Pita Ke Patra Putri Ke Naam : Jawaharlal Nehru; Translator : Munshi Premchand

पिता के पत्र पुत्री के नाम : जवाहरलाल नेहरू; अनुवादक : मुंशी प्रेमचंद

संसार पुस्तक है

जब तुम मेरे साथ रहती हो तो अकसर मुझसे बहुत-सी बातें पूछा करती हो और मैं उनका जवाब देने की कोशिश करता हूँ। लेकिन, अब, जब तुम मसूरी में हो और मैं इलाहाबाद में, हम दोनों उस तरह बातचीत नहीं कर सकते। इसलिए मैंने इरादा किया है कि कभी-कभी तुम्हें इस दुनिया की और उन छोटे-बड़े देशों की जो इन दुनिया में हैं, छोटी-छोटी कथाएँ लिखा करूँ। तुमने हिंदुस्तान और इंग्लैंड का कुछ हाल इतिहास में पढ़ा है। लेकिन इंग्लैंड केवल एक छोटा-सा टापू है और हिंदुस्तान, जो एक बहुत बड़ा देश है, फिर भी दुनिया का एक छोटा-सा हिस्सा है। अगर तुम्हें इस दुनिया का कुछ हाल जानने का शौक है, तो तुम्हें सब देशों का, और उन सब जातियों का जो इसमें बसी हुई हैं, ध्यान रखना पड़ेगा, केवल उस एक छोटे-से देश का नहीं जिसमें तुम पैदा हुई हो।

मुझे मालूम है कि इन छोटे-छोटे खतों में बहुत थोड़ी-सी बातें ही बतला सकता हूँ। लेकिन मुझे आशा है कि इन थोड़ी-सी बातों को भी तुम शौक से पढ़ोगी और समझोगी कि दुनिया एक है और दूसरे लोग जो इसमें आबाद हैं हमारे भाई-बहन हैं। जब तुम बड़ी हो जाओगी तो तुम दुनिया और उसके आदमियों का हाल मोटी-मोटी किताबों में पढ़ोगी। उसमें तुम्हें जितना आनंद मिलेगा उतना किसी कहानी या उपन्यास में भी न मिला होगा।

यह तो तुम जानती ही हो कि यह धरती लाखों करोड़ों, वर्ष पुरानी है, और बहुत दिनों तक इसमें कोई आदमी न था। आदमियों के पहले सिर्फ जानवर थे, और जानवरों से पहले एक ऐसा समय था जब इस धरती पर कोई जानदार चीज न थी। आज जब यह दुनिया हर तरह के जानवरों और आदमियों से भरी हुई है, उस जमाने का खयाल करना भी मुश्किल है जब यहाँ कुछ न था। लेकिन विज्ञान जाननेवालों और विद्वानों ने, जिन्होंने इस विषय को खूब सोचा और पढ़ा है, लिखा है कि एक समय ऐसा था जब यह धरती बेहद गर्म थी और इस पर कोई जानदार चीज नहीं रह सकती थी। और अगर हम उनकी किताबें पढ़ें, पहाड़ों और जानवरों की पुरानी हड्डियों को गौर से देखें तो हमें खुद मालूम होगा कि ऐसा समय जरूर रहा होगा।

तुम इतिहास किताबों में ही पढ़ सकती हो। लेकिन पुराने जमाने में तो आदमी पैदा ही न हुआ था; किताबें कौन लिखता? तब हमें उस जमाने की बातें कैसे मालूम हों? यह तो नहीं हो सकता कि हम बैठे-बैठे हर एक बात सोच निकालें। यह बड़े मजे की बात होती, क्योंकि हम जो चीज चाहते सोच लेते, और सुंदर परियों की कहानियाँ गढ़ लेते। लेकिन जो कहानी किसी बात को देखे बिना ही गढ़ ली जाए वह ठीक कैसे हो सकती है? लेकिन खुशी की बात है कि उस पुराने जमाने की लिखी हुई किताबें न होने पर भी कुछ ऐसी चीजें हैं जिनसे हमें उतनी ही बातें मालूम होती हैं जितनी किसी किताब से होतीं। ये पहाड़, समुद्र, सितारे, नदियाँ, जंगल, जानवरों की पुरानी हड्डियाँ और इसी तरह की और भी कितनी ही चीजें हैं जिनसे हमें दुनिया का पुराना हाल मालूम हो सकता है। मगर हाल जानने का असली तरीका यह नहीं है कि हम केवल दूसरों की लिखी हुई किताबें पढ़ लें, बल्कि खुद संसार-रूपी पुस्तक को पढ़ें। मुझे आशा है कि पत्थरों और पहाड़ों को पढ़ कर तुम थोड़े ही दिनों में उनका हाल जानना सीख जाओगी। सोचो, कितनी मजे की बात है। एक छोटा-सा रोड़ा जिसे तुम सड़क पर या पहाड़ के नीचे पड़ा हुआ देखती हो, शायद संसार की पुस्तक का छोटा-सा पृष्ठ हो, शायद उससे तुम्हें कोई नई बात मालूम हो जाय। शर्त यही है कि तुम्हें उसे पढ़ना आता हो। कोई जबान, उर्दू, हिंदी या अंग्रेजी, सीखने के लिए तुम्हें उसके अक्षर सीखने होते हैं। इसी तरह पहले तुम्हें प्रकृति के अक्षर पढ़ने पड़ेंगे, तभी तुम उसकी कहानी उसकी पत्थरों और चट्टानों की किताब से पढ़ सकोगी। शायद अब भी तुम उसे थोड़ा-थोड़ा पढ़ना जानती हो। जब तुम कोई छोटा-सा गोल चमकीला रोड़ा देखती हो, तो क्या वह तुम्हें कुछ नहीं बतलाता? यह कैसे गोल, चिकना और चमकीला हो गया और उसके खुरदरे किनारे या कोने क्या हुए? अगर तुम किसी बड़ी चट्टान को तोड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर डालो तो हर एक टुकड़ा खुरदरा और नोकीला होगा। यह गोल चिकने रोड़े की तरह बिल्कुल नहीं होता। फिर यह रोड़ा कैसे इतना चमकीला, चिकना और गोल हो गया? अगर तुम्हारी ऑंखें देखें और कान सुनें तो तुम उसी के मुँह से उसकी कहानी सुन सकती हो। वह तुमसे कहेगा कि एक समय, जिसे शायद बहुत दिन गुजरे हों, वह भी एक चट्टान का टुकड़ा था। ठीक उसी टुकड़े की तरह, उसमें किनारे और कोने थे, जिसे तुम बड़ी चट्टान से तोड़ती हो। शायद वह किसी पहाड़ के दामन में पड़ा रहा। तब पानी आया और उसे बहा कर छोटी घाटी तक ले गया। वहाँ से एक पहाड़ी नाले ने ढकेल कर उसे एक छोटे-से दरिया में पहुँचा दिया। इस छोटे से दरिया से वह बड़े दरिया में पहुँचा। इस बीच वह दरिया के पेंदे में लुढ़कता रहा, उसके किनारे घिस गए और वह चिकना और चमकदार हो गया। इस तरह वह कंकड़ बना जो तुम्हारे सामने है। किसी वजह से दरिया उसे छोड़ गया और तुम उसे पा गईं। अगर दरिया उसे और आगे ले जाता तो वह छोटा होते-होते अंत में बालू का एक जर्रा हो जाता और समुद्र के किनारे अपने भाइयों से जा मिलता, जहाँ एक सुंदर बालू का किनारा बन जाता, जिस पर छोटे-छोटे बच्चे खेलते और बालू के घरौंदे बनाते।

अगर एक छोटा-सा रोड़ा तुम्हें इतनी बातें बता सकता है, तो पहाड़ों और दूसरी चीजों से, जो हमारे चारों तरफ हैं, हमें और कितनी बातें मालूम हो सकती हैं।

शुरू का इतिहास कैसे लिखा गया

अपने पहले पन्‍ने में मैंने तुम्हें बताया था कि हमें संसार की किताब से ही दुनिया के शुरू का हाल मालूम हो सकता है। इस किताब में चट्टान, पहाड़, घाटियॉं, नदियाँ, समुद्र, ज्वालामुखी और हर एक चीज, जो हम अपने चारों तरफ देखते हैं, शामिल हैं। यह किताब हमेशा हमारे सामने खुली रहती है, लेकिन बहुत ही थोड़े आदमी इस पर ध्यान देते या इसे पढ़ने की कोशिश करते हैं। अगर हम इसे पढ़ना और समझना सीख लें, तो हमें इसमें कितनी ही मनोहर कहानियाँ मिल सकती हैं। इसके पत्थर के पृष्ठों में हम जो कहानियाँ पढ़ेंगे वे परियों की कहानियों से कहीं सुंदर होंगी।

इस तरह संसार की इस पुस्तक से हमें उस पुराने जमाने का हाल मालूम हो जाएगा जब कि हमारी दुनिया में कोई आदमी या जानवर न था। ज्यों-ज्यों हम पढ़ते जाएँगेगे हमें मालूम होगा कि पहले जानवर कैसे आए और उनकी तादाद कैसे बढ़ती गई। उनके बाद आदमी आए; लेकिन वे उन आदमियों की तरह न थे, जिन्हें हम आज देखते हैं। वे जंगली थे और जानवरों में और उनमें बहुत कम फर्क था। धीरे-धीरे उन्हें तजरबा हुआ और उनमें सोचने की ताकत आई। इसी ताकत ने उन्हें जानवरों से अलग कर दिया। यह असली ताकत थी जिसने उन्हें बड़े-से-बड़े और भयानक से भयानक जानवरों से ज्यादा बलवान बना दिया। तुम देखती हो कि एक छोटा-सा आदमी एक बड़े हाथी के सिर पर बैठ कर उससे जो चाहता है करा लेता है। हाथी बड़े डील-डौल का जानवर है, और उस महावत से कहीं ज्यादा बलवान है, जो उसकी गर्दन पर सवार है। लेकिन महावत में सोचने की ताकत है और इसी की बदौलत वह मालिक है और हाथी उसका नौकर। ज्यों-ज्यों आदमी में सोचने की ताकत बढ़ती गई, उसकी सूझ-बूझ भी बढ़ती गई। उसने बहुत-सी बातें सोच निकालीं। आग जलाना, जमीन जोत कर खाने की चीजें पैदा करना, कपड़ा बनाना और पहनना, और रहने के लिए घर बनाना, ये सभी बातें उसे मालूम हो गईं। बहुत-से आदमी मिल कर एक साथ रहते थे और इस तरह पहले शहर बने। शहर बनने से पहले लोग जगह-जगह घूमते-फिरते थे और शायद किसी तरह के खेमों में रहते होंगे। तब तक उन्हें जमीन से खाने की चीजें पैदा करने का तरीका नहीं मालूम था। न उनके पास चावल था, न गेहूँ जिससे रोटियाँ बनती हैं। न तो तरकारियाँ थीं और न दूसरी चीजें जो हम आज खाते हैं। शायद कुछ फल और बीज उन्हें खाने को मिल जाते हों मगर ज्यादातर वे जानवरों को मार कर उनका माँस खाते थे।

ज्यों-ज्यों शहर बनते गए, लोग तरह-तरह की सुंदर कलाएं सीखते गए। उन्होंने लिखना भी सीखा। लेकिन बहुत दिनों तक लिखने का कागज न था, और लोग भोजपत्र या ताड़ के पत्तों पर लिखते थे। आज भी बाज पुस्तकालयों में तुम्हें समूची किताबें मिलेंगी जो उसी पुराने जमाने में भोजपत्रों पर लिखी गई थीं। तब कागज बना और लिखने में आसानी हो गई। लेकिन छापेखाने न थे और आजकल की भाँति किताबें हजारों की तादाद में न छप सकती थीं। कोई किताब जब लिख ली जाती थी तो बड़ी मेहनत के साथ हाथ से उसकी नकल की जाती थी। ऐसी दशा में किताबें बहुत न थीं। तुम किसी किताबबेचनेवाले की दुकान पर जा कर चटपट किताब न खरीद सकतीं। तुम्हें किसी से उसकी नकल करानी पड़ती और उसमें बहुत समय लगता। लेकिन उन दिनों लोगों के अक्षर बहुत सुंदर होते थे और आज भी पुस्तकालयों में ऐसी किताबें मौजूद हैं, जो हाथ से बहुत सुंदर अक्षरों में लिखी गई थीं। हिंदुस्तान में खास कर संस्कृत, फारसी और उर्दू की किताबें मिलती हैं। अकसर नकल करनेवाले पृष्ठों के किनारों पर सुंदर बेल-बूटे बना दिया करते थे।

शहरों के बाद धीरे-धीरे देशों और जातियों की बुनियाद पड़ी। जो लोग एक मुल्क में आस-पास रहते थे उनका एक दूसरे से मेल-जोल हो जाना स्वाभाविक था। वे समझने लगे कि हम दूसरे मुल्कवालों से बढ़-चढ़ कर हैं और बेवकूफी से उनसे लड़ने लगे। उनकी समझ में यह बात न आई, और आज भी लोगों की समझ में नहीं आ रही कि लड़ने और एक-दूसरे की जान लेने से बढ़ कर बेवकूफी की बात और कोई नहीं हो सकती। इससे किसी को फायदा नहीं होता।

जिस जमाने में शहर और मुल्क बने, उसकी कहानी जानने के लिए पुरानी किताबें कभी-कभी मिल जाती हैं। लेकिन ऐसी किताबें बहुत नहीं हैं। हाँ, दूसरी चीजों से हमें मदद मिलती है। पुराने जमाने के राजे-महाराजे अपने समय का हाल पत्थर के टुकड़ों और खंभों पर लिखवा दिया करते थे। किताबें बहुत दिन तक नहीं चल सकतीं। उनका कागज बिगड़ जाता है और उसे कीड़े खा जाते हैं। लेकिन पत्थर बहुत दिन चलता है। शायद तुम्हें याद होगा कि तुमने इलाहाबाद के किले में अशोक की बड़ी लाट देखी है। कई सौ साल हुए अशोक हिंदुस्तान का एक बड़ा राजा था। उसने उस खंभे पर अपना एक आदेश खुदवा दिया है। अगर तुम लखनऊ के अजायबघर में जाओ, तो तुम्हें बहुत-से पत्थर के टुकड़े मिलेंगे जिन पर अक्षर खुदे हैं।

संसार के देशों का इतिहास पढ़ने लगोगी तो तुम्हें उन बड़े-बड़े कामों का हाल मालूम होगा जो चीन और मिस्रवालों ने किये थे। उस समय यूरोप के देशों में जंगली जातियाँ बसती थीं। तुम्हें हिंदुस्तान के उस शानदार जमाने का हाल भी मालूम होगा जब रामायण और महाभारत लिखे गए और हिंदुस्तान बलवान और धनवान देश था। आज हमारा मुल्क बहुत गरीब है और एक विदेशी जाति हमारे ऊपर राज्य कर रही है। हम अपने ही मुल्क में आजाद नहीं हैं और जो कुछ करना चाहें नहीं कर सकते। लेकिन यह हाल हमेशा नहीं था और अगर हम पूरी कोशिश करें तो शायद हमारा देश फिर आजाद हो जाए, जिससे हम गरीबों की दशा सुधार सकें और हिंदुस्तान में रहना उतना ही आरामदेह हो जाए, जितना कि आज यूरोप के कुछ देशों में है।

मैं अपने अगले खत में संसार की मनोहर कहानी शुरू से लिखना आरंभ करूँगा।

जमीन कैसे बनी

तुम जानती हो कि जमीन सूरज के चारों तरफ घूमती है और चाँद जमीन के चारों तरफ घूमता है। शायद तुम्हें यह भी याद है कि ऐसे और भी कई गोले हैं, जो जमीन की तरह सूरज का चक्कर लगाते हैं। ये सब, हमारी जमीन को मिला कर, सूरज के ग्रह कहलाते हैं। चाँद जमीन का उपग्रह कहलाता है; इसलिए कि वह जमीन के ही आसपास रहता है। दूसरे ग्रहों के भी अपने-अपने उपग्रह हैं। सूरज, उसके ग्रह और ग्रहों के उपग्रह मिल कर मानो एक सुखी परिवार बन जाता है। इस परिवार को सौर जगत कहते हैं। सौर का अर्थ है सूरज का। सूरज ही सब ग्रहों और उपग्रहों का बाबा है। इसीलिए इस परिवार को सौर-जगत कहते हैं।

रात को तुम आसमान में हजारों सितारे देखती हो। इनमें से थोड़े-से ही ग्रह हैं और बाकी सितारे हैं। क्या तुम बता सकती हो कि ग्रह और तारे में क्या फर्क है? ग्रह हमारी जमीन की तरह सितारों से बहुत छोटे होते हैं लेकिन आसमान में वे बड़े नजर आते हैं, क्योंकि जमीन से उनका फासला कम है। ठीक ऐसा ही समझो जैसे चाँद, जो बिल्कुल बच्चे की तरह है, हमारे नजदीक होने की वजह से इतना बड़ा मालूम होता है। लेकिन सितारों और ग्रहों के पहचानने का असली तरीका यह है कि वे जगमगाते हैं या नहीं। सितारे जगमगाते हैं, ग्रह नहीं जगमगाते। इसका सबब यह है कि ग्रह सूर्य की रोशनी से चमकते हैं। चाँद और ग्रहों में जो चमक हम देखते हैं वह धूप की है। असली सितारे बिल्कुल सूरज की तरह हैं, वे बहुत गर्म जलते हुए गोले हैं जो आप ही आप चमकते हैं। दरअसल, सूरज खुद एक सितारा है। हमें यह बड़ा आग का गोला-सा मालूम होता है, इसलिए कि जमीन से उसकी दूरी और सितारों से कम है।

इससे अब तुम्हें मालूम हो गया कि हमारी जमीन भी सूरज के परिवार में सौर जगत में है। हम समझते हैं कि जमीन बहुत बड़ी है और हमारे जैसी छोटी-सी चीज को देखते हुए वह है भी बहुत बड़ी। अगर किसी तेज गाड़ी या जहाज पर बैठो तो इसके एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक जाने में हफ्तों और महीनों लग जाते हैं। लेकिन हमें चाहे यह कितनी ही बड़ी दिखाई दे, असल में यह धूल के एक कण की तरह हवा में लटकी हुई है। सूरज जमीन से करोड़ों मील दूर है और दूसरे सितारे इससे भी ज्यादा दूर हैं।

ज्योतिषी या वे लोग जो सितारों के बारे में बहुत-सी बातें जानते हैं हमें बतलाते हैं कि बहुत दिन पहले हमारी जमीन और सारे ग्रह सूर्य ही में मिले हुए थे। आजकल की तरह उस समय भी सूरज जलती हुई धातु का निहायत गर्म गोला था। किसी वजह से सूरज के छोटे-छोटे टुकड़े उससे टूट कर हवा में निकल पड़े। लेकिन वे अपने पिता सूर्य से बिल्कुल अलग न हो सके। वे इस तरह सूर्य के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगे, जैसे उनको किसी ने रस्सी से बाँध कर रखा हो। यह विचित्र शक्ति जिसकी मैंने रस्सी से मिसाल दी है, एक ऐसी ताकत है जो छोटी चीजों को बड़ी चीजों की तरफ खींचती है। यह वही ताकत है, जो वजनदार चीजों को जमीन पर गिरा देती है। हमारे पास जमीन ही सबसे भारी चीज है, इसी से वह हर एक चीज को अपनी तरफ खींच लेती है।

इस तरह हमारी जमीन भी सूरज से निकल भागी थी। उस जमाने में यह बहुत गर्म रही होगी; इसके चारों तरफ की हवा भी बहुत गर्म रही होगी लेकिन सूरज से बहुत ही छोटी होने के कारण वह जल्द ठंडी होने लगी। सूरज की गर्मी भी दिन-दिन कम होती जा रही है लेकिन उसे बिल्कुल ठंडे हो जाने में लाखों बरस लगेंगे। जमीन के ठंडे होने में बहुत थोड़े दिन लगे। जब यह गर्म थी तब इस पर कोई जानदार चीज जैसे आदमी, जानवर, पौधा या पेड़ न रह सकते थे। सब चीजें जल जातीं।

जैसे सूरज का एक टुकड़ा टूट कर जमीन हो गया इसी तरह जमीन का एक टुकड़ा टूट कर निकल भागा और चाँद हो गया। बहुत-से लोगों का खयाल है कि चाँद के निकलने से जो गड्ढा हो गया वह अमरीका और जापान के बीच का प्रशांत सागर है। मगर जमीन को ठंडे होने में भी बहुत दिन लग गए। धीरे-धीरे जमीन की ऊपरी तह तो ज्यादा ठंडी हो गई लेकिन उसका भीतरी हिस्सा गर्म बना रहा। अब भी अगर तुम किसी कोयले की खान में घुसो, तो ज्यों-ज्यों तुम नीचे उतरोगी गर्मी बढ़ती जायगी। शायद अगर तुम बहुत दूर नीचे चली जाओ तो तुम्हें जमीन अंगारे की तरह मिलेगी। चाँद भी ठंडा होने लगा। वह जमीन से भी ज्यादा छोटा था इसलिए उसके ठंडे होने में जमीन से भी कम दिन लगे! तुम्हें उसकी ठंडक कितनी प्यारी मालूम होती है। उसे ठंडा चाँद ही कहते हैं। शायद वह बर्फ क़े पहाड़ों और बर्फ से ढके हुए मैदानों से भरा हुआ है।

जब जमीन ठंडी हो गई तो हवा में जितनी भाप थी वह जम कर पानी बन गई और शायद मेंघ बन कर बरस पड़ी। उस जमाने में बहुत ही ज्यादा पानी बरसा होगा। यह सब पानी जमीन के बड़े-बड़े गङ्ढों में भर गया और इस तरह बड़े-बड़े समुद्र और सागर बन गए।

ज्यों-ज्यों जमीन ठंडी होती गई और समुद्र भी ठंडे होते गए त्यों-त्यों दोनों जानदार चीजों के रहने लायक होते गए।

दूसरे खत में मैं तुम्हें जानदार चीजों के पैदा होने का हाल लिखूँगा।

जानदार चीजें कैसे पैदा हुईं

पिछले खत में मैं तुम्हें बतला चुका हूँ कि बहुत दिनों तक जमीन इतनी गर्म थी कि कोई जानदार चीज उस पर रह ही न सकती थी। तुम पूछोगी कि जमीन पर जानदार चीजों का आना कब शुरू हुआ और पहले कौन-कौन सी चीजें आईं। यह बड़े मजे का सवाल है, पर इसका जवाब देना आसान नहीं है। पहले यह देखो कि जान है क्या चीज। शायद तुम कहोगी कि आदमी और जानवर जानदार हैं। लेकिन दरख्तों और झाड़ियों, फूलों और तरकारियों को क्या कहोगी? यह मानना पड़ेगा कि वे सब भी जानदार हैं। वे पैदा होते हैं, पानी पीते हैं, हवा में साँस लेते हैं और मर जाते हैं। दरख्त और जानवर में खास फर्क यह है कि जानवर चलता-फिरता है, और दरख्त हिल नहीं सकते। तुमको याद होगा कि मैंने लंदन के क्यू गार्डन में तुम्हें कुछ पौधे दिखाए थे। ये पौधे, जिन्हें आर्किड और पिचरक्व कहते हैं, सचमुच मक्खियाँ खा जाते हैं। इसी तरह कुछ जानवर भी ऐसे हैं, जो समुद्र के नीचे रहते हैं और चल-फिर नहीं सकते। स्पंज ऐसा ही जानवर है। कभी-कभी तो किसी चीज को देख कर यह बतलाना मुश्किल हो जाता है कि वह पौधा है या जानवर। जब तुम वनस्पतिशास्त्र (पेड़-पौधों की विद्या) या जीवशास्त्र (जिसमें जीव-जंतुओं का हाल लिखा होता है) पढ़ोगी तो तुम इन अजीब चीजों को देखोगी जो न जानवर हैं न पौधे। कुछ लोगों का खयाल है कि पत्थरों और चट्टानों में भी एक किस्म की जान है और उन्हें भी एक तरह का दर्द होता है; मगर हमको इसका पता नहीं चलता। शायद तुम्हें उन महाशय की याद होगी जो हमसे जेनेवा में मिलने आए थे उनका नाम है सर जगदीश बोस। उन्होंने परीक्षण करके साबित किया है कि पौधों में बहुत कुछ जान होती है। इनका खयाल है कि पत्थरों में भी कुछ जान होती है।

