त्‍याज्‍य पर हक कैसा ? (कहानी): मंगला रामचंद्रन

Tyajya Par Hak Kaisa ? (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran

श्रीकांत का ध्यान अनायास ही उस महिला की ओर गया। अनायास याने टेबल पर साथ बैठी पत्नी से बात करते हुए ज्यों ही अपने खाने की प्लेट से सिर उठाया तो वो महिला एक युवक के साथ अंदर आ रही थी। रेस्‍त्रां में उस समय अधिक भीड़ नहीं थी, शायद इसीलिए श्रीकांत भी कुछ आराम से, अलसाया सा था बैठा हुआ था। वरना भीड़ के समय तो कई लोग पैक करवा कर ही ले जाते थे। वो महिला आधुनिक पोशाक में बड़े सलीके और तहजीब में बंधी हुई लगी याने जिसे देखकर या मिलकर सामने वाले के मन में उसके प्रति सम्मान का भाव जाग जाये। वो युवक उस महिला से इतनी अंतरंगता से बात कर रहा था कि श्रीकांत के मन में उत्सुकता जाग गई कि दोनों के बीच में क्या संबंध होगा। महिला आकर्षक और अंग्रेजी-हिंदी दोनों में बड़े अच्छे से बात कर रही थी।

उस महिला की ओर श्रीकांत का ध्यान बार-बार जा रहा था, मानो कोई पुरानी पहचान हो या किसी की याद दिला रही हो। आखिर पत्नी ने पूछ ही लिया कि कोई पहचान की या रिश्तेदारों में से है क्या पत्नी को तुरंत ना बोल दिया वरना वह शंका के मारे कितने दिन तक टहोकती रहेगी। पर उसके प्रश्न ने श्रीकांत के मन में ये शंका भर दी कि वो महिला कुछ जानी पहचानी और किसी की याद दिलाती सी लग रही है।

एक वेटर उनकी टेबल पर आया तो उस युवक ने कुछ कहा और वेटर सिर हिलाते और मुस्कुराते हुए हट गया। ना जाने क्यों श्रीकांत को उन दोनों को देख- देख कर मन में उत्सुकता और कौतूहल पैदा हो रहा था। उसने और पत्नी ने खाकर मुखशुद्धि भी कर ली थी और उसने बिल में दबाकर साथ पैसे और वेटर की ट्रिप दोनों रख दी थी। बस उठना ही था पर उठते-उठते वो सोचे बिना नहीं रह पाया कि आजकल बड़ी उम्र की महिलाएं उम्र में बहुत छोटे युवकों के साथ जब शादी कर लेती है तो यूं होटल- रेस्त्रां में साथ आना सामान्य बात ही तो है। दोनों पति- पत्नी टेबल से हटे और तभी एक नवयुवती उसी टेबल की ओर बढ़ी जिस पर वो महिला व युवक बैठे हुए थे। टेबल से हटे हुए पति के मन में उत्सुकता की बाढ़ ही आ गई हो। वो जानबूझकर अपनी क्रियाओं को अत्यंत धीरे- धीरे कर रहा था और नजरों को उन तीनों पर केंद्रित कर रहा था। इसके कारण उसकी पत्नी काफी आगे निकल कर रेस्त्रां के बाहर वाले गेट पर पहुंच गई। वो व्यक्ति इन तीनों के टेबल के पास एक क्षण रुका मानो कुछ कहना चाह रहा हो और फिर निकल गया।

उसकी हरकतों से, खासकर अपनी मां को घूर घूर कर देखना उस युवक को तनिक भी अच्छा नहीं लगा। उसने मां को कहा भी था – ‘मम्मी दूसरी टेबल पर बैठा वो तोंदू हमारी और बार-बार क्यों देख रहा है?’

सुजाता ने तनु से कहा – ‘बेटा, कुछ लोग होते ही ऐसे हैं, यदि हम ऐसे लोगों की हरकतों पर ध्यान देने लगे तो हमारा समय, श्रम और मन की शांति तीनों खत्म होगी।'

‘इडियट’ - तनुज ने उसकी ओर अवहेलना भरी नजरों से देख कर कहा।

सुजाता रहस्यमई मुस्कान के साथ उसका ध्यान बातों में लगाने लगी। उधर वो आदमी बहुत समय तक इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि उस महिला और युवक के बीच संबंधों का जोड़ तोड़ करते में ये युवती कहां फिट होती है?

