Sahitya Mein Adhunikta (Hindi Nibandh) : Ramdhari Singh Dinkar

साहित्य में आधुनिकता : रामधारी सिंह 'दिनकर'

आधुनिकता कोई मूल्य नहीं है , बल्कि अत्याधुनिक कवि और लेखक जो कुछ लिखते हैं , उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह मूल्यों के विघटन का पर्याय है । इधर तीन - चार वर्षों में आधुनिकता का वृत्त जिस तेज़ी से संकीर्ण बनाया गया है , उसे देखते हुए मेरा खयाल है , ऐसा कोई कोड नहीं बनाया जा सकता , जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि अमुक लेखक आधुनिक और अमुक लेखक मध्यकालीन हैं ।

केवल रोमांटिक होना ही नहीं , आस्तिक होना भी अब आधुनिकता के प्रतिकूल माना जाता है , किन्तु रवीन्द्रनाथ आस्तिक भी थे और रोमांटिक भी । तो क्या हम यह कहेंगे कि वे मध्यकालीन थे ? अगर वे मध्यकालीन थे , तो गोरा लिखकर उन्होंने यह क्यों बताया कि संस्कार मनुष्य विरासत में नहीं पाता है , उसे वह अपने परिवेश से अर्जित करता है ? और सत्यकाम की कथा लिखकर उन्होंने यह क्यों बताया कि सत्य का अधिकारी वह व्यक्ति भी हो सकता है , जिसके असली पिता का पता उसकी माता को भी नहीं है ?

आधुनिक सभ्यता नगरों की सभ्यता है । आधुनिक लेखक और कवि भी उन्हीं अनुभूतियों और सनसनाहटों के इर्द - गिर्द चक्कर काटते हैं , जो शहरी लोगों के भीतर जगती हैं , जिन अनुभूतियों में जटिलता है , निराशा है , विफलता और आक्रोश है । लेकिन ग्रामीणों की अनुभूतियाँ सीधी - सादी होती हैं । तो क्या जो लेखक ग्रामीण जीवन को अपना विषय मानकर लिखता है , वह मध्यकालीन है ? तब हम प्रेमचन्द , ताराशंकर और रेणु को कहाँ रखेंगे ?

जिसे हम आधुनिकता कहते हैं , वह एक प्रक्रिया का नाम है । यह प्रक्रिया अन्धविश्वास से निकलने की प्रक्रिया है । यह प्रक्रिया नैतिकता में उदारता बरतने की प्रक्रिया है । यह प्रक्रिया बुद्धिवादी बनने की प्रक्रिया है । यह प्रक्रिया धर्म के सही रूप पर पहुँचने की प्रक्रिया है । आधुनिक वह है , जो मनुष्य की ऊँचाई , उसकी जाति या गोत्र से नहीं , बल्कि उसके कर्म से नापता है । आधुनिक वह है , जो मनुष्य - मनुष्य को समान समझता है । इस अर्थ में आधुनकिता का आरम्भ भारत में बुद्ध के समय हुआ था और वह धारा तब से भारत में बराबर बहती आ रही है । सरहपा , नहपा आदि सिद्ध साधुओं ने जिस धर्म का आख्यान किया , वह पारम्परिक धर्म की अपेक्षा अधिक बुद्धिसंगत और नवीन है। कबीरदास, तुलसीदास के पूर्व हुए थे, किन्तु वे तुलसी की अपेक्षा आज के चिन्तन के अधिक समीप हैं ।

बुद्ध के समय से भारत में चिन्तन की दो धाराएँ बहती आ रही हैं । एक धारा भारत की मातृ - संस्कृति की धारा है , जिसके ऋषि मनु , वशिष्ठ और याज्ञवल्क्य , दार्शनिक शंकराचार्य और कवि कंबन , पोतना और तुलसीदास हैं । यह धारा वर्णाश्रम - धर्म की धारा है , जो मनुष्यों की नाम उनके वंश और गोत्र से करती है , किन्तु दूसरी धारा वह है , जो मूल - संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह करने को फूटी थी । इस धारा के ऋषि स्वयं बुद्ध , उसके दार्शनिक वसुबन्धु और नागार्जुन तथा उसके कवि सरहपा , नहपा , कबीर , नानक , वेमन्ना , दादू और मलूकदास हैं । यह वह धारा है , जो जाति , वंश और गोत्र में विश्वास नहीं करती , जो सभी धर्मों में एकता लाकर मनुष्य - मनुष्य को एक बनाना चाहती है । ज्यों - ज्यों समय बीतता जाता है , इन दोनों धाराओं के बीच की दूरी कम होती जाती है , जिसका अर्थ यह होता है कि मध्यकालीनता के संस्कार छीजते जाते हैं और आधुनिकता का वृत्त फैलता जाता है ।

