शेष प्रश्‍न (कहानी): मंगला रामचंद्रन

Shesh Prashna (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran

अजय ने ना जाने कितनी बार आश्‍चर्य से पूछा होगा – ‘अरू, सही में तुम्‍हें किसी से प्‍यार नहीं हुआ था? मान भी लूँ तो ये तो कतई नहीं मान सकता कि किसी को तुमसे प्‍यार ना हुआ हो। वो एक नहीं कई होगें।'

अरूणा इतने वर्षों में, अजय के साथ रहते-रहते प्‍यार शब्‍द सुन कर पहले की तरह डर नहीं जाती है। पर जिस तरह चारों ओर इस शब्‍द का प्रयोग निर्बाध रूप से अनगिनत बार होते सुनती है तो एक संकोच उसे घेर लेता है। वरना विवाह के बाद जब अजय ने बड़े तमीज़ और अंदाज़ से उससे कहा था – ‘मोहतरमा, आपको देख कर तो किसी को भी आपसे प्‍यार हो जाये। .......

अजय आगे की बात तो जारी ना रख पाया कयोंकि अरूणा का राख होता चेहरा देख कर घबरा गया था।

'अरे क्‍या हो गया, सॉरी अगर मेरी बात का बुरा लगा हो तो, वैसे भी मुझे आपकी पिछली जिन्‍दगी से कुछ लेना-देना नहीं। आप बताती हो तो ठीक, ना बतायें तो भी ठीक। पर मैं स्‍वयं के बारे में तो बताना चाहूँगा, मेरा एक-दो पर दिल जरूर आया था, बस क्रश था। पर अब लगता है आपसे जबरदस्‍त इश्‍क हो रहा है।'

अजय मस्‍त मौला, खुले दिलों दिमाग का बंदा था। कोई दुराव-छिपाव जैसी भावना उसमें थी ही नहीं अरूणा को वो जैसा पहली बार लगा था आज इतने वर्षों बाद भी वैसा ही है। एक तरह से प्‍यार शब्‍द का सही अर्थ अरूणा ने अजय से ही पाया। अजय अरूणा का कितना मजाक बनाता है – ‘अरू तुम प्‍यार शब्‍द से इतना क्‍यों डर जाती हो, ये तो एक निहायत ही खूबसूरत एहसास है। जिसको नहीं होता वो सब अभागे हैं। डरने वाली बात तो जरा भी नहीं है।'

अरूणा कैसे बताये कि वो इस शब्‍द से क्‍यों खौफ खाती है और उसके मन में भय कितने अंदर तक धंसा हुआ है। किसी तरह समझा भी दे तो अजय जैसा विशाल हृदय वाला व्‍यक्ति तो समझने को तैयार ही नहीं होगा और अरूणा को वहमी या सनकी कहेगा। उसे मजाक बनाने का एक और बायस मिल जायेगा। ये तो अच्‍छा हुआ कि उसे अजय जैसा सुलझे और खुले विचारों वाला शख्‍स पति के रूप में मिला, वरना अरूणा के पुराने इतिहास को खंगालता रहता। ये भी हो सकता था कि अरूणा के प्रति संदेह का नज़रिया हो जाता। अजय उसे जिस तरह, पान की तरह सेंत कर, सम्‍हाल कर रखता है उससे तो वो निहाल ही हो जाती है। तब उसे लगता है कि विवाह पूर्व उसका जीवन जो भी था, जिस तरह भी था भले ही वो दीदी द्वारा निर्देशित रहा हो, पर अच्‍छा ही हुआ। तभी तो ना उसने कभी पलकें उठा कर किसी को देखने की कोशिश नहीं की। बस घर से कॉलेज जाना और स्‍वयं में सिमटे रह कर कॉलेज का समय खत्‍म होते ही निर्लिप्‍त भाव से लौट आना। अब सोचने पर अरूणा को भी आश्‍चर्य होता है कि वो उस तरह के व्‍यवहार के साथ, एक तरह से दमनकारी नीति के नीचे दब कर रह कैसे पाई। वो दीदी का उसके प्रति दबंग दमनकारी व्‍यवहार ही तो था। जिसे मानना याजिस पर चलना उसकेलिए आवश्‍यक हो गया था। वरना उसका ही नहीं मां का जीना भी मुहाल हो जाता। अरूणा से दस वर्ष बड़ी दीदी, उसे भी तो बाली उम्र में प्‍यार के मीठे एहसास ने ऐसा डंक मारा कि वो उसमें गुम हो गई। स्‍थानीय किसी राजनेता का बिगड़ा गुंडा बेटा, उसी के जाल मे दीदी ऐसे फंसी और अंधी सी हो गई। ना मम्‍मी-पापा, ना सहेली की, ना दो वर्ष छोटे भाई की किसी की बात पर उन्‍होंने विश्‍वास ही नहीं किया। दीदी के सामने इंद्रधनुषी स्‍वप्‍नों को जाल सा बुन दिया गया था जिसमें वो मकड़ी के शिकार की तरह फंस कर रह गई। माता-पिता से विद्रोह, आये दिन लड़ाई, उनको सभी अपने-सगे दुश्‍मन की तरह लगने लगे। छोटा भाई इतना भी छोटा नहीं था और दीदी से कितना कहा – ‘दीदी, पूरा शहर जानता है कि वो कितना बदमाश है और सदैव गलत कामों के लिए ही जाना जाता है। हम लड़के भी उससे बच कर रहते हैं कि आमना सामना ना हो जाये।'

