संवेदना कोरी भावुकता नहीं होती (कहानी) : मंगला रामचंद्रन
Samvedna Kori Bhavukta Nahin Hoti (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran
व्हाटस्एप ग्रुप पर जया भाभी का संदेश था – ‘भैया के दिल के दो वाल्व लीक कर रहे हैं। इस उम्र में डॉक्टर कोई ‘रिस्क’ नहीं लेना चाहते।'
इन दो वाक्यों ने अगले कुछ समय तक मोबाइल पर जो तांडव करवाया वैसा या उतना तो शिवजी ने भी नहीं किया होगा। भाई, बहन भांजे-भांजियां, भतीजे-भतीजियां सब अपने मोबाइल में जल्द से जल्द अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे। जल्दी से जल्दी की होड़ में ‘स्पेलिंग’ की गलतियों पर गलतियां और उसे ठीक करते हुए तुरंत दूसरा संदेश। मानो संदेशों का घमासान मचा हुआ था, भैया के सबसे आला दर्जे के खैरब्वाह कौन है? वही ना जो सबसे प्रथम प्रतिक्रिया दर्ज करेगा। कितना सरल हो गया स्वयं को साबिता करना, बस चंद शब्दों को मोबाइल पर उकेरने के लिए ऊँगलियों की कवायद करवा दो। संदेश देख-पढ़कर उमा तो गुम सुम सी बैठी रह गई। उसके मन मे विचारों का झंझावत सा मचा हुआ था और तब तक ग्रुप के सारे लोगों ने मानों हाजिरी रजिस्टर में दस्तखत कर लिये थे। अब तो अमेरिका में काफी रात हो गई होगी वो आज रात को बात करेगी जब वहां सुबह हो जायेगी।
अनमनी सी पूरा दिन दुश्चिंताओं और अजीब-अजीब विचारों और पुरानी कई घटनाओं के कोलाज में बीता। क्या बनाया क्या खाया, दवाई ली या नहीं ली कोई होश नहीं, कुछ ध्यान नहीं। बस वर्षों की आदत से सधे हुए हाथों ने जो भी निपटाया हो, बस रात हो जाये। पूरे समय भैया की कही हुई बातें याद आती रही और लगातार मां की यादें भी 'एटाच्ड फाइल' (Attached File) की तरह साथ चलती रही। पिताजी के अचानक कैन्सर से मृत्यु हो जाने पर भैया मां को साथ ले गये थे। बाकी दो भैया और छोटी बहन भी वहीं थे। पर मां बराबर दो-दो वर्षों के अंतराल पर भारत आती थीं तो एक तरह से उमा से मिलने ही।
दीदी भले ही भारत में रहती हों पर बीच-बीच में वो अपने बेटे और बेटी के साथ रहने यू एस ए जाया करती थीं। रह जाती थी सिर्फ और सिर्फ उमा जिसकी परिस्थितियां अलग तरह की थी। जो अपने परिवार के स्नेह बंधन में यूं बंधी हुई थी कि कभी सोच भी नहीं पाती थी कि उसे विदेश जाना चाहिये। कभी उसे भी मां या भाईयों और भाभियों से मिलने जाना चाहिये। बहनों के ताने भैया और मां के स्नेहाग्रह ने उमा के पति को पासपोर्ट बनवाने के लिए उकसा दिया और आखिरकार पासपोर्ट भी बन गया। उमा को ना जा पाने का दुख इतना नहीं था जितनी तसल्ली पूछने वालों को अपना पासपोर्ट दिखाने को था। मां फोन पर कहती – ‘उमा, पूरी तैयारी करके आना जिससे यहां लंबे समय तक रह सके।' – उनकी आवाज की प्रसन्नता मानों फोन से बाहर बहने को आतुर थी। उमा मां से बातें करके भावुक हो जाया करती थी और उसे अपनी दोनों बहनों का आरोप सही लगता था।
