संत्रास (कहानी): मंगला रामचंद्रन

Santras (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran

यशी साधारणतया शाम के बाद ही टी वी लगाया करती थी। दिन भर की व्यस्त दिनचर्या के बाद शांत चित्त से समाचार सुनना फिर दो एक पसंद के कार्यक्रम देख लेती। पर उस दिन अपेक्षाकृत समय अधिक था सो दिन में ही समाचार लगा लिया। मानों इसी वज्रपात के लिए ही टी वी लगाया हो। पर्दे पर जिसकी तस्वीर दिखाई जा रही थी उसे पहचानने में भूल कैसे कर सकती है! अभी पिछले सप्ताह ही तो वो यशी से मिलने घर आया था। अचानक , अनायास स्कूल कालेज की शिक्षा पूर्ण कर लगभग बीस वर्षों पश्चात! बीच के दरम्यान ना कोई सम्पर्क ना कोई खबर, मानों एक दूसरे के अस्तित्व से भी अनजान हों।

उस दिन जब अर्दली ने यशी को सूचना दी कि बाहर कोई व्यक्ति आपसे मिलना चाहता है तो वो आश्चर्य और कौतूहल से भरी ग‌ई थी। ऐसा अनजान व्यक्ति कौन होगा जो उससे मिलना चाहता है, क्योंकि एस पी साहब से मिलने आने वाले बाकायदा चिट भिजवा कर बाहर के आफिस में मिलते। अक्सर अर्दली उनको चिन्ह जाते थे और पहचानने लगते थे। यशी से मिलने आने वालों में अधिकांश महिलाएं ही होती थीं जिनको भी सारे अर्दली अच्छे से जानने पहचानने लगे थे। अब ये नया व्यक्ति कौन हो सकता है, यही सोचते हुए जब उस व्यक्ति को ठीक अपने सामने पाया तो विस्मय से चकित रह ग‌ई । स्कूल में दस ग्यारह वर्षों का साथ कक्षा के हर छात्र छात्राओं के बीच लगभग लगभग एक मित्रता का एहसास दिला ही देता है। हां, किसी के प्रति कुछ आसक्ति हो सकती है तो किसी और के साथ मित्रता का भाव अधिक गहरा हो जाता होगा।

स्कूली शिक्षा के बाद पृथक राहों पर निकल जाने पर भी कुछ के सम्पर्क सूत्र बने रहें हैं और कुछ ऐसे थे जिनका कोई अता पता ही नहीं था कि कहां हैं और क्या कर रहें हैं । चैतन्य की बस इतनी खबर थी कि उसने खड़गपुर से बी टेक किया, उसके बाद कहां गया क्या कर रहा है कुछ अता पता नहीं था। यशी को जानने की उत्सुकता भी तो नहीं थी और कदाचित कक्षा के किसी भी छात्र को उसके बारे में जानकारी प्राप्त करने की उत्सुकता रहीं भी नहीं होगी। उसका स्वभाव ही कुछ विचित्र सा था, बातें करते हुए कभी तो लगता मानों वह समक्ष खड़े व्यक्ति के दिल में ही झांक रहा है और कभी कहीं इतनी दूर देखता हुआ लगता मानों अंतरिक्ष में टकटकी लगाए हो।उसके पिता किसी स्कूल में शिक्षक थे और कभी अपने बेटे के स्कूल आएं हो ऐसा हुआ नहीं। उसकी मां भी या तो जीवित नहीं है अथवा उसके पिता को छोड़कर चली गई। ये सारी ख़बरें बस सुनी सुनाई होतीं जिनकी सत्यता का किसी को कुछ पता नहीं था।

चैतन्य का कक्षा के छात्रों के साथ संभाषन अत्यंत अल्प था,पर शिक्षक शिक्षिकाओं से पढ़ाई से सम्बन्धित प्रश्नों का एक जखीरा सदा रहता। कभी तो जिनियस की तरह लगता और कभी ऐसे बेतुके सवाल पूछता मानों शिक्षकों को मात्र खिजाना चाहता हो। अब इतने लंबे अंतराल के बाद उस शख्स को अनायास अचानक अपने सम्मुख देखने पर स्कूल की मीठी स्मृतियां ज़हन में आई और यशी के होंठ स्मित मुस्कान में खिल उठे। हो सकता है अर्दली ने उसकी खुशी को चैतन्य के आगमन से जोड़ कर देखा हो!उस समय तो स्वाभाविक रूप से हुई क्रिया और प्रतिक्रिया थी पर अब इस खबर को देखकर उसका मन विचारों का बवंडर सा उठ खड़ा हुआ।

