नीलदेवी : भारतेंदु हरिश्चंद्र

Neel Devi : Bharatendu Harishchandra

ऐतिहासिक गीतिरूपक

गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ मधु यावत्पिवाम्यहं।
मयात्वयिहतेऽत्रैव गर्जिष्यन्याशु देवताः।: ’
‘त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः।
यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ।।’
‘इत्थं सदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
तदातदाऽवतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम् ।।
‘स्त्रियः सस्ताः सकलाः जगत्सु त्वयैका पूरितमम्बमेतत्,
नाटकस्थ पात्रगण
सूर्य देव : पंजाब प्रान्त का राजा।
सोमदेव : सूर्यदेव का पुत्र।
अब्दुश्शरीफ खाँ सूर : दिल्ली के बादशाह का सिपहसालार।
बसन्त : पागल बना हुआ महाराज सूर्यदेव का नौकर।
पं. विष्णु शर्मा : मौलवी के भेष में राजा का पंडित।
नीलदेवी : महाराज सूर्यदेव की रानी।
चपरगटटू और पीकदान अली दो मुफ्तखोरे।
देवसिंह इत्यादि सिपाही, राजपूत सर्दार।
मुसल्मान मुसाहिब, काजी, भटियारी, देवता, अप्सरा इत्यादि
मातृ भगिनी सखी तुल्या आर्य ललना गण।
आज बड़ा दिन है। क्रिस्तान लोगों को इससे बढ़कर कोई आनन्द का दिन नहीं है। किन्तु मुझ को आज उलटा और दुख है। इस कारण मनुष्य स्वभाव सुलभ ईर्षा मात्र है। मैं कोई सिद्ध नहीं कि रागद्वेषू से विहीन हूँ। जब मुझे अंगरेजी रमणी लोग मेदसिंचित केश राशि कृतृम (त्रि?) कुन्तलजूट, मिथ्या रत्नाभरण और विविध वर्ण वसन से भूषित क्षीण कटि देश कसे, निज निज पति गण के साथ, प्रसन्न बदन इधर से उधर फर फर कल की पुतली की भाँति फिरती हुई दिखलाई पड़ती हैं तब इस देश की सीधी साधी स्त्रियों की हीन अवस्था मुझको स्मरण आती है और यही बात मेरे दुख का कारण होती है। इससे यह शंका किसी को न हो कि मैं स्वप्न में भी यह इच्छा करता हूँ कि इन गौरांगी युवती समूह की भाँति हमारी कुललक्ष्मी गण भी लज्जा को तिलांजलि देकर अपने पति के साथ घूमै; किंतु और बातों में जिस भांति अंगरेजी स्त्रियाँ सावधान होती हैं, पढ़ी लिखी होती हैं, घर का काम काज सम्हालती हैं, अपने संतान गण को शीक्षा (शि?) देती हैं, अपना स्वत्व पहचानती हैं, अपनी जाति और अपने देश की सम्पत्ति विपत्ति को समझती हैं, उसमें सहाय देती हैं, और इतने समुन्नत मनुष्य जीवन को व्यर्थ ग्रह (गृ?) दास्य और कलह ही में नहीं खोतीं उसी भाँति हमारी गृह देवता भी वत्र्तमान हीनावस्था को उल्लंघन करके कुछ उन्नति प्राप्त करें, यही लालसा है। इस उन्नति पथ की अवरोधक हम लोगों की वर्तमान कुल परंपरा मात्र है और कुछ नहीं है। आय्र्य जन मात्र को विश्वास है कि हमारे यहाँ सव्र्वदा स्त्रीगण इसी अवस्था में थीं। इस विश्वास को भ्रम को दूर करने ही के हेतु यह ग्रंथ विरचित हो कर आप लोगों के कोमल कर कमलों में समर्पित होता है। निवेदन यही है कि आप लोग इन्हीं पुण्यरूप स्त्रियों के चरित्र को पढें, सुनें और क्रम से यथा शक्ति अपनी वृद्धि करें।
25 दिसंबर 1881

नीलदेवी : ऐतिहासिक गीतिरूपक

वियोगांत

प्रथम दृश्य

हिमगिरि का शिखर
(तीन अप्सरा गान करती हुई दिखाई देती हैं)
अप्सरागण.. (झिंझोटी जल्द तिताला)
धन धन भारत की छत्रनी।
वीरकन्यका वीरप्रसविनी वीरवधू जग जानी।।
सती सिरोमनि धरमधुरन्धर बुधि बल धीरज खानी।
इन के जस की तिहूँ लोक में अमल धुजा फहरानी ।।
सब मिलि गाओ प्रेम बधाई।
यह संसार रतन इक प्रेमहिं और बादि चतुराई ।।
प्रेम बिना फीकी सब बातैं कहहु न लाख बनाई।
जोग ध्यान जप तप व्रत पूजा प्रेम बिना बिनसाई ।।
हाव भाव रस रंग रीति बहु काव्य केलि कुसलाई।
बिना लोन विंजन सो सबही प्रेम रहित दरसाई ।।
प्रेमहि सो हरिहू प्रगटत हैं जदपि ब्रह्म जगराई।
तासों यह जग प्रेमसार है और न आन उपाई ।।