सुजाता उसे कैसे ना पहचानती? एक तरह से उसकी चुनौती के कारण ही तो वो साहसिक कदम ले पाई। श्रीकांत हूं, यही तो नाम है जिसे तनुज ‘तोंदू’ कह रहा है। सोचते हुए उसे कुछ हंसी और जरा सा भय भी लगा कि अगर तनुज जान जाये कि वो तोंदू ही तो उसका जैविक पिता है तो उसकी प्रतिक्रिया क्या हो सकती है। विचारों को एक झटका देकर दूर करने में उसे देर नहीं लगी खासकर उस व्यक्ति से संबंधित, जिसने अग्नि के इर्द- गिर्द पूरे समाज के सामने पवित्र बंधन का रिश्ता कबूला और तब भी तोड़ने में तनिक भी देर नहीं की।

आज तो वो बेटे तनुज के साथ भविष्य के सपनों में रंग भरने यहां आई है। अपना पूरा ध्यान वो तनुज और उसकी पसंद ईशा के इर्द-गिर्द ही रखना चाहती है। मात्र अपने बेटे की खुशी ही नहीं बहू बनने जा रही ईशा की खुशी का भी उसे ख्याल रखना है।

जितनी सहज और सरल सुजाता है उतनी ही सुलझी हुई उसे ईशा लगी। उन दोनों को आपस में सहजता से बात करते देखना उसे कहीं ना कहीं अंदरुनी रूप से सुखी कर रहा था। वरना आजकल के लड़के लड़कियों का ‘जानू, सोनू और बेबी’ की बौछार करना वो भी जगह वातावरण परिस्थिति के भान से मानों अनजान हो।

इतनी नौटंकी के बाद कुछ अरसे बाद कौन कहां किस हालात में और किसके साथ होगा ये भी नहीं कहा जा सकता। ईशा और तनुज सीधे सुजाता से ही मुखातिब होते हुए अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में बात कर रहे थे। उन दोनों का यह अंदाज उसे अच्छा लगा और दोनों आपस में जिस परिपक्वता से बात कर रहे थे वो भी उसे उनके भविष्य के प्रति आश्वस्त कर रहा था। मन में संतुष्टि के साथ भी एक खिन्नता भर गई है वो सुजाता को परेशान कर रहा था।

मानो इतने लंबे वर्षों के पास श्रीकांत को आज दिखना ही था, जबकि शहर में वो पिछले तीन वर्षों से रह रही है। सुजाता तो अपने उस दो वर्षों से भी कम अवधि के ससुराल वास या पति घर वास को भूल चुकी थी। भूल चुकी कहना भी गलत होगा, सुजाता ने तो उन यादों को दफना ही दिया था। पर जब दफनाई गई चीजों को खदबदाया जाता है तो पोस्टमार्टम की तर्ज पर चीरफाड़ करने पर सिवाय गंदी कीच और तहस-नहस के तर्ज पर बुरी यादें और उन यादों की भयंकर कल्पना जो रूह तक कंपा दे। आज जब उसे लग रहा था कि उसकी तपस्या, उसके लंबे संघर्ष को एक अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है तभी श्रीकांत को एक बुरे शकुन की तरह क्यों दर्शन देना था। स्वयं को भी लताड़ रही थी कि जिस व्यक्ति से उसे रत्ती भर भी मोह या स्नेह का कमजोर तंतु भी नहीं बांध सका, उसे मात्र देखकर वह इतनी परेशान क्यों हो रही है। उसने तय किया कि वह बेटे तनुज को पिछले जीवन के अनखुले पृष्ठों को समय रहते खोल कर रख देगी। कितनी बार किशोर वय के तनुज ने उससे अपने पिता और उनके परिवार के बारे में और अपने सरनेम के बारे में प्रश्न किए हैं। पर पहले आज इस प्राप्य खुशी के पलों को यूं ही व्यर्थ नहीं जाने देगी।

तीनों ने खाना समाप्त किया और सुजाता के कहने पर ईशा के लिए ड्रेस चुनी। उसके पेरेंट्स से भी मिलने गए और तनुज-ईशा के रिश्ते को लेकर दो कदम आगे बढ़ गए। उस हादसे को छोड़कर सुजाता का पूरा दिन इतना अच्छा गुजरा कि वह सोने के पहले इन्हीं लुभावनी यादों की जुगाली करते हुए सो गई। सुबह उठने के थोड़ी देर बाद ही सुजाता के दिमाग में पिछले दिन की सारी घटना एक बार घूम गई।

तनुज को अपने जीवन से जुड़े सारे रहस्य को बताने के लिए, कब से सही वक्त का इंतजार कर रही थी। उसने तय कर लिया कि अब सारी बातों का खुलासा करने का वक्त आ गया है।

पर जब भी बात करने की कोशिश करती तो कोई ना कोई अड़चन आ जाती। आज भी सुबह ब्रेकफास्ट करते हुए तनुज और उसमें पिछले कल की और खासकर ईशा की बातें हुईं। जहां सुजाता ने कहना प्रारंभ किया – ‘कल वो जो आदमी दूसरी टेबल से घूर रहा था, पता है कौन – और तभी तनुज का मोबाइल बजने लगा और वह दफ्तरीय बातों में और आंकड़ों व तथ्यों में ऐसा गुंथ गया कि उससे बात करने के लिए वह तरसती रह गई और वह ऑफिस को निकल गया।

ऐसे जब कई बार हुआ तो सुजाता को यही उचित लगा कि वह सारी बातों का खुलासा एक पत्र या कथा के रूप में लिखकर या बोलकर रिकॉर्ड करके दे दे। उसे कुछ छुपाना तो है नहीं। कितनी बार तो बात शुरू की थी। फिर उसे यह भय लगा कि समय की कमी के कारण बात पूरी ना सुन पाए और अधूरी बात से कोई गलतफहमी मन में समा जाए।

