Neech Sauteli Maan : Lok-Katha (Kashmir)

नीच सौतेली माँ : कश्मीरी लोक-कथा

एक दिन एक ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को अपने बिना खाना खाने से मना किया ताकि कहीं ऐसा न हो कि वह बकरी बन जाये। इसके जवाब में उसकी पत्नी ने भी उससे यही कहा कि वह भी उसके बिना खाना नहीं खायेगा ताकि वह कहीं चीता न बन जाये। दोनों राजी हो गये।

इस तरह काफी दिन निकल गये और दोनों में से किसी ने अपना वायदा नहीं तोड़ा। दोनों एक दूसरे के साथ ही खाना खाते थे पर एक दिन उस ब्राह्मण की पत्नी ने अपने बच्चों को खाना देते समय उस खाने में से चखने के लिये एक कौर खुद खा कर देख लिया।

उस समय क्योंकि उसका पति वहाँ था नहीं सो उसकी पत्नी तुरन्त ही एक बकरी बन गयी। जब वह ब्राह्मण घर आया तो उसने देखा कि एक बकरी उसके घर के चारों तरफ घूम रही है।

यह देख कर वह बहुत दुखी हुआ क्योंकि वह तुरन्त ही जान गया कि वह बकरी और कोई नहीं बल्कि उसकी अपनी प्यारी पत्नी थी। उसने उसको अपने घर के आँगन में बाँध दिया और उसकी बड़ी सावधानी से सेवा करने लगा।

कुछ साल बाद उसने दूसरी शादी कर ली पर उसकी दूसरी पत्नी उसकी पहली पत्नी के बच्चों के साथ बिल्कुल भी अच्छा व्यवहार नहीं करती थी। वह तो उनको खाना भी बहुत कम देती थी। वे बच्चे बेचारे बहुत परेशान रहते थे।

उनकी बकरी माँ उनकी शिकायतों को सुनती रहती पर वह बेचारी भी कुछ नहीं कर सकती थी।

उन बच्चों की माँ ने यह भी देखा कि उसके बच्चे दुबले होते जा रहे हैं। इसलिये एक दिन उसने अपने बच्चों में से एक बच्चे को अपने पास बुलाया और उससे दूसरों को भी यह बात चुपचाप बताने के लिये कहा कि जब भी उनको भूख लगे तो वे एक डंडी से उसके सीगों को मारें। ऐसा करने से उसके सीगों में से कुछ खाना निकल आयेगा जिसे वे खा सकते थे।

बच्चों ने ऐसा ही किया। अब जब भी उनको भूख लगती तो वे अपनी बकरी माँ के सींगों में डंडी मारते, इससे उनमें से कुछ खाना निकल आता और वे उसको खा कर अपना पेट भर लेते। इससे धीरे धीरे उनकी तन्दुरुस्ती अच्छी होने लगी।

पर यह तो उस सौतेली माँ की उम्मीदों के खिलाफ हो रहा था। उसके सौतेले बच्चे तो बजाय दुबले होने के और ज़्यादा तन्दुरुस्त होते जा रहे थे जबकि वह खुद उनको बहुत कम खाना देती थी। वह उनको इतना तन्दुरुस्त देख कर बहुत ही ताज्जुब में पड़ गयी कि यह सब कैसे हो रहा था।

कुछ समय बाद उस ब्राह्मण की दूसरी पत्नी ने एक एक आँख की बेटी को जन्म दिया। वह अपनी उस कानी बेटी को बहुत प्यार करती थी और उसकी किसी भी जरूरत को तुरन्त ही पूरा करने को तैयार रहती थी जिसको वह समझती थी कि वह उसको चाहिये।

कुछ दिनों बाद जब वह लड़की काफी बड़ी हो गयी, चलने फिरने लगी, बोलने चालने लगी, अच्छी तरह बात करने लगी तो उसकी माँ उसको दूसरे बच्चों के साथ बाहर खेलने के लिये भेजने लगी।

उसने उसको यह भी कहा कि वह अपने बड़े भाई बहिनों पर निगाह रखे कि वे कब और कैसे खाते पीते हैं। लड़की ने कहा “ठीक है।”

वह लड़की उनके साथ सारे दिन रही और उसने वह सब कुछ देखा जो उनके साथ हुआ।

यह सुन कर कि बकरी उसके सौतेले बच्चों को खाना दे रही थी वह दूसरी पत्नी बहुत गुस्सा हुई। उसने तय कर लिया कि वह उस बकरी को जल्दी से जल्दी मरवा देगी।

