नगेसर मिसिर (कहानी) : अनवर सुहैल

Nagesar Misir (Story in Hindi) : Anwar Suhail

प्लेग, स्वाईन फ्लू जैसी बीमारियों के वायरस जो भी हों लेकिन मीडिया इन वायरस से बढ़कर काम करता है। मीडिया इन बीमारियों को वायरस से ज्यादा तेज़ गति से फैलाता है। ऐसे ही हमारी खदान के ब्लास्टिंग विभाग के वरिष्ठ कामगार नगेसर मिसिर हैं जिनके पेट में कोई बात नहीं पचती। जब तक आठ-दस लोग जान न जाएं उन्हें अफ़ारा होता रहता है। सच्ची-झूठी खबरों-अफवाहों का पिटारा हैं नगेसर मिसिर। नगेसर मिसिर परिचय बाद में हो ही जाएगा, पहले अपनी ही एक बात आप सभी से शेयर करता हूं। मेरी हेड- क्वाटर से नई-नई पोस्टिंग खदान के इस विभाग में हुई।

पहले ही दिन, अपनी घनी चितकबरी-छितराई हुई मूंछों में मुस्कुराहट सजाए एक आदमी ने मेरे केबिन में प्रवेश किया। मुझमें अपना काम समझने और कोयला कम्पनी के विशाल फलक में अपनी भूमिका तलाशने की उत्सुकता थी। तभी उस आदमी ने सवालों के तीर चलाने शुरू कर दिये। मैं असमंजस में उसका जवाब देने लगा।

--‘आप यहां शर्मा साहब की जगह में आए हैं?’

--‘हां’।

--‘आप कहीं से बदली होकर आए हैं या अभी नई भरती हैं?’

--‘यहीं नौकरी ज्वाईन किया है भाई।’

मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुंहफट कामगार से कैसे निपटूं। उसकी छितराई मूंछों के नीचे पान से लाल आंेठ ग़ज़ब के फब रहे थे।

--‘इसके पहले पढ़ाई-लिखाई कर रहे थे न?’

--‘हां, पढ़ाई-लिखाई और ट्रेनिंग वगैरा।’

--‘कहां के रहने वाले हैं साहब आप?’

मुझे उसके सवालों से उकताहट होने लगी। साधारण वेशभूषा के उस व्यक्ति की बेतकल्लुफ प्रश्नावलियां मुझे निरूत्तर किए दे रही थीं। मैं उसका परिचय जानना चाह रहा था। अतः सोचा कि पहले उसकी जिज्ञासा शान्त कर दूं, फिर उससे परिचय ले लंूगा। मैंने उसे बताया कि मैं महाराष्ट्र का रहने वाला हूं।

--‘अच्छा महाराष्ट्र, यह किधर पड़ता है साहब। बनारस से ज्यादा दूरी पर है,’

मुझे उसके कमज़ोर भौगोलिक ज्ञान पर तरस आया। उसका मन रखने के लिए मैंने स्पष्ट किया--‘हां, बहुत दूर है।’

--‘फिर भी मैथ्यू साहब के देस जितना दूर तो नहिए होगा न!’

--‘हां, उतना तो नहीं, उसकी आधी दूरी पर समझिए।’ मुझे हेड-क्वाटर में समझाया गया था कि खदानों में कामगार नेता अधिकांशतः ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते। अधिकांशतः अशिक्षित ही होते हैं। सो, कार्यभार सम्भालते ही आपदा बने उस व्यक्ति को मैं तिरस्कृत नहीं करना चाहता था।

--‘बाप रे, फिर भी बहुत दूर पड़ेगा आपका देस सर!’

थोड़ा सांस लेकर उसने अगला प्रश्न किया--

--‘आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं?’

