प्‍यारा सा अपना वतन (यात्रा वृत्‍तान्त) : मंगला रामचंद्रन

Pyara Sa Apna Watan (Travelogue in Hindi) : Mangala Ramachandran

कुछ कुछ जाने पहचाने बेंगलुरु में पहुंच कर भारत में आ जाने का पूरा एहसास कर पाती हूं। कुछ- कुछ जाना पहचाना इसलिए कि तीन-चार बार 1970-80 के दशक में पर्यटक या मेहमान बन कर आई थी । पिछले दो वर्षों में जब से छोटी बेटी पूर्णिमा यहां रहने लगी, इंदौर के बाद बेंगलुरु दूसरा घर हो गया। इनका  घर जिस  बिल्डिंग में है उसका नाम हमेशा ध्यान खींचता है। अंसल कृष्णा, और अंग्रेजी में स्पेलिंग है 'Ansal Krsna' ऐसा क्यों है ये एक क्षण सोच कर फिर भूल ही तो जाना है। फिर दो दिन थकान उतारना, यहां रहने वाली बड़ी बहन से बातें करना बस! जब बच्चों को लेकर बेंगलुरु - मैसूर आदि घूमने आए थे तो लगभग सारे प्रमुख स्थलों और धरोहरों को देखा था। उस समय विधान सौदा के विशाल भवन ने अपनी मजबूती और सुंदरता से मन मोह लिया था। वास्तुकला का अत्यंत मनोहर-मजबूत उदाहरण । इसे मैसूर नव द्रविड कला के अंदाज में चार वर्षों में, 1956 को बनाया।

नंदी टेंपल (डोड्डा बासवना गुड़ी) एक ओर ऐसा स्थल जिसे अनेक बार जाने का मौका मिला। शहर के दक्षिण में एक पार्क के अंदर बना विश्व का सबसे बड़ा, नंदी को समर्पित मंदिर है। स्थानीय लोग इसे 'डोड्डा बासवना गुड़ी' के नाम से ही जानते हैं । भगवान शिव के भक्त के लिए ये मंदिर अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है। पर्यटकों के लिए मूर्तिकला तथा वास्तुकला का अद्भुत नमूना। नंदी का निर्माणग्रेनाइट चट्टान केएक ही पत्थर से बना हुआ है, जिसकी ऊंचाई 4.5 मीटर (150 फीट) और लंबाई 6.5 मीटर (216 फीट) है। ऐसा माना जाता है कि वृषभवति नदी नंदी के चरणों में होती है।      

इसी प्रांगण में शिव के प्रिय पुत्र गणेश का सुंदर सा मंदिर है । गणेश जी की मूर्ति 110 किलो मक्खन से बना हुआ है । हर चार वर्ष में इस मक्खन को प्रसाद के रूप में भक्तों में बांट दिया जाता है । फिर नई मूर्ति बनाई जाती है । मक्खन इस बीच ना तो पिघलता है और ना ही मूर्ति का आकार बदलता है।

बेंगलोर (बेंगलुरु) कर्नाटक की राजधानी है। इसका नाम बेंडकलुरु था यहां के शासक केंपे गौड़ा प्रथम ने इसकी खोज की तब ( इसका.........) । इन्होंने यहां पर एक किला 1537 में बनवाया था जो काफी छोटा और मामूली का था । 

इसके अलावा लालबाग और कपल पार्क के कारण इसे गार्डन सिटी कहा जाता है लगभग छ: हजार पौधे और पेड़ करीब 300 एकड़ जमीन पर फैला हुआ। सबसे बड़ी पब्लिक लाइब्रेरी कब्बन पार्क के अय्यर हॉल में है, कदाचित ब्रेल लिपि की सबसे अधिक पुस्तकें भी यहीं हैं। सुंदरतम लॉन, ऐतिहासिक धरोहर भवनों के रूप में संगीतमय फव्वारा (Musical Fountain) याने आकर्षित करने के पूरे सरंजाम।

लालबाग बोटनिकल गार्डन ( Lalbaugh Botanical Garden) जो हैदर अली ने बनवाया था। इसी से प्रेरणा पाकर मैसूर की दीवान सर मिर्जा इस्मार्इल ने मैसूर की श्रीरंगपट्टनम् में प्रसिद्ध वृंदावन गार्डन बनवाया। जो कि मैसूर के मांड्या जिले में है वही मैसूर जहान टीपू सुल्तान का राज था जिनके दो ग्रीष्म रहवास के महल प्रसिद्धये दो मंजिला महल पूरी तरह से सागौन की लकड़ी के बने हुए हैं।

