नसीबन (कहानी) : अनवर सुहैल
Naseeban (Story in Hindi) : Anwar Suhail
शहडोल जाने वाली बस आज लेट है।
नसीबन बस-स्टैंड के यात्री-प्रतीक्षालय में बैठी बस का इंतजार कर रही थी। उसका चार वर्षीय बेटा बार-बार मूँगफली खाने की जिद कर रहा था। सुबह थोड़ा बासी टूँगाहै, भुखा गया होगा अब तक!
लेकिन क्या किया जाए? नसीबन उसे डाँटने लगी।
वह जानती है कि बस का यही आलम रहा तो शहडोल पहुँचते-पहुँचते शाम हो जाएगी।
मुसुआ सुबह उठा तो शहडोल जाने की उमंग में झटपट तैयार हो गया। हाँ, इतनी सुबह उसे पैखाना कहाँ से उतरता। रात नाना के घर दावत हुई तो जम कर 'गोश्त-पुलाव' खायागया था। फिर टीवी पर 'निकाह' पिक्चर दिखाई जाने लगी, तो सभी बैठ गए। पाकिस्तानी अभिनेत्री सलमा आग़ा का इसमें जबरदस्त रोल था।
नसीबन को 'निकाह' का वो गाना कभी नहीं भूलता जिसे सलमा आग़ा ने नकियाती आवाज में गाया था... 'दिल के अरमाँ आँसुओं में बह गए'
कितनी दिलकश आवाज है सलमा आग़ा की...
उसी गाने के कारण नसीबन 'निकाह' खासकर देखना चाहती थी।
अब्बा को पिक्चर में कोई दिलचस्पी नहीं। वह इशा (रात की आखिरी नमाज) की नमाज अदा करने मस्जिद गए तो फिर काफी रात गए वापस आए। अम्मा ने कह भी दिया था कि चूँकि आजगोश्त-पुलाव का कार्यक्रम है, इसलिए मगरिब (सूर्यास्त पर पढ़ी जाने वाली नमाज) बाद खाना मिलने का सवाल ही नहीं।
इत्मीनान के साथ इशा के बाद खाना मिलेगा।
नसीबन के दो बार निकाह हुए किंतु उसने इससे पहले कभी 'निकाह' पिक्चर देखी न थी। नसीबन ने 'तलाक' का दर्द झेला था। नसीबन सिसकियाँ ले-लेकर पिक्चर देखती रही।
बीच-बीच में आने वाले विज्ञापन थोड़ा विघ्न जरूर डालते, लेकिन इससे नसीबन को कोई फर्क न पड़ता। नसीबन की अम्मा ने समझाया कि उस मरदूद पर न रो बेटी, उसके जिस्मपर तो कीड़े पड़ेंगे। एड़ियाँ रगड़-रगड़ कर मरेगा जुम्मन समझे! उसने मेरी फूल सी बेटी को बहुत तकलीफ दी है। खुदा उसे कभी माफ न करेगा।
नसीबन को फिल्म में तब जाकर सुकून मिला जब कि दूल्हे-मियाँ काजी के पास जाकर रोते गिड़गिड़ाते हैं। तलाक के बाद सलमा आग़ा से दुबारा निकाह कैसे हो सकता है इसकेलिए मसला जानना चाहते हैं।
काजी साहब समझाते हैं - 'इसीलिए कहा गया है कि बिना सोचे समझे तलाक लफ्ज़ न बोला जाए। क़ुरआन-शरीफ में तलाक की मजम्मत की गई है।'
तब तक अब्बा भी आ गए थे। वे मसला-मसायल में दिलचस्पी रखते हैं, इसलिए वह भी बैठ कर फिल्म देखने लगे।
इसी सब में काफी रात गुजर गई।
उसे सुबह पहली बस से जाना भी था। अम्मा ने कहा कि रात बहुत हो गई है, इसलिए अब नसीबन चाहे तो दूसरी बस से शहडोल चली जाए। दूसरी बस आठ बजे सुबह जाती है। लेकिननसीबन ने कहा कि वह पहली बस से ही जाएगी। वरना शहडोल पहुँचने में बहुत देर हो जाएगी। इधर पंचायत का चुनाव होने वाला है और दूसरे मनेंद्रगढ़ से शहडोल के बीच सड़ककी हालत बहुत ज्यादा खस्ता हो चुकी है। एक सौ तीस किलोमीटर के सफर में पूरे आठ से नौ घंटे लग जाते हैं। सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे इतने कि बसों का पट्टा-कमानीजवाब दे जाता। पूरी 'बॉडी' झनझना जाती। कई बसें कबाड़ा हो गई हैं। वह तो सवारियाँ मिल जाती हैं, वरना बस-मालिक बस खड़ी रखते। इस रूट में बस चलाना एक घाटे कासौदा है।
