Tohfa Saadat Hasan Manto

तोहफ़ा सआदत हसन मंटो

पात्र/अफ़राद
जुगल: (आवाज़ में बेनियाज़ी है)
शीला: (ख़ुश-आवाज़ लड़की)
गणेश: तालीम-ए-याफ़ता बनिया। बोलने का जचा तुला अंदाज़
एक लड़की: शीला की सहेली
दुकानदार: (अन-पढ़ बनिया। झगड़ालू किस्म का आदमी)
रामू: (नौकर)

(कॉलेज का घंटा बजता है। साथ ही कई क़दमों की आवाज़)

शीला: जुगल ! जुगल !
जुगल: ओ ! शीला
शीला: मैं तुमसे एक बात कहना चाहती हूँ ?
जुगल: कहो।
शीला: मैंने बहुत ग़ौर किया और इस नतीजे पर पहुंची हूँ कि हमारा आपस में मिलना ठीक नहीं। कॉलेज में या कॉलेज के बाहर अब हमें एक दूसरे से नहीं मिलना चाहीए।
जुगल: क्यों?
शीला: इस लिए कि।
जुगल: कहो कहो ! साफ़ साफ़ कहो।
शीला: इस लिए कि लोग तुम्हें अव्वल दर्जे का बदमाश, आवारागर्द और लुचा ख़्याल करते हैं।
जुगल: (हँसता है) सिर्फ ख़याल ही करते हैं। उन्हें अब तक यक़ीन होना चाहीए था।
शीला: जुगल तुम कभी संजीदा होना भी सीखोगे या नहीं।
जुगल: नहीं।
शीला: क्यों?
जुगल: संजीदगी में क्या धरा है। यानी ख़्वाह-मख़ाह आदमी संजीदा होता फिरे। मैं सेहत मंद हूँ और सेहत मंद रहता हूँ। अपनी ज़िंदगी को ये रोग नहीं लगाना चाहता।
शीला: तुमने मेरा फ़ैसला सुन लिया।
जुगल: सुन लिया।
शीला: तुम्हें क़बूल है?
जुगल: मैं दूसरों के फ़ैसले क़बूल नहीं करता। मैं तुमसे मिलूँगा और मिलता रहूँगा।
शीला: ज़िंदगी अजीरन गवाओगे मेरी।
जुगल: (मुस्कुरा कर) मैं तुम्हें अपनी ज़िंदगी दे दूँगा।
शीला: (अज़राह मज़ाक़) जो तुम्हारे इस बूट की तरह घसी हुई है।
जुगल: इस्तिमाल जो ज़्यादा करता रहा हूँ मगर सिर्फ उस का तला ही घिसा है। ऊपर का हिस्सा बिलकुल ठीक है। पालिश करोगी तो चमक उठेगी।
शीला: तुम ख़ुद पालिश क्यों नहीं करते?
जुगल: इस लिए कि।
शीला: ठहरो ! मैं इस वक़्त संजीदा होना चाहती हूँ। बताओ तुम ख़ुद पालिश क्यों नहीं करते। तुम अपनी इस्लाह की कोशिश क्यों नहीं करते, लोग तुम्हें अव़्वल दर्जे का आवारागर्द समझते हैं।तुम उनके दिमाग़ से ये ख़्याल दूर क्यों नहीं करते। तुम क्यों इतने बेपरवाह हो। क्या तुम्हारा ये लाउबालीपन कभी दूर नहीं होगा।क्या तुम कभी इन्सान नहीं बनोगे?
जुगल: आहिस्ता-आहिस्ता।
शीला: लोग मेरी जान खा गए हैं। जिधर जाती हूँ मेरी तरफ़ उंगलियां उठती हैं। मेरी कैरक्टर पर हमले किए जाते हैं।मैं सब कुछ सहती हूँ सिर्फ़ तुम्हारी ख़ातिर।
जुगल: मेरी ख़ातिर।
शीला: भगवान जाने मेरी अक़ल को क्या हो गया है। मुझे तुमसे इतना उनस क्यों पैदा हो गया है। मैं तुमसे बिलकुल किनारा-कश हो जाती। तुम्हारे ख़्याल तक को अपने दिल-ओ-दिमाग़ से महव कर देती मगर मुझे तरस आता है कि तुम और भी ज़्यादा बहक जाओगे।
जुगल: तुम मुझ पर तरस खाती हो। मैं कोई ज़ख़मी गधा नहीं। कोई लंगड़ा कुत्ता नहीं। कोई बीमार भैंस नहीं।
शीला: (ज़रा दुरुश्ती के साथ) जुगल !
