नासमझी : सिक्किम की लोक-कथा

Nasamjhi : Lok-Katha (Sikkim)

यह उस समय की बात है, जब राजतंत्र शासन व्यवस्था थी। एक युवक, जिसका नाम चंद्रशेखर था, राजदरबार में काम करता था। वह एक छोटे से गाँव से संबंध रखता था। गाँव का कोई लड़का शहर में स्थित राजदरबार में कार्य करता है, इससे गाँव के सभी लोगों को बड़ी प्रसन्नता होती। वह बड़ा परिश्रमी और थोड़ा चालाक भी था। वह अपने माता-पिता का बड़ा सम्मान करता, जिसे देखकर उसके माता-पिता उससे बहुत खुश रहते और सदैव उसकी प्रशंसा करते, उसे आशीर्वाद देते। जीवन के छोटे-बड़े हर कार्य–व्यापार में वह अपने माता–पिता और अपने बड़े-बुजुर्गों की सलाह लेता। वह अब काफी बड़ा हो गया था। दरबार में नौकरी करते हुए उसे बहुत ही अकेलापन महसूस होता था। एक बार जब वह अपने माता–पिता से भेंट करने गाँव आया तो दोनों ने उसे ब्याह करने की सलाह दी—“अब तुम कमाकर स्वयं का खयाल रख सकते हो। कुछ कमा लेते हो, इसलिए ब्याह करके पत्नी का भी ध्यान तुम भलीभाँति रख सकोगे, इसलिए बेटा, हमें कुछ हो जाए, उससे पहले ब्याह कर अपना घर बसा लो, ताकि तुम्हारी चिंता से हम मुक्त हो जाएँ।”

अब उसके लिए उपर्युक्त लड़की की खोज होने लगी थी। घर में लगातार इसी सिलसिले में बातचीत होती। उससे कहा जाता, ‘शहर की कोई लड़की नजर में हो तो ब्याह लो’, फिर इस बात की भी शंका जताई जाती कि शहर की लड़की बहुत नकचढ़ी और खर्चीली होती है। फिर कहते, ‘शहर की लड़की से ब्याह करेंगे तो वह गाँव आना पसंद नहीं करेगी। सास-ससुर का लिहाज नहीं करेगी।’ कुछ सलाह देते, ‘हम गाँव के लोगों को गाँव की लड़की से ही ब्याह करना चाहिए।’ चंद्रशेखर दरबार में काम करता है, इस बात से गाँव के आसपास सभी परिचित थे, इसलिए उसके ब्याहने की उम्र हो गई है, इसको जानकर सभी अपनी बेटी से उसका रिश्ता करवाने की चाह रखते थे। लड़की के रिश्तेदार लड़कियों की गुणों का लंबा बखान उसके सामने करते। वह सबको सुनता, पर शांत रहता।

एक दिन उस पार के गाँव के जमींदार अपनी बेटी का रिश्ता लेकर आए। चंद्रशेखर को भी लगा कि जमींदार (मंडल) की बेटी से ब्याह कर गाँववालों के बीच उसका सम्मान और बढ़ जाएगा। उसे यह रिश्ता उपयुक्त लगा और माता-पिता से सलाह लेने के साथ दोनों का ब्याह हो गया। ब्याह के बाद चंद्रशेखर अपनी पत्नी को लेकर शहर आ गया। दिन भर वह दरबार में रहता और उसकी पत्नी इस बीच आसपास के घरों की स्त्रियों से बातचीत कर अपने दिन काटती। शहर की उन स्त्रियों को उसकी बातें बड़ी ऊटपटाँग लगतीं, क्योंकि वह जो बातें कहती, वे खेत, खलिहान, कुदाल, गाय, बैल, टोकरी, घास, लकड़ियाँ आदि से संबंधित होतीं। गाँव में खेत-खलिहान में काम करते हुए जो घटनाएँ होतीं, उसका जिक्र करती। शहरी स्त्रियों को महसूस होता कि चंद्रशेखर की पत्नी को बात करने की तमीज नहीं है। वह शहर की जीवन-शैली नहीं समझती, जबकि चंद्रशेखर की वे तारीफें करती नहीं थकतीं। वे सभी इस बात पर सहमत होती कि वह बड़ा सीधा और समझदार है, जबकि उसकी पत्नी बड़ी गँवार! वह उसके जोड़ की नहीं है। उन स्त्रियों ने यह गौर किया था कि चनामती किसी की बात को भी बीच में काटकर बोलते लग जाती थी। चनामती बेधड़क होकर दूसरों की बात काट देती, उस पर उसका बात करने का ढंग भी बहुत जोर-जोर से होता था। आसपास की स्त्रियों को लगता, चनामती को चंद्रशेखर के लिए योग्य बनाना होगा!