दूसरा दृश्य

युद्ध के डेरे खड़े हैं।
एक शामियाने के नीचे अमीर अबदुश्शरीफ खाँ सूर बैठा है और मुसाहिब लोग इर्द गिर्द बैठे हैं।
शरीफ : एक मुसाहिब से, अबदुस्समद! खूब होशियारी से रहना। यहाँ के राजपूत बड़े काफिर हैं। इन कमबख्तों से खुदा बचाए। ख्दूसरे मुसाहिब से, मलिक सज्जाद! तुम शव के पहरों का इन्तिजाम अपने जिम्में रक्खो न हो कि सूरजदेव शबेखून मारे। ख्काजी से, काजी साहब! मैं आप से क्या बयान करूँ, वल्लाही सूरजदेव एक ही बदबला है। इहातए पंजाब में ऐसा बहादुर दूसरा नहीं।
काजी : बेशक हुजूर! सुना गया है कि वह हमेशा खेमों ही में रहता है। आसमान शामियाना और जमीन ही उसे फर्श है। हजारों राजपूत उसे हरवक्त घेरे रहते हैं।
शरीफ : वल्लाह तुमने सच कहा, अजब बदकिरदार से पाला पड़ा, जाना तंग है। किसी तरह यह कमबख्त हाथ आता तो और राजपूत खुद बखुद पस्त हो जाते।
1 मुसाहिब: खुदाबन्द! हाथ आना दूर रहा उसके खौफ से अपने खेमे में रह कर भी खाना सोना हराम हो रहा है।
शरीफ : कभी उस बेईमान से सामने लड़ कर फष्तह नहीं मिलनी है। मैंने तो अब जी में ठान ली है कि मौका पाकर एक शब उसको सोते हुए गिरफ्तार कर लाना। और अगर खुदा को इस्लाम की रोशनी का जिल्वा हिन्दोस्तान जुल्मत निशान में दिखलाना मंजूर है तो बेशक मेरी मुराद बर आएगी।
काजी : इन्शा अल्लाह तआला।
शरीफ : कसम है कलामे शरीफ को मेरी खुराक आगे से इस तफक्कुर में आधी हो गई है। सब लोगों से, देखो अब मैं सोने जाता हूँ तुम सब लोग होशियार रहना।
गजल,
उठ कर सब की तरफ देख कर,
इस राजपूत से रहो हुशियार खबरदार।
गफलत न जष्रा भी हो खबरदार खबरदार ।।
ईमाँ की कसम दुश्मने जानी है हमारा।
काफिर है य पंजाब का सरदार है खबरदार ।।
अजदर है भभूका है जहन्नुम है बला है।
बिजली है गजब इसकी है तलवार खबरदार ।।
दरबार में वह तेग़े शररवार न चमके।
घरबार से बाहर से भी हर बार खबरदार ।।
इस दुश्मने ईमाँ को है धोखे से फँसाना।
लड़ना न मुकाबिल कभी जिनहार खबरदार ।।
(सब जाते हैं)

तीसरा दृश्य

पहाड़ की तराई
(राजा सूर्यदेव, रानी नीलदेवी और चार राजपूत बैठे हैं)
सू : कहो भाइयो इन मुसलमानों ने तो अब बड़ा उपद्रव मचाया है।
1 ला. : तो महाराज! जब तक प्राण हैं तब तक लड़ेंगे।
2 रा : महाराज! जय पराजय तो परमेश्वर के हाथ है परंतु हम अपना धम्र्म तो प्राण रहे तक निवाहैं ही गे।
सू. : हाँ हाँ, इसमें क्या संदेह है। मेरा कहने का मतलब यह है कि सब लोग सावधान रहैं।
3 रा. : महाराज! सब सावधान हैं। धम्र्म युद्ध में तो हमको जीतने वाला कोई पृथ्वी पर नहीं है। 
नी.दे. : पर सुना है कि ये दुष्ट अधम्र्म से बहुत लड़ते हैं।
सू. : प्यारी। वे अधम्र्म से लड़ें हम तो अधम्र्म नहीं न कर सकते। हम आर्यवंशी लोग धम्र्म छोड़ कर लड़ना क्या जानैं? यहां तो सामने लड़ना जानते हैं। जीते तो निज भूमि का उद्धार और मरे तो स्वर्ग। हमारे तो दोनों हाथ लड्डू हैं; और यश तो जीतै तो भी हमारा साथ है और मरैं तो भी। 
4 था. : महाराज। इसमें क्या संदेह है, और हम लोगों को एकाएकी अधम्र्म से भी जीतना कुछ दाल भात का गस्सा नहीं है।
नी.दे. : तो भी इन दुष्टों से सदा सावधान ही रहना चाहिए। आप लोग सब तरह चतुर हो मैं इसमें विशेष क्या कहूँ स्नेह कुछ कहलाए बिना नहीं रहता।
सू. दे. : (आदर से) प्यारी। कुछ चिंता नहीं है अब तो जो कुछ होगा देखा ही जायगा न। (राजपूतों से)।
सावधान सब लोग रहहु सब भाँति सदाहीं।
जागत ही सब रहैं रैनहूँ सोअहिं नाहीं ।।
कसे रहैं कटि रात दिवस सब वीर हमारे।
असव पीठ सो होंहि चारजामें जिनि न्यारे ।।
तोड़ा सुलगत चढ़े रहैं घोड़ा बंदूकन।
रहै खुली ही म्यान प्रतंचे नहिं उतरें छन ।।
देखि लेहिंगे कैसे पामर जवन बहादुर।
आवहिं तो चड़ि सनमुख कायर कूर सबै जुर ।।
दैहैं रन को स्वाद तुरंतहि तिनहिं चखाई।
जो पै इक छन हू सनमुख ह्नै करिहिं लराई ।।
(जवनिका पतन)

चौथा दृश्य

सराय
(भठियारी, चपरगट्टू खाँ और पीकदान अली)
चप. : क्यों भाई अब आज तो जशन होगा न? आज तो वह हिंदू न लड़ेगा न।
पीक. : मैंने पक्की खबर सुनी है। आज ही तो पुलाव उड़ने का दिन है। 
चप. : भई मैं तो इसी से तीन चार दिन दरबार में नहीं गया। सुना वे लोग लड़ने जायंगे। मैंने कहा जान थोड़ी ही भारी पड़ी है। यहाँ तो सदा भागतों के आगे मारतों के पीछे। जबान की तेग कहिए दस हजार हाथ झारूँ।
पीक. : भई इसी से तो कई दिन से मैं भी खेमों की तर्प$ नहीं गया। अभी एक हफ्ता हुआ मैं उस गाँव में एक खानगी है उसके यहाँ से चला आता था कि पाँच हिन्दुओं के सवारों ने मुझे पकड़ लिया और तुरक तुरक करके लगे चपतियाने। मैंने देखा कि अब तो बेतरह फँसे मगर वल्लाह मैंने भी अपने कौम और दीन की इतनी मजष्म्मत और हिन्दुओं की इतनी तारीफ की कि उन लोगों को छोड़ते ही बन आई। ले ऐसे मौके पर और क्या करता? मुसल्मानी के पीछे अपनी जान देता? 
चप. : हाँ जी किसकी मुसल्मानी और किसका कुफ्र। यहाँ अपने मांडे़ हलुए से काम है।
भठि. : तो मियाँ आज जशन में जाना तो देखो मुझको भूल मत जाना। जो कुछ इनाम मिलै उसमं भी कुछ देना। हाँ! देखो मैंने कई दिन खिदमत की है।
पीक. : जरूर जरूर जान छल्ला। यह कौन बात है तुम्हारे ही वास्ते तो जी पर खेलकर यहाँ उतरें हैं। (चपरगट्टू से कान में) यह सुनिए जान झोवें$ हम माल चाभैं बी भटियारी। यह नहीं जानतीं कि यहाँ इनकी ऐसी ऐसी हजारों चरा कर छोड़ दी हैं।
चप. : (धीरे से) अजी कहने दो कहने से कुछ दिये ही थोड़े देते हैं। भटियारी हो चाहे रंडी, आज तो किसी को कुछ दिया नहीं है उलटा इन्हीं लोगों का खा गए हैं (भटियारी से) वाह जान तक हाजिर है। जब कहो गरदन काट कर सामने रख दूँ। (खूब घूरता है।)
भटि. : (आँखें नचाकर) तो मैं भी तो मियाँ की खिदमत से किसी तरह बाहर नहीं हौं।
दोनो गाते हैं, 
पिकदानों चपरगट्टू है बस नाम हमारा।
इक मुफ्त का खाना है सदा काम हमारा ।।
उमरा जो कहै रात तो हम चाँद दिखा दें।
रहता है सिफारिश से भरा जाम हमारा ।।
कपड़ा किसी का खाना कहीं सोना किसी का।
गैरों ही से है सारा सरंजाम हमारा ।।
हो रंज जहाँ पास न जाएँ कभी उसके।
आराम जहाँ हो है वहाँ काम हमारा ।।
जर दीन है कुरप्रान है ईमां है नबी है।
जर ही मेरा अल्लाह है जर राम हमारा ।। 
भटि. : ले मैं तो मियाँ के वास्ते खाना बनाने जाती हूँ।
पिकदान : तो चलो भाई हम लोग भी तब तक जरा ‘रहे लाखों बरस साकी तेरा आबाद मैखाना’।
चपर. : चलो।
(जवनिका पतन)