चैतन्य कट्टर नक्सली है और किसी मकसद से उस जिले में घूम रहा है। खासकर प्रमुख सरकारी अधिकारियों के घरों में घुसने का कोई ना कोई बहाना बनाकर अंदर प्रवेश कर रहा है। आम लोगों से सावधानी बरतने और फोटो पर दिख रहे व्यक्ति को देखने पर सूचना देने के लिए सम्पर्क नंबर दिया गया था। जिस दिन वो यशी से बंगले पर मिला था उस दिन,उस वक्त को यशी अपने जेहन में लाकर मन ही मन दोहराती है कि क्या क्या बातें हुई थी, चैतन्य ने ऐसा कुछ विशेष कहा हो जिसका यशी कुछ अर्थ निकाल सके।पर ना ही कुछ याद आ रहा था ना समझ जिससे कोई संकेत मिले कि किस मकसद से आया था। यशी ने पूछा था कि उसे कैसे पता कि वो यहां है, जिसका जवाब उसने एकदम सहजता से दिया ----" अरे भाई, तुम ठहरी जिले के पुलिस अधीक्षक की पत्नी तो तुम्हारे पति देव जहां तैनात होंगे वहीं तो रहोगी।"

चैतन्य से यशी ने एक साथ अनेक प्रश्न पूछ लिए थे , वो कहां है क्या कर रहा है और यहां किस काम से आया है । उसने यूं ही गोल गोल सा उत्तर दिया था, ---" खंडवा जा रहा था, जीप ख़राब हो गई, सुधर रही है। वो सब छोड़ो, तुम कैसी हो? एस पी साहब के साथ मज़े ही कर रही होगी , पुलिस विभाग में तो दोनों हाथों में लड्डू ही तो है।"

" क्या मतलब है तुम्हारा; चौबीसों घंटों में कभी भी काम आ जाना , जान सांसत में पड़ी रहती है सो अलग फिर ऐसे ऐसे अपराधियों के साथ डील करना पड़ता है ये सब तुम्हें मामूली और सरल लगता है ?"

जोश में आकर इतना बोल गई फिर तनिक सांस लेने रूक कर अवहेलना और तंज कसते स्वर में बोली -- ---" तुम तो शायद इंजीनियर हो और तुम्हारे काम के घंटे तो तय होंगे।"

अब जब उस दिन के पूरे संभाषन का याद करती है तो साफ समझ आता है कि कितनी सफलता से बात को टालते हुए कुछ यूं कहा था -----" सरकारी अफसरों को इतनी सहूलियत और अन्य सुविधाएं मिलती हैं उस अर्थ में कह दिया था। बुरा लगा हो तो माफी चाहूंगा।"--- कहते हुए उसके चेहरे पर विद्रूप एवं अवहेलना भरी हंसी साफ देख पा रही थी।

यशी ने बेमन से चाय के लिए पूछा अवश्य और जब वो ये कहते हुए निकल गया ---" कहीं जल्दी पहुंचना है, जीप ठीक हो गई होगी, पर हां चाय पीने कभी आऊंगा जरूर।" ---तेजी से निकल गया।

अब जब उस दिन की घटनाओं को सिलसिलेवार याद करती है तो सिहर उठती है। अच्छा हुआ चाय पीने रूका नहीं, पर आया क्यों था? पुलिस अधीक्षक के बंगले पर उनकी पत्नी से मिलने आना, भले ही वो स्कूल में साथ में रही हो , पर इस तरह अचानक और चंद मिनटों के लिए आना रहस्यमई मुआयना करने जैसा लग रहा है। यशी ने तो उसी दिन पति समीर को चैतन्य के अचानक आने और तुरंत चले जाने की बात कही थी, उसी सहजता से जितनी किसी भी परिचित के आगमन पर बताती थी।

समीर ने भी तो सदा की तरह सरलता से कहा था ----" मैं घर पर होता तो मिल लेता पर ये नौकरी ही ऐसी है, कोई बात नहीं उसे किसी दिन बुला लेंगे।"

यशी कहना चाहती थी कि चैतन्य उसके लिए तनिक भी अहमियत नहीं रखता है कि बुलाया जाए और वैसे भी उसने सम्पर्क बनाए रखने के लिए अता पता अथवा नंबर दिया ही नहीं। अब टीवी पर उसका चित्र देखते और खबरें सुनते हुए वो स्वयं को एक जाल में फंसता हुआ महसूस कर रही है। चैतन्य अचानक अथवा अनायास नहीं आया था वरन् योजना बना कर ही आया होगा। समीर तो कुछ दिनों से मुख्यमंत्री और प्रदेश के गृहमंत्री के साथ मीटिंग में इतने व्यस्त हैं कि खाने पीने का भी ठिकाना नहीं है, यशी और उसकी ढंग से बात भी कहां हो पा रही है!