जुगल: बको नहीं।
शीला: (धीमे लहजे में। अफ़्सुर्दगी के साथ) जुगल !
जुगल: जुगल अव़्वल दर्जे का बदमाश। शुहदा लुचा और आवारागर्द है।
शीला: मैंने ये कभी नहीं समझा।
जुगल: वो अपने बालों में तेल नहीं लगाता। मैले कपड़े पहनता है। उस का जूता फटा हुआ है।
शीला: मैंने ये कभी नहीं कहा।
जुगल: पहले नहीं कहा तो अब कह लो। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझसे नफ़रत करो। अभी इसी वक़्त । मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी अक़ल दरुस्त हो जाये और वो रत्ती भर उनस जो तुम्हारे दिल में पैदा हो गया है दूर हो जाये तुम मुझसे बिलकुल किनारा-कश हो जाओ ताकि मैं और ज़्यादा बहक सकूँ।
शीला: तुम कितने बेरहम हो।
जुगल: लोग तुम्हारी जान खा गए हैं।जिधर जाती हो तुम्हारी तरफ़ उंगलियां उठती हैं। तुम्हारे कैरक्टर पर हमले किए जाते हैं। सिर्फ मेरी ख़ातिर। मुझ शुहदे, लुचे और आवारागर्द की ख़ातिर। तुम्हारा फ़ैसला अब मुझे मंज़ूर है इस लिए कि तुम मुझ पर बेकार तरस खाती रही हो। तबीयत पर जबर करके मुझ पर रहम करती रही हो।
शीला: तुम बहुत जल्द भड़क उठे हो। मुझे तुमसे झूट-मूट का उनस नहीं है। मेरी हमदर्दी मस्नूई हमदर्दी नहीं है। मैं तुम पर तरस खाती हूँ इस लीए के दूसरे तुम पर तरस नहीं खाते। वो चाहते हैं कि तुम और ज़्यादा बहक जाओ। तुम्हारा वजूद बिलकुल मुंतशिर हो जाये। तुम्हारे टुकड़े टुकड़े हो जाएं। इस तौर पर कि तुम फिर उन्हें इकट्ठा भी ना कर सको। मैं ये नहीं चाहती मुझे तुमसे हमदर्दी है। मैं औरत हूँ। मैं चाहती हूँ कि तुम सलामत रहो। वो तमाम खूबियां जो लोगों के नज़दीक तुम्हारे अंदर नहीं पैदा हो जाएं। मैं बड़े फ़ख़र के साथ कह सकूँ जुगल साहिब मेरे दोस्त हैं।
जुगल: (तम्सख़र आमेज़ हंसी) जुगल साहिब। ये जुगल साहिब हैं शहर के बहुत बड़े रईस। बहुत बड़ा नाम है आपका। आपकी पतलून में चार पैवंद लगे हैं कोट आपने किसी दोस्त का पहन रखा है। जूता आपका फटा हुआ है(हँसता है) ये जुगल साहिब हैं(हँसता है) जाओ शीला जाओ। एक नाकारा आदमी में इतनी दिलचस्पी ना लो। पढ़ो। इमतिहान पास करो और शादी वादी करके इतमीनान से एक जगह बैठ जाओ

(शादी वादी के साथ ही शहनाइयों का रिकार्ड लगा दिया जाये। थोड़ी देर के बाद हुजूम का शोर पैदा किया जाये। चंद लमहात के बाद इन आवाज़ों को धीमा कर दिया जाये और जे़ल का मुकालमा सपरामपोज़ किया जाये।)

एक आदमी: क्या हो रहा है भाई यहां?
दूसरा आदमी: शादी ब्याह हो रहा है।
जुगल: किस का।
पहला आदमी: तुम जानते हो।
जुगल: मुझे क्या मालूम
पहला आदमी: राय बहादुर श्यामसुंदर जी की सुपतरी शीला का ब्याह हो रहा है।
जुगल: किस के साथ
पहला आदमी: राय साहिब लाला गणेश प्रशाद जी के साथ । शहर के बहुत बड़े रईस हैं । लाखों में खेलते हैं।
जुगल: ज़रूर खेलते होंगे। सिगरट का एक कश मुझे भी देना।
पहला आदमी: नया ले लो।
जुगल: नहीं नहीं। यही दो। नया तुम सुलगा लो (हँसता है) सुलगे सुलगाए सिगरेट मुझे अच्छे लगते हैं इस लिए कि सुलगाने नहीं पड़ते।
(शहनाइयों की आवाज़ बुलंद हो कर फिर अक़ब में चली जाये)
जुगल: बड़ा जमघट लगा है।
पहला आदमी: बरात आ चुकी है।
जुगल: चली भी जाएगी।
पहला आदमी: (हँसता है) तो क्या यहीं बैठी रहेगी। कैसी बातें करते हो यार।
जुगल: (हँसता है) बस ऐसी बातें ही किया करता हूँ।
दूसरा आदमी: ये लड़की किसे ढूंढ रही है?
