Neelkamal Aur Lalkamal : Lok-Katha (Bengal)

नीलकमल और लालकमल : लोक-कथा (बंगाल)

एक राजा की दो रानियाँ थीं। उनकी एक रानी राक्षसी थी, पर यह बात किसी को मालूम न थी। दोनों रानियों का एक-एक बेटा था। अच्छी रानी के बेटे के नाम था कुसुम और राक्षसी रानी के बेटे का नाम था अजित। दोनों में बहुत मेल था।

राक्षसी रानी के मन में काला था। वह रक्त पिपासू थी। दोनों भाइयों का प्रेम उसे एक आँख नहीं सुहाता था। वह हमेशा इस ताक में रहती थी कि कब सौत के बेटे को मारकर उसके नरम-नरम मांस का शोरबा बनाकर पिएगी! उसकी मंशा को उसका सगा पुत्र बहुत अच्छी तरह समझता था, अतः वह कभी कुसुम का साथ नहीं छोड़ता था। गुस्से से राक्षसी रानी दाँत पीसती रहती थी। मौका न मिलने से वह दोष-त्रुटि ढूँढ़ती। अपनी दृष्टि-शक्ति से सौत का खून चूसती रहती। फलतः अच्छी रानी दुर्बल होती गई और एक दिन उसने बिस्तर पकड़ लिया। दो-तीन दिनों में उसका देहांत हो गया। सारे राज्य में शोक छा गया, परंतु असल कारण किसी को समझ में न आया।

राक्षसी रानी कुसुम को तो सताती ही थी, अपने पुत्र को भी उसका साथ देने के लिए धिक्कारती थी। एक दिन अजित ने कुसुम से कहा, "भैया जाने दीजिए, हमलोग उनके पास और नहीं जाएँगे।" उन लोगों ने उस राक्षसी माँ के पास जाना बंद कर दिया, परंतु राक्षसी माँ का अत्याचार फिर भी जारी रहा। अजित अपने दिल को कड़ा कर सब सहता रहा, पर नरम दिलवाला कुसुम धीरे-धीरे सूखता गया।

रानी ने जब देखा कि उसका सगा बेटा ही उसका शत्रु बन गया है, तो वह एकदम जल-भुन गई। एक रात राजा के हाथीखाने में एक हाथी की मौत हो गई, घुड़साल में एक घोड़ा मर गया और गोशाला में एक गाय मृत पाई गई। राजा का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। दूसरी रात राजमहल में शोरगुल सुनकर राजा चिहुँककर उठे और तलवार लेकर अपने कमरे से बाहर निकले। सोने के पलंग पर अजित और कुसुम सोये थे। एक बड़ा राक्षस कुसुम को उठा लाया। इससे पहले कि राजा कुछ करते, रानी ने अपना एक केश तोड़कर राजा पर फेंक दिया। राजा वहीं जड़ हो गए। उसकी आँखों के सामने राक्षस कुसुम को खाने लगा। राजा की आँखों से अश्रुधार बह निकली, पर वे उसे पोंछ नहीं सके। उनका शरीर थर-थर काँप रहा था, पर वे बैठ भी न सके। रानी अट्टहास कर उठी।

अजित की नींद टूट गई। उसने देखा कि कुसुम भैया पास में नहीं हैं। वह हड़बड़ाकर उठा। उसने देखा कि रानी के हाथ का बाला-कंगन झम-झम कर रहा है और कुसुम भैया को राक्षस खा रहा है। क्रोध से उसका शरीर जलने लगा। वह दौड़कर वहाँ पहुँचा और राक्षस के सिर पर एक जोर का चूँसा मारा। राक्षस हाय-हाय कर चीत्कार कर उठा और सोने का एक टुकड़ा उगलकर भाग गया। रानी ने देखा कि यह तो अनर्थ हो रहा है। अपना ही पुत्र दुश्मन बन गया है ! क्रोधाग्नि में जलती रानी अपने ही पुत्र को चबाने लगी। तभी उसके गले से लोहे का एक टुकड़ा गिर पड़ा। हतप्रभ होकर वह उछल पड़ी और सोने एवं लोहे के टुकड़े को लेकर छत पर चढ़ गई। छत पर राक्षसों की भीड़ थी। उनमें कुछ कह रहे थे, "और खाऊँगा, और खाऊँगा।" और कुछ कह रहे थे, "अपने देश जाऊँगा।"


