संकल्पों का नया सवेरा (बाल कहानी) : अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'
कक्षा दसवीं की परीक्षा नजदीक थी, लेकिन रोहन और उसके दोस्तों का गुट स्कूल के पीछे वाले मैदान में बैठकर हमेशा की तरह देश की समस्याओं पर चर्चा कर रहा था। रोहन हाथ हिलाते हुए कह रहा था, "यार, हमारे देश का कुछ नहीं हो सकता। सड़कों का हाल देखो, प्रदूषण देखो, हर जगह बस कमियाँ ही कमियाँ हैं।" उसके दोस्त समीर और अमित भी हाँ में हाँ मिला रहे थे। उनकी बातें हमेशा ऊपरी होती थीं। किसी भी समस्या की गहराई या उसके पीछे के कारणों को समझने की न तो उनकी इच्छा थी और न ही वे इतने कुशाग्र थे कि जटिल व्यवस्था को समझ सकें।
एक दिन उनके हिंदी के शिक्षक मोहित जी उनकी बातें सुन रहे थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए उनके पास जाकर कहा- "तुम लोग रोज इतनी बड़ी समस्याओं पर बात करते हो, क्यों न कल स्कूल के मुख्य द्वार के पास बिखरा हुआ कचरा साफ करने की छोटी सी पहल करो !"
यह सुनते ही रोहन और उसके दोस्तों के चेहरे उतर गए। उन्होंने बहाने बनाने शुरू कर दिए- "सर, वह तो सफाई कर्मचारी का काम है। हमारे पास समय नहीं है। हम अकेले क्या कर सकते हैं।"
सच तो यह था कि वे केवल बातें करना जानते थे, कर्म करने का साहस और दृढ़ता उनमें नहीं थी। वे बहुत सामान्य बुद्धि के छात्र थे, जो खुद को बड़ा दिखाने के लिए देश की आलोचना का सहारा लेते थे।
मोहित जी ने उनकी हिचकिचाहट देख ली। उन्होंने कोई डाँट नहीं लगाई और शाँत भाव से कहा, "आज शाम को तुम सब स्कूल की छत पर आना। मैं तुम्हें तुम्हारे सपनों का भारत दिखाऊँगा।"
शाम को जब चारों दोस्त छत पर पहुँचे, तो सूरज ढल रहा था। मोहित जी वहाँ पहले से मौजूद थे। उन्होंने बच्चों से कहा- "नीचे मत देखो, सीधे ऊपर देखो। इस अनंत आसमान को देखो।"
बच्चों ने ऊपर देखा। शाम का आसमान अद्भुत लग रहा था—कहीं गहरा नीला, कहीं नारंगी, तो कहीं बादलों के छोटे-छोटे टुकड़े तैर रहे थे।
मोहित जी ने पूछा- "इस आसमान को देखकर तुम्हें क्या समझ आता है? क्या यह सिर्फ बुद्धिमान लोगों के लिए चमकता है?"
समीर ने धीमे से कहा, "नहीं सर, यह तो सबके लिए एक जैसा है।"
मोहित जी मुस्कुराए और बोले, "यही तुम्हारे सपनों के भारत की शुरुआत है। तुम सोचते हो कि देश को बदलने के लिए बहुत ऊँचा आईक्यू या कोई जादुई शक्ति चाहिए लेकिन यह आसमान हमें सिखाता है कि भारत को महान बनने के लिए सिर्फ असाधारण लोगों की जरूरत नहीं है। इस आसमान का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह सबको एक समान छत देता है, चाहे कोई कितना भी सामान्य क्यों न हो।"
उन्होंने आगे समझाते हुए कहा, "तुम्हारे सपनों का भारत वह नहीं होना चाहिए जहाँ केवल शिकायतें हों। तुम्हारा आसमान गवाह है कि पतंग उड़ाने के लिए आसमान का बड़ा होना जरूरी है, लेकिन डोर थामने वाले हाथ सामान्य भी हो सकते हैं। इस देश के आसमान के नीचे हर उस बच्चे का सपना सुरक्षित होना चाहिए, जो शायद गणित में कमज़ोर है, जो शायद बहुत बड़ा वैज्ञानिक नहीं बन सकता, लेकिन जिसके दिल में देश के लिए ईमानदारी है। अगर तुम रास्ते पर पड़ा पत्थर हटा देते हो, ट्रैफिक रूल्स का पालन करते हो, अपना कार्य ईमानदारी से करते हो ,किसी कमजोर सहपाठी की मदद कर देते हो, तो तुम इस देश के आसमान को और ऊँचा कर रहे होते हो।"
रोहन और उसके दोस्तों को अपनी सतही बातों पर पहली बार शर्मिंदगी महसूस हुई। उन्होंने महसूस किया कि देश को, देश की परिस्थितियों को कोसना बहुत आसान है, लेकिन उस विशाल आसमान की तरह उदार बनना और अच्छे नागरिक बनकर सिविक सेंस रखते हुए अपने हिस्से का छोटा सा योगदान देना ही असली देशभक्ति है।
अगले दिन, बिना किसी के कहे, कक्षा दसवीं के उस गुट ने स्कूल के गेट के पास से कचरा हटाना शुरू कर दिया। उनके पास अब कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं थीं लेकिन जब उन्होंने काम पूरा करके ऊपर देखा, तो नीला आसमान उन पर मुस्कुरा रहा था। अब वे समझ चुके थे कि उनके सपनों का भारत कोई दूर का लक्ष्य नहीं, बल्कि उनके अपने छोटे-छोटे ईमानदार प्रयासों में छुपा हुआ है।
यह सिद्धाँत उन्होंने अपने हृदय में धारण कर लिया और समझ लिया कि छोटे-छोटे कामों की भी बहुत बड़ी अहमियत है।
हमें एक जिम्मेदार नागरिक होने की भूमिकाएँ निभाने के लिए हमेशा पहल करना चाहिए।
तभी शिक्षिका वर्षा जी की आवाज सुनकर सब चौंकें -देखो बच्चो ! आज तुम लोगों के लिए एक प्रेरक खबर मैं भी लाई हूँ। अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक कर्तव्य परायण जिम्मेदार नागरिक 'सुरेंद्र सिंह चौधरी' जिसे सोशल मीडिया पर लोग 'बिट्टू तबाही' के नाम से भी जानते हैं। मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा के रहने वाले हैं। सुरेंद्र ने अकेले ही अपने स्तर पर प्रशासन या किसी संस्था की मदद के बिना अजनार नदी को साफ करने का बीड़ा उठाया और बिना ग्लव्स या किसी बड़े साधन के नदी में उतरकर टनों प्लास्टिक और कचरा साफ किया । उनके निस्वार्थ कर्तव्य बोध से प्रभावित होकर नीदरलैंड की एक मशहूर अंतरराष्ट्रीय संस्था 'द ओशन क्लीनअप' से नौकरी का ऑफर मिला है।"- वर्षा जी ने गर्व से बताया तो बच्चों की आँखों में उत्साह के जुगनू चमक उठे। अब शुभ संकल्पों का एक नया सवेरा मुस्कुरा रहा था और संदेश दे रहा था।"अच्छे विचार अर्थात अच्छे कार्य।"
अधिकार नहीं बल्कि कर्तव्यों को सबसे आगे रखना है।
सिर्फ बातें करने से और सोचने से नहीं होगा बल्कि करने से ही होगा।