मेरी आत्मकथा : चार्ली चैप्लिन - अनुवाद : सूरज प्रकाश

My Autobiography : Charlie Chaplin

भूमिका : मेरी आत्मकथा

वेस्ट मिंस्टर ब्रिज के खुलने से पहले केनिंगटन रोड सिर्फ अश्व मार्ग हुआ करता था। 1750 के बाद, पुल से शुरू करते हुए एक नयी सड़क बनायी गयी थी जिससे ब्राइटन तक का सीधा रास्ता खुल गया था। इसका नतीजा यह हुआ कि केनिंगटन रोड पर, जहां मैंने अपने बचपन का अधिकांश वक्त गुज़ारा है, कुछ बहुत ही शानदार घर देखे जा सकते थे। ये घर वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने थे। इनके सामने की तरफ लोहे की ग्रिल वाली बाल्कनी होती थी। हो सकता है कि उन घरों में रहने वालों ने कभी अपनी कोच में बैठ कर ब्राइटन जाते हुए जॉर्ज IV को देखा होगा।

उन्नीसवीं शताब्दी के आते-आते इनमें से ज्यादातर घर किराये के कमरे देने वाले घरों में और अपार्टमेंटों में बदल चुके थे। अलबत्ता, कुछ घर ऐसे भी बचे रहे जिन पर वक्त की मार नहीं पड़ी और उनमें डॉक्टर, वकील, सफल व्यापारी और नाटकों वग़ैरह में काम करने वाले कलाकार रहते आये। रविवार के दिन, सुबह के वक्त केनिंगटन रोड के दोनों तरफ के किसी न किसी घर के बाहर आप कसी हुई घोड़ी और गाड़ी देख सकते थे जो वहां रहने वाले नाटक कलाकार को नौरवुड या मेरटन जैसी दसियों मील दूर की जगह पर ले जाने के लिए तैयार खड़ी हो। वापसी में ये केनिंगटन रोड पर अलग-अलग तरह के शराब घरों व्हाइट हाउस, द' हार्न्स, और द' टैन्कार्ड पर रुकते हुए आते थे।

मैं बारह बरस का लड़का, अक्सर टैन्कार्ड के बाहर खड़ा बेहतरीन पोशाकें पहने इन रंगीले चमकीले महानुभावों को उतरते और भीतर लाउंज बार में जाते देखा करता था। वहां नाटकों के कलाकार आपस में मिलते-जुलते थे। रविवार के दिनों का उनका यही शगल हुआ करता था। दोपहर के भोजन के लिए घर जाने से पहले वे अपना एक आखिरी पैग यहां लिया करते थे। वे कितने भव्य लगते थे। चारखाने के सूट पहने और भूरे फेल्ट हैट डाटे, अपनी हीरे की अंगूठियों और टाइपिनों के लशकारे मारते। रविवार को दोपहर दो बजे पब बंद हो जाता था और वहां मौजूद सब लोग बाहर झुंड बना कर खड़े हो जाते और एक-दूसरे को विदा देने से पहले मन बहलाव में वक्त ज़ाया करते। मैं उन सबको हसरत भरी निगाहों से देखा करता और खुश होता क्योंकि उनमें से कुछेक बेवकूफी भरी अकड़ के साथ डींगें हांकते।

जब उनमें से आखिरी आदमी भी जा चुका होता तो ऐसा लगता मानो सूर्य बादलों के पीछे छिप गया हो। और तब मैं ढहते पुराने घरों की अपनी कतार की तरफ चल पड़ता। मेरा घर केनिंगटन रोड के पीछे की तरफ था। ये तीन नम्बर पाउनाल टेरेस था जिसकी तीसरी मंज़िल पर एक छोटी-सी दुछत्ती पर हम रहा करते थे। तीसरी मंज़िल तक आने वाली सीढ़ियां खस्ता हाल में थीं। घर का माहौल दमघोंटू था और वहां की हवा में बास मारते पानी और पुराने कपड़ों की बू रची-बसी रहती।

जिस रविवार की मैं बात कर रहा हूं, उस दिन मां खिड़की पर बैठी एकटक बाहर देख रही थी। वह मेरी तरफ मुड़ी और कमज़ोरी से मुस्कुरायी। कमरे की हवा दमघोंटू थी और कमरा बारह वर्ग फुट से थोड़ा-सा ही बड़ा रहा होगा। ये और भी छोटा लगता था और उसकी ढलुआं छत काफी नीची प्रतीत होती थी। दीवार के साथ सटा कर रखी गयी मेज़ पर जूठी प्लेटों और चाय के प्यालों का अम्बार लगा हुआ था। निचली दीवार से सटा एक लोहे का पलंग था जिस पर मां ने सफेद रंग पोता हुआ था। पलंग और खिड़की के बीच की जगह पर एक छोटी सी आग झंझरी थी। पलंग के एक सिरे पर एक पुरानी-सी आराम कुर्सी थी जिसे खोल देने पर चारपाई का काम लिया जा सकता था। इस पर मेरा भाई सिडनी सोता था लेकिन फिलहाल वह समुद्र पर गया हुआ था।

इस रविवार को कमरा कुछ ज्यादा ही दमघोंटू लग रहा था क्योंकि किसी कारण से मां ने इसे साफ-सूफ करने में लापरवाही बरती थी। आम तौर पर वह कमरा साफ रखती थी। इसका कारण यह था कि वह खुद भी समझदार, हमेशा खुश रहने वाली और युवा महिला थी। वह अभी सैंतीस की भी नहीं हुई थी। वह इस वाहियात दुछत्ती को भी चमका कर सुविधापूर्ण बना सकती थी। खासकर सर्दियों की सुबह के वक्त जब वह मुझे मेरा नाश्ता बिस्तर में ही दे देती और जब मैं सो कर उठता तो वह छोटा-सा कमरा सफाई से दमक रहा होता। थोड़ी-सी आग जल रही होती और खूंटी पर गरमा-गरम केतली रखी होती और जंगले के पास हैड्डर या ब्लो्टर मछली गरम हो रही होती और वह मेरे लिए टोस्ट बना रही होती। मां की उल्लसित कर देने वाली मौज़ूदगी, कमरे का सुखद माहौल, चीनी मिट्टी की केतली में डाले जाते उबलते पानी की छल-छल करती आवाज़, और मैं ऐसे वक्त अपना साप्ताहिक कॉमिक पढ़ रहा होता। शांत रविवार की सुबह के ये दुर्लभ आनन्ददायक पल होते।

लेकिन इस रविवार के दिन वह निर्विकार भाव से बैठी खिड़की से बाहर एकटक देखे जा रही थी। पिछले तीन दिन से वह खिड़की पर ही बैठी हुई थी। आश्चर्यजनक ढंग से चुप और अपने आप में खोयी हुई। मैं जानता था कि वह परेशान है। सिडनी समुद्र पर गया हुआ था और पिछले दो महीनों से उसकी कोई खबर नहीं आयी थी। मां जिस किराये की सिलाई मशीन पर काम करके किसी तरह घर की गाड़ी खींच रही थी, किस्तों की अदायगी समय पर न किये जाने के कारण ले जायी जा चुकी थी (ये कोई नयी बात नहीं थी) और मैं डांस के पाठ पढ़ा कर पांच शिंलिंग हफ्ते का जो योगदान दिया करता था, वह भी अचानक खत्म हो गये थे।

मुझे संकट के बारे में शायद ही पता रहा हो क्योंकि हम तो लगातार ही ऐसे संकटों से जूझते आये थे और लड़का होने के कारण मैं इस तरह की अपनी परेशानियों को शानदार भुलक्कड़पने के साथ दर किनार कर दिया करता था। हमेशा की तरह मैं स्कूल से दौड़ता हुआ घर आता और मां के छोटे-मोटे काम कर देता। बू मारता पानी गिराता और ताज़े पानी के डोल भर लाता। तब मैं भाग कर मैक्कार्थी परिवार के घर चला जाता और वहां शाम तक खेलता रहता। मुझे इस दम घोंटती दुछत्ती से निकलने का कोई न कोई बहाना चाहिये होता।

मैक्कार्थी परिवार मां का बहुत पुराना परिचित परिवार था। मां उन्हें नाटकों के दिनों से जानती थी। वे केनिंगटन रोड के बेहतर समझे जाने वाले इलाके में आरामदायक घर में रहते थे। उनकी माली हैसियत भी हमारी तुलना में बेहतर थी। मैक्कार्थी परिवार का एक ही लड़का था - वैली। मैं उसके साथ शाम का धुंधलका होने तक खेलता रहता और अमूमन यह होता कि मुझे शाम की चाय के लिए रोक लिया जाता। मैंने इस तरह कई बार देर तक वहां मंडराते हुए रात के खाने का भी जुगाड़ किया होगा। अक्सर मिसेज मैक्कार्थी मां के बारे में पूछती रहती और कहती कि कई दिन से वह नज़र क्यों नहीं आयी है। मैं कोई भी बहाना मार देता क्योंकि जब से मां दुर्दिन झेल रही थी, वह शायद ही अपनी नाटक मंडली के परिचितों से मिलने-जुलने जाती हो।

हां, ऐसे भी दिन होते जब मैं घर पर ही रहता और मां मेरे लिए चाय बनाती, सूअर की चर्बी में मेरे लिए ब्रेड तल देती। मुझे ये ब्रेड बहुत अच्छी लगती। फिर वह मुझे एक घंटे तक कुछ न कुछ पढ़ कर सुनाती। वह बहुत ही बेहतरीन पाठ करती थी। और तब मैं मां के इस संग-साथ के सुख के रहस्य का परिचय पाता और तब मुझे पता चलता कि मैं मैक्कार्थी परिवार के साथ जितना सुख पाता, उससे ज्यादा मैंने मां के साथ रह कर पा लिया है।

सैर से आ कर मैं जैसे ही कमरे में घुसा, वह मुड़ी और उलाहने भरी निगाह से मेरी तरफ देखने लगी। उसे इस हालत में देख कर मेरा कलेजा मुंह को आ गया। वह बहुत कमज़ोर तथा मरियल-सी हो गयी थी तथा उसकी आंखों में गहरी पीड़ा नज़र आ रही थी। मैं अकथनीय दुख से भर उठा। मैं तय नहीं कर पा रहा था कि घर पर रह कर उसके आसपास ही बना रहूं या फिर इस सब से दूर चला जाऊं। उसने मेरी तरफ तरस खाती निगाह से देखा,"तुम लपक कर मैक्कार्थी परिवार के यहां चले क्यों नहीं जाते," उसने कहा था।

मेरे आंसू गिरने को थे,"क्योंकि मैं तुम्हारे पास ही रहना चाहता हूं। वह मुड़ी और सूनी-सूनी आंखों से खिड़की के बाहर देखने लगी,"तुम भाग कर मैक्कार्थी के यहां ही जाओ और रात का खाना भी वहीं खाना। आज घर में खाने को कुछ भी नहीं है।

मैंने उसकी आवाज में तड़प महसूस की। मैंने इस तरफ से अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर दिये,"अगर तुम यही चाहती हो तो मैं चला जाता हूं।

वह कमजोरी से मुस्कुरायी और मेरा सिर सहलाया,"हां..हां तुम दौड़ जाओ।" हालांकि मैं उसके आगे गिड़गिड़ाता रहा कि वह मुझे घर पर ही अपने पास रहने दे लेकिन वह मेरे जाने पर ही अड़ी रही। इस तरह से मैं अपराध बोध की भावना लिये चला गया। वह उसी मनहूस दुछत्ती की खिड़की पर बैठी रही। उसे इस बात का ज़रा सा भी गुमान नहीं था कि आने वाले दिनों में दुर्भाग्य की कौन-सी पोटली उसके लिए खुलने वाली है।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 1

मेरा जन्म ईस्ट लेन, वेलवर्थ में 16 अप्रैल 1889 को रात आठ बजे हुआ था। इसके तुरंत बाद, हम, सेंट स्क्वायर, सेंट जॉर्ज रोड, लैम्बेथ में रहने चले गये थे। मेरी मां का कहना है कि मेरी दुनिया खुशियों से भरी हुई थी। हमारी परिस्थितियां कमोबेश ठीक-ठाक थीं। हम तीन कमरों के घर में रहते थे जो सुरुचिपूर्ण तरीके से सजे हुए थे। मेरी शुरुआती स्मृतियों में से एक तो ये है कि मां रोज़ रात को थियेटर जाया करती थी और मुझे और सिडनी को बहुत ही प्यार से आरामदायक बिस्तर में सहेज कर लिटा जाती थी और हमें नौकरानी की देख-रेख में छोड़ जाती थी। साढ़े तीन बरस की मेरी दुनिया में सब कुछ संभव था; अगर सिडनी, जो मुझसे चार बरस बड़ा था, हाथ की सफाई के करतब दिखा सकता था और सिक्का निगल कर अपने सिर के पीछे से निकाल कर दिखा सकता था तो मैं भी ठीक ऐसे ही कर के दिखा सकता था। इसलिए मैं अध पेनी का एक सिक्का निगल गया और मज़बूरन मां को डॉक्टर बुलवाना पड़ा।

रोज़ रात को जब वह थियेटर से वापिस लौटती थी तो उसका यह दस्तूर-सा था कि मेरे और सिडनी के लिए खाने की अच्छी-अच्छी चीज़ें मेज़ पर ढक कर रख देती थी ताकि सुबह उठते ही हमें मिल जायें - रंग-बिरंगे और सुगंधित केक का स्लाइस या मिठाई। इसके पीछे आपसी रज़ामंदी यह थी कि हम सुबह उठ कर शोर-शराबा नहीं करेंगे। वह आम तौर पर देर तक सो कर उठती थी।

मां वैराइटी स्टेज की कलाकार थी। अपनी उम्र के तीसरे दशक को छूती वह नफ़ासत पसंद महिला थी। उसका रंग साफ़ था, आंखें बैंजनी नीली और लम्बे, हल्के भूरे बाल। बाल इतने लम्बे कि वह आसानी से उन पर बैठ सकती थी। सिडनी और मैं अपनी मां को बहुत चाहते थे। हालांकि वह असाधारण खूबसूरत नहीं थी फिर भी वह हमें स्वर्ग की किसी अप्सरा से कम नहीं लगती थी। जो लोग उसे जानते थे उन्होंने मुझे बाद में बताया था कि वह सुंदर और आकर्षक थी और उसमें सामने वाले को बांध लेने वाले सौन्दर्य का जादू था। रविवार के सैर-सपाटे के लिए हमें अच्छे कपड़े पहनाना उसे बहुत अच्छा लगता था। वह सिडनी को लम्बी पतलून के साथ चौड़े कालर वाला सूट पहनाती, और मुझे नीली मखमली पतलून और उससे मेल खाते नीले दस्ताने। इस तरह के मौके आत्मतुष्टि के उत्सव होते जब हम केनिंगटन रोड पर इतराते फिरते।

लंदन उन दिनों धीर-गंभीर हुआ करता था। शहर की गति मंथर थी; यहां तक कि वेस्टमिन्स्टर रोड से चलने वाली घोड़े जुती ट्रामें भी खरामा-खरामा चलतीं और इसी गति से ही पुल के पास टर्मिनल पर गोल घेरे, रिवाल्विंग टेबल पर घूम जातीं। जब मां के खाते-पीते दिन थे तो हम भी वेस्टमिन्स्टर रोड पर रहा करते थे। वहां का माहौल दिल खुश करने वाला और दोस्ताना होता। वहां शानदार दुकानें, रेस्तरां और संगीत सदन थे। पुल के ठीक सामने कोने पर फलों की दुकान रंगीनियों से भरी होती। बाहर की तरफ तरतीब से रखे गये संतरों, सेबों, नाशपाती और केलों के पिरामिड सजे होते। इसके ठीक विपरीत, सामने की तरफ नदी के उस पार संसद की शांत धूसर इमारतें नज़र आतीं।

ये मेरे बचपन का, मेरी मन:स्थितियों का और मेरे जागरण का लंदन था। वसंत में लैम्बेथ की स्मृतियां - छोटी मोटी घटनाएं और चीज़ें। मां के साथ घोड़ा बस में ऊपर जा कर बैठना और पास से गुज़रते लिलाक के दरख्तों को छूने की कोशिश करना। तरह-तरह के रंगों की बस टिकटें, संतरे के रंग की, हरी, नीली, गुलाबी और दूसरे रंगों की। जहां बसें और ट्रामें रुकती थीं, वहां फुटपाथ पर उन टिकटों का बिखरा होना। मुझे वेस्टमिन्स्टर पुल के कोने पर फूल बेचने वाली गुलाबी चेहरे वाली लड़कियां याद आती हैं जो कोट के बटन में लगाने वाले फूल बनाया करती थीं। उनकी दक्ष उंगलियां तेजी से गोटे और किनारी के फर्न बनाती चलतीं। ताज़े पानी छिड़के गुलाबों की भीगी-भीगी खुशबू, जो मुझे बेतरह उदास कर जाती थी। और वो उदास कर देने वाले रविवार और पीले चेहरे वाले माता-पिता और उनके बच्चे जो वेस्टमिन्स्टर पुल पर पवन चक्की के खिलौने तथा रंगीन गुब्बारे लिये घिसटते चलते। और फिर पैनी स्टीमर जो हौले से पुल के नीचे से जाते समय अपने फनेल नीचे कर लेते थे। मुझे लगता है इस तरह की छोटी-छोटी घटनाओं से मेरी आत्मा का जन्म हुआ था। और फिर, हमारे बैठने के कमरे से जुड़ी स्मृहतियां जिन्होंने मेरी अनुभूतियों पर असर डाला।

नेल ग्वेन की मां की बनायी आदमकद पेंटिंग जिसे मैं पसंद नहीं करता था। हमारे खाने-पीने की मेज़ के लम्बोतरे डिब्बे जो मुझमें अवसाद पैदा करते थे और फिर छोटा-सा गोल म्यूजिक बॉक्स जिसकी ऐनामल की हुई सतह पर परियों की तस्वीरें बनी हुई थीं। इसे देख मैं खुश भी होता था और परेशान भी।

महान पलों की स्मृतियां : रायल मछली घर में जाना, मां के साथ वहां के स्लाइड शो देखना, लपटों में मुस्कुराती औरत का जीवित सिर देखना, 'शी' देखना, छ: पेनी की भाग्यशाली लॉटरी, सरप्राइज़ पैकेट उठाने के लिए मां का मुझे एक बहुत बड़े बुरादे के ड्रम तक ऊपर करना और उस पैकेट में से एक कैंडी का निकलना जो बजती नहीं थी और एक खिलौने वाले ब्रूच का निकलना। और फिर कैंटरबरी म्यूजिक हॉल में एक बार जाना जहां लाल आरामदायक सीट पर पांव पसार कर बैठना और पिता को अभिनय करते हुए देखना।

और अब रात का वक्त हो रहा है और मैं चार घोड़ों वाली बग्घी में ऊपर की तरफ सफरी झोले में लिपटा हुआ, मां और उसके थियेटर के और साथियों के साथ चला जा रहा हूं। उनकी चाल में रमा तथा हंसी-खुशी में खुश। हमारा बिगुल बजाने वाला अपनी शेखी में हमें केनिंगटन रोड से घोड़े की साज-सज्जा की सुमधुर रुन झुन और घोड़ों की टापों की संगीतमय आवाज़ के साथ लिये जा रहा था।

तभी कुछ हुआ। ये एक महीने के बाद की बात भी हो सकती है या थोड़े ही दिनों के बाद की भी। अचानक लगा कि मां और बाहर की दुनिया के साथ सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। वह सुबह से अपनी किसी सखी के साथ बाहर गयी हुई थी और वापिस लौटी तो बहुत अधिक उत्तेजना से भरी हुई थी। मैं फर्श पर खेल रहा था और अपने ठीक ऊपर चल रहे भीषण तनाव के बारे में सतर्क हो गया था। ऐसा लग रहा था मानो मैं कूएं की तलहटी में सुन रहा होऊं। मां भावपूर्ण तरीके से हाव-भाव जतला रही थी, रोये जा रही थी और बार-बार आर्मस्ट्रंग का नाम ले रही थी - आर्मस्ट्रंग ने ये कहा और आर्मस्ट्रंग ने वो कहा। आर्मस्ट्रंग जंगली है। मां की इस तरह की उत्तेजना हमने पहले नहीं देखी थी और यह इतनी तेज थी कि मैंने रोना शुरू कर दिया। मैं इतना रोया कि मज़बूरन मां को मुझे गोद में उठाना पड़ा और दिलासा देनी पड़ी। कुछ बरस बाद ही मुझे उस दोपहरी के महत्त्व का पता चल पाया था। मां अदालत से लौटी थी। वहां उसने मेरे पिता पर बच्चों के भरण पोषण का खर्चा-पानी न देने की वजह से मुकदमा ठोक रखा था और बदकिस्मती से मामला उसके पक्ष में नहीं जा रहा था। आर्मस्ट्रंग मेरे पिता का वकील था।

मैं पिता को बहुत ही कम जानता था और मुझे इस बात की बिल्कुल भी याद नहीं थी कि वे कभी हमारे साथ रहे हों। वे भी वैराइटी स्टेज के कलाकार थे। एकदम शांत और चिंतनशील। आंखें उनकी एकदम काली थीं। मां का कहना था कि वे एकदम नेपोलियन की तरह दीखते थे। उनकी हल्की महीन आवाज़ थी और उन्हें बेहतरीन अदाकार समझा जाता था। उन दिनों भी वे हर हफ्ते चालीस पौंड की शानदार रकम कमा लिया करते थे। बस, दिक्कत सिर्फ एक ही थी कि वे पीते बहुत थे। मां के अनुसार यही उन दोनों के बीच झगड़े की जड़ थी।

स्टेज कलाकारों के लिए यह बहुत ही मुश्किल बात होती कि वे पीने से अपने आपको रोक सकें। कारण यह था कि उन दिनों शराब सभी थियेटरों में ही बिका करती थी और कलाकार की अदाकारी के बाद उससे उम्मीद की जाती थी कि वह थियेटर बार में जाये और ग्राहकों के साथ बैठ कर पीये। कुछ थियेटर तो बॉक्स ऑफिस से कम और शराब बेच कर ज्यादा कमा लिया करते थे। कुछेक कलाकारों को तो तगड़ी तन्ख्वाह ही दी जाती थी जिनमें उनकी प्रतिभा का कम और उस पगार को थियेटर के बार में उड़ाने का ज्यादा योगदान रहता था। इस तरह से कई बेहतरीन कलाकार शराब के चक्कर में बरबाद हो गये। मेरे पिता भी ऐसे कलाकारों में से एक थे। वे मात्र सैंतीस बरस की उम्र में ज्यादा शराब के कारण भगवान को प्यारे हो गये थे।

मां उनके बारे में मज़ाक ही मज़ाक में और उदासी के साथ किस्से बताया करती थी। शराब पीने के बाद वे उग्र स्वभाव के हो जाते थे और उनकी इसी तरह की एक बार की दारूबाजी की नौटंकी में मां उन्हें छोड़-छाड़ कर अपनी कुछ सखियों के साथ ब्राइटन भाग गयी थी। पिता जी ने जब हड़बड़ी में तार भेजा,"तुम्हारा इरादा क्या है और तुरंत जवाब दो?" तो मां ने वापसी तार भेजा था,"नाच, गाना, पार्टियां और मौज-मज़ा, डार्लिंग!"

मां दो बहनों में से बड़ी थी। उनके पिता चार्ल्स हिल्स, जो एक आइरिश मोची थे, काउंटी कॉर्क, आयरलैंड से आये थे। उनके गाल सुर्ख सेबों की तरह लाल थे। उनके सिर पर बालों के सफेद गुच्छे थे। उनकी वैसी सफेद दाढ़ी थी जैसी व्हिस्लर के पोट्रेट में कार्लाइल की थी। वे कहा करते थे कि राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में पुलिस से छिपने-छिपाने के चक्कर में वे गीले नम खेतों में सोते रहे। इस कारण से उनके घुटनों में हमेशा के लिए दर्द बैठ गया और इस कारण वे दोहरे हो कर चलते थे। वे आखिर लंदन में आ कर बस गये थे और अपने लिए ईस्ट लेन वेलवर्थ में जूतों की मरम्मत का काम-धंधा तलाश लिया था।

दादी आधी घुमक्कड़िन थी। यह बात हमारे परिवार का खुला रहस्य थी। दादी मां हमेशा इस बात की शेखी बघारा करती थी कि उनका परिवार हमेशा ज़मीन का किराया दे कर रहता आया था। उनका घर का नाम स्मिथ था। मुझे उनकी शानदार नन्हीं बुढ़िया के रूप में याद है जो हमेशा मेरे साथ नन्हें-मुन्ने बच्चों जैसी बातें करके मुझसे दुआ सलाम किया करती थी। मेरे छ: बरस के होने से पहले ही वे चल बसी थीं। वे दादा से अलग हो गयी थीं जिसका कारण उन दोनों में से कोई भी नहीं बताया करता था। लेकिन केट आंटी के अनुसार इसके पीछे पारिवारिक झगड़ा था और दादा ने एक प्रेमिका रखी हुई थी और एक बार उसे बीच में ला कर दादी को हैरानी में डाल दिया था। आम जगह के मानदंडों के माध्यम से हमारे खानदान के नैतिकता को नापना उतना ही गलत प्रयास होगा जितना गर्म पानी में थर्मामीटर डालकर देखना होता है। इस तरह की आनुवंशिक काबलियत के साथ मोची परिवार की दो प्यारी बहनों ने घर-बार छोड़ा और स्टेज को समर्पित हो गयीं।

केट आंटी, मां की छोटी बहन, भी स्टेज की अदाकारा थी। लेकिन हम उसके बारे में बहुत ही कम जानते थे। इसका कारण यह था कि वह अक्सर हमारी ज़िंदगी में से आती-जाती रहती थी। वह देखने में बहुत आकर्षक थी और गुस्सैल स्वभाव की थी इसलिए मां से उसकी कम ही पटती थी। उसका कभी-कभार आना अचानक छोटे-मोटे टंटे में ही खत्म होता था कि मां ने कुछ न कुछ उलटा सीधा कह दिया होता था या कर दिया होता था।

अट्ठारह बरस की उम्र में मां एक अधेड़ आदमी के साथ अफ्रीका भाग गयी थी। वह अक्सर वहां की अपनी ज़िंदगी की बात किया करती थी कि किस तरह से वह वहां पेड़ों के झुरमुटों, नौकरों और जीन कसे घोड़ों के बीच मस्ती भरी ज़िंदगी जी रही थी। उसकी उम्र के अट्ठारहवें बरस में मेरे बड़े भाई सिडनी का जन्म हुआ था। मुझे बताया गया था कि वह एक लॉर्ड का बेटा था और जब वह इक्कीस बरस का हो जायेगा तो उसे वसीयत में दो हजार पौंड की शानदार रकम मिलेगी। इस समाचार से मैं एक साथ ही दुखी और खुश हुआ करता था।

मां बहुत अरसे तक अफ्रीका में नहीं रही और इंगलैंड में आ कर उसने मेरे पिता से शादी कर ली। मुझे नहीं पता कि उसकी ज़िंदगी के अफ्रीकी घटना-चक्र का क्या हुआ, लेकिन भयंकर गरीबी के दिनों में मैं उसे इस बात के लिए कोसा करता था कि वह इतनी शानदार ज़िंदगी काहे को छोड़ आयी थी। वह हँस देती और कहा करती कि मैं इन चीज़ों को समझने की उम्र से बहुत कम हूं और मुझे इस बारे में इतना नहीं सोचना चाहिये।

मुझे कभी भी इस बात का अंदाज़ा नहीं लग पाया कि वह मेरे पिता के बारे में किस तरह की भावनाएं रखती थी। लेकिन जब भी वह मेरे पिता के बारे में बात करती थी, उसमें कोई कड़ुवाहट नहीं होती थी। इससे मुझे शक होने लगता था कि वह खुद भी उनके प्यार में गहरे-गहरे डूबी हुई थी। कभी तो वह उनके बारे में बहुत सहानुभूति के साथ बात करती तो कभी उनकी शराबखोरी की लत और हिंसक प्रवृत्ति के बारे में बताया करती थी। बाद के बरसों में जब भी वह मुझसे खफा होती, वह हिकारत से कहती,तू भी अपने बाप की ही तरह किसी दिन अपने आपको गटर में खत्म कर डालेगा।"

वह पिताजी को अफ्रीका जाने से पहले के दिनों से जानती थी। वे एक दूसरे को प्यार करते थे और उन्होंने शामुस ओ'ब्रीयन नाम के एक आयरिश मेलोड्रामा में एक साथ काम किया था। सोलह बरस की उम्र में मां ने उसमें प्रमुख भूमिका निभायी थी। कम्पनी के साथ टूर करते हुए मां एक अधेड़ उम्र के लॉर्ड के सम्पर्क में आयी और उसके साथ अफ्रीका भाग गयी। जब वह वापिस इंगलैंड आयी तो पिता ने अपने रोमांस के टूटे धागों को फिर से जोड़ा और दोनों ने शादी कर ली। तीन बरस बाद मेरा जन्म हुआ था। मैं नहीं जानता कि शराबखोरी के अलावा और कौन-कौन सी घटनाएं काम कर रही थीं लेकिन मेरे जन्म के एक बरस के ही बाद वे दोनों अलग हो गये थे। मां ने गुज़ारे भत्ते की भी मांग नहीं की थी। वह उन दिनों खुद एक स्टार हुआ करती थी और हर हफ्ते 25 पौंड कमा रही थी। उसकी माली हैसियत इतनी अच्छी थी कि अपना और अपने बच्चों का भरण पोषण कर सके। लेकिन जब उसकी ज़िंदगी में दुर्भाग्य ने दस्तक दी तभी उसने मदद की मांग की। अगर ऐसा न होता तो उसने कभी भी कानूनी कार्रवाई न की होती।

मां को उसकी आवाज़ बहुत तकलीफ दे रही थी। वैसे भी उसकी आवाज़ कभी भी इतनी बुलंद नहीं थी लेकिन ज़रा-सा भी सर्दी-जुकाम होते ही उसकी स्वर तंत्री में सूजन आ जाती थी जो फिर हफ्तों चलती रहती थी; लेकिन उसे मज़बूरी में काम करते रहना पड़ता था। इसका नतीजा यह हुआ कि उसकी आवाजा़ बद से बदतर होती चली गयी। वह अब अपनी आवाज़ पर भरोसा नहीं कर सकती थी। गाना गाते-गाते बीच में ही उसकी आवाज़ भर्रा जाती या अचानक गायब ही हो जाती और फुसफुसाहट में बदल जाती। तब श्रोता बीच में ठहाके लगने लगते। वे गला फाड़ कर चिल्लाना शुरू कर देते। आवाज़ की चिंता ने मां की सेहत को और भी डांवाडोल कर दिया था और उसकी हालत मानसिक रोगी जैसी हो गयी। नतीजा यह हुआ कि उसे थियेटर से बुलावे आने कम होते चले गये और एक दिन ऐसा भी आया कि बिल्कुल बंद ही हो गये।

ये उसकी आवाजा़ के खराब होते चले जाने के कारण ही था कि मुझे पांच बरस की उम्र में पहली बार स्टेज पर उतरना पड़ा। मां आम तौर पर मुझे किराये के कमरे में अकेला छोड़ कर जाने के बजाये रात को अपने साथ थियेटर ले जाना पसंद करती थी। वह उस वक्त कैंटीन एट द' एल्डरशाट में काम कर रही थी। ये एक गंदा, चलताऊ-सा थियेटर था जो ज्यादातर फौजियों के लिए खेल दिखाता था। वे लोग उजड्ड किस्म के लोग होते थे और उन्हें भड़काने या ओछी हरकतों पर उतर आने के लिए मामूली-सा कारण ही काफी होता था। एल्डरशॉट में नाटकों में काम करने वालों के लिए वहां एक हफ्ता भी गुज़ारना भयंकर तनाव से गुज़रना होता था।

मुझे याद है, मैं उस वक्त विंग्स में खड़ा हुआ था जब पहले तो मां की आवाज़ फटी और फिर फुसफुसाहट में बदल गयी। श्रोताओं ने ठहाके लगाना शुरू कर दिये और अनाप-शनाप गाने लगे और कुत्ते बिल्लियों की आवाज़ें निकालना शुरू कर दिया। सब कुछ अस्पष्ट-सा था और मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा था कि ये सब क्या चल रहा है। लेकिन शोर-शराबा बढ़ता ही चला गया और मज़बूरन मां को स्टेज छोड़ कर आना पड़ा। जब वह विंग्स में आयी तो बुरी तरह से व्यथित थी और स्टेज मैनेजर से बहस कर रही थी। स्टेज मैनेजर ने मुझे मां की सखियों के आगे अभिनय करते देखा था। वह मां से शायद यह कह रहा था कि उसके स्थान पर मुझे स्टेज पर भेज दे। और इसी हड़बड़ाहट में मुझे याद है कि उसने मुझे एक हाथ से थामा था और स्टेज पर ले गया था। उसने मेरे परिचय में दो चार शब्द बोले और मुझे स्टेज पर अकेला छोड़ कर चला गया। और वहां फुट लाइटों की चकाचौंध और धुंए के पीछे झांकते चेहरों के सामने मैंने गाना शुरू कर दिया। ऑरक्रेस्टा मेरा साथ दे रहा था। थोड़ी देर तक तो वे भी गड़बड़ बजाते रहे और आखिर उन्होंने मेरी धुन पकड़ ही ली। ये उन दिनों का एक मशहूर गाना जैक जोन्स था।

जैक जोंस सबका परिचित और देखा भाला

घूमता रहता बाज़ार में गड़बड़झाला

नहीं नज़र आती कोई कमी जैक में हमें

तब भी नहीं जब वो जैसा था तब कैसा था

हो गयी गड़बड़ जब से छोड़ा उसे बुलियन गाड़ी ने

हो गया बेड़ा गर्क, जैक गया झाड़ी में

नहीं मिलता वह दोस्तों से पहले की तरह

भर देता है मुझे वह हिकारत से

पढ़ता है हर रविवार वह अखबार टेलिग्राफ

कभी वह बन कर खुश था स्टार

जब से जैक के हाथ में आयी है माया

क्या बतायें, हमने उसे पहले जैसा नहीं पाया।

अभी मैंने आधा ही गीत गाया था कि स्टेज पर सिक्कों की बरसात होने लगी। मैंने तत्काल घोषणा कर दी कि मैं पहले पैसे बटोरूंगा और उसके बाद ही गाना गाऊंगा। इस बात पर और अधिक ठहाके लगे। स्टेज मैनेजर एक रुमाल ले कर स्टेज पर आया और सिक्के बटोरने में मेरी मदद करने लगा। मुझे लगा कि वो सिक्के अपने पास रखना चाहता है। मैंने ये बात दर्शकों तक पहुंचा दी तो ठहाकों का जो दौरा पड़ा वो थमने का नाम ही न ले। खास तौर पर तब जब वह रुमाल लिये-लिये विंग्स में जाने लगा और मैं चिंतातुर उसके पीछे-पीछे लपका। जब तक उसने सिक्कों की वो पोटली मेरी मां को नहीं थमा दी, मैं स्टेज पर वापिस गाने के लिए नहीं आया। अब मैं बिल्कुल सहज था। मैं दर्शकों से बातें करता रहा, मैं नाचा और मैंने तरह-तरह की नकल करके दिखायी। मैंने मां के आयरिश मार्च थीम की भी नकल करके बतायी।

रिले . . रिले. . बच्चे को बहकाते रिले

रिले. . रिले. . मैं वो बच्चा जिसे बहकाते रिले

हो बड़ी या हो सेना छोटी

नहीं कोई इतना दुबला और साफ

करते अच्छे सार्जेंट रिले

बहादुर अट्ठासी में से रिले. .।

और कोरस को दोहराते हुए मैं अपने भोलेपन में मां की आवाज़ के फटने की भी नकल कर बैठा। मैं ये देख कर हैरान था कि दर्शकों पर इसका जबरदस्त असर पड़ा है। खूब हंसी के पटाखे छूट रहे थे। लोग खूब खुश थे और इसके बाद फिर सिक्कों की बौछार। और जब मां मुझे स्टेज से लिवाने के लिए आयी तो उसकी मौज़ूदगी पर लोगों ने जम के तालियां बजायीं। उस रात मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार स्टेज पर उतरा था और मां आखिरी बार।

जब नियति आदमी के भाग्य के साथ खिलवाड़ करती है तो उसके ध्यान में न तो दया होती है और न ही न्याय ही। मां के साथ भी नियति ने ऐसे ही खेल दिखाये। उसे उसकी आवाज़ फिर कभी वापिस नहीं मिली। जब पतझड़ के बाद सर्दियां आयीं तो हमारी हालत बद से बदतर हो गयी। हालांकि मां बहुत सावधान थी और उसने थोड़े-बहुत पैसे बचा कर रखे थे लेकिन कुछ ही दिन में ये पूंजी भी खत्म हो गयी। धीरे-धीरे उसके गहने और छोटी-मोटी चीज़ें बाहर का रास्ता देखने लगीं। ये चीज़ें घर चलाने के लिए गिरवी रखी जा रही थीं। और इस पूरे अरसे के दौरान वह उम्मीद करती रही कि उसकी आवाज़ वापिस लौट आयेगी।

इस बीच हम तीन आरामदायक कमरों के मकान में से दो कमरों के मकान में और फिर एक कमरे के मकान में शिफ्ट हो चुके थे। हमारा सामान कम होता चला जा रहा था और हर बार हम जिस तरह के पड़ोस में रहने के लिए जाते, उसका स्तर नीचे आता जा रहा था। तब वह धर्म की ओर मुड़ गयी थी। मुझे इसका कारण तो यह लगता है कि शायद उसे यह उम्मीद थी कि इससे उसकी आवाज़ वापिस लौट आयेगी। वह नियमित रूप से वेस्टमिन्स्टर ब्रिज रोड पर क्राइस्ट चर्च जाया करती और हर इतवार को मुझे बाख के आर्गन म्यूजिक के लिए बैठना पड़ता और पादरी एफ बी मेयेर की जोशीली तथा ड्रामाई आवाज़ को सुनना पड़ता जो गिरजे के मध्य भाग से घिसटते हुए पैरों की तरह आती प्रतीत होती। ज़रूर ही उनके भाषणों में अपील होती होगी क्योंकि मैं अक्सर मां को दबोच कर थाम लेता और चुपके से अपने आंसू पोंछ डालता। हालांकि इससे मुझे परेशानी तो होती ही थी।

मुझे अच्छी तरह से याद है उस गर्म दोपहरी में पवित्र प्रार्थना सभा की जब वहां भीड़ में से चांदी का एक ठंडा प्याला गुज़ारा गया। उस प्याले में स्वादिष्ट अंगूरों का रस भरा हुआ था। मैंने उसमें से ढेर सारा जूस पी लिया था और मां का मुझे रोकता-सा वह नम नरम हाथ और तब मैंने कितनी राहत महसूस की थी जब फादर ने बाइबल बंद की थी। इसका मतलब यही था कि अब प्रार्थनाएं शुरू होंगी और ईश वंदना के अंतिम गीत गाये जायेंगे।