रानी बोली, "मैं यहाँ रहूँगी। तुम लोग अपने देश जाओ।"
झुंड बनाकर राक्षस अपने देश की ओर जब भागे, तो उनके धक्के से राजभवन का शिखर टूट गया, पेड़-पौधों की डालें टूट गईं, नदी के जल में उत्ताल लहरें उठी और राजा का हृदय काँप उठा।

जली-भुनी रानी अपने कमरे में आई। उसे कहीं से भी चैन नहीं आ रहा था। रात काटे नहीं कट रही थी। अंत में उसने अपनी जादुई आराम छड़ी एवं जिराम छड़ी को जला दिया और आसमान में उड़ती हुई एक नदी के किनारे उतरकर एक बाँस वन में एक स्थान पर सोने के टुकड़े एवं लोहे के टुकड़े को गाड़ दिया। फिर निश्चिंत होकर वह घर लौट आई।

दूसरे दिन राजा यह देखकर हैरान रह गया कि पूरे महल में जगह-जगह हड्डियों के ढेर, रास्ते में भी सर्वत्र हड्डियाँ बिखरी हुई हैं। पूरे देश में राक्षसों ने आतंक फैला रखा है, रक्षा का कोई मार्ग नहीं। जब लोगों ने सुना कि राक्षसों ने राजपुत्रों को भी खा लिया है, तो सब झुंड-का-झुंड बनाकर राज्य छोड़कर भागने लगे; राजा जड़ हो गए। उनके राज्य में राक्षस छा गए।

नदी किनारे बाँस वन में एक किसान बाँस काटने गया। एक बाँस को चीरने पर उसे दो अंडे दिखे। उसे समझ में नहीं आया कि वे साँप के अंडे थे या किसी और प्राणी के, अत: उसने अंडों को फेंक दिया। अंडे टूट गए। लाल रंग के अंडे से एक लाल रंग का राजपुत्र और नीले रंग के अंडे से नीले रंग का राजपुत्र प्रकट हुआ। माथे पर मुकुट, हाथ में नंगी तलवार लिये दोनों राजपुत्र वायुवेग से वहाँ से चले गए। डर से किसान मूर्च्छित हो गया। जब उसे होश आया तो उसने देखा कि लाल अंडे का खोल सोने का एवं नीले अंडे का खोल लोहे का बनकर वहाँ पड़ा हुआ है। किसान ने लोहेवाले खोल से अपने लिए एक हँसिया और सोनेवाले खोल से अपनी पुत्रवधू के लिए एक बाजूबंद बनवा दिया।

दोनों राजपुत्र चलते-चलते एक राज्य में पहुँचे। वहाँ बड़े-बड़े राक्षसों से लोग डरे-सहमे रहते थे। राजा रोज मंत्री नियुक्त करते, पर राक्षस उन्हें खा जाते एवं एक परिवार के लोगों को खा जाते। राजा ने घोषणा कर दी थी कि जो कोई भी जोड़ा राजपुत्र राक्षसों का संहार करेगा उसके साथ परी की तरह जुड़वाँ राजकुमारियों का ब्याह करा दिया जाएगा एवं उनका राजत्व भी उन्हें मिलेगा। अनेक जोड़ा राजपुत्र आए, पर राक्षसों ने उन्हें खा लिया।

लालकमल और नीलकमल राजा के समक्ष उपस्थित होकर बोले, "हम लोग राक्षसों को मारने के लिए आए हैं।"
उन्हें देख राजा के मन में आशा-निराशा के भाव उठे, पर अंत में बोले, 'ठीक है।'

