पुराना खाता (हिंदी कहानी) : महेश केशरी

Purana Khata (Hindi Story) : Mahesh Keshri

मँथन दु:खी था। शहर में बड़ा सा शॉपिंग मॉल खुला था। और उसके दुकान के लगभग सारे ग्राहक शॉपिंग मॉल में सामान लेने जा रहे थे। एक दिन की बात है। मँथन ने सुबह - सुबह दुकान खोली थी। और उसकी दुकान में बहुत से ग्राहक सामान लेने आये हुए थे। तभी रजत अपने पापा अजय के साथ मँथन की दुकान पर पहुँचा। और उसने इशारे से मँथन को बताया-
"मँथन भाई, वो जैम की शीशी , वो होरलिक्स की बोतल और वो चॉकलेट का पैकेट दे दीजिए।

मँथन ने चॉकलेट का पैकेट , जैम की शीशी और होरलिक्स का पैसा जोड़ कर बिल बताया। सात सौ रूपये का कुल सामान था।

पर्ची थमाते हुए मँथन बोला -"रजत बाबू , सात सौ रूपये हो गये।".

रजत ने एम. आर . पी. और चीजों के दाम को मिलाया। दाम ठीक - ठाक ही लगाये गये थे। लेकिन एक दो सामान में एम. आर. पी.से दो - तीन रूपये ही कम निकले।

रजत ने आँखे तरेरते हुए कहा -"मँथन भाई आपने तो एम. आर. पी. पर ही सब सामान के दाम लगा दिये हैं।"

"नहीं भाई सब में कम है। जैम की एम. आर .पी . एक सौ रूपये है। पिच्यानवे रूपये लगाया है। होरलिक्स की एम. आर . पी . पाँच सौ है। चार सौ नब्बे रूपये लगाया है।"

"नहीं मँथन भाई आप ज्यादा लगा रहें हैं। मॉल में अभी भारी डिस्काऊँट चल रहा है। हम वहीं से सब सामान लेंगे। चलिये पापा।"

उसके पिताजी ये सब बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे।

बोले -"मॉल , तो आज खुला है ,बेटा। इससे पहले मैं और तुम्हारे दादाजी भी इसी दुकान से सामान खरीदते रहे हैं। इस दुकान से मेरा आज का संबंध नहीं है। मैं बचपन में यहीं से सब सामान ले जाता था। तब मँथन के दादाजी दुकान चलाते थे। उससे पहले उनके पिताजी दुकान चलाते थे। मरनी जीनी , मर - मुसीबत ,शादी - ब्याह सब चीज में इन लोगों ने साथ दिया था, हमारा। इस तरह से इनका और हमारा घर की तरह का संबध है। इसे व्यापार से मत जोड़ो ।

और ये एक दिन में नहीं बना है। इसको बनने में सालों लगे हैं ।"

"तो , आपकी तरह मैं बेवकूफ नहीं हूँ , पिताजी। जो इनसे मँहगे दामों में सामान खरीदूँ। आखिर , ये लोग चीजों के दाम उन मॉल वालों से ज्यादा क्यों रखते हैं ? आखिर हम भी पैसा बहुत मेहनत से कमाते हैं। जब और ,लोग कंपिटीशन कर रहें हैं। तो इनको भी तो कंपीट करना चाहिए। ये लोग पहले की तरह अब अधिक पैसे नहीं ले सकते। अब जमाना बदल गया है।"

"रजत बेटा तुम शायद कोरोना को भूल गये हो । उस समय तुम इसी मँथन के यहाँ से सामान ले जाते थे। और तुम्हें ये भी पता होना चाहिए कि उस समय तुम्हारे बैंक से तुम्हारी सैलरी नहीं आ रही थी। तब भी हमलोगों को घर बैठे ही सामान आसानी से मिल जाता था। और इसी मँथन की दुकान से तुमने दसियों हजार के राशन खाये थे। उस समय यही मँथन पीछे के दरवाजे से हमें चीजें मुहैया करवाता था। और उस समय के ये बड़े - बड़े मॉल अपनी - अपनी दुकानें बँद करके ना जाने किस बिल में समा गये थे। उस समय पुलिस के कितने लाठी और डँडे खाकर मँथन सामान इधर - उधर से जुगाड़ कर -करके पूरे मुहल्ले को खिलाता था। और कितना पैसा ये लोग ज्यादा ले - लेते हैं। रुपया -दो रूपया आगे पीछे चलता रहता है। तुम या तुम्हारे बच्चों को कई बार जब तुम नहीं भी रहते हो। तो ये उनको फ्री में टॉफियाँ दे देता है। और फिर बड़े - बड़े मॉल कभी कैरी बैग के नाम पर। तो कभी सर्विस चार्ज के नाम पर एक्सट्रा चार्जेज जोड़ लेते हैं। जिसका ग्राहक चाहकर भी विरोध नहीं कर पाता है। वहाँ मुँह बँद हो जाता है, लोगों का ।"