इससे तुम्हें मालूम हो गया होगा कि किसी चीज को जानदार या बेजान कहना कितना मुश्किल है। लेकिन इस वक्त हम पत्थरों को छोड़ देते हैं, सिर्फ जानवरों और पौधों पर ही विचार करते हैं। आज संसार में हजारों जानदार चीजे हैं। वे सभी किस्म की हैं। मर्द हैं और औरतें हैं। और इनमें से कुछ लोग होशियार हैं और कुछ लोग बेवकूफ हैं। जानवर भी बहुत तरह के हैं और उनमें भी हाथी, बंदर या चींटी की तरह समझदार जानवर हैं और बहुत-से जानवर बिल्कुल बेसमझ भी हैं। मछलियाँ और समुद्र की बहुत-सी चीजें जानदारों में और भी नीचे दरजे की हैं। उनसे भी नीचा दरजा स्पंजों और मुरब्बे की शक्ल की मछलियों का है जो आधा पौधा और जानवर है।

अब हमको इस बात का पता लगाना है कि ये भिन्न-भिन्न प्रकार के जानवर एक साथ और एक वक्त पैदा हुए या एक-एक कर धीरे-धीरे। हमें यह कैसे मालूम हो। उस पुराने जमाने की लिखी हुई तो कोई किताब है नहीं। लेकिन क्या संसार की पुस्तक से हमारा काम चल सकता है? हाँ, चल सकता है। पुरानी चट्टानों में जानवरों की हड्डियाँ मिलती हैं, इन्हें अंग्रेजी में फॉसिल या पथराई हुई हड्डी कहते हैं। इन हड्डियाँ से इस बात का पता चलता है कि उस चट्टान के बनने के बहुत पहले वह जानवर जरूर रहा होगा जिसकी हड्डियाँ मिली हैं। तुमने इस तरह की बहुत-सी छोटी और बड़ी हड्डियाँ लंदन के साउथ कैंसिंगटन के अजायबघर में देखी थीं।

जब कोई जानवर मर जाता है तो उसका नर्म और माँसवाला भाग तो फौरन सड़ जाता है, लेकिन उसकी हड्डियाँ बहुत दिनों तक बनी रहती हैं। यही हड्डियाँ उस पुराने जमाने के जानवरों का कुछ हाल हमें बताती हैं। लेकिन अगर कोई जानवर बिना हड्डी का ही हो, जैसे मुरब्बे की शक्ल वाली मछलियाँ होती हैं तो उसके मर जाने पर कुछ भी बाकी न रहेगा।

जब हम चट्टानों को गौर से देखते हैं और बहुत-सी पुरानी हड्डियों को जमा कर लेते हैं तो हमें मालूम हो जाता है कि भिन्न-भिन्न समय में भिन्न-भिन्न प्रकार के जानवर रहते थे। सबके सब एकबारगी कहीं से कूद कर नहीं आ गए। सबसे पहले छिलकेदार जानवर पैदा हुए जैसे घोंघे। समुद्र के किनारे तुम जो सुंदर घोंघे बटोरती हो वे उन जानवरों के छिलके हैं जो मर चुके हैं। उसके बाद ज्यादा ऊँचे दरजे के जानवर पैदा हुए, जिनमें साँप और हाथी जैसे बड़े जानवर थे, और वे चिड़ियाँ और जानवर भी, जो आज तक मौजूद हैं। सबके पीछे आदमियों की हड्डियाँ मिलती हैं। इससे यह पता चलता है कि जानवरों के पैदा होने में भी एक क्रम था। पहले नीचे दरजे के जानवर आए, तब ज्यादा ऊँचे दरजे के जानवर पैदा हुए और ज्यों-ज्यों दिन गुजरते गए वे और भी बारीक होते गए और आखिर में सबसे ऊँचे दरजे का जानवर यानी आदमी पैदा हुआ। सीधे-सादे स्पंज और घोंघे में कैसे इतनी तब्दीलियाँ हुईं और कैसे वे इतने ऊँचे दरजे पर पहुँच गए; यही बड़ी मजेदार कहानी है और किसी दिन मैं उसका हाल बताऊँगा। इस वक्त हम सिर्फ उन जानवरों का जिक्र कर रहे हैं जो पहले पैदा हुए।

जमीन के ठंडे हो जाने के बाद शायद पहली जानदार चीज वह नर्म मुरब्बे की-सी चीज थी जिस पर न कोई खोल था न कोई हड्डी थी वह समुद्र में रहती थी। हमारे पास उनकी हड्डियाँ नहीं हैं क्योंकि उनके हड्डियाँ थी ही नहीं, इसलिए हमें कुछ न कुछ अटकल से काम लेना पड़ता है। आज भी समुद्र में बहुत-सी मुरब्बे की सी चीजे हैं। वे गोल होती हैं लेकिन उनकी सूरत बराबर बदलती रहती है क्योंकि न उनमें कोई हड्डी है न खोल। उनकी सूरत कुछ इस तरह की होती है।

तुम देखती हो कि बीच में एक दाग है। इसे बीज कहते हैं और यह एक तरह से उसका दिल है। यह जानवर, या इन्हें जो चाहो कहो, एक अजीब तरीके से कट कर एक के दो हो जाते हैं। पहले वे एक जगह पतले होने लगते हैं और इसी तरह पतले होते चले जाते हैं, यहाँ तक कि टूट कर दो मुरब्बे की-सी चीजें बन जाते हैं और दोनों ही शक्ल असली लोथड़े की सी होती है।

बीज या दिल के भी दो टुकड़े हो जाते हैं और दोनों लोथड़ों के हिस्से में इसका एक-एक टुकड़ा आ जाता है। इस तरह ये जानवर टूटते और बढ़ते चले जाते हैं।

इसी तरह की कोई चीज सबसे पहले हमारे संसार में आई होगी। जानदार चीजों का कितना सीधा-सादा और तुच्छ रूप था! सारी दुनिया में इससे अच्छी या ऊँचे दरजे की चीज उस वक्त न थी। असली जानवर पैदा न हुए थे और आदमी के पैदा होने में लाखों बरस की देर थी।

इन लोथड़ों के बाद समुद्र की घास और घोंघे, केकड़े और कीड़े पैदा हुए। तब मछलियाँ आईं। इनके बारे में हमें बहुत-सी बातें मालूम होती हैं क्योंकि उन पर कड़े खोल या हड्डियाँ थीं और इसे वे हमारे लिए छोड़ गई हैं ताकि उनके मरने के बहुत दिनों के बाद हम उन पर गौर कर सकें। यह घोंघे समुद्र के किनारे जमीन पर पड़े रह गए। इन पर बालू और ताजी मिट्टी जमती गई और ये बहुत हिफाजत से पड़े रहे। नीचे की मिट्टी, ऊपर की बालू और मिट्टी के बोझ और दबाव से कड़ी होती गई। यहाँ तक कि वह पत्थर जैसी हो गई। इस तरह समुद्र के नीचे चट्टानें बन गईं। किसी भूचाल के आ जाने से या और किसी सबब से ये चट्टानें समुद्र के नीचे से निकल आईं और सूखी जमीन बन गईं। तब इस सूखी चट्टान को नदियाँ और मेह बहा ले गए। और जो हड्डियाँ उनमें लाखों बरसों से छिपी थीं बाहर निकल आईं। इस तरह हमें ये घोंघे या हड्डियाँ मिल गईं जिनसे हमें मालूम हुआ कि हमारी जमीन आदमी के पैदा होने के पहले कैसी थी।

दूसरी चिट्ठी में हम इस बात पर विचार करेंगे कि ये नीचे दरजे के जानवर कैसे बढ़ते-बढ़ते आजकल की सी सूरत के हो गए।

जानवर कब पैदा हुए

हम बतला चुके हैं कि शुरू में छोटे-छोटे समुद्री जानवर और पानी में होनेवाले पौधे दुनिया की जानदार चीजों में थे। वे सिर्फ पानी में ही रह सकते थे और अगर किसी वजह से बाहर निकल आते और उन्हें पानी न मिलता तो जरूर मर जाते होंगे। जैसे आज भी मछलियाँ सूखें में आने से मर जाती हैं। लेकिन उस जमाने में आजकल से कहीं ज्यादा समुद्र और दलदल रहे होंगे। वे मछलियाँ और दूसरे पानी के जानवर जिनकी खाल जरा चिमड़ी थी, सूखी जमीन पर दूसरों से कुछ ज्यादा देर तक जी सकते होंगे। क्योंकि उन्हें सूखने में देर लगती थी। इसलिए नर्म मछलियाँ और उन्हीं की तरह के दूसरे जानवर धीरे-धीरे कम होते गए क्योंकि सूखी जमीन पर जिंदा रहना उनके लिए मुश्किल था और जिनकी खाल ज्यादा सख्त थी वे बढ़ते गए। सोचो, कितनी अजीब बात है! इसका यह मतलब है कि जानवर धीरे-धीरे अपने को आस-पास की चीजों के अनुकूल बना लेते हैं। तुमने लंदन के अजायबघर में देखा था कि जाड़ों में और ठंडे देशों में जहाँ बहुतायत से बर्फ गिरती है चिड़ियाँ और जानवर बर्फ की तरह सफेद हो जाते हैं। गरम देशों में जहाँ हरियाली और दरख्त बहुत होते हैं वे हरे या किसी दूसरे चमकदार रंग के हो जाते हैं। इसका यह मतलब है कि वे अपने को उसी तरह का बना लेते हैं जैसे उनके आसपास की चीजें हों। उनका रंग इसलिए बदल जाता है कि वे अपने को दुश्मनों से बचा सकें, क्योंकि अगर उनका रंग आस-पास की चीजों से मिल जाए तो वे आसानी से दिखाई न देंगे। सर्द मुल्कों में उनकी खाल पर बाल निकल आते हैं जिससे वे गर्म रह सकें। इसीलिए चीते का रंग पीला और धारीदार होता है, उस धूप की तरह, जो दरख्तों से हो कर जंगल में आती है। वह घने जंगल में मुश्किल से दिखाई देता है।

इस अजीब बात का जानना बहुत जरूरी है। जानवर अपने रंग-ढंग को आसपास की चीजों से मिला देते हैं। यह बात नहीं है कि जानवर अपने को बदलने की कोशिश करते हों; लेकिन जो अपने को बदल कर आसपास की चीजों से मिला देते हैं उनको जिंदा रहना ज्यादा आसान हो जाता है। उनकी तादाद बढ़ने लगती है, दूसरों की नहीं बढ़ती। इससे बहुत-सी बातें समझ में आ जाती हैं। इससे यह मालूम हो जाता है कि नीचे दरजे के जानवर धीरे-धीरे ऊँचे दरजों में पहुँचते हैं और मुमकिन है कि लाखों बरसों के बाद आदमी हो जाते हैं। हम ये तब्दीलियाँ, जो हमारे चारों तरफ होती रहती हैं, देख नहीं सकते, क्योंकि वे बहुत धीरे-धीरे होती हैं और हमारी जिंदगी कम होती है। लेकिन प्रकृति अपना काम करती रहती है और चीजों को बदलती और सुधारती रहती है। वह न तो कभी रुकती है और न आराम करती है।

तुम्हें याद है कि दुनिया धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी और इसका पानी सूखता जाता था। जब यह ज्यादा ठंडी हो गई तो जलवायु बदल गई और उसके साथ ही बहुत-सी बातें बदल गईं। ज्यों-ज्यों दुनिया बदलती गई जानवर भी बदलते गए और नई-नई किस्म के जानवर पैदा होते गए। पहले नीचे दरजे के दरियाई जानवर पैदा हुए, फिर ज्यादा ऊँचे दरजे के। इसके बाद जब सूखी जमीन ज्यादा हो गई तो ऐसे जानवर पैदा हुए जो पानी और जमीन दोनों ही पर रह सकते हैं जैसे, मगर या मेढक। इसके बाद वे जानवर पैदा हुए जो सिर्फ जमीन पर रह सकते हैं और तब हवा में उड़ने वाली चिड़ियाँ आईं।

मैंने मेढक का जिक्र किया है। इस अजीब जानवर की जिंदगी से बड़ी मजे की बातें मालूम होती हैं। साफ समझ में आ जाता है कि दरियाई जानवर बदलते-बदलते क्योंकर जमीन के जानवर बन गए। मेढक पहले मछली होता है लेकिन बाद में वह खुश्की का जानवर हो जाता है और दूसरे खुश्की के जानवरों की तरह फेफड़े से सँस लेता है। उस पुराने जमाने में जब खुश्की के जानवर पैदा हुए बड़े-बड़े जंगल थे। जमीन सारी की सारी झावर रही होगी, उस पर घने जंगल होंगे। आगे चल कर ये चट्टान और मिट्टी के बोझ से ऐसे दब गए कि वे धीरे-धीरे कोयला बन गए। तुम्हें मालूम है, कोयला गहरी खानों से निकलता है, ये खानें असल में पुराने जमाने के जंगल हैं।

शुरू-शुरू में जमीन के जानवरों में बड़े-बड़े साँप, छिपकलियाँ और घड़ियाल थे। इनमें से बाज सौ फुट लंबे थे। सौ फुट लंबे साँप या छिपकली का जरा ध्यान तो करो! तुम्हें याद होगा कि तुमने इन जानवरों की हड्डियाँ लंदन के अजायबघर में देखी थीं।

इसके बाद वे जानवर पैदा हुए जो कुछ-कुछ हाल के जानवरों से मिलते थे। ये अपने बच्चों को दूध पिलाते थे। पहले वे भी आजकल के जानवरों से बहुत बड़े होते थे। जो जानवर आदमी से बहुत मिलता-जुलता है वह बंदर या बनमानुस है। इससे लोग खयाल करते हैं कि आदमी बनमानुस की नस्ल है। इसका यह मतलब है कि जैसे और जानवरों ने अपने को आसपास की चीजों के अनुकूल बना लिया और तरक्‍की करते गए इसी तरह आदमी भी पहले एक ऊँची किस्म का बनमानुस था। यह सच है कि यह तरक्‍की करता गया या यों कहो कि प्रकृति उसे सुधारती रही। पर आज उसके घमंड का ठिकाना नहीं। यह खयाल करता है कि और जानवरों से उसका मुकाबला ही क्या। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि हम बंदरों और बनमानुसों के भाई-बंद हैं और आज भी शायद हम में से बहुतों का स्वभाव बंदरों ही जैसा है।

आदमी कब पैदा हुआ

मैंने तुम्हें पिछले खत में बतलाया था कि पहले दुनिया में बहुत नीचे दरजे के जानवर पैदा हुए और धीरे-धीरे तरक्की करते हुए लाखों बरस में उस सूरत में आए जो हम आज देखते हैं। हमें एक बड़ी दिलचस्प और जरूरी बात यह भी मालूम हुई कि जानदार हमेशा अपने को आसपास की चीजों से मिलाने की कोशिश करते गए। इस कोशिश में उनमें नई आदतें पैदा होती गईं और वे ज्यादा ऊँचे दरजे के जानवर होते गए। हमें यह तब्दीली या तरक्‍की कई तरह दिखाई देती है। इसकी मिसाल यह है कि शुरू-शुरू के जानवरों में हड्डियाँ न थीं लेकिन हड्डियों के बगैर वे बहुत दिनों तक जीवित न रह सकते थे इसलिए उनमें हड्डियाँ पैदा हो गईं। सबसे पहले रीढ़ की हड्डी पैदा हुई। इस तरह दो किस्म के जानवर हो गए हड्डीवाले और बेहड्डीवाले। जिन आदमियों या जानवरों को तुम देखती हो वे सब हड्डीवाले हैं!

एक और मिसाल लो। नीचे दरजे के जानवरों में मछलियाँ अंडे दे कर उन्हें छोड़ देती हैं। वे एक साथ हजारों अंडे देती हैं लेकिन उनकी बिल्कुल परवाह नहीं करतीं। माँ बच्चों की बिल्कुल खबर नहीं लेती। वह अंडों को छोड़ देती है और उनके पास कभी नहीं आती। इन अंडों की हिफाजत तो कोई करता नहीं, इसलिए ज्यादातर मर जाते हैं। बहुत थोड़े से अंडों से मछलियाँ निकलती हैं। कितनी जानें बरबाद जाती हैं! लेकिन ऊँचे दरजे के जानवरों को देखो तो मालूम होगा कि उनके अंडे या बच्चे कम होते हैं लेकिन वे उनकी खूब हिफाजत करते हैं। मुर्गी भी अंडे देती है लेकिन वह उन पर बैठती है और उन्हें सेती है। जब बच्चे निकल आते हैं तो वह कई दिन तक उन्हें चुगाती है। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तब माँ उनकी फिक्र छोड़ देती है।

इन जानवरों में और उन जानवरों में जो बच्चे को दूध पिलाते हैं बड़ा फर्क है। यह जानवर अंडे नहीं देते। माँ अंडे को अपने अंदर लिए रहती है और पूरे तौर पर बने हुए बच्चे जनती है। जैसे कुत्ता, बिल्ली या खरगोश। इसके बाद माँ अपने बच्चे को दूध पिलाती है, लेकिन इन जानवरों में भी बहुत-से बच्चे बरबाद हो जाते हैं। खरगोश के कई-कई महीनों के बाद बहुत-से बच्चे पैदा होते हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर मर जाते हैं। लेकिन ऊँचे दरजे के जानवर एक ही बच्चा देते हैं और बच्चे को अच्छी तरह पालते-पोसते हैं जैसे हाथी।

अब तुमको यह भी मालूम हो गया कि जानवर ज्यों-ज्यों तरक्‍की करते हैं वे अंडे नहीं देते बल्कि अपनी सूरत के पूरे बने हुए बच्चे जानते हैं, जो सिर्फ कुछ छोटे होते हैं। ऊँचे दरजे के जानवर आम तौर से एक बार में एक ही बच्चा देते हैं। तुमको यह भी मालूम होगा कि ऊँचे दरजे के जानवरों को अपने बच्चों से थोड़ा-बहुत प्रेम होता है। आदमी सबसे ऊँचे दरजे का जानवर है, इसलिए माँ और बाप अपने बच्चों को बहुत प्यार करते और उनकी हिफाजत करते हैं।

इससे यह मालूम होता है कि आदमी जरूर नीचे दरजे के जानवरों से पैदा हुआ होगा। शायद शुरू के आदमी आजकल के से आदमियों की तरह थे ही नहीं। वे आधे बनमानुस और आधे आदमी रहे होंगे और बंदरों की तरह रहते होंगे। तुम्हें याद है कि जर्मनी के हाइडलबर्ग में तुम हम लोगों के साथ एक प्रोफेसर से मिलने गई थीं? उन्होंने एक अजायबखाना दिखाया था जिसमें पुरानी हड्डियाँ भरी हुई थीं, खासकर एक पुरानी खोपड़ी जिसे वह संदूक में रखे हुए थे। खयाल किया जाता है कि यह शुरू-शुरू के आदमी की खोपड़ी होगी। हम अब उसे हाइडलबर्ग का आदमी कहते हैं, सिर्फ इसलिए कि खोपड़ी हाइडलबर्ग के पास गड़ी हुई मिली थी। यह तो तुम जानती ही हो कि उस जमाने में न हाइडलबर्ग का पता था न किसी दूसरे शहर का।

उस पुराने जमाने में, जब कि आदमी इधर-उधर घूमते फिरते थे, बड़ी सख्त सरदी पड़ती थी इसीलिए उसे बर्फ का जमाना कहते हैं। बर्फ के बड़े-बड़े पहाड़ जैसे आज-कल उत्तरी ध्रुव के पास हैं, इंग्लैंड और जर्मनी तक बहते चले जाते थे। आदमियों का रहना बहुत मुश्किल होता होगा, और उन्हें बड़ी तकलीफ से दिन काटने पड़ते होंगे। वे वहीं रह सकते होंगे जहाँ बर्फ के पहाड़ न हों। वैज्ञानिक लोगों ने लिखा है कि उस जमाने में भूमध्‍य सागर न था बल्कि वहाँ एक या दो झीलें थीं। लाल सागर भी न था। यह सब जमीन थी। शायद हिंदुस्तान का बड़ा हिस्सा टापू था। और हमारे सूबे पंजाब का कुछ हिस्सा समुद्र था। खयाल करो कि सारा दक्षिणी हिंदुस्तान और मध्‍य हिंदुस्तान एक बहुत बड़ा द्वीप है और हिमालय और उसके बीच में समु्द्र लहरें मार रहा है। तब शायद तुम्हें जहाज में बैठ कर मसूरी जाना पड़ता।

शुरू-शुरू में जब आदमी पैदा हुआ तो इसके चारों तरफ बड़े-बड़े जानवर रहे होंगे और उसे उनसे बराबर खटका लगा रहता होगा। आज आदमी दुनिया का मालिक है और जानवरों से जो काम चाहता है करा लेता है। बाजों को वह पाल लेता है जैसे घोड़ा, गाय, हाथी, कुत्ता, बिल्ली वगैरह। बाजों को वह खाता है और बाजों का वह दिल बहलाने के लिए शिकार करता है, जैसे शेर और चीता। लेकिन उस जमाने में वह मालिक न था, बल्कि बड़े-बड़े जानवर उसी का शिकार करते थे और वह उनसे जान बचाता फिरता था। मगर धीरे-धीरे उसने तरक्‍की की और दिन-दिन ज्यादा ताकतवर होता गया यहाँ तक कि वह सब जानवरों से मजबूत हो गया। यह बात उसमें कैसे पैदा हुई? बदन की ताकत से नहीं क्योंकि हाथी उससे कहीं ज्यादा मजबूत होता है। बुध्दि और दिमाग की ताकत से उसमें यह बात पैदा हुई।

आदमी की अक्ल कैसे धीरे-धीरे बढ़ती गई, इसका शुरू से आज तक का पता हम लगा सकते हैं। सच तो यह है कि बुध्दि ही आदमियों को और जानवरों से अलग कर देती है। बिना समझ के आदमी और जानवर में कोई फर्क नहीं है।