नीलकमल और लालकमल नंगी तलवार लेकर एक कमरे में छुपकर बैठ गए। धीरे-धीरे रात गहराने लगी। कोई भी राक्षस नहीं आया। और एक पहर बीता, तब भी कोई नहीं आया। आधी रात बीतने पर भी कोई नहीं आया। दोनों राजपुत्रों को नींद आने लगी। नीलकमल ने लालकमल से कहा, “भैया मैं सो जाता हूँ, बाद में मुझे जगाकर तुम सो जाना। राक्षस आकर अगर नाम पूछे, तो मेरा नाम पहले बताना। अपना नाम पहले मत बताना," यह कहकर नीलकमल सो गया।

थोड़ी देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। लालकमल तलवार को मजबूती से पकड़कर सावधान हो गया। राक्षस आए। शायद रोशनी में उन्हें ठीक से दिखाई नहीं देता था, इसलिए एक ने कहा, "रोशनी बंद करो।"


लालकमल बोला, "नहीं।"
राक्षसों में, जो सबसे बड़ा था, गुस्से से गों-गों करने लगा। बोला, "घर में कौन जाग रहा है रे? सारे राक्षस किच-किच करते हुए बोले, "कौन जाग रहा है, कौन जाग रहा है ?"
लालकमल ने कहा-

"लालकमल से पहले नीलकमल जाग रहा है,
और जाग रहा है तलवार
जाग रहा है घी का दीया
किसका आया है काल?"

नीलकमल का नाम सुनते ही राक्षसगण डर से तीन कदम पीछे हो गए। नीलकमल अपने पूर्वजन्म में राक्षसी रानी के गर्भ से पैदा हुआ था। उसके शरीर में राक्षस का ही खून दौड़ रहा होगा! राक्षस इस बात को जानते थे। सबने कहा, “अच्छा, तुम नीलकमल हो भी या नहीं, प्रमाण दो।"

राक्षसों ने अनेक चतुराई से उससे प्रमाण माँगना आरंभ किया। राक्षसों के लीडर ने कहा, “तुम लोग अपने नाखून दिखाओ।"

लालकमल ने नीलकमल के मुकुट को तलवार की नोंक पर रखकर बाहर दिखाया। उसे हाथ से छूकर आपस में बोलने लगे, “बाप रे, जिसके नाखून इतने भयंकर हैं, पता नहीं वह कैसा होगा?" लीडर ने फिर कहा, "देखू, तुम लोगों का थूक कैसा है ?"

लालकमल ने तलवार द्वारा दीये के गरम घी को उनपर छिडक दिया। राक्षसों के रोएँ जलने लगे, वातावरण में दुर्गंध फैल गई। राक्षसगण गों-गों करते हुए भागे। थोड़ी देर बाद फिर आकर वे बोले, “तुम लोग अपनी जीभ दिखाओ जरा।"

लालकमल ने अपनी और नीलकमल की तलवारों को दरवाजे की फाँक से बाहर निकाल दिया। राक्षसों के लीडर ने दोनों तलवारों को अपने हाथों से कसकर पकड़ लिया और सभी राक्षसों से उसने कहा, “अब मैं जीभ को खींचकर उखाड़ लूँगा। तुम लोग मुझे पकड़कर खूब जोर से खींचो।"

सबने जोर लगाकर खींचा। फिर क्या था, नंगी तलवार की धार से उसके दोनों हाथ कट गए और काले रक्त की धारा बहने लगी। चिल्लाते हुए सभी राक्षसों के सिरों को लाँघकर लीडर राक्षस भाग गया।
बहुत देर बाद लीडर राक्षस फिर कहीं से आया और पूछा, “कौन जाग रहा है, कौन जाग रहा है?"
बहुत देर तक किसी राक्षस की आहट न पाकर लालकमल निश्चिंत हो गया था। उसे नींद आने लगी थी। उस अवस्था में उसके मुख से निकल गया, "लालकमल जाग रहा है और...।"

उसकी बातें मुँह में ही रह गई और दरवाजा तोड़कर सभी राक्षस लालकमल पर टूट पड़े। घी का दीपक उलट गया। लालकमल का मुकुट गिर गया। वह चीत्कार कर बोला, “भाई!"
नीलकमल की नींद टूट गई। उसने देखा, राक्षस हैं। अंगड़ाई लेते हुए उसने कहा-

"आराम छड़ी, विराम छड़ी
जाग रहा है रे कौन?
देख जरा दरवाजे पर
मेरी नींद तोड़ रहा कौन?"