‘तू भी आ गया मुझे समझाने, मम्‍मी-पापा कम है! आ गया उनका तोता बन कर। तुम लोगों को उसकी अच्‍छाईयां ना जाने क्‍यों दिखती ही नहीं हैं। एल एल बी क्‍या ऐसे ही पास कर लिया है? मुझसे तो इतने सलीके से और जेन्‍टलमेन की तरह ही पेश आता है तो मैं तुम लोगों की ये फालतू की बकवास पर क्‍यों ध्‍यान दूँ।

‘दीदी, ऐसा तो उसने कई लड़कियों से रिश्‍ते कायम किये हैं। उसका असली रूप जब तक पता चले तब तक वो अपना काम साध लेता है।' ........

भाई छोटा होते हुए भी समझदारी से भरी बातें कर रहा था, पर दीदी पर तो किसी की बातों का कोई असर कहां हो रहा था।

बस सपनों में खोई रहती और रोबोट की तरह चलती-फिरती, सातवें आसमान पर तैर रही थी। आखिरकार उनके पापा ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया, बिना इसकी परवाह किये कि उनको नौकरी में सीनियॉरीटी में फर्क पड़ जायेगा या जगह बदलने से घर के सभी सदस्‍यों को कितनी परेशानी होगी। क्‍योंकि उनको और कोई रास्‍ता सूझा ही नहीं, अपनी जान से प्‍यारी बेटी का जीवन तबाह ना हो जाये बस यही ख्‍याल उन्‍हें इस बड़े फैसले का पूरा करने का हौसला दे रहा था। उन दिनों दीदी खूंखार सी हो गई थी, अपने माता-पिता के खिलाफ नफरत की आग उगलती हुई उनकी सलोनी-सुंदर छबि इस तरह विकृत हो गई थी कि घर में कोई उनसे बात करने से कतराता था। अरूणा तो उस समय बहुत छोटी थी और इस बिगड़े माहौल में सहमी-सहमी रहती थी। उसको उस उम्र में कुछ समझ ही कहां आ रहा था। तब से ही दीदी का उसके प्रति रूख नकारात्‍मक होने लगा था।

जगह बदलने के ठीक पहले उस तथा कथित वकील, राजनेता के बिगड़े बेटे पर किसी लड़की से संबंधित क्रिमीनल केस में पुलिस पकड़ कर ले गई। माता-पिता और भाई को लगा कि अब तो दीदी को समझ आयेगी और वो चैन की सांस ले पायेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ, क्‍योंकि दीदी का मानना था कि वो उसको अपने प्‍यार से सही रास्‍ते ले आती वरना उसके सच्‍चे प्‍यार का अर्थ ही क्‍या रह जायेगा! माता-पिता ने सिर पीट लिया पर मौन रहना ही श्रेयस्‍कर था। कुछ भी बोलने या समझाने पर बात बनने के बजाय बिगड़ती ही। गांधीजी के तीन बंदरों की तरह कुछ सुनना नहीं, सामने घटते हुए भी कुछ देखना नहीं और नफरत और क्रोध के लावा को उगलने के अलावा कुछ ढंग का बोलना ही नहीं था। उनका झूठा अहंकार या इगो उन्‍हें सकारात्‍मक सोच की और ले जाने में सफल नहीं हो रहा था। नई जगह आने पर भी दीदी के कारण घर के माहौल में तनाव बना ही रहा। भार्इ तो अपनी शिक्षा में मसरूफ हो गया था जो आवश्‍यक भी था।