आम मध्यमवर्गीय सुशिक्षित सुसंस्कारित परिवार की तीन संतानों में से सबसे छोटी थी सुजाता। भैया-दीदी दोनों की दुलारी ‘सुजी’ होशियार भी इतनी थी कि पापा और भैया ने तय किया था कि उसे यूपीएससी (UPSC) की परीक्षा की तैयारी करवायेंगे। दीदी और जीजा भी उच्च शिक्षित और पी एच डी थे और यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। दोनों पापा भैया की इस बात से सहमत थे। मां तो अपने परिवार के शिक्षित और संस्कृति स्वरूप से गर्वित और प्रसन्न थी। इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर में उसका प्लेसमेंट हो गया था। पर वो तो भैया और पापा के विचारों से सहमत यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा में मग्न थी। प्रीलिम यानी प्रारंभिक परीक्षा में पास भी हो चुकी थी और घर में सभी प्रसन्नता से फूले नहीं समा रहे थे। भैया-भाभी का कोई प्रोजेक्ट था, जिसके लिए वह परिवार समेत अर्थात दोनों बच्चों के साथ डेनमार्क जाने की तैयारी में थे। घर का पूरा माहौल ही प्रगतिवादी था। दीदी और भैया यूं ही मजाक करते कि अपनी सुजी तो कलेक्टर बन जायेगी, फिर हम इसे इस तरह सुजी या रवा नहीं बुला सकते। सुजाता स्वयं भी तो मजबूत धरातल पर अपने पैर टिकाये हुए कल्पना में आसमान को छू रही थी।

नियति कब किस करवट में क्या-क्या बदल दे मुझे आज तक कोई जान नहीं पाया। हम जिसे अच्छा या भला मौका मानते हैं वो जीवन में अभिशाप की तरह न जाने कैसे और कब घुसपैठ कर जाता है। सुजाता अपने लक्ष्य को पाने की तपस्या में जी जान से लगी हुई थी। लगभग-लगभग तो वो पहुंच  ही चुकी थी, बस जरा सी कसर इंटरव्यू-डिस्कशन आदि में तो उसे कोई दिक्कत ही नहीं होनी थी। जब फल टूटकर झोली में गिरने को हो गया तभी नियति ने उसके खिलाफ विनाशकारी षड्यंत्र का जाल सा बुन दिया था। जिसकी चोट मखमल के दास्ताने में पत्थर भर कर मारने की तरह था।

सुजाता की मौसी, तीनों बच्चों की प्यारी अनु मौसी जो स्वयं भी खुशमिजाज थी और जहां रहती वहां भी आसपास खुशियां बिखेरती रहती थी, वही सुजी के लिए रिश्ता लेकर आई थी। सुजाता के विवाह का तो घर में अभी कहीं से किसी के मन में भी ख्याल नहीं था और ये बात मौसी जानती भी थी वो भी तो सुजाता को उच्च पद पर देखने को लालायित थी और पूरी तरह आश्वस्त भी कि सुजाता सफल ही होगी। पर अनु मौसी को जिस तरह वो प्रस्ताव एक दम हाथों हाथ लेने वाला लगा वैसा ही उसने प्रस्तुत किया। मौसी-मौसा के बहुत अच्छे परिचित के इकलौते बेटे के लिए सुजाता का रिश्ता मांग रहे थे। सुजाता के तो मन में एक पल को भी कभी विवाह के विचार का पदार्पण ही नहीं हुआ था। सदा ज्ञान अर्जन में ही जो खुशी ढूंढती रहती थी उसके लिए अनायास विवाह का प्रस्ताव सुनकर घर के सभी अचकचा गये सुजाता की मां ने तो अपनी छोटी बहन से कहा ही ‘अनु, तेरा दिमाग तो खराब नहीं है, तुझे क्यों लगा कि सुजी अपने इतने बड़े उद्देश्य को बीच में छोड़ देगी, वो भी विवाह के पीछे।

‘दीदी, मैंने ये कब कहा कि वो अपने उद्देश्य से दूर हो जाए या छोड़ दे। मेरे लिए भी वह उतनी ही लाड़ली है जितना आप सबके लिए। कभी ना कभी तो उसके विवाह का सोचना पड़ेगा ना? जीजाजी को सेवानिवृत्त हुए चार वर्ष हो गए और बेटा अजय और बहू भी विदेश जाने वाले हैं। - ‘अनु मौसी थोड़े हताश से स्वर में बोली।

सुजाता के पापा बोले – ‘अनु, तुम्हारी बात भी सही है और मंशा भी ठीक है। मन छोटा मत करो आराम से सारा विवरण बताओ, अभी नहीं तो आगे तो करना ही पड़ेगा ना।'

‘जीजाजी असल में श्रीकांत दिखता भी सुंदर है और इकलौता भी है और हर तरह से समृद्ध भी है। कोई झमेला नहीं, माता-पिता के विवाह के बहुत वर्षों बाद पैदा हुई संतान है। इसीलिये माता-पिता चाहते हैं उचित उम्र में बेटे का विवाह कर दे तो खानदान के उत्तराधिकारी का मुंह तो देख लेंगे। श्रीकांत को हम लोगों ने देखा हुआ भी है और आते जाते बातें भी की है। सुदर्शन व्यक्तित्व का सलीके वाला युवक है मेरी कोई पुत्री है नहीं वरना तो -- -----