दोनों बहने सदैव सुनाया करती थी, ‘उमा, तूने ना जाने कौन सा जादू कर दिया है कि मां का सारा प्यार, सारी ममता बस तुझपे ही लुटती है।'
ये कम नहीं था उमा को भावनाओं में बहने के लिए जो बड़े भैया जब तब वीडियो या स्काईप पर कॉल इसलिए करते कि बबली को देख सकें। उमा को भैया बबली ही पुकारते हैं और जब-तब उसकी पैदाइश के समय के हालात् बयां कर देते। उमा को कभी-कभी संकोच भी होता और वो भैया से कहना चाहती है कि वो स्वयं नानी-दादी बन गई है अब तो उसे बबली न बुलाए। पर भैया का दिल न दुख जाये ये सोचकर चुप रह जाती है। भाभी इतनी भली और थोड़ी शरारती भी है तो उमा को छेड़ते हुए ‘बबली’ का उच्चारण एक विशेष तरीके से करते हुए हंसती थी। पर वो उमा से कहती थी – ‘अपने भैया की प्रसन्नता के खातिर इस कहानी को एक बार और सुन लो। मुझे भी इसका एक-एक अक्षर ऐसे रट गया है कि कोई नींद में उठाकर सुनाने को कहे तो भी सुना सकती हूं।
भाभी सही तो कहती है। अपने बड़े भाई का इतना प्यार इस उम्र तक पाना किसके भाग्य में होता है? शायद उसकी पैदाइश ऐसी साइत में हुई थी जिसमें भातृ प्रेम का जबरदस्त योग रहा होगा। भैया पंद्रह वर्ष के थे जब उमा का जन्म हुआ। पिताजी मां को अस्पताल में भर्ती कर टैक्सटाईल मिल में सेठ से छुट्टी के लिए बात करने गये हुए थे। पिताजी बी. एस. सी. केमिस्ट्री थे और मिल में ‘ड्राईंग’ विभाग के प्रमुख थे। मां को प्रसव की जो तारीख दी गई थी उससे कुछ पहले ही दर्द उठने लगे थे। उन दिनों अहमदाबाद में जब तब हिंदू-मुस्लिम दंगे हो जाते थे और कर्फ्यू लग जाता था। पिताजी मिल में फंस गए थे और तेरह वर्षीय दीदी ने अपनी समझ से शाम का कुछ खाना भैया के हाथ अस्पताल पहुंचाने का बीड़ा उठाया। दीदी को बाकी दो भाइयों और घर को भी संभालना था। उन दिनों भैया साइकिल चलाने के लालच में कहीं भी जाने, कोई भी काम करने को एकदम तैयार रहते थे। सो वो तुरंत खाना लेकर अस्पताल पहुँच गये, सोचा था आकर खाना खायेगें। पर तब तक दंगा भड़क चुका था और कर्फ्यू लग चुका था। सो पिताजी मिल में, भैया अस्पताल में। घर मे दीदी दोनों भाईयों के साथ चिंता में।
अस्पताल में एंग्लो-इंडियन डॉक्टर मार्था ने भैया को रोक लिया कि उसे रात भर रहना पड़ेगा, सुबह देखेंगे। भैया ने उन्हे तसल्ली देने की कोशिश की कि वो दस मिनट में घर पहुँच जायेगें।
डॉ. मार्था ने प्यार से समझाया ‘बच्चे, आपको पता नहीं है कि पूरे शहर में दंगा हो रहा है और कर्फ्यू लग या है। तुमको कैसे जाने देगें, आज रात यहां मां के साथ रूक जाओ। और हां तुमने अपनी छोटी बहन को भी नहीं देखा, चलो, मां से मिल लो वो भी अकेली हैं। पिताजी भी अभी एकदम आ नहीं पायेगें।