मां जब से धर्म की शरण में गयी थी, वह थियेटर की अपनी सखियों से कभी-कभार ही मिल पाती। उसकी वह दुनिया अब छू मंतर हो चुकी थी और उसकी अब यादें ही बची थीं। ऐसा लगता था मानो हम हमेशा से ही इस तरह के दयनीय हालात में रहते आये थे। बीच का एक बरस तो तकलीफों के पूरे जीवन काल की तरह लगा था। हम अब बेरौनक धुंधलके कमरे में रहते थे। काम-धाम तलाशना बहुत ही दूभर था और मां को स्टेज के अलावा कुछ आता-जाता नहीं था, इससे उसके हाथ और बंध जाते थे। वह छोटे कद की, लालित्य लिये भावुक महिला थी। वह विक्टोरियन युग की ऐसी भयंकर विकट परिस्थितियों से जूझ रही थी जहां अमीरी और गरीबी के बीच बहुत बड़ी खाई थी। गरीब-गुरबा औरतों के पास हाथ का काम करने, मेहनत मजूरी करने के अलावा और कोई चारा नहीं था या फिर थी दुकानों वगैरह में हाड़-तोड़ गुलामी। कभी-कभार उसे नर्सिंग का काम मिल जाता था लेकिन इस तरह के काम भी बहुत दुर्लभ होते और ये भी बहुत ही कम अरसे के लिए होते। इसके बावजूद वह कुछ न कुछ जुगाड़ कर ही लेती। वह थियेटर के लिए अपनी पोशाकें खुद सीया करती थी इसलिए सीने-पिरोने के काम में उसका हाथ बहुत अच्छा था। इस तरह से वह चर्च के लोगों की कुछ पोशाकें सी कर कुछेक शिलिंग कमा ही लेती थी। लेकिन ये कुछ शिलिंग हम तीनों के गुज़ारे के लिए नाकाफी होते। पिता जी की दारूखोरी के कारण उन्हें थियेटर में काम मिलना अनियमित होता चला गया और इस तरह हर हफ्ते मिलने वाला उनका दस शिलिंग का भुगतान भी अनियमित ही रहता।

मां अब तक अपनी अधिकांश चीज़ें बेच चुकी थी। सबसे आखिर में बिकने के लिए जाने वाली उसकी वो पेटी थी जिसमें उसकी थियेटर की पोशाकें थीं। वह इन चीज़ों को अब तब इसलिए अपने पास संभाल कर रखे हुए थी कि शायद कभी उसकी आवाज़ वापिस लौट आये और उसे फिर से थियेटर में काम मिलना शुरू हो जाये। कभी-कभी वह ट्रंक के भीतर झांकती कि शायद कुछ काम का मिल जाये। तब हम कोई मुड़ी-तुड़ी पोशाक या विग देखते तो उससे कहते कि वह इसे पहन कर दिखाये। मुझे याद है कि हमारे कहने पर उसने जज की एक टोपी और गाउन पहने थे और अपनी कमज़ोर आवाज़ में अपना एक पुराना सफल गीत सुनाया था। ये गीत उसने खुद लिखा था। गीत के बोल तुकबंदी लिये हुए थे और इस तरह से थे:

मैं हूं एक महिला जज

और मैं हूं एक अच्छी जज

मामलों के फैसले करती ईमानदारी से

पर आते ही नहीं मामले पास मेरे

मैं सिखाना चाहती हूं वकीलों को

एकाध काम की बात

क्या नहीं कर सकती औरत जात।

आश्चर्यजनक तरीके से तब वह गरिमापूर्ण लगने वाले नृत्य की भंगिमाएं दिखाने लगती। वह तब कसीदाकारी भूल जाती और हमें अपने पुराने सफल गीतों से और नृत्यों से तब तक खुश करती रहती जब तक वह थक कर चूर न हो जाती और उसकी सांस न उखड़ने लगती। तब वह बीती बातें याद करते लगती और हमें अपने नाटकों के कुछ पुराने पोस्टर दिखाती। एक पोस्टर इस तरह से था:

खासो-खास प्रदर्शन

नाज़ुक और प्रतिभा सम्पन्न

लिली हार्ले

गम्भीर हास्य की देवी,

बहुरूपिन और नर्तकी

जब वह हमारे सामने प्रदर्शन करती तो वह अपने खुद के मनोरंजक अंश तो दिखाती ही, दूसरी अभिनेत्रियों की भी नकल दिखाती जिन्हें उसने तथा कथित वैध थियेटरों में काम करते देखा था।

किसी नाटक को सुनाते समय वह अलग-अलग अंशों का अभिनय करके दिखाती। उदाहरण के लिए द' साइन ऑफ द' क्रॉस' में मर्सिया अपनी आंखों में अलौकिक प्रकाश भरे, शेरों को खाना खिलाने के लिए मांद वाले पिंजरे में जाती है। वह हमें विल्सन बैरट की ऊंची पोप जैसी आवाज में नकल करके दिखाती। वह छोटे कद का आदमी था इसलिए पांच इंच ऊंची हील वाले जूते पहन कर घोषणा करता:"यह ईसाइयत क्या है, मैं नहीं जानता लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूं कि..कि यदि ईसाइयत ने मर्सिया जैसी औरतें बनायी हैं तो रोम, नहीं, जगत ही इसके लिए पवित्रतम होगा।" इस अंश को हास्य की झलक के साथ करके दिखाती लेकिन उसमें बैरेट की प्रतिभा के प्रति सराहना भाव ज़रूर होता।

जिन व्यक्तियों में वास्तविक प्रतिभा थी, उन्हें पहचानने, मान देने में उसका कोई सानी नहीं था। चाहे फिर वह नायिका ऐलेन टेरी हो, या म्यूजिक हॉल की जो एल्विन, वह उनकी कला की व्याख्या करती। वह तकनीक की बारीक जानकारी रखती थी और थियेटर के बारे में ऐसे व्यक्ति की तरह बात करती थी जो थियेटर को प्यार करने वाले ही कर सकते हैं।

वह अलग-अलग किस्से सुनाती और उनका अभिनय करके दिखाती। उदाहरण के लिए, वह याद करती सम्राट नेपोलियन के जीवन का कोई प्रसंग : दबे पांव अपने पुस्तकालय में किसी किताब की तलाश में जाना और मार्शल नेय द्वारा रास्ते में घेर लिया जाना। मां ये दोनों ही भूमिकाएं अदा करती लेकिन हमेशा हास्य का पुट ले कर, "महाशय, मुझे इजाज़त दीजिये कि मैं आपके लिये ये किताब ला दूं। मेरा कद ऊंचा है।" और नेपोलियन यह कहते हुए खफ़ा होते हुए गुर्राया "ऊंचा या लम्बा?"

मां नेल ग्विन का विस्तार से अभिनय करके बताती कि वह किस तरह से महल की सीढ़ियों पर झुकी हुई है और उसकी बच्ची उसकी गोद में है। वह चार्ल्स II को धमकी दे रही है,"इस बच्ची को कोई नाम दो वरना मैं इसे ज़मीन पर पटक दूंगी।" और सम्राट चार्ल्स हड़बड़ी में सहमत हो जाते हैं, "ठीक है, ठीक है, द' ड्यूक ऑफ अल्बांस।"

मुझे ओक्ले स्ट्रीट में तहखाने वाले एक कमरे के घर की वह शाम याद है। मैं बुखार उतरने के बाद बिस्तर पर लेटा आराम कर रहा था। सिडनी रात वाले स्कूल में गया हुआ था और मां और मैं अकेले थे। दोपहर ढलने को थी। मां खिड़की से टेक लगाये न्यू टेस्टामेंट पढ़ रही थी, अभिनय कर रही थी, और अपने अतुलनीय तरीके से उसकी व्याख्या कर रही थी। वह गरीबों और मासूम बच्चों के प्रति यीशू मसीह के प्रेम और दया के बारे में बता रही थी। शायद उसकी संवेदनाएं मेरे बुखार के कारण थीं, लेकिन उसने जिस शानदार और मन को छू लेने वाले ढंग से यीशू के नये अर्थ समझाये वैसे मैंने न तो आज तक सुने और न ही देखे ही हैं। मां उनकी सहिष्णुता और समझ के बारे में बता रही थी; उसने उस महिला के बारे में बताया जिससे पाप हो गया था और उसे भीड़ द्वारा पत्थर मार कर सज़ा दी जानी थी, और उनके प्रति यीशू के शब्द, "आप में से जिसने कभी पाप न किया हो वही आगे आ कर सबसे पहला पत्थर मारे।"

सांझ का धुंधलका होने तक वह पढ़ती रही। वह सिर्फ लैम्प जलाने की लिए ही उठी। तब उसने उस विश्वास के बारे में बताया जो यीशू मसीह ने बीमारों में जगाया था। बीमारों को बस, उनके चोगे की तुरपन को ही छूना होता था और वे चंगे हो जाते थे।

मां ने बड़े-बड़े पादरियों और महिला पादरियों की घृणा के बारे में बताया और बताया कि किस तरह से यीशू मसीह को गिरफ्तार किया गया था और वे किस तरह से पोंटियस के सामने शांत बने रहे थे। पोंटियस ने हाथ धोते हुए कहा था (मां ने बहुत ही शानदार अभिनय करके ये बताया)," मुझे इस आदमी में कोई खराबी ही नज़र नहीं आती।" तब मां ने बताया कि किस तरह से उन लोगों ने यीशू को निर्वस्त्र कर डाला था और उसे जलील किया था और उसके सिर पर कांटों का ताज पहना दिया था, उसका मज़ाक उड़ाया था और उसके मुंह पर ये कहते हुए थूका था, "ओ यहूदियों के राजा ..।"

जब वह ये सब सुना रही थी तो उसके गालों पर आंसू ढरके चले आ रहे थे। मां ने बताया कि किस तरह से साइमन ने क्रॉस ढोने में यीशू मसीह की मदद की थी और किस तरह भाव विह्वल हो कर यीशू ने उसे देखा था। मां ने बाराबास के बारे में बताया जो पश्चातापी था और क्रॉस पर उनके साथ ही मरा था। वह क्षमा मांग रहा था और यीशू कह रहे थे, "आज तुम मेरे साथ स्वर्ग में होवोगे", और क्रॉस से अपनी मां की ओर देखते हुए यीशू ने कहा था, "मां, अपने बेटे को देखो।" और उनकी अंतिम, मरते वक्त की पीड़ा भरी कराह, "मेरे परम पिता, आपने मुझे क्षमा क्यों नहीं किया?" और हम दोनों रो पड़े थे।

"तुमने देखा", मां कह रही थी, "वे मानवता से कितने भरे हुए थे। हम सब की तरह उन्हें भी संदेह झेलना पड़ा।" मां ने मुझे इतना भाव विह्वल कर दिया था कि मैं उसी रात मर जाना और यीशू से मिलना चाहता था। लेकिन मां इतनी उत्साहित नहीं थी, "यीशू चाहते हैं कि पहले तुम जीओ और अपने भाग्य को यहीं पूरा करो।" उसने कहा था। ओक्ले स्ट्रीट के उस तहखाने के उस अंधेरे कमरे में मां ने मुझे उस ज्योति से भर दिया था जिसे विश्व ने आज तक जाना है और जिसने पूरी दुनिया को एक से बढ़ कर एक कथा तत्व वाले साहित्य और नाटक दिये हैं: प्यार, दया और मानवता।

हम समाज के जिस निम्नतर स्तर के जीवन में रहने को मज़बूर थे वहां ये सहज स्वाभाविक था कि हम अपनी भाषा-शैली के स्तर के प्रति लापरवाह होते चले जाते लेकिन मां हमेशा अपने परिवेश से बाहर ही खड़ी हमें समझाती और हमारे बात करने के ढंग, उच्चारण पर ध्यान देती रहती, हमारा व्याकरण सुधारती रहती और हमें यह महसूस कराती रहती कि हम खास हैं।

हम जैसे-जैसे और अधिक गरीबी के गर्त में उतरते चले गये, मैं अपनी अज्ञानता के चलते और बचपने में मां से कहता कि वह फिर से स्टेज पर जाना शुरू क्यों नहीं कर देती। मां मुस्कुराती और कहती कि वहां का जीवन नकली और झूठा है और कि इस तरह के जीवन में रहने से हम जल्दी ही ईश्वर को भूल जाते हैं। इसके बावज़ूद वह जब भी थियेटर की बात करती तो वह अपने आपको भूल जाती और उत्साह से भर उठती। यादों की गलियों में उतरने के बाद वह फिर से मौन के गहरे कूंए में उतर जाती और अपने सुई धागे के काम में अपने आपको भुला देती। मैं भावुक हो जाता क्योंकि मैं जानता था कि हम अब उस शानो-शौकत वाली ज़िंदगी का हिस्सा नहीं रहे थे। तब मां मेरी तरफ देखती और मुझे अकेला पा कर मेरा हौसला बढ़ाती।

सर्दियां सिर पर थीं और सिडनी के कपड़े कम होते चले जा रहे थे। इसलिए मां ने अपने पुराने रेशमी जैकेट में से उसके लिए एक कोट सी दिया था। उस पर काली और लाल धारियों वाली बांहें थीं। कंधे पर प्लीट्स थी और मां ने पूरी कोशिश की थी कि उन्हें किसी तरह से दूर कर दे लेकिन वह उन्हें हटा नहीं पा रही थी। जब सिडनी से वह कोट पहनने के लिए कहा गया तो वह रो पड़ा था, "स्कूल के बच्चे मेरा ये कोट देख कर क्या कहेंगे?"

"इस बात की कौन परवाह करता है कि लोग क्या कहेंगे?" मां ने कहा था,"इसके अलावा, ये कितना खास किस्म का लग रहा है।" मां का समझाने-बुझाने का तरीका इतना शानदार था कि सिडनी आज दिन तक नहीं समझ पाया है कि वह मां के फुसलाने पर वह कोट पहनने को आखिर तैयार ही कैसे हो गया था। लेकिन उसने कोट पहना था। उस कोट की वजह से और मां के ऊंची हील के सैंडिलों को काट-छांट कर बनाये गये जूतों से सिडनी के स्कूल में कई झगड़े हुए। उसे सब लड़के छेड़ते,"जोसेफ और उसका रंग बिरंगा कोट।" और मैं, मां की पुरानी लाल लम्बी जुराबों में से काट-कूट कर बनायी गयी जुराबें (लगता जैसे उनमें प्लीटें डाली गयी हैं।) पहन कर जाता तो बच्चे छेड़ते,"आ गये सर फ्रांसिस ड्रेक।"

इस भयावह हालात के चरम दिनों में मां को आधी सीसी सिर दर्द की शिकायत शुरू हुई। उसे मज़बूरन अपना सीने-पिरोने का काम छोड़ देना पड़ा। वह कई-कई दिन तक अंधेरे कमरे में सिर पर चाय की पत्तियों की पट्टियां बांधे पड़ी रहती। हमारा वक्त खराब चल रहा था और हम गिरजा घरों की खैरात पर पल रहे थे, सूप की टिकटों के सहारे दिन काट रहे थे और मदद के लिए आये पार्सलों के सहारे जी रहे थे। इसके बावजूद, सिडनी स्कूल के घंटों के बीच अखबार बेचता, और बेशक उसका योगदान ऊंट के मुंह में जीरा ही होता, ये उस खैरात के सामान में कुछ तो जोड़ता ही था। लेकिन हर संकट में हमेशा कोई न कोई क्लाइमेक्स भी छुपा होता है। इस मामले में ये क्लाइमेक्स बहुत सुखद था।

एक दिन जब मां ठीक हो रही थी, चाय की पत्ती की पट्टी अभी भी उसके सिर पर बंधी थी, सिडनी उस अंधियारे कमरे में हांफता हुआ आया और अखबार बिस्तर पर फेंकता हुआ चिल्लाया,"मुझे एक बटुआ मिला है।" उसने बटुआ मां को दे दिया। जब मां ने बटुआ खोला तो उसने देखा, उसमें चांदी और सोने के सिक्के भरे हुए थे। मां ने तुरंत उसे बंद कर दिया और उत्तेजना से वापिस अपने बिस्तर पर ढह गयी।

सिडनी अखबार बेचने के लिए बसों में चढ़ता रहता था। उसने बस के ऊपरी तल्ले पर एक खाली सीट पर बटुआ पड़ा हुआ देखा। उसने तुरंत अपने अखबार उस सीट के ऊपर गिरा दिये और फिर अखबारों के साथ पर्स भी उठा लिया और तेजी से बस से उतर कर भागा। एक बड़े से होर्डिंग के पीछे, एक खाली जगह पर उसने बटुआ खोल कर देखा और उसमें चांदी और तांबे के सिक्कों का ढेर पाया। उसने बताया कि उसका दिल बल्लियों उछल रहा था और और वह बिना पैसे गिने ही घर की तरफ भागता चला आया।

जब मां की हालत कुछ सुधरी तो उसने बटुए का सारा सामान बिस्तर पर उलट दिया। लेकिन बटुआ अभी भी भारी था। उसके बीच में भी एक जेब थी। मां ने उस जेब को खोला और देखा कि उसके अंदर सोने के सात सिक्के छुपे हुए थे। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था। ईश्वर का लाख-लाख शुक्र कि बटुए पर कोई पता नहीं था। इसलिए मां की झिझक थोड़ी कम हो गयी थी। हालांकि उस बटुए के मालिक के दुर्भाग्य के प्रति थोड़ा-सा अफसोस जताया गया था, अलबत्ता, मां के विश्वास ने तुरंत ही इसे हवा दे दी कि ईश्वर ने इसे हमारे लिए एक वरदान के रूप में ऊपर से भेजा है।

मां की बीमारी शारीरिक थी अथवा मनोवैज्ञानिक, मैं नहीं जानता। लेकिन वह एक हफ्ते के भीतर ही ठीक हो गयी। जैसे ही वह ठीक हुई, हम छुट्टी मनाने के लिए समुद्र के दक्षिण तट पर चले गये। मां ने हमें ऊपर से नीचे तक नये कपड़े पहनाये।

पहली बार समुद्र को देख मैं जैसे पागल हो गया था। जब मैं उस पह़ाड़ी गली में तपती दोपहरी में समुद्र के पास पहुंचा तो मैं ठगा-सा रह गया। हम तीनों ने अपने जूते उतारे और पानी में छप-छप करते रहे। मेरे तलुओं और मेरे टखनों को गुदगुदाता समुद्र का गुनगुना पानी और मेरे पैरों के तले से सरकती नम, नरम और भुरभुरी रेत.. मेरे आनंद का ठिकाना नहीं था। वह दिन भी क्या दिन था। केसरी रंग का समुद्र तट, उसकी गुलाबी और नीली डोलचियां और उस पर लकड़ी के बेलचे। उसके सतरंगी तंबू और छतरियां, लहरों पर इतराती कश्तियां, और ऊपर तट पर एक तरह करवट ले कर आराम फरमाती कश्तियां जिनमें समुद्री सेवार की गंध रची-बसी थी और वे तट। इन सबकी यादें अभी भी मेरे मन में चरम उत्तेजना से भरी हुई लगती हैं।

1957 में मैं दोबारा साउथ एंड तट पर गया और उस संकरी पहाड़ी गली को खोजने का निष्फल प्रयास करता रहा जिससे मैंने समुद्र को पहली बार देखा था लेकिन अब वहां उसका कोई नामो-निशान नहीं था। शहर के आखिरी सिरे पर वहां जो कुछ था, पुराने मछुआरों के गांव के अवशेष ही दीख रहे थे जिसमें पुराने ढब की दुकानें नजर आ रही थीं। इसमें अतीत की धुंधली सी सरसराहट छुपी हुई थी। शायद यह समुद्री सेवार की और टार की महक थी।

बालू घड़ी में भरी रेत की तरह हमारा खज़ाना चुक गया। मुश्किल समय एक बार फिर हमारे सामने मुंह बाये खड़ा था। मां ने दूसरा रोज़गार ढूंढने की कोशिश की लेकिन कामकाज कहीं था ही नहीं। किस्तों की अदायगी का वक्त हो चुका था। नतीजा यही हुआ कि मां की सिलाई मशीन उठवा ली गयी। पिता की तरफ से जो हर हफ्ते दस शिलिंग की राशि आती थी, वह भी पूरी तरह से बंद हो गयी। हताशा के ऐसे वक्त में मां ने दूसरा वकील करने की सोची। वकील ने जब देखा कि इसमें से मुश्किल से ही वह फीस भर निकाल पायेगा, तो उसने मां को सलाह दी कि उसे लैम्बेथ के दफ्तर के प्राधिकारियों की मदद लेनी चाहिये ताकि अपने और अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए पिता पर मदद के लिए दबाव डाला जा सके।

और कोई उपाय नहीं था। उसके सिर पर दो बच्चों को पालने का बोझ था। उसका खुद का स्वास्थ्य खराब था। इसलिए उसने तय किया कि हम तीनों लैम्बेथ के यतीम खाने (वर्कहाउस) में भरती हो जायें।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 2

हालांकि हम यतीम खाने यानी वर्कहाउस में जाने की ज़िल्लत के बारे में जानते थे लेकिन जब मां ने हमें वहां के बारे में बताया तो सिडनी और मैंने सोचा कि वहां रहने में कुछ तो रोमांच होगा ही और कम से कम इस दमघोंटू कमरे में रहने से तो छुटकारा मिलेगा। लेकिन उस तकलीफ से भरे दिन मैं इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता था कि क्या होने जा रहा है जब तक हम सचमुच यतीम खाने के गेट तक पहुंच नहीं गये। तब जा कर उसकी दुखदायी दुविधा का हमें पता चला। वहां जाते ही हमें अलग कर दिया गया। मां एक तरफ महिलाओं वाले वार्ड की तरफ ले जायी गयी और हम दोनों को बच्चों वाले वार्ड में भेज दिया गया।

मैं मुलाकात के पहले ही दिन की दिल को छू लेने वाली उदासी को भला कैसे भूल सकता हूं। यतीम खाने के कपड़ों में लिपटी मां को मुलाकातियों के कमरे की ओर जाते हुए देखना। वह कितनी बेचारी और परेशान हाल दिखायी दे रही थी। एक ही सप्ताह में उसकी उम्र ज्यादा नज़र आने लगी थी और वह दुबला गयी थी। लेकिन उसका चेहरा हमें देखते ही दमकने लगा था। सिडनी और मैं रोने लगे जिससे मां को भी रोना आ गया और उसके गालों पर बड़े-बड़े आंसू ढरकने लगे। आखिर उसने अपने आप को संभाला और हम तीनों एक खुरदरी बेंच पर जा बैठे। हम दोनों के हाथ उसकी गोद में थे और वह धीरे-धीरे उन्हें थपका रही थी। वह हमारे घुटे हुए सिर देख कर मुस्कुरायी और जैसे सांत्वना देते हुए थपकियां सी देने लगी। हमें बताने लगी कि हम जल्दी ही एक बार फिर एक साथ रहने लगेंगे। अपने लबादे में से उसने नारियल की एक कैंडी निकाली जो उसने एक नर्स के कफ को लेस लगा कर कमाये पैसों से खरीदी थी। जब हम अलग हुए तो सिडनी लगातार भरे मन से उससे कहता रहा कि उसकी उम्र कितनी ज्यादा लगने लगी है। • सिडनी और मैंने जल्दी ही अपने आपको यतीम खाने के माहौल के हिसाब से ढाल लिया लेकिन उदासी की काली छाया हमेशा हमारे ऊपर मंडराती रहती थी। मुझे बहुत ही कम घटनाएं याद हैं लेकिन दूसरे बच्चों के साथ एक लम्बी-सी मेज पर बैठ कर दोपहर का भोजन करना अच्छा लगता था और हम इसकी राह देखा करते थे। इसका मुखिया यतीम खाने का ही एक निवासी हुआ करता था। यह व्यक्ति पिचहत्तर बरस का एक बूढ़ा आदमी था। उसका चेहरा गम्भीरता ओढ़े रहता था। उसकी दाढ़ी सफेद थी और उसकी आंखों में उदासी भरी होती थी। उसने मुझे अपने पास बैठने के लिए चुना क्योंकि मैं ही वहां सबसे छोटा था और जब तक उन लोगों ने मेरे सिर की घुटाई नहीं कर दी, मेरे बहुत ही सुंदर घुंघराले बाल हुआ करते थे। बूढ़ा आदमी मुझे अपना "शेर" कहा करता था और बताता कि जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो मैं एक टॉप हैट लगाया करूंगा और उसकी गाड़ी में पीछे हाथ बांधे बैठा करूंगा। वह मुझे जिस तरह का स्नेह देता, मैं उसे बहुत पसंद करने लगा था। लेकिन अभी एकाध दिन ही बीता था कि वहां एक और छोटा-सा लड़का आया और उस बूढ़े के पास मेरी वाली जगह पर बैठने लगा। लेकिन जब मैंने पूछा तो उसने मौज में आ कर बताया कि हमेशा छोटे और घुंघराले बालों वाले लड़के को ही वरीयता दी जाती है।

तीन सप्ताह के बाद हमें लैम्बेथ यतीम खाने से यतीमों और असहायों के हॉनवैल स्कूल में भेज दिया गया। ये स्कूल लंदन से कोई बारह मील दूर था। घोड़ों द्वारा खींची जाने वाले बेकरी वैन में यह बहुत ही रोमांचकारी यात्रा थी और इन परिस्थितियों में सुखद भी क्योंकि हॉनवैल के आस-पास का नज़ारा उन दिनों बहुत ही खूबसूरत हुआ करता था। वहां शाहबलूत के दरख्त थे, पकते गेहूं से भरे खेत थे और फलों से खूब लदे फलोद्यान थे; और तब से खुले इलाकों में बरसात के बाद की खूब तेज़ और माटी की सोंधी-सोंधी खुशबू मुझे हमेशा हॉनवैल की याद दिला जाती है।

वहां पहुंचने पर हमें अनुमति वाले वार्ड के हवाले कर दिया गया और विधिवत स्कूल में डालने से पहले हमें डाक्टरी और मानसिक निगरानी में रखा गया। इसका कारण ये था कि तीन या चार सौ बच्चों में अगर एक भी ऐसा बच्चा आ गया जो सामान्य न हो या बीमार वगैरह हो तो ये स्कूल के स्वास्थ्य के लिए खराब होता ही, खुद बच्चे को भी विकट हालत से गुज़रना पड़ सकता था।

शुरू के कुछ दिनों तक तो मैं खोया-खोया सा रहा। मेरी हालत बहुत ही खराब थी। इसका कारण यह था कि यतीम खाने में तो मां को मैं हमेशा अपने आस-पास महसूस करता था और इससे मुझे बहुत सुकून मिलता था लेकिन हॉनवैल में आने के बाद यही लगता कि हम एक दूसरे से मीलों दूर हो गये हैं। सिडनी और मेरा दर्जा बढ़ा दिया गया और हमें अनुमति वाले वार्ड से निकाल कर विधिवत स्कूल में डाल दिया गया। यहां हमें एक दूसरे से अलग कर दिया गया। सिडनी बड़े बच्चों के साथ जाने लगा और मैं शिशुओं के साथ। हम अलग-अलग ब्लाकों में सोते थे और एक-दूसरे से कभी-कभार ही मिल पाते। मेरी उम्र छ: बरस से कुछ ही ज्यादा थी और मैं तनहा था। ये बात मुझे खासी परेशान करती। खास तौर पर गर्मियों की रात, सोते समय प्रार्थना करते समय जब मैं रात के सोने की कमीजें पहने वार्ड के बीचों-बीच दूसरे बीस नन्हें मुन्ने बच्चों के साथ घुटनों के बल झुक कर प्रार्थना करता और दूर डूबते सूर्य को और ऊंची नीची पहाड़ियों की तरफ लम्बोतरी खिड़की में से देखता और जब हम सब भर्राये गले से बेसुरी आवाज़ में गाते तो मैं अपने आपको इससे सब से अलग-थलग पाता।

साथ दो मेरा; रात तेजी से गहराती है

अंधियारी होता जाता है घना: प्रभु साथ दो मेरा

जब और मददगार रह जायें पीछे और आराम हो जाये दुश्वार

ओ निर्बल के बल, साथ दो मेरा

ये तभी होता कि मैं अपने-आपको पूरी तरह हताश पाता। हालांकि मैं प्रार्थना के बोल नहीं समझता था, लेकिन ये धुन और धुंधलका मुझे उदासी से भर जाते।

लेकिन तब हमारी खुशी और आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब दो महीने के भीतर ही मां ने हमारी रिहाई का बंदोबस्त कर दिया था और हमें एक बार फिर से लंदन और लैम्बेथ यतीम खाने में भेज दिया गया। मां यतीम खाने के गेट पर अपने खुद के कपड़े पहने हमारी राह देख रही थी। उसने रिहाई के लिए आवेदन सिर्फ इसीलिए दिया था कि वह एक दिन अपने बच्चों के साथ गुज़ारना चाहती थी और उसकी इच्छा थी कि दो-चार घंटे बाहर गुज़ार कर फिर उसी दिन वापिस लौट आये। मां चूंकि यतीम खाने में ही रह रही थी इसलिए यह प्रपंच ही एक मात्र तरीका बचा था उसके पास कि दिन हमारे साथ गुज़ार सके।

हमारे भीतर जाने से पहले ही हमारे निजी कपड़े हमसे ले लिये गये थे और उन्हें गर्म पानी में खंगाल दिया गया था। अब ये कपड़े हमें बिना इस्त्रीत किये लौटा दिये गये। जब हम यतीम खाने के गेट से बाहर निकले तो मां, सिडनी और मैं, तीनों ही मुचड़े हुए कपड़ों में नमूने नज़र आ रहे थे। एकदम सुबह का वक्त था और हमें कहीं भी नहीं जाना था इसलिए हम केनिंगटन पार्क की तरफ चल दिये। पार्क तकरीबन एक मील दूर था। सिडनी के पास नौ पेंस थे जो उसने रुमाल में गांठ बांध कर रखे हुए थे। इसलिए हमने आधा पौंड ब्लैक चेरी ली और पूरी सुबह पार्क में एक बेंच पर बैठ कर चेरी खाते हुए गुज़ार दी। सिडनी ने अखबार के पुराने कागजों को मोड़-तोड़ कर उसे सुतली से कस कर बांध दिया और हम तीनों काफी देर तक इस काम चलाऊ गेंद से पकड़ा-पकड़ी खेलते रहे। दोपहर के वक्त हम एक कॉफी शॉप में गये और अपने बाकी सारे पैसों से दो पेनी का केक, एक पैनी की सूखी, नमक लगी मछली और अध पेनी की दो कप चाय खरीद कर खर्च कर डाले। हमने ये चीज़ें मिल बांट कर खायीं। इसके बाद हम फिर पार्क में वापिस लौट आये। इसके बाद मैं और सिडनी फिर से खेलते रहे और मां क्रोशिया ले कर बैठ गयी।

दोपहर के वक्त हम वापिस यतीम खाने की तरफ चल दिये क्योंकि मां बहुत ही बेशरमी से बोली कि हम चाय के वक्त तक ज़रूर पहुंच जायेंगे। वहां के अफसर लोग बहुत ही खड़ूस थे क्योंकि इसका मतलब होता कि हमें फिर से उन सारी प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता। हमारे कपडेख गर्म पानी में खंगाले जाते और सिडनी और मुझे हॉनवैल लौटने से पहले यतीम खाने में और वक्त गुज़ारना पड़ता। हां, इससे हमें मां से एक बार फिर मिलने का मौका मिल जाता।

लेकिन इस बार हम हॉनवैल में लगभग एक बरस तक रहे। यह बरस बहुत ही रचनात्मक था। मैंने स्कूल जाना शुरू किया और मुझे अपना नाम लिखना सिखाया गया," चैप्लिन।" ये शब्द मुझे बहुत आकर्षित करते और मुझे लगता - ये ठीक मेरी ही तरह हैं।

हॉनवैल स्कूल दो हिस्सों में बंटा हुआ था। एक हिस्सा लड़कों के लिए था और दूसरा लड़कियों के लिए। शनिवार की दोपहर स्नानघर नन्हें मुन्नों के लिए आरक्षित रहता और बड़ी लड़कियां उन्हें नहलाती। हां, ये बातें उस वक्त से पहले की हैं जब मैं सात बरस का नहीं हुआ था। और एक तरह की नाज़ुक मिज़ाजी वाली लज्जा इस तरह के अवसरों के साथ जुड़ी रहती। चौदह बरस की युवा लड़की मेरे पूरे शरीर पर तौलिया रगड़ रही हो तो झेंप तो होनी ही थी। सचेत झेंप के ये मेरे पहले मौके थे।

सात बरस की उम्र में मुझे नन्हें मुन्ने बच्चों के वार्ड में से स्थानांतरित करके बड़े बच्चों के वार्ड में भेज दिया गया। यहां बच्चों की उम्र सात से चौदह बरस के बीच थी। अब मैं बड़े बच्चों की सभी गतिविधियों में भाग ले सकता था। ड्रिल, एक्सरसाइज और हफ्ते में दो बार स्कूल के बाहर हम नियमित रूप से सैर को जाते।

हालांकि हॉर्नवेल में हमारी अच्छी तरह से देखभाल की जाती थी लेकिन फिर भी माहौल पर मुर्दनगी छायी रहती। वहां की हवा में ही उदासी थी। उन गांवों की गलियों में से हम सैकड़ों बच्चे एक के पीछे एक चलते। मैं सैर के उन अवसरों को कितना अधिक नापसंद करता था, और उन गांवों को, जिन में से हम गुज़र कर जाया करते थे, उन स्थानीय लोगों का हमें घूर-घूर कर देखना। हमें 'बूबी हैच के बाशिंदे' के नाम से पुकारा जाता था। ये यतीम खाने के लिए बोलचाल का शब्द था।

बच्चों के खेल का मैदान लगभग एक एकड़ लम्बा-चौड़ा था। इसमें लम्बे-चौड़े पत्थर जड़े हुए थे। इसके चारों तरफ एक मंजिला ईंट की इमारतें थीं जिनमें दफ्तर, भंडार घर, डॉक्टर का एक औषधालय, दांतों के डॉक्टर का कमरा और बच्चों के कपड़ों के लिए अल्मारियां थीं। अहाते के आखिरी सिरे पर एक अंधेरा कमरा था। उसमें इन दिनों चौदह बरस के एक छोकरे को बंद करके रखा गया था। लड़कों के अनुसार वह लड़का आफत की पुड़िया था। एक गया गुज़रा चरित्र। उसने दूसरी मंज़िल की खिड़की से कूद कर स्कूल से भाग जाने की कोशिश की थी और वहां से छत पर चढ़ गया था। जब स्टाफ के लोग उसके पीछे चढ़े तो उसने उन पर चीज़ें फेंक कर मारनी शुरू कर दीं और उन पर शाहबलूत फेंके। ये किस्सा तब हुआ जब हम नन्हें-मुन्ने सो रहे थे। अगली सुबह हमें इस किस्से का पूरा का पूरा हिसाब-किताब बड़े बच्चों ने सुनाया था।

इस तरह की बड़ी हरकतों के लिए हर शुक्रवार को बड़े वाले जिमनाशियम में दंड मिला करता था। ये एक साठ फुट लम्बा और चालीस फुट चौड़ा अंधियारा-सा हॉल था। इसकी छत ऊंची थी और ऊपर की कड़ियों तक रस्सियां लटकी हुई थीं। शुक्रवार की सुबह, सात से चौदह बरस के बीच की उम्र के दो या तीन सौ बच्चे प्रवेश करते और वे मिलिटरी के जवानों की तरह आते, और स्क्वायर के तीनों तरफ खड़े हो जाते। सबसे दूर वाले सिरे पर, यानी चौथी तरफ एक लम्बी-सी स्कूली मेज के पीछे शरारती बच्चे अपने-अपने अपराध की सज़ा सुनने और सज़ा पाने के लिए एकत्र होते। ये मेज आर्मी वालों की खाने की मेज जितनी लम्बी थी। डेस्क के सामने तथा दायीं तरफ एक ईज़ल थी जिस पर हाथों में बांधने वाले स्ट्रैप लटकते रहते और फ्रेम से एक टहनी झूलती रहती।

छोटे-मोटे अपराधों के लिए बच्चे को लम्बी मेज पर लिटा दिया जाता। बच्चे का चेहरा नीचे की तरफ होता और उसके पैर एक सार्जेंट पट्टों से कस देता। तब दूसरा सार्जेंट आता और बच्चे की कमीज को उसकी पतलून में से खींच कर बाहर निकाल देता और उसके सिर के ऊपर की तरफ कर देता, और उसकी पतलून को कस कर खींचता।

एक थे कैप्टन हिन्ड्रम। नेवी से रिटायर हुए शख्स। वजन उनका रहा होगा कोई दो सौ पौंड। उनका एक हाथ पीछे रहता और दूसरे हाथ में वे मारने के लिए छड़ी थामे रहते। छड़ी की मोटाई होती हाथ के अंगूठे के बराबर और लम्बाई कोई चार फुट। वे तन कर खड़े हो जाते।

वे छड़ी को लड़के के चूतड़ों के आर-पार नापते, और तब हौले से और पूरी नाटकीयता के साथ वे छड़ी ऊपर उठाते और एक सड़ाक के साथ लड़के के चूतड़ों पर पड़ती। नज़ारा दिल दहला देने वाला होता और निश्चित रूप से लड़का बेहोश हो कर नीचे गिर जाता।

पिटाई के लिए कम से कम तीन छड़ियों का और अधिकतम छ: का प्रावधान था। यदि दोषी को तीन से ज्यादा छड़ियों की मार पड़ती तो उसकी चीखें दिल दहला देने वाली होतीं। कई बार ऐसा भी होता कि वह आश्चर्यजनक रूप से शांत रहता या बेहोश ही हो चुका होता। ये मार आदमी को अधमरा कर देने वाली होती इसलिए शिकार को तो अक्सर ही एक तरफ ले जाना पड़ता और उसे जिमनाशियम में ले जा कर लिटाना पड़ता, जहां उसे दर्द कम होने तक कम से कम दस मिनट तक तिलमिलाना और दर्द के मारे ऐंठना पड़ता था। दर्द कम होने पर उसके चूतड़ों पर धोबन की उंगलियों की तरह तीन चौड़ी धारियां बन चुकी होतीं।

भूर्ज का मामला अलग था। तीन संटियां खाने के बाद लड़के को दो सार्जेंट सहारा कर इलाज के लिए सर्जरी में ले जाते।

लड़के यही सलाह देते कि कोई भी आरोप लगने पर मना मत करो, बेशक आप निरपराध हों, क्योंकि दोष सिद्ध हो जाने पर आपको अधिकतम मार पड़ेगी। आम तौर पर लड़के निर्दोष होने पर भी अपनी ज़ुबान नहीं खोलते थे और चुपचाप मार खा लेते थे।

अब मैं सात बरस का हो चला था और बड़े बच्चों के सैक्शन में था। मुझे याद है जब मैंने पहली बार इस तरह की पिटाई देखी थी। मैं शांत खड़ा हुआ था और मेरा दिल तेजी से धड़कना शुरू हो गया जब मैंने अधिकारियों को भीतर आते देखा। डेस्क के पीछे वह जांबाज़ बहादुर था जिसने स्कूल से भाग जाने की कोशिश की थी। डेस्क के पीछे से हमें मुश्किल से उसका सिर और कंधे ही नज़र आ रहे थे। वह एकदम पिद्दी-सा नज़र आ रहा था। उसका चेहरा पतला, लम्बोतरा और आंखें बड़ी थीं। वह बहुत छोटा-सा लगता था।

प्रधान अध्यापक ने धीमे स्वर में आरोप पत्र पढ़ा और पूछा,"दोषी या निर्दोष?"