पंचम दृश्य

(सूर्यदेव के डेरे का बाहरी प्रान्त)
(रात्रि का समय)
देवा सिंह सिपाही पहरा देता हुआ घूमता है।
नेपथ्य में गान
(राग कलिगड़ा)
सोंओ सुख निंदिया प्यारे ललन।
नैनन के तारे दुलारे मेरे बारे 
सोओ सुख निंदिया प्यारे ललन।
भई आधी रात बन सनसनात, 
पथ पंछी कोउ आवत न जात,
जग प्रकृति भई मनु थिर लखात 
पातहु नहिं पावत तरुन हलन ।।
झलमलत दीप सिर धुनत आय, 
मनु प्रिय पतंग हित करत हाय,
सतरात अंग आलस जनाय, 
सनसन लगी सिरी पवन चलन।
सोए जग के सब नींद घोर, 
जागत काम चिंतित चकोर,
बिरहिन बिरही पाहरू चोर, 
इन कहं छन रैनहूं हाय कल न ।।
सिपाही : बरसों घर छूटे हुए। देखें कब इन दुष्टों का मुँह काला होता है। महाराज घर फिर कर चलैं तो देस फिर से बसै। रामू की माँ को देखे कितने दिन हुए। बच्चा की खबर तक नहीं मिली (चैंक कर ऊँचे स्वर से) कौन है? खबरदार जो किसी ने झूटमूठ भी इधर देखने का विचार किया। (साधारण स्वर से) हां-कोई यह न जानै कि देवासिंह इस समय जोरू लड़कों की याद करता है इससे भूला है। क्षत्री का लड़का है। घर की याद आवै तो और प्राण छोड़कर लडै़। (पुकारकर) खबरदार। जागते रहना।
(इधर उधर फिर कर एक जगह बैठकर गाता है)
(कलिगड़ा)
प्यारी बिन कटत न कारी रैन।
पल छिन न परत जिय हाय चैन ।।
तन पीर बढ़ी सब छुटयो धीर,
कहि आवत नहिं कछु मुखहु बैन।
जिय तड़फड़ात सब जरत गात,
टप टप टकत दुख भरे नैन ।।
परदेस परे तजि देस हाय,
दुख मेटन हारो कोउ है न।
सजि विरह सैन यह जगत जैन,
मारत मरोरि मोहि पापी मैन ।।
प्यारी बिन कटत न कारी रैन।
(नेपथ्य में कोलाहल)
कौन है। यह कैसा शब्द आता है। खबरदार।
(नेपथ्य में विशेष कोलाहल)
(घबड़ाकर) हैं यह क्या है? अरे क्यों एक साथ इतना कोलाहल हो रहा है। बीर सिंह! बीर सिंह! बीर सिंह जागो। गांविद सिंह दौड़ो!
नेपथ्य में बड़ा कोलाहल और मार मार का शब्द। शस्त्र खींचें हुए अनेक यवनों का प्रवेश। अल्ला अकबर का शब्द। देवासिंह का युद्ध और पतन। यवनों का डेरे में प्रवेश। पटाक्षेप।