इसीलिए नसीबन चाहती थी कि दिन रहते वह घर छोड़ दे।
मुसुआ की जिद से परेशान होकर वह स्टैंड पर भुनी-मूँगफली के ठेले पर गई और पचास ग्राम मूँगफली खरीदी। मूँगफली वाले ने अढ़ाई रुपये माँगे।
'एक छँटाक मूँगफली के अढ़ाई रुपये?' वह चीखी।
'चिल्लाती काहे हैं, पूरे मनेंद्रगढ़ में यही दाम है। लेना हो तो लीजिए?' ठेले वाला बिगड़ कर भूत हो गया।
'दो रुपया दूँगी, लेना हो तो लो वरना सामान वापस...' कहने को तो कह दिया उसने किंतु मुसुआ की जिद के आगे हार मानकर वह बोली - 'अच्छा ऐसा कर कि मुझे दो रुपये कीमूँगफली ही दे दो। थोड़ा कम कर लो और क्या?'
मूँगफली पाकर मुसुआ झूम उठा। वह अपनी तुतली आवाज में गाना गाने लगा।
'कहो न प्याल है...'
नसीबन वात्सल्य रस से ओत-प्रोत हो उठी। ममता उसकी आँखों से छलकने लगी। वह मुसुआ को मूँगफली के दाने छील-छील कर देने लगी। नसीबन मुसुआ को जान से भी ज्यादा चाहतीहै। अपने सीमित साधनों के बीच वह मुसुआ की हर जिद पूरा करने का प्रयास करती। वह हमेशा अल्लाह पाक परवरदिगार का शुक्रिया अदा किया करती।
मुसुआ के अब्बा भी मुसुआ को बहुत प्यार करते। आखिर अधेड़ावस्था में बाप बनने का एक अलग ही सुख है। मुसुआ के अब्बा का ध्यान क्या आया कि वह बेचैन हो उठी।
नसीबन का दूसरा पति गुलजार खान, फोरमैन... उम्र पचपन वर्ष... ढेर सी पैत्रिक और व्यक्तिगत संपति के स्वामी... किंतु आल-औलाद की खुशी से महरूम! जब तक पहली पत्नीजीवित रही, दूसरी शादी का ख्याल भी मन में न लाया। गुलजार खान की पहली बीवी को मलेरिया हुआ था। मलेरिया कब टाइफाइड में बदला और कब उसे पीलिया भी हो गया कुछ पतान चला। इस इलाके में अभी रक्त-जाँच अच्छी सुविधा न थी। गुलजार खान ने अपनी बीवी को बचाने का हर संभव प्रयास किया किंतु उसे बचा न पाया।
चूँकि गुलजार खान बेऔलाद थे अतः घरवालों के दबाव ने उसका दूसरा निकाह नसीबन से कराया। गुलजार खान ने भी अपनी तरफ से यही कहा कि किसी कुँवारी लड़की का जीवन तबाहन किया जाए। नसीबन की खाला ने ये रिश्ता लगाया था। उसने ही उन लोगों को राजी किया। गुलजार खान कोयला खदान में मैकेनिकल फोरमैन थे। इज्जतदार नौकरी, बी-टाइपक्वार्टर, बनी-बनाई गृहस्थी। घर में फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन, स्कूटर सब कुछ था। कमी थी तो सिर्फ औलाद की।
वह कमी उसने दूर कर दी।
नसीबन बाँझ न थी।
वह किससे बताती कि उसकी नम-उर्वरा कोख की धरती पर बीज पड़ा ही न था।
