नो कैप, ब्रो! हिंदी ही है असली स्वैग (बाल कहानी) : अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'
बारह साल का आरव अपने स्कूल का सबसे 'कूल' और 'टेक-सेवी' लड़का था। उसकी बातचीत में चौबीसों घंटे " ब्रो देट्स सो मिड!" (भाई, यह तो बहुत साधारण है), नो केप! (सच्ची में), और "चिल पिल लो" जैसे शब्द तैरते रहते थे। आरव के लिए हिंदी का मतलब था सिर्फ एक बोरिंग सब्जेक्ट, जिसमें मात्राओं की मिस्टेक पर मार्क्स कट जाते हैं। वह सोचता था, "जब सिरी और एलेक्सा मेरी अंग्रेजी एक बार में समझ जाते हैं, तो मुझे इस कठिन व्याकरण की क्या जरूरत?"
इसके ठीक विपरीत उसकी क्लासमेट प्रिया थी। प्रिया आधुनिक होने के साथ-साथ हमेशा हिंदी और भारतीय संस्कृति को प्रमोट करती थी। आरव अक्सर उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहता -
"प्रिया, तुम इतनी 'ओल्ड-स्कूल' क्यों हो? थोड़ा अपग्रेड करो खुद को!" पर प्रिया मुस्कुराकर कहती-
"आरव, असली अपग्रेड अपनी जड़ों को भूलना नहीं, उन्हें समझना होता है।"
एक शाम आरव अपने आईपैड पर एक गेम खेल रहा था और अचानक जोर से चिल्लाया- मॉम माय कैरेक्टर जस्ट डाइड! यह गेम कितना अनफेयर है, मेरा तो पूरा मूड ही स्पॉइल हो गया!"
लिविंग रूम में आरव के दादू बैठे थे, जो रिटायर्ड हिंदी प्रोफेसर थे। दादू ने शाँति से चाय की चुस्की ली और कहा, "आरव बेटा, तुम बहुत टेक-सैवी हो न? जरा अपने इस सुपर-फास्ट फोन के गूगल असिस्टेंस को ऑन करो और अंग्रेजी में बोलो- 'The knight rode the horse last night'.
आरव ने तुरंत फोन निकाला और बोला। स्क्रीन पर टेक्स्ट आ गया।
दादू ने मुस्कुराकर कहा, "अब जरा ध्यान से देखो। पहले वाले 'Knight' में 'K' है पर हम उसे 'नाइट' बोलते हैं। दूसरे वाले 'Night' में 'G' और 'H' हैं, पर उनका कोई साउंड ही नहीं है! तुम्हारी इतनी एडवांस अंग्रेजी में जो लिखा जाता है, वो बोला नहीं जाता। स्पेलिंग रटते-रटते थक जाओगे। अब जरा मेरे साथ एक शब्द जोर से बोलो—'कल्याण'।"
आरव बोला, "कल्याण।"
दादू ने पूछा, "क्या इस शब्द को लिखने के लिए तुम्हें कोई साइलेंट लेटर चाहिए? जैसा बोला, वैसा ही लिखा न? हमारी हिंदी की वर्णमाला इतनी साइंटिफिक है कि जो हमारे गले से निकलता है, उंगलियांँ हूबहू वही लिखती हैं। इसमें कोई कंफ्यूजन नहीं है, नो कैप !