छठवाँ दृश्य

अमीर का खेमा
(मसनद पर अमीर अबदुश्शरीफ खाँ सूर बैठा है। इधर उधर 
मुसल्मान लोग हथियार बाँधे मोछ पर ताव देते बड़ी शान से बैठे हैं।)
अमीर : अलहम्दुलिल्लाह! इस कम्बख्त काफिर को तो किसी तरह गिरफ्तार किया। अब बाकी फौज भी फतह हो जायेगी।
1 सर्दार : ऐ हुजूर, जब राजा ही कैद हो गया तो फौज क्या चीज है। खुदा और रसूल के हुक्म से इसलाम की हर जगह फतह है। हिंदू हैं क्या चीज। एक तो खुदा की मार दूसरे बेवकूफ आनन फानन में सब जहन्नुमरसीद होंगे।
2 सर्दार : खुदाबंद! इसलाम के आफताब के आगे कुफ्र की तारीकी कभी ठहर सकती है? हुजूर अच्छी तरह से यकीन रक्खैं कि एक दिन ऐसा आवेगा जब तमाम दुनिया में ईमान का जिल्वा होगा। कुफ्फांर सब दाखिले दोजख होंगे और पयगँबरे आखिरूल् जमां सल्लरू-ल्लाह अल्लै हुम्सल्लम का दीन तमाम रूए जमीन पर फैल जायेगा।
अमीर : आमीं आमीं।
काजी : मगर मेरी राय है कि और गुफ्तगू के पेश्तर शुकरिया अदा किया जाय क्योंकि जिस हकतआला की मिहरबानी से यह फतह हासिल हुई है सबके पहिले उस खुदा का शुक्र अदा करना जुरूर है।
सब : बेशक, बेशक।
(व़$ाज़ी उठकर सब के आगे घुटने के बल झुकता है और फिर अमीर आदि भी उसके साथ झुकते हैं)
काजी : (हाथ उठाकर) काफिर पै मुसल्माँ को फतहयाब बनाया।
सब : (हाथ उठाकर) अलहमद् उलिल्ला ह।
काजी : की मेह बड़ी तूने य बस मेरे खुदाया।
सब : अलहम्द् उलिल्लाह्।
काजी : सदके में नवी सैयदे मक्की मदनी के, अतफाले अली के असहाब के, लश्कर मेरा दुश्मन से बचाया।
सब : अलहम्द् उलिल्लाह्।
काजी : खाली किया इक आन में दैरों को सनम से, शमशीर दिखा के, बुतखानः गिरा कर के हरम तूने बनाया।
सब : अलहम्द् उल्लिल्लाह।
काजी : इस हिंद से सब दूर हुई कुफ्र की जुल्मत, की तूने वह रहमत, नक्कारए ईमां को हरेक सिम्त बजाया।
सब : अलहम्द् उल्लिल्लाह।
काजी : गिरकर न उठे काफिरे बदकार जमीं से, ऐसे हुए गारत। आमीं कहो।
सब : आमीं।
काजी : मेरे महबूब खुदाया।
सब : अलहम्द् उल्लिल्लाह।
(जवनिका गिरती है)

सातवाँ दृश्य

कैदखाना। महाराज सूर्यदेव एक लोहे के पिंजड़े में मूर्छित पड़े हैं। 
एक देवता सामने खड़ा होकर गाता है।
देवता कृ
लावनी,
सब भांति दैव प्रतिकूल होइ एहि नासा।
अब तजहु बीर बर भारत की सब आसा ।।
अब सुख सूरज को उदय नहीं इत ह्नैहै।
सो दिन फिर इत सपनेहूं नहिं ऐहै ।।
स्वाधीनपनो बल धीरज सबहि नसैहै।
मंगलमय भारत भुव मसान ह्नै जैहै ।।
दुख ही दुख करिहै चारहु ओर प्रकासा।
अब तजहु बीर बर भारत की सब आसा ।।
इस कलह विरोध सबन के हिय घर करिहै।
मूरखता को तम चारहु ओर पसरिहै ।।
वीरता एकता ममता दूर सिधरि है।
तजि उद्यम सब ही दास वृत्ति अनुसरि है ।।
ह्नै जैहै चारहु बरन शूद्र वनि दासा।
अब तजहु बीर बर भारत की सब आसा ।।
ह्नैहैं सब इनके भूत पिशाच उपासी।
कोऊ बनि जैहैं आपुहि स्वयं प्रकासी ।।
नसि जैहैं सगरे सत्य धर्म अविनासी।
निज हरि सों ह्नै हैं बिमुख भरत भुवबासी ।।
तजि सुपथ सबहि जन करिहैं कुपथ बिलासा।
अब तजहुं बीर बर भारत की सब आसा ।।
अपनी वस्तुन कहँ लखिहैं सबहि पराई।
निज चाल छोड़ि गहिहैं औरन की धाई ।।
तुरकन हित करिहैं हिंदू संग लराई।
यवनन के चरनहिं रहिहैं सीस चढ़ाई ।।
तजि निज कुल करिहैं नीचन संग निवासा।
अब तजहु बीर बर भारत की सब आसा ।।
रहे हमहुँ कबहुँ स्वाधीन आर्य बल धारी।
यह दैहैं जिय सों सबही बात बिसारी ।।
हरि विमुख धरम बिनु धन, बलहीन दुखारी।
आलसी मंद तन छीन छुछित संसारी ।।
सुख सों सहिहैं सिर यवन पादुका त्रसा।
अब तजहु बीर बर भारत की सब आसा ।।
(जाता है)
सू. दे. : (सिर उठा कर) यह कौन था? इस मरते हुए शरीर पर इस ने अमृत और विष दोनों एक साथ क्यों बरसाया? अरे अभी तो यहां खड़ा गा रहा था अभी कहाँ चला गया? निस्संदेह यह कोई देवता था। नहीं तो इस कठिन पहरे में कौन आ सकता है। ऐसा सुंदर रूप और ऐसा मधुर सुर और किसका हो सकता है। क्या कहता था? ‘अब तजहु वीर वर भारत की सब आसा’ ऐं! यह देववाक्य क्या सचमुच सिद्ध होगा? क्या अब भारत का स्वाधीनता सूर्य फिर न उदय होगा? क्या हम क्षत्रिय राजकुमारों को भी अब दासवृत्ति करनी पडै़गी? हाय! क्या मरते मरते भी हमको यह वज्र शब्द सुनना पड़ा? और क्या कहा ‘सुख सौं सहिहैं सिर यवन पादुका त्रासा।’ हाय! क्या अब यहाँ यही दिन आवैगे? क्या भारत जननी अब एक भी वीर पुत्र न प्रसव करैगी? क्या दैव को अब इस उत्तम भूमि की यही नीच गति करनी है? हा! मैं यह सुनकर क्यों नहीं मरा कि आर्यकुल की जय हुई और यवन सब भारतवर्ष से निकाल दिए गए। हाय!
(हाय करता और रोता हुआ मुर्छित हो जाता है)
(जवनिका पतन)