बस-स्टैंड के पूरब में बने शेड पर बैठे अनांउसर की आवाज लाउडस्पीकर पर गूँजी। - 'शहडोल जाने वाले यात्री ध्यान दें... मनेंद्रगढ़ से बिजुरी, कोतमा, अनुपपुर,अमलाइ, बुढ़ार से होकर शहडोल जाने वाली बस आने वाली है। आप लोग अपने सीट नंबर और टिकट काउंटर पर बैठे एजेंट से ले लें।'
नसीबन की तंद्रा भंग हुई। उसने मुसुआ से चाहा कि वह चुपचाप सामान के पास बैठे तो टिकट खरीद ले आए। मुसुआ नहीं माना। नसीबन ने झुँझला कर उसे धीरे से चपत लगाई।मुसुआ रोने लगा। मुसुआ एकदम पिन्ना है। माँ-बाप के अत्यधिक दुलार-प्यार से वह जिद्दी भी हो गया है। नसीबन उसका रोना बर्दाश्त नहीं कर सकती। नसीबन ने गोद में उसेउठाया और दूसरे हाथ से प्लास्टिक की डोलची उठा ली।
टिकट लेकर वह पुनः प्रतीक्षालय में आ गई। वह जहाँ बैठी थी वहाँ एक महिला बैठी थी। वह गोरे रंगत की एक जवान महिला थी। माँग पर सिंदूर की जगह सफेद चमकीली सी एकलकीर... 'अफसन' की लकीर। यानी यह महिला भी मुसलमान ही है।
उसके साथ तीन बच्चे थे। दो बेटियाँ और एक बेटा। छोटी बेटी अभी गोद में है। वह माँ का दूध पीने को बेचैन है। महिला ने सलवार सूट पहन रखी है। सफर में सलवार सूटमें बच्चे को दूध पिलाने में दिक्कत होती है। बच्ची की चीख-पुकार से तंग आकर महिला ने उसे दो चपत जमा दी। बच्ची और जोर-जोर से रोने लगी।
मुसुआ को मूँगफली खाते देख, उस महिला का चार वर्षीय बेटा भी कुछ खाने की जिद करने लगा। महिला ने लाचार होकर पहले तो गोद की बिटिया का मुँह जबरदस्ती दुपट्टे केअंदर करके चुस्त कुर्ते का दामन इस तरह से समेटना चाहा कि बदन भी न उघड़े और बच्ची दूध भी पी ले।
इस कोशिश में उसकी दूध-भरी गोरी छातियों की एक झलक नसीबन ने पाई। नसीबन मुस्कुरा उठी। उस महिला ने छाती में बच्ची का मुँह ठूँस कर बेटे की तरफ घूर कर देखा। बेटाबदस्तूर मूँगफली खाने की जिद मचाए हुए था।
नसीबन से अब चुप न रहा गया। उसने मुसुआ से कहा कि वह मूँगफली के चार दाने उस रोते बच्चे को भी दे दे। मुसुआ मान गया। महिला ने कृतज्ञता प्रकट की। दोनों महिलाएँमुस्कुरा उठीं।
कुछ मामले में मुसुआ बाप पर गया है। गुलजार भी इसी प्रकृति के हैं। भले ही भूखे रह जाएँ लेकिन मेहमान की खिदमत में कोई कमी न करेंगे। बड़े दरियादिल हैं गुलजार...ईद मिलने उसे मैके आना पड़ गया, वरना वह मियाँ को एक दिन भी अकेला छोड़ती नहीं। इतनी जिंदगी गुजरने के बाद तो वह मियाँ-वाली हुई है। पहला मियाँ तो बस नाम कामियाँ था। नसीबन को मुँह में कुछ कड़वा कसैला सा महसूस हुआ। पहले शौहर जुम्मन का तसव्वुर उसे भयभीत कर देता। जाने क्या-क्या चाहता था जुम्मन अपनी बीवी से।
वह चाहता था कि उसकी नामर्दी की बात किसी भी तरह से समाज में न आने पाए।
वह चाहता था कि चाहे जैसे भी हो नसीबन उसके लिए औलादों की लाइन लगा दे।
वह चाहता था कि नसीबन उसकी अंधी माँ और नकारा देवर की खिदमत में राई-रत्ती की कमी न करे। ठीक उसी तरह जुम्मन की माँ अपनी बाँझ बहू को रात-दिन ताने मारा करती।