भैया बड़े बेमन से मां के कमरे में गये और थकी हुई मां के चेहरे पर उन्हें देख एक क्षीण सी मुस्कान आई। मां ने पास रखे लोहे के झूले में सो रही नवजात की ओर इशारा किया। भैया ने ज्यों ही झूले में झांका तो ठगे से खड़े रह गये।
वो जरा सी जान नींद में मुस्कुरा रही थी और उसके वो होंठ इतने सुदंर थे कि भैया ताकते रह गये। ये पूरा वाक्या भैया इतने चाव से सुनाते और फिर बच्ची के होठों पर कुछ बुलबुले से दिखे तो उसका नाम उन्होंने रख दिया ‘बबली’। आज तक उमा को वो इसी नाम से पुकारते हैं। उनके मन मे उसी क्षण उस प्यारी बच्ची के लिए पितृवत स्नेह हो गया था जो कि आज तक वैसा ही है।
जब भारत आते तो उमा क यहां भेया-भाभी और उनके बच्चे अधिक रहते थे, बाकी सबकें यहां थोड़ा कम रहते थे। मां भी तो यही करती थी, दीदी के यहां बस जरा से दिन रहती और उमा के घर लंबे समय तक। फिर एक समय ऐसा आया कि मां की हालत यात्रा करने लायक नहीं रही थी। तभी उमा का पासपोर्ट बन गया था और मां को तसल्ली हुई कि उमा वहां उन लोगों के पास आ सकती है। मानव का हिसाब-किताब और नियति का संजो कर रखा गया हिसाब कब एक से रहे हैं। उमा की सास अपनी उम्र के अंतिम तीन वर्षों में एक तरह से बहू-बेटे पर पूरी तरह आश्रित हो गई थीा उमा ऐसे में उनको छोड़कर कैस जाती ? मां को भी उसकी समझदारी और गंभीरता पर गर्व होता था और वो फोन पर उसका हौसला बढ़ाया करती थी। सास की मृत्यु के बाद उमा को खुद को संभलाने के लिए काफी वक्त लगा और जब तक संभल कर कुछ सोचती मां का भी देहांत हो गया। अब मां से कभी न मिल पाने के विचार से उमा के दिल को इतनी चोट पहुंची की उसने तय किया कि अब वो कभी अमेरिका जाने की सोचेगी भी नहीं । बिना मां के मायके का सोचकर अपराध बोध से ग्रस्त हो जाती। मां के रहते हुए एक बार नहीं गई अब क्या करेगी जाकर उमा का मन एकदम बुझ गया था । उस पर तीनों भैया ने जब बताया – ‘मां सिर्फ तुम्हारी राह देखती रही, बाकी हम सब वहां थे और वो टकटकी लगाए बस तुम्हारे आने का इंतजार करती रही।'
उमा स्वयं को अपराधी मानने से रोक न सकी। तीनो भाई बीच-बीच में, बारी-बारी से भारत आते, छोटी बहन भी आती पर ससुराल के रिश्तेदारों के यहां उसको जाना होता था। पिछले पंद्रह वर्षों से भैया-भाभी अपने खराब स्वास्थ्य के चलते लंबी यात्राओं से परहेज करने लगे। अब उनके वीडियो कॉल अधिक आने लगे, बबली को कुछ देर देख लिया फिर भाभी से कहते ऑडियो में कर दो तभी बातें ढंग से हो पाती है। जब भी वो पूछते – ‘ बबली कब आ रही हो, अधिक दिन नहीं रह सकती हो तो कुछ दिन दिनों के लिए ही आ जाओ।
