सज़ा मिली ! (कहानी) : मंगला रामचंद्रन

Saza Mili ! (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran

‘अरे, ये तो वही शख्स है‘ - मेरे मुंह से अनायास निकल गया। साथ चल रहे जॉय ने पूछा - ‘कौन; किसे कह रही हो ?

‘सामने गुमटी में जो सरदारजी छोले-भटूरे बेच रहे हैं, उनका कह रही हूँ।‘ - उनकी उम्र और बुजुर्गियत को ध्यान में रखकर मैंने ‘इसको‘ नहीं कहा।

‘इनकी इस छोटी सी दुकान के छोले-भटूरे की बहुत तारीफ सुनी है। बड़े-बड़े लोग भी अपनी कार रूकवा कर, कार में ही मंगवा कर खाते हैं। कभी-कभी पैक करवा कर भी ले जाते देखा है।‘ - जॉय बड़ी हसरत से उस गुमटी को देखते हुए बोला।

बाहर से खाना बुलवा कर खाने के पक्ष में मैं कम ही होती हूँ। इसलिए जॉय को पक्का विश्वास था कि वो कितनी भी तारीफें करे मैं वहां से खरीदने के लिये मना करूँगी। असल में उनके हाव-भाव ने ही मुझे याद दिलाया कि स्कूल के आस-पास मैं इन्हें ही देखती थी। अपनी पहली मंजिल के फ्लैट के किचन और बेडरूम की खिड़कियों से कितनी बार इन सज्जन को देखा होगा, याद ही नहीं। दरअसल किचन में काम करते या बेडरूम में आते जाते खिड़कियों से बाहर नज़र पड़ ही जाती थी। वहां एक कॉन्वेन्ट स्कूल था और एक सुन्दर सा चर्चा। बच्चों का जत्ता कभी स्कूल बस में चढ़ते-उतरते, खेलते-कूदते नज़र आ ही जाता था। आंखों और मन को ये दृश्य अच्छे भी लगते थे।

सबसे पहले उनको स्कूल के गेट पर देखा था तब ध्यान गया भी नहीं और ध्यान दिया भी नहीं। कई अभिभावक, ड्राईवर या ऑटोवाले स्कूल की छुट्टी के समय गेट पर आते हैं। इन सरदारजी की ओर ध्यान गया भी इसलिए कि सिर की पगड़ी और दाढ़ी के खिचड़ी बाल इन्हें अलग ही पहचान दे रहा था। एक खास बात ये भी थी कि उक्त सज्जन स्कूूल लगने या छूटन पर ही नहीं कभी भी दिख जाया करते थे। किसी भी समय स्कूल या चर्च को एक टक देखते रहते और गहरे विचारों में डूबे रहते। उन्हें इस तरह देख कर मेरी उत्सुकता को बढ़ावा मिला, और धीरे-धीरे एक तरह से मैं उनकी राह देखने लगी थी। जिस तरह की उधेड़बुन में रहते थे उससे मेरे मन में तरह- तरह के ख्याल उठा करते थे। कभी ये भी लगता कि कहीं वो बच्चों को अगवा करने वाला व्यक्ति तो नहीं है ? क्या पता स्कूल के आस-पास टोह ले रहा हो ?

चर्च को हसरती निगाहों से देखते हुए भी उन्हें पकड़ चुकी हूँ। कहते हैं तीन दशक पूर्व एक उन्मादी भीड़ ने चर्च को जला दिया था। चर्च के जिस क्षेत्र या दीवार को नुकसान पहुँचा था उसे सुधार दिया गया था। पर वो हिस्सा नासूर की तरह अनभरे घाव के रूप में निशान छोड़ गया था। एक दिन देखा कि वो शख्स उस निशान को सहला रहा था। मेरी उत्सुकता अब तो संभाले नहीं संभल रही थी। मेरी भी तो इस चर्च से पैदाइशी संबंध था। जब इस चर्च में मैंने प्रवेश किया या कहना चाहिये कराया गया तब मैं मात्र छत्तीस घंटे अर्थात डेढ़ दिन की दुधमुंही बच्ची थी। रक्तनाल या मां और ममता का बच्चे के साथ क्या संबंध होता होगा ये भी तो तीन वर्ष पूर्व ही पता चला, जब में मीजॉन की मां बनी।