‘अरे अनु, दिल छोटा न कर सुजाता और ये दोनों बच्चे तुम्हारे भी तो हैं, मैं जानती नहीं क्या सुजाता की मां ने अपनी संतान विहिन बहन छोटी बहन अनु को मलहम सा लगाते हुए कहा। सुजाता के भाई साहब भी बोल पड़े

- ‘मौसी, लगता है आप सही समय पर इस रिश्ते की बात कर रही हैं। आठ-दस महीने बाद हम लोग डेनमार्क चले गये तो एकदम तो आ नहीं सकते। जाने के पहले ये शुभ कार्य संपन्न हो जाए तो मम्मी-पापा की चिंता भी खत्म हो जाएगी।

मां बोलना चाह रही थी कि सुजाता के विवाह की ऐसी खास चिंता थी ही कहां? बाकी दोनों बच्चों ने जिस तरह अपनी मर्जी से जीवन साथी का चयन किया सुजी भी कर लेगी। वो तो अपने बच्चों के समझदारी से किये गए उचित चयन से अति संतुष्ट थी। पर कहीं न कहीं उनके भी मन में ये भाव आ गया था कि बेटी के लिए बैठे- बिठाए रिश्ता चल कर आ रहा है तो उसे बिना देखे या परखे लौटाना ठीक नहीं होगा। हालांकि सबको उसके इंटरव्यू आदि की चिंता भी थी। मौसी ने आश्वस्त किया कि श्रीकांत और उसका परिवार भी शिक्षित, समझदार लोगों का है, इसलिए कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। सुजाता को तो ऐसा लग रहा था मानो कोई अज्ञात शक्ति उसके जीवन का निर्धारण करती हुई चल रही है। दीदी-भैया जीजाजी सभी तो श्रीकांत और उस परिवार और उनके रिश्तेदारों से मिल कर प्रभावित हुए। श्रीकांत को देखकर सुजाता के मन में पहली बार कुछ उत्साह पैदा हुआ हालांकि अधिक बातें हो नहीं पाई थी। सुजाता अल्पभाषी और घर की सबसे छोटी होने के कारण व्यावहारिक बातों में अल्पज्ञानी भी थी।

पांच महि‍नों बाद ब्याह हो ही गया और सभी अति प्रसन्न थे और अनु मौसी और मौसा जी के प्रति कृतज्ञ थे। हालांकि सुजाता गाजियाबाद आ गई थी पर फ्लाइट से अहमदाबाद से गाजियाबाद अथवा दिल्ली की दूरी कोई मायने नहीं रखती थी। जब इंटरव्यू का कॉल आया तो घर पर कुछ ऐसी अड़चने आई कि सुजाता मन मसोस कर चुप रही, हालांकि मन ही मन वो रोती रही। उसकी दीदी-भैया और बाकी सब को भी बहुत बुरा लगा और दीदी-जीजा को तो लगा कि श्रीकांत चाहता तो सुजाता का ये महत्वपूर्ण पड़ाव आराम से पार हो जाता। श्रीकांत की मां की तो बस एक ही इच्छा हो जैसे, सुजाता दो-तीन होनहार बेटे पैदा कर दे। वरना वंश का नाम कैसे फैलेगा? सुजाता को पति के घर का माहौल कुछ अजीब ही लगता। खासकर अपने मां के घर बिना किसी मनोग्रंथि के भाई-बहनों के बीच बिना किसी लिंग भेद के स्वच्छंद-स्वस्थ वातावरण में जीने के बाद तो यहां उसे बहुत कुछ सोचना पड़ रहा था। जब वह गर्भवती हुई तो सुन-सुन कर उकता गई की पोता ही होना चाहिये । सास को तो वह समझ सकती थी कि पिछली पीढ़ी की है, सोच भी वैसी ही होगी। पर जब श्रीकांत पीछे पड़ गया कि उनके परिवार के बहुत करीब की लेडी डॉक्टर है उससे मिलकर गर्भ में बच्चे के लिंग का पता करा लेते हैं। अब जाकर सुजाता का माथा ठनका और उसे लगा कि श्रीकांत प्रगतिवादी सोच मात्र दिखावा है। अब तो इंटरव्यू पर उसे ना जाने पर जो कारण या माहौल बनाया गया था वो भी कृत्रिम लगा। उसने दीदी से फोन पर अपनी शंकाओं को जताया तो वो अगले ही सप्ताह अपने पति के साथ मिलने सुजाता के घर आ गई। सबके सामने दोनों ने यही कहा – ‘सुजी हम सबकी लाडली है, उसे बिना देखे इतना समय कभी नहीं हुआ था।’

श्रीकांत ने बड़ी शालीनता से कहा- ‘दीदी, आप लोगों के लिए हमारे घर के द्वार कभी बंद थोड़ी थे, जब चाहो आ सकते हो।’

