पहली विदेश यात्रा वो भी मुखौटे में (यात्रा वृत्‍तान्त) : मंगला रामचंद्रन

Pehli Videsh Yatra Vo Bhi Mukhaute Mein (Travelogue in Hindi) : Mangala Ramachandran

मार्च 2018 में बेटा अनिरूद्ध और बहू मर्लिना कैनेडा शिफ्ट हो गये। मेरे पतिदेव और मैं अब तक इन लोगों के कारण व्यस्त भी रहते थे और पोती अनन्या का लगातार सानिध्य पाकर खुश थे। अचानक अनन्या के चले जाने पर एक खाली पन समा गया था। अनिरूद्ध ने कहा था कि दो-तीन वर्षों में वो लोग जम जायें फिर हम दोनों को ले जायेगा। हमारी अनिच्छा से बनते- बिगड़ते चेहरे को देखकर दोनों बोले, एक बार आकर देख लेना फिर कुछ तय करेगें। फरवरी 2019 में हालात् ने ऐसी करवट बदली कि पतिदेव रहे नहीं और बेटा तुरंत आ नहीं सकता था। दोनों बेटियों चंद्रिका-पूर्णिमा ने ही अपने पिताश्री का अंतिम संस्कार और अन्य सारे कार्य संपादित किये।

पतिदेव की प्रथम बरसी के काफी पहले से ही ये तय होने लगा कि बरसी पर अनिरूद्ध आयेगा और मुझे ले जायेगा। प्रक्रिया प्रारंभ हो गई, पूर्णिमा ने बैंगलुरू में वीसा बनवा दिया। यात्रा से संबंधित और बरसी की तैयारी में कुछ न कुछ कार्य प्रतिदिन होता रहता। सन् 2020 फरवरी का वो दिन भी आ गया। तीनों बच्चे इस हेतु आये और घर में मानों खुशियों की लहर दौड़ गई। कभी-कभी लगता कि ये बाहर से आयेगें, हाथ मे या तो गर्म जलेबी, समोसे/कचौड़ी का पैकेट होगा या आईस्क्रीम पैक। बहुत शौक था खिलाने का, बेटियां आती तो उत्साह से भर जाते थे। स्थिति समझ कर आंखों के सामने आये आभासी चित्र को सायास हटाती। सायास इसलिए कि उनमें खोये रहने से आगे का कार्य सम्पन्न होने में दिक्कत हो जाती। सारे कार्य संतोषजनक तरीके से सम्पन्न होते जा रहे थे। यात्रा की तैयारियां भी पूर्ण हो रही थी।

बड़ी बेटी ने लौटने के पहले मुझे कुछ सर्जिकल मास्क दिए। खबरों में चीन के वुहान से दूसरे देशों में फैलता वायरस चौंकाने लगा था। उसने कहा कि अंतर राष्ट्रीय हवाई अड्डों और उड़ानों में पहनना पड़ेगा। मास्क लगाया जरूर पर उसमे बसी दवाई की बू और मोटे कपड़े के कारण सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। जब देखा कि मुश्किल से दो प्रतिशत लोग ही मास्क लगाये हुए हैं तो उतार कर हैंड बैग में रख लिया। ये कहां पता था कि आगे मुखौटे में ही यात्रा होगी, जैन मुनियों और साध्वियों की तरह।

यात्रायें नये-नये अनुभव कराती है, कुछ न कुछ नया सीखाती है, ये तो सभी मानते हैं। कुछ यात्रायें अविस्मरणीय बन जाती हैं, जब कि कुछ कड़वी यादों से जुड़ जाती हैं। जब तक इंसान के हाथ-पैर सलामत रहते हैं, स्वास्थ्य अच्छा रहता है तो यात्राओं का आनंद कुछ अलग स्तर पर हो जाता है। पर अपनी शारीरिक असमर्थता और महामारी की तालाबंदी के बाद भी जो अन्वेषण मैं कर पाई वो कम नहीं है। शायद ताजिन्दगी याद रखने और याद रहने योग्य है।

फरवरी का दूसरा हफ्ता होते ना होते बेटा मुझे लेकर इंदौर से निकल गया। बैंगलोर में बेटी के यहां चार दिन रूक कर वहां से उड़ान थी। पहले फैंक्रफर्ट (जर्मनी) में कुछ घंटों का पड़ाव और फिर वहां से टोरोंटो (कैनेडा)। लंबी थकाऊ, बेमन से की यात्रा। बेमन से इसलिए किएक उम्र के बाद शारीरिक रूप से यात्रा करना मात्र थकावट वाला होता हैं। टोरंटों में घर पहुँचते ही बहू मर्लिना और पोती का खिलखिलाता चेहरा लंबी यात्रा की थकान को काफी हद तक मिटा चुका था। बेटा अनिरूद्ध हर समय एक अच्छे गाईड की तरह किसी भी जगह का इतिहास, वर्तमान जानकारी आदि देता रहा। एयरपोर्ट से घर जाते हुए सांध्य काल और मौसम का मिला-जुला धुंधलापन था। उस समय ये अंदाज ही नहीं था कि मौसम के कितने अजूबे, कितनी खूबसूरती आंखों के सामने आने जाने वाली हैं। अगले तीन-चार दिनों तक रिमझिम बारिश और सांवले बादल के झुरमुट में सूर्य भगवान के दर्शन एकदम नदारद थे। घर सेन्ट्रल हीटींग सिस्टम से गर्म रहता है तो मात्र एक स्वेटर पहन कर काम चल रहा था। पर जब तापमान को -13, -10 आदि पाया तो शरीर मे सिहरन होने लगी। खिड़की के कांच और बालकनी के शटर को जरा सा हटा कर महसूस करने की कोशिश मे ज्यों ही ठंडी हवा ने चेहरे को छूना चाहा और गाल सुन्न! तापमान की असलियत का प्रमाण।