स्कूल-कॉलेज की शिक्षा पूरी करने तक मेरा अधिकतर समय, याने स्कूल-कॉलेज में जो समय व्यतीत होता उससे बचा, चर्च उसके फाद़र, नन्स और स्कूल की कुछ टीचर्स के घरोंअहातों में बीता। मेरी तरह और भी बच्चे थे जो किसी न किसी कारण से अपने माता-पिता से बिछुड़े हुए थे। अधिकतर गरीब घरों की अनाचाही संताने या अमीरों और एय्याषों के मदद करने के नाम पर हुए सौदे के प्रतिफल हैं।

इन बच्चों के बीच मुझे न जाने क्यों एक अलग हैसियत मिली हुई थी। उन दिनों तो समझ नहीं आया कि ये फर्क क्यों था। किषोर वय में पदार्पण करते-करते मेरी गोरी गुलाबी रंगत और स्वस्थ गठीली कद-काठी मुझे उन बच्चों से स्वतः ही अलग कर देती थी। बाद में कई बार लोगों की बातचीत में सुना - ‘ओ, दैट पुअर गर्ल, द रॉयट विक्टिम ----

सिस्टर इग्नेस से इन बातों का मतलब जानने की कोशिश एक बार नहीं कई बार की। बस इतना ही जान पाई कि जब मैं दुधमुंही बच्ची ही थीतब जब एक जवान हट्टा-कट्टा सरदार पतली सी रजाई में मुझे लपेट कर इस चर्च में घुसा था। सिस्टर रोज़मेेरी के हाथों में सौंपते हुए बोला - ‘सिस्टर मेरे पीछे उतावली, गुस्से में भरी भीड़ है। न मैं कसूरवार हूँ ना बच्ची, पर ऐसी आक्रोशित भीड़ को समझाया भी नहीं जा सकता। जिन्दा रहा तो वापिस जरूर आऊँगा।‘ --- इतना सब वो एक सांस में बोल गया मानों पागल भीड़ उसे अगली सांस के पहले ही ना मार डाले।

रोज़मेरी हक्का-बक्का जरूर हो गई थी, पर उस समय देश के जो हालात थे, उससे सब समझ गई। चर्च के बाहर भीड़ जमा हो गई थी, उससे सरदार को बचाना भी था। सबसे पहले तो बच्ची को सुरक्षित किया। फादर के साथ रोज़मेरी बाहर आई। भीड़ उन्हें देख अपने अस्त्र-शस्त्र लहराते हुए चिल्ला रही थी - ‘सरदार के बच्चे को हमें सौंप दो। उसे बचाया तो तुम लोगों को भी चैन से नहीं रहने देगें।

पादरी ने भीड़ को समझाने की कोशिश की - ‘प्रभु की शरण में आए हुए को बचाना ही हम लोगों का कर्त्तव्य है।‘

भीड़ पागल ओर अनियंत्रित हो गई और चर्च पर हमले करने लगी। पुलिस की एक टुकड़ी वहां पहुंच कर फायरिंग करने की चेतावनी देने लगी तब जाकर भीड़ तितर-बितर हुई। पर चर्च का एक हिस्सा हमेशा के लिये क्षतिग्रस्त हो गया।

सिस्टर रोज़मेरी की मुझे बहुत धुंधली सी याद है। जब मैं आठ वर्ष की थी तब उन्हें केरल (द.भारत) जाना पड़ा। वहां वो बीमार होकर कभी ठीक ही नहीं हुई। सिस्टर इग्नेस ने ही मुझे ये सब बताया था। मेरी कद-काठी और रंगत का कारण भी धीरे-धीरे समझ आ रहा था। इसीलिए मुझ पर कभी ये दबाव नहीं डाला गया था कि मैं किस धर्म का पालन करूँ। बाकी बच्चों के साथ मैं भी प्रभु यीशु की महिमा में प्रार्थना करती, गीत गाती होली वॉटर भी पीती थी।