यह आधुनिकता की वह धारा है , जो भारत में खुद - ब - खुद उत्पन्न हुई थी , किन्तु जिस आधुनिकता को हम यूरोप से सम्बद्ध मानते हैं , उसका प्रवेश इस देश में 19 वीं सदी में हुआ था और उसके साथ टकराने से भारतीय संस्कृति के भीतर ऐसी खलबली मची थी कि कोई तीस वर्षों के भीतर भारत एक ऐसी क्रान्ति से गुजर गया , जैसी क्रान्ति का अनुभव उसने सारे इतिहास में नहीं किया था , किन्तु उसी क्रान्ति के समय यूरोपीय आधुनिकता के प्रति भारतवासियों के मन में शंका भी उत्पन्न हो गई । इसके मुख्य रूप से दो कारण थे । एक तो यह कि भारत में आधुनिकता के प्रतीक अंग्रेज थे , जिनसे जनता घृणा करती थी । चूँकि अंग्रेज भारतवासियों को नापसन्द थे , इसलिए उनके साथ आनेवाली आधुनिकता भी शंका की पात्री बन गई । दूसरा कारण यह था कि जो लोग अंग्रेजी पढ़कर अपने को आधुनिक बताते थे , उनके आचरण ठीक नहीं थे । ये लोग बुनियादी और उदार तो बने नहीं , उलटे यूरोप से उन्होंने उच्छृखलता का सबक ले लिया , जबकि खुद यूरोप में उच्छृंखलता आधुनिकता की प्रकृति नहीं , विकृति समझी जाती थी ।

तब भी जितनी आधुनिकता का वरण उस समय के महान भारतीयों ने किया था , उतनी आधुनिकता भारत में भी आदर की वस्तु बन गई । ईश्वरचन्द्र विद्यासागर नास्तिक थे , जिन्तु जनता उन्हें देवता समझती थी । राममोहनराय और केशवचन्द्र हिन्दुत्व को घसीटकर ईसाइयत के पास ले गए थे , लेकिन भारतीय जनता ने उनका अनादर नहीं किया । स्वामी दयानन्द प्रतिमा - पूजन के विरुद्ध थे , लेकिन जनता तब भी उन्हें अपना आराध्य समझती थी । और स्वामी विवेकानन्द ने गरचे समुद्र पार की यात्रा की थी और ईसाइयों के हाथ का कच्चा - पक्का भोजन भी ग्रहण किया था , किन्तु आज वे हिन्दू - धर्म के उद्धारक के रूप में पूजित हैं ।

जिस आधुनिकता का वरण भारत ने 19वीं सदी में किया था, वह आधुनिकता अभी सन् 1950 तक हमारे साहित्य की मुख्य प्रेरणा रही थी । बंकिमचन्द्र और रवीन्द्रनाथ , भारतेन्दु और प्रेमचन्द , नान्हालाल और हरिनारायण आप्टे , केशवसुत और सुब्रह्मण्यम् भारती इसी आधुनिकता के चितेरे थे । तिलकजी ने कर्मयोगशास्त्र इसी की प्रेरणा से लिखा था । हाली और इकबाल इसी आधुनिकता के अवतार थे । छायावादी और छायावादोत्तर काव्य इसी आधुनिकता के नतीजे थे । इस आधुनिकता का ध्येय मनुष्य को बुद्धिवादी और उदार बनाना था , उसे प्रवृत्तिमार्गी और कर्मठ बनाना था । इस आधुनिकता के अधीन साहित्य उद्देश्य को अपनाने में शरमाता नहीं था , न नबी और पैगम्बर बनने के काम को कवि अपने लिए हेय समझता था ।

किन्तु अब भारत में वह आधुनिकता प्रवेश कर रही है , जो साहित्य को शैली प्रधान बनाना चाहती है , जो कवियों को यह समझाना चाहती है कि उनका काम मनुष्य का सुधार करना नहीं , उसे चौंकाना है , उसकी चेतना को शॉक और धक्के देना है । यह आधुनिकता यूरोप में उत्पन्न हुई और वहाँ के बहुत बड़े - बड़े लेखक और कवि उसकी लपेट में आ गए । यूरोप में इसकी उत्पत्ति के कारण थे , किन्तु भारत में वे कारण मौजूद नहीं हैं । इसलिए समझा यह जाता है कि भारत के लेखक और कवि यूरोप का अनुकरण कर रहे हैं और वे जो कुछ भी लिखते हैं , वह ठीक - ठीक वास्तविक नहीं है ।

('आधुनिक बोध' पुस्तक से)

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