"फिर ,भी मैं वहीं से सामान लूँगा। मॉल बेस्ट है मेरे लिये।"

बात आई गई हो गई थी। कई साल बीत गये। दो -तीन साल बाद रजत के पिताजी भी चल बसे। अब रजत और उसकी फैमिली ही बच गये थे।

एक दिन रजत अपनी कार से आॅफिस जा रहा था। तभी विपरीत दिशा से आ रही उसकी कार एक दूसरी अनियंत्रित कार से टकरा गई। और रजत के कार के परखच्चे उड़ गये। रजत को अस्पताल में भर्ती करवाया गया। रजत अब महीनों बिस्तर से उठ नहीं सकता था। अब डॉक्टरों ने उसको लँबा बेड रेस्ट करने को कहा था। डॉक्टर कह रहे थे कि इतने बड़े एक्सीडेंट में अगर वो बच गया है। तो यही बहुत बड़ी बात है। बैंक की उसकी प्राइवेट नौकरी थी। उसकी नौकरी छूट गई। उसकी पत्नी के घर वालों ने कुछ महीनों तक मदद की। उसके बाद उन्होंनेे भी हाथ खींच लिये। पूरे दो साल तक रजत बेड पर रहा। खाना - पीना , पर -पेशाब सब बेड पर ही करता था। बच्चों की फीस जमा नहीं करवा पाने के कारण स्कूल ने बच्चों के नाम काट दिए। अब रजत के बच्चे गर्वन्मेंट स्कूल में पढ़ने जाते। एक दिन की बात है। घर में राशन का सब सामान खत्म हो गया था। और बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे। रजत के बाबूजी अगर जीवित होते। तो जरूर मँथन से कहकर राशन पानी और बच्चों की स्टेशनरी ले आते। लेकिन अब उसके पिता , अजय जी जीवित नहीं थे। इस खराब समय में सविता के पिताजी और भाई ने सविता का फोन उठाना भी बँद कर दिया था। सच कहते हैं , लोग कि मुसीबत में ही अपने और पराये लोगों की पहचान होती है।

एक दिन जब बच्चों को भूख लगी थी। और घर में कुछ भी खाने को नहीं बचा था। रजत का घर और मॉल दोनों पास - पास थे। तो रजत की पत्नी ने सारी बात जाकर मॉल वाले दुकानदार को बताई थी। तब उस दिन सविता के पैरों तले की जमीन खिसक गई । जब मॉल वाले ने सामान उधार देने से साफ मना कर दिया था । उसने बहुत सारे ग्राहकों के सामने ही सविता की बेइज्जती भी कर दी थी। सविता , पति की दुर्घटना वाली स्थिति के कारण बेबस थी। वो अपमान का घूँट पीकर वहाँ से चली आई थी । घर आकर उसने सारी घटना रजत को बताई। रजत बेबसी में आकर बस मॉल वाले के ऊपर दाँत पीसकर रह गया था। उसके पैर अभी पूरी तरह से ठीक नहीं हुए थे। कमर की हड्डी भी टूट गई थी। वो लाचार था। बेचारा कर भी क्या सकता था?

खैर , उड़ते - उड़ते ये बात मँथन को पता चली। मँथन का और अजय बाबू का पुराना पारिवारिक संबंध था। इस नाते मँथन दाल , चावल , चीनी , होरलिक्स , मैदा , सरसों- तेल , कुछ बिस्किट के पैकेट , कुछ मसालों की पुड़िया और आलू , प्याज एक पन्नी में डालकर रजत के घर दे आया था।

रजत और सविता दोनों अवाक् से मँथन को ताक रहे थे।

मँथन ने रजत को नमस्ते किया। और पूछा - "क्या हाल चाल हैं , रजत भैया आप कैसे हैं ?"

रजत को जबाब देते ना बना। फिर भी मँथन से बोला -"ठीक , हूँ, मँथन भैया। धीरे - धीरे रिकवरी हो रही है।"

"हूँ ...आपके एक्सीडेंट के बारे में सुना था। लेकिन दुकान में भीड़ - भाड़ रहने के कारण आपसे मिलने नहीं आ सका। कुछ झिझक भी थी। पता नहीं आप क्या सोचे?"