जुगल: जाने बला।
पहला आदमी: तुम्हारी तरफ़ देख रही है।
जुगल: मेरी तरफ़ ? (हँसता है) लेकिन मैं तो शादी नहीं करना चाहता।
(तीनों हंसते हैं)
लड़की: आप में से किस का नाम जुगल है।
पहला आदमी: मेरा तो नहीं है इस से पूछ लो।
लड़की: (जुगल से) किया जुगल साहिब आप हैं।
जुगल: साहिब कोई और होगा। मैं सिर्फ जुगल हूँ।
लड़की: चलीए ! आपको अंदर बुलाया है।
जुगल: किस ने?
लड़की: आप चलीए मैं बताती हूँ।
जुगल: क्या मेरा चलना ज़रूरी है।
लड़की: जी हाँ।
जुगल: (अपने साथीयों से) अच्छा भई रुख़स्त चाहता हूँ। सिगरेट का शुक्रिया।
पहला आदमी: (अज़राह-ए-मज़ाक़) एक और लेते जाओ। शायद अन्दर ज़रूरत पड़े।
जुगल: (हँसता है) नहीं पड़ेगी।
(शहनाइयों और हुजूम का शोर अक़ब से उभर आए और चंद लमहात के बाद दब जाये।)

जुगल: आपने मुझे बुलाया है । फ़रमाईए?
शीला: (इज़तिराब भरे लहजे में) तुमने मुझे आप क्यों कहा?
जुगल: देर के बाद मुलाक़ात हुई इस लिए ये अजनबीयत पैदा हो गई।
शीला: तुम अभी तक वैसे के वैसे हो।
जुगल: जी हाँ अभी तक वैसे का वैसा हूँ। क्या जनाब आपको इस पर कोई एतराज़ है।
शीला: (और ज़्यादा मुज़्तरिब हो कर) ये आदाब किस लिए।
जुगल: आपके शानदार लिबास से मरऊब हो गया हूँ।
शीला: (तंग आकर) आह। तुम मुझे दीवाना बना दोगे। मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है। मैंने तुम्हें यहां इस लिए बुलाया था कि मैं तुमसे बेशुमार बातें करना चाहती थी मगर अब मुझे एक भी याद नहीं आती।तुम्हारे इस अजीब-ओ-ग़रीब लहजे ने मुझे सब कुछ भुला दिया। बताओ मुझे क्या कहना था?
जुगल: मुझे क्या मालूम?
शीला: तुम्हें सब कुछ मालूम है। तुम सब कुछ जानते हो। जल्दी करो। मेरे पास बहुत थोड़ा वक़्त है। बताओ। बताओ। मैं तुमसे क्या कहना चाहती थी। बताते क्यों नहीं?
जुगल: मुझे क्या मालूम।
शीला: तुम।तुम। तुम्हारी सेहत कैसी है?। तुम बहुत दुबले हो गए हो। हैं, मैं बिलकुल अच्छी हूँ। लेकिन तुम।(तंग आकर) नहीं। मैं कुछ और ही पूछना चाहती थी(बाहर से किसी औरत की आवाज़ आती है,शीला)। देखा।वक़्त हो गया। तुमने मुझे कुछ नहीं बताया। और मुझे बेशुमार बातें कहना थीं।
जुगल: तुम्हारी शादी हो रही है।
शीला: हाँ।हाँ।मुझे तुमसे ये भी कहना था।
(दस्तक होती है)
शीला: (बुलंद आवाज़ में) ठहरो। (जुगल से) कुछ और भी कहो।
जुगल: क्या कहूं
(दस्तक होती है)
शीला: आई।तौबा। दस्तक दे देकर दरवाज़ा तोड़ दिया है (जुगल से) जुगल अब तुम जाओ। क्या करूँ मजबूरी है। लेकिन देखो कभी कभी मुझसे मिलने के लिए ज़रूर आया करना। ज़रूर ज़रूर इधर से।
(दरवाज़ा खोलने की आवाज़)
शीला: मुझे भूलना मत । सुनते हो। मुझे भूल ना जाना।
(शहनाइयों और हुजूम की आवाज़ उभर कर ऊंची हो जाती है। चंद लमहात के बाद फेड आउट)

गणेश: शीला
शीला: जी
गणेश: तुम्हारे एलबम में ये तस्वीर किस की है।
शीला: ठहरिए। मैं आके बताती हूँ।
(क़दमों की आवाज़)
शीला: ये?