कुछ समय पढ़ाई से विमुख रही दीदी ने जोर-शोर से पढ़ाई शुरू कर दी थी, यही सभी के लिए नियामत थी। इससे भी बड़ी जो उपलब्धि उन्‍होंने प्राप्‍त की वो एक तरह से सबके लिए वरदान की तरह साबित हुई। अपनी उच्‍च शिक्षा के बल पर नौकरी में एक सम्‍माननीय पद प्राप्‍त करना। वो प्रसन्‍न भी रहने लगी थी पर अपना बीता हुआ कल शायद वो भुलाना ही नहीं चाहती थी। जबकि उनकी उस समय की एक मात्र, कभी साथ न छोड़ने वाली प्रिय सखी भी कई बार जता चुकी थी कि बीता हुआ समय एक बुरा सपना ही था। बुरे सपने की तो परछाई भी वर्तमान पर पड़ना ग्रहण की तरह वर्तमान खुशियों को डंस लेगा। सब समझते हुए भी दीदी का अहंकार वो भी झूठा, उन्‍हें मानों पूर्ण संतुष्टता देते हुए आज़ादी की अनुभूति नहीं दे पा रहा था। बाल हठ-राज हठ की तरह ‘ईगों’ हठ की आड़ में दीदी ने विवाह ना करने की ठान ली थी। जब कि उनके लिए रिश्‍ते स्‍वयं चल कर आ रहे थे। मम्‍मी-पापा को लगा था कि देर-सबेर वो स्‍वयं ही पसंद करके किसी न किसी से विवाह करने को तैयार हो जायेंगी।

जब अरूणा पंद्रह वर्ष की हो रही थी तभी दीदी ने उसे किसी लड़के को कागज का पुर्जा देते हुए देख लिया था। अरूणा कहती रही कि उसे तो कुछ पता ही नहीं है कि उस कागज में क्‍या है, वो तो ऊपर वाली दीदी ने कहा था देने को। पर दीदी ने इस एक घटना को इतना तूल दे दिया था कि मम्‍मी को बीच में बोलना पड़ा।

'कम से कम ठीक से जान तो लेती कि कागज में क्‍या था, किसने किसको देने को कहा था। मैं भी कई बार मशीन या कढ़ाई के धागे फ्रेंडस् लेडीज़ टेलर्स से मंगवाती रही हूँ। शेड और नंबर लिख के देने से एकदम सही आ जाता है। सोनिया ने अरूणा के हाथ से वो कागज भिजवा दिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?’ - मां कुछ खीझते हुए बोली।

‘मुझे तो सही उम्र में भी तुम लोगों ने ऐसे रोड़े अटकाये थे कि .......... दीदी आग ऊगलती आंखों से मां और अरूणा को देखते हुए अपने कमरे में चली गई।

यूं भी अरूणा बचपन से दीदी के तेज स्‍वभाव और माता-पिता के साथ सदैव बहस करता हुआ रौद्र रूप देखती आ ही रही थी। उनके सामने उसकी चूँ भी नहीं निकलती, डरी-सहमी, दब्‍बू की तरह बैठी रह जाती। अपनी पढ़ाई में वो भैया से भले ही कुछ पूछना हो तो पूछ लेती है। पर दीदी तो खुद से होकर उससे पढ़ाई के बारे में पूछेगी और वो सहमी सी, झिझकी सी जवाब ना दे पाये या जवाब देने में पल भर भी देर होने पर इतना सुना देती कि अरूणा को विश्‍वास हो जाता था कि वो कम अक्‍ल, दब्‍बू ही है। ऊपर से मम्‍मी ने उसे अकेले में समझा भी दिया था कि वो संभल कर रहे और ऐसी कोई भी हरकत ना करे जिससे दीदी को उसे डांटने या सही कहें तो हड़काने का मौका मिले। ऊपर से दीदी का आदेश – ‘इस बार तो ठीक है, पर आगे भी ध्‍यान रखना कि लड़कों से दोस्‍ती मत कर बैठना, कहीं प्‍यार-वार हो जाये तो समझना सब खत्‍म। स्‍कूल जाना, बाहर जाना सब बंद, बस घर का काम करती रह जाना। आंखे नीची करके स्‍कूल जाना-आना और बस पढ़ाई में ध्‍यान लगाना, समझीं।'