"रजत भैया , बच्चों को स्कूल जाते नहीं देखता। वो स्कूल जाते हैं, ना?"

"हाँ भाई , स्कूल तो जाते हैं। लेकिन अब प्राइवेट स्कूल में नहीं बल्कि गवर्न्मेंट स्कूल में जाते हैं। लेकिन इधर उनकी स्टेशनरी , किताब , नोटबुक और पेंसिल खत्म हो गये हैं। इसलिए सप्ताह भर से वो स्कूल भी नहीं जा रहे हैं।"

"हाँ, इधर भाभी को भी देखता हूँ। सुबह - सुबह शायद बच्चों को पढ़ाने जाती है।"

"हाँ बगल में प्राइमरी स्कूल है। वहीं छह -सात हजार रूपये में पढ़ाती है। बेचारी को मेरे एक्सीडेंट के बाद बाहर निकलना पड़ गया। अब क्या करूँ? सविता की कमाई तो मेरे दवा - दारू में ही निकल जाती है।"

"पढ़ाने या काम करने में कोई बुराई थोड़ी ही है, रजत भैया। सविता भाभी तो ज्ञान का दीपक जला रही है। इसमें कौन सी बुरी बात है? रजत भैया आपके परिवार के लिये कुछ राशन सामग्री , चावल, दाल , तेल और बच्चों के लिये बिस्किट का पैकेट लेकर आया हूँ। आपके परिवार में मेरे यहाँ से सालों राशन जाता रहा था। इधर कुछ दिनों से आपके यहाँ से राशन-पानी मॉल से आ रहा था। आप मेरे पुराने खाते को फिर से चालू कर दीजिये। रेट भी आपको मैं मॉल वाला ही लगा दूँगा।"

"मँथन भैया मुझे शर्मिंदा मत कीजिए.। मैं पहले ही अपनी नजरों में गिर चुका हूँ। मैनें सविता से कहा भी नहीं था।लेकिन, ये मॉल वाले के यहाँ से उधार माँगने चली गई थी । लेकिन मॉल वाले ने सविता को बेइज्जत करके भगा दिया। मुझे अब समझ में आया आपसी रिश्ते का महत्व। भैया मुझे माफ कर दीजिये। अपने व्यवहार पर मैं शर्मिंदा हूँ।"

"हाँ, इसकी चर्चा मेरे पास आये ग्राहक कर रहे थे। कि एक महिला के साथ मॉल वाला तू- तू, मैं - मैं कर रहा था।मुझे नहीं पता था कि वो आपकी पत्नी सविता जी ही थी। मुझे पता चला तो आपके यहाँ दौड़ा चला आया। सोचा रजत भैया की कुछ मदद की जाए। आखिर मुसीबत के समय ही तो अपने लोग काम आते हैं। अगर, कल को कोई मुसीबत मेरे ऊपर आन पड़ी तो आप लोग मेरी मदद करने आएँगे, ना । कोई बात नहीं भैया। गलती तो आदमी से ही होती है। बच्चों को स्कूल भेजिए। आप स्टेशनरी का सामान मेरी दुकान से मँगवा लीजियेगा। राशन - पानी , साग - भाजी सब कुछ की व्यवस्था मैं कर दूँगा। जब आप ठीक हो जाईयेगा तो, मेरा हिसाब कर दीजियेगा।"

"भैया , सब्जी तो आप नहीं बेचते हैं। फिर सब्जी कैसे देंगे ?"

"मेरा एक दोस्त बिगन आजकल सब्जी बेच रहा है। फल और सब्जियाँ उसके यहाँ से खरीदकर मैं आपको भिजवा दूँगा। पैसे हिसाब में लिख दूँगा। बच्चों को स्कूल भेजिए। उनके पढ़ने लिखने की उम्र है। ईश्वर सब ठीक कर देंगें।"

"अच्छा भैया चलता हूँ। दुकान पर मेरा लड़का अकेला है। फिर आपके पास आऊँगा।" मँथन चला गया।

रजत सोच रहा था। कि पिताजी ठीक कहते थे। ये रिश्ता बरसों में तैयार हुआ है। रजत बच्चों की तरह सुबक - सुबक कर रोने लगा। उसको लगा कि कोई दुकानदार छोटा या बड़ा नहीं होता। छोटी - बड़ी परिस्थितियाँ होती हैं।

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