--‘हां, पूछो।’

--‘आपका नाम बाघमारे साहब है, शर्मा साहब बता रहे थे। अच्छा साहब, ये बाघमारे कौन बिरादरी होते हैं? आप राजपूत हैैं?’ औद्योगिक सम्बंधों की जटिल पढ़ाई से छूटा मेरा रहा-सहा धैर्य जवाब दे गया। मैंने उसे सामने पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और ‘वसुधैव कुटुम्बुकम्’ प्रारम्भ कर अत्याधुनिक विश्व-ग्राम की संकल्पना तक सविस्तार स्पष्ट करते हुए उसे समझाया कि यह संयोग मात्र है कि किसी व्यक्ति का जन्म गंगा के किनारे ब्राम्हण परिवार में हुआ और किसी का जन्म अफ्रीका में काले हब्शियों के घर। हम समस्त जीव उस महान सर्जक की उत्कृष्ट रचना हैं। सूचना क्रांति के विस्फोट के बाद आज समूचा विश्व एक छोटे से गांव में तब्दील हो चुका है। सभी दूरियों सिमट गई हैं। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र मे मानव ने काफी प्रगति की हैं। जात-पात, ऊंच-नीच आदि धारणाओं का युग समाप्’त हो चुका है।

मेरा व्याख्यान जारी रहता किन्तु विभागाध्यक्ष की जीप की आवाज न मुझे मौन कर दिया। सम्मुख बैठा व्यक्ति भी चैंककर उठ खड़ा हुआ। मैंने उससे उसका नाम जानना चाहा।

उसने बताया--‘नगेसर मिसिर!’ और फुर्ती से वह चला गया।

बाद में मुझे जानकारी मिली नगेसर मिसिर हमारे विभाग का सबसे पुराना कामगार है। अनपढ़ होने के कारण उसकी पदोन्नति नहीं हो पाई है। उसके दूसरे स्वरूप का परिचय मुझे उसी दिन भोजनावकाश के उपरान्त हो गया।

आफिस के बगल की खाली जगह में प्रबंधन ने एक शेड बनवा दिया है, जहां कामगार अपने वाहन खड़ा करते हैं और अवकाश के क्षण गप्प मारा करते हैं। लंच के बाद मैं पैदल ही आफिस आया। लगता है इसीलिए शेड पर बैठे कर्मियों को मेरे आगमन की भनक नहीं मिल पाई। मैंने कनखियों से देखा। वही चितकबरी मूंछों वाला नगेसर बड़ी तेज़ आवाज़ भांज रहा था। सहकर्मियों के ठहाकों के बीच उसकी आवाज़ साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी। नगेसर अपनी तेज मगर फटे बांस सी आवाज़ में कह रहा था--‘समझे साहूजी, और तो सब ठीकै है लेकिन जब हम उनसे उनकी बिरादरी पूछ बैठे तो लगे अंट-शंट बतियाने। अकबका गए थे साहब। डेढ़ घण्टा दुनियादारी समझाते रहे लेकिन ई नहीं बताए कि ये बाघमारे कौन चिड़िया का नाम है। हमने पूछा भी साहब कहीं आप ठाकुर-ठकार तो नहीं हैं। लेकिन उनकी गोलमोल बातचीत से मामला गड़बड़ लग रहा है। कहीं ये भी तो वही नहीं...!’ खाली स्थान को उपस्थित जनों ने समझ लिया और ठठाकर हंस पड़े।

मुझे क्रोध तो ज़रूर आया मगर यह सोचकर शान्त हो गया कि कोयला उद्योग में ज्यादातर कामगार कूप-मण्डूक ही होते हैं। बाहरी दुनिया से इनका सम्पर्क बहुत कम होता है। एकबारगी कोई बात इनके पल्ले नहीं पड़ेगी।

चंद दिनो के बाद मैंने जाना कि अन्य सभी लोग नगेसर मिसिर का सम्मान करते है, उससे सलाह लिया करते हैं।

नगेसर मिसिर के चरित्र की चंद और विशेषताएं इस प्रकार हैं कि वह वाक्पटु हैं। टाईम-पास का सर्वोत्तम साधन। पीठ पीछे बुराई करने की आदत के कारण त्याज्य, अधकचरे ज्ञान के कारण मनोरंजक और अपने काम की अच्छी जानकारी के कारण उपयोेगी भी है नगेसर। कम्पनी से येन-केन प्रकारेण ओव्हर-टाईम के पैसे झटकने में माहिर। एक बार ड्यूटी आ जाने के बाद उसे घर जाने की कोई हड़बड़ी नहीं होती। एक बार काम पकड़ लेने के बाद उससे ज्यादा निपुण कामगार भी अन्य कोई नहीं है। एक अच्छे टीम-लीडर के गुण भी हैं उसमें। सुपरवाईजरों की गैर-मौजूदगी मंे नगेसर मिसिर पर भरोसा किया जाता है।