नीलकमल की आवाज सुनते ही सारे राक्षसों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। वे अधमरे हो गए। नीलकमल ने घी के दीये को जलाया। फिर सभी राक्षसों को तलवार से काट डाला। राक्षसों को मारकर हाथ-मुँह धोकर दोनों निश्चिंत होकर सो गए।

दूसरे दिन सुबह राजा ने देखा दोनों राजपुत्र एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर सो रहे हैं। उन्हें ऐसा लगा मानो दो लाल अड़हुल के फूल हैं वे! चारों ओर राक्षसों की लाशें पड़ी हुई हैं। देखकर राजा गद्गद हो गए।

दोनों भाइयों को जोड़ा राजकन्या एवं राज-पाट मिल गया। उधर राक्षसी रानी ने राजभवन में अपना आधिपत्य जमा लिया था। आई राक्षस एवं काई राक्षस नामक दो राक्षस दूतों ने उन्हें राक्षसों की मरणकथा की सूचना दी। सुनकर रानी हतप्रभ होकर अपनी छाती पीटने लगी और बोली, “आई रे, काई रे, अब तो मैं नहीं बचूँगी रे।"

राक्षसी रानी के कहने से आई-काई दोनों राक्षस दूत सिपाही का वेश धारण कर नीलकमल एवं लालकमल की राजसभा में गए और बोले, "छाती में कील, पीठ में कील, हमारे राजा को जब तक राक्षसों के सिर का तेल नहीं दिया जाएगा, उनकी बीमारी दूर नहीं होगी।"
लालकमल नीलकमल ने कहा, "ठीक है, तेल ला दूंगा।"

नई तलवारों में धार देकर दोनों भाई एक जंगल में पहुँचे। एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे विश्राम हेतु बैठे। पेड़ पर एक बेंगमा-बेंगमी पक्षी का घोंसला था। बेंगमी ने बेंगमा से कहा, "काश, कोई दयालु व्यक्ति होता, जो अपने दो बूंद रक्त से हमारे बच्चों के प्राणों की रक्षा करता!"
यह सुनकर लाल एवं नील ने कहा, “पेड़ पर कौन बातचीत कर रहा है ? हम लोग अपना रक्त दे सकते हैं।"

यह सुनकर बेंगमी खुशी से अहा-अहा करने लगी। बेंगमा नीचे उतरा। दोनों भाइयों ने अपनी उँगली चीरकर उसे खून दिया। खून लेकर बेंगमा ऊपर चला गया। थोड़ी देर बाद सों-सों करते हुए बेंगमा के दो बच्चे नीचे उतरकर बोले, "हमारे प्राण बचानेवाले राजपुत्र, तुम लोग कौन हो? हम तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं, बोलो!"

नील-लाल ने कहा, "हमें किसी चीज की जरूरत नहीं। बस, तुम लोग जीवित रहो।"
बेंगमा-बेगमी के दोनों बच्चों ने कहा, "ठीक है, पर तुम लोग जाओगे कहाँ? चलो हम तुम्हें पीठ पर बैठाकर वहाँ छोड़ आते हैं।"

दोनों राजपुत्र उनकी पीठ पर बैठ गए। देखते-ही-देखते तीव्र गति से वे हू-हू कर उड़ने लगे। नदीनाले, जंगल-पहाड़, चंद्र-सूर्य को पीछे छोड़ वे शून्य में उड़ने लगे। सात दिन, सात रात तक लगातार उड़ने के बाद आठवें दिन वे एक पहाड़ पर उतरे। पहाड़ के नीचे मैदान। मैदान के उस तरफ राक्षसों का देश। नीलकमल ने कुछ उरद के दाने चुनकर लालकमल के कोंछ में रखते हुए कहा, "लोहे की उरद चबाने के लिए वे कहेंगे, तो इसे चबाना।"