पहली चीज, जिसका आदमी ने पता लगाया वह शायद आग थी। आजकल हम दियासलाई से आग जलाते हैं। लेकिन दियासलाइयाँ तो अभी हाल में बनी हैं। पुराने जमाने में आग बनाने का यह तरीका था कि दो चकमक पत्थरों को रगड़ते थे यहाँ तक कि चिनगारी निकल आती थी और इस चिनगारी से सूखी घास या किसी दूसरी सूखी चीज में आग लग जाती थी। जंगलों में कभी-कभी पत्थरों की रगड़ या किसी दूसरी सूखी चीज की रगड़ से आप ही आग लग जाती है। जानवरों में इतनी अक्ल कहाँ थी कि इससे कोई मतलब की बात सोचते। लेकिन आदमी ज्यादा होशियार था। उसने आग के फायदे देखे। यह जाड़ों में उसे गर्म रखती थी और बड़े-बड़े जानवरों को, जो उसके दुश्मन थे, भगा देती थी। इसलिए जब कभी आग लग जाती थी तो मर्द और औरत उसमें सूखी पत्तियाँ फेंक-फेंक कर उसे जलाए रखने की कोशिश करते होंगे। धीरे-धीरे उन्हें मालूम हो गया कि वे चकमक पत्थरों को रगड़ कर खुद आग पैदा कर सकते हैं। उसके लिए यह बड़े मार्के की बात थी, क्योंकि इसने उन्हें दूसरें जानवरों से ताकतवर बना दिया। आदमी को दुनिया के मालिक बनने का रास्ता मिल गया।

शुरू के आदमी

मैंने अपने पिछले खत में लिखा था कि आदमी और जानवर में सिर्फ अक्ल का फर्क है। अक्ल ने आदमी को उन बड़े-बड़े जानवरों से ज्यादा चालाक और मजबूत बना दिया जो मामूली तौर पर उसे नष्ट कर डालते। ज्यों-ज्यों आदमी की अक्ल बढ़ती गई वह ज्यादा बलवान होता गया। शुरू में आदमी के पास जानवरों से मुकाबला करने के लिए कोई खास हथियार न थे। वह उन पर सिर्फ पत्थर फेंक सकता था। इसके बाद उसने पत्थर की कुल्हाड़ियाँ और भाले और बहुत-सी दूसरी चीजें भी बनाईं जिनमें पत्थर की सूई भी थी। हमने इन पत्थरों के हथियारों को साउथ कैंसिंगटन और जेनेवा के अजायबघरों में देखा था।

धीरे-धीरे बर्फ का जमाना खत्म हो गया जिसका मैंने अपने पिछले खत में जिक्र किया है। बर्फ के पहाड़ मध्‍य-एशिया और यूरोप से गायब हो गए। ज्यों-ज्यों गरमी बढ़ती गई आदमी फैलते गए।

उस जमाने में न तो मकान थे और न कोई दूसरी इमारत थी। लोग गुफाओं में रहते थे। खेती करना किसी को न आता था। लोग जंगली फल खाते थे, या जानवरों का शिकार करके माँस खा कर रहते थे। रोटी और भात उन्हें कहाँ मयस्सर होता क्योंकि उन्हें खेती करनी आती ही न थी। वे पकाना भी नहीं जानते थे; हाँ, शायद माँस को आग में गर्म कर लेते हों। उनके पास पकाने के बर्तन, जैसे कढ़ाई और पतीली भी न थे।

एक बात बड़ी अजीब है। इन जंगली आदमियों को तस्वीर खींचना आता था। यह सच है कि उनके पास कागज, कलम, पेंसिल या ब्रश न थे। उनके पास सिर्फ पत्थर की सुइयाँ और नोकदार औजार थे। इन्हीं से वे गुफाओं की दीवारों पर जानवरों की तस्वीरें बनाया करते थे। उनके बाज-बाज खाके खासे अच्छे हैं मगर वे सब इकरुखे हैं। तुम्हें मालूम है कि इकरुखी तस्वीर खींचना आसान है और बच्चे इसी तरह की तस्वीरें खींचा करते हैं। गुफाओं में अँधेरा होता था इसलिए मुमकिन है कि वे चिराग जलाते हों।

जिन आदमियों का हमने ऊपर जिक्र किया है वे पाषाण या पत्थर-युग के आदमी कहलाते हैं। उस जमाने को पत्थर का युग इसलिए कहते हैं कि आदमी अपने सभी औजार पत्थर के बनाते थे। धातुओं को काम में लाना वे न जानते थे। आजकल हमारी चीजें अकसर धातुओं से बनती हैं, खासकर लोहे से। लेकिन उस जमाने में किसी को लोहे या काँसे का पता न था। इसलिए पत्थर काम में लाया जाता था, हालांकि उससे कोई काम करना बहुत मुश्किल था।

पाषाण युग के खत्म होने के पहले ही दुनिया की आबोहवा बदल गई और उसमें गर्मी आ गई। बर्फ के पहाड़ अब उत्तरी सागर तक ही रहते थे और मध्यएशिया और यूरोप में बड़े-बड़े जंगल पैदा हो गए। इन्हीं जंगलों में आदमियों की एक नई जाति रहने लगी। ये लोग बहुत-सी बातों में पत्थर के आदमियों से ज्यादा होशियार थे। लेकिन वे भी पत्थर के ही औजार बनाते थे। ये लोग भी पत्थर ही के युग के थे; मगर वह पिछला पत्थर का युग था, इसलिए वे नए पत्थर के युग के आदमी कहलाते थे।

गौर से देखने से मालूम होता है कि नए पत्थर युग के आदमियों ने बड़ी तरक्‍की कर ली थी। आदमी की अक्ल और जानवरों के मुकाबले में उसे तेजी से बढ़ाए लिये जा रही है। इन्हीं नए पाषाण-युग के आदमियों ने एक बहुत बड़ी चीज निकाली। यह खेती करने का तरीका था। उन्होंने खेतों को जोत कर खाने की चीजें पैदा करना शुरू कर दिया। उनके लिए यह बहुत बड़ी बात थी। अब उन्हें आसानी से खाना मिल जाता था, इसकी जरूरत न थी कि वे रात-दिन जानवरों का शिकार करते रहें। अब उन्हें सोचने और आराम करने की ज्यादा फुर्सत मिलने लगी। और उन्हें जितनी ही ज्यादा फुरसत मिलती थी, नई चीजें और तरीके निकालने में वे उतनी ही ज्यादा तरक्‍की करते थे। उन्होंने मिट्टी के बर्तन बनाने शुरू किए और उनकी मदद से खाना पकाने लगे। पत्थर के औजार भी अब ज्यादा अच्छे बनने लगे और उन पर पालिश भी अच्छी होने लगी। उन्होंने गाय, कुत्ता, भेड़, बकरी वगैरह जानवरों को पालना सीख लिया और वे कपडे़ भी बुनने लगे।

वे छोटे-छोटे घरों या झोंपड़ों में रहते थे। ये झोंपड़े अकसर झीलों के बीच में बनाए जाते थे, क्योंकि जंगली जानवर या दूसरे आदमी वहाँ उन पर आसानी से हमला न कर सकते थे। इसलिए ये लोग झील के रहनेवाले कहलाते थे।

तुम्हें अचंभा होता होगा कि इन आदमियों के बारे में हमें इतनी बातें कैसे मालूम हो गईं। उन्होंने कोई किताब तो लिखी नहीं। लेकिन मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि इन आदमियों का हाल जिस किताब में हमें मिलता है वह संसार की किताब है। उसे पढ़ना आसान नहीं है। उसके लिए बड़े अभ्यास की जरूरत है। बहुत-से आदमियों ने इस किताब के पढ़ने में अपनी सारी उम्र खत्म कर दी है। उन्होंने बहुत-सी हड्डियाँ और पुराने जमाने की बहुत-सी निशानियाँ जमा कर दी हैं। ये चीजें बड़े-बड़े अजायबघरों में जमा हैं, और वहाँ हम उम्दा चमकती हुई कुल्हाड़ियाँ और बर्तन, पत्थर के तीर और सुइयाँ, बहुत-सी दूसरी चीजें देख सकते हैं, जो पिछले पत्थर युग के आदमी बनाते थे। तुमने खुद इनमें से बहुत-सी चीजें देखी हैं, लेकिन शायद तुम्हें याद न हो। अगर तुम फिर उन्हें देखो तो ज्यादा अच्छी तरह समझ सकोगी।

मुझे याद आता है कि जिनेवा के अजायबघर में झील के मकान का एक बहुत अच्छा नमूना रखा हुआ था। झील में लकड़ी के डंडे गाड़ दिए गए थे और उनके ऊपर लकड़ी के तख्ते बाँध कर उन पर झोंपड़ियाँ बनाई गई थीं। इस घर और जमीन के बीच में एक छोटा-सा पुल बना दिया गया था। ये पिछले पत्थर के युगवाले आदमी, जानवरों की खालें पहनते थे और कभी-कभी सन के मोटे कपड़े भी पहनते थे। सन एक पौधा है जिसके रेशों से कपड़ा बनता है। आजकल सन से महीन कपड़े बनाए जाते हैं। लेकिन उस जमाने के सन के पकड़े बहुत ही भद्दे रहे होंगे।

ये लोग इसी तरह तरक्‍की करते चले गए; यहाँ तक कि उन्होंने ताँबे और काँसे के औजार बनाने शुरू किए। तुम्हें मालूम है कि काँसा, तांबे और रांगे के मेल से बनता है और इन दोनों से ज्यादा सख्त होता है। वे सोने का इस्तेमाल करना भी जानते थे और इसके जेवर बनाकर इतराते थे।

हमें यह ठीक तो मालूम नहीं कि इन लोगों को हुए कितने दिन गुजरे लेकिन अंदाज से मालूम होता है कि दस हजार साल से कम न हुए होंगे। अभी तक तो हम लाखों बरसों की बात कर रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे हम आजकल के जमाने के करीब आते जाते हैं। नए पाषाण युग के आदमियों में और आजकल के आदमियों में एकाएक कोई तब्दीली नहीं आ गई। फिर भी हम उनके-से नहीं हैं। जो कुछ तब्दीलियाँ हुईं बहुत धीरे-धीरे हुईं और यही प्रकृति का नियम है। तरह-तरह की कौमें पैदा हुईं और हर एक कौम के रहन-सहन का ढंग अलग था। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की आबोहवा में बहुत फर्क था और आदमियों को अपना रहन-सहन उसी के मुताबिक बनाना पड़ता था। इस तरह लोगों में तब्दीलियाँ होती जाती थीं। लेकिन इस बात का जिक्र हम आगे चल कर करेंगे।

आज मैं तुमसे सिर्फ एक बात का जिक्र और करूँगा। जब नया पत्थर का युग खत्म हो रहा था तो आदमी पर एक बड़ी आफत आई। मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि उस जमाने में भूमध्‍य सागर था ही नहीं। वहाँ चंद झीलें थीं और इन्हीं में लोग आबाद थे। एकाएक यूरोप और अफ्रीका के बीच में जिब्राल्टर के पास जमीन बह गई और अटलांटिक समुद्र का पानी उस नीचे गढढ़े में भर आया। इस बाढ़ में बहुत-से मर्द और औरतें जो वहाँ रहते थे डूब गए होंगे। भाग कर जाते कहाँ? सैकड़ों मील तक पानी के सिवा कुछ नजर ही न आता था। अटलांटिक सागर का पानी बराबर भरता गया और इतना भरा कि भूमध्‍य सागर बन गया।

तुमने शायद पढ़ा होगा, कम से कम सुना तो है ही, कि किसी जमाने में बड़ी भारी बाढ़ आई थी। बाइबिल में इसका जिक्र है और बाज संस्कृत की किताबों में भी उसकी चर्चा आई है। हम तो समझते हैं कि भूमध्‍य सागर का भरना ही वह बाढ़ होगी। यह इतनी बड़ी आफत थी कि इससे बहुत थोड़े आदमी बचे होंगे। और उन्होंने अपने बच्चों से यह हाल कहा होगा। इसी तरह यह कहानी हम तक पहुँची।

तरह-तरह की कौमें क्योंकर बनीं

अपने पिछले खत में मैंने नए पत्थर-युग के आदमियों का जिक्र किया था जो खासकर झीलों के बीच में मकानों में रहते थे। उन लोगों ने बहुत-सी बातों में बड़ी तरक्‍की कर ली थी। उन्होंने खेती करने का तरीका निकाला। वे खाना पकाना जानते थे और यह भी जानते थे कि जानवरों को पाल कर कैसे काम लिया जा सकता है। ये बातें कई हजार वर्ष पुरानी हैं और हमें उनका हाल बहुत कम मालूम है लेकिन शायद आज दुनिया में आदमियों की जितनी कौमें हैं उनमें से अकसर उन्हीं नए पत्थर-युग के आदमियों की सन्तान हैं। यह तो तुम जानती ही हो कि आज-कल दुनिया में गोरे, काले, पीले, भूरे सभी रंगों के आदमी हैं। लेकिन सच्ची बात तो यह है कि आदमियों की कौमों को इन्हीं चार हिस्सों में बाँट देना आसान नहीं है। कौमों में ऐसा मेल-जोल हो गया है कि उनमें से बहुतों के बारे में यह बतलाना कि वह किस कौम में से हैं बहुत मुश्किल है। वैज्ञानिक लोग आदमियों के सिरों को नापकर कभी-कभी उनकी कौम का पता लगा लेते हैं, और भी ऐसे कई तरीके हैं जिनसे इस बात का पता चल सकता है।

अब सवाल यह होता है कि ये तरह-तरह की कौमें कैसे पैदा हुईं? अगर सब बस एक ही कौम के हैं तो उनमें आज इतना फर्क क्यों है? जर्मन और हब्शी में कितना फर्क है! एक गोरा है और दूसरा बिल्कुल काला। जर्मन के बाल हल्के रंग के और लंबे होते हैं मगर हब्शी के बाल काले, छोटे और घुँघराले होते हैं। चीनी को देखो तो वह इन दोनों से अलग हैं। तो यह बतलाना बहुत मुश्किल है कि यह फर्क क्योंकर पैदा हो गया, हाँ इसके कुछ कारण हमें मालूम हैं। मैं तुम्हें पहले ही बतला चुका हूँ कि ज्यों-ज्यों जानवरों का रंग-ढंग आसपास की चीजों के मुताबिक होता गया उनमें धीरे-धीरे तब्दीलियाँ पैदा होती गईं। हो सकता है कि जर्मन और हब्शी अलग-अलग कौमों से पैदा हुए हों लेकिन किसी न किसी जमाने में उनके पुरखे एक ही रहे होंगे। उनमें जो फर्क पैदा हुआ उसकी वजह या तो यह हो सकती है कि उन्हें अपना रहन-सहन अपने पास पड़ोस की चीजों के मुताबिक बनाना पड़ा या यह कि बाज जानवरों की तरह कुछ जातियों ने औरों से ज्यादा आसानी के साथ अपना रहन-सहन बदल दिया हो।

मैं तुमको इसकी एक मिसाल देता हूँ। जो आदमी उत्तर के ठंडे और बर्फीले मुल्कों में रहता है उसमें सर्दी बरदाश्त करने की ताकत पैदा हो जाती है। इस जमाने में भी इस्कीमो जातिवाले उत्तर के बर्फीले मैदानों में रहते हैं और वहाँ की भयानक सर्दी बरदाश्त करते हैं। अगर वे हमारे जैसे गर्म मुल्क में आऍं तो शायद जीते ही न रह सकें। और चूँकि वे दुनिया के और हिस्सों से अलग हैं और उन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उन्हें दुनिया की उतनी बातें नहीं मालूम हुईं जितनी और हिस्सों के रहनेवाले जानते हैं। जो लोग अफ्रीका या विषुवत-रेखा के पास रहते हैं, जहाँ बड़ी सख्त गर्मी पड़ती है, इस गर्मी के आदी हो जाते हैं। इसी तेज़ धूप के सबब से उनका रंग काला हो जाता है। यह तो तुमने देखा ही है कि अगर तुम समुद्र के किनारे या कहीं और देर तक धूप में बैठो तो तुम्हारा चेहरा साँवला हो जाता है। अगर चंद हफ्तों तक धूप खाने से आदमी कुछ काला पड़ जाता है तो वह आदमी कितना काला होगा जिसे हमेशा धूप ही में रहना पड़ता है। तो फिर जो लोग सैकड़ों वर्षों तक गर्म मुल्कों में रहें और वहाँ रहते उनकी कई पीढ़ियाँ गुजर जाऍं उनके काले हो जाने में क्या ताज्जुब है। तुमने हिंदुस्तानी किसानों को दोपहरी की धूप में खेतों में काम करते देखा है। वे गरीबी की वजह से न ज्यादा कपड़े पहन सकते हैं, न पहनते हैं। उनकी सारी देह धूप में खुली रहती है और इसी तरह उनकी पूरी उम्र गुजर जाती है। फिर वे क्यों न काले हो जाऍं।

इससे तुम्हें यह मालूम हुआ कि आदमी का रंग उस आबोहवा की वजह से बदल जाता है जिसमें वह रहता है। रंग से आदमी की लियाकत, भलमनसी या खूबसूरती पर कोई असर नहीं पड़ता। अगर गोरा आदमी किसी गर्म मुल्क में बहुत दिनों तक रहे और धूप से बचने के लिए टट्टियों की आड़ में या पंखों के नीचे न छिपा बैठा रहे, तो वह जरूर साँवला हो जाएगा। तुम्हें मालूम है कि हम लोग कश्मीरी हैं और सौ साल पहले हमारे पुरखे कश्मीर में रहते थे। कश्मीर में सभी आदमी, यहाँ तक कि किसान और मजदूर भी, गोरे होते हैं। इसका सबब यही है कि कश्मीर की आबोहवा सर्द है। लेकिन वही कश्मीरी जब हिंदुस्तान के दूसरे हिस्सों में आते हैं, जहाँ ज्यादा गर्मी पड़ती है, कई पुश्तों के बाद सॉंवले हो जाते हैं। हमारे बहुत-से कश्मीरी भाई खूब गोरे हैं और बहुत-से बिल्कुल सॉंवले भी हैं। कश्मीरी जितने ज्यादा दिनों तक हिंदुस्तान के इस हिस्से में रहेगा उसका रंग उतना ही सॉंवला होगा।

अब तुम समझ गईं कि आबोहवा ही की वजह से आदमी का रंग बदल जाता है। यह हो सकता है कि कुछ लोग गर्म मुल्क में रहें लेकिन मालदार होने की वजह से उन्हें धूप में काम न करना पड़े, वे बड़े-बड़े मकानों में रहें और अपने रंग को बचा सकें। अमीर खानदान इस तरह कई पीढ़ियों तक अपने रंग को आबोहवा के असर से बचाए रख सकता है लेकिन अपने हाथों से काम न करना और दूसरों की कमाई खाना ऐसी बात नहीं जिस पर हम गरूर कर सकें। तुमने देखा है कि हिंदुस्तान में कश्मीर और पंजाब के आदमी आम तौर पर गोरे होते हैं लेकिन ज्यों-ज्यों हम दक्षिण जाऐं वे काले होते जाते हैं। मद्रास और श्रीलंका में ये बिल्कुल काले होते हैं। तुम जरूर ही समझ जाओगी कि इसका सबब आबोहवा है। क्योंकि दक्षिण की तरफ हम जितना ही बढ़ें विषुवत-रेखा के पास पहूँचते जाते हैं और गर्मी बढ़ती जाती है। यह बिल्कुल ठीक है और यही एक खास वजह है कि हिंदुस्तानियों के रंग में इतना फर्क है। हम आगे चल कर देखेंगे कि यह फर्क कुछ इस वजह से भी है कि शुरू में जो कौमें हिंदुस्तान में आ कर बसी थीं उनमें आपस में फर्क था। पुराने जमाने में हिंदुस्तान में बहुत-सी कौमें आईं और हालाँकि बहुत दिनों तक उन्होंने अलग रहने की कोशिश की लेकिन वे आखिर में बिना मिले न रह सकीं। आज किसी हिन्दुस्तानी के बारे में यह कहना मुश्किल है कि वह पूरी तरह से किसी एक असली कौम का है।

आदमियों की कौमें और जबानें

हम यह नहीं कह सकते कि दुनिया के किस हिस्से में पहले-पहल आदमी पैदा हुए। न हमें यही मालूम है कि शुरू में वह कहाँ आबाद हुए। शायद आदमी एक ही वक्त में, कुछ आगे पीछे दुनिया के कई हिस्सों में पैदा हुए। हाँ, इसमें ज्यादा सन्देह नहीं है कि ज्यों-ज्यों बर्फ के जमाने के बड़े-बड़े बर्फीले पहाड़ पिघलते और उत्तर की ओर हटते जाते थे, आदमी ज्यादा गर्म हिस्सों में आते जाते थे। बर्फ के पिघल जाने के बाद बड़े-बड़े मैदान बन गए होंगे, कुछ उन्हीं मैदानों की तरह जो आजकल साइबेरिया में हैं। इस जमीन पर घास उग आई और आदमी अपने जानवरों को चराने के लिए इधर-उधर घूमते-फिरते होंगे। जो लोग किसी एक जगह टिक कर नहीं रहते बल्कि हमेशा घूमते रहते हैं 'खानाबदोश' कहलाते हैं। आज भी हिंदुस्तान और बहुत से दूसरे मुल्कों में ये खानाबदोश या बंजारे मौजूद हैं।

आदमी बड़ी-बड़ी नदियों के पास आबाद हुए होंगे, क्योंकि नदियों के पास की जमीन बहुत उपजाऊ और खेती के लिए बहुत अच्छी होती है। पानी की तो कोई कमी थी ही नहीं और जमीन में खाने की चीजें आसानी से पैदा हो जाती थीं, इसलिए हमारा खयाल है कि हिंदुस्तान में लोग सिन्धु और गंगा जैसी बड़ी-बड़ी नदियों के पास बसे होंगे, मेसोपोटैमिया में दजला और फरात के पास, मिस्र में नील के पास और उसी तरह चीन में भी हुआ होगा।

हिंदुस्तान की सबसे पुरानी कौम, जिसका हाल हमें कुछ मालूम है, द्रविड़ है। उसके बाद, हम जैसा आगे देखेंगे, आर्य आए और पूरब में मंगोल जाति के लोग आए। आजकल भी दक्षिणी हिंदुस्तान के आदमियों में बहुत-से द्रविड़ों की संतानें हैं। वे उत्तर के आदमियों से ज्यादा काले हैं, इसलिए कि शायद द्रविड़ लोग हिंदुस्तान में और ज्यादा दिनों से रह रहे हैं। द्रविड़ जातिवालों ने बड़ी उन्नति कर ली थी, उनकी अलग एक जबान थी और वे दूसरी जातिवालों से बड़ा व्यापार भी करते थे। लेकिन हम बहुत तेजी से बढ़े जा रहे हैं।

उस जमाने में पश्चिमी-एशिया और पूर्वी-यूरोप में एक नई जाति पैदा हो रही थी। यह आर्य कहलाती थी। संस्कृत में आर्य शब्द का अर्थ है शरीफ आदमी या ऊँचे कुल का आदमी। संस्कृत आर्यों की एक जबान थी इसलिए इससे मालूम होता है कि वे लोग अपने को बहुत शरीफ और खानदानी समझते थे। ऐसा मालूम होता है कि वे लोग भी आजकल के आदमियों की ही तरह शेखीबाज थे। तुम्हें मालूम है कि अंग्रेज अपने को दुनिया में सबसे बढ़ कर समझता है, फ्रांसीसी का भी यही खयाल है कि मैं ही सबसे बड़ा हूँ, इसी तरह जर्मन, अमरीकन और दूसरी जातियाँ भी अपने ही बड़प्पन का राग अलापती हैं।