गणेश: किस की है?
शीला: जुगल साहिब की।
गणेश: वो कौन
शीला: आप नहीं जानते। कॉलेज में ये हमारे साथ पढ़ा करते थे।
गणेश: ऐसा मालूम होता है कि मैंने इस शख़्स को कहीं देखा है।
शीला: देखा होगा।
गणेश: हो सकता है मगर मैंने उसे अच्छी तरह देखा था इस लिए कि इस का लिबास उस की वज़ा क़ता।
(घड़ी चार बजाती है)।
शीला: लीजिए चार बज गए। अब क्या ख़ाक तैयारी होगी मुझसे और हमें ठीक पाँच बजे वहां पहुंचना है। एलबम को छोड़िए और मोटर निकलवाने के लिए कहीए।
गणेश: तुम्हें साड़ी तबदील करना थी।
शीला: यही ठीक है। साड़ी तबदील करूँगी तो सारी चीज़ें बदलना पड़ेंगी। नया ब्लाउज़। नया पेटीकोट और फिर ये सैंडिल भी तो उतारना पड़ेगी। यही ठीक है।
गणेश: लेकिन इतनी जल्दी किया है।
शीला: वाह। मुझे रास्ते में अपनी एक दो सहेलीयों से भी तो मिलना है। चलीए। चलीए।

(क़दमों की चाप। बाद में मोटर की आवाज़)
(एक दम हुजूम का शोर सुनाई देता है ऐसा मालूम होता है कि लोग लड़ झगड़ रहे हैं। शोर के इस टुकड़े पर जे़ल का मुकालमा सुपर अमपोज़ किया जाये।)

दुकानदार: नहीं साहिब मैं उसे कभी नहीं छोड़ूँगा। ऐसे हज़ारों घुसे मुझे दे चुका है।
एक आदमी: एक-बार और देख लो।
दुकानदार: क्या देख लूं। अब का गया छः महीने अपनी शक्ल नहीं दिखाएगा ये तो इत्तिफ़ाक़ से मेरी नज़र पड़ गई वर्ना कभी हाथ ना आता।
दूसरा आदमी: तो अब तुम क्या करना चाहते हो।
दुकानदार: पकड़ कर थाने में ली जाऊँगा और क्या खड़ा साले का मुँह देखता रहूँगा
(मोटर के हॉर्न की आवाज़)
दुकानदार: आप लोग जाईए। क्या कोई तमाशा है।
तीसरा आदमी: तमाशा ही तो है। तुम इस से अपने रुपये मांगते हो, ये कहता है मेरे पास नहीं। तुम कहते हो। नहीं मैं नहीं मानता। तुम्हारे पास हों ना हों अभी निकाल कर दो।
(बहुत से आदमी हंसते हैं)।
दुकानदार: तो क्या करूँ।फिर भाग जाएगा।क्या सारी उम्र उसी को ढूंढता रहूँगा।
पहला आदमी: अरे भाई तुमने क्यों क़र्ज़ लिया था। अब देखो कितनी ख़िफ़्फ़त उठानी पड़ रही है तुम्हें।
(मोटर के हॉर्न की आवाज़)।
दूसरा आदमी: भई रास्ते से तो हट जाओ।
दुकानदार: आप लोग हट जाएं मैं तो यहीं खड़ा रहूँगा। इस का गिरेबान पकड़े।
तीसरा आदमी: ये कैसा आदमी है ख़ुद कुछ बोलता ही नहीं।
दुकानदार: क्या बोलेगा। रुपयेा देना है और हर हालत में देना है।
(मोटर के हॉर्न की आवाज़। बिलकुल क़रीब)
गणेश: रास्ते से हटोगे या मोटर ऊपर चढ़ा दूँ। बाज़ार के ऐन बीच में तमाशा लगा रखा है।
(हुजूम का शोर)
शीला: (घबरा कर) चलीए अब रास्ता साफ़ हो गया।
गणेश: ठहरो।(बुलंद आवाज़ में) ए ! ज़रा इधर आओ।
दुकानदार: मुझे बुलाया है सेठ साहिब?
गणेश: क्या बात है?
दुकानदार: रुपयेा लेना है सेठ साहिब। छः महीने हो गए हैं। बराबर मुझे घुसे दिए चला जा रहा है। आज देता हूँ। कल देता हूँ। बस इस तरह छः महीने गुज़र गए हैं।
गणेश: कितनी रक़म निकलती है तुम्हारी उस की तरफ़।
दुकानदार: सवा नौ रुपये।
गणेश: बस।(वक़फ़ा) लो ये दस रुपये का नोट
शीला: (इज़तिराब के लहजे में) आप क्यों किसी का क़र्ज़ अदा करते हैं वो ख़ुद अदा करे।
गणेश: कहाँ से अदा करेगा। (दुकानदार से) सवा नौ रुपये कहे थे ना तुमने?