अगले सप्ताह खिली धूप देख कर मेरे चेहरे पर स्वयंमेव ही एक स्मित मुस्कान फैल गई। बेटा बंद शटर के पीछे से ही, कांच में से पीछे की घाटी, उसमें स्थित लघुवन एवं उसमे जाती नागिन की तरह बलखाती पक्की पगडंडियां दिखा रहा था। उत्साह मे आकर शटर को जरा सा हटाया कि धूप की गर्मी का आनंद लिया जाये। और ये क्या ! तेज चलती ठंडी हवा के झांेके ने मुझे जिस तरह चौंकाते हुए सिहराया और वों तीनों शरारत और मस्ती में खिलखिला पड़े। अपनी अज्ञानता पर पहली बार कोफ्त नहीं हुई और खुल कर हंस पड़ी। यह भी तो किसी मृग मरिचिका से कम नहीं है। रेगिस्तान में सुनहरे-चमकते रेत में जिस तरह ‘‘नखलिस्तान‘‘ पाते हैं वैसे ही धूप देखकर मैं धोखा खा गई। बालकनी से दिखती उस घाटी को निहारने का कम नियमित हो गया। वहां एक बेंच उसके ऊपर एक लाल छत जो वहां बैठने वालों को धूप और हलकी बारिश से बचाती होगी। छत की रंग का खुलासा हुआ लगभग तीन सप्ताह बाद, जब उस पर जमी बर्फ पूरी तरह पिघल गई सड़कों पर दोनों और बर्फ की पहाड़ी सी बन गई थी, जिसे वहां के नियत कर्मचारी लगातार सड़कों से ‘‘शोवेल‘‘ से हटाते रहते थे। वरना गाड़ियों और पैदल जाने वालों को भी फिसलने का डर रहता है।

फरवरी के आखिरी सप्ताह में बाहर निकलना पड़ा वो भी ‘मॉल‘ के लिए, जहां जाने से मैं बचती रहती हूँ। भारत के गर्म कपड़े यहां काम नहीं आ रहे थे सो मोटा जैकेट लेना ही पड़ा। आगे जाकर उसे पहन कर बाहर टोरंटो दर्शन तो हुआ ही पर एक जो सबसे बड़ा लाभ मिला वो था, उसे पहन कर बालकनी में ठंड को धता बता कर खड़े हो पाना और घाटी को लंबे समय तक देख पाना। उस वन प्रांत और पगडंडियों को निहारना और उसमें खो जाना प्रिय शगल हो गया। कभी स्व. भवानी प्रसाद मिश्र की सतपुड़ा के घने जंगल की पंक्तियां याद आती -

सतपुड़ा के घने जंगल, नींद में डूबे हुए से,

ऊँघते अनमने जंगल, झाड़ ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आंख मींचे, घास चुप है कास चुप है,

मूक शाल, पलाश चुप हैं, बन सके तो धंसों इनमें,
धंस न पाती हवा जिनमें।। सतपुड़ा ......................

ये वृक्ष शाल के हैं या नहीं पता नहीं, पलाश भी वहां नदारद है। वो तो भारत की अग्निशिखा की तरह कुछ महीनों की शान है।

स्कूल में पढ़ाई विलियम वर्डस्वर्थ की ‘डॉफोडिल‘ की पंक्तियां कभी याद आती -

I wandered lonely as a cloud
That floats on high over valley and Hills.
When all at once I saw a crowd,
A host of golden daffodils.

1802 में अपने छोटे से गांव ग्रासमीर (Grasmere) में अपनी बहन डोरोथी के साथ जंगलों के बीच घूमते हुए उनके मन में ये भाव आये।

ये तो पता नहीं कि इस वन प्रांत में अगर मैं चल पाती तो मुझे ऐसा अनुभव होता या नहीं। पर प्राकृतिक सुंदरता से मोहित होकर एक अच्छे पाठक की तरह ये सारी बातें, अनुभव दिमाग में फुदकते रहते। एक पंक्ति मेरे जेहन में गाहे-बगाहे कभी भी कहीं भी खदबदाती रहा करती थी, जब लोगों को जीवन की आपाधापी में प्रकृति से दूर होते देखती। सामने सुंदर, आंखों को शीतलता प्रदान करती प्रकृति पसरी होती है पर आंखे उठा कर देखने का समय ही नहीं है।

विलियम हेनरी डेविस (William Henery Davies) की कविता Leisure.

What is this life if full of care
We have no time to stand & stare.
No time to stand beneath the boughs
And stare as long as sheep or cows.
A poor life this if, full of care
We have no time to stand and stare.

एक दिन यूं ही निहारते हुए कविश्रेष्ठ स्व. सुब्रम्हणिय भारती की याद आई। जबरदस्त प्रकृति प्रेमी भारती का उम्र के सातवें पड़ाव से ये हाल था कि बादलों में बनती-बिगड़ती छबियों पर ही कविता बना लेते। ‘कुयील‘ याने कोयल पर स्वस्फूर्त कविता बहुत प्रसिद्ध हुई। मैं सोचा करती कि भारती कैनेडा आ पाते और यहां के प्राकृतिक वातावरण से रूबरू होते तो क्या लिखते ?

