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परशुराम का अन्तिम प्रहार : किरण विश्नोई
Parshuram Ka Antim Prahaar : Kiran Vishnoi

समय के उस युग में, जब धरती पर अन्याय का अंधकार छाया हुआ था,
ब्राह्मणों का अपमान, किसानों का शोषण और स्त्रियों की असहायता ने धर्म की जड़ें हिला दी थीं।
तब जन्म हुआ — ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र राम का।
यही बालक आगे चलकर “परशुराम” कहलाया — परशु (कुल्हाड़ी) धारण करने वाला योद्धा।

परशुराम बचपन से ही तेजस्वी, धीर , तथा करुणामय थे।
उन्होंने शास्त्र और शस्त्र दोनों में निपुणता प्राप्त की।
पर जब उन्होंने देखा कि क्षत्रिय राजा अन्याय और घमंड में डूब चुके हैं,
तो उन्होंने प्रतिज्ञा की — “जब तक अधर्म मिटेगा नहीं, मैं विश्राम नहीं लूँगा।”

परशुराम ने युद्धभूमि में एक-एक अत्याचारी का अंत किया।
धर्म के नाम पर रक्त की नदियाँ बह चलीं।
लोग उन्हें “विष्णु का क्रोध” कहने लगे।

पर जब शांति छा गई, तो धरती पर सन्नाटा था।
कहीं कोई शत्रु नहीं बचा था —
फिर भी परशुराम के भीतर का तूफ़ान शांत नहीं हुआ।

एक दिन वे एक गाँव पहुँचे।
वहाँ उन्होंने देखा —
कुछ सैनिक एक बूढ़े किसान से कर वसूल रहे थे।
किसान की पत्नी जमीन पर गिरकर कह रही थी __
“राजा के लोग अनाज ले गए, अब हमारे बच्चों को क्या खिलाएँगे?”

परशुराम का क्रोध फिर जागा।
उन्होंने परशु उठाया और सैनिकों को मार गिराया।
लोग खुश हुए, पर किसान का चेहरा फीका पड़ गया।
उसने कहा _
“भगवान, आपने उन्हें मारा, लेकिन मेरा बेटा भी उन्हीं के साथ मारा गया।”

परशुराम के हाथ काँप उठे।
उन्हें लगा मानो उनके भीतर कुछ टूट गया हो।
उन्होंने परशु धरती पर रखा और कहा

“क्रोध से अधर्म मिटाया नहीं जाता, वह बस नया अधर्म जन्म देता है।”
“धर्म की तलवार उतनी ही पवित्र है, जितना उसे चलाने वाले का मन।”

रात को ध्यान में उनके पिता जमदग्नि की वाणी सुनाई दी

“बेटा, धर्म का अर्थ केवल अन्याय का अंत नहीं,
बल्कि करुणा का आरंभ भी है।”

सुबह जब सूरज उगा, परशुराम ने अपना परशु नदी में प्रवाहित कर दिया।
लोग आश्चर्यचकित थे।
उन्होंने पूछा —
“भगवान, क्या आप अब शस्त्र त्याग रहे हैं?”

परशुराम ने मुस्कराकर कहा —
“अब मैं उन हाथों को हथियार दूँगा जो हल चलाना भूल गए हैं।”
“सच्चा धर्म वहीं है जहाँ भूखे का पेट भरे और दुखी की आँख सूखे।”

अब परशुराम गाँव-गाँव घूमने लगे।
जहाँ पहले उन्होंने युद्ध सिखाया था, वहाँ अब उन्होंने जीवन सिखाना शुरू किया।
किसानों को खेती, युवाओं को विद्या, और लोगों को एकता का महत्व बताया।
उन्होंने कहा —

“जो मनुष्य दूसरों के आँसू नहीं देख पाता, वह धर्म का ज्ञाता नहीं।”
“जब न्याय तलवार से बड़ा दिखने लगे, तब समझो मनुष्य भीतर से छोटा हो गया है।”

लोग उन्हें अब “शस्त्रगुरु नहीं, शांति गुरु” कहने लगे।
उनके शिष्यों में एक बालक अक्सर पूछता —
“गुरुदेव, क्या आप अब भी वही परशुराम हैं जिन्होंने क्षत्रियों का संहार किया था?”

परशुराम मुस्कराकर बोले —

“परशु मैंने छोड़ दिया है, पर ‘राम’ अब भी मेरे भीतर जीवित है।”
“जब क्रोध मरता है, तब करुणा जन्म लेती है — वही सच्चा पुनर्जन्म है।”