दुकानदार: जी हाँ
गणेश: बारह आने बचेंगे। ये तुम उसे दे देना।
शीला: (क़रीब क़रीब चीख़ कर) आप नोट वापिस लीजिए। आप ज़बरदस्ती भीक दे रहे हैं।
(मोटर स्टार्ट होती है और चल पड़ती है)
पहला आदमी: ये कौन था?
जुगल: (ज़हर-ख़ंद के साथ) तुम नहीं जानते ये कौन थे। ये शहर के बहुत बड़े रईस थे। राय साहिब लाला गणेश प्रशाद। लाखों में खेलते हैं। तुमने देखा नहीं था कि उनकी पतलून में एक भी पैवंद नहीं था। कोट उनका अपना था। जो ताबालकल नया था।
दुकानदार: लो ये बारह आने
जुगल: लाओ। मेरी जेब बिलकुल ख़ाली थी।
(हुजूम का शोर। चंद लमहात के बाद फेड अप)
(आहिस्ता-आहिस्ता जे़ल की ग़ज़ल की धुन शुरू हो। साज़ों पर फिर शेअर गाय जाएं।)

ग़ज़ल
ग़म की दुनिया बसा रही हूँ मैं
उन को अपना बना रही हूँ मैं
साज़-ए-हस्ती के तार टूट ना जाएं
नग़्मा-ए-दिल सुना रही हूँ मैं
सुई-ए-नाकाम के चराग़ों को
आंधीयों में जला रही हूँ मैं
(परवेज़)
(चंद लमहात तक साज़ दर्द-नाक लै में बजते रहें)

गणेश: शीला
शीला: (अफ़्सुर्दगी के साथ) जी
गणेश: तुम्हारे एलबम से वो तस्वीर कहाँ गई।
शीला: वो जो आपने उस रोज़ देखी थी।
गणेश: हाँ वही
शीला: निकाल दी है
गणेश: क्यों। बड़ी अच्छी तस्वीर थी।
शीला: (लहजे में दबे हुए सदमे के आसार नज़र आते हैं) अच्छी ही थी।
गणेश: तो निकाल क्यों फेंकी।
शीला: निकाली है फेंकी नहीं।
गणेश: मेरा मतलब यही था।
शीला: अच्छा
गणेश: तुम्हारी तबीयत कई दिनों से सुसत सी है। ग़ालिबन उसी दिन से जब हम मोटर में बाहर गए थे।
शीला: जी हाँ। उसी दिन से सुसत है हवा लग गई थी।
गणेश: मुझे याद आया। उसी रोज़ वाक़ई हवा बहुत तेज़ थी।
शीला: सर्द भी।
गणेश: सर्द भी। ये हवा बाज़-औक़ात बहुत तेज़ और सर्द हो जाती है।
शीला: जी हाँ
गणेश: शीला अपने उस दोस्त की कुछ बातें तो सुनाओ। तुम्हारी तबीयत बहल जाएगी।
शीला: क्या सुनाऊँ।
गणेश: कुछ भी। तस्वीर से आदमी दिलचस्प मालूम होता था। क्या नाम बताया था।
शीला: जुगल साहिब
गणेश: जुगल साहिब (साहिब पर-ज़ोर दे कर) आपकी कोई ख़ास ख़ूबी।
शीला: आवारा मिज़ाजी।
गणेश: (हँसता है) मज़ाक़ करती हो।
शीला: (इंतिहाई संजीदगी के साथ) मज़ाक़ नहीं करती। जुगल साहिब की सबसे बड़ी ख़ूबी उनकी आवारा मिज़ाजी है। उनका लाउबालीपन।
गणेश: तो वो एक नहीं कई ख़ूबीयों के मालिक हैं।
शीला: जी हाँ। वो बेहद मुफ़लस। इंतिहा दर्जे के ग़लाज़त पसंद। बदतमीज़। आदाब से नावाक़िफ़ (आवाज़ गुलूगीर हो जाती है) बदज़ुबान और ज़िल्लत पसंद हैं।
गणेश: तुम सरीहन मज़ाक़ कर रही हो। मैं हरगिज़ मानने के लिए तैयार नहीं।
शीला: (तल्ख़ लहजे में) मज़ाक़ आप कर रहे हैं।
गणेश: तुम्हारी सालगिरा की ख़ुशी में आज शाम को एक दावत कर रहा हूँ। तुम जुगल साहिब को बुलाओ। मैं उन से मिलना चाहता हूँ।
शीला: (एक दम भड़क उठती है) बस-बस। अब आप मेरी आत्मा को दुख ना दीजिए बहुत ज़हरीली सूईयां आप मुझे चुभो चुके।(रोनी आवाज़ में) जी भर के आपने मुझे ज़लील कर लिया। क्या अभी तक कलेजा ठंडा नहीं हुआ। जो कुछ आप चाहते थे मैंने कह दिया है। आपने कहलवा लिया है। अब आप और क्या चाहते हैं। वो बदमाश है। लुचा है। आवारागर्द है। इन्सानियत के दामन पर बदनुमा धब्बा है। काबिल-ए-नफ़रत इन्सान है। कुछ और कहूं या इतना ही काफ़ी है।