हमारे जांबाज़ हीरो ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन सीधे उनकी आंखों में देखता रहा। इसके बाद उसे ईज़ल पर ले जाया गया और चूंकि वह ज़रा सा ही था, उसे साबुन की एक पेटी पर खड़ा कर दिया गया ताकि उसकी कलाइयों में पट्टे बांधे जा सकें। उसे भूर्ज की छड़ी से तीन बार पीटा गया और फिर उसे सर्जरी के लिए ले जाया गया।

गुरुवार के दिन खेल के मैदान में एक बिगुल बजता और हम खेलते हुए जहां के तहां मूर्तियों की तरह जड़ खड़े हो जाते। तब कैप्टन हिन्ड्रम एक मेगाफोन के ज़रिये उन छोकरों के नाम पुकारते जिन्हें शुक्रवार को दंड भोगने के लिए हाजिर होना है।

मेरी हैरानी का ठिकाना न रहा जब एक गुरुवार मेरा नाम पुकारा गया। मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था कि मैंने ऐसा क्या कर डाला होगा। फिर भी किसी नामालूम कारण से मैं रोमांचित था। शायद इसलिए कि मैं इस नाटक के केन्द्र में होने जा रहा था। ट्रायल के दिन मैं आगे की तरफ बढ़ गया। हैड मास्टर ने पूछा,"तुम पर आरोप है कि तुमने लैट्रिन को आग लगायी।"

यह सच नहीं था। कुछ छोकरों ने पत्थर के फर्श पर कुछ कागज जला डाले थे और संयोग से मैं उस वक्त लैट्रिन का इस्तेमाल करने के लिए वहां जा पहुंचा। लेकिन आग जलाने में मेरी कोई भूमिका नहीं थी।

"तुम दोषी हो या नहीं?"

मैं नर्वस हो गया था और अपने नियंत्रण से बाहर की ताकत में मैं चिल्लाया,"दोषी।" न तो मैंने प्रायश्चित महसूस किया और न ही अन्याय की भावना ही महसूस की लेकिन एक तरह का भयमुक्त रोमांच मुझे लगा जब मुझे डेस्क के पास ले जाया गया और मेरे चूतड़ों पर तीन संटियां फटकारी गयीं। दर्द इतना जान लेवा था कि मेरी तो सांस ही थम गयी। लेकिन मैं चिल्लाया या रोया नहीं और हालांकि मैं दर्द के मारे अधमरा हो गया था और आराम करने के लिए चटाई पर ले जाया गया था, मैं अपने आपको पराक्रम के साथ विजेता समझ रहा था।

सिडनी तो रसोई में काम कर रहा था, उस बेचारे को सज़ा के दिन तक इसके बारे में कुछ पता ही नहीं चला। और उसे दूसरों के साथ जिम में लाया गया तो वह मुझे सज़ा वाली मेज पर औंधे लेटे और सिर लटकाये देख कर हैरानी से दंग रह गया था। उसे झटका लगा था। उसने बाद में मुझे बताया था कि जब उसने मुझे चूतड़ों पर तीन बेंत खाते देखा था तो वह गुस्से के मारे रो पड़ा था।

छोटा भाई अपने बड़े भाई को "भैया" कहकर बुलाता था तो उसमें एक तरह की गर्व की भावना भर जाती थी और एक सुरक्षा का भी अहसास होता था। मैं अक्सर डाइनिंग रूम से बाहर आते समय अपने इस "बड़े भैया" को देखा करता था। वह रसोई में काम करता था इसलिए अक्सर मेरे हाथ में ढेर सारे मक्खन के साथ एक बेड स्लाइस चुपके से सरका देता था। मैं इसे अपनी जर्सी में छुपाकर बाहर ले आता और एक अन्य छोकरे के साथ मिल-बांट कर खा लेता। ऐसा नहीं था कि हमें भूख लगी होती थी, दरअसल मक्खन का इतना बड़ा लोंदा एक असाधारण विलासिता की बात होती थी। लेकिन यह ऐय्याशी भी बहुत ज्यादा दिन तक नहीं चली क्योंकि उसे हॉनवेल छोड़कर एक्समाउथ ट्रेनिंग शिप पर जाना पड़ा।

यतीम खाने में रहने वाले लड़कों को ग्यारह बरस की उमर में विकल्प दिया जाता था कि वे जलसेना या थलसेना, दोनों में से कोई एक चुन लें। यदि वह जल सेना पसन्द करे तो उसे एक्समाउथ पर भेज दिया जाता था, हालांकि यह अनिवार्य नहीं था लेकिन सिडनी तो सागर की विराटता में रह कर अपना जीवन बनाना चाहता था। और एक दिन वह मुझे हॉनवेल में अकेला छोड़कर चला गया।

बच्चों का अपने बालों से खास तरह का जुड़ाव होता है। जब उनके बाल पहली बार काटे जाते हैं तो वे बुरी तरह से रोते और छटपटाते हैं। चाहे बाल घने उगें, सीधे हों या घुंघराले हों, उन्हें ऐसा ही लगता है कि मानो उनसे उनके व्यक्तित्व का कोई हिस्सा अलग किया जा रहा हो।

हॉनवेल में दाद, रिंगवार्म की महामारी फैली हुई थी। यह बीमारी छूत की बीमारी है और बहुत ही तेजी से फैलती है। इसलिए जो भी बच्चा इसकी चपेट में आता था उसे पहली मंजिल पर एक अलग कमरे में रहना पड़ता था, जहां से खेल का मैदान नज़र आता था। अक्सर हम खिड़कियों में से देखते कि वे दीन-हीन बच्चे बड़ी हसरत भरी निगाहों से हमारी ओर टकटकी लगाए देखते रहते थे। उनके घुटे हुए सिरों पर आयोडिन के भूरे चकत्ते नजर आते। उन्हें देखना बहुत ही दिल दहला देने वाला होता और हम उनकी तरफ बहुत ही घृणापूर्वक देखते।

इसलिए जैसे ही एक दिन अचानक ही एक नर्स ने डाइनिंग हाल में मेरे सिर पर हाथ रखा और बालों में उंगलियां फिराने के बाद घोषणा की कि मेरे सिर में दाद हो गयी है तो मैं सकते में आ गया और बुक्का फाड़ कर रो पड़ा।

इलाज में हफ्तों लग गये। लगता था, समय ठहर गया है। मेरा सिर मूंड दिया गया था और मैं रुई धुनने वालों की तरह हर समय सिर पर एक रुमाल बांधे रहता था। बस, मैं एक ही काम नहीं करता था और वो ये कि कभी भी खिड़की से नीचे झांक कर नीचे खड़े लड़कों की तरफ नहीं देखता था, क्योंकि मैं जानता था कि वे लड़के ऊपर फंसे बच्चों को किस हिकारत भरी निगाह से देखते थे।

मेरी बीमारी के दौरान मां मुझसे मिलने आयी। उसने कुछ जुगत भिड़ा कर हमें यतीम खाने से बाहर निकालने का रास्ता निकाल लिया था और अब हम लोगों के लिए एक बार फिर अपना घर बसाना चाहती थी। उसकी मौजूदगी फूलों के गुलदस्ते की तरह थी। ताज़गी और स्नेह की महक से भरी हुई। उसे इस तरह देख कर मुझे अपनी गंदी और बेतरतीब हालत पर और घुटे सिर पर आयोडिन लगा देख कर अपने आप पर शर्म आयी।

नर्स ने मां से कहा,"इसके गंदे मुंह की वजह से इस पर नाराज़ न हों।"

मां हँसी और मुझे याद है कि किस तरह से ये कहते हुए उसने मुझे अपने सीने में भींच लिया था और चूम लिया था,"तेरी इस सारी गंदगी के बावजूद मैं तुझे प्यार करती हूं मेरे लाल।"

इसके तुरंत बाद ही सिडनी एक्समाउथ पर चला गया और मैंने हानवेल छोड़ दिया ताकि मैं अपनी मां के पास रह सकूं। उसने केनिंगटन रोड के पीछे वाली गली में एक कमरा किराये पर ले लिया था और कुछ दिन तक तो वह हमारा भरण-पोषण करने की हालत में रही। थोड़े ही दिन बीते थे कि हम एक बार फिर यतीम खाने के दरवाजे पर खड़े थे। हमारे इस तरह से वहां वापिस जाने के पीछे कारण ये थे कि मां कोई ढंग का रोजगार तलाश नहीं पायी थी और थियेटर में पिता जी के दिन खराब चल रहे थे। इस थोड़े से अरसे के दौरान हम पिछवाड़े की गलियों के एक कमरे से दूसरे कमरे में शिफ्ट होते रहे। ये गोटियों के खेल की तरह था और अपनी आखिरी चाल के बाद हमने खुद को फिर से यतीम खाने में पाया।

अलग ही अलग रहते हुए हमें दूसरे यतीम खाने में भेज दिया गया। और वहां से हमें नोरवुड स्कूल भेज दिया गया। यह स्कूल हॉनवेल के मुकाबले बेहतर था। यहां की पत्तियां गहरी हरी और दरख्त ज्यादा ऊंचे थे। शायद इस ग्रामीण इलाके में भव्यता तो ज्यादा थी लेकिन परिवेश मायूसी से भरा हुआ था।

एक दिन की बात, सिडनी फुटबाल खेल रहा था। तभी दो नर्सों ने उसे खेल से बाहर बुलाया और उसे बताया कि तुम्हारी मां पागल हो गई है, उसे केनहिल के पागलखाने में भेजा गया है। सिडनी ने जब यह खबर सुनी तो किसी भी किस्म की प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की और वापिस जाकर अपने खेल में मशगूल हो गया। लेकिन खेल खत्म होते ही वह एक सुनसान कोने में गया और फूट-फूट कर रोया।

सिडनी ने जब मुझे यह खबर दी तो मैं यक़ीन ही नहीं कर पाया। मैं रोया तो नहीं लेकिन पागल कर देने वाली उदासी ने मुझे घेर लिया। उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। माँ जो इतनी खुशमिजाज़ और दिल की साफ़ थी, भला पागल कैसे हो सकती है। मोटे तौर पर मैंने यही सोचा कि माँ ने जान-बूझ कर अपने दिमाग के दरवाज़े बंद कर दिये होंगे और हमें बेसहारा छोड़ दिया है। मैं हताशा में यह कल्पना करने लगा कि वह परेशान हाल मेरी तरफ़ देख रही है और उसके बाद शून्य में घूर रही है।

आधिकारिक रूप से यह खबर हमें एक हफ्ते बाद मिली। यह भी सुनने में आया कि अदालत ने पिता के ख़िलाफ डिक्री जारी कर दी है कि उन्हें सिडनी और मुझे अपनी निगहबानी में लेना ही होगा। पिता के साथ रहने की संभावना ही उत्तेजना से भर देने वाली थी। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में उन्हें सिर्फ़ दो बार ही देखा था। एक बार मंच पर और दूसरी बार केनिंगटन रोड में एक घर के आगे से गुज़रते हुए जब वे फ्रंट गार्डन के रास्ते से एक महिला के साथ चले आ रहे थे। मैं एक पल के लिए ठिठका था और उनकी तरफ़ देखने लगा था। मुझे पूरा यक़ीन था कि वे मेरे पिता ही हैं। उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ रखकर मुझसे मेरा नाम पूछा था। इस परिस्थिति की नाटकीयता का अंदाज़ा लगाते हुए मैंने भोलेपन से सिहरते हुए कहा था,"चार्ली चैप्लिन।" तब उन्होंने जानबूझ कर उस महिला की तरफ देखा, अपनी जेब में हाथ डालकर कुछ टटोला और आधे क्राउन का सिक्का मुझे थमा दिया। बगैर कुछ और सोचे मैं सीधा घर की तरफ लपका और माँ को बताया कि मैं अपने पिता से मिलकर आ रहा हूं।

और अब हम उनके साथ जाकर रहने वाले थे। कुछ भी हो, केनिंगटन रोड जानी-पहचानी जगह थी और वहां नॉरवुड की तरह अजनबियत और मायूसी नहीं थी।

अधिकारी हमें एक बेकरी वैन में बिठा कर 287 केनिंगटन रोड ले गये। यह वही जगह थी जहां मैंने अपने पिता को बगीचे के रास्ते से गुज़रते हुए देखा था। दरवाजा एक महिला ने खोला। यह वही महिला थी जो उस दिन पिता के साथ थी। वह ऐय्याश और चिड़चिड़ी-सी लगने वाली औरत लगती थी। इसके बावजूद वह आकर्षक, लम्बी और सुंदर देहयष्टि की मालकिन थी। उसके होंठ भरे-भरे और उदास थे। आंखें कबूतरी जैसी थीं। उसकी उम्र तीस बरस के आस-पास हो सकती थी। उसका नाम लुइस था। ऐसा प्रतीत हुआ कि मिस्टर चैप्लिन घर पर नहीं थे। लेकिन सामान्य कागज़ी कार्रवाई पूरी करने और हस्ताक्षर वगैरह करने के बाद अधिकारी हमें लुइस के जिम्मे छोड़ गये। लुइस हमें ऊपर वाली मंज़िल पर आगे वाली बैठक में ले गयी। जब हम कमरे के भीतर पहुंचे तो एक छोटा-सा बच्चा फर्श पर खेल रहा था। बड़ी-बड़ी, गहरी आंखों और घने भूरे बालों वाला एक निहायत ही खूबसूरत बच्चा। ये बच्चा लुइस का बेटा था। मेरा सौतेला भाई।

परिवार दो कमरों में रहता था और हालांकि सामने वाला कमरा बहुत ब़ड़ा था लेकिन उसमें रौशनी ऐसे छन कर आती थी मानो पानी के नीचे से आ रही हो। सारी चीजें लुइस की ही तरह मायूस नज़र आती थीं। वाल पेपर उदास नज़र आता था। घोड़े के बालों से भरा फर्नीचर उदासी भरा था और ग्लास केस में पाइक मछली जो अपने ही बराबर एक और पाइक अपने भीतर ठूंसे हुए थी, और उसका सिर पहले वाली के मुंह से बाहर लटक रहा था, बुरी तरह से उदास नज़र आते थे।

लुइस ने पिछवाड़े वाले कमरे में सिडनी और मेरे सोने के लिए एक अतिरिक्त बिस्तर लगवा दिया था लेकिन ये बिस्तर बहुत ही छोटा था। सिडनी ने सुझाव दिया कि वह बैठक में सोफे पर सो जाया करेगा लेकिन लुइस ने उसे बरज दिया,"तुम्हें जहां सोने के लिए कहा गया है, तुम वहीं सोवोगे।" इस संवाद से विकट मौन पसर गया और हम चुपचाप पिछवाड़े वाले कमरे की तरफ बढ़ गये।

हमारा जिस तरीके से स्वागत हुआ था, उसमें लेशमात्र भी उत्साह नहीं था। और इसमें हैरानी वाली कोई बात भी नहीं थी। सिडनी और मैं अचानक उसके ऊपर लाद दिये गये थे। वैसे भी हम अपने पिता की छोड़ी गयी पत्नी के ही तो बच्चे थे।

हम दोनों चुपचाप बैठे उसे काम करते देखते रहे। वह खाने की मेज पर कुछ तैयारियां कर रही थी। तब उसने सिडनी से कहा,"ऐय, क्या निठल्ले की तरह से बैठे हो, कुछ काम-धाम करो और इस सिगड़ी में कोयले भरो।" और तब वह मेरी तरफ मुड़ी और कहने लगी,"और तुम लपक कर जाओ और व्हाइट हार्ट की बगल वाली कसाई की दुकान से एक शिलिंग के छीछड़े लेकर आओ।"

मैं उसकी मौजूदगी और पूरे माहौल के आतंक से बाहर निकलने पर खुश ही था क्योंकि एक अदृश्य भय मेरे भीतर उगने लगा था और मैं चाहने लगा था कि हम वापिस नौरवुड लौट जायें।

पिताजी देर से घर वापिस आये और उन्होंने गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। वे मुझे बहुत अच्छे लगे। खाना खाते समय मैं उनकी एक एक गतिविधि को ध्यान से देखता रहा। वे किस तरह से खाते थे और किस तरह से चाकू को पैन की तरह पकड़ते थे और उससे गोश्त की बोटियां काटते थे। और मैं बरसों-बरस उनकी नकल करता रहा।

जब लुइस ने पिताजी को बताया कि सिडनी यह शिकायत कर रहा था कि उसका बिस्तर छोटा है तो उन्होंने कहा कि वह बैठक में सोफे पर सो जाया करेगा। सिडनी की जीत ने लुइस को और भी भड़का दिया और उसने सिडनी को इस बात के लिए कभी माफ नहीं किया। वह हमेशा पिताजी के कान सिडनी के खिलाफ भरती रहती। लुइस हालांकि अक्खड़ और चिड़चिड़ी थी और हमेशा असहमत ही रहती थी लेकिन उसने मुझे एक बार भी पीटा नहीं या कभी डांटा फटकारा भी नहीं। लेकिन इस बात ने कि वह सिडनी को नापसंद करती है, मुझे हमेशा डराये रखा और मैं उससे भय खाता रहा। वह जम के पीती थी और उसकी यह बात मुझे भीतर तक हिला कर रख देती थी। वह अपने छोटे बच्चे के मासूम चेहरे को निहारती हुई हंसती थी और वह अपनी खराब ज़बान में उसे कुछ कहता रहता था। पता नहीं क्यों, मैं उस बच्चे के साथ हिल-मिल नहीं सका। वैसे तो वह मेरा सौतेला भाई था लेकिन मैंने उससे शायद ही कभी बात की हो, बेशक मैं उससे चार बरस बड़ा भी था। जब कभी भी लुइस पी कर बैठती और क़ुड़-कुड़ करती रहती तो मैं भीतर तक हिल जाता था। दूसरी तरफ सिडनी था, उसने इन बातों पर कभी भी ध्यान ही नहीं दिया। शायद ही कोई ऐसा समय रहा हो जब वह रात में देर से न आया हो। मुझ पर यह बंदिश थी कि मैं स्कूल से सीधा ही घर आऊं और घर आते ही मुझे तरह तरह के कामों के लिए दौड़ाया जाता।

लुइस ने हमें कैनिंगटन रोड के स्कूल में भेजा। यह मेरे लिए बाहरी दुनिया का एक छोटा-सा टुकड़ा था क्योंकि मैं दूसरे बच्चों की मौजूदगी में खुद को कम तन्हा महसूस करता था। शनिवार के दिन आधी छुट्टी रहती थी, लेकिन मैं कभी भी इस दिन का इंतज़ार नहीं करता था क्योंकि मेरे लिए इसका मतलब था कि जल्दी घर जाना, झाड़ू पोंछा करना, चाकू साफ करना, और तो और, लुइस उस दिन हर हाल में पीना शुरू कर देती थी। जब मैं चाकू साफ कर रहा होता था तो वह अपनी एक सखी के साथ बैठ जाती, पीती रहती और ज़ोर-ज़ोर से अपनी सखी से कड़ुआहट भरे स्वर में शिकायतें करती रहती कि उसे सिडनी और मेरी देखभाल करनी पड़ती है और किस तरह से उसके साथ यह अन्याय किया जा रहा है। मुझे याद है कि उसने मेरी तरफ इशारा करते हुए अपनी सखी से कहा था कि ये तो फिर भी ठीक है लेकिन दूसरा वाला तो आफत की पुड़िया है और उसे तो ज़रूर ही सुधार घर में भेज देना चाहिए। इतना ही नहीं, वो तो चार्ली की औलाद भी नहीं है। सिडनी के बारे में यह बदज़ुबानी मुझे भयभीत कर देती थी। मैं हताशा से भर जाता और मायूस-सा अपने बिस्तर पर जा कर ढह जाता और आंखें खोले निढाल-सा पड़ा रहता था। उस वक्त मैं आठ बरस का भी नहीं हुआ था लेकिन वे दिन मेरी ज़िन्दगी के सबसे लम्बे और उदासी भरे दिन थे।

कई बार शनिवार की रात को जब मैं खुद को बुरी तरह से हताश महसूस करता तो पिछवाड़े के बेडरूम के पास से गुज़रते हुए किसी दो धौंकनियों वाले बाजे, कन्सर्टिना का संगीत सुना करता। कोई जाते-जाते हाइलैंड मार्च की धुन बजा रहा होता और उसके साथ लुच्चे लड़कों और खिड़ खिड़ करती फेरी करके सामान बेचने वाली लड़कियों की आवाजें सुनाई देतीं। संगीत का प्रवाह और प्रभाव भी मेरी बेरहम उदासी पर कोई खास असर नहीं कर पाता था। इसके बावजूद संगीत दूर जाता हुआ धीमा होता चला जाता और मैं उसके चले जाने पर अफसोस मनाता। कई बार कोई फेरी वाला गली से गुज़रता। एक खास फेरी वाले की मुझे याद है जो रात को रूल ब्रिटानिया की धुन पर आवाज़ निकालता था और उसे झटके के साथ खत्म कर देता। दरअसल वह घोंघे बेच रहा होता था। तीन दरवाजे छोड़कर एक पब था, जिसके बंद होते समय मैं ग्राहकों की आवाज़ें सुन सकता था। वे नशे में धुत गाते, भावुकता भरा एक उदास गीत जो उन दिनों खासा लोकप्रिय हुआ करता था।

पुराने वक्त की खातिर मत रहने दो नफरत को जिंदा

पुराने वक्त की खातिर कहो भुला दोगे और कर दोगे माफ

जिंदगी इतनी छोटी कि मत गंवाओ लड़ने में

दिल इतने कीमती कि मत तोड़ो इन्हें

मिलाओ हाथ और खाओ दोस्ती की कसमें

पुराने वक्त की खातिर

मैं भावनाओं को कभी पसंद नहीं कर पाया था लेकिन मुझे ये गीत मेरी उदास हालत में एक बहुत ही नजदीकी साथी की तरह प्रतीत होता था और मुझे लोरी की तरह से सुला दिया करता था।

जब सिडनी रात में देर से लौटता, और ऐसा अक्सर होता था कि वह बिस्तर में सोने के लिए जाने से पहले खाने की अलमारी पर हल्ला बोलता था। इससे लुइस बहुत ताव खाती थी। एक रात जब वह पी रही थी तो वह कमरे में आयी और सिडनी की चादर खींच कर चिल्लाई और उससे बोली कि दफा हो जाओ यहां से। लेकिन सिडनी इसके लिए तैयार था, तुरंत उसने अपने तकिये के नीचे हाथ डाला और एक छोटा सा खंजर निकाला। इसमें एक लम्बा बटन हुक था और उस पर उसने तेज धार दे रखी थी।

"आओ तो जरा मेरे पास और मैं ये तुम्हारे पेट में घुसेड़ दूंगा," सिडनी चिल्ला पड़ा था। लुइस हक्की-बक्की सी पीछे हटी थी,"ऐ क्यों रे, ये हरामी का पिल्ला तो मुझे मार डालेगा।"

"हां, मैं तुम्हें मारूंगा," सिडनी ने बड़े ही नाटकीय अंदाज में कहा।

"ज़रा घर आने तो दे मिस्टर चैप्लिन को।"

लेकिन मिस्टर चैप्लिन कभी-कभार ही घर आते थे। अलबत्ता, मुझे शनिवार की एक शाम की याद है। लुइस और पिताजी बैठे पी रहे थे। और पता नहीं किस वज़ह से हम मकान मालकिन और उसके पति के साथ पहली मंज़िल पर उनके सामने वाले कमरे के आगे की जगह पर बैठे हुए थे। चमकीली रौशनी में मेरे पिता का चेहरा बहुत ही ज्यादा पीला लग रहा था। और वे बहुत ही खराब मूड में अपने आपसे कुछ बड़बड़ा रहे थे। अचानक उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला और ढेर सारे पैसे निकाले और गुस्से में चारों तरफ उछाल दिये। सोने और चांदी के सिक्के। इसका असर अतियथार्थवादी था। कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला। मकान मालकिन अपनी जगह से चिपकी रह गयी। लेकिन मैंने देखा कि उसकी निगाह सोने के एक सिक्के का पीछा कर रही थी जो लुढ़कता हुआ दूर एक कुर्सी के नीचे जा पहुंचा था। मेरी निगाहें भी उसी सिक्के का पीछा कर रही थी। अभी भी कोई भी नहीं हिला था। मैंने सोचा, मैं ही सिक्के उठाने का श्रीगणेश करूं। मेरे पीछे मकान मालकिन और दूसरे लोग भी उठे। और सावधानी पूर्वक बिखरे सिक्के बीनने लगे, इस तरह से कि पिता की धमकाती आंखों के आगे अपनी हरकत को वाजिब ठहरा सकें।

एक शनिवार की बात है, मैं स्कूल से लौटा तो देखा, घर पर कोई भी नहीं है। सिडनी हमेशा की तरह सारे दिन के लिए फुटबाल खेलने गया हुआ था। मकान मालकिन ने बताया कि लुइस अपने बेटे के साथ सुबह से ही बाहर गयी हुई है। पहले तो मैने राहत महसूस की क्योंकि लुइस के न होने का मतलब था कि मुझे पोंछा नहीं लगाना पड़ेगा, चाकू-छुरियां साफ नहीं करनी प़ड़ेंगी। मैं खाने के समय के बाद भी बहुत देर तक उनका इंतज़ार करता रहा, तब मुझे चिंता घेरने लगी। शायद वे लोग मुझे अकेला छोड़ गए थे। जैसेड़जैसे दोपहर ढलती गई, मुझे उनकी याद सताने लगी। ये क्या हो गया था? कमरा मनहूस और पराया-सा लग रहा था और उसका खालीपन मुझे डरा रहा था। मुझे भूख भी लग आयी थी। इसलिए मैंने अलमारी में खाने को कुछ तलाशा लेकिन वहां कुछ भी नहीं था। मैं अब खाली घर के भीतर और देर तक खड़ा नहीं रह सकता था इसलिए मैं हताशा में बाहर आ गया और पूरी दोपहर मैंने बाजारों में आवारागर्दी करते हुए गुज़ार दी। मैं लैम्बेथ वॉक पर और दूसरी सड़कों पर भूखा-प्यासा केक की दुकानों की खिड़कियां में झांकता चलता रहा और गाय और सूअर के मांस के गरमा-गरम स्वादिष्ट लजीज पकवानों को और शोरबे में डूबे गुलाबी लाल आलुओं को देख-देख कर मेरे मुंह में पानी आता रहा। मैं घंटों तक सड़क के किनारे मजमेबाजों को तरह-तरह की चीज़ें बेचते देखता रहा। इस तरह के भटकाव से मुझे थोड़ी राहत मिली और कुछ देर के लिए मैं अपनी परेशानी और भूख को भूल गया था।

जब मैं वापिस लौटा तो रात हो चुकी थी। मैंने दरवाजा खटखटाया लेकिन कोई जवाब नहीं आया। सब बाहर गये हुए थे। थका मांदा मैं केनिंगटन क्रॉस रोड पर जा कर, घर के पास ही एक पुलिया पर जा कर बैठ गया और निगाह अपने घर पर रखी कि शायद कोई आ जाये। मैं थका हुआ था और बुरी हालत थी मेरी। मैं इस बात को भी सोच-सोच कर परेशान हो रहा था कि सिडनी भी कहां चला गया। आधी रात होने को थी और एकाध भूले-भटके आवारा को छोड़ कर केनिंगटन रोड पूरी तरह शांत और उजाड़ थी। कैमिस्ट और सरायों की बत्तियों को छोड़ कर बाकी सारी दुकानों की बत्तियां बंद होने लगी थीं।

तभी संगीत की आवाज सुनायी दी। दिल की गहराइयों को छू लेने वाला संगीत। ये आवाजें व्हाइट हार्ट कार्नर पब की दहलीज से आ रही थीं और सुनसान चौराहे पर एकदम साफ गूंज रही थीं। धुन जिस गीत की थी वह था, 'द हनीसकल एंड द बी' और इसे क्लेरिनेट और हार्मोनियम पर पूरी तन्मयता से बजाया जा रहा था। मैं इससे पहले कभी भी संगीत लहरियों को ले कर सचेत नहीं हुआ था। लेकिन ये गीत तो अद्भुत और शानदार था। इतना अलौकिक और खुशी से भर देने वाला। गर्मजोशी और आश्वस्ति से भर देने वाला। मैं अपनी हताशा भूल गया और सड़क पार वहां तक चला गया जहां वे संगीतज्ञ थे। हार्मोनियम बजाने वाला अंधा था और उसकी आंखों की जगह पर गहरे खोखल थे। और एक जड़ कर देने वाला, बदसूरत चेहरा क्लेरिनेट बजा रहा था।

संगीत सभा जल्द ही खत्म हो गयी और उनके जाते ही रात फिर से पहले से भी ज्यादा उदास हो गयी। मैं सड़क पार कर घर की तरफ आया। थका मांदा और कमज़ोर। मैंने इस बात की भी परवाह नहीं की कि कोई घर लौटा भी है या नहीं। मैं सिर्फ बिस्तर पर पहुंच कर सो जाता चाहता था। तभी मैंने हल्की रौशनी में बगीचे के रास्ते से किसी को अपने घर की तरफ जाते हुए देखा। ये लुइस थी और साथ में उसका बेटा था जो उसके आगे-आगे भागा जा रहा था। मुझे ये देख कर गहरा सदमा लगा कि वह बुरी तरह से लड़खड़ा रही थी और एक तरफ बहुत ज्यादा झुकी जा रही थी। पहले तो मैंने यही सोचा कि कहीं उसके साथ कोई दुर्घटना हो गयी होगी और उसमें उसका पैर जख्मी हो गया होगा लेकिन तभी मैंने महसूस किया कि वह बुरी तरह से नशे में थी। मैंने उसे पहले कभी भी इस तरह से नशे में धुत्त नहीं देखा था। उसकी इस हालत में मैंने यही उचित समझा कि उसके सामने न ही पड़ा जाये तो बेहतर। इसलिए मैं तब तक रुका रहा जब तक वह घर के अंदर नहीं चली गयी। कुछ ही पलों के बाद मकान मालकिन आयी तो मैं उसके साथ भीतर गया। मैं जब अंधेरे में सरकते हुए सीढ़ियां चढ़ रहा था कि किसी तरह उसकी निगाह में आये बिना अपने बिस्तर तक पहुंच जाऊं। लुइस सीढ़ियों पर एकदम सामने आ खड़ी हुई,"ऐ, कहां चले जा रहे हो ओ नवाबजादे? ये तेरा घर नहीं है।"

मैं बिना हिले डुले खड़ा रहा।

"आज रात तुम यहां नही सोवोगे। समझे। बहुत झेल चुकी मैं तुम दोनों को। दफा हो जाओ यहां से। तुम और तुम्हारा वो भाई। करने दो अपने बाप को तुम लोगों की तीमारदारी।"

मैं बिना हिचकिचाहट के मुड़ा और सीढ़ियों से नीचे उतर कर घर से बाहर हो गया। अब मैं बिल्कुल भी थका हुआ नहीं था। मुझे मेरी दूसरी दिशा मिल चुकी थी। मैंने सुना था कि पिता जी प्रिंस रोड पर क्वींस हैड पब में जाया करते हैं। ये पब आधा मील दूर था। इसलिए मैं उस दिशा में चल पड़ा। मैं उम्मीद कर रहा था कि वे वहां पर मुझे मिल जायेंगे। लेकिन मैंने जल्दी ही उनकी छाया आकृति अपनी तरफ आती देखी। वे गली के लैम्प की रौशनी में चले आ रहे थे।

मैं कुनमुनाया,"वो मुझे अंदर नहीं आने दे रही। और मुझे लगता है वह पीती रही है।"

जब हम घर की तरफ चले आ रहे थे तो वे हिचकिचाये,"मेरी खुद की हालत बहुत अच्छी नहीं है।"

मैंने उन्हें आश्वस्त करने की कोशिश की कि वे बिलकुल ठीक-ठाक हैं।

"नहीं, मैं नशे में धुत्त हूं।"

उन्होंने बैठक का दरवाजा खोला और वहां मौन और डराने की मुद्रा में खड़े रहे और लुइस की तरफ देखते रहे। वह फायर प्लेस के पास खड़ी, मैंटलपीस पकड़े लहरा रही थी।

"तुमने इसे भीतर क्यों नहीं आने दिया?"

वह अकबकाई-सी पिता जी की तरफ देखती रही और फिर बुड़बुड़ाई,"तुम भी जहन्नुम में जाओ। तुम सब।"

अचानक पिता ने बगल की अलमारी में से कपड़े झाड़ने का भारी ब्रश उठाया और लुइस की तरफ ज़ोर से दे मारा। ब्रश का पिछला हिस्सा ठीक उसके चेहरे के एक तरफ जा लगा। उसकी आंखें बंद हुईं और वह फर्श पर ज़ोर की आवाज़ करते हुए भहरा कर गिर गयी मानो वह खुद इस उपेक्षा का स्वागत कर रही हो।

पिता की ये करनी देख कर मुझे धक्का लगा। उनकी इस तरह की हिंसा देख कर मेरे मन से उनके प्रति सम्मान की भावना जाती रही थी। और उसके बाद फिर क्या हुआ था, इस बारे में मेरी याददाश्त बहुत धुंधली-सी है। मेरा विश्वास है कि बाद में सिडनी आया था और पिता जी ने हम दोनों को बिस्तर पर लिटा दिया था और घर से चले गये थे।

मुझे पता चला था कि पिताजी और लुइस का उस सुबह ही झगड़ा हुआ था क्योंकि पिताजी उसे छोड़ कर अपने भाई स्पैंसर के पास दिन बिताने के लिए चले गये थे। उनके भाई के लैम्बेथ के आस-पास कई सराय घर थे। अपनी हैसियत के प्रति संवेदनशील होने के कारण लुइस ने इस बात को पसंद नहीं किया कि वह स्पैंसर चैप्लिन के घर जाये और पिताजी अकेले ही चले गये थे। और बदले के भावना से जलते हुए लुइस ने दिन कहीं और बिताया था।

वह पिता को प्यार करती थी। हालांकि मैं उस वक्त बहुत छोटा था लेकिन मैं इस बात को महसूस कर सका था कि जब वह रात के वक्त फायरप्लेस के पास बेचैन और उनकी उपेक्षा से आहत खड़ी थी। मुझे इस बात का भी यकीन है कि वे भी उसे प्यार करते थे। मैंने इस बात को कई मौकों पर खुद देखा। ऐसे भी वक्त आते थे कि जब वे आकर्षक लगते, स्नेह से पेश आते और थियेटर के लिए निकलने से पहले शुभ रात्रि का चुंबन दे कर जाते। और किसी रविवार की सुबह, जब उन्होंने पी नहीं रखी होती थी, वे हमारे साथ नाश्ता करते और लुइस को उन कलाकारों के बारे में बताते जो उनके साथ काम कर रहे होते थे। वे हम सब को ये बातें बता कर खूब हंसाते। मैं मुंह बाये गिद्ध की तरह उनकी तरफ देखता रहता और उनकी हर गतिविधि को अपने भीतर उतारता रहता। एक बार जब वे बहुत ही खिलंदड़े मूड में थे तो अपने सिर पर तौलिया बांध कर मेज के चारों तरफ अपने नन्हें बेटे के पीछे-पीछे दौड़ते हुए बोलते रहे,"मैं हूं राजा टर्की रूबार्ब।"

शाम को आठ बजे थियेटर के लिए निकलने से पहले वे पोर्ट वाइन के साथ छ: कच्चे अंडे निगल जाते। वे शायद ही कभी ठोस आहार लेते। यही उनकी खुराक थी जो उन्हें पूरा दिन चुस्त-दुरुस्त बनाये रखती। वे शायद ही कभी घर आते। कभी आते भी तो सिर्फ़ नशा उतरने तक सोने के लिए आते थे।

एक दिन बच्चों के प्रति क्रूरता की रोक-थाम करने वाली सोसाइटी से कुछ लोग लुइस से मिलने आये। वह उन्हें देख कर बुरी तरह बेचैन हो गयी थी। वे लोग इसलिए आये थे क्योंकि पुलिस ने उन्हें बताया था कि उन्होंने सिडनी और मुझे आधी रात को तीन बजे चौकीदार की कोठरी के पास सोये हुए पाया था। यह उस रात की बात थी जब लुइस ने हम दोनों को बाहर निकाल कर दरवाजा बंद कर दिया था और पुलिस ने जबरदस्ती उससे दरवाजा खुलवाया था और हमें भीतर लेने के लिए उससे कहा था।

अलबत्ता, कुछेक दिनों के बाद, पिता जब दूसरे प्रदेशों में अभिनय में व्यस्त थे, लुइस को एक पत्र मिला जिसमें लिखा था कि मां ने पागलखाना छोड़ दिया है। एक या दो दिन के बाद मकान मालकिन ऊपर आयी और बताने लगी कि दरवाजे पर एक औरत खड़ी है जो सिडनी और चार्ली को पूछ रही है।

"जाओ, तुम्हारी मां आयी है।" लुइस ने कहा। थोड़ी देर के लिए भ्रम की स्थिति पैदा हो गयी। तभी सिडनी कूदा और तेज़ी से दौड़ते हुए सीधे मां की बांहों में जा समाया। मैं उसके पीछे-पीछे लपका। यह वही हमारी प्यारी, मुस्कुराती मां थी और उसने हम दोनों को स्नेह से अपने सीने से लगा लिया था।

लुइस और मां का एक दूसरे से मिलना, खासा परेशानी का कारण बन सकता था, इसलिए मां दरवाजे पर ही खड़ी रहीं और हम दोनों भाई अपनी चीजें समेटते रहे। दोनों तरफ कोई कड़ुवाहट या दुर्भावना नहीं थी बल्कि सिडनी को विदा करते समय लुइस का व्यवहार बहुत ही अच्छा था।

मां ने हेवर्ड अचार फैक्टरी के पास केनिंगटन क्रॉस के पीछे वाली गली में एक कमरा किराये पर ले लिया था। हर दोपहर को वहां एसिड की तीखी गंध वातावरण में फैलने लगती, लेकिन कमरा सस्ता था और हम सब एक बार फिर साथ-साथ रह पा रहे थे। मां की सेहत बहुत अच्छी थी और ये बात हमने कभी सोची ही नहीं कि वह कभी बीमार भी रही थी।

मुझे इस बात का ज़रा-सा भी गुमान नहीं है कि हमारा वह अरसा कैसे गुज़रा। न तो मुझे किसी सीमा से ज्यादा तकलीफ की याद है और न ही किसी ऐसी समस्या की जिसका समाधान हमारे पास न हो। पिता की ओर से हर सप्ताह मिलने वाली दस शिलिंग की राशि आम तौर पर नियमित रूप से मिलती रही और, हां, मां ने सीने-पिरोने का काम फिर से हाथ में ले लिया था और गिरजा घर के साथ फिर से संबंध बना लिये थे।

उस समय की एक घटना खास तौर पर याद आ रही है। हमारी गली के एक सिरे पर कसाईघर था जहां हमारी गली में से हो कर कटने के लिए भेड़ें ले जायी जाती थीं। मुझे याद है कि एक भेड़ बच कर निकल भागी थी और गली में दौड़ती चली गयी थी। सब लोग ये तमाशा देखने लगे। कुछेक लोगों ने उसे दबोचने की कोशिश की और दूसरे कुछ लोग अपनी जगह ही कूद-फांद रहे थे। मैं खुशी के मारे खिलखिला कर हँस रहा था। ये नज़ारा इतना ज्यादा हास्यास्पद लग रहा था। लेकिन जब भेड़ को पकड़ लिया गया और वापिस कसाईघर की तरफ ले जाया गया तो त्रासदी की सच्चाई मुझ पर हावी हो गयी और मैं भाग कर घर के अंदर चला गया। मैं चिल्ला रहा था और ज़ार-ज़ार रोते हुए मां को बता रहा था,"वे लोग उसे मारने के लिए ले जा रहे हैं, वे लोग उसे मारने के लिए ले जा रहे हैं।" वह तीखी, वसंत की दोपहर और उस भेड़ का कॉमेडी-भरा पीछा करना, कई दिन तक मेरे दिलो-दिमाग पर छाये रहे। और मुझे लगता है कि शायद कहीं इसी घटना ने ही मेरी भावी फिल्मों के लिए ज़मीन तैयार की हो। त्रासदी और कॉमेडी का मिला-जुला रूप।