एक दिन उसने बहाना किया कि वह बहुत बीमार है और अपने इलाज के लिये एक हकीम को बुलवाया। उसने उस हकीम को रिश्वत दी और कहा कि वह उसके लिये दवा के तौर पर बकरी का माँस खाने के लिये बताये। उस हकीम ने ऐसा ही किया।

ब्राह्मण अपनी पत्नी की बीमारी के लिये बहुत चिन्तित था और हालाँकि वह बकरी को बिल्कुल मारना नहीं चाहता था फिर भी वह अपनी दूसरी पत्नी को ठीक करने के लिये उस बकरी को मारने को लिये तैयार हो गया।

पर यह सुन कर उसकी पहली पत्नी के छोटे छोटे बच्चे बहुत रोये। वे बहुत दुखी हो कर अपनी बकरी माँ के पास गये और उसको जा कर सब बताया।

उनकी माँ ने कहा — “मेरे प्यारे बच्चों रोओ नहीं। जो ज़िन्दगी मैं जी रही हूँ ऐसी ज़िन्दगी से तो मर जाना अच्छा है। रोओ नहीं। मुझे तुम्हारे खाने को ले कर कोई दुख नहीं है क्योंकि अगर तुम मेरा कहा करोगे तो खाना तो तुमको उसके बाद भी मिलता रहेगा।

मेरे मरने के बाद तुम लोग मेरी हड्डियाँ इकट्ठी कर लेना और उनको किसी ऐसी जगह दबा देना जहाँ उनको कोई ढूँढ न सके। फिर जब भी तुमको भूख लगे तो तुम वहाँ आ जाना तुमको वहाँ खाना मिल जायेगा।”

उस बकरी ने उनको यह सलाह बड़े समय से दे दी थी क्योंकि जैसे ही उसने अपनी बात खत्म की और उसके बच्चे वहाँ से गये कि तभी एक कसाई अपना बड़ा सा चाकू ले कर वहाँ आ पहुँचा और उसने उस बकरी को मार दिया।

उस बकरी के शरीर को टुकड़ों में काट कर पका दिया गया। ब्राह्मण की पत्नी ने उस बकरी के माँस को खाया पर बच्चों को केवल हड्डियाँ ही मिलीं।

बच्चों ने उन हड्डियों का वही किया जो उनकी बकरी माँ ने उनसे करने के लिये कहा था। उन्होंने उसकी हड्डियाँ एक ऐसी जगह दबा दीं जहाँ उन्हें कोई ढूँढ नहीं सकता था।

जब उनको खाने की जरूरत होती तो वे वहाँ जाते और उन हड्डियों से खाना माँग लेते और उनको खाना मिल जाता। सो अब उनको फिर से खाना रोज और खूब मिल रहा था। अब वे भूखे भी नहीं रहते थे। उनकी तन्दुरुस्ती फिर से ठीक होती जा रही थी।

उस बकरी के मर जाने के कुछ समय बाद ब्राह्मण की पहली पत्नी की एक बेटी पानी के नाले में अपना चेहरा धो रही थी कि उसकी नाक की लौंग खुल गयी और पानी में गिर गयी। एक मछली पानी के साथ साथ उसको भी पी गयी।

अब हुआ यह कि एक मछियारे ने वह मछली पकड़ ली और राजा के रसोइये को बेच दी।

रसोइये ने जब उस मछली को पकाने के लिये काटा तो उसको यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसके अन्दर तो नाक की एक लौंग थी। वह उसको ले कर राजा के पास गया तो राजा को भी उसमें रुचि हो गयी।

राजा ने अपने राज्य में यह मुनादी पिटवा दी कि जिस किसी की भी नाक की लौंग खो गयी हो वह उसको राजा से आ कर ले जाये।

कुछ ही दिनों में उस लड़की का भाई राजा के पास आया और बोला कि वह नाक की लौंग उसकी बहिन की थी। उसकी यह नाक की लौंग उसका चेहरा धोते समय नाले में गिर पड़ी थी।

राजा ने उस लड़की को बुलाया तो वह उसकी सुन्दरता और अच्छा व्यवहार देख कर इतना प्रभावित हुआ कि उसने उससे शादी कर ली और उसके परिबार की भी खूब सहायता की।

(सुषमा गुप्ता)

 
 
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