ये आर्य उत्तरी-एशिया और यूरोप के चरागाहों में घूमते रहते थे। लेकिन जब उनकी आबादी बढ़ गई और पानी और चारे की कमी हो गई तो उन सबके लिए खाना मिलना मुश्किल हो गया इसलिए वे खाने की तलाश में दुनिया के दूसरे हिस्सों में जाने के लिए मजबूर हुए। एक तरफ तो वे सारे यूरोप में फैल गए, दूसरी तरफ हिंदुस्तान, ईरान और मेसोपोटैमिया में आ पहुँचे। इससे मालूम होता है कि यूरोप, उत्तरी हिंदुस्तान और मेसोपोटैमिया की सभी जातियाँ असल में एक ही पुरखों की संतान हैं, यानी आर्यों की; हालाँकि आजकल उनमें बड़ा फर्क है। यह तो मानी हुई बात है कि इधर बहुत जमाना गुजर गया और तब से बड़ी-बड़ी तब्दीलियाँ हो गईं और कौमें आपस में बहुत कुछ मिल गईं। इस तरह आज की बहुत-सी जातियों के पुरखे आर्य ही थे।

दूसरी बड़ी जाति मंगोल हैं। यह सारे पूर्वी एशिया अर्थात चीन, जापान, तिब्बत, स्याम (अब थाइलैंड) और बर्मा में फैल गई। उन्हें कभी-कभी पीली जाति भी कहते हैं। उनके गालों की हड्डियाँ ऊँची और आँखें छोटी होती हैं।

अफ्रीका और कुछ दूसरी जगहों के आदमी हब्शी हैं। वे न आर्य हैं, न मंगोल और उनका रंग बहुत काला होता है। अरब और फलिस्तीन की जातियाँ अरबी और यहूदी एक दूसरी ही जाति से पैदा हुईं।

ये सभी जातियाँ हजारों साल के दौरान में बहुत-सी छोटी जातियों में बँट गई हैं और कुछ मिल-जुल गई हैं। मगर हम उनकी तरफ धयान न देंगे। भिन्न-भिन्न जातियों के पहचान का एक अच्छा और दिलचस्प तरीका उनकी जबानों का पढ़ना है। शुरू-शुरू में हर एक जाति की एक अलग जबान थी, लेकिन ज्यों-ज्यों दिन गुजरते गए उस एक जबान से बहुत-सी जबानें निकलती गईं। लेकिन ये सब जबानें एक ही माँ की बेटियॉं हैं। हमें उन जबानों में बहुत-से शब्द एक-से ही मिलते हैं और इससे मालूम होता है कि उनमें कोई गहरा नाता है।

जब आर्य एशिया और यूरोप में फैल गए तो उनका आपस में मेल-जोल न रहा। उस जमाने में न रेलगाड़ियाँ थीं, न तार व डाक, यहाँ तक कि लिखी हुई किताबें तक न थीं। इसलिए आर्यों का हर एक हिस्सा एक ही जबान को अपने-अपने ढंग से बोलता था, और कुछ दिनों के बाद यह असली जबान से, या आर्य देशों की दूसरी बहनों से, बिल्कुल अलग हो गई। यही सबब है कि आज दुनिया में इतनी जबानें मौजूद हैं।

लेकिन अगर हम इन जबानों को गौर से देखें तो मालूम होगा कि वे बहुत-सी हैं लेकिन असली जबानें बहुत कम हैं। मिसाल के तौर पर देखो कि जहाँ-जहाँ आर्य जाति के लोग गए वहाँ उनकी जबान आर्य खानदान की ही रही है। संस्कृत, लैटिन, यूनानी, अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन, इटालियन और बाज दूसरी जबानें सब बहनें हैं और आर्य खानदान की ही हैं। हमारी हिन्दुस्तानी जबानों में भी जैसे हिंदी, उर्दू, बाँग्ला, मराठी और गुजराती सब संस्कृत की संतान हैं और आर्य परिवार में शामिल हैं।

जबान का दूसरा बड़ा खानदान चीनी है। चीनी, बर्मी, तिब्बती और स्यामी जबानें उसी से निकली हैं। तीसरा खानदान शेम जबान का है, जिससे अरबी और इबरानी जबानें निकली हैं।

कुछ जबानें जैसे तुर्की और जापानी इनमें से किसी वंश में नहीं हैं। दक्षिणी हिंदुस्तान की कुछ जबानें, जैसे तमिल, तेगलु, मलयालम और कन्नड़ भी उन खानदानों में नहीं हैं। ये चारों द्रविड़ खानदान की हैं और बहुत पुरानी हैं।

जबानों का आपस में रिश्ता

हम बतला चुके हैं कि आर्य बहुत-से मुल्कों में फैल गए और जो कुछ भी उनकी जबान थी उसे अपने साथ लेते गए। लेकिन तरह-तरह की आबोहवा और तरह-तरह की हालतों ने आर्यों की बड़ी-बड़ी जातियों में बहुत फर्क पैदा कर दिया। हर एक जाति अपने ही ढंग पर बदलती गई और उसकी आदतें और रस्में भी बदलती गईं। वे दूसरे मुल्कों में दूसरी जातियों से न मिल सकते थे, क्योंकि उस जमाने में सफर करना बहुत मुश्किल था, एक गिरोह दूसरे से अलग होता था। अगर एक मुल्क के आदमियों को कोई नई बात मालूम हो जाती, तो वे उसे दूसरे मुल्कवालों को न बतला सकते। इस तरह तब्दीलियाँ होती गई और कई पुश्तों के बाद एक आर्य जाति के बहुत-से टुकड़े हो गए। शायद वे यह भी भूल गए कि हम एक ही बड़े खानदान से हैं। उनकी एक जबान से बहुत-सी जबानें पैदा हो गईं जो आपस में बहुत कम मिलती-जुलती थीं।

लेकिन उनमें इतना फर्क मालूम होता था, उनमें बहुत से शब्द एक ही थे, और कई दूसरी बातें भी मिलती-जुलती थीं। आज हजारों साल के बाद भी हमें तरह-तरह की भाषाओं में एक ही शब्द मिलते हैं। इससे मालूम होता है कि किसी जमाने में ये भाषाएँ एक ही रही होंगी। तुम्हें मालूम है कि फ्रांसीसी और अंग्रेजी में बहुत-से एक जैसे शब्द हैं। दो बहुत घरेलू और मामूली शब्द ले लो, 'फादर' और 'मदर', हिंदी और संस्कृत में यह शब्द 'पिता' और 'माता' हैं। लैटिन में वे 'पेटर' और 'मेटर' हैं; यूनान में 'पेटर' और 'मीटर'; जर्मन में 'फाटेर' और 'मुत्तार'; फ्रांसीसी में 'पेर' और 'मेर' और इसी तरह और जबानों में भी। ये शब्द आपस में कितने मिलते-जुलते हैं! भाई बहनों की तरह उनकी सूरतें कितनी समान हैं! यह सच है कि बहुत-से शब्द एक भाषा से दूसरी भाषा में आ गए होंगे। हिंदी ने बहुत से शब्द अंग्रेजी से लिए हैं और अंग्रेज़ी ने भी कुछ शब्द हिंदी से लिए हैं। लेकिन 'फादर' और 'मदर' इस तरह कभी न लिये गए होंगे। ये नए शब्द नहीं हो सकते। शुरू-शुरू में जब लोगों ने एक दूसरे से बात करनी सीखी तो उस वक्त माँ-बाप तो थे ही, उनके लिए शब्द भी बन गए। इसलिए हम कह सकते हैं कि ये शब्द बाहर से नहीं आए। वे एक ही पुरखे या एक ही खानदान से निकले होंगे। और इससे हमें मालूम हो सकता है कि जो कौमें आज दूर-दूर के मुल्कों में रहती हैं और भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलती हैं वे सब किसी जमाने में एक ही बड़े खानदान की रही होंगी। तुमने देख लिया न कि जबानों का सीखना कितना दिलचस्प है और उससे हमें कितनी बातें मालूम होती हैं। अगर हम तीन-चार जबानें जान जाएँ तो और जबानों का सीखना आसान हो जाता है।

तुमने यह भी देखा कि बहुत-से आदमी जो अब दूर-दूर मुल्कों में एक-दूसरे से अलग रहते हैं, किसी जमाने में एक ही कौम के थे। तब से हम में बहुत फर्क हो गया है और हम अपने पुराने रिश्ते भूल गए हैं। हर एक मुल्क के आदमी खयाल करते हैं कि हमीं सबसे अच्छे और अक्लमंद हैं और दूसरी जातें हमसे घटिया हैं। अंग्रेज खयाल करता है कि वह और उसका मुल्क सबसे अच्छा है; फ्रांसीसी को अपने मुल्क और सभी फ्रांसीसी चीजों पर घमंड है; जर्मन और इटालियन अपने मुल्कों को सबसे ऊँचा समझते हैं। और बहुत-से हिंदुस्तानियों का खयाल है कि हिंदुस्तान बहुत-सी बातों में सारी दुनिया से बढ़ा हुआ है। यह सब डींग है। हर एक आदमी अपने को और अपने मुल्क को अच्छा समझता है लेकिन दरअसल कोई ऐसा आदमी नहीं है जिसमें कुछ ऐब और कुछ हुनर न हों। इसी तरह कोई ऐसा मुल्क नहीं है जिसमें कुछ बातें अच्छी और कुछ बुरी न हों। हमें जहाँ कहीं अच्छी बात मिलें उसे ले लेना चाहिए और बुराई जहाँ कहीं हो उसे दूर कर देना चाहिए। हमको तो अपने मुल्क हिंदुस्तान की ही सबसे ज्यादा फिक्र है। हमारे दुर्भाग्य से इसका जमाना आजकल बहुत खराब है और बहुत-से आदमी गरीब और दुखी हैं। उन्हें अपनी जिंदगी में कोई खुशी नहीं है। हमें इसका पता लगाना है कि हम उन्हें कैसे सुखी बना सकते हैं। यह देखना है कि हमारे रस्म-रिवाज में क्या खूबियाँ हैं और उनको बचाने की कोशिश करना है, जो बुराइयाँ हैं उन्हें दूर करना है। अगर हमें दूसरे मुल्कों में कोई अच्छी बात मिले तो उसे जरूर ले लेनी चाहिए।

हम हिंदुस्तानी हैं और हमें हिंदुस्तान में रहना और उसी की भलाई के लिए काम करना है लेकिन हमें यह न भूलना चाहिए कि दुनिया के और हिस्सों के रहनेवाले हमारे रिश्तेदार और कुटुम्बी हैं। क्या ही अच्छी बात होती अगर दुनिया के सभी आदमी खुश और सुखी होते। हमें कोशिश करनी चाहिए कि सारी दुनिया ऐसी हो जाए जहाँ लोग चैन से रह सकें।

सभ्यता क्या है?

मैं आज तुम्हें पुराने जमाने की सभ्यता का कुछ हाल बताता हूँ। लेकिन इसके पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि सभ्यता का अर्थ क्या है? कोश में तो इसका अर्थ लिखा है अच्छा करना, सुधारना, जंगली आदतों की जगह अच्छी आदतें पैदा करना। और इसका व्यवहार किसी समाज या जाति के लिए ही किया जाता है। आदमी की जंगली दशा को, जब वह बिल्कुल जानवरों-सा होता है, बर्बरता कहते हैं। सभ्यता बिल्कुल उसकी उलटी चीज है। हम बर्बरता से जितनी ही दूर जाते हैं उतने ही सभ्य होते जाते हैं।

लेकिन हमें यह कैसे मालूम हो कि कोई आदमी या समाज जंगली है या सभ्य? यूरोप के बहुत-से आदमी समझते हैं कि हमीं सभ्य हैं और एशियावाले जंगली हैं। क्या इसका यह सबब है कि यूरोपवाले एशिया और अफ्रीकावालों से ज्यादा कपड़े पहनते हैं? लेकिन कपड़े तो आबोहवा पर निर्भर करते हैं। ठंडे मुल्क में लोग गर्म मुल्कवालों से ज्यादा कपड़े पहनते हैं। तो क्या इसका यह सबब है कि जिसके पास बंदूक है वह निहत्थे आदमी से ज्यादा मजबूत और इसलिए ज्यादा सभ्य है? चाहे वह ज्यादा सभ्य हो या न हो, कमजोर आदमी उससे यह नहीं कह सकता कि आप सभ्य नहीं हैं। कहीं मजबूत आदमी झल्ला कर उसे गोली मार दे, तो वह बेचारा क्या करेगा?

तुम्हें मालूम है कि कई साल पहले एक बड़ी लड़ाई हुई थी! दुनिया के बहुत- से मुल्क उसमें शरीक थे और हर एक आदमी दूसरी तरफ के ज्यादा से ज्यादा आदमियों को मार डालने की कोशिश कर रहा था। अंग्रेज जर्मनीवालों के खून के प्यासे थे और जर्मन अंग्रेजों के खून के। इस लड़ाई में लाखों आदमी मारे गए और हजारों के अंग-भंग हो गए कोई अंधा हो गया, कोई लूला, कोई लँगड़ा। तुमने फ्रांस और दूसरी जगह भी ऐसे बहुत-से लड़ाई के जख्मी देखे होंगे। पेरिस की सुरंगवाली रेलगाड़ी में, जिसे मेट्रो कहते हैं, उनके लिए खास जगहें हैं। क्या तुम समझती हो कि इस तरह अपने भाइयों को मारना सभ्यता और समझदारी की बात है? दो आदमी गलियों में लड़ने लगते हैं, तो पुलिसवाले उनमें बीच बचाव कर देते हैं और लोग समझते हैं कि ये दोनों कितने बेवकूफ हैं। तो जब दो बड़े-बड़े मुल्क आपस में लड़ने लगें और हजारों और लाखों आदमियों को मार डालें तो वह कितनी बड़ी बेवकूफी और पागलपन है। यह ठीक वैसा ही है जैसे दो वहशी जंगलों में लड़ रहे हों। और अगर वहशी आदमी जंगली कहे जा सकते हैं तो वह मूर्ख कितने जंगली हैं जो इस तरह लड़ते हैं?

अगर इस निगाह से तुम इस मामले को देखो, तो तुम फौरन कहोगी कि इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, इटली और बहुत से दूसरे मुल्क जिन्होंने इतनी मार-काट की, जरा भी सभ्य नहीं हैं। और फिर भी तुम जानती हो कि इन मुल्कों में कितनी अच्छी-अच्छी चीजें हैं और वहाँ कितने अच्छे-अच्छे आदमी रहते हैं।

अब तुम कहोगी कि सभ्यता का मतलब समझना आसान नहीं है, और यह ठीक है। यह बहुत ही मुश्किल मामला है। अच्छी-अच्छी इमारतें, अच्छी-अच्छी तस्वीरें और किताबें और तरह-तरह की दूसरी और खूबसूरत चीजें जरूर सभ्यता की पहचान हैं। मगर एक भला आदमी जो स्वार्थी नहीं है और सबकी भलाई के लिए दूसरों के साथ मिल कर काम करता है, सभ्यता की इससे भी बड़ी पहचान है। मिल कर काम करना अकेले काम करने से अच्छा है और सबकी भलाई के लिए एक साथ मिल कर काम करना सबसे अच्छी बात है।

जातियों का बनना

मैंने पिछले खतों में तुम्हें बतलाया है कि शुरू में जब आदमी पैदा हुआ तो वह बहुत कुछ जानवरों से मिलता था। धीरे-धीरे हजारों वर्षों में उसने तरक्‍की की और पहले से ज्यादा होशियार हो गया। पहले वह अकेले ही जानवरों का शिकार करता होगा, जैसे जंगली जानवर आज भी करते हैं। कुछ दिनों के बाद उसे मालूम हुआ कि और आदमियों के साथ एक गिरोह में रहना ज्यादा अक्ल की बात है और उसमें जान जाने का डर भी कम है। एक साथ रहकर वह ज्यादा मजबूत हो जाते थे और जानवरों या दूसरे आदमियों के हमलों का ज्यादा अच्छी तरह मुकाबला कर सकते थे। जानवर भी तो अपनी रक्षा के लिए अकसर झुंडों में रहा करते हैं। भेड़, बकरियाँ और हिरन, यहाँ तक कि हाथी भी झुंडों में ही रहते हैं। जब झुंड सोता है, तो उनमें से एक जागता रहता है और उनका पहरा देता है। तुमने भेड़ियों के झुंड की कहानियाँ पढ़ी होंगी। रूस में जाड़ों के दिनों में वे झुंड बांधाकर चलते हैं और जब उन्हें भूख लगती है, जाड़ों में उन्हें ज्यादा भूख लगती भी है, तो आदमियों पर हमला कर देते हैं। एक भेड़िया कभी आदमी पर हमला नहीं करता लेकिन उनका एक झुंड इतना मजबूत हो जाता है कि वह कई आदमियों पर भी हमला कर बैठता है। तब आदमियों को अपनी जान लेकर भागना पड़ता है और अक्सर भेड़ियों और बर्फ वाली गाड़ियों में बैठे हुए आदमियों में दौड़ होती है।

इस तरह पुराने जमाने के आदमियों ने सभ्यता में जो पहली तरक्‍की की वह मिल कर झुंडों में रहना था। इस तरह जातियों (फिरकों) की बुनियाद पड़ी। वे साथ-साथ काम करने लगे। वे एक दूसरे की मदद करते रहते थे। हर एक आदमी पहले अपनी जाति का खयाल करता था और तब अपना। अगर जाति पर कोई संकट आता तो हर एक आदमी जाति की तरफ से लड़ता था। और अगर कोई आदमी जाति के लिए लड़ने से इन्कार करता तो बाहर निकाल दिया जाता था।

अब अगर बहुत से आदमी एक साथ मिल कर काम करना चाहते हैं तो उन्हें कायदे के साथ काम करना पड़ेगा। अगर हर एक आदमी अपनी मर्जी के मुताबिक काम करे तो वह जाति बहुत दिन न चलेगी। इसलिए किसी एक को उनका सरदार बनना पड़ता है। जानवरों के झुंडों में भी तो सरदार होते हैं। जातियों में वही आदमी सरदार चुना जाता था जो सबसे मजबूत होता था इसलिए कि उस जमाने में बहुत लड़ाई करनी पड़ती थी।

अगर एक जाति के आदमी आपस में लड़ने लगें तो जाति नष्ट हो जाएगी। इसलिए सरदार देखता रहता था कि लोग आपस में न लड़ने पाएँ। हाँ, एक जाति दूसरी जाति से लड़ सकती थी और लड़ती थी। यह तरीका उस पुराने तरीके से अच्छा था जब हर एक आदमी अकेला ही लड़ता था।

शुरू-शुरू की जातियाँ बड़े-बड़े परिवारों की तरह रही होंगी। उसके सब आदमी एक-दूसरे के रिश्तेदार होते होंगे। ज्यों-ज्यों यह परिवार बढ़े, जातियाँ भी बढ़ीं।

उस पुराने जमाने में आदमी का जीवन बहुत कठिन रहा होगा, खासकर जातियाँ बनने के पहले। न उनके पास कोई घर था, न कपड़े थे। हाँ, शायद जानवरों की खालें पहनने को मिल जाती हों। और उसे बराबर लड़ना पड़ता रहा होगा। अपने भोजन के लिए या तो जानवरों का शिकार करना पड़ता था या जंगली फल जमा करने पड़ते थे। उसे अपने चारों तरफ दुश्मन ही दुश्मन नजर आते होंगे। प्रकृति भी उसे दुश्मन मालूम होती होगी, क्योंकि ओले, बर्फ और भूचाल वही तो लाती थी। बेचारे की दशा कितनी दीन थी। जमीन पर रेंग रहा है, और हर एक चीज से डरता है इसलिए कि वह कोई बात समझ नहीं सकता। अगर ओले गिरते तो वह समझता कि कोई देवता बादल में बैठा हुआ उस पर निशाना मार रहा है। वह डर जाता था और उस बादल में बैठे हुए आदमी को खुश करने के लिए कुछ न कुछ करना चाहता था जो उस पर ओले और पानी और बर्फ गिरा रहा था। लेकिन उसे खुश करे तो कैसे! न वह बहुत समझदार था, न होशियार था। उसने सोचा होगा कि बादलों का देवता हमारी ही तरह होगा और खाने की चीजें पसन्द करता होगा। इसलिए वह कुछ माँस रख देता था, या किसी जानवर की कुरबानी करके छोड़ देता था कि देवता आकर खा ले। वह सोचता था कि इस उपाय से ओला या पानी बंद हो जाएगा। हमें यह पागलपन मालूम होता है क्योंकि हम मेह या ओले या बर्फ के गिरने का सबब जानते हैं जानवरों के मारने से उसका कोई संबंध नहीं है। लेकिन आज भी ऐसे आदमी मौजूद हैं जो इतने नासमझ हैं कि अब तक वही काम किये जाते हैं।

मजहब की शुरुआत और काम का बँटवारा

पिछले खत में मैंने तुम्हें बतलाया था कि पुराने जमाने में आदमी हर एक चीज से डरता था और खयाल करता था कि उस पर मुसीबतें लानेवाले देवता हैं जो क्रोधी हैं और इर्ष्‍या करते है। उसे ये फर्जी देवता जंगल, पहाड़, नदी, बादल सभी जगह नजर आते थे। देवता को वह दयालु और नेक नहीं समझता था, उसके खयाल में वह बहुत ही क्रोधी था और बात-बात पर झल्ला उठता था। और चूँकि वे उसके गुस्से से डरते थे इसलिए वे उसे भेंट देकर, खासकर खाना पहुँचा कर, हर तरह की रिश्वत देने की कोशिश करते रहते थे। जब कोई बड़ी आफत आ जाती थी, जैसे भूचाल या बाढ़ या महामारी जिसमें बहुत-से आदमी मर जाते थे, तो वे लोग डर जाते थे और सोचते थे कि देवता नाराज हैं। उन्हें खुश करने के लिए वे मर्दों-औरतों का बलिदान करते, यहाँ तक कि अपने ही बच्चों को मार कर देवताओं को चढ़ा देते। यही बड़ी भयानक बात मालूम होती है लेकिन डरा हुआ आदमी जो कुछ कर बैठे, थोड़ा है।

इसी तरह मजहब शुरू हुआ होगा। इसलिए मजहब पहले डर के रूप में आया और जो बात डर से की जाए बुरी है। तुम्हें मालूम है कि मजहब हमें बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें सिखाता है। जब तुम बड़ी हो जाओगी तो तुम दुनिया के मज़हबों का हाल पढ़ोगी और तुम्हें मालूम होगा कि मजहब के नाम पर क्या-क्या अच्छी और बुरी बातें की गई हैं। यहाँ हमें सिर्फ यह देखना है कि मजहब का खयाल कैसे पैदा हुआ और क्योंकर बढ़ा। लेकिन चाहे वह जिस तरह बढ़ा हो, हम आज भी लोगों को मजहब के नाम पर एक दूसरे से लड़ते और सिर फोड़ते देखते हैं। बहुत-से आदमियों के लिए मजहब आज भी वैसी ही डरावनी चीज है। वह अपना वक्त फर्जी देवताओं को खुश करने के लिए मंदिरों में पूजा, चढ़ाने और जानवरों की कुर्बानी करने में खर्च करते हैं।