स्कूल अब नयी ऊंचाइयां छू रहा था। इतिहास, कविता और विज्ञान। लेकिन कुछ विषय बहुत ही जड़ और नीरस थे। खास तौर पर अंक गणित। उसके जोड़-भाग मुझमें किसी लिपिक और कैश रजिस्टर, उसके इस्तेमाल की छवि पैदा करते थे और और सबसे बड़ी बात, ये लगता था कि ये रेज़गारी की कमी से एक बचाव की तरह है।

इतिहास मूर्खताओं और हिंसा का दस्तावेज था। कत्ले-आम और राजाओं द्वारा अपनी रानियों, भाइयों और भतीजों को मारने का सतत सिलसिला; भूगोल में सिर्फ नक्शे ही नक्शे ही थे; काव्य के नाम पर अपनी याददाश्त की परीक्षा लेने के अलावा कुछ नहीं था। शिक्षा शास्त्र मुझे पागल बनाता था और तथ्यों की जानकारी में मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी।

काश, किसी ने कारोबारी दिमाग इस्तेमाल किया होता, प्रत्येक अध्ययन की उत्तेजनापूर्ण प्रस्तावना पढ़ी होती जिसने मेरा दिमाग झकझोरा होता, तथ्यों के बजाये मुझ में रुचि पैदा की होती, अंकों की कलाबाजी से मुझे आनंदित किया होता, नक्शों के प्रति रोमांच पैदा किया होता, इतिहास के बारे में मेरा दृष्टिकोण विकसित किया होता, मुझे कविता की लय और धुन को भीतर उतारने के मौके दिये होते तो मैं भी आज विद्वान बन सकता था।

अब चूंकि मां हमारे पास वापिस लौट आयी थी, उसने थियेटर की तरफ मेरी रुचि फिर से जगानी शुरू कर दी थी। उसने मुझमें यह अहसास भर दिया था कि मुझ में थोड़ी-बहुत प्रतिभा है। लेकिन ये सुनहरा मौका बड़े दिन से पहले तब तक नहीं आया था जब तक स्कूल ने अपना संक्षिप्त नाटक सिंडरेला नहीं खेला था और मुझे अपने आपको वह सब अभिव्यक्त करने की ज़रूरत महसूस होने लगी थी जो मुझे मां ने सिखाया-पढ़ाया था। कुछ कारण थे कि मुझे नाटक के लिए नहीं चुना गया था, और भीतर ही भीतर मैं कुढ़ रहा था और महसूस कर रहा था कि बेहतर होता, मैं नाटक में भूमिका करूं बजाये उनके जो इस नाटक के लिए चुने गये थे। जिस तरह से बच्चे नीरस ढंग से और कल्पना शक्ति का सहारा लिये बिना अपनी भूमिका अदा कर रहे थे, उससे मुझमें खीज पैदा हो रही थी। बदसूरत बहनों में न कोई उत्साह था न ही भीतरी उमंग। वे अपनी लाइनें रटे-रटाये ढंग से पढ़ रही थीं जिसमें स्कूल के बच्चों वाली भेड़-चाल और खीझ पैदा करने वाली कृत्रिमता का दबाव था। मैं मां की दी हुई शिक्षा के साथ बदसूरत बहनों में से एक की भूमिका भला कैसे कर सकता था। अलबत्ता, जिस लड़की ने सिंडरेला की भूमिका की थी, उसने मुझे बांध लिया था। वह खूबसूरत और नफासत पसंद थी और उसकी उम्र चौदह बरस के आस-पास थी। मैं उससे गुपचुप प्यार करने लगा था। लेकिन वह मेरी पहुंच से दूर थी। सामाजिक तौर पर भी और उम्र के लिहाज से भी।

मैंने जब नाटक देखा तो मुझे ये बकवास लगा लेकिन लड़की की खूबसूरती के कारण मैंने इसे पसंद किया। उस लड़की ने मुझे उदास कर दिया था। अलबत्ता, मैंने इस बात को शायद ही महसूस किया था कि दो महीने बाद मेरी ज़िंदगी में कितने शानदार पल आने वाले थे कि मुझे हर क्लास के सामने ले जाया गया और -मिस प्रिशिला की बिल्ली का पाठ करने के लिए कहा गया। ये एक स्वांग भरी कविता थी जो मां ने अखबारों की दुकान के बाहर देखी थी और ये उसे इतनी अच्छी लगी कि वह खिड़की पर से नकल करके घर लेती आयी। कक्षा में खाने की छुट्टी के समय मैं उसे एक लड़के को सुना रहा था। तभी मिस्टर रीड, हमारे स्कूल के अध्यापक, ने अपने कागजों पर से ध्यान हटा कर देखा। वे इसे सुन कर इतने खुश हुए कि जब कक्षा के सब बच्चे वापिस आ गये तो उन्होंने मुझे ये सुनाने के लिए कहा। पूरी कक्षा हंसते-हंसते लोट पोट हो गयी। इस वजह से पूरे स्कूल में मेरा नाम फैल गया और अगले दिन मुझे स्कूल की हर कक्षा में, लड़के-लड़कियों की सभी कक्षाओं में ले जाया गया और उसका पाठ करने के लिए कहा गया।

हालांकि मैंने पांच बरस की उम्र में दर्शकों के सामने मंच पर मां की जगह लेते हुए अभिनय किया था लेकिन ग्लैमर से ये मेरा पहला होशो-हवास वाला साबका था। अब स्कूल मेरे लिए उत्तेजनापूर्ण हो चुका था और अब मैं शर्मीला और गुमसुम-सा लड़का नहीं रहा था। अब मैं अध्यापकों और बच्चों, सबका चहेता विद्यार्थी बन चुका था। इससे मेरी पढ़ाई में भी सुधार हुआ, लेकिन मेरी पढ़ाई में फिर से व्यवधान आया जब मुझे अष्टम लंकाशायर बाल गोपाल मंडली के साथ क्लॉग नर्तकों के एक ट्रुप में हिस्सा लेना पड़ा।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 3

पिता जी मिस्टर जैक्सन को जानते थे। वे एक ट्रुप के संचालक थे। पिता जी ने मां को इस बात के लिए मना लिया कि मेरे लिए स्टेज पर कैरियर बनाना एक अच्छी शुरुआत रहेगी और साथ ही साथ मैं मां की आर्थिक रूप से मदद भी कर पाऊंगा। मेरे लिए खाने और रहने की सुविधा रहेगी और मां को हर हफ्ते आधा क्राउन मिला करेगा। शुरू-शुरू में तो वह अनिश्चय में डोलती रही, लेकिन मिस्टर जैक्सन और उनके परिवार से मिलने के बाद मां ने हामी भर दी।

मिस्टर जैक्सन की उम्र पचास-पचपन के आस-पास थी। वे लंकाशायर में अध्यापक रहे थे और उनके परिवार में चार बच्चे थे। तीन लड़के और एक लड़की। ये चारों बच्चे अष्टम लंकाशायर बाल गोपाल मंडली के सदस्य थे। मिस्टर जैक्सन परम रोमन कैथोलिक थे और अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह करने के बारे में उन्होंने अपने बच्चों से सलाह ली थी। उनकी दूसरी पत्नी उम्र में उनसे भी थोड़ी बड़ी थी। वे हमें पूरी नेकनीयती से बता दिया करते कि उन दोनों की शादी कैसे हुई थी। उन्होंने एक अखबार में अपने लिए एक बीवी के लिए एक विज्ञापन दिया था और उसके जवाब में तीन सौ से भी ज्यादा ख़त मिले थे।

भगवान से राह सुझाने के लिए दुआ करने के बाद उन्होंने केवल एक ही लिफाफा खोला था और वह खत था मिसेज जैक्सन की ओर से। वे भी एक स्कूल में पढ़ाती थीं और शायद ये मिस्टर जैक्सन की दुआओं का ही असर था कि वे भी कैथोलिक थीं।

मिसेज जैक्सन को बहुत अधिक खूबसूरती का वरदान नहीं मिला था और न ही उन्हें किसी भी निगाह से कमनीय ही कहा जा सकता था। जहां तक मुझे याद है, उनका बड़ा सा, खोपड़ी जैसा पीला चेहरा था और उस पर ढेर सारी झुर्रियां थीं। शायद इन झुर्रियों की वज़ह यह रही हो कि उन्हें काफी बड़ी उम्र में मिस्टर जैक्सन को एक बेटे की सौगात देनी पड़ी थी। इसके बावजूद वे निष्ठावान और समर्पित पत्नी थीं और हालांकि उन्हें अभी भी अपने बेटे को छाती का दूध पिलाना पड़ता था, वे ट्रुप की व्यवस्था में हाड़-तोड़ मेहनत करके मदद किया करती थीं।

जब उन्होंने रोमांस की अपनी दास्तान सुनायी तो यह दास्तान मिस्टर जैक्सन की बतायी कहानी से थोड़ी अलग थी। उनमें आपस में पत्रों का आदान-प्रदान हुआ था लेकिन उन दोनों में से किसी ने भी दूसरे को शादी के दिन तक नहीं देखा था और बैठक के कमरे में उन दोनों के बीच जो पहली मुलाकात हुई थी और परिवार के बाकी लोग दूसरे कमरे में इंतज़ार कर रहे थे, मिस्टर जैक्सन ने कहा था, "बस, आप वही हैं जिनकी मुझे चाह थी।" और मैडम ने भी वही बात स्वीकार की। हम बच्चों को ये किस्सा सुनाते समय वे विनम्र हो कर कहतीं,"लेकिन मुझे नहीं पता था कि मुझे हाथों-हाथ आठ बच्चों की मां बन जाना पड़ेगा।"

उनके तीन बच्चों की उम्र बारह से अट्ठारह बरस के बीच थी और लड़की की उम्र नौ बरस थी। उस लड़की के बाल लड़कों की तरह कटे हुए थे ताकि उसे भी मंडली के बाकी लड़कों में खपा लिया जा सके।

हर रविवार को मेरे अलावा सब लोग गिरजाघर जाया करते थे। मैं ही उन सब में अकेला प्रोटैस्टैंट था, इसलिए अक्सर उनके साथ ही चला जाता। मां की धार्मिक भावनाओं के प्रति सम्मान न होता तो मैं कब का कैथोलिक बन चुका होता क्योंकि मैं इस धर्म का रहस्यवाद पसंद करता था और घर की बनी हुई छोटी-छोटी ऑल्टर तथा लास्टर की मेरी वर्जिन की मूर्तियां, जिन पर फूल और मोमबत्तियां सजी रहतीं, मुझे अच्छी लगतीं। इन्हें बच्चे अपने बेडरूम के कोने में सजा कर रखते और जब भी उसके आगे से गुज़रते, घुटने टेक कर श्रद्धा अर्पित करते।

छ: सप्ताह तक अभ्यास करने के बाद मैं अब इस स्थिति में था कि बाकी मंडली के साथ नाच सकूं। लेकिन चूंकि मैं अब आठ बरस की भी उम्र पार कर चुका था, मैं अपनी आश्वस्ति खो चुका था और पहली बार दर्शकों के सामने आने पर मुझे मंच का भय लगा। मैं मुश्किल से अपनी टांगें हिला पा रहा था। हफ्तों लग गये तब कहीं जा कर मैं मंडली के बाकी बच्चों की तरह एकल नृत्य करने की हालत में आ सका।

मैं इस बात को ले कर बहुत अधिक खुश नहीं था कि मुझे भी मंडली के बाकी आठ बच्चों की तरह क्लॉग डांसर ही बना रहना पड़े। बाकी बच्चों की तरह मैं भी एकल अभिनय करने की महत्त्वाकांक्षा रखता था। सिर्फ इसलिए नहीं कि इस तरह के काम के ज्यादा पैसे मिलते थे बल्कि इसलिए भी कि मैं शिद्दत से महसूस करता था कि नाचने के बजाये इस तरह के अभिनय से कहीं ज्यादा संतुष्टि मिलती है। मैं बाल हास्य कलाकार बनना चाह सकता था लेकिन उसके लिए स्टेज पर अकेले खड़े रहने का माद्दा चाहिये था। इसके अलावा मेरी पहली भीतरी प्रेरणा यही थी कि मैं एकल नृत्य के अलावा जो कुछ भी करूंगा, हास्यास्पद होगा। मेरा आदर्श दोहरा अभिनय था। दो बच्चे कॉमेडी ट्रैम्प की तरह कपड़े पहने हों। मैंने यह बात अपने एक साथी बच्चे को बतायी और हम दोनों ने पार्टनर बनना तय किया। ये हमारा कब का पाला सपना पूरा होने जा रहा था। हम अपने आपको ब्रिस्टॉल और चैप्लिन - करोड़पति ट्रैम्प कहते और ट्रैम्प गलमुच्छे लगाते, और हीरे की बड़ी बड़ी अंगूठियां पहनते। हमने उस हर पहलू पर विचार कर लिया था जो मज़ाकिया होता और जिससे कमाई हो सकती लेकिन अफ़सोस, ये सपना कभी भी साकार नहीं हो सका।

दर्शक अष्टम लंकाशायर बाल गोपाल मंडली पसंद करते थे क्योंकि जैसा कि मिस्टर जैक्सन कहते थे - हम थियेटर के बच्चों जैसे बिलकुल भी नहीं लगते थे। उनका यह दावा था कि हमने कभी भी अपने चेहरों पर ग्रीज़ पेंट नहीं पोता, और हमारे गुलाबी गाल वैसे ही गुलाबी थे। यदि कोई बच्चा स्टेज पर जाने से पहले जरा-सा भी पीला दिखायी देता तो वे हमें बताते कि अपने गालों को मसल दें। लेकिन लंदन में एक ही रात में दो या तीन संगीत सदनों में काम करने के बाद अक्सर हम भूल जाते और स्टेज पर खड़े हुए थके-मांदे और मनहूस लगने लगते। तभी हमारी निगाह विंग्स में खड़े मिस्टर जैक्सन पर पड़ती और वे ज़ोर-ज़ोर से खींसें निपोरते हुए अपने चेहरे की तरफ इशारा कर रहे होते। इसका बिजली का-सा असर होता और हम अचानक हँसी के मारे दोहरे हो जाते।

प्रदेशों के टूर करते समय हम हर शहर में एक-एक हफ्ते के लिए स्कूल जाया करते। लेकिन इससे मेरी पढ़ाई में कोई खास इज़ाफा नहीं हुआ।

क्रिसमस के दिनों में हमें लंदन हिप्पोड्रोम में सिंडरेला पैंटोमाइम में बिल्ली और कुत्ते का मूक अभिनय करने का न्यौता मिला। उन दिनों ये नया थियेटर हुआ करता था और इसमें वैराइटी शो और सर्कस का मिला-जुला रूप हुआ करता था। इसे बहुत खूबसूरती से सजाया जाता और काफी हंगामा रहा करता था। रिंग का फर्श नीचे चला जाता था और वहां पानी भर जाता था और काफी बड़े पैमाने पर बैले होता। एक के बाद एक बला की खूबसूरत लड़कियां चमकीली सज-धज में आतीं और पानी के नीचे एकदम गायब हो जातीं। जब लड़कियों की आखिरी पंक्ति भी डूब जाती तो मैर्सलाइन, महान फ्रांसीसी जोकर, शाम की बेतुकी, चिकनी पोशाक में सजे धजे, एक कैम्प स्टूल पर बैठे हाथ में मछली मारने की रॉड लिये अवतरित होते और बड़ा-सा गहनों का बक्सा खोलते, अपने कांटे में हीरे का एक नेकलेस फंसाते और उसे पानी में डाल देते। थोड़ी देर के बाद वे छोटे आभूषण निकालते और कुछ बेसलेट फेंकते, और इस तरह पूरा का पूरा बक्सा खाली कर डालते। अचानक वे एक झटका खाते और तरह-तरह की मजाकिया हरकतें करते हुए रॉड के साथ संघर्ष करते हुए प्रतीत होते और आखिर कांटे को खींच कर बाहर निकालते और हम देखते कि पानी में से एक छोटा-सा प्रशिक्षित कुत्ता बाहर आ रहा है। कुत्ता वही सब कुछ करता जो मार्सलीन करते। अगर वे बैठते तो कुत्ता भी बैठ जाता और अगर वे खड़े होते तो कुत्ता भी खड़ा हो जाता। मार्सलीन साहब की कॉमेडी हंसी-ठिठोली से भरी और आकर्षक थी और लंदन के लोग उनके पागलपन की हद तक दीवाने थे।

रसोई के एक दृश्य में मुझे उनके साथ करने के लिए एक छोटा-सा मजाकिया दृश्य दिया गया। मैं बिल्ली बना हुआ था और मार्सलीन एक कुत्ते की तरफ से पीछे आते हुए मेरे ऊपर गिर जाने वाले थे जबकि मैं दूध पी रहा होता। वे हमेशा शिकायत किया करते कि मैं अपनी कमर को इतना नहीं झुकाता कि उनके गिरने के बीच आड़े आऊं। मैंने बिल्ली का एक मुखौटा पहना हुआ था और मुखौटा ऐसा कि जिस पर हैरानी के भाव थे। बच्चों के लिए पहले मैटिनी शो में मैं कुत्ते के शरीर के पिछले हिस्से की तरफ चला गया और उसे सूंघने लगा। जब दर्शक हंसने लगे तो मैं वापिस मुड़ा और उनकी तरफ हैरानी से देखने लगा और मैंने एक डोरी खींची जिससे बिल्ली की घूरती हुई आंख मुंद जाती थी। मैं जब कई बार सूंघने और आंख मारने का अभिनय कर चुका तो स्टेज मैनेजर लपका हुआ बैक स्टेज में आया और विंग्स में से पागलों की तरह हाथ हिलाने लगा। लेकिन मैं अपने काम में लगा रहा। कुत्ते को सूंघने के बाद मैंने रंगमंच सूंघा और फिर अपनी टांग उठा दी। दर्शक हँस हँस कर दोहरे हो गये। शायद इसलिए क्योंकि ये हरकत बिल्ली जैसी नहीं थी। आखिरकार मैनेजर से मेरी आंखें मिल ही गयीं और मैं इतना कूदा-फांदा कि लोग हँसते हँसते लोट पोट हो गये। वे मुझ पर झल्लाये,"इस तरह की हरकत फिर कभी मत करना।" यह कहते हुए उनकी सांस फूल रही थी,"तुम जरूर इस थियेटर के मालिक लॉर्ड चैम्बरलिन को ये थियेटर बंद करने पर मजबूर करोगे।"

सिंडरेला को आशातीत सफलता मिली। और हालांकि मार्सलीन साहब को कहानी तत्व या प्लॉट के साथ कुछ लेना-देना नहीं था, फिर भी वे सबसे बड़ा आकर्षण थे। कई बरसों के बाद मार्सलीन न्यूयॉर्क के हिप्पोड्रोम में चले गये और उन्हें वहां भी हाथों-हाथ लिया गया। लेकिन जब हिप्पोड्रोम की जगह सर्कस ने ले ली तो मार्सलीन साहब को जल्दी ही भुला दिया गया।


1918 या उसके आस पास की बात है, रिंगलिंग ब्रदर्स का थ्री रिंग सर्कस लॉस एंजेल्स में आया तो मार्सलीन उनके साथ थे। मैं ये मान कर चल रहा था कि उनका ज़िक्र पोस्टरों में होगा लेकिन मुझे यह देख कर गहरा धक्का लगा कि उनकी भूमिका बहुत से उन दूसरे जोकरों की ही तरह थी जो पूरे रिंग में यहां से वहां तक दौड़ते नज़र आते हैं। एक महान कलाकार तीन रिंग वाले सर्कस की अश्लील तड़क-भड़क में खो गया था।

बाद में मैं उनके ड्रेसिंग रूम में गया और अपना परिचय दिया और उन्हें याद दिलाया कि मैंने उनके साथ लंदन के हिप्पोड्रोम में बिल्ली की भूमिका अदा की थी। लेकिन उनकी प्रतिक्रिया उदासीन थी। यहां तक कि अपने जोकर वाले मेक-अप में भी उनका चेहरा सूजा हुआ लग रहा था और वे उदास और सुस्त लग रहे थे।

एक बरस बाद न्यू यार्क में उन्होंने खुदकुशी कर ली। अखबारों में एक कोने में छोटी-सी खबर छपी थी कि उसी घर में रहने वाले एक पड़ोसी ने गोली चलने की आवाज़ सुनी थी और मार्सलीन को फर्श पर पड़े हुए देखा था। उनके एक हाथ में पिस्तौल थी और ग्रामोफोन रिकार्ड अभी भी घूम रहा था। रिकार्ड पर जो गीत बज रहा था, वह था, "मूनलाइट एंड रोजेज़।"


कई मशहूर अंग्रेज़ी कॉमेडियनों ने खुदकुशी की है। टी ई डनविले, जो बहुत ही आला दरजे के हंसोड़ व्यक्ति थे, ने सैलून बार के भीतर जाते समय किसी को पीठ पीछे यह कहते सुन लिया था,"अब इस शख्स के दिन लद गये।" उसी दिन उन्होंने टेम्स नदी के किनारे अपने आप को गोली मार दी थी।

मार्क शेरिडन, जो इंगलैंड के सर्वाधिक सफल कामेडियन थे, ने ग्लासगो में एक सार्वजनिक पार्क में अपने आपको गोली मार दी थी क्योंकि वे ग्लासगो के दर्शकों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे थे।

फ्रैंक कॉयन, जिनके साथ हमने उसी शो में काम किया था, जांबाज़, हट्टे-कट्टे कामेडियन थे और जो अपने एक हल्के-फुल्के गाने के लिए बहुत प्रसिद्ध थे:


आप मुझे घोड़े की पीठ पर दोबारा सवार नहीं पायेंगे

ऐसा नहीं है वह घोड़ा चढ़ सकूं जिस पर मैं

जिस घोड़े पर मैं चढ़ सकता हूं वो तो

है वो जिस पर मोहतरमा सुखाती है कपड़े


स्टेज के बाहर वे हमेशा खुश रहते और मुस्कुराते रहते। लेकिन एक दोपहर, अपनी पत्नी के साथ घोड़ी वाली गाड़ी पर सैर की योजना बनाने के बाद वे कुछ भूल गये और अपनी पत्नी से कहा कि वह इंतज़ार करे और वे खुद सीढ़ियां चढ़ कर भीतर गये। बीस मिनट के बाद जब वह ऊपर यह देखने के लिए गयी कि उन्हें आने में देर क्यों हो रही है तो उसने उन्हें बाथरूम के फर्श पर खून से लथपथ पड़े हुए पाया। उनके हाथ में उस्तरा था और उन्होंने अपना गला काट कर अपने आपको लगभग खत्म ही कर डाला था।

अपने बचपन में मैंने जिन कई कलाकारों के साथ काम किया था और जिन्होंने मुझे प्रभावित किया था, वे स्टेज पर हमेशा सफल नहीं थे बल्कि स्टेज से बाहर उनका विलक्षण व्यक्तित्व हुआ करता था। जार्मो नाम के एक कॉमेडी ट्रैम्प बाजीगर हुआ करते थे जो कड़े अनुशासन में काम करते थे और थियेटर के खुलते ही हर सुबह घंटों तक अपनी बाजीगरी का अभ्यास किया करते थे। हम उन्हें स्टेज के पीछे देख सकते थे कि वे बिलियर्ड खेलने की छड़ी को अपनी ठुड्डी पर संतुलित कर रहे हैं और एक बिलियर्ड गेंद उछाल कर उसे इस छड़ी के ऊपर टिका रहे हैं। इसके बाद वे दूसरी गेंद उछालते और पहली गेंद के ऊपर टिका देते। अक्सर वे दूसरी गेंद टिकाने में चूक जाते। मिस्टर जैक्सन ने बताया कि वे चार बरस तक लगातार इस ट्रिक का अभ्यास करते रहे थे और सप्ताह के अंत में इसे पहली बार दर्शकों के सामने दिखाना चाह रहे थे। उस रात हम सब विंग्स में खड़े उन्हें देखते रहे। उन्होंने बिलकुल ठीक प्रदर्शन किया और पहली ही बार ठीक किया। गेंद को ऊपर उछालना और बिलियर्ड की छड़ी पर ऊपर टिका देना और फिर दूसरी गेंद उछालना और उसे पहली गेंद के ऊपर टिका देना लेकिन दर्शकों ने मामूली सी तालियां ही बजायीं।

मिस्टर जैक्सन ने उस रात का किस्सा बताया था, उन्होंने जार्मो से कहा था,"तुम इस ट्रिक को बहुत ही आसान बना डालते हो। इस वज़ह से तुम इसे बेच नहीं पाते। तुम इसे कई बार मिस करो, तब जा कर गेंद को ऊपर टिकाओ, तब बात बनेगी।" जार्मो हंसे थे,"मैं इतना कुशल नहीं हूं कि इसे मिस कर सकूं।" जार्मो मानस विज्ञान में भी दिलचस्पी रखते थे और हमारे चरित्र पढ़ा करते। उन्होंने मुझे बताया था कि मैं जो कुछ भी ज्ञान हासिल करूंगा, उसे बनाये रखूंगा और उसका बेहतर इस्तेमाल करूंगा।

इनके अलावा, ग्रिफिथ बंधु हुआ करते थे। मज़ाकिया और प्रभाव छोड़ने वाले। उन्होंने मेरा मनोविज्ञान ही उलट-पुलट डाला था। वे दोनों कॉमेडी ट्रैपीज़ जोकर थे और दोनों ट्रैपीज़ पर झूला करते। वे मोटे पैड लगे जूतों से एक दूसरे के मुंह पर जोर से लात जमाते।

"आह," लात खाने वाला चिल्लाता।

"ज़रा एक बार फिर मार कर तो दिखा।"

"ले और ले। एक और लात"

और फिर लात खाने वाला हैरानी से देखता रह जाता और आंखें नचाता और कहता,"अरे देखो, उसने फिर से लात मार दी है।"

मुझे इस तरह की पागलपन से भरी हिंसा से तकलीफ होती। लेकिन स्टेज से बाहर वे दोनों भाई बहुत प्यारे, शांत और गम्भीर होते।

मेरा ख्याल है, किंवदंती बन चुके ग्रिमाल्डी के बाद डान लेनो महान अंग्रेज़ कॉमेडियन रहे। हालांकि मैंने कभी भी लेनो को उनके चरम उत्कर्ष पर नहीं देखा, वे मेरे लिए कॉमेडियन के बजाये चरित्र अभिनेता अधिक थे। लंदन के निचले वर्गों के सनक से भरे जीवन के उनके खाके, स्कैच अत्यंत मानवीय और दिल को छू लेने वाले होते, मां ने मुझे बताया था।

प्रसिद्ध मैरी लॉयड की प्रसिद्धि छिछोरी औरत के रूप में थी। इसके बावजूद जब हमने उनके साथ स्ट्रैंड में ओल्ड टिवोली में अभिनय किया तो वे ज्यादा गम्भीर और सतर्क अभिनेत्री लगीं। मैं उन्हें आंखें चौड़ी किये देखता रहता। एक चिंतातुर, छोटी-मोटी महिला जो दृश्यों के बीच आगे-पीछे कदम ताल करती रहती थीं।

वे तब तक गुस्से में और डरी रहतीं जब तक उनके लिए मंच पर जाने का समय न आ जाता। उसके बाद वे एकदम खुशमिजाज दिखतीं और उनके चेहरे पर राहत के भाव आ जाते।

और फिर, ब्रांसबाय विलियम्स, जो डिकेंस के पात्रों का अभिनय करते थे, वे उरिया हीप, बिल साइक्स और द' ओल्ड क्यूरोसिटी शॉप के बूढ़े आदमी की नकल से मुझे आनन्दित किया करते थे। इस खूबसूरत, अभिजात्य पुरुष का ग्लासगो की उजड्ड जनता के सामने अभिनय करना और अपने आप को इन शानदार चरित्रों में ढाल कर करतब दिखाना, थियेटर के नये ही अर्थ खोलता था।

उन्होंने साहित्य के प्रति भी मेरे मन में अनुराग जगाया था। मैं जानना चाहता था कि आखिर वह अबूझ रहस्य क्या है जो किताबों में छुपा रहता है, डिकेंस के ये ज़मीनी रंग के चरित्र जो इस तरह की आश्चर्यजनक क्रुक्शांकियाई दुनिया में विचरते हैं। हालांकि मैं मुश्किल से पढ़ पाता था, मैंने आखिरकार ऑलिवर ट्विस्ट की प्रति खरीदी।

मैं चार्ल्स डिकेंस के चरित्रों के साथ इतना ज्यादा रोमांचित था कि मैं उनकी नकल करने वाले ब्रांसबाय विलियम्स की नकल करता। इस बात से इनकार कैसे किया जा सकता है कि इस तरह की उभरती हुई प्रतिभा पर किसी की निगाह न जाती। इसे छुपा कर कैसे रखा जा सकता था। तो हुआ ये कि एक दिन मिस्टर जैक्सन ने मुझे अपने दोस्तों का द' ओल्ड क्यूरोसिटी शॉप के बूढ़े का चरित्र निभा कर उसकी नकल करते देख लिया। मुझे तब और तभी जीनियस मान लिया गया और मिस्टर जैक्सन ने तय कर लिया कि वे पूरी दुनिया से इस प्रतिभा का परिचय करवा के रहेंगे।

अचानक मौका आया मिडल्सबोरो में थियेटर में। हमारे क्लॉग नृत्य के बाद मिस्टर जैक्सन स्टेज पर कुछ इस तरह का भाव लिये हुए आये मानो वे एक नये मसीहा का परिचय कराने के लिए चले आ रहे हों। उन्होंने घोषणा की कि उन्होंने एक बाल प्रतिभा खोज निकाली है और द' ओल्ड क्यूरोसिटी शॉप के उस बूढ़े की ब्रांसबाय विलियम्स की नकल करके दिखायेगा जो अपने नन्हें नेल की मृत्यु को पहचान नहीं पाता।

दर्शक इसके लिए बहुत ज्यादा तैयार नहीं थे, क्योंकि वे पहले ही पूरी शाम का एक बोर मनोरंजन झेल चुके थे। अलबत्ता, मैं अपनी डांस वाली सामान्य पोशाक पहने हुए ही मंच पर आया। मैंने सफेद लीनन का फ्रॉक, लेस वाले कॉलर, चमकीले निक्कर, बॉकर पैंट, और नाचने के समय के लाल जूते पहले पहने हुए थे। और मैं अभिनय कर रहा था ऐसे बूढ़े का जो नब्बे बरस का हो। कहीं से हमें एक ऐसी पुरानी विग मिल गयी थी - शायद मिस्टर जैक्सन कहीं से लाये होंगे, जो वैसे तो बड़ी थी लेकिन जो मुझे पूरी नहीं आ रही थी हालांकि मेरा सिर बड़ा था लेकिन विग उससे भी बड़ी थी। ये एक गंजे आदमी वाली विग थी और उसके चारों तरफ सफेद लटें झूल रही थीं इसलिए मैं जब स्टेज पर एक बूढ़े आदमी की तरह झुका हुआ पहुंचा तो इसका असर घिसटते गुबरैले की तरह था और दर्शकों ने इस तथ्य को दबी हंसी के साथ स्वीकार किया।

इसके बाद तो उन्हें चुप कराना ही मुश्किल हो गया। मैं दबी हुई फुसफुसाहट में बोल रहा था," हश़ ... हश़.... शोर मत करो, नहीं तो मेरा नेल जग जायेगा।"

"जोर से बोलो, जोर से बोलो" दर्शक चिल्लाये।

लेकिन मैं बहुत ही अनौपचारिक तरीके से उसी तरह से फुसफुसाहट के स्वर में ही बोलता रहा। मैं इतने अंतरंग तरीके से बोल रहा था कि दर्शक पैर पटकने लगे। चार्ल्स डिकेंस के चरित्रों को जीने के रूप में ये मेरे कैरियर का अंत था।


हालांकि हम किफायत से रहते थे लेकिन हम अष्टम लंकाशायर बाल गोपालों का जीवन ठीक-ठाक चल रहा था। कभी कभी हम लोगों में छोटी-मोटी असहमति भी हो जाती। मुझे याद है, हम दो युवा एक्रोबैट्स के साथ एक ही प्रस्तुति में काम कर रहे थे। प्रशिक्षु लड़के मेरी ही उम्र के रहे होंगे। उन्होंने हमें विश्वास पूर्वक बताया कि उनकी मांओं को तो सात शिलिंग और छ: पेंस हफ्ते के मिलते हैं और हर सोमवार की सुबह उन्हें नाश्ते की बैकन और अंडे की प्लेट के नीचे एक शिलिंग की पाकेट मनी भी रखी मिलती है। और हमें तो, हमारे ही एक साथी ने शिकायत की,"हमें तो सिर्फ दो ही पेंस मिलते हैं और ब्रेड जैम का नाश्ता मिलता है।"

जब मिस्टर जैक्सन के पुत्र जॉन ने ये सुना कि हम शिकायत कर रहे हैं तो वह रुआंसा हो गया और एकदम रो पड़ा। हमें बताने लगा कि हमें कई बार लंदन के उन उपगनरों में ऐसे भी सप्ताह गुज़ारने पड़ते हैं जब उसके पिता को पूरी मंडली के लिए मात्र सात पौंड ही मिल पाते हैं और वे किसी तरह गाड़ी खींचने में बहुत ही मुश्किल का सामना कर रहे हैं।

इन दोनों युवा एक्रोबैट्स की इस शानदार जीवन शैली का ही असर था कि हमने भी एक्रोबैट बनने की हसरतें पाल लीं। इसलिए कई बार सुबह के वक्त, जैसे ही थियेटर खुलता, हम में से एक या दो जन एक रस्सी के साथ कलाबाजियां खाने का अभ्यास करते। हम रस्सी को अपनी कमर से बांध लेते, जो एक पूली से जुड़ी होती, और हम में से एक लड़का रस्सी को थामे रहता। मैंने इस तरीके से अच्छी कलाबाजियां खाना सीख लिया था कि तभी मैं गिरा और अपने अंगूठे में मोच खा बैठा। इसी के साथ ही मेरे एक्रोबैट के कैरियर का अंत हुआ।

नृत्य के अलावा हमेशा हम लोगों की कोशिश होती कि अपने आइटम में नया कुछ जोड़ें। मैं एक कॉमेडी बाजीगर बनना चाहता था। और इसके लिए मैंने इतने पैसे बचा लिये थे कि मैंने उनसे रबर की चार गेंदें और टिन की चार प्लेटें खरीदीं। मैं अपने बिस्तर के पास खड़ा घंटों इनके साथ अभ्यास किया करता।

मिस्टर जैक्सन अनिवार्य रूप से एक बेहतरीन आदमी थे। मेरे ट्रुप छोड़ने से तीन महीने पहले उन्होंने मेरे पिता की सहायतार्थ एक आयोजन किया था और उसमें हम लोग शामिल हुए थे। मेरे पिता उन दिनों बहुत बीमार चल रहे थे। कई वैराइटी कलाकारों ने बिना कोई शुल्क लिये अपनी सेवाएं दीं। मिस्टर जैक्सन की अष्टम बाल गोपाल मंडली ने भी अपनी सेवाएं दीं। उस सहायतार्थ आयोजन में मेरे पिता स्टेज पर मौज़ूद थे और वे बहुत मुश्किल से सांस ले पा रहे थे। बहुत तकलीफ़ से वे अपना भाषण दे पाये थे। मैं स्टेज पर एक तरफ खड़ा उन्हें देख रहा था। उस वक्त मैं नहीं जानता था कि वे तिल-तिल मौत की तरफ बढ़ रहे थे।


जब हम लंदन में होते तो मैं हर सप्ताह मां से मिलने के लिए जाता। उसे लगता कि मैं पीला पड़ गया हूं और कमज़ोर हो गया हूं और कि नाचने से मेरे फेफड़ों पर असर हो रहा है। इस बात ने उसे इतना चिंतित कर दिया कि उसने इस बारे में मिस्टर जैक्सन को लिखा। मिस्टर जैक्सन इतने नाराज़ हुए कि आखिरकार उन्होंने मुझे घर का ही रास्ता दिखा दिया कि मैं चिंतातुर मां का लाडला इतनी बड़ी परेशानी के लायक नहीं हूं।

अलबत्ता, कुछ ही हफ्तों के बाद मुझे दमा हो गया। दमे के दौरे इतने तेज होते कि मां को पूरा यकीन हो गया कि मुझे टीबी हो गयी है और वह मुझे तुरंत ब्राम्पटन अस्पताल ले गयी। वहां मेरी अच्छी तरह से पूरी जांच की गयी। मेरे फेफड़ों में कोई भी खराबी नहीं थी, बस, मुझे अस्थमा हो गया था। महीनों तक मैं उसकी तकलीफ से गुज़रता रहा और मुझे सांस लेने में भी तकलीफ होती थी। कई बार तो खिड़की से बाहर कूद जाने की मेरी इच्छा होती। सिर पर कंबल डाले जड़ी-बूटियों की भाप लेने से भी मेरे सिर दर्द में कोई कमी न आती। लेकिन जैसा कि डॉक्टर ने कहा था, अंतत: मैं ठीक हो जाऊंगा, मैं ठीक हो ही गया।


इस दौरान की मेरी स्मृतियां स्पष्ट और धूमिल होती रहती हैं। सबसे उल्लेखनीय छवि तो हमारी दयनीय हालात का निचाट कछार है। मुझे याद नहीं पड़ता कि उन दिनों सिडनी कहां था। चूंकि वह मुझसे चार बरस बड़ा था, वह कभी-कभार ही मेरे चेतन में आता। ऐसा हो सकता है कि मां की तंग हालत के कारण वह नाना के पास रह रहा हो। हम अपना डोरा-डंडा उठाये एक गरीबखाने से दूसरे गरीबखाने की ओर कूच करते रहते। और अंतत: 3 पाउनाल टैरेस की दुछत्ती पर आ बसे थे।

मुझे अपनी गरीबी के सामाजिक कलंक का अच्छी तरह से भान था। गरीब से गरीब बच्चे भी रविवार की शाम को घर के बने डिनर का लुत्फ ले ही लिया करते थे। घर पर कोई भुनी हुई चीज़ का मतलब सम्मानजनक स्थिति हुआ करता था जो एक गरीब को दूसरे गरीब से अलग करती थी। वे लोग, जो रविवार की शाम घर पर डिनर के लिए नहीं बैठ पाते थे, उन्हें भिखमंगे वर्ग का माना जाता था और हम उसी वर्ग में आते थे। मां मुझे नजदीकी कॉफी शॉप से छ: पेनी का डिनर (मीट और दो सब्जियां) लेने के लिए भेजती। और सबसे ज्यादा शर्म की बात ये होती कि ये रविवार की शाम होती। मैं उसके आगे हाथ जोड़ता कि वह घर पर ही कोई चीज़ क्यों नहीं बना लेती और वह बेकार में ही यह समझाने की कोशिश करती कि घर पर ये ही चीजें बनाने में दुगुनी लागत आयेगी।

अलबत्ता, एक सौभाग्यशाली शुक्रवार को, जब उसने घुड़दौड़ में पांच शिलिंग जीते थे, मुझे खुश करने की नीयत से मां ने तय किया कि वह रविवार के दिन डिनर घर पर ही बनायेगी। दूसरी स्वादिष्ट चीजों के अलावा वह भूनने वाला मांस भी लायी जिसके बारे में वह तय नहीं कर पा रही थी कि ये गाय का मांस है या गुर्दे की चर्बी का लोंदा है। ये लगभग पांच पौंड का था और उस पर चिप्पी लगी हुई थी,"भूनने के लिए।"