उस समय तो अरूणा बस सिर को हल्‍का सा हिला कर उनसे निजात पा गई। पर प्‍यार का मीठा सा एहसास शायद ही किसी को छोड़ता है। अरूणा इतनी तो समझदार हो गई थी दीदी के सुप्‍त ज्‍वालमुखी के स्‍त्रोत को जान गई थी। पर क्‍या करे जब सहेलियां अपने छोटे-मोटे क्रश और सिनेमा के कलाकारों के अफेयर आदि के बारे में खुल कर बात करतीं, अरूणा बहरी तो थी नहीं सो कभी न कभी, कुछ न कुछ सुनाई तो दे ही जाता था। वैसे भी इस उम्र में याने टीन एज में लड़कियों को ‘हाय, कितना/कितनी प्‍यारा/प्‍यारी है।' बोलते हुए सुनना इतना आम है कि हम अंदाज ही नहीं लगा पाते कि ये उद्गार किस वस्‍तु या व्‍यक्ति को इंगित कर के कहे गये हैं। कुत्‍ते का पिल्‍ला, गधे या बंदर का बच्‍चा, मेमना से लेकर कोई सुंदर फूल, तितली या प्रकृति में फैले हुए के अलावा मानवीय रूप अर्थात फिल्‍मी नायक-नायिकायें या कोई फोटो ही हो। अरूणा के लिए प्‍यार एक निषिद्ध शब्‍द है सो वो प्‍यार के समकक्ष किसी भी शब्‍द से घबरा उठती है। उसकी सहेलियों के मुंह से प्‍यारा और प्‍यारी की बौछार से बचने के लिए आखिर वो कौन सी छतरी का इस्‍तेमाल करे। खास कर जब लड़कियां कहती – ‘अरूणा तो इतनी प्‍यारी, सलोनी है कोई भी उसे प्‍यार कर बैठेगा।'

अरूणा घबरा जाती और उन लोगों से कहती – ‘प्‍लीज़, यार, तुम लोग ऐसी बातें मत किया करो, मुझे घबराहट होने लगती है। हम यहां शिक्षा ग्रहण करने आते हैं, समय व्‍यर्थ करने के लिए नहीं।'

दीदी के समझाये हुए वाक्‍यों का जखीरा उसके दिमाग में मानों धंस ही गया था, उन्‍हीं में से यदा-कदा यूं इस्‍तेमाल कर लेती थी। पर लड़कियां उसे आसानी से छोड़ती नहीं थी।

‘क्‍या यार, दादी-नानी जैसी बातें करती है, यहां हम सिर्फ पढ़ाई के लिए ही आते हैं? उससे भी अधिक तो हम एक-दूसरे से मिलने-बतियाने और मस्‍ती करने आते हैं। पूरे दिन में यही तो हमारे अच्‍छे और सुखद पल हैं जो सदा याद आते रहेगें, ता‍‍ज़ि‍न्‍दगी’ - कहते-कहते वो सहेली सुखद कल्‍पना में खो सी गई थी।

अरूणा को भी उन सब के साथ बहुत अच्‍छा लगता था, वो मस्‍ती और मजे भी करना चाहती है, पर .... ये पर, परंतु उसे चैन की सांस नहीं लेने देती, मुक्‍त होकर हंसने नहीं देती, मुक्‍त होकर आस-पास के माहौल या प्रकृति से तादात्‍म्‍य स्‍थापित नहीं करने देती। मतलब तो यही हुआ कि अरूणा घुटन महसूस करती है, पर उससे अधिक उसको चिंता है दीदी की दी हुई धमकी की, ‘कुछ भी गड़बड़ हुई तो कॉलेज छुड़वा कर घर में बैठा दूँगी’।