इससे मालूम होता है कि शुरू में आदमी को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। उसे रोज का खाना तलाश करना पड़ता था, नहीं तो भूखों मर जाता। उन दिनों कोई आलसी आदमी जिंदा न रह सकता था। कोई ऐसा भी नहीं कर सकता था कि एक ही दिन बहुत-सा खाना जमा कर ले और बहुत दिनों तक आराम से पड़ा रहे।

जब जातियाँ (फिरके) बन गईं, तो आदमी को कुछ सुविधा हो गई। एक जाति के सब आदमी मिल कर उससे ज्यादा खाना जमा कर लेते थे जितना कि वे अलग-अलग कर सकते थे। तुम जानती हो कि मिल कर काम करना या सहयोग, ऐसे बहुत से काम करने में मदद देता है जो हम अकेले नहीं कर सकते। एक या दो आदमी कोई भारी बोझ नहीं उठा सकते लेकिन कई आदमी मिल कर आसानी से उठा ले जा सकते हैं। दूसरी बड़ी तरक्‍की जो उस जमाने में हुई वह खेती थी। तुम्हें यह सुन कर ताज्जुब होगा कि खेती का काम पहले कुछ चींटियों ने शुरू किया। मेरा यह मतलब नहीं है कि चींटियाँ बीज बोतीं, हल चलातीं या खेती काटती हैं। मगर वे कुछ इसी तरह की बातें करती हैं। अगर उन्हें ऐसी झाड़ी मिलती है, जिसके बीज वे खाती हों, तो वे बड़ी होशियारी से उसके आस-पास की घास निकाल डालती हैं। इससे वह दरख्त ज्यादा फलता-फूलता है और बढ़ता है। शायद किसी जमाने में आदमियों ने भी यही किया होगा जो चींटियाँ करती हैं। तब उन्हें यह समझ क्या थी कि खेती क्या चीज है। इसके जानने में उन्हें एक जमाना गुजर गया होगा और तब उन्हें मालूम हुआ होगा कि बीज कैसे बोया जाता है।

खेती शुरू हो जाने पर खाना मिलना बहुत आसान हो गया। आदमी को खाने के लिए सारे दिन शिकार नही करना पड़ता था। उसकी जिंदगी पहले से ज्यादा आराम से कटने लगी। इसी जमाने में एक और बड़ी तब्दीली पैदा हुई। खेती के पहले हर आदमी शिकारी था और शिकार ही उसका एक काम था। औरतें शायद बच्चों की देख-रेख करती होंगी और फल बटोरती होंगी। लेकिन जब खेती शुरू हो गई तो तरह-तरह के काम निकल आए। खेतों में भी काम करना पड़ता था, शिकार करना, गाय-बैलों की देख-भाल करना भी जरूरी था। औरतें शायद गायों की देखभाल करतीं थीं और उनको दुहती थीं। कुछ आदमी एक तरह का काम करने लगे, कुछ दूसरी तरह का।

आज तुम्हें दुनिया में हर एक आदमी एक खास किस्‍म का काम करता हुआ दिखाई देता है। कोई डाक्टर है, कोई सड़कों और पुलों को बनानेवाला इंजीनियर, कोई बढ़ई, कोई लुहार, कोई घरों का बनानेवाला, कोई मोची या दरजी वगैरह। हर एक आदमी का अपना अलग पेशा है और दूसरे पेशों के बारे में वह कुछ नहीं जानता। इसे काम का बँटना कहते हैं। अगर काई आदमी एक ही काम करे तो उसे बहुत अच्छी तरह करेगा। बहुत-से काम वह इतनी अच्छी तरह पूरे नहीं कर सकता, दुनिया में आज-कल इसी तरह काम बँटा हुआ है।

जब खेती शुरू हुई तो पुरानी जातियों में इसी तरह धीरे-धीरे काम का बँटना शुरू हुआ।

खेती से पैदा हुई तब्दीलियाँ

अपने पिछले खत में मैंने कामों के अलग-अलग किए जाने का कुछ हाल बतलाया था। बिल्कुल शुरू में जब आदमी सिर्फ शिकार पर बसर करता था, काम बँटे हुए न थे। हर एक आदमी शिकार करता था और मुश्किल से खाने भर को पाता था। पहले मर्दों और औरतों के बीच में काम बँटना शुरू हुआ होगा, मर्द शिकार करता होगा और औरत घर में रहकर बच्चों और पालतू जानवरों की निगरानी करती होगी।

जब आदमियों ने खेती करना सीखा तो बहुत-सी नई-नई बातें निकलीं। पहली बात यह हुई कि काम कई हिस्सों में बँट गया। कुछ लोग शिकार खेलते और कुछ खेती करते और हल चलाते। ज्यों-ज्यों दिन गुजरते गए आदमी ने नए-नए पेशे सीखे और उनमें पक्के हो गए।

खेती करने का दूसरा अच्छा नतीजा यह हुआ कि लोग गॉंव और कस्बों में आबाद होने लगे। खेती के पहले लोग इधार-उधार घूमते-फिरते थे और शिकार करते थे। उनके लिए एक जगह रहना जरूरी नहीं था। शिकार हर एक जगह मिल जाता था। इसके सिवाय उन्हें गायों, बकरियों और अपने दूसरे जानवरों की वजह से इधर-उधर घूमना पड़ता था। इन जानवरों को चराने के लिए चरागाह की जरूरत थी। एक जगह कुछ दिनों तक चरने के बाद जमीन में जानवरों के लिए काफी घास न पैदा होती थी और सारी जाति को दूसरी जगह जाना पड़ता था।

जब लोगों को खेती करना आ गया तो उनका जमीन के पास रहना जरूरी हो गया। जमीन को जोत-बो कर वे छोड़ न सकते थे। उन्हें साल भर तक लगातार खेती का काम लगा ही रहता था और इस तरह गॉंव और शहर बन गए।

दूसरी बड़ी बात जो खेती से पैदा हुई वह यह थी कि आदमी की जिंदगी ज्यादा आराम से कटने लगी। खेती से जमीन में खाना पैदा करना सारे दिन शिकार खेलने से कहीं ज्यादा आसान था। इसके सिवा जमीन में खाना भी इतना पैदा होता था जितना वह एकदम खा नहीं सकते थे इससे वह हिफाजत से रखते थे। एक और मजे की बात सुनो। जब आदमी निपट शिकारी था तो वह कुछ जमा न कर सकता था या कर भी सकता था तो बहुत कम, किसी तरह पेट भर लेता था। उसके पास बैंक न थे। जहाँ वह अपने रुपए व दूसरी चीजें रख सकता। उसे तो अपना पेट भरने के लिए रोज शिकार खेलना पड़ता था, खेती में उसे एक फसल में जरूरत से ज्यादा मिल जाता था। इस फालतू खाने को वह जमा कर देता था। इस तरह लोगों ने फालतू अनाज जमा करना शुरू किया। लोगों के पास फालतू खाना इसलिए हो जाता था कि वह उससे कुछ ज्यादा मेहनत करते थे जितना सिर्फ पेट भरने के लिए जरूरी था। तुम्हें मालूम है कि बैंक खुले हुए हैं जहाँ लोग रुपए जमा करते हैं और चेक लिख कर निकाल सकते हैं। यह रुपया कहाँ से आता है? अगर तुम गौर करो तो तुम्हें मालूम होगा कि यह फालतू रुपया है यानि ऐसा रुपया जिसे लोगों को एकबारगी खर्च करने की जरूरत नहीं है। इसलिए इसे वे बैंक में रखते हैं। वही लोग मालदार हैं जिनके पास बहुत-सा फालतू रुपया है, और जिनके पास कुछ नहीं है वे गरीब हैं। आगे तुम्हें मालूम होगा कि यह फालतू रुपया आता कहाँ से है। इसका सबब यह नहीं है कि आदमी दूसरे से ज्यादा काम करता है और ज्यादा कमाता है बल्कि आजकल जो आदमी बिल्कुल काम नहीं करता उसके पास तो बचत होती है और जो पसीना बहाता है उसे खाली हाथ रहना पड़ता है। कितना बुरा इंतजाम है! बहुत-से लोग समझते हैं कि इसी बुरे इंतजाम के सबब से दुनिया में आजकल इतने गरीब आदमी हैं। अभी शायद तुम यह बात समझ न सको इसलिए इसमें सिर न खपाओ। थोड़े दिनों में तुम इसे समझने लगोगी।

इस वक्त तो तुम्हें इतना ही जानना काफी है कि खेती से आदमी को उससे ज्यादा खाना मिलने लगा जितना वह एकदम खा सकता था। यह जमा कर लिया जाता था। उस जमाने में न रुपए थे न बैंक। जिनके पास बहुत-सी गाएं, भेड़ें, ऊँट या अनाज होता था वही अमीर कहलाते थे।

खानदान का सरगना कैसे बना

मुझे भय है कि मेरे खत कुछ पेचीदा होते जा रहे हैं। लेकिन अब जिंदगी भी तो पेचीदा हो गई है। पुराने जमाने में लोगों की जिंदगी बहुत सादी थी और अब हम उस जमाने पर आ गए हैं जब जिंदगी पेचीदा होनी शुरू हुई। अगर हम पुरानी बातों को जरा सावधानी के साथ जाँचें और उन तब्दीलियों को समझने की कोशिश करें जो आदमी की जिंदगी और समाज में पैदा होती गईं, तो हमारी समझ में बहुत-सी बातें आ जाएँगी। अगर हम ऐसा न करेंगे तो हम उन बातों को कभी न समझ सकेंगे जो आज दुनिया में हो रही हैं। हमारी हालत उन बच्चों की-सी होगी जो किसी जंगल में रास्ता भूल गए हों। यही सबब है कि मैं तुम्हें ठीक जंगल के किनारे पर लिए चलता हूँ ताकि हम इसमें से अपना रास्ता ढूँढ़ निकालें।

तुम्हें याद होगा कि तुमने मुझसे मसूरी में पूछा था कि बादशाह क्या हैं और वह कैसे बादशाह हो गए। इसलिए हम उस पुराने जमाने पर एक नजर डालेंगे जब राजा बनने शुरू हुए। पहले-पहल वह राजा न कहलाते थे। अगर उनके बारे में कुछ मालूम करना है तो हमें यह देखना होगा कि वे शुरू कैसे हुए।

मैं जातियों के बनने का हाल तुम्हें बतला चुका हूँ। जब खेती-बारी शुरू हुई और लोगों के काम अलग-अलग हो गए तो यह जरूरी हो गया कि जाति का कोई बड़ा-बूढ़ा काम को आपस में बाँट दे। इसके पहले भी जातियों में ऐसे आदमी की जरूरत होती थी जो उन्हें दूसरी जातियों से लड़ने के लिए तैयार करे। अक्सर जाति का सबसे बूढ़ा आदमी सरगना होता था। वह जाति का बुजुर्ग कहलाता था। सबसे बूढ़ा होने की वजह से यह समझा जाता था कि वह सबसे ज्यादा तजरबेदार और होशियार है। यह बुजुर्ग जाति के और आदमियों की ही तरह होता था। वह दूसरों के साथ काम करता था और जितनी खाने की चीजें पैदा होती थीं वे जाति के सब आदमियों में बाँट दी जाती थीं। हर एक चीज जाति की होती थी। आजकल की तरह ऐसा न होता था कि हर एक आदमी का अपना मकान और दूसरी चीजें हों और आदमी जो कुछ कमाता था वह आपस में बाँट लिया जाता था क्योंकि वह सब जाति का समझा जाता था। जाति का बुजुर्ग या सरगना इस बाँट-बखरे का इंतजाम करता था।

लेकिन तब्दीलियाँ बहुत आहिस्ता-आहिस्ता होने लगीं। खेती के आ जाने से नए-नए काम निकल आए। सरगना को अपना बहुत सा वक्त इंतजाम करने में और यह देखने में कि सब लोग अपना-अपना काम ठीक तौर पर करते हैं या नहीं, खर्च करना पड़ता था। धीरे-धीरे सरगना ने जाति के मामूली आदमियों की तरह काम करना छोड़ दिया। वह जाति के और आदमियों से बिल्कुल अलग हो गया। अब काम की बँटाई बिल्कुल दूसरे ढंग की हो गई। सरगना तो इंतजाम करता था और आदमियों को काम करने का हुक्म देता था और दूसरे लोग खेतों में काम करते थे, शिकार करते थे या लड़ाइयों में जाते थे और अपने सरगना के हुक्मों को मानते थे। अगर दो जातियों में लड़ाई ठन जाती तो सरगना और भी ताकतवर हो जाता क्योंकि लड़ाई के जमाने में बगैर किसी अगुआ के अच्छी तरह लड़ना मुमकिन न था। इस तरह सरगना की ताकत बढ़ती गई।

जब इंतजाम करने का काम बहुत बढ़ गया तो सरगना के लिए अकेले सब काम मुश्किल हो गया। उसने अपनी मदद के लिए दूसरे आदमियों को लिया। इंतजाम करनेवाले बहुत-से हो गए। हाँ, उनका अगुआ सरगना ही था। इस तरह जाति दो हिस्सों में बँट गई, इंतजाम करनेवाले और मामूली काम करनेवाले। अब सब लोग बराबर न रहे। जो लोग इंतजाम करते थे उनका मामूली मजदूरों पर दबाव होता था।

अगले खत में मैं दिखाऊँगा कि सरगना का अधिकार क्योंकर बढ़ा।

सरगना का इख्तियार कैसे बढ़ा

मुझे उम्मीद है कि पुरानी जातियों और उनके बुजुर्गों का हाल तुम्हें रूखा न मालूम होता होगा।

मैंने अपने पिछले खत में तुम्हें बतलाया था कि उस जमाने में हर एक चीज सारी जाति की होती थी। किसी की अलग नहीं। सरगना के पास भी अपनी कोई खास चीज न होती थी। जाति के और आदमियों की तरह उसका भी एक ही हिस्सा होता था। लेकिन वह इंतजाम करनेवाला था और उसका यह काम समझा जाता था कि वह जाति के माल और जायदाद की देख-रेख करता रहे। जब उसका अधिकार बढ़ा तो उसे यह सूझी कि यह माल और असबाब जाति का नहीं, मेरा है। या शायद उसने समझा हो कि वह जाति का सरगना है इसलिए उस जाति का मुख्तार भी है। इस तरह किसी चीज को अपना समझने का खयाल पैदा हुआ। आज हर एक चीज को मेरा-तेरा कहना और समझना मामूली बात है। लेकिन जैसा मैं पहले तुमसे कह चुका हूँ उन पुरानी जातियों के मर्द और औरत इस तरह खयाल न करते थे। तब हर एक चीज सारी जाति की होती थी। आखिर यह हुआ कि सरगना अपने को ही जाति का मुख्तार समझने लगा। इसलिए जाति का माल व असबाब उसी का हो गया।

जब सरगना मर जाता था तो जाति के सब आदमी जमा हो कर कोई दूसरा सरगना चुनते थे। लेकिन आमतौर पर सरगना के खानदान के लोग इंतजाम के काम को दूसरों से ज्यादा समझते थे। सरगना के साथ हमेशा रहने और उसके काम में मदद देने की वजह से वे इन कामों को खूब समझ जाते थे। इसलिए जब कोई बूढ़ा सरगना मर जाता, तो जाति के लोग उसी खानदान के किसी आदमी को सरगना चुन लेते थे। इस तरह सरगना का खानदान दूसरे से अलग हो गया और जाति के लोग उसी खानदान से अपना सरगना चुनने लगे। यह तो जाहिर है कि सरगना को बड़े इख्तियार होते थे और वह चाहता था कि उसका बेटा या भाई उसकी जगह सरगना बने। और भरसक इसकी कोशिश करता था। इसलिए वह अपने भाई या बेटे या किसी सगे रिश्तेदार को काम सिखाया करता था जिससे वह उसकी गद्दी पर बैठे। वह जाति के लोगों से कभी-कभी कह भी दिया करता था कि फलां आदमी जिसे मैंने काम सिखा दिया है मेरे बाद सरगना चुना जाए। शुरू में शायद जाति के आदमियों को यह ताकीद अच्छी न लगी हो लेकिन थोड़े ही दिनों में उन्हें उसकी आदत पड़ गई और वे उसका हुक्म मानने लगे। नए सरगना का चुनाव बंद हो गया। बूढ़ा सरगना तय कर देता था कि कौन उसके बाद सरगना होगा और वही होता था।

इससे हमें मालूम हुआ कि सरगना की जगह मौरूसी हो गई यानी उसी खानदान में बाप के बाद बेटा या कोई और रिश्तेदार सरगना होने लगा। सरगना को अब पूरा भरोसा हो गया कि जाति का माल असबब दरअसल मेरा ही है। यहाँ तक कि उसके मर जाने के बाद भी वह उसके खानदान में ही रहता था। अब हमें मालूम हुआ कि मेरा-तेरा का खयाल कैसे पैदा हुआ। शुरू में किसी के दिल में यह बात न थी। सब लोग मिल कर जाति के लिए काम करते थे, अपने लिए नहीं। अगर बहुत-सी खाने की चीजें पैदा करते, तो जाति के हर एक आदमी को उसका हिस्सा मिल जाता था। जाति में अमीर-गरीब का फर्क न था। सभी लोग जाति की जायदाद में बराबर के हिस्सेदार थे।

लेकिन ज्यों ही सरगना ने जाति की चीजों को हड़प करना शुरू किया और उन्हें अपनी कहने लगा, लोग अमीर और गरीब होने लगे। अगले खत में इसके बारे में मैं कुछ और लिखूँगा।

सरगना राजा हो गया

बूढ़े सरगना ने हमारा बहुत-सा वक्त ले लिया। लेकिन हम उससे जल्द ही फुर्सत पा जाएंगे या यों कहो उसका नाम कुछ और हो जाएगा। मैंने तुम्हें यह बतलाने का वायदा किया था कि राजा कैसे हुए और वह कौन थे और राजाओं का हाल समझने के लिए पुराने जमाने के सरगनों का जिक्र जरूरी था। तुमने जान लिया होगा कि यह सरगना बाद को राजा और महाराजा बन बैठे। पहले वह अपनी जाति का अगुआ होता था। अंग्रेजी में उसे 'पैट्रियार्क' कहते हैं। 'पैट्रियार्क' लैटिन शब्द 'पेटर' से निकला है जिसके माने पिता के हैं। 'पैट्रिया' भी इसी लैटिन शब्द से निकला है जिसके माने हैं 'पितृभूमि'। फ्रांसीसी में उसे 'पात्री' कहते हैं। संस्कृत और हिंदी में हम अपने मुल्क को 'मातृभूमि' कहते हैं। तुम्हें कौन पसंद है? जब सरगना की जगह मौरूसी हो गई या बाप के बाद बेटे को मिलने लगी तो उसमें और राजा में कोई फर्क न रहा। वही राजा बन बैठा और राजा के दिमाग में यह बात समा गई कि मुल्क की सब चीजें मेरी ही हैं। उसने अपने को सारा मुल्क समझ लिया। एक मशहूर फ्रांसीसी बादशाह ने एक मर्तबा कहा था 'मैं ही राज्य हूँ।' राजा भूल गए कि लोगों ने उन्हें सिर्फ इसलिए चुना है कि वे इंतजाम करें और मुल्क की खाने की चीजें और दूसरे सामान आदमियों में बाँट दें। वे यह भी भूल गए कि वे सिर्फ इसलिए चुने जाते थे कि वह उस जाति या मुल्क में सबसे होशियार और तजरबेकार समझे जाते थे। वे समझने लगे कि हम मालिक हैं और मुल्क के सब आदमी हमारे नौकर हैं। असल में वे ही मुल्क के नौकर थे।

आगे चल कर जब तुम इतिहास पढ़ोगी, तो तुम्हें मालूम होगा कि राजा इतने अभिमानी हो गए कि वे समझने लगे कि प्रजा को उनके चुनाव से कोई वास्ता न था। वे कहने लगे कि हमें ईश्‍वर ने राजा बनाया है। इसे वे ईश्‍वर का दिया हुआ हक कहने लगे। बहुत दिनों तक वे यह बेइंसाफी करते रहे और खूब ऐश के साथ राज्य के मजे उड़ाते रहे और उनकी प्रजा भूखों मरती रही। लेकिन आखिरकार प्रजा इसे बरदाश्त न कर सकी और बाज मुल्कों में उन्होंने राजाओं को मार भगाया। तुम आगे चल कर पढ़ोगी कि इंग्लैंड की प्रजा अपने राजा प्रथम चार्ल्स के खिलाफ उठ खड़ी हुई थी, उसे हरा दिया और मार डाला। इसी तरह फ्रांस की प्रजा ने भी एक बड़े हंगामे के बाद यह तय किया कि अब हम किसी को राजा न बनाएँगे। तुम्हें याद होगा कि हम फ्रांस के कौंसियरजेरी कैदखाने को देखने गए थे। क्या तुम हमारे साथ थीं। इसी कैदखाने में फ्रांस का राजा और उसकी रानी मारी आंतांनेत और दूसरे लोग रखे गए थे। तुम रूस की राज्य-क्रांति का हाल भी पढ़ोगी जब रूस की प्रजा ने कई साल हुए अपने राजा को निकाल बाहर किया जिसे 'जार' कहते थे। इससे मालूम होता है कि राजाओं के बुरे दिन आ गए और अब बहुत-से मुल्कों में राजा हैं ही नहीं। फ्रांस, जर्मनी, रूस, स्विट्जरलैंड, अमरीका, चीन और बहुत-से दूसरे मुल्कों में कोई राजा नहीं है। वहाँ पंचायती राज है जिसका मतलब है कि प्रजा समय-समय पर अपने हाकिम और अगुआ चुन लेती है और उनकी जगह मौरूसी नहीं होती।

तुम्हें मालूम है कि इंग्लैंड में अभी तक राजा है लेकिन उसे कोई अधिकार नहीं हैं। वह कुछ कर नहीं सकता। सब इख्तियार पार्लमेंट के हाथ में है जिसमें प्रजा के चुने हुए अगुआ बैठते हैं। तुम्हें याद होगा कि तुमने लंदन में पार्लमेंट देखी थी।

हिंदुस्तान में अभी तक बहुत से राजा, महाराजा और नवाब हैं। तुमने उन्हें भड़कीले कपड़े पहने, कीमती मोटर गाड़ियों में घूमते, अपने ऊपर बहुत-सा रुपया खर्च करते देखा होगा। उन्हें यह रुपया कहाँ से मिलता है? यह रिआया पर टैक्स लगा कर वसूल किया जाता है। टैक्स दिए तो इसलिए जाते हैं कि उससे मुल्क के सभी आदमियों की मदद की जाए, स्कूल और अस्पताल, पुस्तकालय, और अजायबघर खोले जाऍं, अच्छी सड़कें बनाई जाएं और प्रजा की भलाई के लिए और बहुत-से काम किए जाऍं। लेकिन हमारे राजा-महाराजा उसी फ्रांसीसी बादशाह की तरह अब भी यही समझते हैं कि हमीं राज्य हैं और प्रजा का रुपया अपने ऐश में उड़ाते हैं। वे तो इतनी शान से रहते हैं और उनकी प्रजा जो पसीना बहा कर उन्हें रुपया देती है, भूखों मरती है और उनके बच्चों के पढ़ने के लिए मदरसे भी नहीं होते।

शुरू का रहन-सहन

सरगनों और राजाओं की चर्चा हम काफी कर चुके। अब हम उस जमाने के रहन-सहन और आदमियों का कुछ हाल लिखेंगे।