श्रीकांत की बात खत्म होते ना होते जीजा जी ने चुभता हुआ प्रश्न किया- ‘भाई साहब, हमारे घर के द्वार तो आप दोनों के स्वागत के लिए कब से तैयार थे। जब भी आपको आमंत्रण दिया आपने कोई ना कोई बहाना बना दिया। आपकी बड़ी साली साहिबा ने तो कितनी बार तैयारी कर ली थी कि कहां-कहां ले जाना है, क्या-क्या खिलाना है और उसके बाद आपकी तरफ से ना आ पाने का कोई बहाना फोन पर आप सुना देते।’

‘नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, असल में बहुत से पेंडिंग काम पूरे करने थे।’

सुजाता का वि‍स्मित चेहरा देखकर श्रीकांत तुरंत आगे बोल पड़ा- ‘सही में अभी भी बहुत से अधूरे काम पूरे करने के लिए बाकी है, देखिए इन चक्‍करों में मैं सुजाता को आपके फोन के बारे में भी कुछ नहीं बता पाया।

जीजाजी ने उन्हें अजीब नजरों से देखा और मन में कहा, इतनी बार फोन किया और हर बार अपनी पत्नी को बताना भूल गये; अविश्वसनीय। दीदी समझ तो गई कि कहीं ना कहीं कुछ गलत या गड़बड़ है, पर क्या, ये ठीक से समझ नहीं आ रहा था। उन्होंने बात को संभालने की तरह कहा – ‘हम आप दोनों को लेने ही आएं हैं, लेकर ही जायेंगे। हमारे भी तो कुछ अरमान होंगे कि नहीं।’

सुजाता के चेहरे पर अब जाकर कुछ स्मित रेखाएं खिंची, और बच्चों की तरह ललक कर पूछ बैठी – ‘सच दीदी कब चलेंगे?’

‘सुजाता, अभी तुम यात्रा नहीं कर सकतीं, भूल गईं?’ – श्रींकांत ने चेतावनी सी देते हुए कहा।

‘क्या हो गया सुजी को, यात्रा क्यों नहीं कर सकती’ - दीदी के चिंतातुर आवाज ने श्रीकांत को एक तरह से संज्ञान में ला दिया।

‘नहीं वैसे कोई चिंता की बात नहीं है पर फिर भी डॉक्टर कंफर्म कर दे तो मां-पापा आपके यहां खुशखबरी भेजते ही’ - इस उत्तर से श्रीकांत में अपने अपना बचाव भी कर लिया।

‘जो भी हो यह तो बड़ी खुशी की बात है, पर आप हां करें तो डॉक्टर के पास सुजाता के साथ मैं भी चल सकती हूं, हां पर आपकी और आपकी माताजी के इजाजत हो तो।’ --- दीदी को वहां का माहौल कुछ भारी-सा ही लग रहा था।

तब तक सुजाता की सास भी वहां कमरे में आ गई और नौकरानी के हाथों नाश्ता- चाय आदि ले आई।

दीदी को कुछ ना सूझा तो सुजाता की सास को बधाई देते हुए बोली – ‘बस अब तो आप दादी बन रही हैं,’ - उनके हाथ में अपनी लाई मिठाई देते हुए बोली।

‘बस अब तो पोते को गोद में खिला लूं तो मन की तमन्ना पूरी हो जाएगी।’ - सास भी खुशी-खुशी मिठाई मुंह में रखते हुए बोली।

जीजा जी ने यूं ही छेड़ते हुए बोले – ‘अगर पोती हुई तो गोद में नहीं खिलायेंगी क्या? जो भी होगा आप तो दादी ही बनोगी ना!’

‘अरे दामाद जी आपने मिठाई का स्वाद कड़वा कर दिया’ - आधी खाई मिठाई यूं ही छोड़ दी।

पल-पल रंग बदलते माहौल को देखते हुए दीदी और जीजाजी को चुप रह कर सही बात का पता लगाना ही उचित लगा।

भैया-भाभी दोनों बच्चों को लेकर डेनमार्क चले गये थे तो उन्हें अभी किसी चिंता में डालना उचित नहीं लगा लग रहा था। माँ-पापा को सूना घर काटने को दौड़ रहा था सो अपने दोस्त मंडली के साथ देशाटन पर चले गए थे।

सुजाता ने तय कर लिया था कि वो लिंग परीक्षण नहीं होने देगी, चाहे कुछ भी हो जाये। सही में कुछ नहीं, बहुत अधिक कुछ हो गया। जब सुजाता ने लिंग परीक्षण करवाने को अपराध की श्रेणी में रखा तो श्रीकांत को पहली बार इतना क्रोध आया – ‘मुझे अनपढ़ समझ लिया या बेवकूफ, मैं वकालत बिना कुछ जाने ही तो कर रहा हूं। सिर्फ लिंग जान लेना अपराध नहीं होता, हां उसके बाद – - -

‘जब हमारा ही अंश है तो वो जो भी हो प्यारा होगा, बेटी हो या बेटा।’ - सुजाता मरियल से आवाज में बोली।