प्रकृति ही ऐसी ‘शै‘ है जो देश-विदेश, प्रदेशों के बीच, भाषा के बंधन, देश के बंधन कुछ नहीं जानता। बस प्रकृति प्रेमी के मन से उद्गार फूट पड़ते हैं।

कैनेडा में पेड़ों पर तब तक काफी बर्फ बची हुई थी जिसकी एक अद्भुत-अद्वितीय रंगत आगे उजागर होने वाली थी। यहां का राष्ट्रीय पेड़ ‘मेपल‘ जिसकी पत्तियों पंचकोनी, बहुत सुंदर दिखती हैं। बर्फ गिरनी बंद हो जाये तब नई पंचकोनी पत्नियां (चमकती) का एक हरियाला रूप होता है। वहीं पत्तियां आगे ग्रीष्म में जो एक निराली बैंगनी-कत्थई रंग बदल कर दिखती है वो निश्चित ही देखने वाले की आंखों को मजबूर कर देती हैं कि आगे बढ़ने से पहले कुछ ठिठक कर निहारों। बर्फ या स्नो का गिरना तो लगभग रोज़ की बात थी। कभी-कभी हल्की-हल्की मानों रूई हो, कभी हवा के साथ तूफानी अंदाज में। कभी रात को इतनी बर्फ पड़ती कि सुबह गैलरी में छः-आठ इंच जमी मिलती। धूप आई तो कुछ पिघल कर कम हुई, वरना उसी के ऊपर और बर्फ गिरती गई। मार्च भी आ गया और तय हुआ कि शहर का एक बड़ा सा चक्कर लगा लिया जाये। इस राउंड में ओंटारिओं झील जिसके उत्तरी और पश्चिमी दिशा में टोरंटो, किंग्सटन और हैमिलटन शहर हैं और दक्षिण में अमेरिका का रोचेस्टर है। इससे उसकी विशालता का अंदाज़ लगा सकते हैं। जब झील के पास खड़े हुए तो लगा समुद्र है जिसका दूसरा किनारा दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा था।

सी.एन.टॉवर (Canadian National Tower) जो कि 1975 में बना था, और 2007 तक दुनिया का सबसे ऊँचा बुर्ज टोरंटो के डाउनटॉउन में है। इसे आधुनिक वास्तुकला के सात अजूबों में से एक माना जाता है। कैनेडा की पहचान इसी से होती है। इनके अलावा कुछ पार्क व बड़े-बड़े मॉल और मार्ट कार से बिना उतरे बाहर से देखते हुए गये। इसमें भारतीयों के लिए पंचवटी और कुछ अन्य और भी स्टोर्स हैं जहां आपको अपने काम का सब कुछ मिल जायेगा। रोटी, तरह-तरह के परांठे (फ्रोज़न) और हल्दी राम के नमकीन और मीठे मिल जायेगा। एक गुजराती सज्जन का बड़ी स्टोर हैं जहां आपको राजस्थान-गुजरात के अलावा और भी बहुत सी काम की चीजें मिल जायेगी। जितने भी इंडियन स्टोर्स हैं ये ताजी मिठाईयां भी बनाते हैं, जलेबी, लड्डू और इमरती से लेकर और भी बहुत कुछ।

आनंद मिश्रित आश्चर्य तो अगले सप्ताह मिला। टोरंटो की लाइब्रेरी, आंखों के सामने मानो तिलिस्मी संसार। इतना विशाल कि अपने विस्तार और धूल विहिन वृहद संग्रह से मुझे अभिभूत कर गया। ऐसी व्यवस्थित लाइब्रेरी मैंने चेनै की अन्ना सेनटेनरी लाइब्रेरी के चार पांच मंजिला वृहद पुस्तकालय में और कुछ-कुछ चेनै कोनीमारा लाइब्रेरी में देखा। वहीं बैठ कर पढ़ने और अध्ययन करने के लिये एक बड़ा हॉल सारी सुविधाओं से युक्त। बच्चों के लिए किताबें पढ़ने व उनके क्रिया कलापों के लिए एक अलग हिस्सा। शांति इतनी कि आप सांस लेना भूल जायें कि कहीं किसी को नागवार न लगे। अंग्रेजी, फ्रेंच भाषा के अलावा हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तके और पत्रिकाओं थी। एक सदस्य के कार्ड पर पचास, जी हां पचास। पुस्तकें ला सकते हैं। पर मैं इतना छांट नहीं सकी। फिर भी हिंदी, अंग्रेजी और तमिल की काफी कुछ इकठ्ठी कर ली। अपने इस खजाने से लेस होकर, गदगद भरे हुए और प्रसन्नचित्त मन से और ढेरों पुस्तकों से लेस घर में प्रवेश किया।

अंधविश्वासी ना होते हुए भी मन को हर घटना या दृष्टान्त के बाद स्वयं को अत्यंत भाग्यवान मानती रही हूँ। पुस्तके लाने के बाद उन्हे तरतीब से याने क्रमवार कौन सी पहले पढ़नी है, फिर कौन सी इत्यादि करते हुए आनंद में गोते लगाते चार-छः दिन हो गये। तब तक दिसम्बर में दस्तक दिए, कोरोना वायरस का ऐसा विस्तार हुआ कि ‘लॉक डाऊन‘ शब्द समस्त विश्व का सबसे अधिक जाना पहचाना शब्द हो गया। शुरूआत में इसकी तीव्रता और अंजाम का अंदाजा नहीं हुआ। लालची की तरह पुस्तकों को पढ़-पढ़ कर समाप्त करने का सोच रखा था। उस विशाल पुस्तकालय में अपना दिल छोड़ आई थी कि जल्दी ही दुबारा लौट कर आऊँगी। पर मेरे उतावलेपन पर ‘ब्रेक‘ ही लग गया। लॉकडाउन के इस लंबे समय में इन किताबों ने जो साथ दिया उसके बाद भाग्यशाली होने को क्या बचा था।