हमें उस पुराने जमाने के आदमियों का बहुत ज्यादा हाल तो मालूम नहीं, फिर भी पुराने पत्थर के युग और नए पत्थर के युग के आदमियों से कुछ ज्यादा ही मालूम है। आज भी बड़ी-बड़ी इमारतों के खंडहर मौजूद हैं जिन्हें बने हजारों साल हो गए। उन पुरानी इमारतों, मंदिरों और महलों को देख कर हम कुछ अन्दाजा कर सकते हैं कि वे पुराने आदमी कैसे थे और उन्होंने क्या-क्या काम किए। उन पुरानी इमारतों की संगतराशी और नक्‍काशी से खासकर बड़ी मदद मिलती है। इन पत्थर के कामों से हमें कभी-कभी इसका पता चल जाता है कि वे लोग कैसे कपड़े पहनते थे। और भी बहुत-सी बातें मालूम हो जाती हैं।

हम यह तो ठीक-ठीक नहीं कह सकते कि पहले-पहल आदमी कहाँ आबाद हुए और रहने-सहने के तरीके निकाले। बाज आदमियों का खयाल है कि जहाँ एटलांटिक सागर है वहाँ एटलांटिक नाम का एक बड़ा मुल्क था। कहते हैं कि इस मुल्क में रहनेवालों का रहन-सहन बहुत ऊँचे दरजे का था, लेकिन किसी वजह से सारा मुल्क एटलांटिक सागर में समा गया और अब उसका कोई हिस्सा बाकी नहीं है। लेकिन किस्से कहानियों को छोड़ कर हमारे पास इसका कोई सबूत नहीं है, इसलिए उसका जिक्र करने की जरूरत नहीं।

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि पुराने जमाने में अमरीका में ऊँचे दरजे की सभ्यता फैली हुई थी। तुम्हें मालूम है कि कोलंबस को अमरीका का पता लगानेवाला कहा जाता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि कोलम्बस के जाने से पहले अमरीका था ही नहीं। इसका खाली इतना मतलब है कि यूरोपवालों को कोलंबस के पहले उसका पता न था। कोलंबस के जाने के बहुत पहले से वह मुल्क आबाद और सभ्य था। युकेटन में, जो उत्तरी अमरीका के मेक्सिको राज्य में है, और दक्षिनी अमरीका के पेरू राज्य में, पुरानी इमारतों के खंडहर हमें मिलते हैं। इससे इसका यकीन हो जाता है कि बहुत पुराने जमाने में भी पेरू और युकेटन के लोगों में सभ्यता फैली हुई थी। लेकिन उनका और ज्यादा हाल हमें अब तक नहीं मालूम हो सका। शायद कुछ दिनों के बाद हमें उनके बारे में कुछ और बातें मालूम हों।

यूरोप और एशिया को मिला कर यूरेशिया कहते हैं। यूरेशिया में सबसे पहले मेसोपोटैमिया, मिस्र, क्रीट, हिंदुस्तानी और चीन में सभ्यता फैली। मिस्र अब अफ्रीका में है लेकिन हम इसे यूरेशिया में रख सकते हैं क्योंकि वह इससे बहुत नजदीक है।

पुरानी जातियाँ जो इधर-उधर घूमती-फिरती थीं, जब कहीं आबाद होना चाहती होंगी तो वे कैसे जगह पसंद करती होंगी? वह ऐसी जगह होती होगी जहाँ वे आसानी से खाना पा सकें। उनका कुछ खाना खेती से जमीन में पैदा होता था। और खेती के लिए पानी का होना जरूरी है। पानी न मिले तो खेत सूख जाते हैं और उनमें कुछ नहीं पैदा होता। तुम्हें मालूम है कि जब चौमासे में हिंदुस्तान में काफी बारिश नहीं होती तो अनाज बहुत कम होता है और अकाल पड़ जाता है। गरीब आदमी भूखों मरने लगते हैं। पानी के बगैर काम नहीं चल सकता। पुराने जमाने के आदमियों को ऐसी ही जमीन चुननी पड़ी होगी जहाँ पानी की बहुतायत हो। यही हुआ भी।

मेसोपोटैमिया में वे दजला और फरात इन दो बड़ी नदियों के बीच में आबाद हुए। मिस्र में नील नदी के किनारे। हिंदुस्तान में उनके करीब-करीब सभी शहर सिंधु, गंगा, जमुना इत्यादि बड़ी-बड़ी नदियों के किनारे आबाद हुए। पानी उनके लिए इतना जरूरी था कि वे इन नदियों को देवता समझने लगे जो उन्हें खाना और आराम की दूसरी चीजें देता था। मिस्र में नील को 'पिता नील' कहते थे और उसकी पूजा करते थे। हिंदुस्तान में गंगा की पूजा होने लगी और अब तक उसे पवित्र समझा जाता है। लोग उसे 'गंगा माई' कहते हैं और तुमने यात्रियों को 'गंगा माई की जय' का शोर मचाते सुना होगा। यह समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों वे नदियों की पूजा करते थे, क्योंकि नदियों से उनके सभी काम निकलते थे। उनसे सिर्फ पानी ही न मिलता था, अच्छी मिट्टी और बालू भी मिलती थी जिससे उनके खेत उपजाऊ हो जाते थे। नदी ही के पानी और मिट्टी से तो अनाज के ढेर लग जाते थे, फिर वे नदियों को क्यों न 'माता' और 'पिता' कहते। लेकिन आदमियों की आदत है कि असली सबब को भूल जाते हैं। वे बिना सोचे-समझे लकीर पीटते चले जाते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि नील और गंगा की बड़ाई सिर्फ इसलिए है कि उनसे आदमियों को अनाज और पानी मिलता है।

पुरानी दुनिया के बड़े-बड़े शहर

मैं लिख चुका हूँ कि आदमियों ने पहले-पहल बड़ी-बड़ी नदियों के पास और उपजाऊ घाटियों में बस्तियाँ बनाईं जहाँ उन्हें खाने की चीजें और पानी बहुतायत से मिल सकता था। उनके बड़े-बड़े शहर नदियों के किनारे पर थे। तुमने इनमें से बाज मशहूर शहरों का नाम सुना होगा। मेसोपोटैमिया में बाबुल, नेनुवा, और असुर नाम के शहर थे। लेकिन इनमें से किसी शहर का अब पता नहीं है। हाँ, अगर बालू या मिट्टी में गहरी खुदाई होती है तो कभी-कभी उनके खंडहर मिल जाते हैं। इन हजारों बरसों में वे पूरी तरह मिट्टी और बालू से ढक गए और उनका कोई निशान भी नहीं मिलता। बाज जगहों में इन ढके हुए शहरों के ठीक ऊपर नए शहर बस गए। जो लोग इन पुराने शहरों की खोज कर रहे हैं उन्हें गहरी खुदाई करनी पड़ी है और कभी-कभी तले ऊपर कई शहर मिले हैं। यह बात नहीं है कि ये शहर एक साथ ही तले ऊपर रहे हों। एक शहर सैकड़ों वर्षों तक आबाद रहा होगा, लोग वहाँ पैदा हुए होंगे और मरे होंगे और कई पुश्तों तक यही सिलसिला जारी रहा होगा। धीरे-धीरे शहर की आबादी घटने लगी होगी और वह वीरान हो गया होगा। आखिर वहाँ कोई न रह गया होगा और शहर मलबे का एक ढेर बन गया होगा। तब उस पर बालू और गर्द जमने लगी होगी और यह शहर उसके नीचे ढक गए होंगे क्योंकि कोई आदमी सफाई करनेवाला न था। एक मुद्दत के बाद सारा शहर बालू और मिट्टी से ढक गया होगा और लोगों को इस बात की याद भी न रही होगी कि यहाँ कोई शहर था। सैकड़ों बरस गुजर गए होंगे तब नए आदमियों ने आ कर नया शहर बसाया होगा और यह नया शहर भी कुछ दिनों के बाद पुराना हो गया होगा। लोगों ने उसे छोड़ दिया होगा और वह भी वीरान हो गया होगा। एक जमाने के बाद वह भी बालू और धूल के नीचे गायब हो गया होगा। यही सबब है कि कभी-कभी हमें कई शहरों के खंडहर ऊपर-नीचे मिलते हैं। यह हालत खासकर बलुई जगहों में हुई होगी क्योंकि बालू हर एक चीज पर जल्दी जम जाती है।

कितनी अजीब बात है कि एक के बाद दूसरे शहर बनें, मर्दों, औरतों और बच्चों के जमघटों से गुलजार हों और तब धीरे-धीरे उजड़ जाऍं और जहाँ यह पुराने शहर थे वहाँ नए शहर बसें और नए-नए आदमी आ कर वहाँ आबाद हों। फिर उनका भी खात्मा हो जाए और शहर का कोई निशान न रहे। मैं तो इन शहरों का हाल दो-चार वाक्यों में लिख रहा हूँ, लेकिन सोचो कि इन शहरों के बनने और बिगड़ने और उनकी जगह नए शहरों के बनने में कितने युग बीत गए होंगे। जब कोई आदमी सत्तर या अस्सी साल का हो जाता है, तो हम उसे बुड्ढा कहते हैं। लेकिन उन हजारों बरसों के सामने सत्तर या अस्सी साल क्या हैं? जब ये शहर रहे होंगे तो उनमें कितने छोटे-छोटे बच्चे-बूढ़े हो कर मर गए होंगे और कई पीढ़ियाँ गुजर गई होंगी और अब बाबुल और नेनुवा का सिर्फ नाम बाकी रह गया है। एक दूसरा बहुत पुराना शहर दमिश्क था। लेकिन दमिश्क वीरान नहीं हुआ। वह अब तक मौजूद है और बड़ा शहर है। कुछ लोगों का खयाल है कि दमिश्क दुनिया का सबसे पुराना शहर है। हिंदुस्तान में भी बड़े-बड़े शहर नदियों के किनारे ही पर हैं। सबसे पुराने शहरों में एक का नाम इंद्रप्रस्थ था जो कहीं दिल्ली के आसपास था, लेकिन इंद्रप्रस्थ का अब निशान भी नहीं है। बनारस या काशी भी बड़ा पुराना शहर है, शायद दुनिया के सबसे पुराने शहरों में हो। इलाहाबाद, कानपुर और पटना और बहुत-से दूसरे शहर जो तुम्हें खुद याद होंगे नदियों ही के किनारे हैं। लेकिन ये बहुत पुराने नहीं हैं। हाँ, प्रयाग या इलाहाबाद और पटना जिसका पुराना नाम पाटलिपुत्रा था कुछ पुराने हैं।

इसी तरह चीन में भी पुराने शहर हैं।

मिस्र और क्रीट

पुराने जमाने में शहरों और गाँवों में किस तरह के लोग रहते थे? उनका कुछ हाल उनके बनाए हुए बड़े-बड़े मकानों और इमारतों से मालूम होता है। कुछ हाल उन पत्थर की तख्तियों की लिखावट से भी मालूम होता है जो वे छोड़ गए हैं। इसके अलावा कुछ बहुत पुरानी किताबें भी हैं जिनसे उस पुराने जमाने का बहुत कुछ हाल मालूम हो जाता है।

मिस्र में अब भी बड़े-बड़े मीनार और स्फिंग्स मौजूद हैं। लक्सर और दूसरी जगहों में बहुत बड़े मंदिरों के खंडहर नजर आते हैं। तुमने इन्हें देखा नहीं है लेकिन जिस वक्त हम स्वेज़ नहर से गुजर रहे थे, वे हमसे बहुत दूर न थे। लेकिन तुमने उनकी तस्वीरें देखी हैं। शायद तुम्हारे पास उनकी तस्वीरों के पोस्टकार्ड मौजूद हों। स्फिंग्स औरत के सिरवाली शेर की मूर्ति को कहते हैं। इसका डील-डौल बहुत बड़ा है। किसी को यह नहीं मालूम कि यह मूर्ति क्यों बनाई गई और उसका क्या मतलब है। उस औरत के चेहरे पर एक अजीब मुरझाई हुई मुस्कराहट है। और किसी की समझ में नहीं आता कि वह क्यों मुस्करा रही है। किसी आदमी के बारे में यह कहना कि वह स्फिंग्स की तरह है इसका यह मतलब है कि तुम उसे बिल्कुल नहीं समझते।

मीनार भी बहुत लंबे-चौड़े हैं। दरअसल, वे मिस्र के पुराने बादशाहों के मकबरे हैं जिन्हें फिरऊन कहते थे। तुम्हें याद है कि तुमने लंदन के अजायबघर में मिस्र की ममी देखी थी? ममी किसी आदमी या जानवर की लाश को कहते हैं जिसमें कुछ ऐसे तेल और मसाले लगा दिए गए हों कि वह सड़ न सके। फिरऊनों की लाशों की ममी बना दी जाती थीं और तब उन बड़े-बड़े मीनारों में रख दी जाती थीं। लाशों के पास सोने और चॉंदी के गहने और सजावट की चीजें और खाना रख दिया जाता था। क्योंकि लोग खयाल करते थे कि शायद मरने के बाद उन्हें इन चीजों की जरूरत हो। दो-तीन साल हुए कुछ लोगों ने इनमें से एक मीनार के अंदर एक फिरऊन की लाश पाई जिसका नाम तूतन खामिन था। उसके पास बहुत-सी खूबसूरत और कीमती चीजें रखी हुई मिलीं।

उस जमाने में मिस्र में खेती को सींचने के लिए अच्छी-अच्छी नहरें और झीलें बनाई जाती थीं। मेरीडू नाम की झील खास तौर पर मशहूर थी। इससे मालूम होता है कि पुराने जमाने के मिस्र के रहनेवाले कितने होशियार थे और उन्होंने कितनी तरक्‍की की थी। इन नहरों और झीलों और बड़े-बड़े मीनारों को अच्छे-अच्छे इंजीनियरों ने ही तो बनाया होगा।

केंडिया या क्रीट एक छोटा-सा टापू है जो भूमध्‍य सागर में है। सईद बंदर-गाह से वेनिस जाते वक्त हम उस टापू के पास से हो कर निकले थे। उस छोटे-से टापू में उस पुराने जमाने में बहुत अच्छी सभ्यता पाई जाती थी। नोसोज में एक बहुत बड़ा महल था और उसके खंडहर अब तक मौजूद हैं। इस महल में गुसलखाने थे और पानी की नलें भी थीं। जिन्हें नादान लोग नए जमाने की निकली हुई चीज समझते हैं। इसके अलावा बहुत खूबसूरत मिट्टी के बर्तन, पत्थर की नक्काशी, तस्वीरें और धातु और हाथी दाँत के बारीक काम भी होते थे। इस छोटे-से टापू में लोग शांति से रहते थे और उन्होंने खूब तरक्‍की की थी।

तुमने मीदास बादशाह का हाल पढ़ा होगा जिसकी निस्बत मशहूर है कि जिस चीज को वह छू लेता था वह सोना हो जाती थी। वह खाना न खा सकता था क्योंकि खाना सोना हो जाता था और सोना तो खाने की चीज नहीं। उसके लालच की उसे यह सजा दी गई थी। यह है तो एक मजेदार कहानी, लेकिन इससे हमें यह मालूम होता है कि सोना इतनी अच्छी और लाभदायक चीज नहीं है जितनी लोग खयाल करते हैं। क्रीट के सब राजा मीदास कहलाते थे और यह कहानी उन्हीं में से किसी राजा की होगी।

क्रीट की एक और कथा है जो शायद तुमने तुमने सुनी हो। वहाँ मैनोटार नाम का एक देव था जो आधा आदमी और आधा बैल था। कहा जाता है कि जवान आदमी और लड़कियाँ, उसे खाने को दी जाती थीं। मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि मजहब का खयाल शुरू में किसी अनजानी चीज के डर से पैदा हुआ। लोगों को प्रकृति का कुछ ज्ञान न था, न उन बातों को समझते थे जो दुनिया में बराबर होती रहती थीं। इसलिए डर के मारे वे बहुत-सी बेवकूफी की बातें किया करते थे। यह बहुत मुमकिन है कि लड़के और लड़कियों का यह बलिदान किसी देव को न किया जाता हो बल्कि वह महज खयाली देव हो क्योंकि मैं समझता हूँ ऐसा देव कभी हुआ ही नहीं।

उस पुराने जमाने में सारे संसार में मर्दों-औरतों का फर्जी देवताओं के लिए बलिदान किया जाता था। यही उनकी पूजा का ढंग था। मिस्र में लड़कियाँ नील नदी में डाल दी जाती थीं। लोगों का खयाल था कि इससे पिता नील खुश होंगे।

बड़ी खुशी की बात है कि अब आदमियों का बलिदान नहीं किया जाता; हाँ, शायद दुनिया के किसी कोने में कभी-कभी हो जाता हो। लेकिन अब भी ईश्‍वर को खुश करने के लिए जानवरों का बलिदान किया जाता है। किसी की पूजा करने का यह कितना अनोखा ढंग है!

चीन और हिंदुस्तान

हम लिख चुके हैं कि शुरू में मेसोपोटैमिया, मिस्र और भूमध्‍य सागर के छोटे-से टापू क्रीट में सभ्यता शुरू हुई और फैली। उसी जमाने में चीन और हिंदुस्तान में भी ऊँचे दरजे की सभ्यता शुरू हुई अपने ढंग से फैली।

दूसरी जगहों की तरह चीन में भी लोग बड़ी नदियों की घाटियों में आबाद हुए। यह उस जाति के लोग थे जिन्हें मंगोल कहते हैं। वे पीतल के खूबसूरत बर्तन बनाते थे और कुछ दिनों बाद लोहे के बर्तन भी बनाने लगे। उन्होंने नहरें और अच्छी-अच्छी इमारतें बनाईं, और लिखने का एक नया ढंग निकाला। यह लिखावट हिंदी, उर्दू या अंग्रेजी से बिल्कुल नहीं मिलती। यह एक किस्म की तस्वीरदार लिखावट थी। हर एक शब्द और कभी-कभी छोटे-छोटे जुमलों की भी तस्वीर होती थी। पुराने जमाने में मिस्र, क्रीट और बाबुल में भी तस्वीरदार लिखावट होती थी। उसे अब चित्रलिपि कहते हैं। तुमने यह लिखावट अजायबघर की बाज किताबों में देखी होगी। मिस्र और पश्चिम के मुल्कों में यह लिखावट सिर्फ बहुत पुरानी इमारतों में पाई जाती है। उन मुल्कों में भी इस लिखावट का बहुत दिनों से रिवाज नहीं रहा। लेकिन चीन में अब भी एक किस्‍म की तस्वीरदार लिखावट मौजूद है और ऊपर से नीचे को लिखी जाती है। अंग्रेजी या हिंदी की तरह बाएँ से दाईं तरफ या उर्दू की तरह दाहिनी से बाईं तरफ नहीं।

हिंदुस्तान में बहुत-सी पुराने जमाने की इमारतों के खंडहर शायद अभी तक जमीन में नीचे दबे पड़े हैं। जब तक उन्हें कोई खोद न निकाले तब तक हमें उनका पता नहीं चलता। लेकिन उत्तर में बाज बहुत पुराने खंडहरों की खुदाई हो चुकी है। यह तो हमें मालूम ही है कि बहुत पुराने जमाने में जब आर्य लोग हिंदुस्तान में आए तो यहाँ द्रविड़ जाति के लोग रहते थे। और उनकी सभ्यता भी ऊँचे दरजे की थी। वे दूसरे मुल्कवालों के साथ व्यापार करते थे। वे अपनी बनाई हुई बहुत-सी चीजें मेसोपोटैमिया और मिस्र में भेजा करते थे। समुद्री रास्ते से वे खासकर चावल और मसाले और साखू की इमारती लकड़ियाँ भी भेजा करते थे। कहा जाता है कि मैसोपोटैमिया के 'उर' नामी शहर के बहुत से पुराने महल दक्षिणी हिंदुस्तान से आई हुई साखू की लकड़ी के बने हुए थे। यह भी कहा जाता है कि सोना, मोती, हाथीदाँत, मोर और बंदर हिंदुस्तान से पश्चिम के मुल्कों को भेजे जाते थे। इससे मालूम होता है कि उस जमाने में हिंदुस्तान और दूसरे मुल्कों में बहुत व्यापार होता था। व्यापार तभी बढ़ता है जब लोग सभ्य होते हैं।

उस जमाने में हिंदुस्तान और चीन में छोटी-छोटी रियासतें या राज्य थे। इनमें से किसी मुल्क में भी एक राज्य न था। हर एक छोटा शहर, जिसमें कुछ गॉंव और खेत होते थे, एक अलग राज्य होता था। ये शहरी रियासतें कहलाती हैं। उस पुराने जमाने में भी इनमें से बहुत-सी रियासतों में पंचायती राज्य था। बादशाह न थे, राज्य का इंतजाम करने के लिए चुन हुए आदमियों की एक पंचायत होती थी। फिर भी बाज रियासतों में राजा का राज्य था। गोकि इन शहरी रियासतों की सरकारें अलग होती थी, लेकिन कभी-कभी वे एक दूसरे की मदद किया करती थीं, कभी-कभी एक बड़ी रियासत कई छोटी रियासतों की अगुआ बन जाती थी।

चीन में कुछ ही दिनों बाद इन छोटी-छोटी रियासतों की जगह एक बहुत बड़ा राज्य हो गया। इसी राज्य के जमाने में चीन की बड़ी दीवार बनाई गई थी। तुमने इस बड़ी दीवार का हाल पढ़ा है। वह कितनी अजीबोगरीब चीज है। वह समुद्र के किनारे से ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों तक बनाई गई थी, ताकि मंगोल जाति के लोग चीन में घुस कर न आ सकें। यह दीवार चौदह सौ मील लंबी, बीस से तीस फुट तक ऊँची और पच्चीस फुट चौड़ी है। थोड़ी-थोड़ी दूर पर किले और बुर्ज हैं। अगर ऐसी दीवार हिंदुस्तान में बने तो वह उत्तर में लाहौर से लेकर दक्षिण में मद्रास तक चली जाएगी। वह दीवार अब भी मौजूद है और अगर तुम चीन जाओ तो उसे देख सकती हो।

समुद्री सफर और व्यापार

फिनीशियन भी पुराने जमाने की एक सभ्य जाति थी। उसकी नस्ल भी वही थी जो यहूदियों और अरबों की है। वे खासकर एशिया माइनर के पश्चिमी किनारे पर रहते थे, जो आजकल का तुर्की है। उनके खास-खास शहर एकर, टायर और सिडोन भूमध्‍य समुद्र के किनारे पर थे। वे व्यापार के लिए लंबे सफर करने में मशहूर थे। वे भूमध्‍य समुद्र से होते हुए सीधे इंग्लैंड तक चले जाते थे। शायद वे हिंदुस्तान भी आए हों।