यशी का मन असाधारण रूप से बैचेन हो रहा था , उसे इस बाबत जल्द से जल्द समीर से बात करनी है। अपने मन की उलझन को और किसी के साथ बांट भी नहीं सकती और मन ऊटपटांग सोचों से ऐसा कोहराम मचा रहा था कि यशी स्वयं को अपराधी की तरह महसूस कर रही थी। बाहर खड़े संतरी और अर्दली ने चैतन्य को देखा ही था तो आपस में या किसी और से उसके यहां आने का बताएंगे ही। शायद ये लोग ऐसा तो कह रहें हों कि कप्तान साहब की बीबी का दोस्त तो नक्सली है। अब तक तो ये समाचार लगभग सभी ने देखी और पढ़ ली होगी। अच्छा हुआ कि बेटी दादा दादी के साथ राजधानी में शिक्षा ग्रहण कर रही है।यशी तड़प रही थी कि समीर के साथ आमने सामने खुल कर लंबी चर्चा हो जाए पर पिछले कुछ समय से समीर किसी प्रमुख मुद्दे को लेकर अत्यंत व्यस्त हैं। लगातार मीटिंग भी चल रहीं हैं मानों कोई व्यूह रचा जा रहा हो। तभी उसका माथा ठनका, कहीं चैतन्य के खिलाफ ही कोई घेराबंदी तो नहीं हो रही? वो फड़फड़ाने लगी कि समीर से जल्द से जल्द बता दे कि चैतन्य से उसका ना कोई लगाव है ना उसे उसके नक्सली होने का पता था। पर समीर का तो खाना सोना सब कुछ इतना अनियमित और अनिश्चित सा हो गया है कि उसे लगने लगा था कि उस बड़े बंगले में वो अकेली ही रहती है। अभी तक दूसरे अफसरों की बीबीयों से बात करते मिलते, आपस में मिलकर गेम्स खेलते या लेडीज़ क्लब की योजना बनाते समय आसानी से कट जाता था। अब इस खबर के बाद यशी चिंतित हो गई थी, एक हिचक और झिझक उसे किसी से भी बातें करने से रोक रही थी। बंगले का गार्ड और अर्दली जिन्होंने चैतन्य को देखा था वो क्या सोच रहें होंगे या फिर आपस में इस बारे में बातें तो नहीं कर रहें होंगे? उसकी मनोदशा ऐसी हो गई कि लगा सांस लेने में दिक्कत हो रही हो, सिर में ऐसा भारीपन महसूस कर रही थी कि लगा फिर गर्दन पर टिक ही नहीं पाएगी। बैचेनी के माथे ना बैठ पा रही थी ना लेट पा रही थी। बाहर इतना बड़ा हरी मुलायम घास का लाॅन तथा सुन्दर बागीचा है पर एक अनजानी ज़ंजीर पैरों को जकड़ रही थी और वो घर के बाहर कदम बढ़ाने में भी झिझक रही थी। खाना बना रखा है पर का नहीं पाएगी, गला सूख रहा है पर उसे गीला करने की चेष्टा करने की भी इच्छा नहीं हो रही। बस एक ही विचार मन को मथे जा रहा है कि समीर से तुरंत बात करनी है। सिर के अंदर मानों भट्टी जल रही और फिर कभी भी फट जायेगा। यशी समझ गई थी कि उसका ब्लडप्रेशर इतना बढ़ गया होगा कि हेमोरेज हो सकता है। तभी उसे लगा कि स्वयं को शांत और संयत रखना उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए वरना समीर के आने पर अपने मन की बात को सही तरीके से नहीं रख पाएंगी। लंबी लंबी सांसे लेकर शांत चित्त से मेडिटेशन करने की कोशिश करने लगी।

आखिरकार समीर का फ़ोन आया कि वो रात आठ साढ़े आठ बजे तक पहुंच जाएगा और खाना भी खाएगा। फ़ोन पर उसकी आवाज़ सुन कर यशी का ऑक्सीजन लेवल ही मानों बढ़ गया हो, वो समीर की पसंद का कुछ बनाने की योजना बनाने लगी। दिल में बैठा भय और शंका का भूत मानों भाग गया था। धीरे- धीरे वो सामान्य हो रही थी और आश्वस्त भी कि उसने कुछ ग़लत तो किया ही नहीं, चूक उससे हुई ही नहीं तो वो क्यों घबरा उठी!

