स्वतंत्रता का नया सूरज (बाल कहानी) : अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'
रिमझिम बारिशों के बाद रविवार का सुनहला सा दिन हवाओं से ताजगी और सूर्य से मद्धम रोशनी समेट, सावन की हरी -भरी सुबह लेकर खिल चुका था ।
रोहन तेजी से ड्राइंग रूम से अपना मोबाइल फोन उठा कर अपने कमरे में जा ही रहा था कि उसकी नजर दादाजी पर पड़ी जो टीवी पर न्यूज़ देख रहे थे । प्रधानमंत्री किसी विशाल सभा को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि - हमें लोकतंत्र के आखिरी पायदान ,आखिरी व्यक्ति तक सभी बुनियादी सुविधाएँ, शिक्षा और सुरक्षा उपलब्ध करानी है। इसमें देश के सभी नागरिकों को अपनी महत्वपूर्ण भूमिका ईमानदारी से निभानी पड़ेगी कि महान कवि दिनकर कहते हैं -" नव-धर्म-प्रणेता कौन हुआ?जिसने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर काम किया।"
पंक्तियों का अर्थ रोहन समझ नहीं पाया और उसने आश्चर्य से दादाजी से पूछा - प्रणेता का अर्थ क्या है दादाजी! "
" इसका मतलब होता है किसी नई रचना, किसी नए सजृन को जन्म देना ।"- दादा जी रोहन के गाल थपथपाते हुए बोले।
"तुम लोग की गिटपिट भाषा, स्लैंग लैंग्वेज के आगे हमारी यह संस्कृत निष्ठ, उत्कृष्ट साहित्यिक हिंदी तुम्हें समझ नहीं आएगी !
तुम्हारी भाषा में तो यह आज के बच्चे इस पूरी बात को सिर्फ एक शब्द "हसल" या "ग्रिंड" कहकर छोड़ देते हैं।सुनो रोहन! इसका असली मतलब है कि असली 'लीडर' या 'गोट' यानी 'ग्रेटेस्ट ऑफ ऑल टाइम' वही बनता है जो मुश्किलों में भी काम करता रहता है।
शुक्रिया दादा जी! आप भी बहुत कुछ जानने लगे हो हमारी लैंग्वेज के बारे में!- रोहन ने आँखें तिरछी करके दादाजी को छेड़ा।
हाँ! मैं भी अपडेट रहता हूँ।
देख- देख कर तुम लोगों के सारे रूप रंग, व्यवहार,बोलचाल।
और कहाँ तेरे कान खींचना है बेटा यह बात भी तू जान ले क्योंकि हर चीज की एक लिमिट है! -समीर ने चर्चा में शामिल होते हुए कहा।
हाँ! पूज्य दादा जी और प्रिय पिताजी "- और सभी खिलखिला उठे।
" ठीक है! मैं जरा अपने दोस्तों से चैट करने के बाद बाहर जा रहा हूँ । रोहन ने माँ को आवाज लगाई।
ठीक है बेटा! आजा पहले नाश्ता कर ले। नाश्ता रेडी है" -श्रेया ने कहा।
ओके मॉम टूडल्स ! - रोहन नाश्ता करने के बाद अपने बैडमिंटन उठा खेलने बाहर चला गया ।
श्रेया हैरत से मुस्कुराती है जब भी इस तरह की कोई स्लैंग लैंग्वेज अपने बेटे से सुनती है और यह कभी उसे समझ में आती, कभी बिल्कुल समझ में नहीं आती। श्रेया की कोशिश रहती है कि वो और दादाजी मिलकर रोहन को सुंदर हिंदी सिखाएँ और संस्कृत भी।
रोहन की अचानक खेलते- खेलते जब सड़क पर नजर पड़ी तो वहाँ कुछ नवयुवक- नवयुतियाँ हाथ में तख्तियाँ, बैनर्स और पोस्टर्स लेकर सड़क पर चिल्लाते जा रहे थे ।
" आजादी चाहिए! आजादी चाहिए। माय स्पेस, माय लाइफ, माय चॉइस। हम बदल देंगे, हम देखेंगे।"
सभी दोस्त बैडमिंटन एक तरफ रख इस शोर- शराबे की तरफ देख रहे थे और सोच रहे थे कि यह क्या हो रहा है! कैसा अभियान है!