बेटे से झूटी शिकायतें करती कि बहू ने ढंग से खाना दिया न पानी... दिन भर बस मुझसे लड़ती रहती है। बाँझ-निपूती राँड़ सब ऐसी ही होती हैं। मेरे बेटे पर 'टोनाहिन'ने जाने कैसा टोना कर दिया है कि यह किसी की सुनता ही नहीं।
देवर अलग अपना राग अलापता। वह एक सेठ का डंपर चलाता था। रेत-गिट्टी आदि की ढुलाई में वह डंपर लगा था। रेत-गिट्टी की लोडिंग-अनलोडिंग में गाँव की रेजाएँ और मजदूरलगा करते हैं। उसका चाल-चलन भी ठीक न था। देवर के कई रेजाओं से संबंध थे। वह पूरे समाज में बदनाम हो चुका था। इसीलिए कोई अपनी बेटी उसे देने को तैयार न होता। एकजगह बात चल रही थी। लड़की वाले इसलिए झुककर आए थे कि उनकी बेटी में कई दोष थे। लड़की भेंगी और काली-कलूटी थी। बदसूरत कहें तो कोई हर्ज नहीं। उसी समय ऐसा हुआ किरेजाओं की बस्ती में मार-पीट और शराब पीकर हुड़दंग मचाने के अपराध में देवर को जेल हो गई। लड़की वालों ने खुदा का शुक्र अदा किया कि समय रहते उनकी आँखें खुलगर्इं। उनकी बेटी बरबाद होने से बच गई। क्या हुआ कि बेटी बदसूरत है किंतु बदकिरदार तो नहीं।
देवर अक्सर भौजाई को छेड़ता - 'भइया से कुछ न हो पाएगा भौजी। एक बार इस बंदे को आजमा कर देखो तो... शर्तिया लड़का होगा। जाने कितनी जगह मैंने आजमाया है। एक मौकाखिदमत का हमें भी तो देकर देखो।'
वह बद्तमीजी से हँसता। एक बेहद अश्लील हँसी... जिसमें निगाहों से कपड़े उतारने की ताकत हो। नसीबन अपना दुख किससे कहती? उसका मन करता कि वह आगे बढ़कर देवर कामुँह अपने तेज नाखूनों से नोच ले! या कि अपनी बदनसीबी पर दहाड़ें मार-मार कर रोए।
समाज देवर-भौजाई के बीच मजाक को बुरा नहीं समझता। जुम्मन से कहे तो उसकी मार खाए। सास ठहरी अंधी-बहरी, पुत्र-मोह से उसमें भला-बुरा समझने का जज्बा भी खत्म होगया था। वह किसी भी तरह उस घर में बच्चे की किलकारी सुनना चाहती थी। इस मामले में वह हक-नाहक, भला-बुरा, नैतिक-अनैतिक कुछ भी न मानती थी। बस पानी पी पीकर वह बहूको कोसती और बेटे को उकसाती कि वह एक और निकाह कर ले। वरना इस वंश का क्या होगा?
अनांउसर ने पुनः हाँक लगाई - 'शहडोल जाने वाली बस अब आने ही वाली है। आप लोग अपने टिकट और सीट नंबर ले लें।'
नसीबन की तंद्रा भंग हुई।
उसने मुसुआ के हाथ से मूँगफली का पूड़ा छीन कर डोलची में रख लिया। वह प्रतीक्षालय से बाहर निकल आई। उसने देखा कि वह महिला भी उठ गई है। शायद उसे भी यही बसपकड़नी हो। दूर कहीं बस की घुरघुराहट सुनाई दी।
एजेंट और अनांउसर सजग हुए। देखते ही देखते बस आ गई। नसीबन को खिड़की के पास वाली महिला-सीट का नंबर मिला था। नसीबन बस के सफर में खिड़की के पास की सीट चाहती है।उसे हमेशा ताजा हवा चाहिए। बस में सवारियाँ बीड़ी-सिगरेट का सेवन करती हैं तो उस गंध से उसे मितली आने लगती है। जाड़े मे भी सफर के दौरान वह खिड़की खुला रखनाचाहती। यदि अन्य लोग विरोध करते तो वह खिड़की बंद करती। थोड़ा सा फाँक वह फिर भी बचा लेती। ताजा हवा का स्पर्श मिलता रहे बस!