समीर आते से ही बोले----" दस मिनिट दो, नहा कर आ जाता हूं फिर साथ खाना भी खाएंगे और बातें भी कर लेंगे।"

एक लंबे अर्से के बाद समीर का सानिध्य मिलेगा वो अपनी तरफ से स्पष्टीकरण में अधिक समय जाया ना कर दे। दोनों टेबल पर बैठे और यशी ने कहा ---" बस एक बात आपसे कहनी है कह दूं फिर साथ खाएंगे।"

समीर उसकी ओर देख कर बोला ---" यार जल्दी से बता दो , बहुत तेज़ भूख लगी है और थकान भी महसूस हो रही है।"

समीर की हड़बड़ाहट देख कर ना जाने कैसे यशी के मुंह से सीधे सीधे, बिना भूमिका बांधें निकल गया --

---" उस दिन जो क्लास मेट चैतन्य मिलने आया था वो तो ------" ---बात पूरी होने से पहले ही समीर ने खाना प्रारंभ कर दिया और कहा ----" यही बात थी, अधिक परेशान मत हो जाओ । उस पर हम लोग लगातार नज़र रख रहें हैं बस कुछ समय की बात है फिर उसका खेल ख़त्म।"

यशी खुले मुंह से उसे ताक रही थी, इतनी गंभीर बात को ऐसी सहजता से कहना मानों कोई मसला हो ही नहीं।

" अरे ऐसे क्या देख रही हो, खाना नहीं खाना है क्या? जल्दी सोना भी है, सुबह से बहुत व्यस्त हो जाऊंगा।" --- समीर का खाना समाप्ति पर था।

यशी ने अपने अचरज पर काबू पाया और समीर के लिए बनाई ख़ास मीठा डिश ले आई। स्वयं का खाना खनन फानन में समाप्त कर बेड रूम में आई। मन में उठते प्रश्न उसे पूरी तरह से आश्वस्त नहीं कर पा रहे थे। कमरे में प्रवेश करते हुए उसने पूछा ----" जब आपको उसका इतिहास पता था, नज़र भी रख रहे थे तो फिर मुझसे मिलने क्यों दिया? तुम्हारी ये अर्दलियों की फौज मेरे बारे में कितना गलत सोच रही होगी !

" तुम यूं ही तनाव मत लो, बस इतना समझ लो कि हम लोगों की एक प्रणाली होती है जिससे इनकी प्लानिंग और मक़सद जान सकें। यदि चैतन्य के खिलाफ तुरंत कोई कार्रवाई करते हैं तो दल के बाकी लोग चौकन्ने हो जाएंगे और वो कितना और किस तरह का नुक़सान पहुंचा सकतें हैं ये पता ही नहीं चलेगा।"----

यशी को असमंजस में पड़े देख कर समीर बोला ----" यार प्लीज़, आज और कुछ मत पूछना, अगले चंद दिन बहुत व्यस्तता भरे रहेंगे। पर इतना वाला करता हूं कि तुम पर तनिक भी आंच नहीं आएगी और आश्वस्त रहो कि तुमने कुछ ग़लत नहीं किया है । अब मुझ पर भरोसा कर खुद भी सो जाओ और मुझे भी सोने दो।"----

समीर की थकान से भरी, मुंदती आंखों को देख यशी का दिल भर आया। वो आश्वस्त होकर उसके करीब लेट गई और उसके बालों को उंगलियों से सहलाने लगी।

यशी भी सो गई थी और ऐसा सोई कि सुबह जब आंखें खुली तो समीर को यूनिफॉर्म में पूरी तरह तैयार पाया।

" मुझे जगाया क्यों नहीं, एकदम चले मत जाना, जल्दी से चाय नाश्ता तैयार कर लेती हूं खा कर ही जाना।"--- बहुत तेजी से सब बना कर टेबल पर रखा।

" अब अगले कुछ दिनों के लिए मेरा कोई तय समय नहीं रहेगा, जब समय मिल जाए या जब सुविधा हो जाए आ जाया करूंगा। पर तुम बहुत चौकस रहना, आसपास के बंगलों में भी पूर्व की तरह टहलते हुए अकेले मत निकल पड़ना। असल में ये लोग सरकारी अफसरों के बंगलों में जा जाकर टोह ले रहें हैं, या तो अपने हथियार छुपाने या सद्स्यों को पनाह देने तथा छुपाने की जगह की तलाश कर रहें हैं। हम पूरी टोली को रंगे हाथों पकड़ने के लिए जाल बिछा रहें हैं। बहुत ही गुप्त तरीके और धैर्यपूर्वक कार्य करना होगा। तुम्हारे लिए वैसे तो कोई खतरे वाली बात नहीं है पर लापरवाही मत बरतना।"