तभी उनमें से एक आगे बढ़कर आया और बोलने लगा-" तुम लोग भी हमारे साथ शामिल हो जाओ। हम लोग चाहते हैं कि हमें बिना रोक-टोक स्वतंत्रता से अपना जीवन जीने दिया जाए। जैसी हमारी इच्छा, हमारी बोलचाल, हमारा पहनावा, जैसी हमारी मर्जी। हम यह माँग कर रहे हैं कि हम पर किसी तरह की कोई रोक-टोक न लगाई जाए ।" -
रोहन और उसके दोस्तों ने उस समय यह कहकर मना कर दिया कि हम बाद में बताएँगे।
खेलने के बाद जब घर गया तो उसने अपनी मम्मी को यह सब बातें बताई और दादाजी भी सुन रहे थे। दादा जी बुदबुदा उठे-" आज की जनरेशन! इन्हें क्या पता आजादी क्या होती है! यह तो बलिदान के बारे में, किसी संघर्ष के बारे में जानते ही नहीं है!
मम्मी! दादी जी क्या बड़बड़ा रहे है"-
समीर ने रोहन के पीठ थपथपाते हुए कहा - आओ! मैं तुम्हें सुनाता हूँ यह कहानी क्या है!
तुम अभी सोलह साल के हो। जब तुम्हारे परदादा जी तुमसे दो-चार साल बड़े थे । उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी । गुलामी के उस दौर में बुनियादी सुविधाओं की कमी,आर्थिक स्थिति मजबूत न होने के बाद भी, सूचना तंत्र, मोबाइल,इंटरनेट यह सब न होने के बाद भी अपने देश के आत्म गौरव एवं अपने आत्म सम्मान के लिए,अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु गुलामी की जंजीरें काटने के लिए उन्होंने कहाँ-कहाँ, किस -किस तरह से संघर्ष किया और लाठियाँ खाईं , जंजीरों में जकड़े गए,जेल गए। अनगिनत भारत माँ के सपूत शहीद हो गए। मातृभूमि का मान रखने में कुर्बान हो गए। यह सब आज की युवा जेनरेशन ,नई पीढ़ी कहाँ जानती है।
" अब समझे हो तुम रोहन! तुम्हारे परदादा जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। यह स्वतंत्रता किस तरह से संघर्ष की आँच में तप कर ,बहुत कठिन पर स्थितियों में जी कर और अपमान सहन करके पाई है, इसका तुम्हें अंदाज नहीं है! तुम लोगों को हर तरह की सुविधा मिल रही है। लिखने- पढ़ने, बोलने की अभिव्यक्ति है ।खाने- पीने, घूमने की स्वतंत्रता है। मॉल , मोबाइल, नए-नए गैजेट्स, फैशन स्टाइल सब तुम्हारे पास है ।आज बस एक ही चीज की कमी है कि हमें यह समझना है कि हम अपनी संस्कृति ,सभ्यता ,हमारी आजादी का लड़ाई का जो इतिहास है, हमारे जो महापुरुष हैं,उनके बारे में हम कितना जान पाते हैं!- चर्चा में अपना भी योगदान देते हुए श्रेया ने अपने लैपटॉप से लॉगआउट किया और सभी के लिए चाय बनाने चली गई।
समीर ने रोहन को अपने पास बिठाया। उन्होंने वह पुरानी डायरी खोली, जिसके पन्नों पर हाथ से लिखी कुछ कविताएँ और यादें थीं।
समीर ने कहा, रोहन! तुम्हें लगता है कि यह सब कुछ हमेशा से ऐसा ही था? इस आँठवीं मंजिल से जो खुला आसमान तुम्हें दिख रहा है न, इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकाई गई है। तुम्हारे परदादा जी जब तुम्हारी उम्र के थे, तब इस शहर की सड़कों पर भारतीय शान से सिर उठाकर चल भी नहीं सकते थे। हर मोड़ पर ब्रिटिश पुलिस का पहरा था। जरा सी मर्जी चलाने पर कोड़े बरसाए जाते थे। उन्हें कई दिनों तक खाना नहीं दिया गया, लेकिन उन्होंने कभी 'वंदे मातरम' कहना बंद नहीं किया।"
" सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।" महान कविवर दिनकर की इन पंक्तियों को सुनकर अंग्रेज और भी भड़क जाया करते थे ।
तुम्हारे परदादा जी के सिर पर भी गहरी चोट आई थी, उन्हें महीनों तिहाड़ जेल की एक काल कोठरी में बंद रखा गया, जहाँ न ढंग से रोशनी आती थी और न हवा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।"
भारत के गौरव शाली इतिहास की चर्चा में शामिल होने दादाजी भी आ चुके थे। पिताजी से यह स्वतंत्रता संग्राम का अनुभव उन्होंने सुना था। और उनकी कई सारी इससे जुड़ी हुई स्मृतियाँ जैसे पुरानी डायरी, संदूकची, पीले पड़ चुके पन्नों वाले पत्र उन्होंने संभाल कर रखे थे। उन्हें बहुत अच्छा लग रहा था कि समीर उनके पोते को किस तरह गंभीरता से उनके पिताजी का संघर्ष सुना रहा है । दादा जी ने रोहन को अपने पास और करीब खींचते हुए गंभीर आवाज में कहा- तुम्हारे परदादा जी अकेले नहीं थे। उनके जैसे लाखों वीरों के बलिदान से यह भारत भूमि सींची गई है। जब तुम इस आजाद देश में साँस लेते हो, तो तुम्हें याद होना चाहिए कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपनी जवानी हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर चढ़ा दी थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा' का नारा देकर देश की रगों में जोश भर दिया था। चंद्रशेखर आजाद ने आखिरी साँस तक गुलाम न होने की कसम निभाई थी, और महात्मा गाँधी के सत्य और अहिंसा के आंदोलनों ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और बाबासाहेब अंबेडकर तक अनगिनत महापुरुषों ने अपना पूरा जीवन, अपना सुख और अपना परिवार दाँव पर लगा दिया, ताकि सदियों के अंधेरे के बाद देश में आजादी का नया सूरज उग सके।"
रोहन सोच में डूब गया। शहर की ऊँची-ऊँची इमारतों और उड़ती हुई कारों व मेट्रो को देखा और सोचा कि अगर उस समय दादाजी और उनके जैसे लाखों लोग जेल न जाते, तो आज वह इस आलीशान घर में बैठकर अपनी मर्जी की जिंदगी नहीं जी रहा होता।
गर्व से भर उठे रोहन ने पूछा - "पिताजी, अब हम परदादा जी और इन महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों , शहीदों का यह कर्ज कैसे उतार सकते हैं?"