अभी वह बस में बैठी ही थी कि उसकी बगल में वह महिला आकर बैठ गई। अपने तीनों बच्चों के साथ। उसे कोई आदमी बैठाने आया था। वह आदमी जाने लगा तो महिला ने बच्चों सेकहा - 'मामू को सलाम करो!'
नसीबन ने जाना कि ये भी अपने मैके आई लगती है। शायद ईद मिलने आई हो। खैर उसे क्या?
वह महिला बगल सीट में आ गई।
नसीबन ने मुस्कुराकर परिचय की पेशकश की। वह भी जवाबन मुस्कुराई। उसका बेटा अभी भी रो रहा था। लड़कियाँ बेचारी चुप थीं। नसीबन ने सोचा कि लड़कियाँ अमूमन चुप हीरहती हैं। अगर ये कहें कि बेजुबान होती हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। यही बेजुबानी उन्हें जुल्म सहने और सिसकने के लिए प्रेरित करती है। नसीबन भी तो इसीचुप्पी की शिकार थी। यदि वह जुबान वाली होती तो जरूर जुम्मन के आरोपों का विरोध करती।
कितना सहा था उसने! बुढ़िया अँधरी सास तक एक स्त्री होते हुए भी उसे पाप के लिए मजबूर करती। माना कि जुम्मन सीधे कुछ न कहता किंतु अप्रत्यक्ष रूप से उसका इशारायही होता कि उसे औलाद चाहिए। किसी भी कीमत पर उसे औलाद चाहिए थी।
बाकी बात सास स्पष्ट कर देती।
कहती - 'रंडी! सती-सावित्री बनती है। अपने देवर पर इल्जाम लगाती है। अरे घर की बात सड़क पर लाती है। तू जा तो सही, देखना जुम्मन को कैसे औलाद वाला बनाती हूँ।'
नसीबन लड़ती - 'आपके बेटे से कुछ भी न हो पाएगा, वह बच्चा पैदा करने लायक तो क्या किसी औरत के ही लायक नहीं।
वह भरी जवानी में अपने ठंडे-बिस्तर और मुर्दा रातों की बात कैसे कहती।
'राँड... दोष तेरे में है। अरे, औरत चाहे तो पत्थर भी पिघल जाए। हर साल बकरी और कुतिया की तरह गाभिन होती रहे। ये कह न कि तेरी कोख में ताकत ही नहीं।'
'नहीं अम्मा! ताली एक हाथ से नहीं बजती... तू मान कि तेरा बेटा किसी काम का नहीं सिवाए रोजा-नमाज, रोजी-रोटी के। मीठा बोलता है और मुस्कुराता रहता है, इससे ये नसमझियो कि वह बड़ा मर्द है।' वह कैसे कहे कि हिजड़ा है जुम्मन एकदम हिजड़ा!
सास रोने-धोने लगती - 'पता नहीं किस घड़ी मैंने तुझे पसंद किया। कमीनी थी ननद साली, मेरी दुश्मन, वही तेरा रिश्ता लाई थी। उसने तो तुझे हमारे गले मढ़कर हमसेबदला ले ही लिया... अब हमें जिंदगी भर यही ढोल बजाना होगा। लेकिन नहीं, मैं पोता खिलाए बिना मरूँगी नहीं। मैंने हजरत जी से बात की है। उन्होंने कह दिया है किऔलाद के लिए दूसरा या तीसरा क्या चौथा निकाह भी जायज है। मैंने तो लड़की भी देख ली है। बस, ये जोरू का गुलाम जुम्मनवा एक बार 'हाँ' भर बोल दे। दूसरे दिन हीनिकाह करवा दूँ।'
वह भी चिढ़ जाती - 'तब ऐसा है कि गाभिन बहू लाना। एक-दो माह का पेट वाली हो। मैके से औलाद ले आई तो ठीक, वरना उसे भी मेरी तरह सौतन बर्दाश्त करना होगा।'
सास भी कहाँ कम थी। उसने भी दुनिया देखी थी। बुढ़िया ने कहा ही - 'औलाद के लिए कुछ न कुछ गँवाना तो होगा ही। ऐसे रोने-धोने से कोई फायदा नहीं। तू बाँझ है समझी!अब तो जुम्मन के लिए घर में एक नई बहू ले आना है बस!'