‘हमें बेटा ही चाहिए, इस घर में बेटियों के लिए कोई जगह नहीं है।’ – ये श्रीकांत की मां की दमदार आवाज थी। सुजाता अपने विचारों और मन की बातों को मन में ही दबा कर रह गई कि भैंस के आगे बीन बजाने का कोई अर्थ नहीं। पर मन में उसने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि कुछ भी हो जाये वो इस गलत बात के लिए झुकेगी नहीं। उसने दीदी- जीजा जी से सारी स्थिति पर बात कर ली थी और मां-पापा भी देशाटन से लौट आए थे।

अगले सप्ताह जब श्रीकांत ने उसे अपनी पहचान के लेडी डॉक्टर के पास जाने की बात कही, तो उसने तसल्ली करने के लिए कहां – ‘रूटीन चेकअप के लिए चल सकती हूं, पर लिंग परीक्षण के लिए नहीं।’

‘कितनी जिद्दी हो, ये तो समझती हो ना कि अब पता लगा ले तो बिना अधिक परेशानी के काम निपट जाएगा। बाद में भी वही हश्र होगा और तुम यूं ही बिना मतलब बोझ ढोती रहोगी ---

‘क्या? सुजाता की चीख निकल गई। एक जीती जागती, अपने ही खून से जन्मी कलेजे के टुकड़े को सिर्फ इसलिए कि ----

इसके आगे वो बोल नहीं पाई और सिसकने लगी। पर उसके सोचने-समझने की शक्ति और तीव्र हो गई। ये समझ आ गया कि टेढ़ी उंगली से ही घी निकलेगा। सो रोना बंद कर के बोली – ‘आज तो अब रहने देते हैं कल देखते हैं।‘

श्रीकांत दांत पीसते रह गया, भुनभुनाते हुए बोला – ‘ जाहिल औरत हो, जरा सी बात समझ में नहीं आती। नौटंकी करती हो।’ फिर गुस्से में ही बोला – ‘अभी तो मुझे कोर्ट जाना है पर शाम 4:00 बजे तैयार रहना, मैं डॉक्टर से बात कर लूंगा, तब चलेंगे।’

सुजाता को कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं थी और श्रीकांत को उसकी ना की आवश्यकता नहीं थी। बस उसने कह दिया कि चलना है तो चलना ही है। श्रीकांत के जाने के बाद सुजाता ने कई जगह फोन खटखटाया और उसके जीजा जी ने अपनी पहचान से कुछ संपर्क सूत्र से मिलकर एक चक्रव्यूह की रचना कर दी जिसमें श्रीकांत अभिमन्यु की तरह घुस तो सकता था पर बाहर निकल नहीं सकता। शाम को घर से निकलते हुए सुजाता ने याचक की तरह कहा था- ‘यह हमारी पहली संतान है सो मेल-फीमेल के पचड़े में ना पड़ें तो ही अच्छा होगा।‘

डॉ प्रभा अत्रे, श्रीकांत की दूर की रिश्तेदार ने दोनों को अपने चेंबर में बैठाया। बड़े आराम से बातें करते हुए सुजाता से सारी जानकारी लेती रही और फिर अंदर जांच के लिए ले गई। बाहर आकर श्रीकांत से कहा- ‘सब ठीक-ठाक है वकील साहब, बस सुजाता संतुलित और पौष्टिक खाना खाये जिसमें सारे विटामिन मिले, प्रोटीन और फाइबर हो तो अधिक सप्लीमेंट लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वैसे वो स्वयं ही पढ़ी- लिखी समझदार महिला है।’

श्रीकांत की खीझ उसके चेहरे पर साफ़ दिख रही थी। वो जिस मतलब से इस डॉक्टर के पास आया उसे तो मानों वो समझ ही नहीं पा रही हो।

‘सुजाता जी, मैं तुम्हें एक चार्ट बना कर देती हूं उसी अनुसार अपनी डाइट रखना, उससे आप भी हेल्दी रहेंगी और बच्चा भी तंदुरुस्त होगा।’

सुजाता ने शालीनता से मुस्कुराते हुए कहा- ‘जी, मैडम!’

‘डॉक्टर साहब, मैंने आपसे फोन पर जो बात की थी ...’ , श्रीकांत कुछ हकला-सा गया।

‘आपने कुछ पुरानी पहचान और रिश्तेदारी आदि कुछ कहा तो था पर असली बात तो यही है कि यू आर गोइंग टू बी ए फादर टू दिस चाइल्ड। बच्चे की मां को खुश रखना अब आपका पहला काम होना चाहिए।’ - उन्होंने अपना लिखा चार्ट सुजाता को देखकर ‘बेस्ट विशेज़’ कहा।

‘प्रभा जी, मैंने आपसे खास कहा था कि बच्चे की सेक्स का पता लगाना है, तभी इतनी दूर आपके पास आया। आपकी मां और मेरी मां के बीच बहुत पुरानी पहचान है, उनकी कोई बात भी हुई थी।

‘इतने विस्तार से तो मुझे मालूम नहीं और पता करने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि मेरे पेरेंट्स या हमारे घर में कोई भी गैरकानूनी कामों में जरा भी रुचि नहीं लेता है । वैसे भी पहली बार गर्भधारण करने पर उसे सहेज कर ही रखा जाता है फिर अंदर पल रहे शिशु का लिंग कुछ भी हो।'