तभी आरव के पापा, जो एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर हैं, लैपटॉप बंद करते हुए वहांँ आए। उन्होंने आरव के सिर पर हाथ फेरा और कहा-
"दादू बिल्कुल सही कह रहे हैं आरव। तुम्हें पता है, मेरी कंपनी के ग्लोबल क्लाइंट्स जब भारत आते हैं, तो वे हमारी संस्कृति और भाषा से बहुत इम्प्रेस होते हैं। वे मुझसे पूछते हैं कि आप लोग अपनी भावनाओं को इतने अच्छे से कैसे एक्सप्रेस कर लेते हैं? मैंने उन्हें बताया कि हमारी मातृभाषा में रिश्तों और भावनाओं के लिए जितने शब्द हैं, उतने दुनिया की किसी भाषा में नहीं हैं।"
किचन से गरम-गरम चाय लेकर आईं मम्मी ने बात को आगे बढ़ाया- "हाँ आरव! तुम्हारी इंग्लिश में तो हर उम्र के पुरुष के लिए सिर्फ अंकल और हर महिला के लिए आंटी शब्द है। लेकिन हमारी हिंदी में? चाचा, ताऊ, मामा, फूफा, मौसा... हर रिश्ते की एक अलग पहचान और सम्मान है। अंग्रेजी में जो सिर्फ यू है, वो हिंदी में सामने वाले के आदर के हिसाब से 'आप', 'तुम' बन जाता है। यह तमीज सिर्फ हिंदी के पास है।"
आरव बड़े ध्यान से मम्मी-पापा की बातें सुन रहा था। दादू ने बात जोड़ते हुए कहा, "और इसी हिंदी भाषा की समृद्ध गौरवमयी आत्मीयता भरी अनुभूति और संवाद को साथ लेकर जब अठारह सौ तेरानवे में स्वामी विवेकानंद शिकागो गए थे, तो पूरा अमेरिका दो मिनट तक तालियांँ बजाता रह गया था। आज भी जब देश के बड़े नेता संयुक्त राष्ट्र संघ में जाते हैं, तो वहांँ हिंदी में गौरव से बुलंद आवाज में उद्बोधन देते हैं। हिंदी हमारी कमजोरी नहीं, हमारा सबसे बड़ा पावर-मूव है।"
आरव ने थोड़ा सोचते हुए कहा
-पर दादू, स्कूल में तो सब कहते हैं कि अच्छी जॉब चाहिए तो इंग्लिश ही बेस्ट है। हिंदी तो 'घर की मुर्गी दाल बराबर' जैसी है।"
मम्मी ने प्यार से समझाया, "आरव, जापान, जर्मनी और फ्रांस के लोग अपनी मातृभाषा में काम करते हैं। क्या वे दुनिया में पीछे हैं? बिल्कुल नहीं! हमें आज 'दूर के ढोल सुहावने' लग रहे हैं, जबकि सच तो यह है कि अपनी जड़ों से जुड़कर रहने में ही सबसे अधिक सुकून, संतुष्टि, आत्मिक और भौतिक समृद्धि है। भाषा हम कोई भी सीख सकते हैं और सीखनी भी चाहिए, लेकिन सबसे पहले अपनी भाषा को सीख-समझकर उसके गौरव को , पठन-पाठन ,लेखन को बनाए रखना जरूरी है।"
अगले दिन स्कूल में 'हिंदी दिवस' का फंक्शन था। हर साल आरव इस फंक्शन में पीछे बैठकर मीम्स बनाता था। लेकिन इस बार जब स्टेज पर उसकी बारी आई, तो उसने माइक हाथ में लिया और मुस्कुराकर कहा-
"आदरणीय शिक्षक गण और मेरे प्रिय मित्रों! आज हिंदी दिवस है। हर साल हम इसे एक बोरिंग फॉर्मैलिटी की तरह मनाते हैं। लेकिन कल मुझे समझ आया कि जो भाषा पूरी तरह साइंटिफिक है, जिसे विवेकानंद से लेकर आज तक दुनिया सलाम करती है, उसे uncool समझना हमारी सबसे बड़ी भूल है। इंग्लिश सीखना मेरा चॉइस हो सकता है, पर हिंदी मेरा डीएनए है। हिंदी ही वो स्नेह का सूत्र है जो हम सभी भारतवासियों को जोड़कर रखता है। सो, लेट्स अपग्रेड अवर स्वैग।
अब से हिंदी सिर्फ चौदह सितंबर को नहीं, हर दिन हमारे बातचीत का प्राउड हिस्सा होगी। नो कैप, ब्रो!"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। तभी तीसरी पंक्ति में बैठी प्रिया खड़ी हुई। उसने आरव की तारीफ में ताली बजाते हुए कहा, "ब्रिलियंट आरव! आज तुमने सच में कमाल कर दिया, लेकिन एक सवाल मेरे मन में है। तुम साइंस और गैजेट्स के दीवाने हो। तुम अक्सर कहते थे कि हिंदी टाइपिंग या राइटिंग स्लो होती है। क्या तुम हमारी जेनरेशन को यह बता सकते हो कि हिंदी की देवनागरी लिपि लिखने का हमारे माइंड और थिंकिंग प्रोसेस पर क्या असर पड़ता है? क्योंकि कुछ मुझे पता है कि इसके पीछे भी एक ज़बरदस्त साइंस है!"