उमा खुलकर ठीक से जवाब ही नहीं दे पाती। कैसे कहती कि मां को ना पाकर मेरे दिल पर क्या गुजरेगी। हर हाल में स्वयं को अपराधी महसूस करती थी। पर पिछले वर्ष जो कुछ हुआ उसके बाद तो लगता है कि मैं अपने किये वादे को वापिस भी ले लूं तो भी अमेरिका शायद कभी नहीं जा पाऊंगी। जब बेटा कैनेडा चला गया तो भैया इतने खुश हो गये, ‘जब तू बेटे के पास कैनेडा आयेगी तो वहां से अमेरिका पास ही है।
उमा ने कब सोचा था कि उसे बेटे के पास जाने का मौका इतनी जल्दी मिल जायेगा। साथ ही बेटा उसके लिए यू एस ए का वीज़ा भी बना देगा। उमा ने मन को समझाया कि वो मां के कमरे में कुछ समय बिताया करेगी और आसपास के वातावरण से उनकी यादों को समेट लायेगी। इस सोच ने उसके अपराध बोध को जादू की तरह गायब कर दिया। तब उसे लगा कि वो अपनी नादानी में एक और गलती कर देती और अपने प्यारे भैया से मिल ही नहीं पाती। भैया को स्वयं ही फोन कर कह दिया कि ‘अब तो जल्द ही आपसे मिलने आ रही हूं।' दोनों भाई-बहन में क्या-क्या करना, क्या पढ़ना, क्या खेलेंगे और क्या खायेंगे की चर्चा फोन पर जमकर होती। दोनों तरफ जोश की कमी नहीं थी। कैनेडा जाकर उमा को लगभग एक वर्ष पूरा हो रहा है और वो राह देख रही है कि यू एस ए बॉर्डर खुल जाये तो कार में ही निकल जायें। जब भी कोविद के मरीजों की संख्या घटती तो आशा की किरण नज़र आती कि अब नियमों में ढील होगी और बस उमा उस रात कुछ चैन से सो पाती। फिर दो-चार दिन बाद एक नया नियम या लागू नियमों में कड़ाई का ऐलान उमा को उलझन में डाल देता। मां के समय हुई भूल को सुधारना चाहती है उमा। मौका स्वयं उसके पास चलकर आया और जब वो उसको अपने पक्ष में करना चाहती है तो ये महामारी ‘कोरोना’ के कारण मौका लुकाछिपी का खेल कर रही है। कभी लगता है बस चंद दिनों में यूएसए की यात्रा पर निकल पड़ेंगे और फिर दो-चार दिनों में फूले हुए गुब्बारे में पिन चुभाने की तरह सब धरा का धरा रह जाता है। उमा के वीजा को कैनेडा सरकार कोविद के कारण बढ़ा तो रही है पर कब तक? इसके अलावा भारत से भी वो इतनी लंबी तैयारी कर के तो आई नहीं थी। याने उलझन सुलझने की बजाय और उलझते हुए बढ़ती जा रही थी। इतने प्रश्न चिन्ह तो उमा ने छात्र जीवन में परीक्षा में भी शायद नहीं पाये होंगें। परीक्षा में तो वैसे भी प्रश्नों के उत्तर पढ़कर तैयार किए होते हैं सो पता भी होता है और देना भी सरल होता है। पर यहां मात्र तो उमा को ही नहीं, किसी को भी नहीं पता कि आगे क्या होगा, कब होगा, होगा भी या नहीं। याने सिर्फ और सिर्फ अनिश्चितता और कन्फूयशन (Confusion) या विभ्रान्ति का माहौल। ऐसे में कौन किसको क्या बताये, क्या जवाब दे और तसल्ली दे भी तो कैसे?