‘फोन पर तो आपने कहा था ---

‘क्या कहा था कि ले आईये मैं लिंग परीक्षण करवा दूंगी।' - डॉ प्रभा के तीखे तेवर देखकर श्रीकांत हड़बड़ा गया । पर चारा क्या था? तभी आगे अपनी पूरी बात करते हुए डॉक्टर बोली – ‘मैंने मात्र इसलिए जांच के लिए यहां आने को कहा कि आप किसी घटिया तरीके को ना अपना लें। मेरा कार्य है महिला को स्वस्थ और अच्छी सोच की जिंदगी देना ना कि विनाशकारी व्यक्तित्व। प्लीज आप जाइए, मुझे दूसरे पेशेंट को देखना है ध्यान रहे कि सुजाता जी की सुरक्षा में आपका सबसे बड़ा हाथ हो।'

पूरे रास्ते श्रीकांत का मूड उखड़ा हुआ रहा, सुजाता को जली कटी सुनाते रहा। सुजाता ने अब तक अपने मन में जो योजना बनाई थी वो और पुख्ता हो गई। घर पहुंचकर मां-बेटे में भी काफी कहासुनी हो गई। तब तक सुजाता अपना सामान, अपने गहने, पासबुक और भविष्य निर्धारण करने वाले जरूरी कागजात आदि पैक कर चुकी थी। ‘मम्मी-पापा लौट कर आ गयें हैं और घर में कोई पूजा रखी है, आपको भी फोन किया था पर शायद आप बात नहीं कर पाये। आप भी चलते हैं तो ठीक है वरना मुझे तो जाना ही होगा ----

‘क्यों, तुम्हारे बिना वहां कोई काम रुक जाएगा? कोई जरूरत नहीं है जाने की, अभी यहां इतनी जरूरी काम पड़े हैं ----- श्रीकांत इतनी जोर से चिल्ला पड़ा कि सुजाता एक पल को सहम गई। पर फिर साहस को समेटकर बोली - ‘मैं तो जाऊंगी ही, मेरी कैब बाहर तैयार है और फ्लाइट की टिकट भी’ - सुजाता ने पूरी शक्ति बटोर कर अपने सामान को लेकर उस दम घोंटने वाले वातावरण से जल्दी ही निकल गई। 

पीछे से श्रीकांत की आवाज़ चीखते हुए फटी और खीझ भरी आवाज में उसे जरा भी ठिठकाया नहीं। ‘यदि आज जा रही हो तो फिर कभी मत आना, डिवोर्स के पेपर्स भिजवा दूंगा ----

कैब में बैठकर इतने दिनों बाद सुजाता ने मानों मुक्ति की सांस ली। उसे अपना निर्णय हर तरह से सही लगा। शिक्षित होकर सही सोचने-समझने की प्राप्ति को यूं ही जाया होने देना भी तो एक तरह से अपराध ही है। जैसा कि संभावित था मायके पहुंचने के दो हफ्ते बाद ही डिवोर्स के कागजात भी पहुंच गये। शायद श्रीकांत को लगा कि वह घबराकर वापस आ जाएगी। पर सुजाता तो पिंजरे से छूटकर उड़े पंछी की तरह नीले गगन में उड़ने को तैयार हो रही थी मां पापा को अवश्य डिवोर्स पेपर्स पाकर बुरा लगा पर समझ वो भी रहे थे कि बेटी घुट-घुट कर वहां रहे वो भी ठीक नहीं। सुजाता ने तुरंत ही पेपर्स पर हस्ताक्षर करके भिजवा दिए और अपने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा तुम पर केवल मेरा हक है।'

सुजाता को माता-पिता, दीदी जीजाजी का बहुत सहयोग मिला जिससे तनुज को अच्छे माहौल में जन्म दे सकी। परवरिश तो उसकी अच्छी मानसिकता में होनी ही थी। सुजाता ने सरकारी उच्च पद को जिस ईमानदारी और श्रम से प्राप्त किया वो एक अलग ही गाथा है। भैया-भाभी भी बीच-बीच में भारत आया करते थे। अपने परिवार के सहयोग से सुजाता स्वयं तथा तनुज को सुरक्षित प्रगतिवादी सोच और प्रभावशाली व्यक्तित्व की देन प्राप्त कर सकी। श्रीकांत एक बार, सिर्फ एक बार सुजाता के मायके आया क्योंकि उसे पता चल गया था कि सुजाता को बेटा हुआ है सुजाता ने उसे दूर ही से बेटे को दिखाया और कहा – ‘बेटी होती तब भी इसी तरह विश्वास और प्यार के बंधन में पलती। संतान तां संतान ही होती है।

श्रीकांत के चेहरे पर ग्लानि की काली छाया साफ दिख रही थी। सुजाता समझ चुकी थी कि वह आगे क्या कहेगा, सो स्वयं को कड़े निर्णय लेने को तैयार कर लिया था। क्योंकि बुजुर्ग माता-पिता उसका निर्णय बदलने की एक बार कोशिश कर सकते हैं।

‘सुजाता डिवोर्स पेपर का फैसला अभी हुआ नहीं है, मैं उसे वापस ले लूं तो अपने घर आ जाओगी?’ - सहम सहम कर एक अपराधी की तरह बोलते श्रीकांत के प्रति घर में किसी का मन नरम ना पड़ जाये, यह सोचकर उसने तुरंत फैसले की तरह अपनी बात सुना दी – ‘जिस दिन आपने मुझे छोड़ा, उसी दिन से मेरे गर्भ में पल रहे शिशु पर से भी आपका हक खत्म हो गया था। यह बच्चा मात्र मेरा है और मेरे इस समस्त परिवार का इस बच्चे पर आप से अधिक ही हक होगा। इन सब की मदद के बिना मेरा कठिन समय कैसे गुजरता, इसकी आपने कभी कल्पना भी की है?’