समीर ने रोहन को गले से लगाया और कहा, "इस आजादी की कीमत को समझकर। देश का एक अच्छा नागरिक बनकर। जब तुम कचरा डस्टबिन में डालते हो,कानून का पालन करते हो और दूसरों का सम्मान करते हो, तो तुम देश को मजबूत बनाते हो।जब तुम "पानी और खाना बर्बाद नहीं करते। अपने घर और परिवेश की साफ- सफाई का ध्यान रखते हो। अपने अपार्टमेंट के गार्ड अंकल या सफाई कर्मचारी का सम्मान करते हो। पर्यावरण संरक्षण हेतु पेड़- पौधों को लगाते हो। सिर्फ अपने बारे में नहीं, अपने देश एवं समाज के बारे में सोचते हो, अगर किसी बात पर असहमति है तो क्रोध और आवेश में आकर कोई गलत कदम नहीं उठाते, उद्दंडतापूर्वक अभद्र गालियाँ नहीं बकते, बिना तथ्यों व सच्चाई का परीक्षण किए हुए किसी के बहकावे , भटकाव में नहीं आते, या फिर रोहन तुम लोग तो डिजिटल जैनरेशन हो तो ऐसा कोई पोस्ट,रील, विडियो जो झूठ है ,फेक है जिससे अशाँति ,उपद्रव उत्पन्न हो सकता है समाज में ,उसकी सच्चाई को जाने बगैर उसे इंस्टा, फेसबुक या सोशल मीडिया पर कहीं फॉरवर्ड तो नहीं करते! अपने विवेक से और बुद्धिमानी से ,ईमानदारी से जिस उम्र में तुम्हारा जो कर्तव्य है उसे पूरा करते हो! मर्यादा, संतुलन और अनुशासन का पालन करते हो। अपनी दिनचर्या और बोलचाल व्यवहार को मर्यादित रखते हो, अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी जानते हो।अपनी भाषा ,संस्कृति, सभ्यता , गौरवशाली इतिहास का मान रखते हो ,उसका संरक्षण, संवर्धन करते हो।
तब तुम सच में सही सिविक सेंस वाले आज़ाद और एक सच्चे नागरिक होते हो।"
स्वतंत्रता दिवस पन्द्रह अगस्त आने वाला था । नीचे सोसायटी में कुछ साँस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रैक्टिस चल रही थी। " वंदे मातरम" की धुन गूँज उठी। अपना आईपैड एक तरफ रखकर वह बालकनी की ग्रिल के पास खड़ा हुआ और नीचे फहराते तिरंगे को देखकर पहली बार गर्व से सीधे खड़े होकर सैल्यूट किया। अब उसके लिए आज़ादी सिर्फ एक छुट्टी का दिन नहीं, बल्कि एक अनमोल विरासत थी।उसने सोच लिया था कि वह उस दिन सड़क पर मिले अमर्यादित, अविवेकी ,शोर और उपद्रव मचाते हुए माय स्पेस ,माय लाइफ, माय चॉइस स्लोगन वाली झंडिया लहराते हुए होलीगान्स के समूह से हमेशा दूर रहेगा।आज इस चर्चा से रोहन को 'मेन कैरेक्टर एनर्जी' वाली "अनस्टॉपेबल बाइव" मिल गई थी और यह दिखा रही थी कि स्वतंत्रता का नया सूरज नई शुरुआत कर रहा है।