घर में सभी के चेहरे पर उलझन की अलग-अलग रंग की लकीरें। बच्चों को लगता कब वो स्कूल जाकर पहले की तरह पढ़ाई करना प्रारंभ करेगें। कब अपने दोस्तों के साथ खेल-कूद और दूसरी स्वाभाविक और सहज मेल- जोल की प्रक्रिया कर पायेगें। बच्चों के मन में एक और भी भय समाते जा रहा था कि क्या उन्हें स्कूल में सदा ‘मास्क’ पहने रहना होगा! एक दूसरे से दूरी बना कर पहले की तरह खेल कैसे पायेगें। वहीं बड़ों की अपनी चिंता पति-पत्नी आपस में बात करते तो यही कि फलां को कम्पनी ने छंटनी में निकाल दिया। कभी पता चलता किसी की तनख्वाह कम कर दी। दोनों को दुश्चिन्ता सताती रहती कि उन दोनों में से किसी के साथ ऐसा ना हो जाये। अ्रगर ऐसी कोई अनहोनी हो गई तो विकल्प क्या है? घर खरीदने या कोई और सम्पत्ति या अत्यावश्यक कार्य के लिए, हाथ खींच कर बचाए पैसों पर डाका तो नहीं पड़ जायेगा। दुश्चिंताओं की कमी थी ही नहीं। ये भी स्पष्ट नहीं कि आगे क्या हो सकता है या ये आश्वासन की भविष्य में सब ठीक हो जायेगा।
उमा को लगा कि वो बच्चों से भी कम अक्ल रखती है। इतनी सारी विकट परिस्थितियों का सामना कर रहे परिवार में वो बस भैया की बबली बनी मिलने को बेताब हो रही है। परिस्थितियां सुधर गईं तो सब कुछ ठीक से होगा ही और पूर्ववत् और पूर्व निर्धारित रूप में चलने लगेगा। इस विचार का दिमाग में कौंधते ही उमा मानों अर्धचेतनावस्था से जागी और उठ कर यूं ही किचन में गई।
‘अरे, बबलीजी क्या बनाने वाली हैं आज?’ – बेटा जब स्कूल में था तब भी स्कूल से आते ही अपनी मां को छेड़ते हुए कहता – ‘हाउ वॉस दी डे, बबली?
उन दिनों तो उमा को बहुत गुस्सा आता था और वो तय करती कि बड़े भैया से कहेगी कि अब उसे उमा कह कर ही पुकारे। पर कभी कहने का साहस ही नहीं हुआ और बाद में बच्चों के चिढ़ाने पर उसने चिढ़ना छोड़ दिया।
बेटे ने पूछा तो उमा ने कहा – ‘बता क्या बनाउँ’ चाय के साथ कुछ गर्म-गर्म।'
‘क्या बात है, हम तो समझ रहे तो आप ‘उदास भवन’ में ही धरने पर बैठी हैं।
’उदास भवन’, धरना, क्या मतलब है इनका? - उमा थोड़ी सी चकित होते हुए बोली।
‘हम लोगों को लगा कि आप इतने उदास हैं कि कैकेयी के कोप भवन की तरह आपका उदास भवन ........ उमा को छेड़ते हुए मजे ले रहा था।
’बहुत मत चिढ़ा, मुझे क्या परिस्थितियां समझ नहीं आती क्या? इतनी पागल भी नहीं हूँ।' – शायद उमा की आंखे गीली हो रही थी।
बहू उमा के पास आई – ‘मां, ये तो ऐसे ही सबको चिढ़ाते हैं। लेकिन इतनी दूर आने के बाद आप बड़े मामाजी से मिल नहीं पायें तो आपसे अधिक दुख हम लोगों को होगा।‘
कुछ देर बाद उमा वेजिटेबल पकौड़े तलते हुए सोच रही थी – ‘ संवेदनशील होना बहुत अच्छी बात है पर भावुकता में बह जाना और फिर अपराध बोध से ग्रस्त होकर रहना समझदारी तो कतई नहीं है।' किसी ने सच ही कहा है, कि दुनिया की सबसे खतरनाक नदी है भावना, सब बह जाते हैं इसमें।
बढ़ती उम्र के साथ सभी को कुछ न कुछ स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना ही पड़ता है। अब तो भैया से खुल कर बात किया करेगी और हौसला भी देगी। जिस तरह लगभग प्रतिदिन फोन पर बातें होती हैं वो एक तरह से साथ रहना ही तो हुआ। उमा स्वयं को मन ही मन शाबाशी भी दिये जा रही थी और प्रसन्न होते हुए तंज भी कस रही थी – ‘क्या बात है, आज तो तेरे ज्ञान चक्षु पूरी तरह खुल गयेा’