निराला जी के दारागंज में कुछ महीने तक रहा हूँ (संस्मरण) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

इलाहाबाद के दारागंज में निराला जी रहते थे। दारागंज एक खांटी इलाहाबाद है। एकदम सहज भावों से भरा है निरालाजी का दारागंज। कुछ लोग कहते थे कि जो दारागंज में रह लेता है उसके अंदर साहित्यिक गुण आ जाता है और निराला जैसी कालजयी रचना कर सकता है।

शुरू में मेरे अंदर यह भाव आया था कि दारागंज में एक बार जरूर रहूंगा। वहां की संस्कृति, भाईचारे की भावना, एक आत्मीय संबंध जो होना चाहिए। वह सारी सादगी इलाहाबाद के इस दारागंज में है क्योंकि दारागंज में आधा गांव के लोग तथा आधा शहर के लोग रहते है। गांव के लोग दारागंज की ताजगी बनायें हैं।

मैं भी पन्द्रह साल पहले दारागंज में कुछ महीने तक रहा हूँ। निरालाजी की ही गली में रहता था। निरालाजी के क्षेत्र में रहना एक गौरव की बात होती है। प्रतिदिन निरालाजी की लगी मुर्ति के पास से गुजरता था‌। कुछ देर खड़े होकर निराला जी की मूर्ति को देखता था। उनकी मूर्ति में साहित्य का एक-एक भाव नजर आता था। एक बिल्कुल सीधा पन, कोई बनावटी रंग नहीं।

'वह तोड़ती पत्थर' निराला जी की रचना मैं बहुत बार पढ़ता था। निराला जी की मूर्ति जब भी देखकर आता तो एक कविता जरूर डायरी में लिखता था। बिल्कुल सादगी भरी रचना मेरी होती थी। निरालाजी सुना था पैदल ही गंगा घाट तक जाते थे और आम जनता के दुखदर्द को बांटते हुए चलते थे। यही सब था निराला जी में फक्कड़पन, जो मुझे बहुत भाता था। वही भाव मैं भी भरने की कोशिश करता था।

शाम को अक्सर मैं गंगा घाट तक जाता था। गंगा मैया की आरती कार्यक्रम में शामिल होता था। शाम को कई लोगों से परिचय कर बातचीत करते थे और कुछ नई चीजे सीखते थे। गंगा के किनारे के आनंद में पूरा का पूरा मुझे साहित्य ही नजर आता था। साहित्य पोर-पोर में भरने की कोशिश करता था।

निराला जी के दारागंज में रहने का सौभाग्य मिला और ढेर सारा साहित्यिक भाव मैंने अपने अंदर भरने की कोशिश की। दारागंज की गलियों में कवि सम्मेलन होते थे। कवि सम्मेलन में जरुर जाता था। साहित्यिक दुनिया से परिचित होने लगा‌ लेकिन किसी साहित्यकार से नहीं मिलता था। उस वक्त की लिखी कविता की डायरी कहाँ गायब हो गयी पता ही नहीं चला।

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