अरूणा की सहेलियां कहती – ‘अरूणा, तू खुलकर हँसती क्‍यों नहीं रे, सहमी-डरी, दब्‍बू बनी क्‍यों रहती है? ये ‘लाईफ’ दुबारा नहीं आयेगी, यहां से पढ़ाई खत्‍म कर के निकलो तो कुछ ‘जॉब’ कर लो पर अंत तो हिन्‍दी फिल्‍मों की तरह विवाह पर ही खत्‍म होना है।'

दूसरी कहती ‘और क्‍या’, यहां तो फिर भी चार दिन की चांदनी है, विवाह के बाद तो दो दिन की चांदनी भी मिल जाये तो गनीमत है, फिर तो जिम्‍मेदारी का अंधेरा छायेगा ही।'

एक लड़की अपनी फिलासॉफी झाड़ती – ‘जिम्‍मेदारी को अंधेरा या खराब क्‍यों कहती हो? हमारे ऊपर पढ़ाई की ये जिम्‍मेदारी ना हो तो हम पागलों की तरह यहां मस्‍ती ही करते रहेगें –

सभी ज़ोर से हंसने लगी – ‘अरे बूद्धू, पढ़ाई के बहाने ही तो हम यहां आ सकते हैं, वरना केवल मस्‍ती करने और मजे मारने के लिए कौन हमें यहां भेजेगा! - फिर ठठाकर हंसने लगी।

अरूणा बेचारी सोचती रह जाती कि उसकी ये सहेलियां कितना जानती हैं, समझती हैं तभी तो इतनी बातें कर पाती हैं। वो तो एकदम ही दब्‍बू, बेवकूफ है। क्‍लास में मैडम या सर जब प्रश्‍न पूछते हैं तो वो जितनी झिझक से उठती है, फिर उनसे आंखें बचा कर, पलकें झुकाये हुए ही पूरा जवाब देगी, भले ही एक दम सही। जैन सर तो कई बार उसे डांट चुके हैं – ‘अरूणा, व्‍हाट इज़ दी प्राब्‍लम ? जब तुमको जवाब आता है तो फिर इतनी धीरे से उठकर, मानों आता नहीं हो, फिर ‘लेज़ीली’ (Lazily) बेमन से क्‍यों जवाब देती हो। तुम्‍हारे इस ‘बिहेवियर’ का कितना खराब ‘इम्‍प्रेशन’ होगा, पता है? कोई इसे एप्रीशियेट तो कर ही नहीं सकता’ – सर का सिर निराशा से दो तीन बाद हिलता।

नायडू मैडम तो सिर पीट लेती – ‘सिल्‍ली गर्ल, सोते हुए नींद में ही सब काम करती हो क्‍या? बेंच से उठने में ही इतना समय लगा देती हो फिर जवाब ऐसे देती हो मानों पूछ रही हो कि कांफीडेन्‍स किस चिड़िया का नाम है। वैरी डिसगस्टिंग, मेरी बर्दाश्‍त के बाहर है।'

अरूणा स्‍वयं अपनी हालत से बेजार थी पर उसे सही दिशा दे तो कौन, वो भी प्‍यार से। दीदी के लिये तो वो निषिद्ध शब्‍द था और छोटी बहन को उस शब्‍द से इतना डरा दिया था कि कोई उसे स्‍नेह से देखे भी तो आंखे चुरा लेती या पलकों का झुका लेती मानों उसने ‘नोटिस’ ही नहीं किया हो। अरूणा की खास सहेली को उसकी स्थिति का कुछ-कुछ अंदाजा है कि अपनी बड़ी दीदी के कठोर व्‍यवहार के कारण अरूणा दब्‍बू सी बन गई। पर उसे किस हद तक, कैसे मदद करना ये तो कोई विशेषज्ञ ही बता सकता है, पर इतना अवश्‍य है कि वो सहेली अरूणा के प्रति करूणा से भरी परवाह की दृष्टि रखती है। शायद अरूणा कभी मन खोलकर रखना चाहे तो उसे उस सहेली में एक ठौर मिल जाये।