आठवाँ दृश्य

मैदान-वृक्ष
(एक पागल आता है)
पागल : मार मार मार-काट काट काट-ले ले ले-ईबी-सीबी-बीबी-तुरक तुरक तुरक-अरे आया आया आया-भागो भागो भागो। (दौड़ता है) मार मार मार-और मार दे मार-जाय न जाय न-दुष्ट चांडाल गोभक्षी जवन-अरे हाँ रे जवन-लाल डाढ़ी का जवन-बिना चोटी का जवन-हमारा सत्यानाश कर डाला। हमारा हमारा हमारा। इसी ने इसी ने-लेना जाने न पावै। दुष्ट म्लेच्छ हूँ। हमको राजा बनावैगा। छत्र चँबर मुरछल सिंहासन सब-पर जवन का दिया-मार मार मार-शस्त्र न हो तो मंत्र से मार। मार मार मार। फट चट पट-जवन पट-षट-छट पट-आँ ईं ऊँ आकास बाँध पाताल-चोटी कटा निकाल। फः-हां हीं हौं-जवन जवन मारय मारय उच्चाटय उच्चाट्य........बेधय बेधय......नाशय........नाशय फाँसय फाँसय-त्रासय त्रसय........स्वाहा फू: सब जवन स्वाहा फू: अब भी नहीं गया? मार मार। हमारा देश-हम राजा हम रानी। हम मंत्री। हम प्रजा। और कौन? मार मार मार। तलवार तलवार। टूट गई टूटी। टूटी से मार। ढेले से मार। हाथ से मार। मुक्का जूता लात लाठी सोंटा ईंटा पत्थर-पानी सबसे मार हम राजा हमारा देश हमारा भेस हमारा पेड़ पत्ता कपड़ा लत्ता छाता जूता सब हमारा। ले चला ले चला। मार मार मार-जाय न जाय न-सूरज में जाय चंद्रमा में जाय जहां जाय तारा में जाय उतारा में जाय पारा में जाय जहाँ जाय वहीं पकड़-मार मार मार। मीयाँ मीयाँ मीयाँ चीयाँ चीयाँ चीयाँ। अल्ला अल्ला अल्ला हल्ला हल्ला हल्ला। मार मार मार। लोहे के नाती की दुम से मार पहाड़ की स्त्री के दिये से मार-मार मार-अंड का बंड का संड का खंड़-धूप छाँह चना मोती अगहन पूरा माघ कपड़ा लत्ता डोम चमार मार मार। ईंट की आँख में हाथी का बान-बंदर की थैली में चूने की कमान-मार मार मार-एक एक एक मिल मिल मिल-छिप छिप छिप-खुल खुल खुल-मार मार मार-
(एक मियाँ को आता देखकर)
मार मार मार-मुसल मुसल मुसल-मान मान मान-सलाम सलाम सलाम कि मार मार मार-नबी नबी नबी-सबी सबी-ऊँट के अंडे की चरबी का खर। कागज के धप्पे कर सप्पे की सर-मार मार मार।
(मियाँ के पास जाकर)
तुरुक तुरुक तुरुक-घुरुक घुरुक घुरुक-मुरुक मुरुक मुरुक-फुरुक फुरुक फुरुक-याम शाम लीम लाम ढाम-
(मियाँ को पकड़ने को दौड़ता है)
मियाँ : (आप ही आप) यह तो बड़ी हत्या लगी। इससे कैसे पिंड छूटेगा-(प्रकट) दूर दूर।
पागल : दूर दूर दूर-चूर चूर चूर-मियाँ की डाढ़ी में दोजख की हूर-दन तड़ाक छू मियाँ की माईं में मोयीं की मूँ-मार मार मार-मियाँ छार खा़र।
(मियाँ के पास जाकर अट्टहास करके)
रावण का साला दुर्योंधन का भाई अमरूत के पेड़ को पसेरी बनाता है-अच्छा अच्छा-नहीं नहीं तैने तो हमको उस दिन मारा था न! हाँ हाँ यही-जाने न पावे। मार मार- (मियाँ की गरदन पकड़कर पटक देता है और छाती पर चढ़कर बैठता है)
रावण का साला दिल्ली का नवाब वेद की किताब-बोल हम राजा कि तू राजा-(मियाँ की डाढ़ी पकड़कर खींचने से कृत्रिम डाढ़ी निकल आती है। विष्णु शर्मा को पहिचान कर अलग हो जाता है) रावण का साला मियाँ का भेस विष्णु के कान में शर्मा का केस। मेरी शक्ति गुरु की भक्ति फुरो मंत्रा ईश्वरोवाच डाढ़ी जगाके तो मियाँ साँच।
(आँख से इंगित करता है)
मियाँ : (फिर डाढ़ी लगाकर) लाहौलवलाकूअत क्या बेखबर पागल है। इसके घर के लोग इसके लौटने के मुनतजीर हैं यह यहीं पड़ा है। 