जब मैं ट्रेनिंग कर रहा था तब मेरे नियंत्रण अधिकारी की एक बात मुझे याद हो आई। वह कहा करते थे--‘बाघमारे! हर आदमी में गुण- अवगुण होते हैं। किसी में कम किसी में ज्यादा। सफल प्रबंधक वही हैै जो लोगों के गुणों को परखना जानता है और लक्ष्य प्राप्ति के लिए उन गुणों उपयोग करता है।’

यह सूत्र-वाक्य नगेसर मिसिर के साथ मैंने एप्लाई किया। मुख्यालय और उच्चाधिकारियों की सूचनाओं को कामगारों तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम है नगेसर मिसिर।

इसके अतिरिक्त कई अंदरूनी जानकारियां लोगों तक नगेसर के मार्फत मिनटों में पहुंच जाते हैं। जैसे मेरे विवाह तिथि का निर्धारण हुआ नहीं कि नगेसर ने इस खबर कोे जंगल की आग की तरह सभी तक पहुंचा दिया, मैंने चुपके से नगेसर को सिर्फ यह बात बताई थी। इसी तरह प्रथम पुत्र-रत्न प्राप्ति की खबर भी नगेसर की मार्फत लोगों तक पहुंची।

नगेसर मिसिर के सभी चहेते हैं सिवाए बड़कू यादव के। नगेसर मिसिर का नाम सुनते ही बड़कू यादव नाक-भौंह चढ़ा लेते हैं।

--‘लबरा-झूठा है साला। नाम न लेव उसका, बीबीसी बना फिरता है ससुरा।’

बात सत्य है। प्रतिदिन हाजिरी लगवाने के बाद नगेसर मिसिर शेड पर आकर मूंछों पर मुस्कान बिखेरे शुरू हो जाते। कभी कहते--
‘डीए बढ़ने वाला है। एरियर मिलेगा।’’

कभी सूचना देते--‘जापान में भूकम्प आया है।’

कभी फुसफुसाते--‘अफसर काॅलोनी में काम करने वाली छोकरिया पेट से हैै। कल बच्चा गिरवाने के लिए जड़ी-बूटी वाले के यहां बैठी रो रही थी।’

कभी सुनाई पड़ता--‘स्टोर बाबू की बिटिया जहर खा ली थी, बच गई। जब से अपाहिज हुई है मर सी गई थी। जववान लड़की का अपाहिज रहने से अच्छा है भगवान उसे उठा ले। ठीक किया था उसने, लेकिन डाक्टरों ने बचा लिया। अगर बिटिया मर जाती तो थाना-कचहरी के चक्कर में स्टोर बाबू बिक जाते।’

कभी खबर सुनाते--‘सिविल विभाग में घूसखोरी बढ़ गई है। इन्क्वारी बैठने वाली है।’

प्रत्येक समाचार के बाद शुरू होेता सिलसिला सवाल-जवाब का। जिसमें एक-डेढ़ घण्टा आसानी से गुजर जाता। इस बीच कई दौर खैनी का हो चुका होता। बीबीसीगिरी करने के बाद ही नगेसर मिसिर खदान का काम पकड़ते तो फिर काम निपटाकर ही चैन की सांस लेते। अन्य सहकर्मियों को ललकारते, बोली बोलकर उत्साह बढ़ाते और इस तरह मुश्किल से मुश्किल काम चुटकी बजाते निपट जाता। नगेसर मिसिर की इस अदा के कारण उनके अन्य दोष हर कोई भूल जाता।

किसी-किसी दिन हड़बड़ाए हुए से आते और सीधे मेरे पास चले आते। बिना भूमिका बांधे मकसद पर आ जाते।