अप्रैल-मई के महिने भी निकलने लगे। कैनेडा में ये चंद महीने ही बड़े खुशनुमा माने जाते हैं। लोग इन महिनों में धूप का पूरा-पूरा आनंद उठाने के लिए बाहर पार्क में बार्बेक्यू करते फूल-पौधे उगा कर बागवानी करते और पिकनिक मनाते। सप्ताहांत में कोई घर में रहता ही नहीं है। धूप सेंकना अपने-अपने नाव साथ ले जाते और बोटिंग करते। याने प्रकृति के साथ अधिक से अधिक वक्त बिताते। बाद में तो लंबे समय तो घर में ही अधिकांश रहना पड़ता है। जरूरी कामों के लिए भी स्नो जैकेट, स्नो शू या बूट पहन कर दास्ताने पहन कर जाना सरल नही होता। इन महिनों में सबसे बड़ी खुशी तो स्वेटर पहनने की मुसीबत नहीं थी। बालकनियों और घरों के बाहर बगीचों में जिस चाव से फूल उगाते वो देखते ही बनता है। मिट्टी और शुद्ध जैविक खाद के सम्मिश्रण से बीज हों या पौधे इतनी जल्दी और इतने तंदुरूस्त उगते। फूल भी बड़े-बड़े और गहरी रंगत वाले आप मंत्रमुग्ध हो देखते रह जायेगें।

अभी तक दिमाग में यही था कि बस लॉक डाउन खुल जायेगा और पहले की तरह सब कुछ सामान्य हो जायेगा। पर बीतते समय के साथ-साथ आगे के कठिन समय का सच समझ आ रहा था। सबसे पहले तो वीसा की अवधि बढ़ाने के लिए आवेदन देना था। तब जाकर स्थिति की गंभीरता का भान हुआ। तीन महीनों की तैयारी से गई थी और अबः इस अब का क्या और कब अंत होगा इसकी परिकल्पना ही नहीं हो पा रही थी। अब किताबों को संभाल कर पढ़ने लगी थी और बाद में ऑनलाईन ‘बॉरो‘ कर के ही पढ़ने लगी। बेटा-बहू वर्क फ्रॉम होम करने लगे थे। नया अनुभव रास आने लगा था। एक छत के नीचे, लंबे समय तक, घर में ही, चारों एक साथ शायद पहली बार रहे। हँसी मजाक में कहते, देखा आपके आने का जष्न मना रहे हैं। मुझे भी उनकी पसंद का खाना और खास कर अनन्या के लिए कुछ-कुछ बनाने में मजा आने लगा। लगा कि हम सब इन्दौर में ही हैं। इन्दौर में सबने साथ मिलकर, बैठकर तसल्ली से खाया हो याद नहीं आता। बचपन के ग्रीष्मावकाश का समय याद आ गया। समय हंसी-खुशी बीत रहा था पर बीच-बीच महामारी का पूरे विश्व पर जो असर पड़ रहा था उससे चिंता भी होने लगी थी। एक अनिश्चितता का माहौल बन गया था। भारत और खास कर अपने प्रदेश और उसमें भी इन्दौर की खबरों का सुनकर मन उदास हो रहा था। महानगरों से अपने प्रदेशों को लौटते मजदूरों की नासमझी और दुखभरी कहानियों को देखकर मन द्रवित हो जाता। कुछ ठोस मदद न कर पाने का मलाल भी होता। इतनी दूर से, इस उम्र में शारीरिक रूप से क्या मदद कर सकती थी पर दूसरे तरीके से भरसक मदद की। पर फिर भी यह समुद्र में बूंद की तरह ही थी। महामारी ने कितने प्राण हर लिए, लाखों को असहनीय शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक क्षति पहुँचाई इसका आकलन सुबह-शाम टी.वी. के पर्दे पर देख-देख कर मन मसोस कर रह जाते।

कुछ तकलीफों और छोटी-मोटी परेशानियों के बीच अगर आपको अपने छिहत्तरवें जन्मदिन पर एक नायाब तोहफा मिले तो क्या आप प्रसन्नता से फूल नहीं जायेगें? बेटे अनिरूद्ध ने कुछ ऐसा ही अद्भूत काम किया जिसे मैं ताजिन्दगी याद करते हुए, जुगांली करते हुए बिता सकती हूँ। उसने अपने हाथ से पूरा खाना ही नहीं बनाया मीठे में सूखे मेवे डाल कर सूजी का हलवा भी बनाया। बैठा कर ऐसे खिलाया जैसे वो मेरी मां हो। ये मुझे जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि ही लगी। जीवन के आपा धापी में क्या खोया-क्या पाया? बिना झिझक के कह सकती हूँ, तीनों बच्चों, दामादों, बहू के अलावा चारो नातियों और लाड़ली पोती का ढेर सारा प्यार पाकर डर लगने लगता है। आंखे मूंद कर पड़ी रहूँ तो वक्त यहीं ठहर सकता है क्या?

कैनेडा की बात हो तो उसकी प्राकृतिक संपदा का जिक्र न हो ये हो ही नहीं सकता। विश्व में वन संपदा का क्षेत्र 31 प्रतिशत है, जिसमें से 20 प्रतिशत रशिया में, और कैनेडा में 10 प्रतिशत ।

यहां 560 से भी अधिक झीलें हैं। विश्व के मीठे पानी का 20 प्रतिशत तो यहां की पांच सबसे बड़ी झीलें (ओंटारियो, सुपीरियर, हूरान, मिशिगन और ऐरी) में है। एक-एक झील का क्षेत्रफल अमेरिका के टेक्सास प्रदेश के बराबर है, जो इसकी विशालता का वर्णन है। अभी तक तो यही सुना था ‘तालों में ताल भोपाल का ताल‘। क्या करूँ हर मौक पर अपने प्रदेश का कुछ न कुछ याद आ ही जाता। यहां आप कितनी ऊँची बिल्डिंग में रहते हों नल में पानी स्वयंमेव ही आते रहता है, वो भी ठंडा, कुनकुना या गरम। यही नहीं नल से सीधे पीने का पानी, ना भर कर रखने की झंझट ना प्यूरिफायर लगाने की आवश्यकता।