श्रीकांत उस हारे जुआरी की तरह लग रहा था जो स्वयं के कर्म और स्वयं की सोच पर भरोसा करने के बजाय एक अनिश्चित से सामाजिक जकड़न में बंध कर रह गया।

‘तनुज तुम कई बार पूछा करते थे कि तुम्हारे पिता की तरफ के कोई भी रिलेटिव्स नहीं है क्या? मैं सदा कहती रही थी कि समय आने पर बताऊंगी। तुम विचारों में अपनी उम्र से अधिक परिपक्व हो, मैं तुम्हें कुछ वर्षों पहले भी बता सकती थी पर मेरी नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच जब कभी समय मिलता तो यही लगता कि समय को हंसी खुशी गुजारा जाये। वैसे भी तनुज तुम अपनी मां की पॉजिटिव एटीट्यूड को जानते हो ना! सो बुरी यादों को सहेज कर समेटने में भी समय लगा। अब जब लंबी छुट्टियों में समय मिला तो तुम्हें बताना चाहा। पर बेटा तुम भी तो ईशा के साथ व्यस्त हो गये। उस दिन होटल में जब श्रीकांत को उसकी पत्नी के साथ देखा तब लगा कि मुझे अब देर नहीं करनी है क्योंकि शहरों के बीच दूरियां इतनी अधिक नहीं रह गई जितनी मन में हैं। गाहे-बगाहे आमने-सामने होते रहेंगे और तुम्हारे मन में किसी भी क्षण कोई गलतफहमी पैदा हो जाये यदि मैं तुमको सुनाने बैठती तो टुकड़ों-टुकड़ों में अलग-अलग बैठक में ही बता पाती तब भी कुछ शेष रह जाता इसलिए कलमबद्ध करके रख रही हूं कि तुम पूरे हादसे को सही परिप्रेक्ष्य में देख सको।

याद है तनुज, नानू हमेशा कहा करते थे ना कि कोई भी कार्य जिसे अंतर्मन गवाही ना दे, नहीं करें। ये जो भी लिखा है मेरे चेतन और अवचेतन मन में जो छपा हुआ है उसी का प्रतिबिंब है। लेशमात्र भी, ना पक्षपात के तौर पर ना ही किसी को लांछित करने के लिए, घटाया-बढ़ाया है। अब जब तुम एक नए जीवन के इंद्रधनुषी रिश्ते में बंध रहे हो तो यही चाहूंगी कि ईशा भी इसे पढ़े और स्वतंत्र मन और खुले दिल से तुम्हें स्वीकारे।

तनुज और ईशा दोनों ने साथ ही पढ़ा, क्योंकि लिफाफे के ऊपर दोनों का नाम था दोनों की आंखें भीगी हुई थी। तभी बाहर सुजाता की कार रुकी और ड्राइवर ढेरों फूलों के साथ सुजाता के पीछे आ रहा था। तनुज और ईशा विस्मित से खड़े थे। कार में साथ आये सुजाता की पीए ने कहा – ‘तनुज भैया, मैडम का ट्रांसफर राजधानी को हो गया वह भी प्रमोशन पर ....

‘सच मां! ग्रेट, मम्मा यू आर रियली अमेज़िंग। तनुज बच्चे की तरह उनसे लिपट गया।

‘यस मां, तनुज सही कह रहा है।’ ईशा भी स्नेह और आदर के मिले-जुले भाव से उन्हें देख रही थी।

‘सही कह रहा है तो इतनी दूर क्यों खड़ी हो’ - सुजाता आश्वस्त होते हुए बोली।

रात को साथ खाना खाते हुए तनुज ने कहा – ‘मम्मा, आपने उस श्रीकांत को जो हक की बात समझाई वो मुझे बड़ी अपीलिंग लगी। पर आपके दिमाग में इतना बोल्ड कदम उठाने का साहस कैसे आया, बहुत बड़ी बात है।’

‘जो व्यक्ति न्याय की कुर्सी पर बैठ कर अनाचार और अन्याय की बात करें उसके प्रति मेरे मन में स्नेह, आदर या कोई और कोमल भाव जाग सकता है क्या?’

  • मंगला रामचंद्रन : कहानियाँ हिन्दी में
  • तमिल कहानियां और लोक कथाएं
  • मुख्य पृष्ठ : भारत के विभिन्न प्रदेशों, भाषाओं और विदेशी लोक कथाएं
  • मुख्य पृष्ठ : संपूर्ण हिंदी कहानियां, नाटक, उपन्यास और अन्य गद्य कृतियां