यशी का चिंतित मुख देख कर बोला ----" अरे यार, चिन्ता वाली कोई बात है ही नहीं क्योंकि उन लोगों के हर कदम से हम वाकिफ हैं। बस तुम सहज और सामान्य बने रहना। एक और बात खास हिदायत के तौर पर बोल रहा हूं, भूल से भी मेरी इन बातों को किसी से भी साझा मत करना, ना आमने सामने ना फ़ोन पर। वरना हमारी योजना में सेंध लग गई तो सब चौपट हो जाएगा।"

समीर उसे अवाक् एवं सन्न छोड़ गया और तब से यशी ने वो सात दिन एक रोबोट की तरह गुजारे। टी वी लगाने से कतराने लगी, फ़ोन पर किसी से खुल कर बात करना दुष्कर हो गया था, कहीं मुंह से कोई गोपनीय बात निकल ना जाए। ना कुछ पढ़ने में मन लगता ना दूसरे कामों में। बस स्वाति नक्षत्र के चातक की तरह समीर का इंतजार करती और उस अल्प क्षणों में मानों जी जाती। समीर के चेहरे, हाव भाव में जो आत्मविश्वास और दृढ़ता झलकती उससे यशी को भी कुछ ऊर्जा मिल जाती। इन हालातों का असर यशी के स्वास्थ्य पर तो पड़ ही रहा था, शारीरिक रूप से तो वो एक कमरे में कैद हो ही गई थी,पर मानसिक रूप से भी बुरी तरह प्रभावित हुई। बैठे बैठे ऊल-जलूल सोचों में डूबी रहती और तक कर झपकियां लेते हुए अचानक चौंक कर यूं चारों ओर देखती मानों तंद्रावस्था से जागी हो।

फ़ोन लगातार घनघना रहा था और यशी नीम बेहोशी की हालत में सुनते हुए भी समझ नहीं पा रही थी।

अर्दली ने उसके बंद दरवाजे पर जोर से दस्तक दी तब जाकर चेतना में आई।

" मैडम काफी देर से फ़ोन बज रहा है "

" हां हां मैंने उठा लिया,"----- फ़ोन के दूसरी तरफ कलेक्टर साहब की पत्नी थी। " यशी बधाई हो ---- यशी पूछने वाली थी " किस बात की बधाई," पर अच्छा हुआ उन्होंने उसे मौका ही नहीं दिया और बोलती चली गईं।

" समीर ने जिस तरह योजना बना कर नेक्सलाईट के इस दल को घेरा कि जीत तो मिलनी ही थी। इस मामले से ये लोग फारिग हो जाएं तो पार्टी वगैरह करतें हैं।"

ज़िले की किसी भी मुहीम में पुलिस अधीक्षक के साथ जिलाध्यक्ष का साथ और सहयोग होता है। इस जिले के जिलाध्यक्ष समीर से वय और अनुभव में काफी वरिष्ठ हैं और दोनों पति-पत्नी का समीर और यशी के प्रति स्नेह मात्र दोस्ताना ना होकर कुछ अधिक है।

ख़बर पा कर यशी के शरीर में मानों विद्युत की तरंगें दौड़ गई और लगा वो ऊर्जावान हो उठी। स्वयं को फ्रेश किया और एक अच्छी सी पोशाक निकाल कर पहनी और बहुत दिनों के बाद आईने में स्वयं का मुआयना किया। सूखा बुझा बुझा सा चेहरा साफ़ साफ़ समझा रहा था कि पिछले दिनों अनायास घटी एक घटना ने चेहरे की रौनक को किस तरह धूमिल कर दिया। वास्तविकता में इस लड़ाई को जो मैदान पर सामना कर रहा है उसके संघर्ष को तो यशी ने नज़र अंदाज़ ही कर दिया था। वो स्वयं तो कल्पना और ऊटपटांग सोच से स्वयं को पीड़ित मान किस को सज़ा दे रही थी या बेचारगी का तमग़ा लगाना चाहती थी। झटके से उठी और मन में भरे सारे शंकाओं को एक वायरस की तरह भगा दिया। सदा की तरह समीर के संघर्ष और विजय में शामिल होने के लिए तैयार हो गई ।

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