जहां पर सदैव पानी के लिए इतने जतन करने पड़े हों, चौबीस घंटों में नल मात्र दो घंटे की अपनी उपस्थिति का एहसास कराये और पानी के इस्तेमाल में हद दर्जे की कृपणता करनीपड़ी हो, इसे विलासिता कह सकते हैं क्या? पानी की जांच प्रतिदिन एक से अधिक बार होती है और यहां के प्रधानमंत्री भी नल से आने वाले इसी पानी का सेवन करते हैं।

मुझे याद आता है कि जीवन के मूल-मंत्र पानी के लिए टिल्लू पंप किर्लोस्कर पम्प से लेकर न जाने कितने हॉर्स पावर वाले पम्प लगाने पड़े थे। फिर भी ग्रीष्म के दो महीने तो तकलीफ में ही, बल्कि चिंता में ही बीतता था। यहां जिस तरह की व्यवस्था की गई है। वास्तव में सोचने को मजबूर करती है। जिस तरह झीलों के आसपास सफाई की व्यवस्था है और उनका और वन संपदा के रख रखाव का सवाल है, उसमें दूरदर्षिता का और जनता का सम्मिलित प्रयास प्रषंसनीय है। अपने देश में नदियों की कमी नहीं थी। बावड़ी, तालाबों व अन्य प्राकृतिक स्त्रोतों की भी ऐसी कमी नहीं थी पर दूरगामी परिणामों को सोचने में चूक गये। दूसरी ओर अंधविश्वासों और कर्मकांडों में फंस कर हमने अपनी जीवन दायिनी जलाश्रयों को प्रदूषित भी कर दिया।

समय कब ठहरा है, वो तो ढलान पर पानी के बहाव की तरह, हथेली से फिसलते रेत की तरह है। लगभग चार महिने बाद असली ग्रीष्म की धूप याने गर्म धूप को महसूस करने का सुअवसर आया। ये कल्पना ही नहीं थी कि अब प्रकृति के कई रहस्यों से मेल मुलाकात होगी और मैं मंत्रबिद्ध हो उन्हें निहारा करूँगी। एक दिन शाम को भूख लग रही थी और बाहर फैली धूप देखकर सोचा खाने में देर है तो फल या बिस्किट खा लेती हूँ। पर जैसे ही मोबाईल में समय देखा तो रात के 8.30 बजे थे। सूर्य देवता इन दिनों इतने कृपालु हो गये कि रात 9.30 बजे ही विदा ले रहे थे। रोज खाना खाने बैठते हुए ऐसा महसूस होता मानों जैनियों की तरह सूर्यास्त के पहले शाम का खाना समाप्त कर रही हूँ।

यहां का आसमान अप्रत्याशित रूप से इतना स्वच्छ-साफ होता है कि जब हवाई जहाज गुजरता तो उसके लाल-नीले या कोई और रंग से फ्लाईट कौन सी है ये पता लग जाता था। सूर्यास्त के दृश्य की साक्षी तो लगभग प्रतिदिन ही रहती आई हूँ। पंचमढ़ी के धूपगढ़ से, मुंबई के जुहू-बीच से या कर्नाटक-हैद्राबाद के सूर्यास्त पाईंन्ट हो या कन्याकुमारी में डूबता सूर्य सारे दृश्यों ने लुभाया था। पर फिर भी इतने पारदर्शी-स्वच्छ -साफ पृष्ठभूमि में सूर्यास्त को देखने का अनुभव अद्भूत ही था। दृष्य में इतनी सारी परतें होती, सामने कुछ और ही रंगों का मिश्रण तो दांये-बांये कुछ अलहदा रंगों का मिश्रण। पीली-गुलाबी बैंगनी, गुलाबी-लाल। नियमित रूप से बालकनी से इन दृष्यों की साक्षी बनने से खुद को रोक नहीं पाई। उन अद्भुत दृष्यों को आंखों में भरती रहती कि जब मर्जी हो निकाल कर देख लूँ। मोबाइल पर फोटो भी लेती रहती।

अभी तो आश्चर्य मिश्रित खुशी का खजाना खुलना बाकी था। रात में नींद खुली तो कमरे के अंदर का उजाला देखकर चौंकना स्वाभाविक था। मानों पिघला सोना कमरे में फैल गया हो। गर्दन घुमाई और खिड़की पर पूरा का पूरा, अभ्यस्त हाथों से बनी गोल रोटी की तरह चंद्रमा मानों मेरा ही इंतजार कर रहा था। मुंह खुला रह गया, आंखें आनंद से खिल गई पर मुंह के शब्द मुंह में ही रह गये। चमकते हुए उस स्वर्णथाल को देखती खड़ी की खड़ी रह गई। वो वास्तव में स्वर्णथाल ही है, आज तक इतना विशाल, स्पष्ट पूर्ण चंद्र मैंने कभी नहीं देखा था। कदाचित स्वच्छ और प्रदूषण विहिन विस्तृत आकाश के कारण वो इतना साफ और बड़ा दिख रहा हो। इतनी सुंदर, अतुलनीय छबि ने मन में इस तरह सहेज कर समेट ली जो अंतिम सांस तक साथ रहेगी।

अगले दो-तीन महिने इस खुशनुमा पुनरावृत्ति को महसूस करने का मौका मिलता रहा।

अलग-अलग एहसासों में डूबे हुए, व्यस्तता का आवरण ओढ़े हुए समय निकल रहा था। बच्चों को और मुझे भी यूं लगने लगा था मानों मैं हमेशा से वहीं रहती आई हूँ। मर्लिना को ड्राइविंग और बाहर घूमने का शौक था। कई बार मुझसे पूछ चुकी थी और मेरे मना करने पर बोली - ‘आप बाहर निकल कर कुछ देखो तो सही। इतनी दूर से आकर भी बिना कुछ देखे ही रह जायेंगी।‘