वह क्या कहती सिवाए इसके कि सौतन के साथ वह नहीं जी पाएगी, और यह भी कि वह आत्महत्या भी नहीं करेगी! वह पूरे समाज को चीख-चीख कर बताएगी कि जुम्मन नपुंसक है।उससे औलाद क्या र्इंटा-पत्थर भी पैदा होना मुश्किल है। वह उसे छोड़ दूसरा निकाह क्या करेगा। इसी बात पर वह जुम्मन से स्वयं संबंध-विच्छेद कर लेगी।
आखिर हुआ भी वही... एक दिन पता चला कि जुम्मन अब दूसरा निकाह करने वाला है। इस्लाम में पहली बीवी रहते हुए दूसरा निकाह करने पर प्रतिबंध नहीं। वह जुम्मन को इसकेलिए मजबूर नहीं कर सकती थी।
उसने सोच लिया कि इस दरवाजे़ अब उसे नहीं झाँकना... और वह अपनी खाला के घर चली गई। वहाँ से खाला और खालू दोनों ने जुम्मन पर दबाव डालना चाहा किंतु जुम्मन अपनीमाँ के फरमान के आगे बेबस निकला। कहते हैं कि अंधी सास ने दूसरी बहू लाने में कितनी चालाकी की। वह जान-बूझकर ऐसी लड़की ले आई जिसके पेट में डेढ़ माह का गर्भ था।हाँ, तहकीकात से ये भी जान लिया था कि उस लड़की के पेट में किसी गैर का नहीं बल्कि अपने ही जीजा का नुत्फा था।
यही तो सास नसीबन से चाहती थी। लेकिन...
हुआ नहीं वैसा कुछ, जैसा नसीबन चाहती थी या कि सास-पति-देवर की इच्छा थी।
नसीबन जिद पर अड़ी रही कि दोष आदमी में है। इसलिए दूसरी शादी इस समस्या का समाधान नहीं।
सास ने हजरत जी की चौखट में अपनी परेशानियाँ रखीं। चिरागा में अच्छी रकम चढ़ाई। हजरत जी पर इसका अच्छा असर पड़ा।
उन्होंने सास से पूछा - 'तो आप उससे पीछा छुड़ाना चाहती हैं?'
'जी हाँ, हजरत जी! मुझ राँड़-अंधी को पोते का मुँह देखना है। उससे कुछ होगा नहीं। मैंने जुम्मन के लिए एक लड़की देखी है। रिश्तेदारी के लोग हैं। खाँटी सुन्नीहैं वे लोग... ये नसीबन तो वहाबी घर से है हजरत जी!'
हजरत जी के कान खड़े हुए - 'क्या कहा, देवबंदी घर से है आपकी पहली बहू?'
'जी हाँ, हजरत जी...!'
'बस फिर क्या है। तलाक दे दो उस 'मुनाफिक' को। ये देवबंदी लोग 'काफिरों' से भी बदतर होते हैं। इन से 'सलाम-मुसाफा', खाना-पीना, और रिश्तेदारी वगैरा की मुमानियतहै। आपने निकाह से पहले इसकी तस्दीक नहीं की थी क्या? आज ये दिन न देखना पड़ता। अच्छा हुआ, अल्लाह तआला ने उस 'मुनाफिक' से आपके घर में औलाद न दी। आपको सिर्फइसी बिना पर तलाक मिल सकती है कि आपकी बहू बद-अकीदा है।'
कहा भी गया है कि एक बार काफिर का एतबार कर लो किंतु देवबंदी या वहाबी पर कतई भरोसा न करो। इन लोगों को अल्लाह के प्यारे रसूल पर ईमान नहीं। ये बद-अकीदा लोगनबियों के नबी, हुजूरे-अकरम सल्ल लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अपनी तरह का एक इनसान समझते हैं।
ये उन पर दरूद नहीं भेजते, जिंदा वलियों और बुजुर्गों की करामात पर यकीन नहीं रखते। ये लोग बरेलिवियों को 'बिद्दती' समझते हैं। जबकि ये काफिरों से भी बदतर हैं।इनके साए से भी बचना चाहिए।
और देवबंदी होने की बिना पर जुम्मन ने उसे तलाक दे दिया था।
बस स्टार्ट हुई। बगल वाली महिला कुछ सहज हुई।
नसीबन ने उसके बच्चों को प्यार किया।
नसीबन ने उनसे उनका नाम पूछा। बच्चों ने तुतलाकर अपने नाम बताए जिसे बस की घुरघराहट में वह सुन न पाई। फिर उसने उनसे पूछा - 'कहाँ जाना है?'