उसके बाद वे आगे बढ़ने लगे। मैदान को पार करते ही राक्षसों के एक दल ने उन्हें घेर लिया और वे चिल्लाने लगे-

"हाँऊ-माँऊ-काँऊ!
मानुस गंध पाऊँ,


पकड़-पकड़कर खाऊँ।"
उन्हें देखते ही नीलकमल ने चिल्लाकर कहा, “नानी माँ! नानी माँ! हम लोग आए हैं-तुम्हारा नीलकमल। गोद में उठाकर हमें ले चलो।"

"ठहरो! ठहरो! रुको! रुको!" कहकर सभी राक्षसों को रोककर लंबे-लंबे हाथ-पैरवाली, विशाल जटावाली एक बूढ़ी राक्षसी ने आकर नीलकमल को गोद में उठा लिया और 'मेरा नीलू, मेरा नाती' कहकर दुलार करने लगी। नानी के शरीर की दुर्गंध से नीलकमल को उल्टी आ रही थी। लालकमल को देखकर वह बोली, “तुम्हारे साथ वह कौन है रे?"
नीमकमल बोला, "वह मेरा भाई है नानी, भाई।"

बूढ़ी बोली, "तब मानुस गंध क्यों पा रही हूँ? अगर मेरा नाती है, तो लोहे की उरद खाकर दिखाए!" इसके साथ ही उसने अपनी नाक से पाँच लोहे की उड़द निकालकर लाल नाती को खाने के लिए दी। लालकमल को पहले से ही पता था। उसने चुपचाप लोहे की उरद को अपने कपड़े में छुपा लिया और सचमुच की उरद निकालकर कटर-कटर करके चबाने लगा। बूढ़ी राक्षसी को विश्वास हो गया कि लालकमल उसका नाती ही है। खुशी से वह गद्गद हो गई। दोनों नातियों को गोद में लेकर वह दुलार करने लगी। लेकिन लालकमल के शरीर से मानुस गंध पाकर उसकी जीभ में पानी आने लगा; लेकिन अपने नाती को वह कैसे खा सकती थी? अत: दोनों को लेकर वह अपने घर चली आई।

उस पूरे देश में सिर्फ राक्षस भरे हुए थे। चारों ओर राक्षस कुलबुला रहे थे। पृथ्वी से मनुष्य, जीव-जंतु आदि को मारकर पूरे देश में बिखरा दिया गया था।
लाल-नील राक्षसों के कंधे पर बैठकर घूमते और देखते कि हर ओर मरे हुए, सड़े हुए मनुष्य, जीव-जंतु बिखरे पड़े हैं। दुर्गंध ऐसी कि भूत भी भाग जाए! लाल ने कहा, "भाई लगता है, सारी पृथ्वी उजाड़ हो गई है।"

नीलकमल चुप रहा। लेकिन उसने मन-ही-मन ठान लिया कि पृथ्वी को अब इन राक्षसों से बचाना होगा। जब रात गहरी हो गई, तब सब निशाचर राक्षस अपने बाल-बच्चों के साथ सात समुद्र पार सभी राज्य में उत्पात मचाने, मनुष्य जीव-जंतुओं को मारकर लाने के लिए चले गए, तब नीलकमल लालकमल को साथ में लेकर राजमहल के दक्षिण की ओर स्थित एक कुएँ के पास पहुँचा। वहाँ उसने लालकमल से कहा, "भैया, मेरे कपड़ों को पकड़ो।"