हमारे पास क्योंकि ओवन नहीं था, इसलिए मां ने उसे भूनने के लिए मकान-मालकिन का ओवन इस्तेमाल किया और बार-बार उसकी रसोई के भीतर आने-जाने की जहमत से बचने के लिए अंदाज से उस मांस के लोंदे को भूनने के लिए ओवन का टाइम सेट कर दिया और उसके बाद ही वह रसोईघर में गयी। और हमारी बदकिस्मती से हुआ ये कि हमारा ये मांस का पिंड क्रिकेट की गेंद के आकार का ही रह गया था। इसके बावजूद, मां के इस दृढ़ निश्चय के बावजूद कि हमारा खाना बाहर के छ: पेंस के खाने से कम तकलीफदेह और ज्यादा स्वादिष्ट होता है, मैंने उस भोजन का भरपूर आनंद लिया और यह महसूस किया कि हम भी किसी से कम नहीं।


हमारे जीवन में अचानक एक परिवर्तन आया। मां अपनी एक पुरानी सहेली से मिली जो बहुत समृद्ध पहुंचेली चीज़ बन गयी थी, खूबसूरत हो गयी थी और चलती-पुरजी टाइप की महिला बन गयी थी। उसने एक अमीर बूढ़े कर्नल की मिस्ट्रैस बनने के लिए स्टेज को अलविदा कह दी थी।

वह स्टॉकवेल के फैशनपरस्त जिले में रहा करती थी और मां से फिर से मिलने के अपने उत्साह में उसने हमें आमंत्रित किया कि गर्मियों में हम उसके यहां आ कर रहें। चूंकि सिडनी गांवों की तरफ मस्ती मारने के लिए गया हुआ था इसलिए मां को मनाने में ज़रा भी तकलीफ नहीं हुई और उसने अपनी सुई और कसीदेकारी के हुनर से अपने-आपको काफी ढंग का बना लिया था और मैंने अपना संडे सूट पहन लिया। यह अष्टम बाल मंडली का अवशेष था और इस मौके के हिसाब से ठीक-ठाक लग रहा था।

और इस तरह रातों-रात हम लैंसडाउन स्क्वायर में कोने वाले एक बहुत ही शांत मकान में पहुंचा दिये गये। ये घर नौकरों-चाकरों से भरा हुआ था। वहां गुलाबी और नीले बैडरूम थे, छींट के परदे थे और सफेद भालू के बालों के नमदे थे। मुझे कितनी अच्छी तरह से याद हैं डाइनिंग रूम के साइड बोर्ड को सजाने वाले बड़े नीले हॉटहाउस ग्रेप्स की और मुझे यह बात कितनी लज्जा से भर देती जब मैं देखता कि वे रहस्यमय तरीके से गायब होते चले जा रहे हैं और हर दिन बीतने के साथ उनके ढांचे भर नज़र आने लगे थे।

घर के भीतर काम करने के लिए चार औरतें थीं। रसोईदारिन और तीन नौकरानियां। मां और मेरे अलावा वहां पर एक और मेहमान थे। बहुत तनावग्रस्त, एक सुदर्शन युवक जिनकी कुतरी हुई लाल मूंछें थीं। वे बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे और बहुत सज्जन थे। वे उस घर में स्थायी सामान की तरह थे लेकिन सफेद मूंछों वाले कर्नल महाशय के नज़र आने तक ही। उनके आते ही वह खूबसूरत नौजवान गायब हो जाता।

कर्नल महोदय का आना कभी-कभार ही होता। हफ्ते में दो-एक बार। जब वे वहां होते तो पूरे घर में एक रहस्य का आवरण तना रहता और उनकी मौजूदगी हर जगह महसूस की जाती। और मां मुझे बताती कि उनके सामने न पड़ा करूं और उन्हें नज़र न आऊं। एक दिन मैं ठीक उसी वक्त हॉल में जा पहुंचा जब वे सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे।

वे लम्बे, भव्य, राजसी ठाठ-बाठ वाले व्यक्ति थे और उन्होंने फ्रॉक कोट और टॉप हैट पहने हुए थे। उनका चेहरा गुलाबी था। लम्बी सफेद कलमें चेहरे पर दोनों तरफ काफी नीचे तक थीं और सिर गंजा था। वे मेरी तरफ देख कर शिष्टता से मुस्कुराये और अपने रास्ते चले गये।

मैं समझ नहीं पाया कि उनके आने के पीछे ये सब क्या हंगामा था और उनके आते ही क्यों अफरा-तफरी मच जाती थी लेकिन वे कभी भी बहुत अधिक अरसे तक नहीं रहे और कुतरी मूंछों वाला नौजवान जल्दी ही लौट आता और सब कुछ पहले की तरह सामान्य ढंग से चलने लगता।

मैं कुतरी हुई मूंछों वाले नौजवान का मुरीद हो गया। हम दोनों क्लाफाम कॉमन तक लम्बी सैर पर जाते और हमारे साथ मालकिन के दो खूबसूरत ग्रेहाउंड कुत्ते होते। उन दिनों क्लाफाम कॉमन का माहौल बेहद खूबसूरत हुआ करता था। यहां तक कि कैमिस्ट की दुकान भी, जहां हम अक्सर खरीदारी किया करते थे, फूलों के अर्क की गंध, इत्रों और साबुनों और पाउडरों के साथ भव्य लगा करती थी। मेरे अस्थमा के इलाज के लिए उन्होंने मां को बताया था कि रोज़ सवेरे वह मुझे ठंडे पानी से नहलाया करे और शायद इससे फायदा भी हुआ। ये स्नान बहुत ही स्वास्थ्यकर थे और मैं उन्हें पसंद करता हुआ बड़ा हुआ।


यह एक उल्लेखनीय बात है कि हम किस सफाई से अपने आपको सामाजिक मान मर्यादाओं के अनुसार ढाल लेते हैं। आदमी उपलब्ध सृष्टि की भौतिक सुविधाओं के साथ कितनी अच्छी तरह से एकाकार और आदी हो जाता है। एक सप्ताह के भीतर ही मेरे लिए सब कुछ सहज स्वीकार्य हो चला था। बेहतर होने का बोध - सुबह सवेरे की औपचारिकताएं, कुत्तों को एक्सरसाइज कराना, उनके नये चमड़े के पट्टे लिये जाना, फिर खूबसूरत घर में वापिस लौटना, जहां चारों तरफ नौकर-चाकर हों, शानदार तरीके से चांदी के बरतनों में परोसे जाने वाले लंच की प्रतीक्षा करना।

हमारे घर का पिछवाड़ा एक दूसरे घर के पिछवाड़े से सटा हुआ था और उस घर में भी उतने ही नौकर थे जितने हमारे घर पर थे। उस घर में तीन लोग रहा करते थे, एक युवा दम्पत्ति और उनका एक लड़का जो लगभग मेरी ही उम्र का था। उसके पास एक बालघर था जिसमें बहुत खूबसूरत खिलौने भरे हुए थे। मुझे अक्सर उसके साथ खेलने के लिए बुलवा लिया जाता और रात के खाने के लिए रोक लिया जाता। हम दोनों आपस में बहुत अच्छे दोस्त बन गये थे। उसके पिता सिटी बैंक में किसी बहुत अच्छे पद पर काम करते थे और उसकी मां युवा और बेहद खूबसूरत थी।

एक दिन मैंने अपनी तरफ वाली नौकरानी को लड़के की नौकरानी से गुपचुप बात करते हुए सुन लिया कि उन्हें लड़के के लिए एक गवर्नेस की ज़रूरत है।

"और इसे भी उसी की ज़रूरत है।" हमारी वाली नौकरानी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा। मैं इस बात से बेहद रोमांचित हो गया कि मेरी भी अमीर लड़कों की तरह देखभाल की जायेगी लेकिन मैं इस बात को कभी भी समझ नहीं पाया कि क्यों उसने मेरा दर्जा इतना ऊपर उठा दिया था। हां, तब की बात अलग है कि वह जिन लोगों के लिए काम करती थी या जिनके पड़ोस में वे लोग रहते थे उनका कद ऊपर उठा कर वह खुद ही अपना दर्जा ऊपर उठाना चाहती हो। आखिर, मैं जब भी पड़ोस के उस छोकरे के साथ खाना खाता था, मुझे कमोबेश यही लगता कि मैं बिन बुलाया मेहमान ही तो हूं।

जिस दिन हम उस खूबसूरत घर से अपने 3 पाउनाल के घर लौटने के लिए वापिस चले, वह उदासी भरा दिन था, फिर भी एक तरह की राहत भी थी कि हम अपनी आज़ादी में वापिस लौट रहे हैं। मेहमानों के तौर पर वहां रहते हुए आखिर हमें कुछ तनाव तो होता ही था। और जैसा कि मां कहा करती थी, हम केक की तरह थे। अगर उसे बहुत देर तक रखा जाये तो वह बासी और अखाद्य हो जाता है। और इस तरह से उस संक्षिप्त और शानो-शौकत से भरे वक्त के रेशमी तार हमसे छिन गये और हम एक बार फिर अपने जाने-पहचाने फटेहाल तौर-तरीकों में लौट आये।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 4

1899 बरस गलमुच्छों का बरस था। गलमुच्छों वाले राजा, राजनयिक, सैनिक और नाविक, क्रूगर, सेलिसबरी, रसोइये, कैसर, और क्रिकेट खिलाड़ी। दिखावे और शोशेबाजी का वाहियात बरस। बेइंतहा अमीरी और बेइंतहा गरीबी का बरस। कार्टून और प्रेस, दोनों की शून्यता से भरे राजनैतिक हठधर्मिता से भरे बरस। लेकिन इंगलैंड को कई धक्के और बदमगज़ियां सहनी थीं। अफ्रीकी ट्रांसवाल में कुछ बोअर किसान बिला वज़ह युद्ध छेड़े हुए थे और बड़े-बड़े पत्थरों के और चट्टानों के पीछे से शानदार निशाने लगाते हुए हमारे लाल कोट धारी सैनिकों को मार रहे थे। तब हमारे युद्ध कार्यालय वालों के दिमाग की बत्ती जली और उन्होंने तुरत-फुरत लाल को खाकी में बदल दिया। अगर बोअर उन्हें इस रूप में मारना चाहें तो भले ही मार सकते हैं।

मुझे युद्ध की थोड़ी बहुत ही जानकारी थी और ये मुझे मिली थी देश भक्ति के गीतों, विविध मंचों पर हास्यमय प्रस्तुतियों और सिगरेट की डिब्बियों पर छपी जनरलों की तस्वीरों के माध्यम से। अलबत्ता, हमारे दुश्मन खत्म न होने वाले विलेन थे। कभी सुनने में आता कि बोअर लोगों ने लेडी स्मिथ को घेर लिया है तो इंगलैंड मेफकिंग को मुक्त करा लेने के बाद खुशी के मारे पागल हो गया है। आखिरकार हम जीत ही गये, बेशक ये जीत भी परेशान ही करने वाली थी। अलबत्ता, मैं ये सारी बातें सबसे सुनता था लेकिन मां इस बारे में कुछ नहीं बताती थी। उसने कभी भी लड़ाई का ज़िक्र नहीं किया। उसके पास लड़ने के लिए खुद की लड़ाइयां थी।

सिडनी अब चौदह बरस का हो चला था। उसने स्कूल छोड़ दिया था और उसे स्ट्रैंड डाक घर में तार वाले के रूप में काम मिल गया था। सिडनी की पगार और मां की सिलाई मशीन की वज़ह से होने वाली कमाई से हमारा घर किसी तरह ठीक-ठाक चल रहा था लेकिन इसमें मां का योगदान मामूली ही था। वह मज़दूरों का खून चूसने वाली किसी दुकान के लिए काम करती थी और उसे वहां पर ब्लाउज सीने के एवज में एक दर्जन ब्लाउज के लिए एक शिलिंग और छ: पेंस मिलते थे। हालांकि उसे डिजाइन पहले से ही कट कर मिला करते थे, फिर भी एक दर्जन ब्लाउज सीने में उसे पूरे बारह घंटे लग जाया करते थे। मां का रिकार्ड था एक हफ्ते में चौदह दर्जन ब्लाउज सी कर देने का। इससे उसे छ: शिलिंग और नौ पेंस की कमाई हुई थी।

अक्सर रात को मैं अपनी दुछत्ती में लेटा जागता रहता और उसे अपनी मशीन पर झुके काम करते देखा करता। उसका सिर तेल की कुप्पी की रौशनी में झुका रहता और उसका चेहरा नरम छाया में नज़र आता। उसके होंठ तनाव के कारण थोड़े से खुले होते और वह अपनी मशीन पर तेज़ी से सिलाई का काम करती रहती। और उसके इस काम की उबा देने वाली भिन-भिन की आवाज की वजह से मुझे झपकी आ जाती। वह जब भी रात-बेरात इस तरह से देर तक काम करती थी तो उसके सामने एक ही मकसद होता - पैसों की अगली किसी न किसी किस्त की मीयाद सिर पर होती। हमेशा किस्तों की अदायगी की समस्या सिर पर खड़ी होती।

अब एक और संकट सिर पर आ खड़ा हुआ था। सिडनी को कपड़ों के नये जोड़े की ज़रूरत थी। वह अपनी टेलिग्राफ वाली यूनिफार्म हफ्ते के सभी दिन, यहां तक कि रविवारों को भी डाटे रहता था और आखिर एक ऐसा दिन भी आया कि उसके यार दोस्त उसे इस यूनिफार्म को लेकर छेड़ने लगे। इस वज़ह से वह दो हफ्ते तक, उस वक्त तक घर पर ही रहा जब तक मां के पास उसके लिए नीले सर्ज का सूट खरीदने लायक पैसे नहीं हो गये। उसने किसी तरह से अट्ठारह शिलिंग का बंदोबस्त कर ही लिया था। इससे हमारी अर्थव्यवस्था में भारी दिवालियेपन की हालत आ गयी थी। इसलिए मां को मजबूरन हर सोमवार को, जब सिडनी टेलिग्राफ आफिस चला जाता था, सूट गिरवी रखना पड़ता था। उसे सूट के लिए सात शिलिंग मिलते थे। और हर शनिवार को सूट छुड़वा लिया जाता ताकि सिडनी उसे हफ्ते की छुट्टियों के दौरान पहन सके। यह साप्ताहिक व्यवस्था पूरे साल तब तक चलती रही जब तक सूट फट कर तार तार नहीं हो गया। तभी ये झटका लगा।

सोमवार की सुबह मां हमेशा की तरह गिरवी वाली दुकान पर गयी तो दुकानदार हिचकिचाया,"माफ करना, मिसेज चैप्लिन, लेकिन अब हम आपको सात शिलिंग उधार नहीं दे सकते।"

मां हैरान रह गयी थी,"लेकिन क्यों?" उसने पूछा था।

"अब इसमें अच्छा-खासा जोखिम है। पैंट तार-तार हो रही है। देखो तो ज़रा," दुकानदार पैंट की सीट पर हाथ रखते हुए बोला,"आप उसके आर-पार देख सकती हैं।"

"लेकिन इन कपड़ों को अगले हफ्ते छुड़वा लिया जायेगा।" मां ने कहा था।

गिरवी वाले ने सिर हिलाते हुए कहा,"बहुत हुआ तो मैं आपको कोट और वेस्टकोट के लिए तीन शिलिंग दे सकता हूं।"

मां कभी भी रोती नहीं थी लेकिन इस तरह के अचानक आये धक्के को सह न पाने के कारण वह आंसूं बहाती घर वापिस आयी। पूरा हफ्ता घर की गाड़ी खींचने के लिए उसे इन सात शिलिंग का ही सहारा था।

इस बीच मेरे खुद के कपड़े, कम से कम कहूं तो चीथड़े हो रहे थे। हम अष्टम लंकाशायर बाल गोपालों की जो पोशाक थी, उसकी वाली मेरी पोशाक अब तार तार हो चली थी। जहां-तहां थिगलियां लगी हुई थीं। कुहनी पर, पैंट पर, जूतों पर और मोजों पर। और अपनी इसी हालत में मैं स्टॉकवैल के अपने खास नन्हें दोस्त से जा टकराया। मुझे नहीं पता था कि वह केनिंगटन रोड पर क्या कर रहा था, लेकिन उसे देख कर मैं बहुत परेशानी में पड़ गया था। हालांकि वह मुझसे बहुत प्यार से मिला लेकिन मैं अपनी खस्ता हालत के कारण उससे आंखें भी नहीं मिला पर पा रहा था। अपनी परेशानी को छुपाने के लिए मैंने अपना आजमाया हुआ तरीका अपनाया और अपनी बेहतरीन, सधी हुई आवाज में उसे बताया कि चूंकि मैं बढ़ईगिरी की अपनी कक्षा से आ रहा हूं इसलिए मैं ये सब पुराने कपड़े पहने हुए हूं।

लेकिन उसे मेरी इस सफाई में ज़रा सी भी दिलचस्पी नहीं थी। वह जैसे आसमान से गिरा लग रहा था और अपनी हैरानी-परेशानी को छुपाने के लिए दायें बायें देखने लगा। उसने तब मां के बारे में पूछा।

मैंने तत्काल जवाब दिया कि मां तो आजकल गांव गयी हुई है और तब मैंने उसी की तरफ ध्यान देना शुरू किया,"और सुनाओ, आजकल वहीं रह रहे हो क्या?"

"हां।" उसने मुझे ऊपर से नीचे तक इस तरह से घूरते हुए देखा मानो मैंने कोई अपराध कर दिया हो।

"अच्छा, तो मैं जरा चलूंगा," मैंने अचानक कह कर अपनी जान छुड़ायी।

वह सहर्ष मुस्कुराया और अच्छा विदा कह कर चला गया। वह एक तरफ चला और मैं उसकी विपरीत दिशा में बढ़ा। मैं गुस्से और शर्म के कारण गिरते पड़ते भागा जा रहा था।

मां हमेशा कहा करती थी,"तुम हमेशा अपनी मर्यादा का त्याग कर सकते हो, लेकिन हो सकता है तुम्हें कुछ भी न मिले।" लेकिन वह खुद ही इस सूत्र वाक्य का पालन नहीं करती थी और अक्सर मेरी शिष्टता के बोध को ठेस लगती थी। एक दिन जब मैं ब्राम्पटन अस्पताल से लौट रहा था तो मैंने देखा कि मां कुछ सड़कछाप लड़कों को धकिया रही थी क्योंकि वे एक पागल औरत को सता रहे थे। उस औरत ने बुरी तरह से गंदे चीथड़े लपेटे हुए थे और खुद भी गंदी थी। उसका सिर मुंडा हुआ था और ये उन दिनों असामान्य बात समझी जाती थी। लड़के उस पर हँस रहे थे और एक दूसरे को उस पर धकिया रहे थे। और उसे छू नहीं रहे थे मानो उसे छू लेने से उन्हें गंदगी लग जायेगी। वह दुखियारी तब तक हिरणी की तरह सड़क के बीचों-बीच खड़ी रही जब तक जा कर मां ने उसे उन दुष्ट लड़कों से छुड़वा नहीं लिया। तब उस औरत के चेहरे पर पहचान के चिह्न उभरे। उस औरत ने कमज़ोर आवाज में मां को उसके स्टेज के नाम से पुकारा,"तुम मुझे नहीं पहचानती क्या? मैं इवा लेस्टॉक हूं।"

मां ने उसे तुंत पहचान लिया। वह मां के साथ की वैराइटी स्टेज की पुरानी दोस्त थी।

मां की इस बात से मैं इतना परेशान हो गया कि आगे बढ़ गया और आगे कोने पर जा कर मां का इंतज़ार करने लगा। बच्चे मेरे पास से गुज़र गये। वे फब्तियां कस रहे थे और खी खी करके हँस रहे थे। मैं गुस्से से लाल पीला हो रहा था। मैं ये देखने के लिए मुड़ा कि मां को क्या हो गया है। हे भगवान, वह औरत मां के साथ लग ली थी और अब दोनों मेरी तरफ चली आ रही थीं।

मां ने कहा,"तुम्हें नन्हें चार्ली की याद है?"

"तुम याद की बात करती हो, जब वो ज़रा सा था तो मैंने कितनी बार उसे अपनी बांहों में उठाया है।" उस औरत से लाड़ से कहा।

ये विचार ही लिजलिजे थे क्यों कि वह औरत इतनी गंदी और घिनौनी थी। और जब हम चले आ रहे थे तो मुझे इस बात से खासी कोफ्त हो रही थी कि लोग मुड़ मुड़ कर हम तीनों को देख रहे थे।

मां उसे वैराइटी के दिनों से 'डैशिंग इवा लैस्टाक' के नाम से जानती थी। वह उन दिनों आकर्षक और सदाबहार हुआ करती थी, मां ने मुझे ऐसा बताया था। उस औरत ने मां को बताया कि वह बीमार थी और अस्पताल में थी और अस्पताल छोड़ने के बाद से वह मेहराबों के तले और सैल्वेशन आर्मी के रैन बसेरों में ही सो रही थी।

सबसे पहले तो मां ने उसे स्नान के लिए सार्वजनिक स्नानघर में भेजा और उसके बाद, मेरे आतंक की सीमा न रही जब मां उसे अपने साथ हमारी दुछत्ती पर ले आयी। उसकी इस हालत के पीछे उसकी बीमारी ही थी या कोई और कारण, मैं नहीं जान पाया। इससे वाहियात बात और क्या हो सकती थी कि वह सिडनी की आराम कुर्सी वाले बिस्तर में सोयी थी। अलबत्ता, मां ने उसे वे कपड़े निकाल कर दिये जो वह दे सकती थी और उसे दो शिलिंग भी उधार दिये। तीन दिन बाद वह चली गयी और वही आखिरी बार थी जब हमने `डैशिंग इवा लैस्टाक ' के बारे में देखा या सुना था।

पिता के मरने से पहले मां ने पाउनाल टैरेस वाला घर छोड़ दिया था और अपनी एक सखी, गिरजा घर की सदस्या और समर्पित ईसाई महिला मिसेज टेलर के घर में एक कमरा किराये पर ले लिया था। वे एक छोटे कद की, लगभग पचास बरस की चौड़े बदन की महिला थीं। उनका जबड़ा चौकोर था और पीला झुर्रियोंदार चेहरा था। उन्हें गिरजा घर में देखते समय मैंने पाया था कि उनके दांत नकली थे। जब वे गातीं तो उनके दांत उनके ऊपरी जबड़े से जीभ पर गिर जाते। बहुत ही मोहक नज़ारा होता।

उनका व्यवहार प्रभावशाली था और उनके पास अकूत ताकत थी। उन्होंने मां को अपनी ईसाइयत की छत्र-छाया में ले लिया था और अपने बड़े से घर की दूसरी मंज़िल पर सामने की तरफ वाला कमरा बहुत ही वाजिब किराये पर दे दिया था। ये घर कब्रिस्तान के पास था।

उनके पति चार्ल्स डिकेंस के मिस्टर पिकविक की हूबहू प्रतिकृति थे और उनके घर की सबसे ऊपर वाली मंज़िल पर गणित में काम आने वाले रूलर बनाने का अपना कारखाना था। छत पर आसमानी रौशनी आती और मुझे वह जगह बिलकुल स्वर्गतुल्य लगती। वहां बहुत अधिक शांति होती। मैं अक्सर मिस्टर टेलर को काम करते हुए देखता जब वे अपने मोटे मोटे कांच वाले चश्मे से और मैग्नीफाइंग ग्लास से गहराई से देख रहे होते और स्टील का कोई स्केल बना रहे होते और इंच के भी पांचवें हिस्से को नाप रहे होते। वे अकेले काम करते और मैं अक्सर उनके छोटे मोटे काम कर दिया करता।

मिसेज टेलर की एक ही इच्छा थी कि वे किसी तरह अपने पति को ईसाई धर्म की ओर मोड़ दें। उनकी धार्मिक नैतिकता के हिसाब से तो उनके पति पापी ही थे। उनकी बेटी जो शक्ल-सूरत में ठीक अपनी मां पर गयी थी, सिर्फ उसका चेहरा कम सूजा हुआ था और हां, वह काफी जवान भी थी, आकर्षक होती अगर उसका व्यवहार ढीठपने का न होता और उसके तौर-तरीके आपत्तिजनक न होते। अपने पिता की तरह वह भी चर्च नहीं जाती थी। लेकिन मिसेज टेलर ने उन दोनों को धर्म की शरण में लाने की उम्मीद कभी भी नहीं छोड़ी। बेटी अपनी मां की आंखों का तारा थी लेकिन मेरी मां की आंखों का नहीं।

एक दोपहरी को, जब मैं ऊपर वाली मंज़िल पर मिस्टर टेलर को काम करते हुए देख रहा था, मैंने नीचे से मां और मिसेज टेलर के बीच कहा-सुनी की आवाज़ सुनी। मिसेज टेलर बाहर थीं। मुझे नहीं पता कि ये सब कैसे शुरू हुआ लेकिन वे दोनों एक दूसरे पर ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थीं। जब मैं नीचे सीढ़ियों पर पहुंचा तो मां सीढ़ियों के जंगले पर झुकी हुई थी,"तुम अपने आपको समझती क्या हो? औरत जात की लेंड़ी?"

"ओह," बेटी चिल्लायी, "एक ईसाई औरत की जुबान से कितने शानदार फूल झर रहे हैं?"

"चिंता मत करो," मां ने तुरंत जवाब दिया,"ये सब बाइबिल में है। ओल्ड टेस्टामेंट का पांचवां खंड, अट्ठाइसवां अध्याय, सैंतीसवां पद, हां, वहां इसके लिए एक दूसरा शब्द दिया हुआ है। बस, तुम्हें लेंड़ी शब्द ही सूट करेगा।"

इसके बाद हम अपने पाउनाल टैरेस में वापिस चले आये।

केनिंगटन रोड पर थ्री स्टैग्स बार इस तरह की जगह नहीं थी जहां मेरे पिता अक्सर जाया करते लेकिन एक बार वहां से गुज़रते हुए मुझे पता नहीं ऐसा क्यों लगा कि अंदर झांक कर देखना चाहिये कि कहीं वे भीतर तो नहीं बैठे हैं। मैंने सैलून का दरवाजा कुछ ही इंच खोला था कि वे वहां बैठे हुए मुझे दिखायी दिये। वे एक कोने में बैठे हुए थे। मैं वापिस लौटने ही वाला था कि उनके चेहरे पर चमक उभरी और उन्होंने मुझे अपने पास आने का इशारा किया। मैं इस तरह के स्वागत से हैरान था, क्योंकि वे कभी भी दिखावे में विश्वास नहीं रखते थे। वे बहुत बीमार लग रहे थे। आंखें उनकी भीतर को धंसी हुई थीं और उनका शरीर सूज कर बहुत बड़ा लग रहा था। उन्होंने अपना एक हाथ नेपोलियन की तरह अपने वेस्ट कोट में टिका रखा था मानो अपनी सांस की तकलीफ पर काबू पाना चाहते हों। उस शाम वे बेहद बेचैन थे। वे मां और सिडनी के बारे में पूछते रहे और मेरे चलने से पहले उन्होंने मुझे अपनी बांहों में भरा और पहली बार मुझे चूमा। यही वह आखिरी बार था जब मैंने उन्हें जीवित देखा।

तीन सप्ताह के बाद उन्हें सेंट थॉमस अस्पताल में ले जाया गया। पिताजी को वहां ले जाने के लिए उन लोगों को पिताजी को शराब पिलानी पड़ी थी। जब पिताजी को पता चला कि वे कहां हैं तो वे बुरी तरह से लड़े झगड़े। लेकिन उनकी हालत मर रहे आदमी जैसी थी। वे मर रहे थे। हालांकि वे अभी भी बहुत जवान थे, मात्र सैंतीस बरस के, वे जलोदर रोग के कारण मर रहे थे। उन लोगों ने पिताजी के घुटने से चार गैलन पानी निकाला था।

मां उन्हें देखने के लिए कई बार गयी और हर मुलाकात के बाद वह और ज्यादा उदास हो जाती। वह बताती कि पिता फिर उसके पास वापिस आ कर अफ्रीका में नये सिरे से ज़िंदगी शुरू करना चाहते हैं। मैं इस तरह की संभावना से ही खिल उठता। मां सिर हिलाती, क्योंकि वह बेहतर जानती थी,"वे ये बात सिर्फ इसलिए कह रहे थे क्योंकि वे अच्छे दिखना चाहते थे।" मां ने बताया था।

एक दिन जब वह अस्पताल से वापिस आयी तो रेवरेंड जॉन मैकनील एवेंजलिस्ट की बात सुन कर बहुत खफा थी। जब मां पिताजी से मिलने गयी थी तो तो वे पिता से कह रहे थे,"देखो, मिस्टर चार्ली, जब भी मैं तुम्हारी तरफ देखता हूं तो मुझे एक पुरानी कहावत ही याद आती है कि जो जैसा बोएगा, वैसा ही काटेगा।"

"मरते हुए आदमी को दिलासा देने के लिए आप कितनी अच्छी वाणी बोल रहे हैं," मां ने पलट कर जवाब दिया था। कुछ ही दिन बाद पिताजी की मृत्यु हो गयी थी।

अस्पताल वाले जानना चाहते थे कि उनका अंतिम संस्कार कौन करेगा। मां के पास तो एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी इसलिए उसने वैराइटी आर्टिस्ट सहायता निधि का नाम सुझाया। ये थियेटर वालों की एक चैरिटी संस्था थी। इस सुझाव से परिवार के चैप्लिन कुनबे वालों में अच्छा खासा हंगामा मच गया। चैप्लिन परिवार का आदमी खैरात के पैसों से दफनाया जाये, ये बात वे कैसे गवारा कर सकते थे। उस समय पिताजी के एक छोटे भाई अल्बर्ट लंदन में ही थे। वे अफ्रीका से आये हुए थे। उन्होंसने पिताजी को दफनाने का खर्चा उठाने का जिम्मा उठाया।

ताबूत पर सफेद साटन का कफन लपेटा गया था और पिताजी के चेहरे के चारों उसके तरफ डेज़ी के नन्हें नन्हें सफेद फूलों से सजाया गया था। मां का कहना था कि वे इतने सादगी-भरे और मन को छू लेने वाले लग रह थे। मां ने पूछा था कि ये फूल किसने रखवाये हैं। वहां पर मौजूद कर्मचारी ने बताया था कि सुबह सुबह एक औरत एक छोटे-से बच्चे के साथ आयी थी और ये फूल रख गयी थी। वह लुइस थी।

पहली गाड़ी में मां, अंकल अल्बर्ट और मैं थे। टूटिंग तक की यात्रा तनाव पूर्ण थी क्योंकि मां इससे पहले कभी भी अंकल अल्बर्ट से नहीं मिली थी। वह कुछ कुछ ठाठ-बाठ वाले आदमी थे और अभिजात्य संस्कारों वाले शख्स थे। हालांकि वे बहुत विनम्र थे, उनका व्यवहार बर्फ की तरह ठंडा था। उनकी ख्याति एक अमीर आदमी के रूप में थी। ट्रांसवाल में घोड़ों के उनके रैंच थे और बोअर युद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार को घोड़े उपलब्ध कराये थे।

सर्विस के दौरान बरसात होने लगी थी। कब्र खोदने वालों ने फटाफट ताबूत पर मिट्टी के लोंदे फेंके। इससे बहुत ही क्रूर किस्म की आवाज हो रही थी। ये भयावह नज़ारा था और कुल मिला कर बेहद डरावना था इसलिए मैं रोने लगा। इसके बाद रिश्तेदारों ने अपने साथ लायी मालाएं और फूल उस पर डाले। मां के पास डालने के लिए कुछ भी नहीं था, इसलिए उसने मेरा बेशकीमती काले बार्डर वाला रुमाल लिया और मेरे कान में फुसफुसायी,"मेरे लाल, ये हम दोनों की तरफ से।" इसके बाद चैप्लिन परिवार रास्ते में एक पब में खाना खाने के लिए रुक गया और उन्होंने भीतर जाने से पहले हमसे बहुत विनम्रता से पूछा कि हमें कहां छोड़ दिया जाये। और हमें घर छोड़ दिया गया था।

जब हम घर पहुंचे तो घर में खाने को एक दाना भी नहीं था। बीफ के थोड़े शोरबे की एक प्लेट रखी थी। मां के पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उसके पास सिर्फ दो पेंस थे जो उसने सिडनी को खाने का इंतज़ाम करने के लिए दे दिये थे। पिताजी की बीमारी के बाद उसने बहुत कम काम हाथ में लिया था इसलिए अब हफ्ता खत्म होने को था और टेलिग्राफ बाय के रूप में सिडनी की सात शिलिंग हफ्ते की पगार पहले ही खत्म हो चुकी थी। अंतिम संस्कार के बाद हमें भूख लगी हुई थी। सौभाग्य से रद्दी वाला बाहर से गुजर कर जा रहा था। मां के पास तेल का एक पुराना स्टोव था जिसे मां ने बहुत संकोच के साथ अधपेनी में बेचा और उस अधपेनी की ब्रेड लायी जिसे हमने उस शोरबे के साथ खाया।

मां चूंकि पिता की कानूनन विधवा थी इसलिए उसे अगले दिन बताया गया कि वह अस्पताल जा कर उनका सामान वगैरह ले ले। इस सामान में एक काला सूट था जिसमें खून के दाग लगे हुए थे। एक जांघिया था, एक कमीज, एक काली टाई, एक पुराना ड्रेसिंग गाउन, घर पर पहनने की कुछ पुरानी चप्पलें, जिनमें पंजों की तरफ कुछ ठुंसा हुआ था। जब मां ने वह बाहर निकाला तो स्लीपरों में सोने का एक सिक्का बाहर लुढ़क आया। ये भगवान की भेजी हुई सौगात थी।

हफ्तों तक हम अपने बाजू पर काली क्रेप की पट्टी लगाये रहे। शोक का ये संकेत भी मेरे लिए फायदेमंद रहा क्योंकि शनिवार की दोपहर के वक्त जब मैं फूल बेचने के काम धंधे पर निकलता तो मुझे इससे फायदा ही होता। मैंने मां को मना लिया था कि वह मुझे एक शिलिंग उधार दे दे। मैं सीधे ही फूल बाजार गया और नार्सीसस के फूलों के दो बंडल खरीदे और स्कूल से आने के बाद मैं उनके नन्हें-नन्हें बंडल बनाने में जुटा रहा। अगर सब बिक जाते तो मैं सौ प्रतिशत लाभ कमा सकता था। मैं सैलूनों में जाता जहां मैं अपने संभावित ग्राहक तलाशता कहता,"नार्सीसिस मैडम, मिस .. .. नार्सीसिस के फूल मिस।" महिलाएं हमेशा पूछतीं,"कौन था बेटे?" मैं अपनी आवाज फुसफुसाहट के स्तर तक ले आता और बताता,"मेरे पिता।" और वे मुझे टिप देतीं। मां ये देख कर हैरान रह गयी कि मैं सिर्फ दोपहर में काम करके पांच शिलिंग कमा लाया था। एक दिन उसने मुझे झिड़क दिया जब उसने मुझे एक पब से बाहर आते देखा। उस दिन से उसने मेरे फूल बेचने पर पाबंदी लगा दी। उसका ये मानना था कि बार रूम में जा कर इस तरह से फूल बेचना उसकी ईसाईयत को कहीं ठेस लगाता था,"दारू पीने से तुम्हारे पिता मर गये और इस तरह की कमाई से हम पर दुर्भाग्य का ही साया पड़ेगा," उसने कहा। अलबत्ता, उसने सारी कमाई रख ली थी। उसने फिर कभी मुझे फूल बेचने नहीं दिये।

मुझमें धंधा करने की जबरदस्त समझ थी। मैं हमेशा कारोबार करने की नयी-नयी योजनाएं बनाने में उलझा रहता। मैं खाली दुकानों की तरफ देखता, सोचता, इनमें पैसा पीटने का कौन सा धंधा किया जा सकता है। ये सोचना मछली बेचने, चिप्स बेचने से ले कर पंसारी की दुकान खोलने तक होता। हमेशा जो भी योजना बनती, उसमे खाना ज़रूर होता। मुझे बस पूंजी की ही ज़रूरत होती लेकिन पूंजी ही की समस्या थी कि कहां से आये। आखिर मैंने मां से कहा कि वह मेरा स्कूल छुड़वा दे और काम तलाशने दे।

मैंने कई धंधे किये। पहले मैं एक बिसाती की दुकान में ऊपर के काम करने के लिए रखा गया। काम करने के बाद मैं तहखाने में खुशी खुशी बैठा रहता, वहां साबुन, स्टार्च, मोमबत्तियों, मिठाइयों तथा बिस्किटों से घिरा रहता। मैं सारी की सारी मिठाइयां चख कर तब तक देखता रहा जब तक खुद बीमार नहीं पड़ गया।

इसके बाद मैंने थ्रॉगमोर्टन एवेन्यू में हूल एंड किन्स्ले टेलर, बीमा डॉक्टरों के यहां काम किया। ये काम मेरे हिस्से में सिडनी की वज़ह से आया था। उसी ने इस काम के लिए मेरी सिफारिश की थी। मुझे हर हफ्ते के बारह शिलिंग मिलते थे और मुझे रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करना होता था। इसमें डॉक्टरों के चले जाने के बाद दफ्तरों को साफ करने की ड्यूटी भी शामिल थी। रिसेप्शनिस्ट के रूप में मैं बहुत सफल था क्योंकि मैं वहां पर इंतज़ार कर रहे मरीजों का खूब मनोरंजन करता लेकिन जब दफ्तरों की सफाई का नम्बर आता तो मेरा दिल डूबने लगता। इस काम में सिडनी बेहतर था। मैं पेशाब के पॉट साफ करने में बुरा नहीं मानता था, लेकिन दस-दस फुटी खिड़कियों को साफ करना मेरे लिए आकाशगंगा निकालने जैसा था। इसका नतीजा ये हुआ कि दफ्तर गंदे और धूल भरे होते चले गये और एक दिन आया जब मुझे विनम्रतापूर्वक बता दिया गया कि मैं इस काम के लिए बहुत ही छोटा हूं।

जिस वक्त मैंने ये खबर सुनी, मैं अपने आपको संभाल नहीं पाया और रो पड़ा। डॉक्टर किन्स्ले टेलर, जिन्होंने एक बहुत ही अमीर महिला से शादी की थी और उन्हें शादी में लेसेन्स्टर गेट पर बहुत बड़ा मकान मिला हुआ था, ने मुझ पर तरस खाया और मुझसे कहा कि वे मुझे अपने घर में ऊपर के काम के लिए पेजबॉय के रूप में रखवा देंगे। तुरंत ही मेरा दिल बाग बाग हो गया। किसी निजी घर में पेजबॉय, और घर भी कैसा, बहुत खूबसूरत। ये अच्छा काम था। इसका कारण ये था कि मैं घर भर की नौकरानियों का दुलारा बन गया था। वे मुझसे बच्चे की तरह व्यवहार करतीं और रात को बिस्तर पर जाने से पहले गुड नाइट किस देतीं। अगर मेरी किस्मत में लिखा होता तो मैं बटलर बन गया होता। मैडम ने मुझसे कहा कि मैं तहखाने में जा कर उस जगह को साफ करूं जहां पर पैकिंग वाली पेटियों का ढेर लगा हुआ था और कचरे का अम्बार लगा हुआ था जिसे साफ करना, अलग करना और फिर से लगाना था। मेरा ध्यान इस काम से उस वक्त बंट गया जब मेरे हाथ में लगभग आठ फुट लम्बा लोहे का एक पाइप आ गया और मैं उसे बिगुल की तरह बजाने लगा। जिस वक्त मैं उसके मजे ले रहा था, मैडम अवतरित हुईं और मुझे तीन दिन का नोटिस दे दिया गया।

मुझे स्टेशनरी की एक दुकान डब्ल्यू एच स्मिथ एंडरसन में काम करने में बहुत मज़ा आया लेकिन उन्हें जैसे ही पता चला कि मेरी उम्र कम है तो उन्होंने बाहर का रास्ता दिखा दिया। फिर मैं एक दिन के लिए ग्लास ब्लोअर बना। मैंने स्कूल में ग्लास ब्लोइंग के बारे में पढ़ा था और मुझे लगा, ये बहुत ही रोमांचकारी काम होगा। लेकिन गर्मी मेरे सिर पर चढ़ गयी और मुझे बेहोशी की हालत में बाहर लाया गया और रेत की ढेरी पर लिटा दिया गया। यहीं पर इसकी इतिश्री हो गयी। मैं इस इकलौते दिन की पगार लेने भी नहीं गया। इसके बाद मैंने स्ट्रेकर, पिंटर और स्टेशनर्स के यहां काम किया। मैंने वहां पर झूठ बोला कि मैं व्हार्फेडेल पिंटिंग मशीन चला सकता हूं। ये बहुत ही बड़ी मशीन थी। लगभग बीस फुट लम्बी। मैंने इस मशीन को गली से तहखाने में चलते हुए देखा था और मुझे लगा कि इसे चलाना तो बेहद आसान होगा। एक कार्ड पर लिखा था व्हार्फेडेल प्रिंटिंग मशीन के लिए कागज़ चढ़ाने वाला लड़का चाहिये। जब फोरमैन मुझे मशीन के पास लाया तो ये मुझे दैत्याकार सरीखी लगी। इसे चलाने के लिए मुझे पांच फुट ऊंचे एक प्लेटफार्म पर खड़ा होना पड़ा। मुझे लगा मानो मैं एफिल टावर के ऊपर खड़ा हूं।

"मारो इसे," फोरमैन ने कहा।

"क्या मारूं?"