अब हमें दो बड़ी-बड़ी बातों की दिलचस्प शुरुआत का पता चलता है। समुद्री सफर और व्यापार। आजकल की तरह उस जमाने में अच्छे अगिनवोट और जहाज न थे। सबसे पहली नाव किसी दरख्त के तने को खोखला कर बनी होगी। इनके चलने के लिए डंडों से काम लिया जाता था और कभी-कभी हवा के जोर के लिए तिरपाल लगा देते थे। उस जमाने में समुद्र के सफर बहुत दिलचस्प और भयानक रहे होंगे। अरब सागर को एक छोटी-सी किश्ती पर, जो डंडों और पालों से चलती, तय करने का खयाल तो करो। उनमें चलने-फिरने के लिए बहुत कम जगह रहती होगी और हवा का एक हलका-सा झोंका भी उसे तले ऊपर कर देता है। अक्सर वह डूब भी जाती थी। खुले समुद्र में एक छोटी-सी किश्ती पर निकलना बहादुरों ही का काम था। उसमें बड़े-बड़े खतरे थे और उनमें बैठनेवाले आदमियों को महीनों तक जमीन के दर्शन न होते थे। अगर खाना कम पड़ जाता था तो उन्हें बीच समुद्र में कोई चीज न मिल सकती थी, जब तक कि वे किसी मछली या चिड़िया का शिकार न करें। समुद्र खतरों और जोखिम से भरा हुआ था। पुराने जमाने के मुसाफिरों को जो खतरे पेश आते थे उसका बहुत कुछ हाल किताबों में मौजूद है।

लेकिन इस जोखिम के होते हुए भी लोग समुद्री सफर करते थे। मुमकिन है कुछ लोग इसलिए सफर करते हों कि उन्हें बहादुरी के काम पसंद थे; लेकिन ज्यादातर लोग सोने और दौलत के लालच से सफर करते थे। वे व्यापार करने जाते थे; माल खरीदते थे और बेचते थे; और धन कमाते थे। व्यापार क्या है? आज तुम बड़ी-बड़ी दुकानें देखती हो और उनमें जा कर अपनी जरूरत की चीज खरीद लेना कितना सहज है। लेकिन क्या तुमने ध्‍यान दिया है कि जो चीजें तुम खरीदती हो वे आती कहाँ से हैं? तुम इलाहाबाद की एक दुकान में एक शाल खरीदती हो। वह कश्मीर से यहाँ तक सारा रास्ता तय करता हुआ आया होगा और ऊन कश्मीर और लद्दाख की पहाड़ियों में भेड़ों की खाल पर पैदा हुआ होगा। दाँत का मंजन जो तुम खरीदती हो शायद जहाज और रेलगाड़ियों पर होता हुआ अमरीका से आया हो। इसी तरह चीन, जापान, पेरिस या लंदन की बनी हुई चीजें भी मिल सकती हैं। विलायती कपड़े के एक छोटे-से टुकड़े को ले लो जो यहाँ बाजार में बिकता है। रुई पहले हिंदुस्तान में पैदा हुई और इंग्लैंड भेजी गई। एक बड़े कारखाने ने इसे खरीदा, साफ किया, उसका सूत बनाया और तब कपड़ा तैयार किया। यह कपड़ा फिर हिंदुस्तान आया और बाजार में बिकने लगा। बाजार में बिकने के पहले इसे लौटा-फेरी में कितने हजार मीलों का सफर करना पड़ा। यह नादानी की बात मालूम होती है कि हिंदुस्तान में पैदा होनेवाली रुई इतनी दूर इंग्लैंड भेजी जाए, वहाँ उसका कपड़ा बने और फिर हिंदुस्तान में आए। इसमें कितना वक्त, रुपया और मेहनत बरबाद हो जाती है। अगर रुई का कपड़ा हिंदुस्तान में ही बने तो वह जरूर ज्यादा सस्ता और अच्छा होगा। तुम जानती हो कि हम विलायती कपड़े नहीं खरीदते। हम खद्दर पहनते हैं क्योंकि जहाँ तक मुमकिन हो अपने मुल्क में पैदा होनेवाली चीजों को खरीदना अक्लमंदी की बात है। हम इसलिए भी खद्दर खरीदते और पहनते हैं कि उससे उन गरीब आदमियों की मदद होती है जो उसे कातते और बुनते हैं।

अब तुम्हें मालूम हो गया होगा कि आजकल व्यापार कितनी पेचीदा चीज है। बड़े-बड़े जहाज एक मुल्क का माल दूसरे देश को पहुँचाते रहते हैं। लेकिन पुराने जमाने में यह बात न थी।

जब हम पहले-पहल किसी एक जगह आबाद हुए तो हमें व्यापार करना बिल्कुल न आता था। आदमी को अपनी जरूरत की चीजें आप बनानी पड़ती थीं। यह सच है कि उस वक्त आदमी को बहुत चीजों की जरूरत न थी। जैसा तुमसे पहले कह चुका हूँ। उसके बाद जाति में काम बॉंटा जाने लगा। लोग तरह-तरह के काम करने लगे और तरह-तरह की चीजें बनाने लगे। कभी-कभी ऐसा होता होगा कि एक जाति के पास एक चीज ज्यादा होती होगी और दूसरी जाति के पास दूसरी चीज। इसलिए अपनी-अपनी चीजों को बदल लेना उनके लिए बिल्कुल सीधी बात थी। मिसाल के तौर पर एक जाति एक बोरे चने पर एक गाय देती होगी। उस जमाने में रुपया न था। चीजों का सिर्फ बदला होता था। इस तरह बदला शुरू हुआ। इसमें कभी-कभी दिक्‍कत पैदा होती होगी। एक बोरे चने या इसी तरह की किसी दूसरी चीज के लिए एक आदमी को एक गाय या दो भेड़ें ले जानी पड़ती होंगी लेकिन फिर भी व्यापार तरक्‍की करता रहा।

जब सोना और चाँदी निकलने लगा तो लोगों ने उसे व्यापार के लिए काम में लाना शुरू किया। उन्हें ले जाना ज्यादा आसान था। और धीरे-धीरे माल के बदले में सोने या चाँदी देने का रिवाज निकल पड़ा। जिस आदमी को पहले-पहल यह बात सूझी होगी वह बहुत होशियार होगा। सोने-चॉंदी के इस तरह काम में लाने से व्यापार करना बहुत आसान हो गया। लेकिन उस वक्त भी आजकल की तरह सिक्के न थे। सोना तराजू पर तौल कर दूसरे आदमी को दे दिया जाता था। उसके बहुत दिनों के बाद सिक्के का रिवाज हुआ और इससे व्यापार और बदले में और भी सुभीता हो गया। तब तौलने की जरूरत न रही क्योंकि सभी आदमी सिक्के की कीमत जानते थे। आजकल सब जगह सिक्के का रिवाज है। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि निरा रुपया हमारे किसी काम का नहीं है। यह हमें अपनी जरूरत की दूसरी चीजों के लेने में मदद देता है। इससे चीजों का बदलना आसान हो जाता है। तुम्हें राजा मीदास का किस्सा याद होगा जिसके पास सोना तो बहुत था लेकिन खाने को कुछ नहीं। इसलिए रुपया बेकार है। जब तक हम उससे जरूरत की चीजें न खरीद लें।

मगर आजकल भी तुम्हें देहातों में ऐसे लोग मिलेंगे जो सचमुच चीजों का बदला करते हैं और दाम नहीं देते। लेकिन आम तौर पर रुपया काम में लाया जाता है क्योंकि इसमें बहुत ज्यादा सुभीता है। बाज नादान लोग समझते हैं कि रुपया खुद ही बहुत अच्छी चीज है और वह उसे खर्च करने के बदले बटोरते और गाड़ते हैं। इससे मालूम हो जाता है कि उन्हें यह नहीं मालूम है कि रुपए का रिवाज कैसे पड़ा और यह दरअसल क्या है।

भाषा, लिखावट और गिनती

हम तरह-तरह की भाषाओं का पहले ही जिक्र कर चुके हैं और दिखा चुके हैं कि उनका आपस में क्या नाता है। आज हम यह विचार करेंगे कि लोगों ने बोलना क्यों सीखा।

हमें मालूम है कि जानवरों की भी कुछ बोलियाँ होती हैं। लोग कहते हैं कि बंदरों में थोड़ी-सी मामूली चीजों के लिए शब्द या बोलियॉं मौजूद हैं। तुमने बाज जानवरों की अजीब आवाजें भी सुनी होंगी जो वे डर जाने पर और अपने भाई- बंदों को किसी खतरे की खबर देने के लिए मुँह से निकालते हैं। शायद इसी तरह आदमियों में भी भाषा की शुरुआत हुई। शुरू में बहुत सीधी-सादी आवाजें रही होंगी। जब वे किसी चीज को देख कर डर जाते होंगे और दूसरों को उसकी खबर देना चाहते होंगे तो वे खास तरह की आवाज निकालते होंगे। शायद इसके बाद मजदूरों की बोलियॉं शुरू हुईं। जब बहुत-से आदमियों को कोई चीज खींचते या कोई भारी बोझ उठाते नहीं देखा है? ऐसा मालूम होता है कि एक साथ हाँक लगाने से उन्हें कुछ सहारा मिलता है। यही बोलियॉं पहले-पहल आदमी के मुँह से निकली होंगी।

धीरे-धीरे और शब्द बनते गए होंगे जैसे पानी, आग, घोड़ा, भालू। पहले शायद सिर्फ नाम ही थे, क्रियाएँ न थीं। अगर कोई आदमी यह कहना चाहता होगा कि मैंने भालू देखा है तो वह एक शब्द भालू कहता होगा और बच्चों की तरह भालू की तरफ इशारा करता होगा। उस वक्त लोगों में बहुत कम बातचीत होती होगी।

धीरे-धीरे भाषा तरक्‍की करने लगी। पहले छोटे-छोटे वाक्य पैदा हुए, फिर बड़े-बड़े। किसी जमाने में भी शायद सभी जातियों की एक ही भाषा न थी। लेकिन कोई जमाना ऐसा जरूर था जब बहुत सी तरह-तरह की भाषाएँ न थीं। मैं तुमसे कह चुका हूँ कि तब थोड़ी-सी भाषाएँ थीं। मगर बाद को, उन्हीं में से हर एक की कई-कई शाखाएँ पैदा हो गई।

सभ्यता शुरू होने के जमाने तक, जिसका हम जिक्र कर रहे हैं भाषा ने बहुत तरक्‍की कर ली थी। बहुत-से गीत बन गए थे और भाट व गवैये उन्हें गाते थे। उस जमाने में न लिखने का बहुत रिवाज था और न बहुत किताबें थीं। इसलिए लोगों को अब से कहीं ज्यादा बातें याद रखनी पड़ती थीं। तुकबंदियों और छंदों को याद रखना जयादा सहल है। यही सबब है कि उन मुल्कों में जहाँ पुराने जमाने में सभ्यता फैली हुई थी, तुकबंदियों और लड़ाई के गीतों का बहुत रिवाज था।

भाटों और गवैयों को मरे हुए वीरों की बहादुरी के गीत बहुत अच्छे लगते थे। उस जमाने में आदमी की जिंदगी का खास काम लड़ना था, इसलिए उनके गीत भी लड़ाइयों ही के हैं। हिंदुस्तान ही नहीं, दूसरे मुल्कों में भी, यही रिवाज था।

लिखने की शुरुआत भी बहुत मजेदार है। मैं चीनी लिखावट का बयान कर चुका हूँ। सभी में लिखना तस्वीरों से शुरू हुआ होगा। जो आदमी मोर के बारे में कुछ कहना चाहता होगा, उसे मोर की तस्वीर का खाका बनाना पड़ता होगा। हाँ, इस तरह कोई बहुत ज्यादा न लिख सकता होगा। धीरे-धीरे तस्वीरें सिर्फ निशानियाँ रह गई होंगी। इसके बहुत दिनों पीछे वर्णमाला निकली होगी और उसका रिवाज हुआ होगा। इससे लिखना बहुत सहल हो गया और जल्दी-जल्दी तरक्‍की होने लगी।

अदद और गिनती का निकलना भी बड़े मार्के की बात रही होगी। गिनती के बगैर कोई रोजगार करने का खयाल भी नहीं किया जा सकता। जिस आदमी ने गिनती निकाली वह बड़ा दिमागवाला या बहुत होशियार आदमी रहा होगा। यूरोप में पहले अंक बहुत बेढंगे थे। रोमन अंकों को तुम जानती हो प्ए प्प्ए प्प्प्ए प्टए टए टप्ए टप्प्ए टप्प्प्ए प्ग्ए ग् इत्यादि। ये बहुत बेढंगे हैं और इन्हें काम में लाना मुश्किल है। आजकल हम, हर एक भाषा में, जिन अंकों को काम में लाते हैं वे बहुत अच्छे हैं। मैं 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 वगैरह अंकों को कह रहा हूँ। इन्हें अरबी अंक कहते हैं क्योंकि यूरोपवालों ने उन्हें अरब जाति से सीखा। लेकिन अरबवालों ने उन्हें हिंदुस्तानियों से सीखा था। इसलिए उन्हें हिंदुस्तानी अंक कहना ज्यादा मुनासिब होगा।

लेकिन मैं तो सरपट दौड़ा जा रहा हूँ। अभी हम अरब जाति तक नहीं पहुँचे हैं।

आदमियों के अलग-अलग दरजे

लड़के, लड़कियों और सयानों को भी इतिहास अकसर एक अजीब ढंग से पढ़ाया जाता है। उन्हें राजाओं और दूसरे आदमियों के नाम और लड़ाइयों की तारीखें याद करनी पड़ती हैं। लेकिन दरअसल इतिहास लड़ाइयों का, या थोड़े- से राजाओं या सेनापतियों का नाम नहीं है। इतिहास का काम यह है कि हमें किसी मुल्क के आदमियों का हाल बतलाए, कि वे किस तरह रहते थे, क्या करते थे और क्या सोचते थे, किस बात से उन्हें खुशी होती थीं, किस बात से रंज होता था, उनके सामने क्या-क्या कठिनाइयाँ आईं और उन लोगों ने कैसे उन पर काबू पाया। अगर हम इतिहास को इस तरीके से पढ़ें तो हमें उससे बहुत-सी बातें मालूम होंगी। अगर उसी तरह की कोई कठिनाई या आफत हमारे सामने आए, तो इतिहास के जानने से हम उस पर विजय पा सकते हैं। पुराने जमाने का हाल पढ़ने से हमें यह पता चल जाता है, कि लोगों की हालत पहले से अच्छी है या खराब, उन्होंने कुछ तरक्‍की की है या नहीं।

यह सच है कि हमें पुराने जमाने के मर्दों और औरतों के चरित्र से कुछ न कुछ सबक लेना चाहिए। लेकिन हमें यह भी जानना चाहिए कि पुराने जमाने में भिन्न-भिन्न जाति के आदमियों का क्या हाल था।

मैं तुम्हें बहुत-से खत लिख चुका हूँ। यह चौबीसवाँ खत है लेकिन अब तक हमने बहुत पुराने जमाने ही की चर्चा की है, जिसके बारे में हमें थोड़ी ही-सी बातें मालूम हैं। इसे हम इतिहास नहीं कह सकते। हम इस इतिहास की शुरुआत, या इतिहास का उदय कह सकते हैं। जल्द ही हम बाद के जमाने का जिक्र करेंगे, जिससे हम ज्यादा वाकिफ हैं और जिसे ऐतिहासिक काल कह सकते हैं। लेकिन उस पुरानी सभ्यता का जिक्र छेड़ने के पहले आओ हम उस पर फिर एक निगाह डालें और इसका पता लगाएं कि उस जमाने में आदमियों की कौन-कौन-सी किस्में थीं।

हम यह पहले देख चुके हैं कि पुरानी जातियों के आदमियों ने तरह-तरह के काम करने शुरू किए। काम या पेशे का बँटवारा हो गया। हमने यह भी देखा है कि जाति के सरपंच या सरगना ने अपने परिवार को दूसरों से अलग कर लिया और काम का इंतजाम करने लगा। वह ऊँचे दरजे का आदमी बन बैठा, या यों समझ लो कि उसका परिवार औरों से ऊँचे दरजे में आ गया। इस तरह आदमियों के दो दरजे हो गए। एक इंतजाम करता था, हुक्म देता था और दूसरा असली काम करता था। और यह तो जाहिर है कि इंतजाम करनेवाले दरजे का इख्तियार ज्यादा था और इसके जोर से उन्होंने वह सब चीजें ले लीं जिन पर वह हाथ बढ़ा सके। वे ज्यादा मालदार हो गए और काम करनेवालों की कमाई को दिन-दिन ज्यादा हड़पने लगे।

इसी तरह ज्यों-ज्यों काम की बाँट होती गई और दरजे पैदा होते गए। राजा और उसका परिवार तो था ही, उसके दरबारी भी पैदा हो गए। वे मुल्क का इंतजाम करते थे और दुश्मनों से उसकी हिफाजत करते थे। वे आमतौर पर कोई दूसरा काम न करते थे।

मंदिरों के पुजारियों और नौकरों का एक दूसरा दरजा था। उस जमाने में इन लोगों का बहुत रोबदाब था और हम उनका जिक्र फिर करेंगे।

तीसरा दरजा व्यापारियों का था। ये वे सौदागर लोग थे जो एक मुल्क का माल दूसरे मुल्क में ले जाते थे, माल खरीदते थे और बेचते थे और दुकानें खोलते थे।

चौथा दरजा कारीगरों का था, जो हर एक किस्म की चीजें बनाते थे, सूत कातते और कपड़े बुनते थे, मिट्टी के बरतन बनाते थे, पीतल के बरतन गढ़ते थे, सोने और हाथी दाँत की चीजें बनाते थे तथा बहुत-से और काम करते थे। ये लोग अकसर शहरों में या शहरों के नजदीक रहते थे लेकिन बहुत से देहातों में भी बसे हुए थे।

सबसे नीचा दरजा उन किसानों और मजदूरों का था जो खेतों में या शहरों में काम करते थे। इस दरजे में सबसे ज्यादा आदमी थे। और सभी दरजों के लोग उन्हीं पर दाँत लगाए रहते थे और उनसे कुछ न कुछ ऐंठते रहते थे।

राजा, मंदिर और पुजारी

हमने पिछले खत में लिखा था कि आदमियों के पाँच दरजे बन गए। सबसे बड़ी जमात मजदूर और किसानों की थी। किसान जमीन जोतते थे और खाने की चीजें पैदा करते थे। अगर किसान या और लोग जमीन न जोतते और खेती न होती तो अनाज पैदा ही न होता, या होता तो बहुत कम। इसलिए किसानों का दरजा बहुत जरूरी था। वे न होते तो सब लोग भूखों मर जाते। मजदूर भी खेतों या शहरों में बहुत फायदे के काम करते थे। लेकिन इन अभागों को इतना जरूरी काम करने और हर एक आदमी के काम आने पर भी मुश्किल से गुजारे भर को मिलता था। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा दूसरों के हाथ पड़ जाता था खासकर राजा और उसके दरजे के दूसरे आदमियों और अमीरों के हाथ। उसकी टोली के दूसरे लोग जिनमें दरबारी भी शामिल थे उन्हें बिल्कुल चूस लेते थे।

हम पहले लिख चुके हैं कि राजा और उसके दरबारियों का बहुत दबाव था। शुरू में जब जातियाँ बनीं, तो जमीन किसी एक आदमी की न होती थी, जाति भर की होती थी। लेकिन जब राजा और उसकी टोली के आदमियों की ताकत बढ़ गई तो वे कहने लगे कि जमीन हमारी है। वे जमींदार हो गए और बेचारे किसान जो छाती फाड़ कर खेती-बारी करते थे, एक तरह से महज उनके नौकर हो गए। फल यह हुआ कि किसान खेती करके जो कुछ पैदा करते थे वह बँट जाता था और बड़ा हिस्सा जमींदार के हाथ लगता था।

बाज मंदिरों के कब्जे में भी जमीन थी, इसलिए पुजारी भी जमींदार हो गए। मगर ये मंदिर और उनके पुजारी थे कौन। मैं एक खत में लिख चुका हूँ कि शुरू में जंगली आदमियों को ईश्‍वर और मजहब का खयाल इस वजह से पैदा हुआ कि दुनिया की बहुत-सी बातें उनकी समझ में न आती थीं और जिस बात को वे समझ न सकते थे, उससे डरते थे। उन्होंने हर एक चीज को देवता या देवी बना लिया, जैसे नदी, पहाड़, सूरज, पेड़, जानवर और बाज ऐसी चीजें जिन्हें वे देख तो न सकते थे पर कल्पना करते थे, जैसे भूत-प्रेत। वे इन देवताओं से डरते थे, इसलिए उन्हें हमेशा यह खयाल होता था कि वे उन्हें सजा देना चाहते हैं। वे अपने देवताओं को भी अपनी ही तरह क्रोधी और निर्दयी समझते थे और उनका गुस्सा ठंडा करने या उन्हें खुश करने के लिए क़ुरबानियाँ दिया करते थे।

इन्हीं देवताओं के लिए मंदिर बनने लगे। मन्दिर के भीतर एक मंडप होता था जिसमें देवता की मूर्ति होती थी। वे किसी ऐसी चीज की पूजा कैसे करते जिसे वे देख ही न सकें। यह जरा मुश्किल है। तुम्हें मालूम है कि छोटा बच्चा उन्हीं चीजों का खयाल कर सकता है जिन्हें वह देखता है। शुरू जमाने के लोगों की हालत कुछ बच्चों की सी थी। चूँकि वे मूर्ति के बिना पूजा ही न कर सकते थे, वे अपने मंदिरों में मूर्तियाँ रखते थे। यह कुछ अजीब बात है कि ये मूर्तियाँ बराबर डरावने, कुरूप जानवरों की होती थीं, या कभी-कभी आदमी और जानवर की मिली हुई। मिस्र में एक जमाने में बिल्ली की पूजा होती थी, और मुझे याद आता है कि एक दूसरे जमाने में बंदर की। समझ में नहीं आता कि लोग ऐसी भयानक मूर्तियों की पूजा क्यों करते थे। अगर मूर्ति ही पूजना चाहते थे तो उसे खूबसूरत क्यों न बनाते थे? लेकिन शायद उनका खयाल था कि देवता डरावने होते हैं, इसीलिए वे उनकी ऐसी भयानक मूर्तियाँ बनाते थे।

उस जमाने में शायद लोगों का यह खयाल न था कि ईश्‍वर एक है, या वह कोई बड़ी ताकत है जैसा लोग आज समझते हैं। वे सोचते होंगे कि बहुत-से देवता और देवियाँ हैं, जिनमें शायद कभी-कभी लड़ाइयाँ भी होती हों। अलग-अलग शहरों और मुल्कों के देवता भी अलग-अलग होते थे।

मंदिरों में बहुत-से पुजारी और पुजारिनें होती थीं। पुजारी लोग आम तौर पर लिखना-पढ़ना जानते थे और दूसरे आदमियों से ज्यादा पढ़े-लिखे होते थे। इसलिए राजा लोग उनसे सलाह लिया करते थे। उस जमाने में किताबों को लिखना या नकल करना पुजारियों का ही काम था। उन्हें कुछ विद्याएँ आती थीं इसलिए वे पुराने जमाने के ऋषि समझे जाते थे। वे हकीम भी होते थे और अक्सर महज यह दिखाने के लिए कि वे लोग कितने पहुँचे हुए हैं, वे लोगों के सामने जादू के करतब किया करते थे। लोग सीधे और मूर्ख तो थे ही, वे पुजारियों को जादूगर समझते थे और उनसे थर-थर काँपते थे।

पुजारी लोग हर तरह से आदमियों की जिंदगी के कामों में मिले-जुले रहते थे। वही उस जमाने के अक्लमंद आदमियों में थे और हर एक आदमी मुसीबत या बीमारी में उनके पास जाता था। वे आदमियों के लिए बड़े-बड़े त्योहारों का इंतजाम करते थे। उस जमाने में पत्र न थे, खास कर गरीब आदमियों के लिए। वे त्योहारों ही से दिनों का हिसाब लगाते थे।