एक सुबह दरबार जाते हुए चंद्रशेखर ने अपनी पत्नी से कहा, “मुझे बहुत दिनों से हलवा खाने का जी कर रहा है।” उसके मुँह से निकलना था कि उसने बीच में टोकते ही कहना शुरू किया, “ऐसा था तो मुझे कहा क्यों नहीं? मैं बना देती हलवा तुम्हारे लिए! मैं यहाँ तुम्हारे लिए ही तो हूँ! फिर मुझे कहते क्यों नहीं? मैं आज तुम्हारे लिए हलवा बनाऊँगी।” चंद्रशेखर को शंका हुई, वह हलवा पहचानती भी है या नहीं? यह जानने के उद्देश्य से उसने पूछा, “तुम हलवा जानती हो न, क्या होता है?” उसने तुरंत ‘हाँ’ में सिर हिला दिया और चंद्रशेखर को हलवा की पूरी उम्मीद दिखाकर दरबार भेज दिया। जबकि उसने आज तक हलवा चखना तो क्या, देखा तक नहीं था। वह यह भी नहीं जानती थी कि वह किससे कैसे बनता है और कैसा होता है। परंतु अपने पति के सामने ‘नहीं जानती’ कहकर जो स्थिति खड़ी होती, उससे उसे मुक्ति मिल गई थी।

घर का सारा काम समेटकर चनामती बाहर बैठी स्त्रियों के जमघट में बातचीत करने निकल गई। उसने सोचा, अब यहाँ अगर हलवा के विषय में किसी से पूछती हूँ, तो यह सब मेरा मजाक बनाएँगी और फिर हमेशा के लिए मेरी बेइज्जती करती रहेंगी, इसलिए उसने एक चाल के तहत हलुवा बनाना जानना चाहा। उसने अपनी मंडली से कहा, “मैं आज जल्दी यहाँ से निकल जाऊँगी, क्योंकि आज मुझे उनके लिए हलवा बनाना है।” सुनकर स्त्रियों ने कहा, “हलवा ही तो बनाना है, उसमें इतना सोचना क्या? वह तो बड़ी आसानी से और बहुत कम समय में बनकर तैयार हो जाता है।” उसने कहा, “हाँ, जानती हूँ, पर फिर भी! आप तो जानते ही हैं, उसके लिए बहुत सारी चीजें इकट्ठी करनी होती हैं।” चनामती ने कहा। बूढ़ी औरत ने जवाब दिया, “हाँ-हाँ, मैं अच्छे से जानती हूँ, उसके लिए सूजी चाहिए।” चनामती ने इस तरह जवाब दिया, “हाँ-हाँ, सूजी चाहिए, मुझे पता है, उस पर अन्य सामग्री भी चाहिए न!” बूढ़ी ने फिर उत्तर दिया, “थोड़ा सा घी चाहिए।” चनामती को मालूम हुआ, हलवा सूजी से बनता है, उस पर घी भी चाहिए। उसने इस तरह की प्रतिक्रिया की, जैसे वह सब जानती है। उसने फिर कहा, “उसके बाद भी तो...। बूढ़ी ने फिर कहा, “थोड़ी सी चीनी चाहिए।” चनामती ने कहा, “हाँ, चीनी के बिना हलवा कैसे बन सकता है?” उस बूढ़ी ने फिर कहा, “घर में पानी और दूध तो है न?” तब चनामति ने जवाब दिया, “दूध और पानी नहीं हो, ऐसा कोई घर होता है क्या? फिर उसके घर में, जिसका पति, जो दरबार में काम करता है, वहाँ न हो, ऐसा संभव है?” उस बुढ़िया को चनामती का व्यवहार बड़ा नागवार लगा, पर उन्होंने अब चनामती की बुद्धि की जाँच करने के लिए कहा, “उसके बाद आधा किलो राख को छन्नी में छानकर एक कटोरे में रख लेना।” चनामती ने कहा, “हाँ, अच्छी लकड़ी की जली राख को इसके लिए तैयार करना होगा। इन सबसे मैं अच्छे से परिचित हूँ।” बुढ़िया ने कहा, “पहले सूजी को भून लेना, घी के साथ फिर पानी के साथ अच्छे से पका लेना, जब पक जाए तो छने हुए राख को उसमें अच्छे से मिला लेना।” इतना कहकर बुढ़िया ने कपड़े में अपना मुँह छिपा लिया।