आखिर एक दिन हम लोग डाउन टाउन में एक रिष्तेदार के घर गये। पूरा रास्ता मानों बहारों से लदा था। स्वतंत्र मकान हो या ऊँची बिल्डिंग, बिना फूल पौधों क बिरले ही थे। अपार्टमेन्ट में बालकनी में गमलों और लटकते बास्केट में रंग-बिरंगे फूलों से लदे, भरे इतने खूबसूरत कि लगता उन्हे निहारते ही रहो। स्वतंत्र मकान में पौधों को इतना विस्तार मिल जाता है तो उसकी रंगत की तो अलग ही शान है। ये तीन-चार महिने ही हैं जिसमें यहां के लोग अपनी बागवानी का शौक पूरा कर सकते हैं। बच्चे बड़े सब मिट्टी और प्रकृति से जुड़े रहते हैं। विला या मकानों में न कोई बागड़ ना फेन्स, इसकी हम आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

हमारे यहां सड़कों पर स्वतंत्र घूमते श्वान, सांड, गौ माता जो अपनी मर्जी से आपके बगीचे की बागड़ तोड़े, हरियाली नष्ट कर जाये या आपको रास्ते मे निकलने से ही रोकले। जहां एक अपने घर में बागवानी करता है, फूल उगाता है और कोई और सुबह उससे पहले उन फूलों को तोड़ लेता है। पूजा के नाम पर तोड़े गये ये फूल वो चोरी के मानने को तैयार ही नहीं होते। देश के जनमानस की मानसिकता और कर्म, क्रिया कलाप ही उस देश को गौरव दिला सकते हैं या उसके प्रति हेय दृष्टि से देखने को बाध्य कर सकती है। इस बाहर आने-जाने में इसी से संबंधित एक ओर तथ्य ध्यान खींचती है। सड़क के दोनों ओर कतार से पाईन के वृक्ष लगे हुए हैं। पाईन नटस, याने चिलगोज़ा से लदे हुए। और अपने हाथ के पहुँच के हद में लगे हुए। आते-जाते कोई भी उन्हे छेड़ता ही नहीं। मन में आश्चर्य के साथ इन लोगों के प्रति एक साधुभाव स्वयं ही आ जाता है।

ये बाहर जाना अगस्त में जब प्रारंभ हुआ तो पुरानी तान फिर छेड़ी जाने लगी। जब से कैनेडा आई बेटा-बहू ने जो प्लान बनाया था उसमें नियाग्रा हर ओर से शामिल था। अपने मायके अमेरिका जाते-आते में या किसी सप्ताहांत में जैेसी भी सुविधा हो। महामारी ने देशों की सरहदों को तो बांध दिया था सो वहां का वीसा बन ही नहीं पाया। उन लोगों का मन रखने और दिलासे के लिए कहती, ‘कोई बात नहीं विडियो कॉल और जूम से मिलने से भी अधिक हो जाता है, वो भी घर बैठे-बैठे।‘

‘भले ही मामा के यहां नहीं जायें पर नियाग्रा फॉल्स तो जायेगें ही। जब लौट के इन्दौर जाओगी तो जो भी सुनेगा तो हंसेगा। लोग नियाग्रा को कैनेडा की ओर से देखने खास कर आते हैं।‘

उसी बीच, कुछ समय से दुबई में रहने वाली बेटी ने कहा कि वहां ‘क्वारीनटिन‘ करने की आवष्यकता नहीं है, बस कोविद टेस्ट करवा कर ‘नो‘ का सर्टिफिकेट लेना था। मुझे ये एक सुनहरा मौका लगा कि भारत और खास कर इंदौर पहुँचने के इतने करीब हो जाऊँगी। इसका लाभ उठाना ही था। बेटे को मैंने इसके लिए तैयारी करने को कह दिया। बहुत कुछ तो बेटी ने ऑन लाईन सब करवा ही दिया। सोचा था कुछ दिन रह कर वापिस इंदौर आ जाऊँगी।

पर क्या नियाग्रा जाना रह जायेगा? नहीं जी ऐसा कैसे हो सकता है। मेरी मां जब भी लंबे समय हमारे साथ भारत में रहने आती तब अपने अलग-अलग जगहों के अनुभव सुनाया करती थीं। अपने गांव ‘कडैयम‘ (तमिलनाडु) से बंबई, अहमदाबाद फिर इन्दौर पिताजी के साथ सिलोन (श्री लंका) और अंत में विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका तक उनके ढेरों अनुभव और श्रवण करने को लालायित सिर्फ और सिर्फ मैं नौ बच्चों में से एक मैं। जब उन्होंने स्वयं के नियाग्रा यात्रा का वर्णन किया था मैं कल्पना में बहुत हद तक उसे देख पाई। तभी तो अपनी जड़ ‘कडैयम‘ के रामर नदी से जुड़ पाई और मां को केन्द्र में रख कर लंबी कहानी ‘रामर से नियाग्रा तक‘ लिख पाई। मन में एक ललक थी मां, भैया के यहां जिस कमरे में रहती थी वहां शांति से बैठूँगी और उनकी ‘अनुपस्थिति‘ को महसूस करूँगी। सो वो संभव होता नहीं दिख रहा था। नियाग्रा को उनकी आंखों से देख ही लिया था तो मन में एक दबा हुआ सा विश्वास था। जाना जरूर होगा और वहां मां का प्रतिबिंब ढूँढने का मौका अवश्य मिलेगा।

दुबई जाने की मानसिक तैयारी भी प्रारंभ हो गई थी। अगस्त के आखिरी सप्ताह में अनायास ही विश्व प्रसिद्ध नियाग्रा फॉल्स का दिन भर का कार्यक्रम बन ही गया। आराम से रास्ते में हरियाली और पानी के स्त्रोतों को देखते, खिले हुए फूलों के झुंड के झुंड अपने अंतिम चरण में थे। कभी भी उनका अस्तित्व खत्म कर के मौसम अपने मारक रंग दिखाने की तैयारी में थी। अत्यन्त सुहावना दिन था। दूर से ही कुछ-कुछ दर्शन होने लगे थे। पूरे विश्व से ही लोग थे पर साधारण दिनों में जितने लोग हुआ करते थे उसका दसवां हिस्सा भी नहीं था। महामारी ने पर्यटन को तो बहुत धक्का पहुँचाया है। मास्क पहन कर और दूरियां रख कर भी आनंद तो आ ही रहा था।