मुझे हिचकिचाते देख, वह हँसा,"तो इसका मतलब तुमने व्हार्फेडेल प्रिंटिंग मशीन पर कभी काम नहीं किया है?"

"मुझे बस, एक मौका दीजिये, मैं एकदम तेजी से इसे चलाना सीख जाऊंगा।"

"इसे मारो" का मतलब था उस दैत्य को शुरू करने के लिए लीवर को खींचो। मशीन घूमने, चलने और घुरघुराने लगी। मुझे लगा ये मशीन तो मुझे ही निगल जायेगी। कागज़ बहुत ही बड़े बड़े थे। इतने बड़े कि आसानी से मुझे एक कागज़ में लपेटा जा सकता था। एक बड़े से गत्ते से मैं कागजों को पंखा करता, उन्हें कोनों से उठाता, और ठीक वक्त पर मशीन के जबड़ों में धर देता ताकि वह दैत्य उन्हें निगल जाये, उस पर छापे और दूसरे सिरे पर वापिस उगल दे। पहले दिन तो मैं उसे इतना घबराया हुआ था कि कहीं ये भूखा दैत्य मुझे ही न चबा जाये। इसके बावजूद मुझे बारह शिलिंग हफ्ते की पगार पर नौकरी पर रख लिया गया।

दिन निकलने से पहले, उन ठंडी सुबहों में काम पर निकलने का अपना ही रोमांच था। गलियां शांत और सुनसान होतीं। इक्का दुक्का छायाएं लोखार्ट के टीरूम की मध्यम रौशनी में नाश्ते के लिए आते जाते दिखायी देतीं। ऐसा लगता मानो आप अपने साथ के लोगों के साथ हैं, उस धुंधलके में गरम चाय पीते हुए और आगे मुंह बाये खड़े दिन भर के काम के बावजूद क्षणिक राहत पाते हुए। और फिर प्रिंटिंग का काम इतना उबाऊ भी नहीं था। बस, हफ्ते के आखिर में काम बहुत करना पड़ता, गिलेटिन के उन लम्बे रोलरों पर से स्याही हटाने का काम करना पड़ता। इन रोलरों का वजन सौ पौंड से भी ज्यादा होता। बाकी कुछ मिला कर काम सहन करने योग्य था। अलबत्ता, वहां पर तीन हफ्ते तक काम करने के बाद मुझे इन्फ्लुंजा ने धर दबोख और मां ने ज़िद की कि मैं वापिस स्कूल की राह पकडूं।

सिडनी अब सोलह बरस का हो चला था। एक दिन वह खुश खुश घर आया क्योंकि उसे अफ्रीका जाने वाले एक जहाज में डोनोवन लाइन पैसेंजर बोट पर बिगुल बजाने वाले का काम मिल गया था। उसका काम था खाने वगैरह के लिए बुलाने के लिए बिगुल बजाना। उसने बिगुल बजाना एक्समाउथ ट्रेनिंग कैम्प में सीख लिया था। अब वह सीखना काम आ रहा था। उसे हर महीने दो पाउंड और दो शिलिंग मिलते और सेकेंड क्लास में तीन मेजों पर सर्व करने के लिए टिप अलग से मिलती। उसे जहाज पर जाने से पहले पैंतीस शिलिंग अग्रिम रूप से मिलने वाले थे। तय था वह ये रकम मां को दे कर जाने वाला था। इस सुखद भविष्य के सपने संजोये हम चेस्टर स्ट्रीट में एक नाई की दुकान के ऊपर दो कमरे वाले मकान में आ गये।

अपनी ट्रिप से जब सिडनी पहली बार लौटा तो ये मौका उत्सव की तरह था। क्योंकि उसके पास टिप से कमाये तीन पाउंड से भी ज्यादा की रकम थी और ये चांदी के थे। मुझे याद है वह अपनी जेबों से बिस्तर पर से अपनी दौलत लुढ़काता जा रहा था। ये पैसे इतने ज्यादा लगे मुझे जितने मैंने अपनी ज़िंदगी में नहीं देखे थे और मैं उन पर से अपने हाथ हटा ही नहीं पा रहा था। मैंने उनकी ढेरियां लगायीं, चट्टे लगाये और उनके साथ तब तक खेलता रहा जब मां और सिडनी ने आखिर कह ही दिया कि मैं नदीदा हूं।

क्या तो शान थी। क्या ही मस्ती थी। ये गर्मी के दिन थे और ये हमारे केक और आइसक्रीम खाने का काल था। इनके अलावा और भी कई विलासिताएं राह देख रही थीं। हमने नाश्ते में ब्लोटर, किप्पर, हैड्डाक मछली खायीं और चाय केक का आनंद लिया, और इतवार के दिन बंद और कटलेट खाये।

सिडनी को सर्दी ने जकड़ लिया और वह कई दिन तक बिस्तर पर पड़ा रहा। मां और मैं उसकी तीमारदारी करते रहे। तभी ये हुआ कि हमने खूब छक कर आइसक्रीम खायी। मैं एक बड़े से गिलास में एक पेनी की ले कर आया। मैं ये गिलास इताल्वी आइसक्रीम की दुकान में ले गया था और वह गिलास और एक पेनी देख कर अच्छा खासा चिढ़ा था। दुकानदार ने सुझाव दिया कि अगली बार मैं आऊं तो अपने साथ एक बाथ टब ले कर आऊं। गर्मियों में हमारा प्रिय ड्रिंक होता था शरबत और दूध। खूब झागदार दूध में बुलबुले छोड़ता शरबत, बस पीते ही तबीयत खुश हो जाती।

सिडनी ने हमें अपनी समुद्री यात्रा के बहुत से रोचक किस्से सुनाये। अभी उसने अपनी यात्रा शुरू भी नहीं की थी एक बार उसकी नौकरी पर ही बन आयी। उसने लंच के लिए पहला बिगुल बजाया। बिगुल बजाने की उसकी प्रेक्टिस नहीं रही थी और सारे फौजी खूब हो हल्ला करने लगे। मुख्य स्टीवर्ड भागता हुआ आया,"ऐय तुम क्या कर रहे हो?"

"सॉरी सर, मेरे होंठ अभी बिगुल पर सेट नहीं हुए हैं।"

"ठीक है, ठीक है, जल्दी से अपने होंठ सेट कर लो नहीं तो जहाज चलने से पहले ही तुम्हें तट पर ही उतार देना पड़ेगा।"

खाने के दौरान किचन के बाहर सब वेटरों की लम्बी लम्बी कतारें लग जातीं जो अपने अपने आर्डर का सामान ले रहे होते। जब तक सिडनी का नम्बर आता, वह अपना आर्डर ही भूल चुका होता और उसे एक बार फिर लाइन के आखिर में खड़ा होना पड़ता। सिडनी ने बताया कि पहले कुछ दिन तो ये हालत रही कि बाकी सब तो अपनी स्वीट डिश खा रहे होते और उसकी मेज पर अभी भी सूप ही सर्व हो रहा होता।

सिडनी तब तक घर पर रहा जब तक सारे पैसे खत्म नहीं हो गये। अलबत्ता, उसे दूसरी ट्रिप के लिए भी बुक कर लिया गया। उसे कम्पनी से एक बार फिर पैंतीस शिलिंग अग्रिम रूप से मिले जो उसने मां को दे दिये। लेकिन ये रकम ज्यादा दिन नहीं चली। तीन ही हफ्ते बाद हम बर्तनों की तली में झांक रहे थे। सिडनी के वापिस आने में अभी भी तीन हफ्ते बाकी थे। मां हालांकि अभी भी अपनी सिलाई मशीन पर काम कर ही रही थी, जो कुछ वह कमा रही थी, हम दोनों के लिए काफी नहीं था। नतीजा ये हुआ कि हम एक बार फिर पाउनाल हॉल लौट आये।

लेकिन मैं कुछ न कुछ जुगाड़ कर ही लिया करता था। मां के पास पुराने कपड़ों का एक ढेर लगा हुआ था। एक दिन शनिवार की सुबह थी। मैंने मां को सुझाव दिया कि क्यों न मैं कोशिश करूं और बाज़ार में जा कर इन्हें बेच आऊं। मां इस बात को ले कर थोड़ी परेशान हो गयी। उसका कहना था कि ये सब किसी काम के नहीं हैं। इसके बावजूद मैंने एक पुरानी चादर में कपड़ों की पोटली बांधी और नेविंगटन बट्ट की ओर चल पड़ा। वहां जा कर मैंने अपना माल असबाब फुटपाथ पर फैलाया और गटर पर खड़े हो कर आवाजें लगानी शुरू कर दीं। मेरी दुकानदारी बहुत ही दयनीय हालत में थी."देखिये साहेबान, मेहरबान, कदरदान," मैंने एक पुरानी कमीज हाथ में उठायी और बोलना शुरू किया,"बोलिये साहेबान क्या देते हैं इसका? एक शिलिंग, छ: पेंस, चार पेंस दो पेंस।" मैं उसे एक पेनी में भी न बेच पाया। लोग-बाग आते, खड़े होते, हैरानी से देखते, और हँसते हुए चले जाते। मैं परेशान होना शुरू हो गया। सामने की जवाहरात की दुकान की खिड़की से वहां के मालिकों ने मुझे देखना शुरू कर दिया। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार, गेलिस की एक जोड़ी जो इतनी खराब नहीं लग रही थी, मैं छ: पेंस में बेचने में सफल हो ही गया। लेकिन मुझे वहां पर खड़े हुए जितनी देर होती जा रही थी, मैं उतना ही बेचैन होता जा रहा था। थोड़ी देर बाद उस जवाहरात की दुकान में से एक महाशय आये और भारी रूसी लहजे में मुझसे पूछने लगे कि मैं इस धंधे में कब से हूं। उसके विनम्र चेहरे के बावजूद मैंने ताड़ लिया कि उसके बात करने के लहजे में मज़ाक उड़ाने का सा भाव था। मैंने उसे बताया कि बस अभी शुरू ही किया है। वह धीरे धीरे अपनी दुकान पर लौट गया और, खींसे निपोरते अपने दो भागीदारों के पास लौट गया और फिर से वे दुकान की खिड़की में से मुझे देखने लगे। अब बहुत हो गया था। मैंने अपनी दुकानदारी समेटी और घर वापिस लौट आया। मैंने मां को बताया कि मैंने छ: पेंस में गेटर्स बेचे हैं तो वह हिकारत से बोली, अच्छे भले थे वो तो, उसे ज्यादा पैसों में बेचा जा सकता था।

ये एक ऐसा वक्त था जब हम किराया देने के बारे में ज्यादा माथा पच्ची नहीं करते थे। हमने आसान तरीका ये अपनाया कि जब किराया वसूल करने वाला आता तो सारा दिन गायब ही रहते। हमारे सामान की कीमत ही क्या थी? दो कौड़ी। उसे कहीं और ढो कर ले जाने में ज्यादा पैसे लगते। अलबत्ता, हमारी मंजिल एक बार फिर 3 पाउनाल टेरेस थी।

उसी समय मुझे एक ऐसे बूढ़े आदमी और उसके बेटे के बारे में पता चला जो केनिंगटन रोड के पिछवाड़े की तरफ एक घुड़साल में काम करते थे। वे खिलौने बनाने वाले घुमंतु लोग थे और ग्लासगो से आये थे। वे लोग खिलौने बनाते थे और शहर दर शहर घूमते हुए उन्हें बेचते थे। वे बंधन मुक्त थे और उन पर कोई जिम्मेवारी नहीं थी, इसलिए मैं उनसे ईर्ष्या करता था। उनके धंधे के लिए बहुत ही कम पूंजी की ज़रूरत थी। एक शिलिंग की मामूली रकम लगा कर वे धंधा शुरू कर सकते थे। वे जूतों के डिब्बे इकट्ठे करते। कोई भी दुकानदार खुशी खुशी ये डिब्बे उन्हें दे देता। फिर वे अंगूरों की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाला बुरादा जुटाते। ये भी उन्हें सेंत मेंत में मिल जाता। उन्हें शुरुआत में जिन मदों के लिए पूंजी लगानी पड़ती, वे थीं, एक पेनी की गोंद, एक पेनी के क्रिस्मस वाली रंगीन पन्नियां, और दो पेनी के रंगीन झालर के गोले। एक शिलिंग की पूंजी से वे सात दर्जन नावें बना लेते और एक एक नाव एक एक पेनी की बिकती। नाव के दोनों तरफ के हिस्से जूतों के डिब्बों में से काट लिये जाते, और उन्हें गत्ते के तले के साथ सी दिया जाता। साफ सतह पर गोंद फेर दिया जाता और फिर उस पर कॉर्क का बुरादा छिड़क दिया जाता। मस्तूलों को रंगीन झालरों से सजा दिया जाता और सबसे ऊपर वसले मस्तूल, नाव के आगे और पीछे वाले हिस्से पर और पाल फैलाने के डंडों के आखिरी सिरे पर लाल, पीले और नीले झंडे लगा दिये जाते। सौ या उससे भी अधिक इस तरह की रंगीन पन्नियों वाली नावें ग्राहकों को आकर्षित करतीं और इन्हें आसानी से बेचा जा सकता था।

हमारे परिचय का नतीजा ये हुआ कि मैं नावें बनाने में उनकी मदद करने लगा और जल्दी ही मैं उनके हुनर से वाकिफ हो गया। जब वे लोग हमारा पड़ोस छोड़ कर गये तो मैं खुद उनके धंधे में उतर गया। छ: पेंस की मामूली सी पूंजी और कार्ड बोर्ड काटने से हाथों में हुए छालों के साथ मैं एक ही हफ्ते में तीन दर्जन नावें बनाने में कामयाब हो गया था।

लेकिन हमारी परछत्ती पर इतनी जगह नहीं थी कि मां के काम और मेरे धंधे के लिए जगह हो पाती। इसके अलावा मां की शिकायत थी कि उसे उबलते हुए गोंद की बू से उबकाई आती है और ये भी था कि गोंद का डिब्बा हर समय उसके सीये जाने वाले कपड़ों के लिए मुसीबत बन रहा था। संयोग से, सारे घर भर में ये कपड़े बिखरे ही रहते। अब चूंकि मेरा योगदान मां के योगदान की तुलना में मामूली ही था, मेरी कला को तिलांजलि दे दी गयी।

इन दिनों हम अपने नाना से बहुत कम मिले थे। पिछले एक बरस से उनकी सेहत ठीक नहीं चल रही थी। उनके हाथ गठिया की वजह से सूज गये थे और इस कारण वे जूते गांठने का अपना धंधा नहीं कर पाते थे। पहले के वक्त में जब भी उनसे बन पड़ता, वे एकाध सिक्का दे कर मां की मदद कर दिया करते थे। कभी कभी वे हमारे लिए खाना भी बना दिया करते। वे ओट के आटे और प्याज को दूध में उबाल कर और उस पर नमक और काली मिर्च बुरक कर शानदार दलिये जैसा व्यंजन बनाया करते थे। सर्दी की रातों में ठंड का मुकाबला करने के लिए ये हमारा सबसे बढ़िया खाना होता।

जब मैं बच्चा था तो मैं नाना को हमेशा खरदिमाग और खड़ूस बूढ़ा समझा करता था जो मुझे हर वक्त किसी न किसी बात के लिए टोकते ही रहते थे। कभी व्याकरण के लिए तो कभी तमीज के लिए। इन छोटी-मोटी मुठभेड़ों के कारण ही मैंने उन्हें नापसंद करना शुरू कर दिया था। अब वे अस्पताल में अपने जोड़ों के दर्द की वजह से पड़े हुए थे और मां उन्हें रोज़ देखने के लिए अस्पताल जाती। अस्पताल की ये विजिटें बहुत फायदे की होतीं क्योंकि वह अक्सर थैला भर ताज़े अंडे ले कर वापिस आती। ये हमारी मुफ़लिसी के दिनों में विलासिता की तरह होते। जब वह खुद न जा पाती तो मुझे भेज देती। मुझे ये देख कर हमेशा बहुत हैरानी होती जब मैं नाना को बहुत ज्यादा सहमत और मेरे आने से खुश पाता। वे नर्सों में खासे लोकप्रिय थे। बाद की ज़िंदगी में उन्होंने मुझे बताया था कि वे नर्सों के साथ चुहलबाजी करते और उन्हें बताते कि जोड़ों के दर्द के बावज़ूद उनकी सारी मशीनरी काम से बेकार नहीं हुई है। इस तरह की अश्लील चुहलबाजी नर्सों को खुश कर देती। जब उनके जोड़ों का दर्द काबू में रहता तो वे जा कर रसोई में काम करते, और इस तरह से हमारे पास अंडे आते। विजिट वाले दिनों में वे आम तौर पर अपने बिस्तर पर ही होते और अपने बिस्तर के पास वाले केबिनेट से चुपके से अंडों का एक बड़ा-सा थैला थमा देते, जिसे मैं चलने से पहले नाविकों वाली अपनी बनियान में छुपा लेता।

हम कई-कई हफ्ते अंडों पर ही गुज़ार देते। उनका कुछ न कुछ बना ही लेते। उबले हुए, तले हुए या उनका कस्टर्ड ही बना लेते। बेशक नाना इस बात का विश्वास दिलाते कि सारी नर्सें उनकी दोस्त हैं और कमोबेश जानती हैं कि क्या कुछ चल रहा है, अस्पताल के वार्ड से उन अंडों के साथ बाहर निकलते समय हमेशा मुझे खटका लगा रहता। कभी लगता कि मैं मोम से चिकने फर्श पर फिसल कर गिर पड़ूंगा या मेरा फूला हुआ पेट पकड़ में आ जायेगा। इस बात की हैरानी होती थी कि जब भी मैं अस्पताल से बाहर आने को होता, सारी की सारी नर्सें वहां से गायब हो जातीं। हमारे लिये ये बहुत ही दु:खद दिन था जब नाना को अपने जोड़ों के दर्द से आराम आ गया और उन्हें अस्पताल छोड़ना पड़ा।

अब छ: सप्ताह बीतने को आये थे और सिडनी अब तक नहीं लौटा था। शुरू-शुरू में तो मां इससे इतनी चिंता में नहीं पड़ी लेकिन एक और हफ्ते की देरी के बाद मां ने डोनोवन एंड कैसल लाइन नाम के जहाज के दफ्तर को लिखा तो वहां से ये खबर मिली कि उसे जोड़ों के दर्द के इलाज के लिए केप टाउन के तट पर जहाज से उतार दिया गया है। इस खबर से मां चिंता में पड़ गयी और इससे उसकी सेहत पर बुरा असर पड़ा। अभी भी वह सिलाई मशीन पर काम कर रही थी और मैं भी इस मामले में किस्मत वाला था कि मुझे स्कूल के बाद एक परिवार में नृत्य के लैसन देने का काम मिल गया था और मुझे हफ्ते के पांच शिलिंग मिल जाया करते थे।

लगभग इन्हीं दिनों मैक्कार्थी परिवार केनिंगटन रोड पर रहने आया। मिसेज मैक्कार्थी आयरिश कामेडियन रही थीं और मां की सहेली थीं। उनकी शादी एक सर्टिफाइड एकांउटेंट वाल्टर मैक्कार्थी से हुई थी। लेकिन जब मां को मज़बूरन स्टेज छोड़ देना पड़ा तो हम लोगों की मैक्कार्थी परिवार से मिलने-जुलने की संभावना ही नहीं रही और अब वे सात बरस के बाद एक बार फिर मिल रहे थे। अब वे लोग केनिंगटन रोड के खास इलाके में वाल्कॉट मैन्सन में रहने के लिए आ गये थे।

उनका बेटा वैली मैक्कार्थी और मैं लगभग एक ही उम्र के थे। जब हम छोटे थे तो बड़े लोगों की नकल किया करते थे मानो हम रंगारंग कार्यक्रम के कलाकार हों। हम काल्पनिक सिगार पीते, अपनी कल्पना की घोड़ी वाली बग्घी में सैर करते, और अपने माता-पिता का खूब मनोरंजन किया करते थे।

अब चूंकि मैक्कार्थी परिवार वाल्कॉट मैन्सन में रहने के लिए आ गया था, मां उनसे मिलने शायद ही कभी गयी हो लेकिन मैंने और वैली ने पक्की दोस्ती कर ली थी। स्कूल से वापिस लौटते ही मैं भाग कर मां के पास यह पूछने के लिए जाता कि मेरे लायक कोई काम तो नहीं है, फिर मैक्कार्थी परिवार के यहां भागा-भागा पहुंच जाता। हम वाल्कॉट मैन्सन के पिछवाड़े थियेटर खेलते। मैं चूंकि निर्देशक बनता इसलिए मैं हमेशा खलनायक वाले पात्र अपने लिए रखता। मैं अपने आप ही ये जानता था कि खलनायक का पात्र नायक की तुलना में ज्यादा रंगीन होता है। हम वैली के खाने के समय तक खेलते रहते। आम तौर पर मुझे भी बुलवा लिया जाता। खाने के समय के आस-पास मैंने अपने आप को उपलब्ध कराने के अचूक खुशामदी तरीके खोज निकाले थे। अलबत्ता, ऐसे मौके भी आते जब मेरी सारी तिकड़में काम न आतीं और मैं संकोच के साथ घर लौट आता। मां मुझे देख कर हमेशा खुश होती और मेरे खाने के लिए कुछ न कुछ बना देती। कभी शोरबे में तली हुई ब्रेड या नाना के यहां से जुटाये गये अंडों का कोई पकवान और एक कप चाय। वह मुझे कुछ न कुछ पढ़ कर सुनाती या हम दोनों एक साथ खिड़की पर बैठ जाते और वह नीचे सड़क पर जा रहे राहगीरों के बारे में मज़ेदार बातें करके मेरा दिल बहलाती। उनके बारे में वह किस्से गढ़ कर सुनाती। यदि कोई आदमी खुशमिजाज, फिरकी जैसी चाल के साथ जा रहा होता तो मां कहता,"देखो जा रहे हैं श्रीमान हेपांडस्कौच, बेचारे शर्त लगाने की जगह जा रहे हैं। अगर आज उनकी किस्मत ने साथ दिया तो वह अपनी गर्लफ्रेंड के लिए दो सीटों वाली पुरानी साइकिल खरीदेंगे।"

जब कोई आदमी धीमी गति से कदम गिनते हुए गुजरता तो मां का किस्सा होता,"देखो बेचारे को, घर जा रहा है और उसे पता है आज खाने में उसे फिर से वही कद्दू मिलने वाला है। वह कद्दू से नफरत करता है।"

कोई अपनी ऐंठ में ही चला जा रहा होता तो मां कहती,"देखो, ये सभ्य समाज के सज्जन जा रहे हैं। लेकिन फिलहाल तो वे अपनी पैंट में हो गये छेद की वजह से खासे परेशान हैं।"

इसके बाद एक और आदमी तेज-तेज चाल से लपकता हुआ गुज़र जाता,"उस भले आदमी ने अभी अभी ईनो की खुराक ली है और . ....।" और इस तरह से किस्से चलते रहते और हम हँस-हँस कर दोहरे हो जाते।

एक और सप्ताह बीतने को आया था लेकिन अभी भी सिडनी का कोई समाचार नहीं मिला था। अगर मैं और छोटा होता और मां की चिंता के प्रति ज्यादा संवेदनशील होता तो मैं महसूस कर सकता था कि उसके दिल पर क्या गुज़र रही थी। मैंने तब इस बात को देखा होता कि वह कई दिनों से खिड़की की सिल पर ही बैठी बाहर देखती रहती थी। उसने कई दिन से कमरे को साफ तक नहीं किया था और बेहद शांत होती चली गयी थी। मैं शायद तब भी चिंता में पड़ा होता जब कमीज़ें बनाने वाली फर्म ने उसके काम में मीन-मेख निकालनी शुरू कर दी थी और उसे और काम देना बंद कर दिया था और जब वे बकाया किस्तों की अदायगी न होने के कारण सिलाई मशीन ही उठा कर ले गये और जब नृत्य के पाठ से होने वाली मेरी पांच शिलिंग की कमाई भी अचानक बंद हो गयी तो शायद इस सबके बीच मैंने इस बात पर ध्यान दिया हो कि मां लगातार उदासीन और किंकर्तव्यविमूढ़ बनी रही थी।

अचानक मिसेज मैक्कार्थी की मृत्यु हो गयी। वे कुछ अरसे से बीमार चल रही थीं। उनकी हालत खराब होती चली गयी और अचानक वे गुज़र गयी थीं। तत्काल ही मेरे दिमाग में ख्यालों ने हमला बोल दिया। कितना अच्छा होता अगर मिस्टर मैक्कार्थी मां से विवाह कर लेते। वैली और मैं तो अच्छे दोस्त थे ही। इसके अलावा, ये मां की समस्याओं का आदर्श हल भी होता।

संस्कार के तुरंत बाद मैंने मां से इस बात बारे में बात की,"अब तुम इसे अपनी दिनचर्या बना लो मां कि अक्सर मिस्टर मैक्कार्थी से मिल लिया करो। मैं शर्त बद कर कह सकता हूं कि वे तुमसे शादी कर लेंगे।"

मां कमजोरी से मुस्कुरायी,"उस बेचारे को एक मौका तो दो," मां ने जवाब दिया।

"मां, अगर तुम ढंग से तैयार हो जाया करो और अपने आपको आकर्षक बना लो, जैसा तुम पहले हुआ करती थी तो वे जरूर तुम्हें पसंद कर लेंगे। लेकिन तुम तो अपनी तरफ से कोई कोशिश ही नहीं करती, बस, इस गंदे कमरे में पसरी बैठी रहती हो और वाहियात नज़र आती हो।"

बेचारी मां, मैं अपने इन शब्दों पर कितना अफ़सोस करता हूं। मैं इस बात को कभी सोच ही नहीं पाया कि वह खाना पूरा न मिलने के कारण कमज़ोर थी। इसके बावजूद अगले दिन, पता नहीं उसमें कहां से इतनी ताकत आ गयी, उसने सारा कमरा साफ-सूफ कर दिया। स्कूल में गर्मियों की छुट्टियां शुरू हो गयी थीं। इसलिए मैंने सोचा, मैक्कार्थी परिवार के यहां थोड़ा पहले ही चला जाऊं। अपने उस मनहूस दड़बे से बाहर निकलने का कोई तो बहाना चाहिये ही था। उन्होंने मुझे लंच तक रुकने का न्यौता दिया था। लेकिन मुझे ऐसा आभास हो रहा था कि मुझे मां के पास वापिस लौट जाना चाहिये। जब मैं पाउनाल टैरेस वापिस पहुंचा तो पड़ोस के कुछ बच्चों ने मुझे गेट के पास ही रोक लिया,"तुम्हारी मां पागल हो गयी है, एक छोटी सी लड़की ने कहा।

ये शब्द तमाचे की तरह मेरे मुंह पर आ लगे।

"क्या मतलब है तुम्हारा?" मैं घिघियाया।

"ये सच है," दूसरी ने बताया।

"वो सारे घरों के दरवाजे खटखटाती फिर रही थी और हाथ में कोयले के टुकड़े ले कर बांटती फिर रही थी कि ये बच्चों के लिए जन्मदिन का उपहार है। चाहो तो तुम मेरी मां से भी पूछ सकते हो।"

और कुछ सुने बिना मैं रास्ते से दौड़ा, खुले दरवाजे से घर के भीतर गया, फलांगता हुआ सीढ़ियां चढ़ा और अपने कमरे का दरवाजा खोला। एक पल के लिए अपनी सांस पर काबू पाने के लिए मैं थमा और मां को गहरी नज़र से देखने लगा। ये गरमी की दोपहरी थी और माहौल घुटा-घुटा सा और दबाव महसूस कराने वाला था। मां हमेशा की तरह खिड़की पर बैठी हुई थी। वह धीमे से मुड़ी और उसने मेरी तरफ देखा। उसका चेहरा पीला और पीड़ा से ऐंठा हुआ लग रहा था।

"मां," मैं लगभग चिल्ला उठा।

"क्या हुआ?" मां ने निर्विकार भाव से पूछा।

तब मैं दौड़ कर गया और अपने घुटनों के बल गिरा और उसकी गोद में अपना मुंह छुपा लिया। ज़ोर से मेरी रुलाई फूट पड़ी।

"रुको, रुको, बेटे," वह हौले से मेरा सिर सहलाते हुए बोली,"क्या हो गया मेरे बच्चे?"

"तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है," मैं सुबकते हुए चिल्लाया।

वह मुझे आश्वस्त करते हुए बोली,"मैं तो बिल्कुल चंगी हूं।"

वह बहुत ज्यादा खोयी-खोयी और ख्यालों में डूबी रही थी।

"नहीं,नहीं, वे सब बता रहे हैं कि तुम सब घरों में फिरती रही थी और.. .. और ..." मैं अपना वाक्य पूरा नहीं कर पाया, लेकिन सुबकता रहा।

"मैं सिडनी को तलाश कर रही थी," वह कमज़ोरी से बोली,"वे उसे मुझसे दूर रखे हुए हैं।"

तब मुझे पता चला कि जो कुछ बच्चे बता रहे थे, वह सही था।

"ओह मां, इस तरह की बातें मत करो। नहीं, नहीं," मैं सुबकने लगा,"मैं तुम्हारे लिए डॉक्टर बुलवाता हूं।"

वह मेरा सिर सहलाते हुए बोलती रही,"मैक्कार्थी जी को मालूम है कि वह कहां है और वे उसे मुझे दूर रखे हुए हैं।"

"मम्मी, मम्मी, मुझे जरा डाक्टर को बुलवा लेने दो," मैं चिल्लाया। मैं उठा और सीधे दरवाजे की तरफ लपका।

मां ने दर्दभरी निगाहों से मेरी तरफ देखा और पूछा,"कहां जा रहे हो?"

"डॉक्टर को लिवाने। मुझे ज्यादा देर नहीं लगेगी।"

मां ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन मेरी तरफ चिंतातुर निगाहों से देखती रही। मैं तेजी से लपक कर नीचे गया और मकान मालकिन के पास पहुंचा।

"मुझे तुरंत डॉक्टर को बुलवाना पड़ेगा। मां की हालत ठीक नहीं है।"

"हमने पहले ही डॉक्टर को बुलवा लिया है।" मकान मालकिन ने बताया।

खैराती डॉक्टर बूढ़ा और चिड़चिड़ा था। मकान मालकिन की दास्तान सुन लेने के बाद, जो कमोबेश बच्चों के बताये किस्से जैसी ही थी, उसने मां की सरसरी तौर पर जांच की।

"पागल . . . इसे आप अस्पताल भिजवाइये," कहा उसने।

डॉक्टर ने एक पर्ची लिखी। दूसरी बातों के अलावा इसमें ये लिखा था कि वह कुपोषण की मरीज थी। डॉक्टर ने इसका मतलब मुझे ये बताया कि उसे पूरी खुराक नहीं मिलती रही है।

मकान मालकिन ने मुझे दिलासा देते हुए कहा,"ठीक हो जायेगी बेटा, और उसे वहां खाना भी ठीक तरह से मिलेगा।"

मकान मालकिन ने मां के कपड़े-लत्ते जमा करने में मेरी मदद की और उसे कपड़े पहनाये। मां एक बच्चे की तरह सारी बातें मानती रही। वह इतनी कमज़ोर थी कि उसकी इच्छा शक्ति ने मानो उसका साथ छोड़ दिया हो। जब हम घर से चले तो पास-पड़ोस के बच्चे और पड़ोसी मजमा लगाये गेट के पास खड़े थे और इस अनहोनी को देख रहे थे।

अस्पताल लगभग एक मील दूर था। जब हम वहां के लिए चल रहे थे तो मां कमज़ोरी के कारण किसी शराबी औरत की तरह लड़खड़ा कर चल रही थी और दायें-बायें झूम रही थी। मैं उसे किसी तरह संभाले हुए था। उस दोपहरी में धूप का तीखापन हमें अपनी गरीबी का अहसास बेदर्दी से करवा रहा था। जो लोग हमारे आस पास से गुज़र कर जा रहे थे जरूर सोच रहे होंगे कि मां ने पी रखी है, लेकिन मेरे लिए वे सपने में अजगरों की तरह थे। वह बिल्कुल भी नहीं बोली लेकिन शायद वह जानती थी कि उसे कहां ले जाया जा रहा है और उसे वहां पहुंचने की चिंता भी थी। रास्ते में मैंने उसे आश्वस्त करने की कोशिश की और वह मुस्कुरायी भी। लेकिन यह मुस्कुराहट बेहद कमज़ोर थी।

आखिरकार जब हम अस्पताल में पहुंचे तो एक युवा डॉक्टर ने मां को अपनी देखभाल में ले लिया। नोट को पढ़ने के बाद उसने दयालुता से कहा,"ठीक है मिसेज चैप्लिन, आप इधर से आइये।"

मां ने चुपचाप उसकी बात मान ली। लेकिन जब नर्सें उसे ले जाने लगीं तो वह अचानक मुड़ी और दर्द भरी निगारहों से मुझे देखने लगी। उसे पता चल गया था कि वह मुझे छोड़ कर जा रही है।

"मां, मैं कल आऊंगा," मैंने कमज़ोर उत्साह से कहा।

जब वे उसे ले जा रहे थे तो वह पीछे मुड़ मुड कर मेरी तरफ चिंतातुर निगाहों से देख रही थी। जब वह जा चुकी तो डाक्टर ने मुझसे कहा,"अब तुम्हा रा क्या होगा, मेरे नौजवान दोस्त?"

अब तक मैं यतीनखानों के स्कूलों की बहुत रोटियां तोड़ चुका था इसलिए मैंने लापरवाही से जवाब दिया,"मैं अपनी आंटी के यहां रह लूंगा।"

जब मैं अस्पताल से घर की तरफ वापिस लौट रहा था मैं सिर्फ सुन्न कर देने वाली उदासी ही महसूस कर पा रहा था। इसके बावजूद मैं राहत महसूस कर रहा था। क्योंकि मैं जानता था कि अस्पताल में मां की बेहतर देखभाल हो पायेगी बजाये घर के अंधेरे में बैठे रहने के जहां खाने को एक दाना भी नहीं हैं लेकिन जब वे लोग उसे ले जा रहे थे जो जिस तरह से उसने दिल चीर देने वाली निगाह से मुझे देखा था, वह मैं कभी भी भूल नहीं पाऊंगा। मैंने उसके सभी सहन करने के तरीकों के बारे में सोचा, उसकी चाल के बारे में सोचा, उसके दुलार और उसके प्यार के बारे में सोचा, और मैंने उस कृष काया के बारे में सोचा जो थकी हारी नीचे आती थी और अपने ही ख्यालों में खोयी रहती थी और मुझे अपनी तरफ लपकते हुए आते देखते ही जिसके चेहरे पर रौनक आ जाती थी। किस तरह से वह एकदम बदल जाती थी और जब मैं उसके लिफाफे की तलाशी लेने लगता था जिसमें वह मेरे और सिडनी के लिए अच्छी अच्छी च़ाजें लाती थी तो उसके चेहरे के भाव कितने अच्छे हो जाते थे और वह मुस्कुराने लगती थी। यहां तक कि उस सुबह भी उसने मेरे लिए कैंडी बचा कर रखी थी और जिस वक्त मैं उसकी गोद में रो रहा था, उसने मुझे कैंडी दी थी।

मैं सीधा घर वापिस नहीं गया। मैं जा ही नहीं सका। मैं नेविंगटन बट्स मार्केट की तरफ मुड़ गया और दोपहर ढलने तक दुकानों की खिड़कियों में देखता रहा। जब मैं अपनी परछत्ती पर वापिस लौटा तो वह हद दरजे तक खाली-खाली लग रही थी। एक कुर्सी पर पानी का टब रखा हुआ था। पानी से आधा भरा हुआ। मेरी दो कमीजें और एक बनियान उसमें भिगोने के लिए रखे हुए थे। मैंने तलाशना शुरू किया। घर में खाने को कुछ भी नहीं था। अल्मारी में सिर्फ चाय की पत्ती का आधा भरा पैकेट रखा हुआ था। मेंटलपीस पर मां का पर्स रखा हुआ था जिसमें मुझे तीन पेनी के सिक्के और गिरवी वाली दुकान की कई पर्चियां मिलीं। मेज के कोने पर वही कैंडी रखी हुई थी जो उसने मुझे सुबह दी थी। जब मैं अपने आपको संभाल नहीं पाया और फूट फूट कर रोया।

भावनात्मक रूप से मैं चुक गया था। उस रात मैं गहरी नींद सोया। सुबह मैं जागा तो कमरे का खालीपन भांय भांय कर रहा था। फर्श पर बढ़ती आती सूर्य की किरणें जैसे मां की गैर मौजूदगी का अहसास करवा रही थीं। बाद में मकान मालकिन आयी और बताने लगी कि मैं वहां पर तब तक रह सकता हूं जब तब वह कमरा किराये पर नहीं दे देती और अगर मुझे खाने की ज़रूरत हो तो मुझे कहने भर की देर होगी। मैंने उसका आभार माना और उसे बताया कि जब सिडनी वापिस आयेगा तो उसके सारे कर्जे उतार देगा। लेकिन मैं इतना शरमा रहा था कि खाने के लिए कह ही नहीं पाया।

हालांकि मैंने मां से वायदा किया था कि अगले दिन उससे मिलने जाऊंगा लेकिन मैं नहीं गया। मैं जा ही नहीं पाया। जाने का मतलब उसे और विचलित करना होता। लेकिन मकान मालकिन डॉक्टर से मिली। डॉक्टर ने उसे बताया कि मां को पहले ही केन हिल पागल खाने में ले जाया जा चुका है। इस उदासी भरी खबर ने मेरी आत्मा पर से बोझ हटा दिया क्योंकि केन हिल पागलखाना वहां से बीस मील दूर था और वहां तक जाने का मेरे पास कोई जरिया नहीं था। सिडनी जल्दी ही लौटने वाला था और तब हम दोनों उसे देखने जा पाते। पहले कुछ दिन तक तो मैं न अपने किसी परिचित से मिला और न ही किसी से बात ही की।


मैं सुबह सुबह ही घर से निकल जाता और सारा दिन मारा मारा फिरता। मैं कहीं न कहीं से खाने का जुगाड़ कर ही लेता। इसके अलावा, एक आध बार का खाना गोल कर जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। एक सुबह जब मैं चुपके से सरक कर बाहर जा रहा था तो मकान मालकिन की निगाह मुझ पर पड़ गयी और उसने पूछा कि क्या मैंने नाश्ता किया है।

मैंने सिर हिलाया, वह मुझे अपने साथ ले गयी,"तब चलो मेरे साथ," उसने अपनी भारी आवाज में कहा।

मैं मैक्कार्थी परिवार से दूर दूर ही रहा क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि उन्हें मां के बारे में पता चले। मैं किसी भगोड़े सैनिक की तरह सबकी निगाहों से बचता ही रहा।

मां को गये एक सप्ताह बीत चुका था और मैंने राम भरोसे रहने की आदत डाल ली थी जिस पर न तो अफसोस किया जा सकता था और न ही उसे आनंददायक ही कहा जा सकता था। मेरी सबसे बड़ी चिंता मकान मालकिन थी क्योंकि अगर सिडनी वापिस न आया तो देर सबेर वह मेरे बारे में सुधारगृह वालों को बता ही देगी और मुझे एक बार फिर हैनवेल स्कूल में भेज दिया जायेगा, इसलिए मैं उसके सामने पड़ने से कतरा रहा था और कई बार तो बाहर ही सो जाता।

मैं लकड़ी चीरने वाले कुछ लोगों से जा टकराया जो केनिंगटन रोड के पिछवाड़े की तरफ एक घुड़साल में काम करते थे। ये सड़क छाप से दिखने वाले लोग थे जो एक अंधेरे से भरे दालान में काम करते थे और फुसफुसा कर बातें करते, सारा दिन लकड़ियां चीरते और कुल्हाड़ी से उनकी फांकें तैयार करते। बाद में वे उनके आधी आधी पेनी के बंडल बना देते। मैं उनके खुले दरवाजे के आस पास मंडराता रहता और उन्हें काम करते हुए देखता। उनके पास एक फुट का लकड़ी का गुटका होता। वे उसकी पतली पतली फांकें बनाते और फिर से इन फांकों को तीलियों में बदल डालते। वे इतनी तेजी से लकड़ियां चीरते कि मैं हैरान हो कर देखता ही रह जाता। मुझे उनका ये काम बेहद आकर्षित करता। जल्द ही मैं उनकी मदद करने लगा। वे अपने लिए लकड़ी के लट्ठे इमारतें गिराने वाले ठेकेदारों से लाते और उन्हें ढो कर शेड तक लाते, उनके चट्टे बना कर रखते। इस काम में पूरा एक दिन लग जाता। फिर वे एक दिन लकड़ियां चीरने का काम करते और उससे अगले दिन उसकी तीलियां बनाते। शुक्रवार और शनिवार वे जलावन की लकड़ियां बेचने के लिए निकलते लेकिन बेचने के काम में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। शेड में काम करना कहीं ज्यादा रोमांचक लगता था।

वे लोग तीस और चालीस बरस की उम्र के बीच के शालीन, शांत लोग थे हालांकि वे बरताव बड़ी उम्र के लोगों का करते और लगते भी ज्यादा उम्र के थे। बॉस (जैसा कि हम उसे कहा करते थे) मधुमेह की वजह से लाल नाक वाला था। उसके ऊपर के दांत झड़ गये थे, बस एक ही दांत लटकता रहता लेकिन फिर भी न जाने क्यों उसके चेहरे में अपनेपन का अहसास होता था। अच्छा लगता था वह। वह अजीब तरीके से हँसता जिससे उसका इकलौता दांत दिखायी देने लगता। जब चाय के लिए एक और कप की ज़रूरत होती तो वह दूध का टिन उठाता, उसे धोता, पोंछता और कहता,"क्या ख्याल है इसके बारे में?"