उपरोक्त वर्णन के स्थल मैंने पहले से देखे हुए हैं बस जुगाली कर रही थी बेंगलुरु अब वो नहीं रहा जो कि कभी शांत-शालीन सा चौड़े साफ सड़कों वाला, कम आबादी का था। इसे और खास कर मैसूर को सेवानिवृत्तों का स्वर्ग (Pensioners’ Paradise) कहा जाता था। यहां के रहने वाले कन्नड़वासियों को अपने उजले रंग रूप, कला, संस्कार, संस्कृति पर अत्यंत गर्व था और इसे प्रदर्शित करने में संकोच नहीं करते थे। एक सलीका, नफासत इनकी वेशभूषा बोलचाल, व्यवहार सबमें झलकती थी इनका बस चलता तो ये अपनी इन खासियतो को बचा लेते। यहां के रहवासियों ने अभी तक अपने शहर के लिए पेंशनर्स पैराडाइज़, एयर कंडीशन्‍ड शहर, मिनी हिल स्टेशन और गार्डन सिटी ही सुना था। सन् 1962 में जब पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विधानसौदा में अपने भाषण में इसे ‘भविष्य का शहर’ कहा तो लोगों को अविश्वसनीय लगा। पर 21 वर्ष बाद उनके कहे शब्द सत्य निरूपित हुए।

धीरे-धीरे आई. टी. इंडस्ट्री ने ऐसे पैर पसारे की बेंगलुरु को अमेरिका के कैलिफोर्निया के सिलिकॉन वैली का छोटा प्रारूप कहने लगे। भारत के कुल इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन का तीसरा भाग बेंगलुरु में होता है। व्यावसायिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का 80%उत्पादन यहीं होता है। ‘बाकी शहरों का एक भूतकाल, वर्तमान और भविष्य होता है, पर बेंगलुरु मुझे भविष्य का चित्र प्रस्तुत करता हुआ लगता है।' यही तो नेहरुजी ने 1962 में कहा था और भविष्यवाणी की तरह यह बात सही निकली।

पहले शहर खुला खुला चौड़े रास्ते और हरा-भरा सुंदर लगता था। रास्ते अभी भी चौड़े और वृक्षों की हरियाली और सुंदरता से आच्छादित है। पर भीड़ इतनी बढ़ गई है कि सड़कें और क्षेत्रफल  संकुचित और भीड़भाड़ भरा हो गया। वृक्षों और हरियाली की कोई कमी अभी भी नहीं है। शहर  लगभग पूरे वर्ष हिल स्टेशन की तरह लगता है। मात्र ग्रीष्म के दो-तीन महीनों में पंखे की आवश्यकता होती है । जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ है वो नाईट लाइफ में हुआ है। Stock Exchange का केन्द्र होने के कारण मुंबई पश्चिमी देशों से सेंसेक्स के आंकड़े पाने के लिए रात को जागा करती थी। बेंगलुरु तकनीकी क्षेत्र में पश्चिमी देशों से जुड़ा होने के कारण रात को जागने लगी, आई टी अर्थात इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी का गढ़ होने से युवा पीढ़ी का यहां मजमा लगा हुआ है। रात में ऑफिस, पब, रेस्त्रो आदि खुले रहते हैं और हम कह सकते हैं कि बेंगलुरु रात में सोते नहीं है। दिन में जो नियमित दफ्तर व अन्य कार्यालयों के कारण रास्तों में भीड़ रहती है। रात को भले ही भीड़ न हो पर शहर जागता हुआ चौकन्ना लगता है।

करोना कि लॉकडाउन से सबके चेहरे को मास्क ने ढंक रखा है सबके का अर्थ 100%  ढूंढे से भी कोई बिना मास्क लगाये नहीं दिखेगा।  भले ही फिर जनसंख्या के दबाव के कारण भीड़ रहती हो और लोग उतनी दूरी नहीं बना पाते हैं। 'वर्क फ्रॉम होम' वाला कल्चर होने से बाहर  रेस्त्रां वगैरह में उतनी भीड न हो पर खाने की होम डिलीवरी बाकायदा देर रात तक होती रहती है।