गणेश: (जचे तुले अंदाज़ में) इतना काफ़ी नहीं है। आज शाम को वो दावत में ज़रूर शरीक होंगे।
शीला: मैं उसे हरगिज़ नहीं बुलाऊँगी।
गणेश: मुझे मालूम था। इस लिए मैंने ख़ुद उन से आने को कहा और उन्होंने कमाल इनायत से मेरी दरख़ास्त क़बूल कर ली।
शीला: (सख़्त घबराहट के साथ) वो आएगा। नहीं नहीं। वो कभी नहीं आएगा। अग्र वो आएगा तो आप मुझे मौजूद ना पाइएगा।
गणेश: मैं इस का इंतिज़ाम भी कर लूंगा (हँसता है)। आज शाम को पाँच बजे तुम दोनों दावत में शरीक होगे।
(घड़ियाल के अलार्म की ख़रख़राहट। पाँच बजने की आवाज़ और साथ ही हुजूम का शोर)
एक मेहमान: राय साहिब बड़े ठाट की दावत की है।
गणेश: लाला जी शीला की सालगिरा हो और ये ठाट ना किए जाएं (मुस्कुरा कर) क्यों शीला?
शीला: इतना एहतिमाम सिर्फ आप ही कर सकते थे।
गणेश: (मुस्कुरा कर) सिर्फ तुम्हारी ख़ातिर?
दूसरा मेहमान: राय साहिब। अब किस का इंतिज़ार है दावत शुरू हो।
गणेश: सब मेहमान आ चुके हैं। सिवाए एक के। उनके बग़ैर प्रोग्राम शुरू नहीं हो सकता।
दूसरा मेहमान: कौन है ये महाशय?
गणेश: शीला के कॉलेज के ज़माने के दोस्त। जुगल साहिब अभी तक आए नहीं शीला ?
शीला: आही जाऐंगे
(मोटर के हॉर्न की आवाज़)
तीसरा मेहमान: ये कौन आया?
दूसरा मेहमान: आगे बढ़के देख लो।
(क़दमों की आवाज़)
तीसरा मेहमान: बड़ी शानदार मोटर है।
चौथा: बिलकुल नया मॉडल है।
तीसरा मेहमान: आजकल तो बहुत ज़्यादा क़ीमत होगी उस की?
(क़दमों की आवाज़)
रामू: सरकार। जुगल साहिब तशरीफ़ लाए हैं।
गणेश: आ गए
रामू: हाँ सरकार आ गए।
गणेश: उन्हें अंदर ले आओ। रामू।
(क़दमों की आवाज़। माइक्रोफोन की तरफ़)
गणेश: (हैरत के साथ) ये कौन है?
(क़दमों की आवाज़ क़रीब-तर आजाती है)
जुगल: (बावक़ार,शगुफ़्ता और बातमीज़ लहजे में) अगर नागवार ख़ातिर ना हो तो क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आप में से कौन साहब-ए-ख़ाना हैं।
शीला: जुगल तुम ?
जुगल: ओह ! शीला। भई पहले मुझे अपने पति से मुतआरिफ़ करवाओ जिन्होंने मुझे यहां मदऊ किया।
गणेश: मैं हाज़िर हूँ।
जुगल: पहले आप मेरा शुक्रिया क़बूल कीजिए कि आपने मुझे इस शानदार दावत में शरीक किया। आपने जो आदमी मेरे पास भेजा था मैंने इस से ये कह दिया था कि बेहद मसरूफ़ होने के बावजूद मैं ज़रूर आऊँगा। शीला तुम्हारे राय साहिब बड़े ही अच्छे आदमी हैं। तुम बहुत ख़ुशनसीब हो। क्यों जनाब मैं ग़लत कह रहा हूँ।
गणेश: (चौंक कर) क्या कहा आपने
जुगल: (हँसता है) हद हो गई है। शीला मुझे मालूम ही नहीं था कि तुम्हारी शादी हो चुकी है। दरअसल। जायदाद के इंतिज़ाम और दूसरे कामों में इस क़दर मशग़ूल हुआ कि सब कुछ भूल गया (हँसता है) दौलत कमाना और इस को सँभालना बहुत बड़ी दर्द सिरी है। तुम्हारी सेहत तो अब अच्छी है।
शीला: (ख़ामोश रहती है)
जुगल: राय साहिब। ये आपने शीला को क्या कर दिया है। कुछ बोलती ही नहीं।बिलकुल गूँगी हो गई है। और आप।
गणेश: मैं ! मैं!