पागल : पड़ा घड़ा सड़ा-घूम घाम जड़ा-एक एक बात-जात सात धात-नास नास नास-घास छास फास।
मियाँ : क्या सचमुच-दरहकीकत-यह बड़ा भारी पागल है।
पागल : सचमुच नास-राजा अकास-ढाल बे ढाल मियाँ मतवाल (आँख से दूर जाने को। इंगित करता है। मियाँ आगे बढ़ते हैं-यह पीछे धूल फेंकता दौड़ता है)
मार मार मार। बरसा की धार। लेना जाने न पावे। मियाँ का खच्चर (दोनों एकांत में जाकर खड़े होते हैं)
मियाँ : (चारों ओर देखकर) अरे वसंत! क्या सचमुच सर्वनाश हो गया?
पागल : पंडित जी! कल सबेरी रात ही महाराज ने प्राण त्याग किए (रोता है)
मियाँ : हाय! महाराज हम लोगों को आप किसके भरोसे छोड़ गए! अब हमको इन नीचों का दासत्व भोगना पडै़गा! हाय हाय! (चारों ओर देखकर) हाँ, समाचार तो कहो क्या हुआ।
पागल : कल उन दुष्ट यवनों ने महाराज से कहा कि तुम जो मुसलमान हो जाओ तो हम तुमको अब भी छोड़ दें। इस समय वह दुष्ट अमीर भी वहीं खड़ा था। महाराज ने लोहे के पिंजडे़ में से उसके मुँह पर थूक दिया, और क्रोध कर के कहा कि दुष्ट! हमको पिंजड़े में बंद और परवश जानकर ऐसी बात कहता है। क्षत्राी कहीं प्राण के भय से दीनता स्वीकार करते हैं। तुझ पर थू और तेरे मत पर थू।
मियाँ : (घबड़ाकर) तब तब।
पागल : इस पर सब यवन बहुत बिगड़े। चारों ओर से पिंजड़े के भीतर शस्त्रा फेंकने लगे। महाराज ने कहा इस बंधन में मरना अच्छा नहीं। बड़े बल से लोहे के पिंजड़े का डंडा खींचकर उखाड़ लिया और पिंजड़े के बाहर निकल उसी लोहे के डंडे से सत्ताईस यवनों को मारकर उन दुष्टों के हाथ से प्राण त्याग किए। हाय! (रोता है)
मियाँ : (चारों ओर देखकर) और अब क्या होता है? महाराज का शरीर कहाँ है? तुमने यह सब कैसे जाना?
पागल : सब इन्हीं दुष्टों के मुख से सुना। इसी भेष में घूमते हैं। महाराज का शरीर अभी पिंजड़े में रक्खा है। कल जशन होगा। कल सब शराब पीकर मस्त होंगे। (चारों ओर देखकर) कल ही अवसर है।
मियाँ : तो कुमार सोमदेव और महारानी से हम जाकर यह वृत्त कह देते हैं, तुम इन्हीं लोगों में रहना।
पागल : हाँ हम तो यहीं हुई हैं। (रोकर) हम अब स्वामी के बिना वह जाही कर क्या करैंगे।
मियाँ : हाय! अब भारतवर्ष की कौन गति होगी? अब त्रौलोक्य ललाम सुता भारत कमलिनी को यह दुष्टयवन यथासुख दलन करैंगे। अब स्वाधीनता का सूर्य हम लोगों में फिर न प्रकाश करैगा। हाय! परमेश्वर तू कहाँ सो रहा है। हाय! धार्मिक वीर पुरुष की यह गति!
(उदास स्वर से गाता है)
(विहाग)
कहाँ करूनानिधि केसव सोए!
जागत नेकु न यदपि बहुत बिधि भारत बासी रोए ।।
इक दिन वह हो जब तुम छिन नहिं भारत हित बिसराए।
इतके पसु गज कों आरत लखि आतुर प्यादे धाए ।।
इक इक दीन हीन नर के हित तुम दुख सुनि अकुलाई।
अपनी संपति जानि इनहि तुम रहौ तुरंतहिं धाई ।।
प्रलय काल सम जौन सुदरसन असुर प्राण संहारी।
ताकी धार भई अब कुंठित हमरी बेर मुरारी ।।
दुष्ट जवन बरबर तुव संतति घास साग सम काटैं।
एक-एक दिन सहस सहस नर सीस काटि भुव पाटैं ।।
ह्नै अनाथ आरत कुल विधवा बिलपहिं दीन दुखारी।
बल करि दासी तिनहिं बनावहिं तुम नहिं लजत खरारी ।।
कहाँ गए सब शास्त्रा कही जिन भारी महिमा गाई।
भक्तवछल करुनानिधि तुम कहँ गयो बहुत बनाई ।।
हाय सुनत नहिं निठुर भए क्यों परम दयाल कहाई।
सब बिधि बूड़त लखि निज देसहि लेहु न अवहुँ बचाई ।।
(दोनों रोते हैं)
(जवनिका पतन)