नियाग्रा फॉल्स (प्रपात) उत्तरी अमेरिका में तीन अलग-अलग प्रपातों का समूह है। अलग से इनके नाम हैं:-

अमेरिकन प्रपात, ब्राईडल वेल (याने दुल्हन का घूंघट) प्रपात और सबसे अधिक आकर्षित करने वाला जो कैनेड़ा की तरफ है - हॉर्स शू फॉल्स (इसका आकार घोड़े की नाल की तरह है)। कैनेडा के ओन्टारियो शहर में नियाग्रा नदी के पश्चिमी छोर पर है। इसके ठीक दूसरी ओर न्यूयार्क, अमेरिका है। बीच में एक पुल है जिसे पार कर दूसरी ओर जाने के लिए वीसा की जरूरत होती है। प्रपात 57 मीटर (187 फीट) ऊँचाई से गिरते हुए अदभुत दृष्य की रचना करता है। प्रपात की चौड़ाई हैरान करने वाली 670 मीटर (2,200 फीट) है। पानी 109 कि.मी प्रति घंटे की रफ्तार से गिरता है और बर्फ की तरह ठंडा होता है। यहां के माइनस तापमान में कभी-कभी जम जाता है जिसे देखने साहसी लोग सर्दी को धता बता कर भी आ जाते हैं। यह दृष्य भी खूबसूरत और मन मोहने वाला होता है।

नियाग्रा प्रपात पहुँचने से पहले रास्ते में दूर-दूर तक वाईनरी याने वाईन बनाने के लिए अंगूर, ब्लैक बेरी और ब्लैक करंट उगा कर उनसे वाईन बनाने का, लाइसेंस प्राप्त संरजाम है। काफी लंबी दूरी तक हमें एक मीठी खूशबू का एहसास होते रहता है।

नियाग्रा नदी का पानी कैनेडा और यू.एस.ए. को मिला कर लगभग 1,000,000 (दस लाख) जनसंख्या द्वारा इस्तेमाल होता है। विश्व में इन दोनों देशों की सरहदों को सबसे अधिक सुरक्षित और दोस्ताना माना जाता है। दोनों देशों के मोटर बोट पानी में चलते हैं। अमेरिका की तरफ के लोग नीले रेन-कोट-हुड में और कैनेडा गुलाबी रेनकोट में। प्रपात का वेग इतना तेज होता है कि काफी दूर तक पानीके छींटे उड़ते और ठंडी हवा से सिहर उठते हैं। मोटर बोट में बैठे लोग तो प्रपात के इतने पास से जाते हैं कि बिना बरसाती के नामुमकिन है। दोनों तरफ के लोग जब एक पाइंट पर मिलते हैं तो हर्षो उल्लास से कोलाहल सा मच जाता है, और दूर खड़े हम लोगों के चेहरे भी खुशी से खिल जाते हैं।

वहां से निकलने के पहले भर नज़र उस प्रपात को देखा। कहीं उसका फैनिल उफान तो कहीं कीमती सुंदर पन्ना का गहरा हरियाला पन लिए और कहीं पारदर्शी कांच की तरह बहता वह पानी न जाने कब से यूं ही पर्यटकों का मन बहला रहा है और ना जाने कब तक आंखों को ठंडक और दिल को तसल्ली देता रहेगा।

कैनेडा के लोग पैदल चलने और साईकिल चलाने को सदैव तत्पर रहते हैं। खास कर ग्रीष्म के तीन महिने शारीरिक श्रम और खुले में धूप लेने को सारे यत्न करते हैं, मानों बाकी के महिनों का कोटा पूरा कर रहें हों। जो गाड़ियों में पिकनिक मनाने जाते हैं उनकी गाड़ियों में या साथ लगे पिक अप में सबकी एक सायकिल होगी। बोटिंग के शौकीन लोग नाव साथ में ले जाते हैं और खुद नाव खैते हैं। मनोरंजन और कसरत दोनों हो जाती है।

बच्चों की एक इच्छा तो पूरी हो गई, मुझे नियाग्रा ले जाने की। घर लौटते हुए एक सुंदर सा भारतीय नाम वाला रेस्त्रां दिखा, कैसे छोड़ देते? आश्चर्य! गर्म-गर्म पकौड़ो के साथ बेहद स्वादिष्ट इलायची वाली चाय मिल गई। रेस्त्रां के अंदर न बैठ कर बाहर खुले में ही बैठे थे। एक और सुखद आश्चर्य! कुछ गौरेयां वहां रखे गमलों में से कुछ चुग रही थीं। अनन्या एकदम से बोली - ‘दादी, आपकी चिड़िया आपको ढूंढते हुए इन्दौर से यहां आ गई।‘

तभी बेटे ने अपनी दूसरी इच्छा के बारे में बताया - ‘अगले सप्ताह लॉक डाउन में और ढील मिल जाती है तो तुम्हें एक और जगह ले जाना है। हम लोग कब से प्लान कर रहे थे।‘ (Lynde shores Conservation Area, Whitby) कन्सरवेशन एरिया, बिटबाय जो काफी दूर है और लोग पूरे दिन का कार्यक्रम बना कर चलते हैं। उस क्षेत्र में लगभग दस-पंद्रह किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। मेरे लिए व्हील चेयर का प्रबंध करने वाले थे। वहां तरह-तरह की चिड़िया, गिलहरियां और छोटे-मोटे जानवरों के अलावा बंदर, अजगर आदि भी हैं। ये खुले में प्राकृतिक परिवेश में घूमते मिलेगें। यहां की गिलहरी अपनी भारतीय गिलहरी से कम से कम तीन गुना बड़ी और तीन गुना वजनी भी। इनको खिलाने की छूट है पर दाना वहीं से लेना पड़ता है जो उनके निर्देश पर होता है। इन्दौर में अनन्या हमेशा पूछा करती थी - ‘दादी, ये चिड़िया मेरी हथेली से दाना चुग सकती हैं क्या?‘