चनामती ने सूर्य की ओर देखते हुए समय का अंदाजा लगाया और कहा, “अब मुझे जाना चाहिए। जाकर हलवा भी तो बनाना है।” उसने घर जाकर जैसा उस बुढ़िया ने बताया था, वैसा ही किया और अंत में छने हुए राख को भुनी सूजी में मिलाकर रख दिया। वह अब अपने पति की राह तकने लगी। जब चंद्रशेखर आया तो उसने बहुत प्रसन्न होकर उसके लिए हलवा परोस दिया। वह भी भूख से व्याकुल था, गपागप खाना चाहता था। मुँह में एक बड़ा सा कौर डाला कि उसने उसे तुरंत उलट दिया और जोर से चिल्लाया, “यह क्या है?” चनामती ने डरे हुए भाव से जवाब दिया, “यही हलवा है, मैंने सबकुछ डाला था। मैंने राख को भी बहुत छानकर डाला था, बहुत मेहनत से मैंने हलवा तैयार किया है, अभी कढ़ाई में और भी शेष है।”

इतना सुनना था कि चंद्रशेखर ने झिड़कते हुए कहा, “उसे तुरंत फेंक दो। और हाँ, अच्छे से नीचे देखकर फेंकना। किसी के सिर के ऊपर गिरा तो दूसरी समस्या उठ खड़ी होगी।” लेकिन अपने पति के चिल्लाने से उसका मन इतना व्यथित हुआ था कि आगे उसने क्या कहा, उसे ध्यान से सुना ही नहीं। उसने इतना भर सुना कि हलवा फेंक दे। नीचे से मेयर गुजर रहा था, उसी के सिर के ऊपर हलवा फेंककर चनामती भीतर आ गई। बाहर बहुत हो-हल्ला होने पर चंद्रशेखर ने कहा, “तुमने फिर नई मुसीबत तो नहीं खड़ी की?”

जैसे ही चंद्रशेखर ने बाहर आकर बिगड़ते हुए माहौल को देखा, उसे पलभर में ही सारी स्थिति समझते देर नहीं लगी। उसने अपनी पत्नी की ओर गुस्से से देखते हुए कहा, “अब तुम मुझे जेल भेजकर ही चैन लोगी।”

बिना सीखे-जाने काम करने से अपने ही नहीं, अपने आसपास वालों के लिए भी मुश्किलें खड़ी होती हैं। यह चनामती शायद समझी या नहीं, पर चंद्रशेखर इन हालातों को देखकर बहुत डर गया था। डर से वह पसीना-पसीना हो गया था। वहीं दूसरी ओर शहर के लोगों के सामने अपनी ऐसी स्थिति देखकर शर्म से पूरी तरह सिकुड़ चूका था ।

(साभार : डॉ. चुकी भूटिया)

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