--‘का बताई साहब, पटवारी के दादा मर गए। माटी में जाना है। हम जा रहे हैं।’ और बिना अनुमति की प्रतीक्षा किए चले जाते। मुझे विश्वास था कि मेरे स्वतंत्र आचार-व्यवहार के चलते एक दिन ज़रूर नगेसर मिसिर अपनी कु-प्रवृत्ति से निजात पा जाएंगे। इसीलिए एक दिन सुबह काम बांटने से पूर्व मैंने उन्हें खूब समझाया कि नगेसर, आप जो झूठ-सच बात और दूसरों के घर-परिवार, बहू-बेटियों के बारे में ऊट-पटांग अफ़वाहें फैलाते रहते है ये कोई अच्छी बात नहीं है। ऐसी बातों से लोगों के दिलों को ठेस लगती है। जो भाग्य में लिखा होता है वही तो होता है। दुःख-सुख, जीवन-मरण, यश-अपयश सभी विधाता के हाथों तय होता है। ईश्वर कठपुतली की तरह इंसान को जिन्दगी भर नचाता रहता है। नगेसर मिसिर जैसे सब समझ रहे हों और बड़े सयाने की तरह मेरी हर बात पर सिर हिलाकर सहमति प्रदान कर रहे थे। लेकिन कुत्ते की दुम क्या कभी सीधी हुई है?

उसी दिन लंच ब्रेक के बाद मैंने पाया कि मजमा जुटाए नगेसर मिसिर खैनी मलते हुए अपनी चिर-परिचित मुद्रा में किसी मसालेदार खबर की गंध बिखेर रहे हैं। सहकर्मी चुप्पी साधे नगेसर मिसिर की लनतरानियां सुन रहे हैं। खैनी की ताली बजाकर फाइनल टच दिया नगेसर मिसिर ने और चुटकी से खैनी को आंेठ और दांत के बीच स्थापित करने के बाद किस्सा आगे बढ़ाने लगे---‘जानते हैं आप लोग, ई सब खराबी टीवी से आई है इहां। जब से विदेशी चैनल इहां दिखाया जाने लगा है वहां की मेहररूअन की देखा-देखी अपने देस की हीरोइनें भी अब जादा कपड़े नहीं पहनतीं। छोट-छोट लरिका लोग सब भकुआए से आखें फोड़ दिन-रात टीवी ताकते रहते हैं। हम तो मारे सरम के टीवी नहीं देख पाते हैं। घर-परिवार के संग सिर्फ समाचार भर देखते हैं। उसके भी बीच में मौका बे मौका निरोध औैर माला-डी का प्रचार आ ही जाता है और दिमाग खराब हो जाता है। गौरमिंट को चाहिए कि असिच्छा, दारू-बंदी, घूसखोरी, काला बाजारी, चोरी-चकारी के खिलाफ लोगों को संदेस दे। ऊ सब तो नहिंए होगा। बस एक-दू सेकण्ड का समय मिला नही कि लाल तिकोन निशान टांग दिए।’

बड़कू यादवइ स प्रवचन को झेल नहीं पाए। सो बीच में नगेसर मिसिर को टोक दिया--‘झुट्ठा कहीं का, असिल किस्सा सुनाकर बतिया खतम करना चाहिए तो लगे रामायन बांचने। तोहार परबचन सुने तो इहां लोग आए नाहीं हैं। ऊ बिकरमा की बिटिया वाला किस्सा अधबीचै अटकल बाये।’

नगेसर मिसिर अक्सर राह भटक जाते हैं और फिर मुख्य-मार्ग पर न लाया जाए तो मूल-कथा भूल जाते हैं। उन्होंने घड़ी में समय देखा, अभी पांच-सात मिनट की कसर थी।

--‘अइसन हुआ बड़कू भाई! आप तो जानते हैं कि बिकरमा की बिटिया मुसकिल से चैदह-पंदरा की होगी। ऊ जो सुकुलवा का दामाद है न! ठीकेदारी करता है और घर-जमाई है, उसका टांका बिकरमा की लड़की से जा भिड़ा। कल रात से दोनों लापता हैं। सुकलाईन पगला सी गई है। सुकुलवा की बेटी पेट से है। दो महीने बाद डिलवरी होना है। उसकी हालत भी ठीक नहीं है। दामाद घर से जेवर और रूपिया नगद लेकर फरार हुआ है। उधर बिकरमा पुलिस में रपट लिखवा आए हैं कि उनकी नाबालिग बेटी को सुकलाजी का दामाद बहला-फुसलाकर भगा ले गया है। राम-राम, घोर कलजुग आई गवा है भाई लोगों।,