नवाँ दृश्य

राजा सूर्यदेव के डेरे
(एक भीतरी डेरे में रानी नीलदेवी बैठी हैं 
और बाहरी डेरे में क्षत्री लोग पहरा देते हैं)
नी. दे. : (गाती और रोती)
तजी मोहि काके ऊपर नाथ।
मोहि अकेली छोड़ि गए तजि बालपने को साथ ।।
याद करहु जो अगिनि साखि दै पकरयौ मेरो हाथ।
सो सब मोह आज तजि दीनो कीनो हाय अनाथ ।। 1 ।।
प्यारे क्यों सुधि हाय बिसारी?
दीन भई बिड़री हम डोलत हा हा होय तुमारी ।।
कबहुँ कियो आदर जा तन को तुम निज हाथ पियारे।
ताही की अब दीन दशा यह कैसे लखत दुलारे ।।
आदर के धन सम जा तन कहँ निज अंकन तुम धारौ।
ताही कहैं अब परयौ धूर में कैसे नाथ निहारौ ।। 2 ।।
प्यारे कितै गई सो प्रीति?
निठुर होइ तजि मोहि सिधारे नेह निवाहन रीति ।।
कह्यो रह्यो जो छिन नहिं तजिहैं मानहु वचन प्रतीति।
सो मोहि जीवन लौं दुख दीनो करी हाय विपरीति ।। 3 ।।
कुमार सोमदेव चार राजपूतों के साथ बाहरी डेरे में आते हैं,
सोम : भाइयो, महाराज का समाचार तो आप लोगों ने सुना। अब कहिए क्या कत्र्तव्य है? मेरी तो शोक से मति विकल हो रही है। आप लोगों की जो अनुमति हो किया जाय।
1 रा पू : कुमार आप ऐसी बात कहैंगे कि शोक से मति विकल हो रही है तो भारतवर्ष किस का मुँह देखैगा। इस शोक का उत्तर हम लोग अश्रुधारा से न देकर कृपाण धारा से देंगे।
2 रा पू : बहुत अच्छा !!! उन्मत्त सिंह, तुमने बहुत अच्छा कहा। इन दुष्ट चांडाल यवनों के रुधिर से हम जब तक अपने पितरों का तर्पण न कर लेंगे हम कुमार की शपथ करके प्रतिज्ञा कर के कहते हैं कि हम पितृऋण से कभी उऋण न होंगे।
3 रा पू : शाबाश! विजयसिंह ऐसा ही होगा। चाहे हमारा सर्वस्व नाश हो जाय परंतु आकल्पांत लोह लेखनी से हमारी यह प्रतिज्ञा दुष्ट यवनों के हृदय पर लिखी रहैगी। धिक्कार है उस क्षत्रियाधर्म को जो इन चांडालों के मूल नाश में न प्रवृत्त हो।
4 रा पू : शत बार धिक्कार है। सहस्र बार धिक्कार है उसको जो मनसा वाचा कर्मणा किसी तरह इन कापुरुषों से डरै। लक्ष वार कोटि बार कोटि बार धिक्कार है उसको जो इन चांडालों के दमन करने में तृण मात्रा भी त्राुटि करै। (बायाँ पैर आगे बढ़ा कर) म्लेच्छ कुल के और उसके पक्षपातियों के सिर पर यह मेरा बायाँ पैर है जो शरीर के हजार टुकड़े होने तक ध्रुव की भांति निश्चल है। जिस पामर को कुछ भी सामथ्र्य हो हटावै। 
सो. दे. : धन्य आर्यवीर पुरूषगण! तुम्हारे सिवा और कौन ऐसी बात कहैगा। तुम्हारी ही भुजा के भरोसे हम लोग राज्य करते हैं। यह तो केवल तुम लोगों का जी देखने को मैंने कहा था। पिता की वीरगति का शोच किस क्षत्रिय को होगा? हाँ जो हम लोग इन दुष्ट यवनों का दमन न करके दासत्व स्वीकार करैं तो निसंदेह दुःख हो। (तलवार खींच कर) भाइयो, चलो इसी क्षण हम लोग उस पामर नीच यवन के रक्त से अपने आर्य पितरों को तृप्त करें।
चलहु बीर उठि तुरत सवै जय ध्वजहि उड़ाओ।
लेहु म्यान सो खग खींचि रनरंग जमाओ ।।
परिकर कसि कटि उठो धनुष पै धरि सर साधौ।
केसरिया बानो सजि सजि रनकंकन बाँधौ ।।
जौ आरज गन एक होइ निज रूप सम्हारैं।
तजि गृह कलहहि अपनी कुल मरजाद विचारैं ।।
तौ ये कितने नीच कहा इनको बल भारी।
सिंह जगे कहुँ स्वान ठहरिहैं समर मँझारी ।।
पदतल इन कहँ दलहु कीट त्रिन सरिस जवनचय।
तनिकहु संक न करहु धर्म जित जय तित निश्चय ।।
आर्य वंश को बधन पुन्य जा अधंम धर्म मै।
गोभक्षन द्विज श्रुति हिंसन नित जास कर्म मैं ।।
तिनको तुरितहिं हतौ मिलैं रन कै घर माहीं।
इन दुष्टन सों पाप किएहुँ पुन्य सदाहीं ।।
चिऊँटिहु पदतल दबे डसत ह्नै तुच्छ जंतु इक।
ये प्रत्तच्छ अरि इनहिं उपेछै जौन ताहि धिक ।।
धिक तिन कहँ जे आर्य होइ जवनन को चाहैं।
धिक तिन कहँ जे इनसों कछु संबंध निबाहैं ।।
उठहु बीर तरवार खींचि मारहु घन संगर।
लोह लेखनी लिखहु आर्य बल जवन हृदय पर ।।
मारू बाजे बजैं कहौ धौंसा घहराहीं।
उड़हिं पताका सत्रु हृदय लखि लखि थहराहीं ।।
चारन बोलहिं आर्य सुजस बंदी गुन गावैं।
छुटहिं तोप घनबोर सबै बंदूक चलावैं ।।
चमकहिं असि भाले दमकहिं ठनकहिं तन बखतर।
हींसहिं हय झनकहिं रथ गज चिक्करहिं समर थर ।।
छन महँ नासाहिं आर्य नीच जवनन कहँ करि छय।
कहहु सबै भारत जय भारत जय भारत जय ।।
सब वीर : भारतवर्ष की जय-प्रार्यकुल की जय-महाराज सूर्यदेव की जय- महारानी नीलदेवी की जय-कुमार सोमदेव की जय-क्षत्रिय वंश की जय।
(आगे आगे कुमार उसके पीछे तलवार खींचकर क्षत्रिय चलते हैं। रानी नीलदेवी बाहर के घर में आती हैं)
नील : पुत्र की जय हो। क्षत्रिय कुल की जय हो। बेटा एक बात हमारी सुन लो तब युद्ध यात्रा करो।
सोम : (रानी को प्रणाम करके) माता! जो आज्ञा हो।
नी. दे. : कुमार तुम अच्छी तरह जानते हो कि यवन सेना कितनी असंख्य है और यह भी भली भाँति जानते हो कि जिस दिन महाराज पकड़े गए उसी दिन बहुत से राजपूत निराश होकर अपने अपने घर चले गए। इससे मेरी बुद्धि में यह बात आती है कि इनसे एक ही बेर संमुख युद्ध न करके कौशल से लड़ाई करना अच्छी बात है।
सो. दे. : (कुछ क्रोध कर के) तो क्या हम लोगों में इतनी सामथ्र्य नहीं कि यवनों को युद्ध में लड़कर जीतैं?
सब क्षत्राी : क्यों नहीं?
नी. दे. : (शांत भाव से) कुमार तुम्हारी सर्वदा जय है। मेरे आशीर्वाद से तुम्हारा कहीं पराजय नहीं है। किंतु माँ की आज्ञा मानना भी तो तुमको योग्य है।
सब क्षत्राी : अवश्य अवश्य।
सोम : (हाथ जोड़कर) माँ, जो आज्ञा होगी वही करूँगा!
नी. दे. : अच्छा सुनो। (पास बुलाकर कान में सब विचार कहती हैं)
सोम : जो आज्ञा।
(एक ओर से कुमार और दूसरी ओर से रानी जाती हैं)
(पटाक्षेप)