जुगल: जी हाँ आप क्या सोच रहे हैं। ज़रा हंगामा शुरू हो। मेरे पास वक़्त बहुत कम है जो प्रोग्राम आपने बनाया है बस अब शुरू हो जाये। हाँ भई शीला। मैं तुम्हारे लिए एक तोहफ़ा लाया हूँ।
शीला: (मुर्दा आवाज़ में) तोहफ़ा
जुगल: मेरा ख़्याल है कि मैं तुम्हारे लिए एक तोहफ़ा लाया हूँ। राय साहिब आप प्रोग्राम शुरू नहीं करते। अब देर किया है।
(मुकम्मल ख़ामोशी)
जुगल: ये ख़ामोशी क्यों?
(वक़फ़ा)
जुगल: आप नहीं शुरू करते तो लीजिए। मैं शुरू करता हूँ (बुलंद आवाज़ में लोगों को अपनी तरफ़ मुतवज्जा करता है) हज़रात सुनीए!
(हुजूम की सरगोशियाँ)
जुगल: (तक़रीर के अंदाज़ में) राय साहिब लाला गणेश प्रशाद जी ने आपको एक बंदर का तमाशा दिखाने का इंतिज़ाम किया था। लेकिन अफ़सोस है कि वो बंदर नहीं आया। इस के बदले मैं आ गया।
(हुजूम की सरगोशियाँ)
जुगल: जैसा कि आप देख रहे हैं। मैं बंदर नहीं हूँ ख़ुशपोश इन्सान हूँ आपने मेरा लिबास यक़ीनन पसंद क्या होगा। वो मोटर कार भी पसंद की होगी जो अभी तक बाहर खड़ी है। मेरी गुफ़्तगु आपको ज़रूर भाती होगी।ये मेरी सोने की घड़ी। ये हीरे की अँगूठी बहुत क़ीमती है। लेकिन आपकी निगाहों ने मेरी हर चीज़ को तौल लिया होगा और उस की क़ीमत भी मुक़र्रर कर ली होगी( लहजे में तंज़ पैदा हो जाता है) आप सब शरीफ़ आदमी हैं। मैं भी शरीफ़ आदमी हूँ। इस लिए कि मेरा लिबास अच्छा है। मेरी मोटर अच्छी है। मेरी अँगूठी अच्छी है।
गणेश: मिस्टर जुगल।
जुगल: ख़ामोश राय साहिब ख़ामोश। जब एक शरीफ़ आदमी बात कर रहा हो तो उसे बीच में नहीं टोकना चाहीए। ये गँवारपन है मैं कुछ कहना चाहता हूँ और मेरे पास वक़्त बहुत थोड़ा है मुझे एक बहुत ज़रूरी काम पर जाना है मैं आवारागर्द, लुचा, बदमाश और ज़लील इन्सान नहीं हूँ इस लिए कि मैं मुफ़लिस नहीं। मेरे पास बेशुमार दौलत है(हँसता है) बेशुमार दौलत। इतनी कि मुझसे सँभाले नहीं सँभलती। दौलत बड़ी अच्छी चीज़ है ये ना हो तो आप क्या हैं। महिज़ बंदर।
(हुजूम का शोर)
जुगल: ख़ामोश। अगर दौलत ना होती तो आप सब बंदर होते। लोग डुगडुगीयां बजा कर आपको नचाते। आपके दिमाग़ों में भुस भरा है लेकिन आप अक़लमंद हैं। सिर्फ दौलत की वजह से। आप बद-शक्ल हैं। आपकी तोंदें उभरी हुई हैं लेकिन आप ख़ूबसूरत हैं। ख़ूबसूरत बीवीयों के शौहर हैं। इस लिए कि आप दौलतमंद हैं। आप भरी महफ़िल में डकारे लें मेज़ पर नंगी टांगें रखकर बैठ जाएं। जमाइयों पर जमाइयाँ लें लेकिन आपको कोई बदतमीज़ नहीं कहेगा। आप बुड्ढे हो कर जवान हो सकते हैं लेकिन जिनके पास दौलत नहीं वो जवानी में भी जवान नहीं हो सकते। दौलत अजीब-ओ-ग़रीब चीज़ है।
आप अपनी मनहूस और भयानक शक्ल की तारीफ़ में शाइरों से क़सीदे लिखवा सकते हैं। बड़े बड़े आर्टिस्टों से अपनी तस्वीर खिंचवा सकते हैं। ख़ूबसूरत औरतों से रूमान लड़ा सकते हैं। दौलत अजीब-ओ-ग़रीब चीज़ है(हँसता है) दौलत अजीबोगरीब चीज़ है(हँसता है) मैं भी दौलतमंद हूँ। बड़ा दौलतमंद(दीवाना-वार हँसता है। हंसते हंसते आख़िर में आवाज़ बिलकुल कमज़ोर मुरदा हो जाती है) बहुत बड़ा दौलतमंद।
शीला: (एक दम चीख़ कर) जुगल जुगल !