प्रिया का यह सवाल सुनते ही साइंस टीचर वर्मा सर और प्रिंसिपल मैम भी उत्सुक हो गए।
आरव ने प्रिया को थम्स-अप किया और स्क्रीन पर देवनागरी के कुछ अक्षर डिस्प्ले करते हुए पूरे आत्मविश्वास से बोलना शुरू किया:
"थैंक यू प्रिया, इस बेहतरीन पॉइंट को उठाने के लिए! दोस्तों, कल रात दादू ने मुझे देवनागरी लिपि के पीछे का जो न्यूरो-साइंस समझाया, उसने मेरे होश उड़ा दिए। ध्यान से सुनो हमारे ब्रेन का सुपर वर्कआउट!
जब हम अंग्रेजी की रोमन लिपि लिखते हैं, तो उंगलियाँ एक ही फ्लो में सीधे चलती हैं, लेकिन जब हम देवनागरी लिपि में लिखते हैं, तो हमें अक्षरों को गोलाई देनी पड़ती है, ऊपर 'शिरोरेखा' (लाइन) खींचनी पड़ती है, और बाएँ-दाएँ, ऊपर-नीचे मात्राएंँ लगानी पड़ती हैं। न्यूरो-साइंटिफिक रिसर्च कहती है कि देवनागरी लिखने से हमारे मस्तिष्क के दोनों हिस्से ,लेफ्ट ओर राइट हेमिस्फीयर एक साथ एक्टिव हो जाते हैं। यह हमारे ब्रेन के लिए एक कड़क वर्कआउट है, जो हमारे मस्तिष्क को अधिक फर्टाइल यानी उर्वर और क्रिएटिव बनाता है।
और यदि हम बात करें हैंड-आई कॉर्डिनेशन और फोकस पर, तो देवनागरी के अक्षरों की बनावट इतनी सुव्यवस्थित है कि इसे लिखते समय हमारी आंँखों और हाथों का जो कॉर्डिनेशन बनता है, वह हमारी एकाग्रता और याददाश्त को गजब का बूस्ट देता है।
और जीरो मेंटल फटीग के बारे में भी जान लो। चूँकि हिंदी में उच्चारण और लेखन में कोई भेद नहीं है, जैसा हम सोचते और बोलते हैं, वैसा ही लिखते हैं इसलिए हमारे ब्रेन को स्पेलिंग रटने या कंफ्यूज होने में एक्स्ट्रा एनर्जी वेस्ट नहीं करनी पड़ती। हमारा ब्रेन सिग्नल एकदम क्लियर रहता है, जिससे मानसिक थकान कम होती है।
अरे वाह! इतने सारे फायदे! - प्रिया ध्यान से सुनते हुए उत्साह से बोली।
आरव ने प्रिया की तरफ देखते हुए अपनी बात खत्म की- "सो प्रिया और मेरे प्यारे दोस्तों, मोरल ऑफ द स्टोरी यह है कि हिंदी सिर्फ एक भाषा या एक दिवसीय उत्सव नहीं है, बल्कि हमारे दिमाग को 'सुपर-ब्रेन' बनाने का एक साइंटिफिक टूल भी है। भाषाएंँ हम दुनिया की सारी सीखें, पर अपनी भाषा को सबसे पहले सम्मान दें। क्योंकि जो सुकून, आत्म गौरव अपनी जड़ों में है, वो कहीं नहीं है!"
प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा-
"बिल्कुल सही आरव!
" हिंदी पहचान है भारत की।
राग है आत्मीयता का।।
उत्सव है भारतीय संस्कृति का।
आत्म सम्मान है हम भारतीयों का।।
नो कैप, ब्रो, हिंदी ही हमारा असली स्वैग है!"
पूरा ऑडिटोरियम 'भारत माता की जय' , 'जय हिंद- जय हिंदी' और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंँज उठा। पीछे खड़े दादू, मम्मी और पापा की आँखों में गर्व के आँसू थे। आरव और प्रिया ने मिलकर आज अपनी पूरी जनरेशन को अपनी जड़ों और अपनी भाषा से जुड़ने का एक नया और आधुनिक मंत्र दे दिया था। और इस तरह से 'जड़ों का पासवर्ड' मिलने से आरव का " ब्रेन हुआ हिंदी अपग्रेड।"