घर में आये दिन दीदी के विवाह से संबंधित चर्चाएं होती रहती थीं। मम्‍मी-पापा पूरी तरह आश्‍स्‍वत थे कि देर से ही सही पर दीदी विवाह के लिए हां कर देगी। पर एक दिन दीदी ने ऐलान कर दिया कि उनका इरादा फिलहाल तो विवाह करने का है ही नहीं। उन्‍होंने तो यहां तक कह दिया कि भाई भी विवाह योग्‍य उम्र में है उसके लिए अब रिश्‍ता ढूँढे। बहुत वर्षों बाद वो सहज सी लगीं और सामान्‍य और प्रसन्‍नचित्‍त से बात कर रहीं थी। तभी मम्‍मी का साहस हुआ, उनसे कहने का – ‘बेटी, पहले तेरी हो जाती फिर उसकी करते हैं। तेरे लिए कितने अच्‍छे रिश्‍ते आये हैं, तू जहां बोले वहां बात आगे बढ़ाते हैं।'

मम्‍मी ने इतना साहस किया जो किसी आश्‍चर्य से कम नहीं था पर उससे भी बड़ा आश्‍चर्य तो तब हुआ जब दीदी ने बिना बिगड़े या तेवर दिखाये सरलता से कह दिया – ‘ नहीं मम्‍मी, मैं अभी जिस ‘कंम्‍फर्ट ज़ोन में हूँ उसी में रहना चाहती हूँ। ऊँचे-अच्‍छे पद पर जिम्‍मेदारी से कर्तव्‍य निभाना और सम्‍मान पाना मुझे बहुत भा गया है। विवाह या किसी ओर बात से इसमें गतिरोध नहीं आने देना चाहती हूँ।'

सदा तनी-तनी सी, ऊँची नाक किये, आंखों में भड़कते शोलों के साथ दीदी का जो एक चित्र सबके मनोमस्तिष्‍क में जम गया था, उसके ठीक विपरीत इस रूप में शांत चित्‍त दीदी का रूप अलौकिक सौन्‍दर्य से भरा हुआ लग रहा था। अरूणा को जब उसकी सहेलियां कहती थीं –अरू, तू और तेरी दीदी दोनों ही बहुत सुंदर हैं, दोनों कितने मिलते-जुलते लगते हो। देखना तू जब बड़ी होगी ना तो दीदी जैसी ही सुंदर और प्रभावशाली लगेगी। अरूणा तो उनका कठोर रौद्र रूप ही देखत हुए बड़ी हुई है सो सहेलियिों की बातों को सुन कर यूं ही छोड़ देती थी। पर आज जो दीदी का ये रूप देखा तो उनकी बातों में छिपी सच्‍चाई उसे भी नज़र आई। दीदी इन दिनों सुंदर ही नही वात्‍सलमयी भी लगने लगी थी। अरूणा की पढ़ाई का पूछना और जांचना कोमलता से होने लगा। अरूणा को उनसे शाबाशी भी मिलने लगी।

’अरू, मैंने सबसे अधिक तुझे ही सताया है, तेरा ही नुकसान किया है। पर अब भी देर नहीं हुई है, मैं ही तेरा हौसला बढ़ाऊँगी, पर तुझे अब दब्‍बू बन कर नहीं खुशमिज़ाज आज़ाद लड़की बन कर दिखाना होगा।' – दीदी की बातें सुन कर अरूणा को कुछ समझ ही कहां आ रहा था। वो जिस सांचे में ढल गई थी उसमें उसने स्‍वयं को इस तरह ‘फिट’ कर लिया था कि वही उसका ‘कम्‍फर्ट ज़ोन’ हो गया था।

किसी दि‍न अरूणा से कहती – ‘मेरी सारी गलत-सही बातों को चुपचाप मानती क्‍यों रही वो भी स्‍वाभाविक एहसासों को दर किनार कर के। प्‍यार कोई निषिध्‍द शब्‍द भी नहीं है ना निषिध्‍द एहसास, ये तो विश्‍व का सर्वमान्‍य-सर्वोपरी एहसास है। नाज़ुक, मुलायम, खूबसूरत, जो वास्‍तविक प्‍यार करता है वो अपना सब कुछ सामने वाले पर न्‍यौछावर करने को तैयार हो जाता है। इसी से समझ सकती हो प्‍यार की असली शक्ति, असली कीमत।‘