बड़कू माथा पर हाथ धरे सोच में पड़ गए--‘जाने का होगा आगे...मान लो लड़की मिल भी गई तो किस काम की! च्च...च्च...!’ इस प्रसंग को और खींचा जाता कि मेरी आवाज़ सुनकर महफिल खत्म हुई। लोगों को बुरा तो लगा किन्तु सभी अपने-अपने काम पर चले गए।

मैं नगेसर मिसिर की आदत सुधारना चाहता था किन्तु उपयुक्त राह सूझती न थी। धीरे-धीरे ऐसा हुआ कि मैं भी नगेसर मिसिर की गप्पों में मज़ा लेने लग गया।

दो-चार रोज पहले की बात है। नगेसर मिसिर ड्यूटी आए और गुमसुम से काम में भिड़ गए। सभी आश्चर्य चकित थे। लोगों ने पूछना चाहा मगर जवाब नदारत। नगेसर मिसिर काॅलोनी में नहीं रहते हैं। खदान से सटे हुए एक गांव के निवासी हैं। खेती-बारी है। वहीं से ड्यूटी आना-जाना करते हैं। बड़कू उनका समवयस्क है और उन्हीं के गांव का वाशिन्दा है। बड़कू उस दिन ड्यूटी नहीं आया था। वह ऐेसे ही नागा करने का आदी है। कम दिन काम पर आता है और उसी में उसका खर्च चल जाता है। महीने में बीस-बाईस दिन की हाजिरी मिल जाए तो गांजा-दारू और अन्य खर्च आसानी से निपट जाता है। नगेसर मिसिर लंच के बाद चुपचाप बिना किसी को बताए घर चल गए।

उसके बाद वह कई दिन ड्यूटी नहीं आए तो मुझे भी जिज्ञासा हुई कि क्या बात हो गई है? नगेसर मिसिर बिना सूचना नागा करने वाला कर्मचारी है नहीं। जैसे ही बड़कू यादव काम पर आया तो मैंने उसे अपने आफिस बुलवाया। बड़कू के पीछे-पीछे कई और लोग चले आए।

मैंने बड़कू से नगेसर मिसिर के बारे में पूछा। बड़कू यादव सोच में पड़ गया फिर थोड़ा रूककर उसने जो बयान दिया उसका सार यह है कि नगेसर मिसिर ने पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरी शादी की थी। इस नई बीवी की उम्र ज्यादा नहीं हैै। नगेसर मिसिर पचास के हैं और उनकी दूसरी बीवी की उम्र उनकी उम्र से आधी की है। पहली पत्नी से उनकी पांच संतान है। दूसरी पत्नी से कोई औलाद नहीं है। कहते भी हैं कि स्त्री का रूप-सौंदर्य और चाह इच्छाएं पच्चीस के बाद फूट पड़ती हैं। नगेसर मिसिर के घर ट्यूशन पढ़ाने आने वाला मास्टर साहू अभी बांका जवान है। पता नहीं कब से उनके घर गुल खिल रहा था। आज से तीन दिन पहले उस मास्टर के घर नगेसर मिसिर की घरवाली जा बैठी है। कितना बुलाओ वापिस आती नहीं। नगेसर मिसिर के अलावा गांव के सभी लोग समझा चुके हैं लेकिन वह ढीठ मानती ही नहीं है। मास्टरवा अभी कुंवारा है। पैंतीस-छत्तीस का होगा। दोनों मजे में जीवन गुजार रहे हैं। नगेसर पंचायत बिठाना नहीं चाहते हैं। बस पगलाए से घूमते रहते हैं।

इस कहानी को सुनकर मुझे बेहद दुख हुआ।

इस घटना के बाद फिर नगेसर मिसिर कभी ड्यूटी नहीं आए। लोग बताते हैं कि उसने खुद को घर की चारदीवारी में कैद सा कर लिया है। कभी बाहर भी नहीं निकलते हैं।

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