दूसरा आदमी हालांकि सहमत लगता, शांत, सूजे से चेहरे वाला, मोटे होंठों वाला, व्यक्ति था। वह बहुत धीरे धीरे बोलता, एक बजे के करीब बॉस मेरी तरफ देखता,"ऐय क्या तुमने कभी चीज़ की पपड़ी से बना अधपके मांस का स्वाद लिया है?"

"हमने इसे कई बार खाया है," मैं जवाब देता।

तब ठहाके लगाते हुए और खींसे निपोरते हुए वह मुझे दो पेंस देता और मैं ऐश की राशन की दुकान पर जाता, ये कोने पर चाय की दुकान थी। वह मुझे पसंद करता था और मेरे पैसों पर हमेशा ढेर सारी चीजें दे दिया करता। मैं वहां से एक पेनी की चीज़ की पपड़ी लेता, और एक पेनी की बेड। चीज़ को धो लेने और उसकी पपड़ियां बना लेने के बाद हम उसमें पानी मिलाते, थोड़ा नमक और काली मिर्च डालते, कई बार बॉस उसमें थोड़ी सी सूअर की चर्बी और कतरे हुए प्याज भी छोड़ देता और ये सारी चीजें मिल कर चाय के कैन के साथ बहुत ही पेट भर कर खाने वाला मामला हो जाता।

हालांकि मैं कभी पैसों के लिए पूछता नहीं था, हफ्ता बीतने पर बॉस ने मुझे छ: पेंस दिये। ये मेरे लिए सुखद आश्चर्य था। जो, जिसका चेहरा फूला हुआ था, को मिर्गी के दौरे पड़ते। तब बॉस उसे होश में लाने के लिए उसकी नाक के नीचे खाकी कागज जला कर उसे सुंघाता। कई बार तो उसके मुंह से झाग निकलने शुरू हो जाते और वह अपनी जीभ काटने लगता। जब वह होश में आता तो बेहद दयनीय और शर्मिंदा लगता।

लकड़हारे सुबह सात बजे से लेकर रात के सात बजे तक काम करते रहते। कई बार उसके बाद भी। जब वे शेड में ताला लगा कर घर की तरफ रवाना होते, मैं हमेशा उदास हो जाया करता। एक दिन बॉस ने तय किया कि वह हम सबको ट्रीट देगा और साउथ म्यूजिक हॉल में दो पेनी की गेलरी सीटों पर शो दिखायेगा। मैं और जो पहले ही हाथ मुंह धो चुके थे और बॉस का इंतजार कर रहे थे। मैं बेहद रोमांचित था क्योंकि उस हफ्ते फ्रेड कार्नो की कॉमेडी अर्ली बर्ड्स (इस कम्पनी में मैं कई बरस बाद शामिल हुआ) चल रहा था। जो घुड़साल की दीवार के सहारे खड़ा हुआ था और मैं उसके सामने उत्साहित और रोमांचित खड़ा हुआ था। तभी अचानक जो ने बहुत तेज आवाज़ में चीख मारी और उसे दौरा पड़ा और वह उसी में दीवार के सहारे ही नीचे गिर गया। जो होना था, वह कुछ ज्यादा ही था। जब जो को होश आया तो बॉस चाहते थे कि वे वहीं रुक कर उसकी देखभाल करें लेकिन जो ने जिद की कि वह एकदम ठीक है और हम दोनों उसके बगैर चले जायें। वह सुबह तक एकदम चंगा हो जायेगा।

स्कूल की धमकी एक ऐसी दानव था जिसने कभी भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा। बीच बीच में लकड़ी चीरने वाले मुझसे स्कूल के बारे में सवाल पूछ लेते। जब छुट्टियां खत्म हो गयीं तो वे थोड़े से बेचैने हो गये। अब मैं साढ़े चार बजे तक, यानी स्कूल के छूटने के वक्त तक गलियों में मारा मारा फिरता, लेकिन ये बहुत मुश्किल काम था। बेमतलब गलियों में फिरते रहना और साढ़े चार बजे तक इंतज़ार करना जब मैं अपनी राहत की जगह पर और लकड़ी चीरने वालों के पास लौट सकता।

एक रात जब मैं चुपके से सोने के लिए अपने बिस्तर में सरक रहा था, मकान मालकिन मुझसे मिलने के लिए आयी। वह बेचारी मेरी राह देखती बैठी थी। वह बहुत उत्तेजित थी। उसने मुझे एक तार थमाया जिस पर लिखा था,"कल सुबह दस बजे वाटरलू स्टेशन पर पहुंचूंगा। प्यार, सिडनी।

जिस वक्त मैं उससे स्टेशन पर मिला तो मेरी हालत वाकई खराब थी। मेरे कपड़े गंदे और फटे हुए थे और मेरी कैप में से धागे इस तरह से लटके हुए थे मानो किसी लड़की के स्कर्ट के नीचे झालरें लटकती नज़र आती हैं। मैंने लकड़ी चीरने वालों के यहां ही मुंह धो लिया था और इस तरह से मैं तीसरी मंज़िल तक दो डोल पानी के भर कर ले जाने और मकान मालकिन की रसोई के आगे से गुज़रने की जहमत उठाने से बच गया था। जब मैं सिडनी से मिला तो मेरे कानों और गर्दन के आस पास रात की गंदगी और मैल की परत दिखायी दे रही थी।

मेरी तरफ देखते हुए सिडनी ने पूछा,"क्या हुआ है?"

मैंने सीधे ही खबर नहीं दी। थोड़ा वक्त लिया,"मां पागल हो गयी है और हमें उसे अस्पताल भेजना पड़ा।"

उसका चेहरा चिंता से घिर गया लेकिन उसने अपने आप पर काबू पा लिया,"तो तुम कहां रह रहे हो इस वक्त?"

"वहीं पाउनाल टैरेस"

वह अपना सामान देखने के लिए मुड़ा। उसने एक हाथ गाड़ी का आर्डर दिया और जब कुलियों ने उस पर उसके सामान के चट्टे लगाये तो सबसे ऊपर केलों की एक गेल भी थी।

"ये हमारे हैं क्या?" मैं बेसब्री से पूछा।

उसने सिर हिलाया,"अभी ये कच्चे हैं। इनके तैयार होने में हमें एकाध दिन का इंतज़ार करना पड़ेगा।"

घर आते समय रास्ते में उसने मां के बारे में सवाल पूछने शुरू कर दिये। मैं इतने उत्साह में था कि सारी बातें सिलसिलेवार बता ही नहीं पाया लेकिन उसे सारे सूत्र मिल गये थे। तब उसने बताया कि वह बीमार हो गया था और उसे केप टाउन में उतार कर अस्पताल में ही छोड़ दिया गया था। और कि वापसी की यात्रा में उसने बीस पाउंड कमा लिये थे। ये पैसे वह मां को दे कर जाना चाहता था। उसने ये पैसे सैनिकों के लिए जूए और लाटरी के इंतजाम करके कमाये थे।

उसने मुझे अपनी योजनाओं के बारे में बताया। वह अब अपनी समुद्री यात्राएं छोड़ देने का इरादा रखता था और अभिनेता बनना चाहता था। उसने बताया कि ये पैसे हमारे लिए बीस हफ्तों के लिए काफी होंगे और तब तक उसे थियेटर में कोई न कोई काम मिल ही जायेगा।

जब हम टैक्सी में केलों की गेल के साथ घर पहुंचे तो पड़ोसियों और मकान मालकिन पर इसका बहुत अच्छा असर पड़ा। मकान मालकिन ने सिडनी को मां के बारे में बताया लेकिन सारे डरावने ब्यौरे नहीं बताये।

उसी दिन सिडनी शॉपिंग के लिए गया और मेरे लिए नये कपड़े खरीदे। और उसी रात पूरी सज धज के साथ हम दोनों साउथ म्यूजिकल हॉल के स्टाल में जा पहुंचे। नाटक के दौरान सिडनी लगातार कहता रहा,"जरा सोचो तो, मां के लिए इस सब का क्या मतलब होता।"

उसी हफ्ते हम मां को देखने के लिए केन हिल गये। जिस वक्त हम विजिटिंग रूम में बैठे हुए थे, वहां बैठ कर इंतज़ार करना बहुत कठिन काम लग रहा था। मुझे याद है कि चाभी घूमने की आवाज़ आयी थी और मां चल कर आ रही थी। वह पीली नज़र आ रही थी। उसके होंठ नीले पड़ गये थे। हालांकि उसने हमें पहचान लिया था, उसमें उत्साह नहीं था और उसकी पुरानी जीवन शक्ति जा चुकी थी। उसके साथ एक नर्स आयी थी। बातूनी और भली महिला। वह खड़ी हो कर बात करना चाह रही थी। कहने लगी,"आप लोग बहुत ही गलत वक्त पर आये हैं। आज आपकी मां की हालत बहुत अच्छी नहीं है। नहीं क्या?" उसने मां की तरफ देखा।

मां विनम्रता से मुसकुरायी मानो उसके जाने की राह देख रही हो।

नर्स ने आगे कहा,"अगली बार जब मां की हालत अच्छी हो तुम लोग ज़रूर आना।"

आखिरकार वह चली गयी और हमें अकेला छोड़ दिया गया। हालांकि सिडनी ने मां का मूड बेहतर करने की कोशिश की और उसे अपनी किस्म।त के चमकने और पैसा कमाने और इतने अरसे तक बाहर रहने के बारे में किस्से बताता रहा, वह बैठी सिर्फ सुनती रही और सिर हिलाती रही। वह अपने ही ख्यालों में गुम लग रही थी। मैंने मां को बताया कि वह जल्दी ही चंगी हो जायेगी। "हां बेशक," मां ने मायूसी से कहा,"काश उस दोपहर तुमने मुझे एक कप चाय दे दी होती तो मैं एकदम ठीक हो जाती।"

बाद में डॉक्टर ने सिडनी को बताया कि कम खुराक मिलने की वजह से मां के दिमाग पर बहुत बुरा असर पड़ा है और उसे ठीक ठाक इलाज की ज़रूरत है और कि हालांकि उसे बीच बीच में बातें याद आती हैं, पूरी तरह से ठीक होने मे उसे कई महीने लगेंगे।

लेकिन मैं कई दिन तक मां के इस जुमले से मुक्त नहीं हो सका कि "काश उस दोपहर तुमने मुझे एक कप चाय दे दी होती तो मैं एकदम ठीक हो जाती।"

मेरी आत्मकथा : अध्याय 5

जोसफ कॉनराड ने इस बारे में अपने एक दोस्त को लिखा था कि ज़िंदगी ने उन्हें एक कोने में दुबके उस अंधे चूहे में बदल डाला था जिसे बस, दबोचा जाने वाला हो। ऐसी उपमा से हम लोगों की दयनीय ज़िंदगी को बयान किया जा सकता था। इसके बावजूद हम में से कुछ लोगों की किस्मत अच्छी रही और ऐसे भाग्यशाली लोगो में से मैं भी था।

मैंने बहुत धंधे किये। मैंने अखबार बेचे, प्रिंटर का काम किया, खिलौने बनाए, ग्लास ब्लोअर का काम किया, डॉक्टर के यहाँ काम किया लेकिन इन तरह-तरह के धंधों को करते हुए मैंने सिडनी की तरह इस लक्ष्य से कभी भी निगाह नहीं हटायी कि मुझे अंतत: अभिनेता बनना है, इसलिए अलग-अलग कामों के बीच अपने जूते चमकाता, अपने कपड़ों पर ब्रश फेरता, साफ कॉलर लगाता और स्ट्रैंड के पास बेडफोर्ड स्ट्रीट में ब्लैक मोर थिएटर एजेन्सी में बीच-बीच में चक्कर काटता। मैं तब तक वहाँ चक्कर लगाता रहा जब तक मेरे कपड़ों की हालत ने मुझे वहाँ और जाने से बिलकुल ही रोक नहीं दिया।

जब मैं वहाँ पहली बार गया तो वहाँ पर शानदार कपड़े पहने हुए अभिनेता-अभिनेत्री घेरा बनाए खड़े थे और लम्बी-लम्बी हांक रहे थे।

मैं डर से काँपते हुए दरवाजे के पास, दूर के एक कोने में खड़ा हो गया। मैं हद दर्जे का शर्मीला लड़का था और अपने चिथड़े हो गये सूट और पंजों से फटे जूतों को छुपाने की भरसक कोशिश कर रहा था। अचानक ही भीतर से एक युवा क्लर्क लपकता हुआ बाहर आता, हाय तौबा मचाता और वहाँ जुटे अभिनेताओं को सम्बोधित करते हुए ज़ोर से चिल्लाता,"तुम, तुम, और तुम, तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है।" और ऑफिस गिरजाघर की तरह खाली हो जाता। एक मौके पर मैं अकेला ही वहां खड़ा रह गया था।

जब क्लर्क ने मुझे देखा तो अचानक रुक गया,"क्या चाहिए तुम्हें?"

मुझे लगा, मैं ओलिवर ट्विस्ट की तरह कुछ और मांग रहा होऊं,"क्या आपके पास बच्चों के लिए कोई भूमिका है?"

"क्या तुमने अपना नाम रजिस्टर करवा लिया है?" मैंने सिर हिलाया।

मेरी हैरानी का ठिकाना न रहा जब वह मुझे बगल वाले ऑफिस के भीतर ले गया, मेरा नाम, पता और दूसरे ब्यौरे दर्ज किये और मुझे बताया कि जब भी मेरे लायक कोई काम होगा मुझे खबर कर देगा।

मैं बहुत खुश, इस अहसास के साथ वापिस लौटा कि मैंने अपना कर्त्तव्य निभा दिया है। हालांकि मैं अभी भी मान रहा था कि इसका कोई नतीजा नहीं निकला।

और अब, सिडनी के लौटने के एक महीने के बाद मुझे एक पोस्ट कार्ड मिला। इस पर लिखा था,"क्या आप ब्लैकमोर एजेन्सी, बेडफोर्ड स्ट्रीट, स्ट्रैंड में आयेंगे?"

मैं अपने नये सूट में मिस्टर ब्लैकमोर के ही सामने ले जाया गया। वे मुस्कुरा रहे थे और बहुत प्यार से मिले। मैं यह मानकर चल रहा था कि वे सर्वशक्तिमान होंगे और बारीकी से जांच पड़ताल करेंगे लेकिन वे बहुत ही विनम्र थे और उन्होंने मुझे एक पर्ची दी कि मैं चार्ल्स फ्राहमॅन के कार्यालय में मिस्टर सी ई हैमिल्टन को जाकर दे दूं।

मिस्टर हैमिल्टन ने पर्ची पढ़ी और यह जानकर बहुत खुश और हैरान हुए कि मैं कितना छोटा-सा हूं। दरअसल मैंने अपनी उम्र के बारे में झूठ बोला था कि मैं चौदह बरस का हूं जब कि मेरी उम्र साढ़े बारह बरस की थी। उन्होंने समझाया कि मुझे शारलॉक होम्स में बिली, पेजबॉय की भूमिका करनी है और शरद ऋतु से शुरू होने वाले दौरे में चालीस सप्ताह तक काम करना है।

"इस बीच," मिस्टर हैमिल्टन ने आगे कहा,"एक नये नाटक, जिम, द रोमांस ऑफ अ कॉक्नी" में एक अच्छे लड़के की बहुत ही शानदार भूमिका है। इसे मिस्टर सेंट्सबरी ने लिखा है। ये वही शख्स हैं जो आगामी दौरे में शारलॉक होम्स में प्रमुख भूमिका निभाने जा रहे हैं। जिम नाटक `होम्स' के दौरे से पहले आजमाइश के तौर पर किंग्स्टन में खेला जायेगा। मेरा वेतन दो पाउंड दस शिलिंग प्रति सप्ताह रहेगा और मुझे शारलॉक होम्स के लिए भी इतना ही वेतन मिलेगा।

हालांकि यह राशि मेरे लिए छप्पर फाड़ लॉटरी खुलने जैसी थी फिर भी मैंने यह बात अपने चेहरे पर नहीं झलकने दी। मैंने निम्रता से कहा,"शर्तों के बारे में मैं अपने भाई से सलाह लेना चाहूंगा।"

मिस्टर हैमिल्टर हंसे और लगा कि वे बहुत खुश हुए हैं। इसके बाद उन्होंने सारे ऑफिस को इकट्ठा कर लिया और मेंरी तरफ इशारा करते हुए बोले,"ये हमारा बिली है। क्या ख्याल है इसके बारे में?"

हर कोई बहुत खुश हुआ और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया। क्या हो गया था? ऐसा लगा मानो पूरी दुनिया ही अचानक बदल गयी हो, दुनिया ने मुझे प्यार से अपने सीने से लगा लिया हो और मुझे अपना लिया हो। तब मिस्टर हैमिल्टन ने मुझे सेंट्सबरी के लिए एक पर्ची दी। उनके बारे में बताया कि वे लीसेस्टर स्क्वायर में ग्रीन रूम क्लब में मिलेंगे। और मैं वहाँ से वापिस लौटा, बादलों पर सवार।

ग्रीन रूम क्लब में भी वही बात हुई। मिस्टर सेंट्सबरी ने अपने स्टाफ सदस्यों को मुझे देखने के लिए बुलवाया। वहाँ पर उसी समय मुझे यह कहते हुए सामी की भूमिका थमा दी गई कि उनके नाटक में यह एक महत्त्वपूर्ण चरित्र है। मैं डर के मारे थोड़ा नर्वस था कि कहीं वे उसी समय मुझसे अपना पाठ पढ़ने के लिए न कह दें क्योंकि मैं बिल्कुल भी पढ़ना नहीं जानता था और मैं परेशानी में पड़ जाता। सौभाग्य से उन्होंने मुझे मेरे संवाद घर ले जाने के लिए दे दिए कि मैं फुरसत से उन्हें पढ़ूं क्योंकि वे अगले हफ्ते से पहले रिहर्सल शुरू करने वाले नहीं थे।

मैं खुशी के मारे पागल होता हुआ बस में घर पहुंचा और पूरी शिद्दत से यह महसूस करने लगा कि मेरे साथ क्या हो गया है। मैंने अचानक ही गरीबी की अपनी ज़िंदगी पीछे छोड़ दी थी और अपना बहुत पुराना सपना पूरा करने जा रहा था। ये सपना जिसके बारे में अक्सर मां ने बातें की थीं और उसे मैं पूरा करने जा रहा था। अब मैं अभिनेता होने जा रहा था। ये सब इतना अचानक और अप्रत्याशित रूप से होने जा रहा था। मैं अपनी भूमिका के पन्नों को सहलाता रहा। इस पर नया खाकी लिफाफा था। यह मेरी अब तक की ज़िंदगी का सबसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज था। बस की यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया कि मैंने एक बहुत बड़ा किला फतह कर लिया है। अब मैं झोपड़ पट्टी में रहने वाला नामालूम सा छोकरा नहीं था। अब मैं थिएटर का एक खास आदमी होने जा रहा था। मेरा मन किया कि मैं रो पडूं।

जब मैंने सिडनी को बताया कि क्या हो गया है तो उसकी आंखें भर आयीं। वह बिस्तर पर पालथी मारकर बैठ गया और खिड़की से बाहर देखने लगा। वह हिल रहा था। और तब अपना सिर हिलाते हुए उसने गहरी उदासी से कहा,"ये हमारी ज़िंदगी का निर्णायक मोड़ है। काश, आज हमारी माँ यह खुशी बांटने के लिए हमारे साथ होती।"

मैंने उत्साहपूर्वक कहा,"जरा सोचो तो, चालीस सप्ताह तक दो पाउंड और दस शिलिंग। मैंने तो मिस्टर हैमिल्टन से कह दिया है कि तुम्हीं मेरे कारोबारी मामले सम्भालते हो।" इसलिए मैं बेताबी से बोला,"हो सकता है, हमें कुछ ज्यादा भी मिल जाएं। खैर, हम हर वर्ष साठ पाउंड बचा सकते हैं।"

हमने अपने उत्साह के चलते यह गणना भी कर ली और तर्क भी गढ़ लिया कि इतनी बड़ी भूमिका के लिए दो पाउंड और दस शिलिंग की राशि बहुत कम है। सिडनी ने यहाँ तक सोच डाला कि वह जाकर पैसे बढ़वाने की बात करेगा। मैंने कहा कि कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन हैमिल्टन अड़ गये।

"हम अधिकतम दो पाउंड दस शिलिंग ही दे सकते हैं।" वे बोले। हम इसे पाकर ही खुश थे।

सिडनी ने मुझे मेरी भूमिका पढ़कर सुनाई और मुझे अपनी पंक्तियां याद करने में मेरी मदद की। यह काफी बड़ी भूमिका थी और लगभग पैंतीस पन्नों में लिखी हुई थी। इसे मैंने तीन दिन में ही मुंह ज़बानी याद कर लिया था।

`जिम' की रिहर्सलें ड्ररी लेन थिएटर की ऊपर वाली मंज़िल में हुईं। सिडनी ने मुझे इतने उत्साह के साथ ट्रेनिंग दी थी कि मुझे एक-एक शब्द याद हो गया था। बस, एक शब्द मुझे परेशान कर रहा था। लाइन कुछ इस तरह से थी, "आप अपने आप को समझते क्या हैं मिस्टर पियरपाँट मोरगन?" और मैं कह बैठता,"पुटरपिंट मोरगन।" मिस्टर सेंट्सबरी ने मुझे ये शब्द ज्यों के त्यों रखने दिये। ये शुरुआती रिहर्सलें आँखें खोलने वाली थीं। इन्होंने मेरे सामने तकनीकों की एक नयी दुनिया खोल कर रख दी। मुझे इस बात की कत्तई जानकारी नहीं थी कि स्टेज क्राफ्ट, टायमिंग, विराम, मुड़ने के लिए संकेत, बैठने के लिए संकेत जैसी कई बातें भी होती हैं। लेकिन ये सारी चीज़ें मुझे स्वाभाविक रूप से आ गयीं। बस, मेरी एक ही खामी को मिस्टर सेंट्सबरी ने ठीक किया - बोलते समय मैं सिर बहुत हिलाता था और सांस बहुत रोकता था।

कुछ दृश्यों की रिहर्सल कर लेने के बाद वे हैरान रह गये और मुझसे पूछने लगे कि क्या मैंने पहले कभी अभिनय किया है। कितना संतोषजनक था सेंट्सबरी साहब को और नाटक दूसरे अभिनेताओं को खुश करना! अलबत्ता, मैंने उनका उत्साह इस तरह से स्वीकार किया मानो यह मेरा स्वाभाविक जन्मसिद्ध अधिकार हो।

जिम को किंग्स्टन थिएटर में पहले हफ्ते में और फुलहाम थिएटर में दूसरे हफ्ते में आजमाइश के तौर पर के रूप में खेला जाना था। यह हैनरी ऑर्थर जोन्स के सिल्वर किंग पर आधारित एक मैलोड्रामा था। इसकी कहानी कुछ इस तरह से थी कि एक अभिजात्य व्यक्ति अनिद्रा रोग से पीड़ित है और एक दिन अपने आपको फल बेचने वाली एक युवा लड़की और अखबार बेचने वाले एक लड़के के साथ एक दुछत्ती में रहते हुए पाता है। लड़के सामी की भूमिका मैंने निभानी थी। नैतिक रूप से सब ठीक-ठाक था। लड़की दुछत्ती में एक अलमारी में सोती थी और ड्यूक, उसको हम यही कर पुकारते थे, खाट पर आराम से सोता था और मैं फर्श पर सोता था।

पहले अंक का दृश्य 7 ए डेवरयू कोर्ट, द टेंपल का था। यह एक अमीर वकील जेम्स सीटन गेटलॉक का चेंबर था। बरबाद ड्यूक अपने विरोधी वकील के पास जाता है और अपना भला करने वाली फूल बेचने वाली लड़की, जो बीमार है, की मदद करने के लिए हाथ फैलाता है। इस लड़की ने अनिद्रा के उसके रोग में उसकी मदद की थी।

नोक झोंक में विलेन ड्यूक से कहता है,"दफा हो जाओ। जाओ और भूखे मरो। तुम और तुम्हारी ये रखैल।"

ड्यूक हालांकि कमजोर और मरियल सा है, मेज से कागज़ काटने वाला चाकू उठा लेता है मानो वह विलेन पर हमला कर रहा हो, लेकिन इस तरह से चाकू मेज पर गिरा देता है जैसे उसे मिर्गी का दौरा पड़ा हो और वह विलेन के पैरों के पास बेहोश हो कर गिर जाता है। इस मोड़ पर आकर विलेन की भूतपूर्व पत्नी, जिससे कभी यह पस्त ड्यूक प्रेम किया करता था, कमरे के भीतर आती है। वह भी यह कहते हुए पस्त ड्यूक के लिए हाथ जोड़ती है,"उसकी मेरे साथ नहीं बनी। वह अदालतों में भी कुछ नहीं कर पाया। कम से कम तुम तो उसकी मदद कर सकते हो।"

लेकिन विलेन मना कर देता है। दृश्य चरम उत्तेजना तक जा पहुंचता है। विलेन अपनी भूतपूर्व पत्नी पर निष्ठावान न रहने का आरोप लगाता है और उसे भी छोड़ देता है। सनक में आकर वह कागज़ काटने वाला चाकू उठा लेती है जो पस्त ड्यूक के हाथ से गिरा था और विलेन को मार देती है। विलेन अपनी आराम कुर्सी में गिर कर मर जाता है जबकि ड्यूक अभी भी उसके पैरों के पास बेहोश पड़ा हुआ है। महिला दृश्य से गायब हो जाती है और ड्यूक को जब होश आता है तो वह अपने विरोधी को मरा हुआ पाता है। वह कहता है,"हे भगवान, ये मैंने क्या कर डाला।"

और इस तरह से नाटक चलता रहता है। वह मृतक की जेबों की तलाशी लेता है और उसे एक पर्स मिलता है जिसमें कई पाउंड, हीरे की अंगूठी और आभूषण मिलते हैं। वह ये सारी चीज़ें अपनी जेब के हवाले करता है और जब वह खिड़की रास्ते बाहर निकल रहा है तो मुड़ कर कहता है,"गुड बाय गैटलॉक, आखिर तुमने मेरी मदद कर ही दी।" और परदा गिरता है।

दूसरा दृश्य उस दुछत्ती का था जहाँ ड्यूक रहता था। जब दृश्य खुलता है तो एक अकेला जासूस अलमारी के अंदर तांक-झाँक कर रहा है। मैं सीटी बजाते हुए आता हूँ और जासूस को देखकर रुक जाता हूँ।

अखबारवाला लड़का - अरे आप, क्या आपको नहीं पता कि ये एक महिला का बेडरूम है?

जासूस - क्या? ये अलमारी? जरा इधर तो आना

लड़का - बदतमीज, ढीठ कहीं के!

जासूस - तुमने ये दिखाया। इधर आओ और दरवाजा बंद कर दो।

लड़का - (उसकी तरफ जाते हुए) जरा आराम से। समझे नहीं क्या? उनके अपने ड्राइंग रूम में भोंदुओं के आमंत्रण?

जासूस - मैं एक जासूस हूँ।

लड़का - अरे पुलिस वाला ...तब तो हो गई मेरी छुट्टी।

जासूस - मैं तुम्हें कोई नुक्सा न नहीं पहुंचाऊंगा। मैं तो थोड़ी-जानकारी चाहता हूँ जिससे किसी गरीब की मदद हो जाए।

लड़का - किसी की मदद? यदि यहाँ किसी का भला होता है तो वह कम से कम किसी पुलिस वाले के हाथों तो नहीं ही होगा।

जासूस - ज्यादा मूरख मत बनो। क्या मैंने तुझसे ये कहा है कि मैं कभी फौज में था।

लड़का - बिना किसी बात के शुक्रिया। मैं आपके जूते देख सकता हूँ।

जासूस - यहाँ कौन रहता है?

लड़का - ड्यूक

जासूस - वो तो ठीक है, लेकिन उसका असली नाम क्या है?

लड़का - मुझे नहीं पता। लेकिन वह इसी नाम से जाना जाता है। वैसे आप मुझे इस बात के लिए मार भी सकते हैं कि मुझे इसका मतलब नहीं मालूम।

जासूस - और वो देखने में कैसा लगता है?

लड़का - कागज की तरह पतला, सफेद बाल, दाढ़ी सफाचट, टॉपहैट और एक आँख वाला चश्मा पहनता है। और हां!! वह आपको उसी चश्मे से देखता है।

जासूस - और जिम, - ये कौन है?

लड़का - वह आदमी? आपका मतलब लड़की?

जासूस - तो यह वही लड़की है जो -

लड़का - (उसे टोकते हुए) जो अलमारी में सोती है। यहाँ ये कमरा हमारा है, मेरा और ड्यूक का वगैरह। वगैरह ...

और भी बहुत कुछ था मेरी भूमिका में और मेरा यकीन मानिये, दर्शकों को इसमें बहुत मज़ा आया। मेरा ख्याल है इसका कारण यह रहा होगा कि मैं अपनी उम्र से बहुत छोटा दिखता था। मैं जो भी लाइन बोलता, उस पर ठहाके लगते। सिर्फ मंच पर किए जाने वाले काम मुझे परेशान करते। स्टेज पर सचमुच की चाय बनाना। मैं हमेशा भ्रम में पड़ जाता कि पहले पॉट में गरम पानी डालना है या चाय की पत्ती। इसकी तुलना में स्टेज पर कुछ भी काम करने के बजाय लाइनें बोलना हमेशा आसान होता।

जिम नाटक सफल नहीं रहा था। समीक्षकों ने उस नाटक पर बहुत बेदर्दी से कलम चलायी। इसके बावजूद मेरा ज़िक्र अनुकूल ढंग से किया गया। एक समीक्षा जो मुझे हमारी ही कम्पनी के मिस्टर चार्ल्स रॉक ने दिखायी थी, बहुत ही अच्छी थी। वे एक पुराने एडाल्फी अभिनेता थे और उनका बहुत नाम था। और मैंने अपने अधिकतर दृश्य उनके साथ ही किये थे। "...नौजवान," उन्होंने गंभीरता से कहा था," जब तुम ये सब पढ़ो तो ये चीज़ें तुम्हारे दिमाग पर सवार नहीं हो जानी चाहिये।" और विनम्रता और सौम्यता पर मुझे भाषण पिलाने के बाद लंदन ट्रापिकल टाइम्स में से मुझे ये समीक्षा पढ़ कर सुनायी। मुझे समीक्षा का एक-एक शब्द याद है।

नाटक के बारे में हिकारत से लिखने के बाद अखबार ने लिखा: "लेकिन एक आशा जगाने वाली बात भी है। सामी की भूमिका, अखबार बेचने वाला छोकरा, लंदन की गलियों का एक स्मार्ट अरब, जिसने काफी हद तक का नाटक में हास्य की कमी पूरी की है। बेशक ये भूमिका घिसी-पिटी और पुराने ढब की है फिर भी, मास्टर चार्ली चैप्लिन ने सामी के रोल को काफी हद तक रोचक बना दिया है। एक शानदार और मेहनती बाल कलाकार, मैंने हालांकि इस बच्चे के बारे में पहले कभी पहले नहीं सुना है फिर भी हमें निकट भविष्य में इस बच्चे के बारे में बहुत कुछ बेहतर सुनने को मिलेगा, मुझे ऐसी उम्मीद है।" सिडनी ने इसकी एक दर्जन प्रतियां खरीद लीं।

`जिम' के दो सप्ताह तक चलने के बाद हमने शरलॉक होम्स का पूर्वाभ्यास शुरू किया। इस वक्त के दौरान सिडनी और मैं अभी भी पाउनॉल टैरेस पर ही रह रहे थे। इसका कारण यह था कि आर्थिक रूप में अभी भी हम अपने पैरा तले की ज़मीन के बारे में बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं थे।

पूर्वाभ्यास के दौरान सिडनी और मैं मां से मिलने के लिए केन हिल गये। पहले तो नर्सों ने हमें यही बताया कि हम मां से नहीं मिल पायेंगे क्योंकि मां की तबीयत ठीक नहीं है। फिर वे सिडनी को एक तरफ ले गयीं और उससे फुसफुसा कर बात करने लगीं, लेकिन मैंने सिडनी की बात सुन ली थी,"नहीं, मुझे नहीं लगता वह देख पायेगा।" तब वह मेरी तरफ मुड़ कर उदासी से बोला था,"तुम मां को पागलखाने में नहीं देखना चाहोगे?"