मुझे अपने जन्मदाता के बारे में और वहां पलने का कारण पूरी तरह और खुल कर तब पता चला जब मैं अपनी उच्च शिक्षा पूर्ण कर चुकी। फादर और सिस्टर इग्नेस ने ही मुझे सारी बातें विस्तार से बताईं। फादर ने प्यार से समझाया - ‘मीना, नाऊ यू हेव टू टेक ए डिसिझ़न, इस बड़ी सी दुनिया के विस्तार में तुम कैसे ओर क्या बन कर रहना चाहती हो। हमने व चर्च ने इंसान के एक बच्चे को मानवता का पाठ सिखाया। कुछ भी करो, कहीं भी रहो ये याद रखना कि इंसानियत या ‘ ह्यूमॉनिटि‘ किसी भी व्यक्ति के लिए जरूरी ताकत है।

बाकी बच्चे जो मेरे साथ-साथ बड़े हुए, शिक्षा प्राप्त की उनमें से कुछ नौकरी करने लगे कुछ ने विवाह कर लिया। वो अब रविवार और कुछ खास मौकों पर ही चर्च आते थे। उन सबको धर्म एक सहज प्रक्रिया के तहत मिला। मुझमें और उनमें ये एक मूलभूत अंतर था। फादर की बात का क्या जवाब देती ? मूर्खों की तरह अश्रुपूरित नज़रों से उनका करूणामयी धुँधला चेहरा देखती रही। लगा कि मुझे, केवल मुझे ही उन्होंने वहां से दूर कर दिया। मुझे दुखी देख कर बोले - ‘बच्ची तुम्हें दुखी करना मेरा मकसद नहीं था। पर तुम्हारे पास विकल्प है तो वो बताना हमारा फर्ज़ है कि नहीं।

मेरे सिर पर हथेली से सहलाते हुए उन्होंने सिस्टर को इशारा किया। अपने कमरे में आकर लगा कि मुझे अपना ठिकाना, अपना जीवन स्वयं खोजना पड़ेगा। लगा मैं फिर से अनाथ हो गई हूँ। सिस्टर इग्नेस की बात बार-बार याद आ रही थी। ‘तुम्हें जब सिस्टर रोज़मेरी ने अपनी पकड़ (अंक) में लिया तब तुम्हारे गुलाबी-लाल होठों के किनारे से दूध की पतली धारा, निकली हुई थी। तुम नींद में मुस्कुराती हुई पड़ी थी।‘

मैं उस बच्ची की कल्पना करते हुए फूट-फूट कर रोने लगी। मेरी आंखों के सामने नवजात को मां के आंचल से दूर करते हुए उसके पिता स्वयं एक अनजान के हाथों सौंप रहे हैं, ये दृश्य बार-बार आकर रूला रहा था। रोते-रोते कब सांझ का झुटपुटा उतर आया पता ही नहीं चला।

जॉय आने वाला था। उसके ऑफिस में मेरा जो इंटरव्यू हुआ था उसका परिणाम भी मालूम हो जायेगा। इसी के साथ एक तीखा एहसास हुआ, जॉय को भी तो मेरी पैदाइश से जुड़ी बातें बताना है। पिछले दो वर्षों से मुझे यही कहता आ रहा है - ‘मीना हम शादी कर लेते हैं। साथ-साथ रहते हुए भी तुम्हारी शिक्षा पूरी करने और नौकरी करने का सपना पूरा कर सकते हैं।‘

मैंने ठान रखा है कि पहले अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँ तब ही विवाह रचाऊँगी। जॉय सही अर्थों में एक अच्छा व्यक्ति है और अपनी कही बात करके दिखाएगा, इसमें कोई संशय नहीं। पर अब इन बातों का खुलासा होने पर जॉय के परिवार के लोगों की प्रतिक्रिया क्या हो सकती है, ये भी देखना पड़ेगा । रूलाई दुबारा उमड़ने को तैयार ही थी कि जॉय आ गया। उसे बैठने को कह कर वॉश-बेसिन में मुंह धोकर आई।