(जुगल के गिरने की आवाज़ हुजूम का शोर)
शीला: (भाग कर जुगल के पास जाती है) जुगल जुगल ! ये क्या हो गया तुम्हें। गिर क्यों पड़े। सुनते हो ?
जुगल: (कमज़ोर आवाज़ में कमज़ोर हंसी के साथ) मैं बहुत बड़ा दौलतमंद हूँ। बहुत बड़ा। आठ रोज़ से मैंने कुछ नहीं खाया और दो महीने से बीमार हूँ। राय साहिब आठ रोज़ से मैंने कुछ नहीं खाया। कहाँ हैं राय साहिब।
शीला: (गुलूगीर आवाज़ में) जुगल।
जुगल: शीला।जुगल नहीं। जुगल साहिब कहो। इन लोगों से फ़ख़र के साथ कहो जुगल साहिब हैं। मेरे दोस्त। इन की पतलून अपनी नहीं। कोट क़मीज़।टाई। जूता। अँगूठी। घड़ी। उनमें से कोई चीज़ भी उन की अपनी नहीं। ये सब चीज़ें उस की हैं जो नीचे अपनी मोटर में मेरा लिबास पहने बंधा पड़ा है। जाने कौन गधा है। लेकिन है दौलतमंद (हँसता है)
शीला: ये तुमने क्या-किया जुगल।
जुगल: (मुस्कुरा कर) एक तमाशे के बदले दूसरा तमाशा। क्या मैं इस लिबास में शरीफ़ और मुहज़्ज़ब इन्सान दिखाई नहीं देता। क्या हुआ जो मुझे आठ रोज़ से खाने को नहीं मिला। क्या हुआ अगर ज़ोफ़ के बाइस मेरी ज़िंदगी ख़त्म हो रही है।किया हुआ। एक आवारागर्द कम हो जाएगा। एक नाकारा इन्सान यहां से दफ़ा हो जाएगा। अच्छा शीला मैं अब जाता हूँ।
शीला: कहाँ।
जुगल: मौत ने बुला भेजा है। वहां भी शायद ऐसी दावत होगी।
शीला: (गुलूगीर आवाज़ में) मेरा तोहफ़ा।
जुगल: तुम्हारा तोहफ़ा। हाँ तुम्हारा तोहफ़ा। मेरा सब कुछ ले लो नीचे मोटर में पड़ा है।
(वक़फ़ा) तुम्हारे इस नौकर का क्या नाम है।
शीला: रामू।
जुगल: रामू।ज़रा आगे आओ। आ जाओ। डरो नहीं।
(वक़फ़ा)
जुगल: उस की आँखों में तुम्हें दो मैले आँसू नज़र आ रहे हैं?
शीला: आ रहे हैं।
जुगल: यही आँसू मेरा तोहफ़ा हैं जो यहां और किसी की आँखों में नज़र नहीं आते। मैंने अपनी ज़िंदगी की सबसे क़ीमती चीज़ तुम्हें दे दी है। रामू बीड़ी है तुम्हारे पास?
रामू: है सरकार।
जुगल: एक सुलगा कर मुझे दो।
(माचिस की खड़खड़ाहट)
जुगल: (बिलकुल धीमे लहजे में) आवारागर्द । लुचा । बदमाश । (आवाज़ बिलकुल डूब जाती है)
रामू: लीजिए सरकार बीड़ी।
जुगल: (सरगोशी में। हल्की सी हंसी के साथ) सरकार।
शीला: (एक दम फूट फूटकर रोना शुरू कर देती है) जुगल। जुगल ।
(सिसकियाँ । फेड आउट)

 
 
 Hindi Kavita