धीरे-धीरे अरूणा दीदी से खुलने लगी थी और घर का माहौल आश्‍चर्यजनक रूप से खुशनुमा हो रहा था। छोटा भाई सोच रहा था कि कहीं ये ज्‍वालामुखी का सुप्‍त रूप तो नहीं है। ना जाने कब फट पड़े और गर्म-गर्म लावा बहने लगे, और रास्‍ते में पड़ती हर चीज़ को तबाह करने लगे। पर अब तो वो भी आश्‍वस्‍त हो गया और दीदी से सम पर बात करने लगा। तभी एक दिन साहस जुटा कर बोला – ‘दीदी, पुरानी बातों को भूल कर आप नये सिरे से जीवन की शुरूआत के बारे में कुछ निर्णय करीयेगा।‘

‘पगले कहीं के, तुम्‍हें क्‍या लग रहा है कि पुरानी बातों को सोच कर, याद कर मैं अपने वर्तमान जीवन का निर्वाह कर रही हूँ? उस समय जो भी हुआ ना मुझे उसका ना पछतावा है ना खेद। क्‍योंकि मुझे तो सच्‍चे मन से प्‍यार हो गया था, अब वो गलत इंसान से हो गया तो ........

भाई को कुछ भय सा हुआ कि उसने कुछ गलत कह कर दीदी के दुख को कुरेद तो नहीं दिया।

तभी दीदी बोली – ‘किसी ने सच कहा है – ‘ जिन्‍द्गी का सारा खेल तो वक्‍त रचता है, इंसान तो सिर्फ अपना किरदार निभाता है।‘ – अब जो भी हो, मैं तो वर्तमान के साथ बहती जाती हूँ। इससे जीवन आसान भी हो जाता है, ना भूत की परछाई ना अनजाने भविष्‍य का भय।'

भाई का विवाह हुआ और दीदी ने अभिभावक की तरह पर माता-पिता के पार्श्‍व से सारे सरंजाम किये। नई बहू तो दीदी के हर बात की मुरीद हो गई और मम्‍मी-पापा परिवार में आये इस असाधारण खुशी में भीगते हुए गद्गद् हो रहे थे। दीदी जिसको हमेशा हड़काती रही थी उसी को अब सबसे अधिक प्‍यार करने लगी। मम्‍मी–पापा से भी कहती – ‘मुझे आप लागों का टोकना या रोकना मेरी भलाई के लिए था, ये समझ में ना आया हो ऐसा नहीं था। पर शायद कभी-कभी जीवन में पटकथाएं पहले से तय होती हैं, हम-और आप बस कठपुतली की तरह इशरे पर चलते-फिरते हैं। खैर अब जो हो गया सो हो गया। आप दोनों तो मुझे क्षमा कर देगें, पर अरूणा को मेरे नफरती खैये ने जो नुकसान पहुँचाया हो उसी को सुधारने की कोशिश कर रही हूँ। मुझे विश्‍वास है कि इसमें सफल रहूँगी।'

- दीदी का आत्‍मविश्‍वास से दमकता चेहरा देखकर अरूणा की आंखें भींग गई थी। पहली बार उसे दीदी को देख डर नहीं लगा और वो दीदी से लिपट गई। भले ही अभी भी प्‍यार शब्‍द सुनते ही कुछ संकुचित हो जाती है। पर अरूणा उसके बाद से बेझिझक सोचने भी लगी याने अपनी सोच रखने लगी। अजय को पति के रूप में पाने के बाद तो उसे दीदी का रचा कठोर विधान एक तरह से स्‍वयं केलिए वरदान सा लगता है। अरूणा की झिझक दूर करने के लिए विवाह के बाद भी अजय ने उसे लंबे समय तक मित्रता के दायरे में ही रखा। अजय के इस सौम्‍य व्‍यवहार ने अरूणा के मन में उसके लिए स्‍थायी प्रभाव छोड़ा और पहली बार अरूणा के मन में प्‍यार का प्‍यारा सा एहसास हुआ। जिसे वो स्‍वीकारने से नहीं मुकरी भले ही कुछ संकोच के साथ ही। पर हां वो अजय को कभी दीदी के उस कठोर रूप के बारे में नही बतायेगी, ये तो तय है। अजय जो अक्‍सर उसके चेहरे पर पसरे भोलेपन और लुनाई की बात करता है वो अरूणा की मानें तो दीदी के इसी विधान की तो देन है। पर फिर भी कभी-कभी उसके दिमाग में ये विचार सिर उठाते रहता है कि अगर दीदी को कोई अजय मिल जाता तो?

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