‘तुम अगर मुंह बिना धोए ही आती तो भी खुशखबरी ही सुनाता। तुम्हारी नौकरी का जॉइनिंग लेटर ही लेकर आया हूँ। अगले सोमवार से हम साथ ही चलेगें।‘ - इतना खुश तो वो अपनी नौकरी लगने पर भी नहीं हुआ था। बहुत कुछ बोलना चाह रही थी पर मुंह खुला ही नहीं। अपने चेहरे पर सहज सी हंसी या मुस्कुराहट लाना चाह रही थी पर असफल ही रही थी बस रूलाई उमड़-उमड़ कर दबाव बना रही थी और बांध टूटने से रोकने का मैं अथक प्रयास कर रही थी।

‘तुम तो अपने पैरों पर खडे़ होना चाहती थी, अब तुम्हारे पास वो मौका आ गया। पर तुम तो जरा भी, खुश नहीं लग रही हो, ऐसी क्या परेशानी आ गई।‘ - जॉय परेशान - हैरान सा उसे देखते हुए पूछ रहा था।

अब मेरा चुप रहना उचित नहीं होता सो षीघ्रता से बोल पड़ी - ‘बहुत खुश हूँ, इस समय मुझे नौकरी की सख्त जरूरत भी है। तुमने मेरे लिए बहुत किया, सच में जॉय तुम बहुत ही अच्छे इंसान हो, मुझे हमेशा याद रहोगे -- ‘मीना, क्या बात है, लग रहा है जैसे तुम स्वप्न में बड़बड़ा रही हो।‘ - जॉय ने मीना की हथेलियों को अपनी हथेलियों में दबा कर कहा - ‘मुझे बताना ही होगा, तुम कुछ अलग सा बिहेव क्यों कर रही हो ?‘

जॉय का परेशान-दयनीय चेहरा, प्रष्न-चिह्न बना उसकी मुख-मुद्रा मीना को भी तो सहन नहीं हो रही थी। अपने जन्म से जुड़ी बातों को खोल कर रख दिया।

‘ओके, ओके, ठीक है पर इससे हुआ क्या? यहां आये, रहे अधिकतर बच्चे यूं ही तो अपने पैरों पर खड़ा होकर अपनी अलग दुनिया बसा लेते हैं। जब कोई समस्या है ही नहीं तो फालतू क्यो खड़ी कर रही हो!

जॉय ने प्रेम से, गुस्से से, अपने माता-पिता की आज्ञा मिलने के आष्वासन को पुख्ता कर के उसे विवाह के लिए मना लिया था। छः वर्षों से मैं खुशहाल और इज्ज़तदार ज़िन्दगी बिता रही हूँ। जिसके लिए मन ही मन प्रभु से भी अधिक जॉय को ही धन्यवाद देती हूँ। तीन वर्ष के बेटे का नाम हम दोनों के नाम से मिलाते हुए मीजॉन रखा।

पिछले कुछ समय से जॉय और मैं सरदारजी की गुमटी पर कई बार गये। जॉय तो उनक बनाये छोले-भटूरों का दीवाना ही हो गया था। मैं उनकी गुज़री जिन्दगी का राज जानने वहां जाती थी। इस उम्र में अचानक नई जगह आकर काम शुरू करने का कारण जानना चाहती थी। वो भी धीरे-धीरे प्याज के छिलकों की तरह एक-एक तह खोलते जा रहे थे। कैसे उनकी खुशहाल, सीधी-सादी जिन्दगी कुछ जुनूनी लोगों के कारण तितर बितर होकर बिखर गई। जब वो भीड़ उनके आंगन में अस्त्र-शस्त्र लिये घुसी तब उनकी बीबी नवजात को दूध पिलाकर झूले में छोड़ने की तैयारी कर रही थी। शहर में जो कुछ हो रहा था उससे वो लोग भी वाकिफ थे ही। बीबी ने बच्ची को गोदड़ी के साथ उनके हाथों में देकर बस भागने को कहा। सोचने का समय ही कहां था बस वो भागते गये। जवान बीबी और जवान बहन का ख्याल भी बाद में आया।