जवाब बच्चों की माँ ने दिया - 'शहडोल...'
फिर बात को आगे बढ़ाने की गर्ज से उसने पूछा - 'और आप कहाँ जा रही हैं?'
'शहडोल।'
'देखिए कब तक पहुँचाती है बस... स्टैंड से ही लेट हो गई है। आगे जाने क्या हो?'
'ठीक कह रही हैं आप, यदि यही हाल रहा तो रात तक शहडोल पहुँच पाएँगे!'
'अब जो हो... और कोई साधन नहीं। रास्ता भी इतना खराब है कि बस चाहे भी तेज भागना तो भाग नहीं सकती। अब तो सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं।'
'पीछे सीट मिले तो मैं सफर ही न करूँ... आगे ठीक है। धचका उतना पता नहीं चलता।'
इस वार्तालाप के बाद एक चुप्पी... कंडक्टर आया।
टिकट के पैसे बढ़ाए।
कंडक्टर ने दो इंच के कमजोर से कागज का एक टिकट दिया। इधर की निजी बसों में इसी तरह की टिकटें मिलती हैं। वह भी कभी दिया कभी गोल!
खिड़की पूरी खुली थी।
बगल वाली ने टोका - 'छोटकी को बुखार है। जरा खिड़की तो बंद कर लीजिए...'
नसीबन ने मुरव्वत में खिड़की बंद की किंतु थोड़ा फाँक छोड़ दिया ताकि उसे शुद्ध हवा मिलती रहे।
- 'क्या हुआ उसे?'
- 'कुछ नहीं, कल इसके मामू ने इसे आइसक्रीम खिला दी थी। रात में हल्का सा बुखार हो आया। मैं तो डर रही हूँ कि इसके अब्बा को क्या बताऊँगी... वह मुझे बहुतडाँटेंगे।'
- 'तो क्या आपने जान-बूझकर बुखार से कहा है कि मेरे बच्चे की देह पर आकर बैठे।'
- 'वह बात नहीं। उन्हें औलाद से बहुत प्यार है। वह तो अच्छा है कि सास नहीं रही वरना वह अंधी तो बहुत गरियाती!'
- 'अंधी सास!' नसीबन का माथा ठनका। उसे अपने पहले शौहर जुम्मन की माँ की याद हो आई।
- 'हाँ आपा, 'जाने क्यों उस महिला ने उससे बहनापा जोड़ लिया।
नसीबन को उस महिला में दिलचस्पी हुई।
उसने उससे पूछा - 'शहडोल में आपकी ससुराल है?'
- 'हाँ।' मुख्तसर सा जवाब।
- 'कहाँ पर घर है?' नसीबन व्यग्र थी।
- 'इतवारी मुहल्ला में।' महिला ने सहज भाव से उत्तर दिया।
इतवारी मुहल्ला, यानी इतवारी मुहल्ला में तो उसकी पहली ससुराल थी। उसने तत्काल अगला प्रश्न दागा
- 'क्या नाम है आपके शौहर का?'
नसीबन ने अपनी आँखें जवाब सुनने से पूर्व बंद कर लीं।
उस महिला ने अपने शौहर का नाम बताने में संकोच किया। उसने अपनी बच्ची से कहा, 'बिटिया अब्बू का नाम चची को बता दो!'
बिटिया ने अटकते हुए कहा - 'जुम्मन...'
नसीबन की आँखें बंद थीं।
एक बम सा फटा उसके कान के पास! 'जुम्मन' काश! उसने अपने कान भी बंद कर लिए होते।