पुजारी लोग प्रजा को ठगते और धोखा देते थे। लेकिन इनके साथ कई बातों में उनकी मदद भी करते और उन्हें आगे भी बढ़ाते थे।

मुमकिन है कि जब लोग पहले-पहल शहरों में बसने लगे हों तो उन पर राज्य करनेवाले राजा न रहे हों, पुजारी ही रहे हों। बाद को राजा आए होंगे और चूँकि वे लोग लड़ने में ज्यादा होशियार थे, उन्होंने पुजारियों को निकाल दिया होगा। बाज जगहों में एक ही आदमी राजा और पुजारी दोनों ही होता था, जैसे मिस्र के फिरऊन। फिरऊन लोग अपनी जिंदगी ही में आधे देवता समझे जाने लगे थे, और मरने के बाद तो वे पूरे देवताओं की तरह पुजने लगे।

पीछे की तरफ एक नजर

तुम मेरी चिट्ठियों से ऊब गई होगी! जरा दम लेना चाहती होगी। खैर, कुछ अरसे तक मैं तुम्हें नई बात न लिखूँगा। हमने थोड़े-से खतों में हजारों लाखों बरसों की दौड़ लगा डाली है। मैं चाहता हूँ कि जो कुछ हम देख आए हैं उस पर तुम जरा गौर करो। हम उस जमाने से चले थे जब जमीन सूरज ही का एक हिस्सा थी, तब वह उससे अलग हो कर धीरे-धीरे ठंडी हो गई। उसके बाद चाँद ने उछाल मारी और जमीन से निकल भागा, मुद्दतों तक यहाँ कोई जानवर न था। तब लाखों, करोड़ों बरसों में, धीरे-धीरे जानदारों की पैदाइश हुई। दस लाख बरसों की मुद्दत कितनी होती है, इसका तुम्हें कुछ अंदाजा होता है? इतनी बड़ी मुद्दत का अंदाजा करना निहायत मुश्किल है। तुम अभी कुल दस बरस की हो और कितनी बड़ी हो गई हो! खासी कुमारी हो गई हो। तुम्हारे लिए सौ साल ही बहुत हैं। फिर कहाँ हजार, और कहाँ लाख जिसमें सौ हजार होते हैं। हमारा छोटा-सा सिर इसका ठीक अंदाजा कर ही नहीं सकता। लेकिन हम अपने आपको बहुत बड़ा समझते हैं और जरा-जरा-सी बातों पर झुँझला उठते हैं, और घबरा जाते हैं। लेकिन दुनिया के इस पुराने इतिहास में इन छोटी-छोटी बातों की हकीकत ही क्या? इतिहास के इन अपार युगों का हाल पढ़ने और उन पर विचार करने से हमारी आँखें खुल जाएँगी और हम छोटी-छोटी बातों से परेशान न होंगे।

जरा उन बेशुमार युगों का खयाल करो जब किसी जानदार का नाम तक न था। फिर उस लंबे जमाने की सोचो जब सिर्फ समुद्र के जंतु ही थे। दुनिया में कहीं आदमी का पता नहीं है। जानवर पैदा होते हैं और लाखों साल तक बेखटके इधर-उधर कुलेलें किया करते हैं। कोई आदमी नहीं है जो उनका शिकार कर सके। और अंत में जब आदमी पैदा भी होता है तो बिल्कुल बित्ता भर का, नन्हा-सा, सब जानवरों से कमज़ोर! धीरे-धीरे हजारों बरसों में वह ज्यादा मजबूत और होशियार हो जाता है, यहाँ तक कि वह दुनिया के जानवरों का मालिक हो जाता है। और दूसरे जानवर उसके ताबेदार और गुलाम हो जाते हैं और उसके इशारे पर चलने लगते हैं।

तब सभ्यता के फैलने का जमाना आता है। हम इसकी शुरुआत देख चुके हैं। अब हम यह देखने को कोशिश करेंगे कि आगे चल कर उसकी क्या हालत हुई। अब हमें लाखों बरसों का जिक्र नहीं करना है। पिछले खतों में हम तीन-चार हजार साल पहले के जमाने तक पहुँच गए थे। लेकिन इधार के तीन-चार हजार बरसों का हाल हमें उधार के लाखों बरसों से ज्यादा मालूम है। आदमी के इतिहास की तरक्‍की दरअसल इन्हीं तीन हजार बरसों में हुई है। जब तुम बड़ी हो जाओगी तो तुम इतिहास के बारे में बहुत कुछ पढ़ोगी। मैं इनके बारे में कुछ थोड़ा-सा लिखूँगा जिससे तुम्हें कुछ खयाल हो जाए कि इस छोटी-सी दुनिया में आदमी पर क्या-क्या गुजरी।

फॉसिल' और पुराने खंडहर

मैंने अरसे से तुम्हें कोई खत नहीं लिखा। पिछले दो खतों में हमने उस पुराने जमाने पर एक नजर डाली थी जिसका हम अपने खतों में चर्चा कर रहे हैं। मैंने तुम्हें पुरानी मछलियों की हड्डियों के चित्र पोस्टकार्ड भेजे थे जिससे तुम्हें खयाल हो जाय कि ये 'फॉसिल' कैसे होते हैं। मसूरी में जब तुमसे मेरी मुलाकात हुई थी तो मैंने तुम्हें दूसरे किस्‍म के 'फॉसिल' की तस्वीरें दिखाई थीं।

पुराने रेंगनेवाले जानवरों की हड्डियों को खास तौर से याद रखना। सांप, छिपकली, मगर और कछुवे वगैरह जो आज भी मौजूद हैं, रेंगनेवाले जानवर हैं। पुराने जमाने के रेंगनेवाले जानवर भी इसी जाति के थे पर कद में बहुत बड़े थे और उनकी शक्ल में भी फर्क था। तुम्हें उन देव के-से जंतुओं की याद होगी जिन्हें हमने साउथ केन्सिगटन के अजायबघर में देखा था। उनमें से एक तीस या चालीस फुट लंबा था। एक किस्म का मेढक भी था जो आदमी से बड़ा था और एक कछुवा भी उतना ही बड़ा था। उस जमाने में बड़े भारी-भारी चमगादड़ उड़ा करते थे और एक जानवर जिसे इगुआनोडान कहते हैं, खड़ा होने पर वह एक छोटे-से पेड़ के बराबर होता था।

तुमने खान से निकले हुए पौधे भी पत्थर की सूरत में देखे थे। चट्टानों में 'फर्न' और पत्तियों और ताड़ों के खूबसूरत निशान थे।

रेंगनेवाले जानवरों के पैदा होने के बहुत दिन बाद वे जानवर पैदा हुए जो अपने बच्चों को दूध पिलाते हैं। ज्यादातर जानवर जिन्हें हम देखते हैं, और हम लोग भी, इसी जाति में हैं। पुराने जमाने के दूध पिलानेवाले जानवर हमारे आजकल के बाज जानवरों से बहुत मिलते थे उनका कद अक्सर बहुत बड़ा होता था लेकिन रेंगनेवाले जानवरों के बराबर नहीं। बड़े-बड़े दाँतोंवाले हाथी और बड़े डील-डौल के भालू भी होते थे।

तुमने आदमी की हड्डियाँ भी देखी थीं। इन हड्डियों और खोपड़ियों के देखने में भला क्या मजा आता। इससे ज्यादा दिलचस्प वे चकमक के औजार थे जिन्हें शुरू जमाने के लोग काम में लाते थे।

मैंने तुम्हें मिस्र के मक़बरों और ममियों की तस्वीरें भी दिखाई थीं। तुम्हें याद होगा इनमें से बाज बहुत खूबसूरत थीं। लकड़ी की ताबूतों पर लोगों की बड़ी-बड़ी कहानियाँ लिखी हुई थीं। थीब्स के मिस्र मक़बरों की दीवारों की तस्वीरें बहुत ही खूबसूरत थीं।

तुमने मिस्र के थीब्स नामी शहर में महलों और मन्दिरों के खंडहरों की तस्वीरें देखी थीं। कितनी बड़ी-बड़ी इमारतें और कितने भारी-भारी खंभे थे। थीब्स के पास ही मेमन की बहुत बड़ी मूर्ति है। ऊपरी मिस्र में कार्नक के पुराने मंदिरों और इमारतों की तस्वीरें भी थीं। इन खंडहरों से भी तुम्हें कुछ अंदाजा हो सकता है कि मिस्र के पुराने आदमी मेमारी के काम में कितने होशियार थे। अगर उन्हें इंजीनियरी का अच्छा ज्ञान न होता तो वे ये मंदिर और महल कभी न बना सकते।

हमने सरसरी तौर पर पीछे लिखी हुई बातों पर एक नजर डाल ली। इसके बाद के खत में हम और आगे चलेंगे।

आर्यों का हिंदुस्तान में आना

अब तक हमने बहुत ही पुराने जमाने का हाल लिखा है। अब हम यह देखना चाहते हैं कि आदमी ने कैसे तरक्‍की की और क्या-क्या काम किए। उस पुराने जमाने को इतिहास के पहले का जमाना कहते हैं, क्योंकि उस जमाने का हमारे पास कोई सच्चा इतिहास नहीं है। हमें बहुत कुछ अंदाज से काम लेना पड़ता है। अब हम इतिहास के शुरू में पहुँच गए हैं।

पहले हम यह देखेंगे कि हिंदुस्तान में कौन-कौन-सी बातें हुईं। हम पहले ही देख चुके हैं कि बहुत पुराने जमाने में मिस्र की तरह हिंदुस्तान में भी सभ्यता फैली हुई थी। रोजगार होता था और यहाँ के जहाज हिंदुस्तानी चीजों को मिस्र, मेसोपोटैमिया और दूसरे देशों को ले जाते थे। उस जमाने में हिंदुस्तान के रहनेवाले द्रविड़ कहलाते थे। ये वही लोग हैं जिनकी संतान आजकल दक्षिणी हिंदुस्तान में मद्रास के आसपास रहती हैं।

उन द्रविड़ों पर आर्यों ने उत्तर से आ कर हमला किया, उस जमाने में मध्‍य एशिया में बेशुमार आर्य रहते होंगे। मगर वहाँ सब का गुजारा न हो सकता था इसलिए वे दूसरे मुल्कों में फैल गए। बहुत-से ईरान चले गए और बहुत-से यूनान तक और उससे भी बहुत पश्चिम तक निकल गए। हिंदुस्तान में भी उनके दल के दल कश्मीर के पहाड़ों को पार करके आए। आर्य एक मजबूत लड़नेवाली जाति थी और उसने द्रविड़ों को भगा दिया। आर्यों के रेले पर रेले उत्तर-पश्चिम से हिंदुस्तान में आए होंगे। पहले द्रविड़ों ने उन्हें रोका लेकिन जब उनकी तादाद बढ़ती ही गई तो वे द्रविड़ों के रोके न रुक सके। बहुत दिनों तक आर्य लोग उत्तर में सिर्फ अफगानिस्तान और पंजाब में रहे। तब वे और आगे बढ़े और उस हिस्से में आए जो अब संयुक्त प्रांत कहलाता है, जहाँ हम रहते हैं। वे इसी तरह बढ़ते-बढ़ते मध्‍य भारत के विंध्‍य पहाड़ तक चले गए। उस जमाने में इन पहाड़ों को पार करना मुश्किल था क्योंकि वहाँ घने जंगल थे। इसलिए एक मुद्दत तक आर्य लोग विंध्‍य पहाड़ के उत्तर तक ही रहे। बहुतों ने तो पहाड़ियों को पार कर लिया और दक्षिण में चले गए। लेकिन उनके झुंड के झुंड न जा सके इसलिए दक्षिण द्रविड़ों का ही देश बना रहा।

आर्यों के हिंदुस्तान में आने का हाल बहुत दिलचस्प है। पुरानी संस्कृत किताबों में तुम्हें उनका बहुत-सा हाल मिलेगा। उनमें से बाज किताबें जैसे वेद उसी जमाने में लिखी गयी होंगी। ऋग्वेद सबसे पुराना वेद है और उससे तुम्हें कुछ अंदाजा हो सकता है कि उस वक्त आर्य लोग हिंदुस्तान के किस हिस्से में आबाद थे। दूसरे वेदों से और पुराणों और दूसरी संस्कृत की पुरानी किताबों से मालूम होता है कि आर्य फैलते चले जा रहे थे। शायद इन पुरानी किताबों के बारे में तुम्हारी जानकारी बहुत कम है। जब तुम बड़ी होगी तो तुम्हें और बातें मालूम होंगी। लेकिन अब भी तुम्हें बहुत-सी कथाएँ मालूम हैं जो पुराणों से ली गई हैं। इसके बहुत दिनों बाद रामायण लिखी गई और उसके बाद महाभारत।

इन किताबों से हमें मालूम होता है कि जब आर्य लोग सिर्फ पंजाब और अफगानिस्तान में रहते थे, तो वे इस हिस्से को ब्रह्मावर्त कहते थे। अफगानिस्तान को उस समय गांधार कहते थे। तुम्हें महाभारत में गांधारी का नाम याद है। उसका यह नाम इसलिए पड़ा कि वह गांधार या अफगानिस्तान की रहनेवाली थी। अफगानिस्तान अब हिंदुस्तान से अलग है लेकिन उस जमाने में दोनों एक थे।

अब आर्य लोग और नीचे, गंगा और जमुना के मैदानों में आए, तो उन्होंने उत्तरी हिंदुस्तान का नाम आर्यावर्त रखा।

पुराने जमाने की दूसरी जातियों की तरह वे भी नदियों के किनारे पर बसे शहरों में ही आबाद हुए। काशी या बनारस, प्रयाग और बहुत से दूसरे शहर नदियों के ही किनारे हैं।

हिंदुस्तान के आर्य कैसे थे?

आर्यों को हिंदुस्तान आए बहुत जमाना हो गया। सबके सब तो एक साथ आए नहीं होंगे, उनकी फौजों पर फौजें, जाति पर जाति और कुटुम्ब पर कुटुम्ब सैकड़ों बरस तक आते रहे होंगे। सोचो कि वे किस तरह लंबे काफिलों में सफर करते हुए, गृहस्थी की सब चीजें गाड़ियों और जानवरों पर लादे हुए आए होंगे। वे आजकल के यात्रियों की तरह नहीं आए। वे फिर लौट कर जाने के लिए नहीं आए थे। वे यहाँ रहने के लिए या लड़ने और मर जाने के लिए आए थे। उनमें से ज्यादातर तो उत्तर-पश्चिम की पहाड़ियों को पार करके आए; लेकिन शायद कुछ लोग समुद्र से ईरान की खाड़ी होते हुए आए और अपने छोटे-छोटे जहाजों में सिंधू नदी तक चले गए।

ये आर्य कैसे थे? हमें उनके बारे में उनकी लिखी हुई किताबों से बहुत-सी बातें मालूम होती हैं। उनमें से कुछ किताबें, जैसे वेद, शायद दुनिया की सबसे पुरानी किताबों में से हैं। ऐसा मालूम होता है कि शुरू में वे लिखी नहीं गई थीं। उन्हें लोग जबानी याद करके दूसरों को सुनाते थे। वे ऐसी सुंदर संस्कृत में लिखी हुई हैं कि उनके गाने में मजा आता है। जिस आदमी का गला अच्छा हो और वह संस्कृत भी जानता हो उसके मुँह से वेदों का पाठ सुनने में अब भी आनंद आता है। हिंदू वेदों को बहुत पवित्र समझते हैं। लेकिन 'वेद' शब्द का मतलब क्या? इसका मतलब है 'ज्ञान' और वेदों में वह सब ज्ञान जमा कर दिया गया है जो उस जमाने के ऋषियों और मुनियों ने हासिल किया था। उस जमाने में रेलगाड़ियाँ, तार और सिनेमा न थे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उस जमाने के आदमी मूर्ख थे। कुछ लोगों का तो यह खयाल है कि पुराने जमाने में लोग जितने अक्लमंद होते थे, उतने अब नहीं होते। लेकिन चाहे वे ज्यादा अक्लमंद रहे हों या न रहे हों उन्होंने बड़े मार्के की किताबें लिखीं जो आज भी बड़े आदर से देखी जाती हैं। इसी से मालूम होता है पुराने जमाने के लोग कितने बड़े थे।

मैं पहले ही कह चुका हूँ कि वेद पहले लिखे न गए थे। लोग उन्हें याद कर लिया करते थे और इस तरह वे एक पुश्त से दूसरी पुश्त तक पहुँचते गए। उस जमाने में लोगों की याद रखने की ताकत भी बहुत अच्छी रही होगी। हममें से अब कितने आदमी ऐसे हैं जो पूरी किताबें याद कर सकते हैं?

जिस जमाने में वेद लिखे गए उसे वेद का जमाना कहते हैं। पहला वेद ऋग्वेद हैं। इसमें वे भजन और गीत हैं जो पुराने आर्य गाया करते थे। वे लोग बहुत खुशमिजाज रहे होंगे, रूखे और उदास नहीं। बल्कि जोश और हौसले से भरे हुए। अपनी तरंग में वे अच्छे-अच्छे गीत बनाते थे और अपने देवताओं के सामने गाते थे।

उन्हें अपनी जाति और अपने आप पर बड़ा गरूर था। आर्य शब्द के माने हैं शरीफ आदमी या ऊँचे दरजे का आदमी। और उन्हें आजाद रहना बहुत पसंद था। वे आजकल की हिंदुस्तानी संतानों की तरह न थे जिनमें हिम्मत का नाम नहीं और न अपनी आजादी के खो जाने का रंज है। पुराने जमाने के आर्य मौत को गुलामी या बेइज्जती से अच्छा समझते थे।

वे लड़ाई के फन में बहुत होशियार थे। और कुछ-कुछ विज्ञान भी जानते थे। मगर खेती-बाड़ी का ज्ञान उन्हें बहुत अच्छा था। खेती की कद्र करना उनके लिए स्वाभाविक बात थी। और इसलिए जिन चीजों से खेती को फायदा होता था उनकी भी वे बहुत कद्र करते थे। बड़ी-बड़ी नदियों से उन्हें पानी मिलता था इसलिए वे उन्हें प्यार करते थे और उन्हें अपना दोस्त और उपकारी समझते थे। गाय और बैल से भी उन्हें अपनी खेती में और रोजमर्रा के कामों में बड़ी मदद मिलती थी, क्योंकि गाय दूध देती थी जिसे वे बड़े शौक से पीते थे। इसलिए वे इन जानवरों की बहुत हिफाजत करते थे और उनकी तारीफ के गीत गाते थे। उसके बहुत दिनों के बाद लोग यह तो भूल गए कि गाय की इतनी हिफाजत क्यों की जाती थी और उसकी पूजा करने लगे। भला सोचो तो इस पूजा से किसका क्या फायदा था। आर्यों को अपनी जाति का बड़ा घमंड था और इसलिए वे हिंदुस्तान की दूसरी जातियों में मिल-जुल जाने से डरते थे। इसलिए उन्होंने ऐसे कायदे और कानून बनाए कि मिलावट न होने पाए। इसी वजह से आर्यों को दूसरी जातियों में विवाह करना मना था। बहुत दिनों के बाद इसी ने आजकल की जातियाँ पैदा कर दीं। अब तो यह रिवाज बिल्कुल ढोंग हो गया है। कुछ लोग दूसरों के साथ खाने या उन्हें छूने से भी डरते हैं। मगर यह बड़ी अच्छी बात है कि यह रिवाज कम होता जा रहा है।

रामायण और महाभारत

वेदों के जमानें के बाद काव्यों का जमाना आया। इसका यह नाम इसलिए पड़ा कि इसी जमानें में दो महाकाव्य, रामायण और महाभारत लिखे गए, जिनका हाल तुमने पढ़ा है। महाकाव्य पद्य की उस बड़ी पुस्तक को कहते हैं, जिसमें वीरों की कथा बयान की गई हो।

काव्यों के जमाने में आर्य लोग उत्तरी हिंदुस्तान से विंध्‍य पहाड़ तक फैल गए थे। जैसा मैं तुमसे पहले कह चुका हूँ इस मुल्क को आर्यावर्त कहते थे। जिस सूबे को आज हम 'संयुक्त प्रदेश कहते हैं वह उस जमाने में मध्‍य प्रदेश कहलाता था, जिसका मतलब है बीच का मुल्क। बंगाल को बंग कहते थे।

यहाँ एक बड़े मजे की बात लिखता हूँ जिसे जान कर तुम खुश होगी। अगर तुम हिंदुस्तान के नक्शे पर निगाह डालो और हिमालय और विंध्‍य पर्वत के बीच के हिस्से को देखो, जहाँ आर्यावर्त रहा होगा तो तुम्हें वह दूज के चाँद के आकार का मालूम होगा। इसीलिए आर्यावर्त को इंदु देश कहते थे। इंदु चाँद को कहते हैं।

आर्यों को दूज के चाँद से बहुत प्रेम था। वे इस शक्ल की सभी चीजों को पवित्र समझते थे। उनके कई शहर इसी शक्ल के थे जैसे बनारस। मालूम नहीं तुमने खयाल किया है या नहीं, कि इलाहाबाद में गंगा भी दूज के चाँद की-सी हो गई है।

यह तो तुम जानती ही हो कि रामायण में राम और सीता की कथा और लंका के राजा रावण के साथ उनकी लड़ाई का हाल बयान किया गया है। पहले इस कथा को वाल्मीकि ने संस्कृत में लिखा था। बाद को वही कथा बहुत-सी दूसरी भाषाओं में लिखी गई। इनमें तुलसीदास का हिंदी में लिखा हुआ रामचरितमानस सबसे मशहूर है।

रामायण पढ़ने से मालूम होता है कि दक्खिनी हिंदुस्तान के बंदरों ने रामचन्द्र की मदद की थी और हनुमान उनका बहादुर सरदार था। मुमकिन है कि रामायण की कथा आर्यों और दक्खिन के आदमियों की लड़ाई की कथा हो, जिनके राजा का नाम रावण रहा हो। रामायण में बहुत-सी सुंदर कथाएँ हैं; लेकिन यहाँ मैं उनका जिक्र न करूँगा, तुमको खुद उन कथाओं को पढ़ना चाहिए।

महाभारत इसके बहुत दिनों बाद लिखा गया। यह रामायण से बहुत बड़ा ग्रंथ है। यह आर्यों और दक्खिन के द्रविड़ों की लड़ाई की कथा नहीं; बल्कि आर्यों के आपस की लड़ाई की कथा है। लेकिन इस लड़ाई को छोड़ दो, तो भी यह बड़े ऊँचे दरजे की किताब है जिसके गहरे विचारों और सुंदर कथाओं को पढ़ कर आदमी दंग रह जाता है। सबसे बढ़ कर हम सबको इसलिए इससे प्रेम है कि इसमें वह अमूल्य ग्रन्थ रत्न है जिसे भगवद्गीता कहते हैं।

ये किताबें कई हजार बरस पहले लिखी गई थीं। जिन लोगों ने ऐसी-ऐसी किताबें लिखीं वे जरूर बहुत बड़े आदमी थे। इतने दिन गुजर जाने पर भी ये पुस्तकें अब तक जिंदा हैं, लड़के उन्हें पढ़ते हैं और सयाने उनसे उपदेश लेते हैं।

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