दसवाँ दृश्य

स्थान-अमीर की मजलिस
(अमीर गद्दी पर बैठा है। दो चार सेवक खड़े हैं। 
दो चार मुसाहिब बैठे हैं। सामने शराब के पियाले, 
सुराही, पानदान, इतरदान रक्खा है। 
दो गवैये सामने गा रहे हैं। अमीर नशे में झूमता है)
गवैये : आज यह फत्ह की दरबार मुबारक होए।
मुल्क यह तुझको शहरयार मुबारक होए ।।
शुक्र सद शुक्र की पकड़ा गया वह दुश्मने दीन।
फत्ह अब हमको हरेक बार मुबारक होए ।।
हमको दिन रात मुबारक हो फतह ऐणे उरूज।
काफिरों को सदा फिटकार मुबारक होए ।।
फत्हे पंजाब से सब हिंद की उम्मीद हुई।
मोमिनो नेक य आसार मुबारक होए ।।
हिंदू गुमराह हों बेजर हों बनें अपने गुलाम।
हमको ऐशो तरबोतार मुबारक होए ।।
अमीर : आमीं आमीं। वाह वाह वल्लाही खूब गाया। कोई है? इन लोगों को एक एक जोड़ा दुशाला इनआम दो। (मद्यपान)
(एक नौकर आता है)
नौ : खुदावंद निआमत! एक परदेस की गानेवाली बहुत ही अच्छी खे़मे के दरवाजे पर हाजिर है। वह चाहती है कि हुजूर को कुछ अपना करतब दिखलाए। जो इरशाद हो बजा लाऊँ।
अमीर : जरूर लाओ। कहो साज मिला कर जल्द हाजिर हो।
नौ : जो इरशाद। (जाता है)
अमीर : आज के जशन का हाल सुनकर दूर दूर से नाचने गानेवाले चले आते हैं।
मुसाहिब : बजा इरशाद है, और उनको इनाम भी बहुत ज्यादा: मिलता है न क्यों आवैं?
(चार समाजियों के साथ एक गायिका का प्रवेश)
अमीर : आप ही आप, यह तायफा तो बहुत ही खूबसूरत है! ख्प्रगट, तुम्हारा क्या नाम है? (मद्यपान)
गायिका : मेरा नाम चंडिका है। मैं बड़ी दूर से आपका नाम सुनकर आती हूँ।
अमीर : बहुत अच्छी बात है। जल्द गाना शुरू करो। तुम्हारा गाना सुनने को मेरा इश्तियाक हर लहजे बढ़ता जाता है। जैसी तुम खूबसूरत हो वैसा ही तुम्हारा गाना भी खूबसूरत होगा। (मद्यपान)
गायिका : जो हुकुम। (गाती है)
ठुमरी तिताला
हाँ मोसे सेजिया चढ़लि नहिं जाई हो।
पिय बिनु साँपिन सी डसै बिरह रैन ।।
छिन छिन बढ़त बिथा तन सजनी,
कटत न कठिन वियोग की रजनी ।।
बिनु हरि अति अकुलाई हो।
अमीर : वाह वाह क्या कहना है! (मद्यपान) क्यों फिदाहुसैन! कितना अच्छा गाया है।
मुसाहिब : सुबहानअल्लाह! हुजूर क्या कहना है। वल्लाह मेरा तो क्या जिक है मेरे बुजुर्गों ने ख्वाब में भी ऐसा गाना नहीं सुना था।
(अमीर अंगूठी उतारकर देना चाहता है)
गायिका : मुझको अभी आपसे बहुत कुछ लेना है। अभी आप इसको अपने पास रखें आखीर में एक साथ मैं सब ले लूँगी।
अमीर : (मद्यपान करके) अच्छा! कुछ परवाह नहीं। हाँ, इसी धुन की एक और हो मगर उसमें फुरकत का मजमून न हो क्योंकि आज खुशी का दिन है।
गायिका : जो हुकुम (उसी चाल में गाती है)
जाओ जाओ काहे आओ प्यारे कतराए हो।
काहे चलो छाँह से छाँह मिलाए हो ।।
जिय को मरम तुम साफ कहत किन काहे फिरत मँडराए हो।
एहो हरि देखि यह नयो मेरो जीवन हम जानी तुम जो लुभाए हो ।।
अमीर : (मद्यपान कर के अत्यंत रीझने का नाट्य करता है) कसम खुदा की ऐसा गाना मैंने आज तक नहीं सुना था। दरहकीकत हिंदोस्तान इल्म का खजाना है। वल्लाह मैं बहुत ही खुश हुआ।
मुसाहिब गण: वल्लाह, (बजा इरशाद बेशक इत्यादि सिर और दाढ़ी हिलाकर कहते हैं) 
अमीर : तुम शराब नहीं पीतीं?
गायिका : नहीं हुजूर।
अमीर : तो आज हमारी खातिर से पीओ।
गायिका : अब तो आपके यहाँ आई ही हूँ। ऐसी जल्दी क्या है। जो जो हुजूर कहैंगे सब करूँगी।
अमीर : अच्छा कुछ परवाह नहीं। (मद्यपान) थोड़ा सा और आगे बढ़ आओ।
(गायिका आगे बढ़ कर बैठती है)
अमीर : (खूब घूरकर स्वागत) हाय हाय! इसको देखकर मेरा दिल बिलकुल हाथ से जाता रहा। जिस तरह हो आज ही इसको काबू में लाना जरूर है। (प्रगट) वल्लाह, तुम्हारे गाने ने मुझको बेअख़्तियार कर दिया है। एक चीज़ और गाओ इसी धुन की। (मद्यपान) 
गायिका : जो हुकुम। (गाती है)
हाँ गरवा लगावै गिरिधारी हो, देखो सखी लाज सरम जग की,
छोड़ि चट निपट निलज मुख चूमै बारी बारी।
अति मदमाती हरि कछु न गिनत छैल बरजि रही मैं होई होई बलिहारी।
अब कहाँ जाऊँ कहा करूँ लाज की मैं मारी।
अमीर : (मद्यपान करके उन्मत्त की भाँति) वाह! क्या कहना है। (गिलास हाथ में उठाकर) एक गिलास तो अब तुझको जरूर ही पीना होगा। लो तुमको मेरी कसम, वल्लाह मेरे सिर की कसम जो न पी जाओ।
गायिका : हुजूर मैंने आज तक शराब नहीं पी है। मैं जो पीऊँगी तो बिल्कुल बेहोश हो जाऊँगी।
अमीर : कुछ परवाह नहीं, पीओ।
गायिका : हाथ जोड़कर, हुजूर, एक दिन के वास्ते शराब पीकर मैं क्यों अपना ईमान छोडूँ?
अमीर : नहीं नहीं, तुम आज से हमारी नौकर हुई, जो तुम चाहोगी तुमको मिलैगा। अच्छा हमारे पास आओ हम तुमको अपने हाथ से शराब पिलावैंगे।
(गायिका अमीर के अति निकट बैठती है)
अमीर : लो जान साहब!
(पियाला उठाकर अमीर जिस समय गायिका के पास ले जाता है उस समय गायिका बनी हुई नीलदेवी चोली से कटार निकालकर अमीर को मारती है और चारों समाजी बाजा फेंककर शस्त्रा निकालकर मुसाहिब आदि को मारते हैं)।
नी. दे. : ले चांडाल पापी! मुझको जान साहब कहने का फल ले, महाराज के बध का बदला ले। मेरी यही इच्छा थी कि मैं इस चांडाल का अपने हाथ से बध करूँ। इसी हेतु मैंने कुमार को लड़ने से रोका सो इच्छा पूर्ण हुई। (और आघात) अब मैं सुखपूर्वक सती हूँगी
अमीर : (मृतावस्था में) दगा-अल्लाह चंडिका-
(रानी नीलदेवी ताली बजाती है (तंबू फाड़कर शस्त्रा खींचे हुए, कुमार सोमदेव राजपूतों के साथ आते हैं। मुसलमानों को मारते और बाँधते हैं। क्षत्राी लोग भारतवर्ष की जय, आर्यकुल की जय, क्षत्रियवंश की जय, महाराज सूर्यदेव की जय, महारानी नीलदेवी की जय, कुमार सोमदेव की जय इत्यादि शब्द करते हैं)।

  • संपूर्ण हिन्दी नाटक, व्यंग्य और निबंध : भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
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