भागते-भागते जैसे ही ये चर्च नज़र आया। उन्हें लगा कि कम से कम बच्ची की जान यहां बच सकती है। अपने और पत्नी के प्यार की निशानी को सफेद वस्त्रों में लिपटी उस साध्वी को सौंपते हुए उनका दिल कितना रोया ये मैं अच्छे से समझ पा रही थी। सुनाते-सुनाते उनकी आंखे डबडबाई -‘बेटी, उस बच्ची की दूध भरी हंसी और छुअन अभी भी महसूस कर सकता हूँ।‘

‘लेकिन आप इतने समय तक क्या करते रहे, पहले क्यों नहीं आए? - उलाहने के स्वर में पूछ रही थी मैं। ‘क्या करता ? घायल मरन्नासन अवस्था में अस्पतालों, धर्मशालाओं और भी ना जाने कहां-कहां लावारिस पड़ा रहा। जब होश आकर कुछ समझ आने लगा तब तक बहुत देर हो गई। अपने मोहल्ले गया तो देखा हालात् इतने बदल गये थे कि मैं सबके लिए अजूबा बन गया।

मैं बीच-बीच में प्रष्न करती रहती थी और रोज अपनी जानकारी में जोड़ा करती थी। उस दिन मैंने पूछा -

‘आपने उस बच्ची को ढूँढने की कोशिश की कि नहीं। अब वो इकत्तीस-बत्तीस की तो होगी ही, मिलेगी भी तो कैसे पहचानेगें।‘

‘चर्च में बहुत कुछ बदल गया, लोग बदल गये, जिसे जिगर का टुकड़ा सौंपा था वो नहीं मिली। जब अपना सब कुछ खो जाता है तो लगता है कि काश ये जान भी निकल जाती। जब ये जान बची है तो शायद इसीलिए कि मैं इन बच्चों में अपनी बच्ची का खोया बचपन ढूँढ लूँ। थोड़ी बड़ी लड़कियो में उसकी मासूमियत से भरी दुधिया हँसी की झलक पा लूँ।‘ - ‘पल भर को षून्य में निहारते हुए - ‘जानता हूँ अपने मन का बहला रहा हूँ, और कर भी क्या सकता हूँ! हो सकता है वो खुद भी माँ बन गई हो। कहीं भी हो सलामत रहे और खुश रहे!‘

‘पर बाबा आप तो पहचान भी नही पायेगें फिर यहीं क्यो आये! आपकी बेटी दूसरे शहर या विदेश चली गई हो तो ? - मैं कुछ न कुछ पूछना चाह रही थी कि उनसे संवाद बना रहे।

‘जहां छोड़ गया था उसी के आसपास रहना चाहता हूँ। वैसे भी मेरा कहने को ना तो कोई है ना कोई ठिकाना।‘ - उनके स्वर में उदासी से भी अधिक एक ठंडी तटस्थता महसूस हुई।

एक दिन मैंने यूं ही पूछा - बाबा, जिनके कारण आपका जीवन तबाह हुआ, आपके अपने बिछड़ गये उनके लिए आपने अपने ईष्वर से सजा की दरकार नहीं की ? कौम के कुछ लोगों के किये काम की सजा क्या पूरी कौम को भुगतना पड़ेगा ? - कहते-कहते मेरी आवाज में जोश और क्रोध का पुट आ गया था।

उदास स्वरों में बोल -‘बेटा, मेरे चाहने या ना चाहने से कुछ होगा या बदलेगा क्या ? फैसला मेरे हाथ में है क्या ? वैसे भी सजा तो मिल ही गई। ‘सजा मिल गई, किसे मिली सजा ? - मैंने आश्चर्य से पूछा।

‘गरीब, लाचार, बेकसूर को ही तो हमेशा सज़ा मिलती है, बेटी । मुझे और मेरे जैसे अनेकों को मिल गई है। - इच्छा तो हुई कि उनके गले मिल कर कहूँ - ‘बाबा मैं ही तो आपकी वो लाल होंठ और दुधिया हँसी वाली बच्ची हूँ।‘

अगर फिल्म चल रही होती तो मैं नायिका की तरह उनसे लिपट जाती। पर --- वास्तविक जीवन में क्या ये इतना सहज होगा ?

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