कपड़े देकर नीलकमल कुएँ में उतरकर एक तलवार और एक सोने का डिब्बा लेकर बाहर निकला। डिब्बे को खोलते ही जीवनकाठी एवं मरणकाठी नामक एक ततैया और ततैयी बाहर निकले। जीवन काठी में राक्षसों के प्राण एवं मरणकाठी में उस रानी राक्षसी के प्राण बसते थे। नीलकमल ने जीवनकाठी को अपने पास रखा एवं लालकमल को मरणकाठी थमा दिया।

जब दोनों ततैयों के शरीर में हवा लगी, तब राक्षसों को घबराहट होने लगी। पृथ्वी पर जड़ पड़े राजा के देश में राक्षसी रानी नींद में लुढ़क गई। पृथ्वी पर गए राक्षस तेज कदमों से नदी-पर्वत लाँघकर लौटने लगे। यह देख नीलकमल ने जीवनकाठी ततैये के दो पैरों को तोड़ दिया। सारे राक्षसों के दोनों पैर टूट गए। राक्षस दोनों हाथों के बल पर तेज गति से आने लगे। यह देख नीलकमल ने ततैये के बाकी दोनों पैर भी तोड़ दिए। सारे राक्षसों के दोनों हाथ कटकर गिर गए। हाथ नहीं, पैर नहीं, फिर भी सारे राक्षस 'हाऊँ-माऊँ-काऊँ ! सात शत्रुओं को खाऊँ' कहते हुए लुढ़कते हुए आगे बढ़ने लगे। तब नीलकमल ने तलवार से जीवनकाठी नामक उस ततैये के सिर को काट दिया। इसके साथ ही सारे राक्षसों के सिर कटकर लुढ़कने लगे। बूढ़ी राक्षसी का सिर छिटककर नीलकमल और लालकमल के पास आकर गिरा। नीलकमल और लालकमल ने उस बूढ़ी राक्षसी के सिर को एक नए कपड़े में बाँधा और मरणकाठी नामक ततैये को सोने के डिब्बे में डालकर बेंगमा-बेंगमी को पुकारा।।

तीन माह तेरह दिनों के बाद दोनों भाइयों के पैर अपने देश में पड़े। सर्वत्र उनकी जय-जयकार होने लगी। नीलकमल और लालकमल ने कहा, "कहाँ हैं वे सिपाही लोग? दवा ले जाओ!"

लेकिन वे तो सिपाही नहीं, राक्षस थे। वे लोग उसी दिन मर गए थे। नीलकमल एवं लालकमल ने छाती में कील, पीठ में कीलवाले राजा के देश में अपने सिपाहियों द्वारा राक्षसनी का सिर भिजवा दिया। सिर को देखते ही राक्षसी रानी अपने वास्तविक रूप में आ गई और गुस्से में लाल-पीली होती हुई अविलंब नीलकमल और लालकमल के राज्य में पहुँच गई।
लालकमल ने मरणकाठी नामक ततैया को सोने के डिब्बे से बाहर निकाला। उसे देखते ही राक्षसी रानी के प्राण उड़ गए।

राक्षसी रानी के मरते ही जड़ हो चुके राजा का रोग भी दूर हो गया। स्वस्थ होने पर राजा ने सारे राज्य में ढोल पिटवाया। प्रजाजनों ने आकर पूछा, "हाय! हमारे राजकुमार अजित और कुसुम कहाँ हैं?
राजा ने भी दीर्घ श्वास छोड़ते हुए कहा, “हाय! कहाँ हैं मेरे सुपुत्र?"

तभी राजभवन के बाहर ढाक-ढोल बजने लगे। थोड़ी ही देर में नीलकुसुम एवं लालकुसुम एक-दूसरे के गले में हाथ डाले राजा के सम्मुख उपस्थित हुए। राजा ने पूछा, “क्या तुम लोग मेरे अजित और कुसुम हो?"
प्रजागण एक स्वर में बोले, "हाँ! हाँ! ये ही हमारे अजित और कुसुम हैं।"

उसके बाद दोनों राज्य एक हो गए। नीलकुसुम और लालकुसुम ईलावती और लीलावती के साथ दोनों राज्यों में शासन करते हुए सुखपूर्वक रहने लगे।

 
 
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