छोटी बेटी पूर्णिमा के यहां बडा नाती  ऋषभ इंफोसिस में हैदराबाद में था वर्क फ्रॉम होमहो जाने पर अपने घर बेंगलुरु आ गया । छोटे वाले नाती सौरभ का तो प्लेसमेंट होने के बाद ज्वाइन करने के पहले लॉक डाउन हो जाने से शुरुआत ही ऑनलाइन पर हुई। वह कहता है कि मुझे लगता ही नहीं कि मैं नौकरी कर रहा हूं। ना ऑफिस का भवन देखा ना किसी से मिल पाया, अजीब सा लगता है । यही तो विनाश लीला और नवनिर्माण के आगे-पीछे चलने की कहानी है। अपने सीमित संसाधन और कई अड़चनों,  आलोचनाओं के बावजूद भारत विकसित देशों के समकक्ष होने की कोशिश करता रहा और नई तकनीकी ज्ञान (Technological Knowledge)से जुड़ा रहा। वरना इस महामारी  ने प्लेग और कॉलेरा आदि की तरह कई गुना अधिक नुकसान पहुंचाया होता।

छोटे दामाद जेद्दा (सौदी अरेबिया में है ) से लौट नहीं पा रहे थे।  बहुत सी मानसिक-आर्थिक परेशानियों से एक होने के बाद बेंगलुरु पहुंचे। तीनों बच्चों के साथ एक तरह का संयोग भी दुर्लभ है। मानो परिवारों का मिलन देखने और उत्सव मनाने ही बारी-बारी से जा रही हूं। 

 बेंगलुरु को लंबे समय से देखती आ रही हूं तो सबसे बड़ा फर्क यही लगता है कि कॉस्मापॉलिटि‍न (Cosmopolitin) शहर है । भारत के हर प्रदेश से लोग यहां नौकरी की तलाश में आए और रह रहे हैं।  विदेशी भी काफी है। याने विश्वव्यापी जनसंख्या यहां बसी हुई है। अंग्रेजों के राज्य के समय उन्हें बेंगलुरु का मौसम बहुत माफिक आया था सो यहां छावनी औरवाइसराय की पत्नी के नाम से बड़ा अस्पताल भी बनवाया । यहां से पास के हिल स्टेशन जो तमिलनाडु में है 'कन्नुर’ अंग्रेजों का पसंदीदा स्थल था।  नीलगिरी के पर्वत, और चाय बागान हरियाली का अद्भुत नजारा पेश करते हैं।  कई प्रपात हैं जिनमें से जोग वाटरफॉलस  पर शिव समुद्र वॉटर फॉल्स अत्यंत प्रसिद्ध है।  कर्नाटक की सबसे बड़ी खासियत जो पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है वो है यहां की हरियाली । पहाड़ हो, मैदान हो, कोई पिकनिक स्थल हो, ऐतिहासिक धरोहर हो या मंदिर आसपास हरियाली भी होगी और नायाब से नायाब याने अल्भ्य फूल।

यहां भी मैं पर्यटक की हैसियत से तो आई नहीं, पिछली यात्राओं की जुगाली का परिणाम ही मुझे ये सब व्यक्त करने को बाध्य कर रहा है। उस समय इनको व्यक्त नहीं कर पाई पर अभी भी बहुत कुछ स्मृति चित्रो  और बिंबो में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहा है । शायद, भारत के बाहर दो विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों वाले देशों की यात्रा करने के बाद यहां आने पर अपने देश की सुंदरता का भान अधिक तीव्रता से हुआ हो।

 हर पड़ाव की तरह वही प्रश्न मेरे सामने आकर खड़ा हो गया।  अपने घर, अपने प्यारे शहर इंदौर कब पहुंचेगी जिस नाम से मेरे बहुत अपनेजो खून के रिश्ते से तो नहीं पर अपनेपन की चासनी से पके हुए जुड़े हुए लोग अंग्रेजी में इसके लिए एक शब्द है एक्सटेंडेन्ट फैमिली (extendent family), इसका शाब्दिक अर्थ होता हैं विस्तृत परिवार।( तो यह अर्थ सही भी लगता है) जब पूरे इंदौर में हर दिशा में अपने शुभ चिंतकों का अक्स देखती हूं (----- लगता है)।

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