इन्दौर में जरा सी बालकनी में फूलों और मिर्च-मैथी के साथ ही चिड़िया के लिए चुगने का तसला और पीने के लिए पानी रखा रहता था। ढे़रों गौरेया फुर्र-फुर्र कर आती, कुछ पत्ते और दाना चुगती पानी पीकर उसमें धमा-चौकड़ी मचाती। मैं और अनन्या कभी फोटो कभी वीडियो निकाला करते थे। सो कन्सरवेशन एरिया में जाने को सबसे अधिक उत्सुक भी वही थी। मेरे वहां रहते में जाना संभव नहीं हुआ और दिनांक 17 सितम्बर को दुबई के लिए निकलना था। अक्टोबर के पहले सप्ताह में अनन्या अपने मम्मी-पापा के साथ वहां गई और पूरा पैदल चली। गिलहरी और चिड़िया को हथेली में रखकर दाना चुगाते हुए उसके खुशी से दमकते चेहरे का वीडियो मेरे पास आ गया। इतनी खुशी, शायद मैं स्वयं खिलाती तो भी नहीं होती।

जब तारीख तय हो ही गई तो प्रक्रिया भी प्रारंभ हो गई, मानसिक रूप से भी तैयारी करनी थी। दुबई के लिए निकलने से पहले नियत घंटों के पूर्व कोविद टेस्ट करवाना था। टेस्ट करवाना अपेक्षाकृत सरल था, बजाय इस डर के कि कहीं पॉज़िटिव न आ जाये। याने जाने की तैयारी तो पूरी कर लो पर टाटा-बाय-बाय बोलने की नौबत आयेगी या नहीं पता नहीं। जब से जाने की बात होने लगी अनन्या को दादी पर कुछ ज्यादा ही लाड़ आ रहा था। ताश, मोनोपॉली और अन्य बोर्ड-गेम खेलने का क्रम ज्यादा होने लगा। आनंदमय समय वैसे भी हाथ से फिसलता हुआ, तेजी से जाता हुआ लगता है। बेटा भी यदा कदा कहते रहता - ‘अभी भी सोच लो और यहीं पर और रह लो।‘

पर दुबई जाने का मकसद ही यही था कि वहां से इन्दौर पास हो जायेगा, हालात सुधरते ही जा सकूँगी। दूसरा कारण ये भी था कि निगेटिव कोरोना रिपोर्ट लेकर दुबई में आसानी से प्रवेश मिल जायेगा। क्वारेनटाईन की जरूरत नहीं पड़ेगी।

नियत दिनांक को सुबह से ही दिल भारी हुआ जा रहा था। अब ना जाने कब मिलना हो! इंदौर से कैनेडा तक की यात्रा का एक स्मृति चित्र दिमाग में फ्लैश-बैक की तरह कौंध गया।

लुफ्तानज़ा (जर्मनी) की फ्लाईट थी और उसकी परिचारिकाओं को याद कर बड़ा अच्छा सा लगा। जर्मनी के प्रति, नाज़ियों के कारण दिमाग में नकारात्मक विचार थे। पर इन परिचारिकाओं की सुघड़ता, यात्रियों का ख्याल रखने के तरीके ने मन को मोह लिया था। अब दुबई के लिए एमिरेटस् की फ्लाईट थी। मेरे दिलोदिमाग में जमी एक पॉज़िटिव सोच हमेशा, हर परिस्थिति में साथ देती रही है। हर देश, हर काल में पांच तत्व से बना मानव और पांच ही तत्वों से बनी प्रकृति रहे हैं और रहेगें। धर्म, भाषा, वेशभूषा, खान-पान का फर्क फिर इतना बड़ा फर्क नहीं रह जाता। सामने वाले को वो जैसा है वैसा ही मान कर स्वीकार कर लें तो ना मानसिक द्वंद होता है ना प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कोई दर्द। कैनेडा से निकलना आवश्यक था वरना प्राकृतिक सुंदरता से भरे-पूरे, दोस्ताना नज़रिया रखने वाले देश को कौन छोड़कर जाना चाहेगा।

आखिर सत्तरह तारीख आ ही गई और एयरपोर्ट को निकलने का क्षण भी आ गया। घर से एयरपोर्ट के पूरे रास्ते में आंखों से यादों में जितना समेट सकती थी समेटती गई। अनन्या का ये कहना कि ‘दादी आप अपने इंदौर के सारे काम खत्म कर लीजिए फिर यहीं हमारे साथ रहिये।‘ लगा वक्त वहीं थम जाये और मैं भी वहीं थम जाऊँ। इन्दौर और इन्दौर के बचे हुए काम भूल जाऊँ। पर जानती हूँ कि सोचने, चाहने या खुली आंख से सपना देखकर उसे पूरा होने की चाहत पूरी हो सकती होती तो दुनिया का रंग-रूप क्या हो जाता, कुछ कहा नहीं जा सकता। भारी मन से हवाई अड्डे पर तीन घंटे बैठना ही था। फिर बोर्डिंग और बारह घंटे की उड़ान का सफर। लगभग 18-20 घंटे मास्क पहने रखा। इस उम्र में प्रथम बार विदेश यात्रा, ये जैसे कम था तो महामारी भी जुड़ गई।

अब जब ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना। एकदम विपरीत वातावरण और परिस्थितियों वाला दूसरा विदेश ही सही।

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