"नहीं नहीं, मैं ये बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा।" मैंने तड़प कर कहा।

लेकिन सिडनी मां से मिला और मां ने उसे पहचान लिया और वह सचेत हो गयी। कुछ ही पलों के बाद नर्स ने आ कर मुझे बताया कि अब मां बेहतर है और क्या मैं उसे देखना चाहूंगा। तब हम दोनों पागलखाने वाले कमरे में गये और वहाँ जा कर बैठ गये। इससे पहले कि हम जाते, वह मुझे एक तरफ ले कर गयी और मेरे कान में फुसफुसायी,"हिम्मत मत हारना, नहीं तो वे लोग तुम्हें यहीं रख सकते हैं।" मां फिर से अपनी सेहत वापिस पाने से पहले पूरे अट्ठारह महीने केन हिल में रही। मैं जब दौरे पर था तो सिडनी नियमित रूप से जा कर उससे मिलता रहा।

मिस्टर एच ए सेंट्सबरी जो टूर पर होम्स का पार्ट कर रहे थे, स्ट्रैंड मैग्जीन में छपने वाले चित्रों की हू ब हू प्रतिकृति थे। उनका लम्बोतरा संवेदनशील चेहरा था, और माथे पर प्रेरणा देते से भाव थे। जितने भी कलाकार होम्स की भूमिका अदा किया करते थे, उनमें से सेंट्सबरी को बेहतरीन समझा जाता था। उन्हें विलियम गिलेट, मूल होम्स और नाटक के लेखक से भी अच्छा माना जाता था।

मेरे पहले टूर के दौरान मैनेजमेंट ने तय किया कि मैं मिस्टर और मिसेज ग्रीन के साथ रहूं। मिस्टर ग्रीन हमारी कम्पनी के बढ़ई थे और मिसेज ग्रीन वार्डरोब संभालती थीं। ये व्यवस्था बहुत शानदान नहीं कही जा सकती थी। ऊपर से मिस्टर और मिसेज ग्रीन कभी-कभार पीते-वीते थे। इसके अलावा, मै अक्सर उसी वक्त खाना नहीं खाता था जब वे खाया करते। जो वे खाया करते वह मैं नहीं खाता। मुझे यकीन है, मेरा ग्रीन दम्पत्ति के साथ रहना मेरे लिये उतना तकलीफदेह नहीं था, जितना उनके लिए था। इसलिए तीन हफ्ते तक एक साथ रहने के बाद हमने आपसी रज़ामंदी से अलग होने का फैसला कर लिया। और चूंकि मैं इतना छोटा था कि किसी और कलाकार के साथ नहीं रह सकता था, मैं अकेला ही रहने लगा। मैं अजनबी शहरों में अकेले रहता, पिछवाड़े के कमरों में अकेले रहता, और शाम के शो के वक्त से पहले शायद ही किसी साथी कलाकार से मिलता-जुलता। जब मैं अपने आप से बात करता तो मुझे सिर्फ अपनी ही आवाज़ सुनायी देती। अक्सर मैं सैलूनों में चला जाता जहाँ हमारी कम्पनी के साथी इकट्ठे होते। और उन्हें बिलियर्ड्स खेलते देखता। लेकिन मैं हमेशा पाता कि मेरी मौजूदगी से उनकी बातचीत में बाधा ही आ खड़ी होती है और वे इस बात को मुझे जतलाने में कोई शर्म भी महसूस न करते। इसलिए उनकी किसी ऐसी-वैसी बात पर मुस्कुरा भी दूँ तो उनकी भौंहे तन जाती थीं।

मैं अकेला होता चला गया। रविवारों की रात को उत्तरी शहरों में पहुंचना, अंधियारी मुख्य गली में से गुजरते हुए गिरजा घर की घंटियों की उदास टुनटुनाहट सुनना। ये सारी बातें मेरे अकेलेपन में कुछ भी न जोड़ पाती। सप्ताह के अंत की छुट्टियों के दिनों में मैं स्थानीय बाजार खंगालता, और अपनी खरीदारी करता, राशन-पानी खरीदता, मांस खरीदता जिसे मकान मालकिन पका कर दे देती। कई बार मुझे खाने और रहने की सुविधा मिल जाती और मैं तब रसोई में बैठ कर परिवार के साथ ही खाता। मुझे वह व्यवस्था अच्छी लगती क्योंकि उत्तरी इंगलैंड के रसोईघर साफ-सुथरे और भरे पूरे होते, वहां पॉलिश किए हुए फायरग्रेट होते और नीली भट्टियाँ होतीं। मकान मालकिन का ब्रेड सेंकना, और ठंडे अंधियारे दिन में से निकल कर लंकाशायर रसोई की जलती आग की लाल लौ के दायरे में आना हमेशा अच्छा लगता। वहाँ बिना सिंकी डबलरोटियों के डिब्बे भट्टी के आस-पास पार बिखरे होते, तब परिवार के साथ चाय के लिए बैठना, भट्टी से अभी-अभी निकली गरमा-गरम डबलरोटी की सोंधी-सोंधी महक, उस पर लगाया गया ताज़ा मक्खन...मैं गंभीर महानता ओढ़े इनका आनंद उठाता।

मैं प्रदेशों में छह महीने तक रहा। इस बीच सिडनी को थियेटर में ही काम तलाशने में बहुत कम सफलता मिली थी इसलिए अब वह कलाकार बनने की अपनी महत्त्वाकांक्षा को त्याग कर स्ट्रैंड में कोल होल में एक बार में काम के लिए आवेदन करने पर मजबूर हो गया। एक सौ पचास आवेदकों में से यह नौकरी उसे मिली थी। लेकिन मानो एक तरह से यह उसका पहले की स्थिति से पतन था।

वह मुझे नियमित रूप से लिखा करता और मां के बारे में मुझे समाचार देता रहता। लेकिन मैं शायद ही उसके खतों के जवाब देता। इसका एक कारण था कि मुझसे वर्तनी की गलतियाँ बहुत होतीं। उसके एक खत ने तो मुझे इतनी गहराई से छुआ और इसकी वजह से मैं उसके और नजदीक आ गया। उसने मुझे उसके खतों का जवाब न देने के कारण फटकार लगायी और याद दिलाया था कि हम कैसे-कैसे दिन एक साथ देख कर यहाँ तक पहुँचे हैं और इस बात से हमें कम से कम एक दूसरों के और करीब होना चाहिए।

सिडनी ने लिखा,".. मां की बीमारी के बाद हम दोनों के पास एक दूसरे के अलावा और कौन बचे हैं। तुम नियमित रूप से लिखा करो और मुझे बताओ कि मेरा एक भाई भी है।"

उसका पत्र इतना अधिक भावपूर्ण था कि मैंने तुरंत ही उसका जवाब दे दिया। अब मैं सिडनी को दूसरे ही आलोक में देख रहा था। उसके पत्र ने भ्रातृत्व के प्यार का ऐसा अटूट बंधन बांधा जो मेरी पूरी ज़िंदगी मेरे साथ बना रहा।

मैं अकेले रहने का आदी हो चुका था। लेकिन मैं बातचीत करने से इतना विमुख होता चला गया कि जब कम्पनी का कोई साथी मुझसे मिलता तो मैं बहुत ज्यादा परेशानी में पड़ जाता। मैं अपने आपको फटाफट इस बात के लिए तैयार ही न कर पाता कि हाजिर जवाबी से, समझदारी से किसी बात का जवाब दे सकूं। लोग-बाग मुझे छोड़ कर चले जाते। मुझे पक्का यकीन है कि मेरी बुद्धि के प्रति घबड़ाकर चिंतातुर हो कर ही मुझसे विदा लेते। अब उदाहरण के लिए, मिस ग्रेटा हॉन को ही लें। वे हमारी प्रमुख अभिनेत्री थीं। खूबसूरत, आकर्षक और दयालुता की साक्षात प्रतिमा, लेकिन जब मैंने उन्हें सड़क पार कर अपनी तरफ आते देखता तो मैं तेजी से मुड़ कर या तो एक दुकान की खिड़की में देखने लगता या उससे मिलने से बचने के लिए किसी दूसरी ही गली में सरक जाता।

मैंने अपने-आप की परवाह करनी छोड़ दी और अपनी आदतों में लापरवाह होता चला गया। जब मैं कम्पनी के साथ यात्रा कर रहा होता तो रेलवे स्टेशन पहुंचने में मुझे हमेशा देर हो जाती। आखिरी पलों में पहुँचता और मेरी हालत अस्त-व्यस्त होती, मैंने कॉलर भी न लगाया होता, और मुझे हमेशा इस बात के लिए फटकार सुननी पड़ती।

मैंने अपने साथ के लिए एक खरगोश खरीद लिया और मैं जहाँ भी रहता, उसे छुपा कर अपने कमरे में ले जाता और मकान मालकिन को इस बात की हवा भी न लग पाती। ये एक छोटा-सा प्यारा-सा जीव था जो बेशक इधर-उधर मुंह नहीं मारता था। इसकी फर इतनी सफेद और साफ थी कि यह बात किसी की ध्यान में भी नहीं आती थी कि इसकी गंध कितनी तीखी हो सकती है। मैं इसे अपने बिस्तर के नीचे एक लकड़ी के पिंजरे में छुपा कर रखता। मकान मालकिन खुशी-खुशी मेरे कमरे में मेरा नाश्ता ले कर आती, तभी उसे इस महक का पता चलता, तब वह कमरे से परेशान और भ्रमित हो कर चली जाती, उसके कमरे से बाहर जाते ही मैं अपने खरगोश को आज़ाद कर देता और वह सारे कमरे में फुदकता फिरता।

बहुत पहले ही मैंने अपने खरगोश को इस बात की ट्रेनिंग दे दी थी कि ज्यों ही वह दरवाजे पर खटखट सुने, पलट कर अपनी पेटी में चला जाये। अगर मकान मालकिन को मेरे इस रहस्य का पता चल भी जाये तो मैं अपने खरगोश को ट्रिक करके दिखाने को कह कर उसका दिल जीत लेता और वह फिर हमें पूरा हफ़्ता रहने के लिए इजाजत दे देती।

लेकिन टोनीपेंडी, वेल्स में, मैंने अपनी ट्रिक दिखायी तो मकान मालकिन रहस्यमय ढंग से मुस्कुरायी लेकिन उसने कोई राय जाहिर नहीं की, लेकिन उस रात जब मैं थियेटर से लौटा तो मेरा प्रिय पालतू खरगोश जा चुका था। जब मैंने उसके बारे में पूछताछ की तो मकान मालकिन ने सिर्फ अपना सिर हिला दिया,"कहीं भाग-वाग गया होगा या उसे ज़रूर किसी ने चुरा लिया होगा।" उसने बड़ी चतुराई से अपने-आप ही समस्या को सुलझा लिया था।

टोनीपेंडी से हम ऐब्बी वेल के खदानों वाले शहर में पहुँचे जहाँ हमें तीन रातों के लिए रुकना था। और मैं इस बात के लिए शुक्रगुजार था कि हमें सिर्फ तीन दिन ही रुकना था क्योंकि ऐब्बीवेल एक सीलन-भरी जगह थी जो उन दिनों गंदा-सा शहर हुआ करता था, भयानक, एक जैसे मकानों की एक के बाद एक कतार, हर घर में चार छोटे कमरे थे जिनमें तेल की कुप्पियाँ जलतीं। कंपनी के ज्यादातर लोग एक छोटे-से होटल में ठहरे। सौभाग्य से मुझे एक खदानकर्मी के घर में सामने की तरफ वाला कमरा मिल गया। कमरा बेशक छोटा था लेकिन ये साफ और आरामदायक था। रात को जब मैं नाटक से वापिस लौटता तो कमरे में आग के पास ही मेरा खाना रख दिया जाता जहाँ वह गरम रहता।

मकान मालकिन लम्बी, खूबसूरत-सी औरत थी जिसके आस-पास त्रासदी का एक आवरण लिपटा हुआ था। वह सुबह मेरे कमरे में राश्ता ले कर आती और शायद ही कभी एक-आध शब्द बोलती। मैंने नोट किया कि उसकी रसोई का दरवाजा हमेशा ही बंद रहता। जब भी मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत होती, मुझे दरवाजा खटखटाना पड़ता और दरवाजा एकाध इंच ही खोला जाता।

दूसरी रात जब मैं रात का खाना खा रहा था तो उसका पति आया। वह लगभग अपनी पत्नी की उम्र का रहा होगा। उस शाम वह थियेटर गया हुआ था और उसे हमारा नाटक अच्छा लगा था। बातचीत करते समय वह खड़ा ही रहा। उसने हाथ में एक जलती मोमबत्ती पकड़ी हुई थी और वह सोने के लिए जाने की तैयारी में था। वह बात करते समय थोड़ा रुका मानो कुछ कहना चाह रहा हो."...सुनो, मेरे पास कुछ ऐसा है जो मुझे लगता है, तुम्हारे काम काज में कहीं फिट हो सकता है। कभी मानव मेंढक देखा है? लो इस मोमबत्ती को पकड़ो और मैं लैम्प पकड़ता हूँ।"

वह मुझे रसोई घर तक ले कर गया और लैम्प को ड्रेसर पर रख दिया। ड्रेसर पर ऊपर से नीचे तक अलमारी के दरवाजों के पल्लों की जगह पर परदा लगा हुआ था। "...ऐ गिल्बर्ट, जरा बाहर तो निकलो।" उसने परदे सरकाते हुए कहा।

एक आधा आदमी जिसके पैर नहीं थे, सामान्य आकार से बड़ा सिर, लाल बाल, चपटा-सा माथा, बीमार-सा सफेद चेहरा, धँसी हुई नाक, बड़ा-सा मुँह और मजबूत कंधे और बाहें, ड्रेसर के नीचे से निकल कर आया। उसने फलानेल का जांघिया पहना हुआ था। जांघिये के कपड़े को जाँघों तक काट दिया गया था। वहाँ उसके दस मोटे, ठूँठ जैसे पंजे नज़र आ रहे थे। इस डरावने प्राणी की उम्र बीस से चालीस के बीच कुछ भी हो सकती थी।

"ऐ, ... हे गिल्बर्ट, जरा कूद के दिखाओ।" पिता ने कहा और दीन-हीन आदमी ने अपने आपको थोड़ा नीचे किया और लगभग मेरे सिर की ऊँचाई तक अपनी बाहें ऊपर उछाल दीं।

"...क्या ख्याल है? सर्कस के लिए यह फिट रहेगा? मानव मेंढक?"

मैं इतना भयभीत हो गया था कि जवाब ही न दे सका। अलबत्ता, मैंने उन्हें कई सर्कसों के नाम पते बताये जहाँ वे इस बारे में लिख सकते थे।

वे इस बात पर अड़े रहे कि ये लिजलिजा प्राणी और भी उछल कूद, कलाबाजियाँ और कूद फाँद दिखाये। उसे आराम कुर्सी के हत्थे पर हाथों के बल खड़ा किया गया, कुदाया गया। जब उसने अपने ये सब करतब बंद किये तो मैंने यह जतलाया कि ये वाकई उत्साह जनक है और इन ट्रिक्स पर उसे बधाई दी।

कमरे से बाहर निकलने से पहले मैंने उससे कहा ..."गुड नाइट गिल्बर्ट," तो कूँए में से आती सी, जबान दबा कर उसे बेचारे ने जवाब दिया," ...गुड नाइट।"

उस रात कई बार मैं उठा और अपने बंद दरवाजे को अच्छी तरह देखा-भाला। अगली सुबह मकान मालकिन खुश मिजाज़ नजर आयी और उसके चेहरे पर संवाद करने जैसे भाव थे। "मेरा ख्याल है, तुमने कल रात गिल्बर्ट को देखा है," कहा उसने, "हां, ये ज़रूर है कि जब हम थिएटर के लोगों को घर में रखते हैं तो वह ड्रेसर के नीचे ही सोता है।"

तब यह वाहियात ख्याल मेरे मन में आया कि मैं गिल्बर्ट के बिस्तर में ही सोता रहा हूँ।... "हाँ," मैंने जवाब दिया और उसके सर्कस में जाने की संभावनाओं पर नपे-तुले शब्दों में ही बात करता रहा।

मकान मालकिन ने सिर हिलाया,"...हम अक्सर इस बारे में सोचते रहे हैं।"

मेरा उत्साह - या इसे जो भी नाम दे दें - मकान मालकिन को खुश करता जा रहा था। वहाँ से चलने से पहले मैं रसोई में गिल्बर्ट को बाय-बाय कहने गया। सहज रहने की कोशिश करते हुए मैंने उसका बड़ा-सा फैला हुआ हाथ अपने हाथ में लिया और उसने हौले से मेरा हाथ दबाया।

चालीस हफ्तों तक अलग-अलग प्रदेशों में प्रदर्शन करने के बाद हम लंदन लौटे। अब हमें आस-पास के उपनगरों में आठ हफ्ते तक प्रदर्शन करने थे। शरलॉक होम्स, जो सदाबहार सफलता के झँडे गाड़ता था, पहले टूर के होने के बाद तीन हफ्ते बाद दूसरे टूर से शुरू होने वाला था।

अब सिडनी और मैंने तय किया कि पाउनाल टेरेस वाला अपना कमरा छोड़ दें और केनिंगटन रोड पर किसी ज्यादा इज़्ज़तदार जगह में जा कर रहें। हम अब सांपों की तरह अपनी केंचुल को उतार फेंक देना चाहते थे। अपने अतीत को धो पोंछ देना चाहते थे।

मैंने होम्स के अगले दौरे के दौरान सिडनी को एक छोटी-सी भूमिका दिये जाने के बारे में मैनेजमेंट से बात की। और उसे काम मिल भी गया। एक हफ्ते के पैंतीस शिलिंग। अब हम अपने दौरे पर साथ एक साथ थे।

सिडनी हर हफ्ते मां को खत लिखता था और हमारे दूसरे दौरे के आखिरी दिनों में हमें केन हिल पागल खाने से एक पत्र मिला कि अब हमारी मां की सेहत बिलकुल ठीक है। यह निश्चित ही एक बेहतर खबर थी। हमने फटाफट अस्पताल से मां को डिस्चार्ज कराने के इंतज़ाम किये और इस बात की तैयारियाँ कीं कि वह हमारे पास ही रीडिंग शहर में पहुँच जाये। इस मौके का जश्न मनाने के लिए हमने एक स्पेशल डीलक्स अपार्टमेंट लिया जिसमें दो बेडरूम थे, एक ड्राइंगरूम था जिसमें पियानो रखा हुआ था। हमने मां का बेडरूम फूलों से सजा दिया और एक शानदार डिनर का इंतजाम किया।

सिडनी और मैं स्टेशन पर मां का इंतज़ार करते रहे। हम तनाव में भी थे और खुश भी। लेकिन मैं इस बात को सोच-सोच कर परेशान हुआ जा रहा था कि अब वह कैसे हमारी ज़िंदगी में फिर से फ़िट हो पायेगी, इस बात को जानते हुए कि उन दिनों की वह आत्मीय घड़ियां फिर से नहीं जी जा सकेंगी।

आखिरकार ट्रेन आ पहुँची। सवारियाँ जैसे-जैसे डिब्बों में से निकल कर आ रही थीं, हम उत्तेजना और अनिश्चितता से उनके चेहरे देख रहे थे। और आखिर में वह नज़र आयी। मुस्कुराती हुई और चुपचाप धीरे-धीरे हमारी तरफ बढ़ती हुई। जब हम उससे मिलने के लिए आगे बढ़े तो उसने ज्यादा भाव प्रदर्शित नहीं किये लेकिन वात्सल्य के साथ हमें प्यार किया। तय था वह अपने आपको एडजस्ट करने के भीषण दौर से गुज़र रही थी। टैक्सी से अपने कमरों तक की उस छोटी-सी यात्रा में हमने हज़ारों बातें की, मतलब की और बेमतलब की।

मां को अपार्टमेंट और उसके बेडरूम के फूल दिखा देने के तात्कालिक उत्साह के बाद हम अपने आपको ड्राइंगरूम में एक दूसरे के सामने खाली-खाली बैठा पा रहे थे। हमारी सांस फूल रही थी। धूप भरा दिन था और हमारा अपार्टमेंट एक शांत गली में था। लेकिन अब इसकी शांति बेचैन कर रही थी। हालांकि मैं खुश होना चाहता था लेकिन पता नहीं क्यों, मैं अपने-आपको एक तरह के दिल डूबने वाले के भाव से लड़ता हुआ पा रहा था। बेचारी मां, उसने खुश और संतुष्ट रहने के लिए ज़िंदगी से कितना कम चाहा था, मुझे अपने तकलीफ़ भरे अतीत की याद दिला रही थी ...वह दुनिया की आखिरी औरत थी जिसने मुझे इस तरह से प्रभावित किया होगा। लेकिन मैंने अपनी तरफ़ से इन भावनाओं को छुपाने की भरपूर कोशिश की। उसकी उम्र थोड़ी बढ़ गयी थी और वज़न भी बढ़ गया था। मैं हमेशा इस बात पर गर्व किया करता था कि हमारी मां कितनी शानदार दिखती है और ढंग से पहनी ओढ़ती है, और मैं चाहता था कि मैं अपनी कम्पनी को उसके बेहतरीन रूप में दिखाऊं। लेकिन अब वह अनाकर्षक दिख रही थी। मां ने ज़रूर मेरी शंका के ताड़ लिया होगा तभी तो उसने मेरी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखा।

झिझकते हुए मैंने मां के बालों की लट का ठीक किया,"...मेरी कम्पनी से मिलने से पहले," मैं मुस्कुराया,"मैं चाहता हूँ कि तुम अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में होवो।"

हमें एक दूसरे से एडजस्ट हाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। और मेरी हताशा उड़न छू हो गयी। अब हम उस आत्मीयता के दायरे से बाहर आ चुके थे जो वह तब जानती थी जब हम बच्चे थे और तब वह उस बात को हम बच्चों से बेहतर जानती थी। और यह बात हमें और भी प्यारी बना रही थी। हमारे टूर के दौरान वह खरीदारी करती, सौदा सुलुफ लाती, घर पर फल वगैरह ले आती, खाने-पीने के लिए कुछ न कुछ अच्छी चीज़ें ले आती और थोड़े से फल तो जरूर ही खरीद कर लाती। हम अतीत में कितने भी गरीब क्यों न रहे हों, शनिवारों की रात के वक्त खरीदारी करते समय हम हमेशा पेनी भर के फूल खरीदने का जुगाड़ तो कर ही लिया करते थे। अक्सर वह शांत और अपने आप में गुमसुम रहती और उसका ये अलगाव मुझे उदास कर जाता। वह हमारे साथ मां की तरह पेश आने के बजाये मेहमानों की तरह पेश आती।

एक महीने के बाद मां ने लंदन वापिस जाने की इच्छा प्रकट की। वह अब घर बसा लेना चाहती थी ताकि जब हम दौरे से वापिस आयें तो उसके पास हमारे लिए एक घर हो। इसके अलावा, जैसा कि उसने कहा, इस तरह सदा सैरों पर घूमते हुए एक अतिरिक्त किराया देने की तुलना में लंदन में घर ले कर रहना कहीं ज्यादा सस्ता पड़ेगा।

मां ने चेस्टर स्ट्रीट पर नाई की दुकान के ऊपर एक फ्लैट किराये पर ले लिया। यहाँ हम पहले भी रह चुके थे। मां किस्तों पर दस पाउंड का फर्नीचर ले आयी। कमरे हालांकि वर्सेलिस के कमरों जैसे बड़े और शानदार नहीं थे लेकिन मां ने तो कमाल कर दिया और कमरों का काया-कल्प कर दिया। उसने सोने के कमरों को संतरी रंग के क्रेटस् और क्रेटोन से रंग डाला। अब कमरे सजावटी अल्मारियों की तरह दिखने लगे थे। हम दोनों, सिडनी और मैं मिल कर हर हफ्ते चार पाउंड और पांच शिलिंग कमा रहे थे और उसमें से एक पाउंड और पांच शिलिंग मां को भेज देते।

अपने दूसरे दौरे के बाद मैं और सिडनी घर वापिस लौटे और एक हफ्ता मां के साथ रहे। हालांकि हम मां के पास आ कर खुश थे, फिर भी हम मन ही मन फिर से दौरे पर जाने की चाह रखने लगे थे क्योंकि चेस्टर स्ट्रीट के घर में वे सारी सुविधाएं उस तरह की नहीं थीं जिनके मैं अब और सिडनी आदी होने लगे थे। बिला शक मां ने इस बात को ताड़ लिया। जब हमें स्टेशन पर विदा करने के लिए आयी तो वह काफी खुश लग रही थी लेकिन हम दोनों ने सोचा, जब प्लेटफार्म पर खड़ी वह रुमाल हिलाती हमें विदा कर रही थी तो हमें वह चिंतित लगी।

हमारे तीसरे दौरे के दौरान मां ने हमें लिखा कि लुइस, जिसके साथ सिडनी और मैं केनिंगट रोड पर रहे थे, नहीं रही है। मज़ाक ही तो कहा जायेगा कि, उसकी मृत्यु भी लैम्बेथ यतीम घर में ही हुई जिस जगह पर कुछ अरसे तक हमें रखा गया था। वह पिता जी के बाद सिर्फ चार बरस ही जी पायी थी और अपने बच्चे को यतीम छोड़ गयी थी। उस बेचारे को भी उस अनाथालय में ही रखा गया और उसे भी उसी हॉनवेल स्कूल में ही भेजा गया था जहाँ सिडनी और मुझे भेजा गया था।

मां ने लिखा था कि वह बच्चे से मिलने के लिए गयी थी और उसे बताने की कोशिश की थी कि वह कौन है और कि सिडनी और मैं केनिंगटन रोड पर उसके और उसके पापा...मम्मी के साथ रहे थे लेकिन बच्चे को कुछ भी याद नहीं था क्योंकि वह उस समय मात्र चार बरस का ही था। उसे अपने पिता की भी कोई स्मृतियां नहीं थीं। अब वह दस बरस को होने को आया था। उसे लुइस के मायके वाले नाम के साथ रखा गया था और मां जहाँ तक पता लगा पायी थी, उसका कोई रिश्तेदार नहीं था। मां ने लिखा था कि वह खूबसूरत और शांत लड़का निकल आया था। वह शर्मीला और ख्यालों में खोया रहने वाला लड़का था। वह उसके लिए थैला भर मिठाइयां, संतरे और सेब लेकर गयी थी और उससे वायदा किया था कि वह उसके पास नियमित रूप से आती रहेगी और मेरा विश्वास है वह तब तक जाती भी रही होगी जब तक वह खुद बीमार हो कर फिर से केन हिल में वापिस न भेज दी गयी हो।

मां के एक बार फिर पागल हो जाने की खबर सीने में खंजर की तरह लगी। हमें पूरे ब्यौरे कभी नहीं मिल पाये। हमें सिर्फ एक शुष्क सरकारी पर्ची मिली कि वह बेमतलब और असंगत तरीके से गलियों में फिरती हुई पायी गयी थी। हम कुछ भी तो नहीं कर सकते थे सिवाय इसके कि बेचारी मां की किस्मत के लेखे को स्वीकार कर लें। उसके बाद उसका दिमाग फिर कभी पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ।

वह कई बरस तक केन हिल पागल खाने में ही तब तक एड़ियाँ रगड़ती रही जब तक हम इस लायक नहीं हो गये कि उसे एक प्राइवेट पागल खाने में भर्ती करवा सकें।

कई बार बदकिस्मती के देवता भी अपनी चलाते-चलाते थक जाते हैं और थोड़ी-सी दया माया दिखला देते हैं जैसा कि मां के मामले में हुआ। अपने जीवन के अंतिम सात बरस मां को आराम से, फूलों से घिरे हुए और धूप से घिरे हुए बिताने का मौका मिला। वह अपने बड़े हो गये सपूतों को यश और किस्मत के उस स्तर को भोगते देख सकी जिसकी उसने कभी कल्पना की थी।

शरलॉक होम्स के तीसरे टूर के कारण ही सिडनी और मुझे मां को देखने आने में अच्छा-खासा वक्त लग गया। फ्रॉहमैन कम्पनी के साथ टूर हमेशा के लिए खत्म हो गया। इसके बाद थियेटर रॉयल, ब्लैकबर्न के मालिक मिस्टर हैरी यॉर्क ने फ्रॉहमैन से छोटे शहरों में खेलने के लिए शरलॉक होम्स के अधिकार खरीद लिये। सिडनी और मुझे नयी कम्पनी में रख लिया गया लेकिन अब हमारा वेतन घटा कर पैंतीस शिलिंग प्रति सप्ताह कर दिया गया था।

उत्तरी इंगलैंड के छोटे शहरों में अपेक्षाकृत हल्के स्तर के कम्पनी के साथ नाटक खेलना घुटन पैदा करने वाला और स्तर से नीचे आने जैसा था। इसके बावजूद, इसने मेरे इस विवेक को समृद्ध किया कि जो कम्पनी हम छोड़ कर आये थे और जिसमें काम कर रहे थे उनमें क्या फर्क था। मैं इस तुलना को छुपाने की कोशिश करता लेकिन रिहर्सलों के समय, नये निर्देशक की मदद करने के उत्साह में मैं अक्सर उसे बताने लगता कि ये काम तो फ्रॉहमैन कम्पनी में इस तरह से होता था और फलां काम उस तरह से होता था। वह बेचारा तो मुझसे स्टेज डायरेक्शन, संवादों के संकेतों तथा स्टेज पर होने वाले कामों के बारे में पूछ लिया करता था। लेकिन सच तो यह था कि मैं अपनी इस हरकत से बाकी कलाकारों के साथ खास तौर पर लोकप्रिय नहीं हो पाया था और मुझे बड़बोले के रूप में देखा जाने लगा था। बाद में, नये स्टेज पर अपनी यूनिफार्म में से एक बटन खो देने के कारण मैनेजर ने मुझ पर दस शिलिंग का जुर्माना ठोंक दिया। इस बटन के बारे में वे मुझसे पहले भी कई बार कह चुके थे।

विलियम गिलेट, शरलॉक होम्स के लेखक, क्लारिसा नाम के नाटक में मारियो डोरो को ले कर आये। ये नाटक भी उन्होंने ही लिखा था। समीक्षक नाटक के प्रति और गिलेट की स्पीच के तरीके के प्रति बहुत बेरहम थे, जिसकी वजह से गिलेट साहब को एक पर्दा उठाऊ, कर्टेन रेजर नाटक द' पेनफुल प्रेडिक्टामेंट ऑफ शरलाक होम्स' लिखने पर मजबूर होना पड़ा। इसमें उन्होंने कभी एक शब्द भी नहीं बोला था। नाटक के पात्रों में सिर्फ तीन ही लोग थे, एक पगली, खुद होम्स और उनका पेज बॉय। जब मुझे मिस्टर पोस्टेंट, गिलेट के प्रबंधक से एक तार मिला तो मुझे लगा, मेरे लिए स्वर्ग से खास संदेश आ गया है। मुझसे पूछा गया था कि क्या मैं लंदन आ कर कर्टेन रेजर में विलियम गिलेट महोदय के साथ बिली की भूमिका अदा करना चाहूँगा?

मैं पेसोपेश के मारे कांपने लगा। मेरी चिंता ये थी कि क्या मेरी कम्पनी वाले इतने कम समय के नोटिस पर प्रदेशों में मेरी जगह कोई दूसरा बिली खोज लेंगे। मैं कई दिन तक उहापोह वाले रहस्य में डूबता-इतराता रहा। अलबत्ता, उन्हें दूसरा बिली मिल गया।

लंदन में वापिस लौट कर वेस्ट एंड में नाटक करने के अनुभव को मैं सिर्फ अपने पुनर्जागरण के रूप में ही बयान कर सकता हूँ। मेरा दिमाग प्रत्येक घटना के रोमांच के साथ चकर-घिन्नी सा घूम रहा था। शाम के वक्त ड्यूक के यॉर्क थियेटर में पहुँचना और स्टेज मैनेजर मिस्टर पोस्टेंट से मिलना, जो मुझे मिस्टर गिलेट के ड्रेसिंग रूप में लिवा ले गये, और जब मेरा उनसे परिचय करवा दिया गया तो उनका मुझसे पूछा,"...क्या तुम मेरे साथ शरलॉक होम्स में काम करना चाहोगे?"

और मेरा उत्साह के मारे नर्वस हो जाना, ..."ओह ज़रूर, मिस्टर गिलेट, ज़रूर ज़रूर...।" और अगली सुबह रिहर्सल के लिए स्टेज पर इंतज़ार करना और पहली बार मारियो डोरो को देखना। वे निहायत खूबसूरत सफेद रंग की गर्मी की पोशाक पहने हुए थीं। सुबह के वक्त इतनी खूबसूरत किसी महिला को देख लेने का अचानक झटका! वे दो पहिये की एक बग्घी में आयी थीं और उन्होंने पाया कि उनकी पोशाक पर कहीं स्याही का एक धब्बा लग गया है। वे नाटक की प्रापर्टी वाले से पूछना चाह रही थीं कि कहीं कुछ होगा इस दाग से छुटकारा पाने के लिए तो जब उस आदमी ने इस बारे में शक जाहिर किया तो उनके चेहरे पर खीझ के इतने शानदार भाव आये,"ओह, लेकिन क्या ये इतना वाहियात नहीं है?"

वे बला की सुंदर थीं। मैं उनसे खफ़ा हो गया। में उनके नाज़ुक, कलियों से खिलते हेंठों से नाराज़ हो गया, उनके एक जैसे सफेद दांतों से नाराज़ हो गया, उनकी मदमस्त ठुड्डी ने मुझे खफ़ा कर दिया, उनके लहराते बाल, और उनकी गहरी भूरी आँखों ने मुझे नाराज़ कर दिया। मैं उनके नाराज़ होने की अदा पर नाराज़ हुआ और उस आकर्षण पर खफ़ा हुआ जो उन्होंने इस बात को पूछते समय दिखाया था। इस पूछताछ के दौरान मैं उनके और प्रापर्टी वाले के बस एकदम पास ही खड़ा हुआ था, पर वे मेरी उपस्थिति से पूरी तरह अनजान थीं। हालांकि मैं उनके पास ही, उनकी खूबसूरती से ठगा और मंत्र बिद्ध सा खड़ा था। मैं हाल ही में सोलह बरस का हुआ था और इस अचानक चकाचौंध के सानिध्य ने मेरा यह पक्का इरादा सामने ला दिया कि मैं इससे अभिभूत नहीं होऊँगा। लेकिन हे भगवान! वे इतनी खूबसूरत थीं। ये पहली ही नज़र में प्यार था।

द' पेनफुल प्रेडिक्टामेंट ऑफ शरलॉक होम्स' में आइरीन वानब्रुग नाम की एक बहुत ही उत्कृष्ट अभिनेत्री ने पगली की भूमिका की थी और नाटक में बोलने का सारा काम वही करती थीं जबकि होम्स चुपचाप बैठे रहते और सुनते। ये समीक्षकों पर करारा तमाचा था। मेरी हिस्से में शुरुआती लाइनें थी, मैं होम्स के अपार्टमेंट मे जा घुसता हूँ और दरवाजा थामता हूँ जबकि बाहर से पगली दरवाजा लगातार पीट रही है और जब मैं उत्साह में भर कर होम्स को ये समझाना चाहता हूँ कि क्या हो रहा है, पगली धड़धड़ाती हुई अंदर आती है। लगातार बीस मिनट तक वह किसी ऐसे मामले के बारे में आँय बाँय बकती रहती है जिसके बारे में वह चाहती है कि होम्स हाथ में ले लें। चोरी छुपे होम्स एक पर्ची लिखते है और घंटी बजाते हैं और वह पर्ची मुझे थमा देते हैं। बाद में दो हट्टे कट्टे आदमी आ कर उस पगली को लिवा ले जाते हैं। मैं तथा होम्स अकेले रह जाते हैं। मैं कहता हूँ,"... आप ठीक कहते हैं सर, यह सही पागल खाना था।"

समीक्षकों को लतीफा अच्छा लगा लेकिन क्लारीसा नाटक जो गिलेट ने मैरी डोरो के लिए लिखा था, फ्लॉप गया। हालांकि उन्होंने मैरी की खूबसूरती के गुणगान किये थे लेकिन उन्होंने लिखा कि यही काफी नहीं मदोन्मत्त नाटक को बांधे रखने के लिए। इसलिए गिलेट ने उस सीजन का बाकी वक्त शरलॉक होम्स को फिर से नये सिरे से पेश करके गुज़ारा। मुझे इस नाटक में फिर से बिली की भूमिका के लिए रख लिया गया।

विख्यात विलियम्स गिलेट के साथ काम करने के अति उत्साह में मैं अपने काम की शर्तों वगैरह के बारे में बात करना ही भूल गया। सप्ताह खत्म होने पर मिस्टर पोस्टेंट मेरे पास आये और मुझे वेतन का लिफाफा देते हुए शर्मिंदा होते हुए कहने लगे,"...मैं तुम्हें ये राशि देते हुए वाकई शर्मिंदा हूँ लेकिन फ्रॉहमैन के दफ्तर में मुझे यही बताया गया था कि मुझे तुम्हें उतनी ही राशि देनी है जितनी पहले तुम हमसे लेते रहे थे।...दो पाउंड और दस शिलिंग।" मुझे ये राशि पा कर सुखद आश्चर्य हुआ।

होम्स की रिहर्सलों के दौरान, मैं मेरी डोरो से फिर मिला...वह पहले से भी ज्यादा खूबसूरत नजर आ रही थीं। मेरे इस संकल्प के बावजूद कि मैं उनकी खूबसूरती के जाल में नही फँसूंगा, मैं उनके मौन प्यार के निराशाजनक सागर में और गहरे धंसता चला गया। मैं इस कमज़ोरी से नफ़रत करता था और अपने चरित्र की कमज़ोरी के कारण खुद से खफ़ा था। ये एक तरफा प्यार का मामला था। मैं उनसे प्यार भी करता था और नफ़रत भी करता था। इतना ही नहीं, वह बला की खूबसूरत और भव्य थी।

होम्स में वे एलिस फॉकनर की भूमिका निभाती थीं। लेकिन नाटक के दौरान हम कभी भी नहीं मिले। अलबत्ता, मैं सीढ़ियों पर उनका इंतज़ार करता और वे जब गुज़र कर जातीं तो गुड मार्निंग कह दिया करता। वे जवाब में खुश होकर गुड मार्निंग कहतीं और यही था जो हम दोनों के बीच हो पाया।

होम्स ने हाथों-हाथ सफलता के झंडे गाड़ दिये। नाटक जब चल रहा था तो रानी एलेक्जेंड्रा भी देखने आयीं। उनके साथ रॉयल बॉक्स में ग्रीस के राजा और प्रिंस क्रिश्चियन भी बैठे थे। प्रिंस महोदय राजा जी को जबरदस्ती नाटक समझाये जा रहे थे और ऐसे अत्यंत तनाव भरे और अशांत पलों में जब होम्स और मैं स्टेज पर अकेले होते हैं, पूरे थियेटर में गूँजती-सी एक आवाज़ सुनाई दी,"...मुझे मत बताओ, मुझे मत बताओ।"

डिऑन बाउसीकाल्ट का दफ्तर भी ड्यूक ऑफ यॉर्क थियेटर में ही था और आते-जाते वे मेरे सिर पर प्यार भरी चपत लगा दिया करते। हाल केन भी ऐसा ही करते। वे अक्सर गिलेट से मिलने बैक स्टेज में आ जाया करते। एक मौके पर तो मुझे लॉर्ड किचनर से मुस्कुराहट का भी सम्मान मिला।

जब शरलॉक होम्स चल रहा था, उन्हीं दिनों सर हेनरी इर्विंग का देहांत हो गया और मुझे वेस्टमिन्स्टर ऐब्बी में उनके अंतिम संस्कार में जाने का मौका मिला। मैं चूँकि वेस्ट एंड का एक्टर था इसलिए मुझे विशेष पास मिला और मैं इस बात से बेहद खुश हुआ। अंतिम संस्कार के वक्त मैं शांत लेविस वालर और डॉ. वाल्फोर्ड बोडी के बीच बैठा। लेविस उन दिनों लंदन के रोमांटिक अभिनेताओं के बेताज़ बादशाह थे और डॉक्टर बोडी की ख्याति रक्तरहित सर्जरी के कारण थी। उन पर मैंने बाद में एक रंगारंग कार्यक्रम में उनके पात्र का स्वांग किया था। वालर मौके की नज़ाकत के अनुरूप खूबसूरत तरीके से कपड़े पहने हुए थे और गर्दन अकड़ाये, सीधे बैठे वे न दायें देख रहे थे और न बायें। लेकिन डॉक्टर बोडी, बस इस कोशिश में कि वे हेनरी के ताबूत को नीचे अब उतारे जाते समय बेहतर तरीके से देख पायें, ड्यूक की छाती से उचक उचक कर देखते रहे। जबकि वालर साहब को अच्छी खासी कोफ्त हो रही थी। मैंने कुछ भी देखने की कोशिश ही छोड़ दी और मेरे आगे जो लोग बैठे हुए थे, सिर्फ उन्हीं की पीठ की तरफ देखता रहा।

शारलॉक होम्स के बंद होने से दो सप्ताह पहले मिस्टर बाउसीकॉल्ट ने विख्यात मिस्टर और मिसेज कैंडल के नाम मुझे इस बात की संभावना के साथ एक परिचय पत्र दिया कि शायद मुझे उनके नये नाटक में कोई भूमिका मिल जाये। वे सेंट जेम्स थियेटर में अपने सफल नाटक के शो खत्म कर रहे थे। मिलने के लिए सवेरे दस बजे का समय तय हुआ। मैडम कैंडल मुझे फोयर में मिलने वाली थीं। वे बीस मिनट देरी से आयीं। आखिरकार, गली में एक आकृति उभरी। ये मिसेज कैंडल थीं। लम्बी तगड़ी, अभिमानी मोहतरमा। उन्होंने यह कहते हुए मेरा अभिवादन किया,"ओह, तो तुम हो, छोकरे से!! हम जल्द ही प्रदेशों की तरफ एक नया नाटक ले कर जा रहे हैं। मैं चाहूंगी कि तुम हमें अपनी भूमिका पढ़ कर सुनाओ। लेकिन फिलहाल तो हम बहुत ही व्यस्त हैं। इसलिए तुम कल सुबह इसी वक्त यहां आ रहे हो!!"

"माफ करना मैडम," मैंने ठंडेपन के साथ जवाब दिया, "लेकिन मैं शहर से बाहर कोई भी काम स्वीकार नहीं कर सकता।" इसके साथ ही मैंने अपना हैट ऊपर किया, फोयर से बाहर आया, वहां से गुज़रती एक टैक्सी रुकवायी और - मैं दस महीने तक बेकार रहा था।

जिस रात ड्यूक ऑफ यार्क थियेटर में शारलॉक होम्स का अंतिम शो हुआ, और मैरी डोरो को अमेरिका वापिस लौटना था, मैं अकेला ही बाहर निकल गया और शराब पी कर बुरी तरह से धुत्त हो गया। दो या तीन बरस बाद फिलेडाल्फिया में मैंने उन्हें दोबारा देखा। उन्होंने उस नये थियेटर का समर्पण किया था जिसमें मैं कार्नो कॉमेडी कम्पनी में अभिनय कर रहा था। वे अभी भी पहले की ही तरह खूबसूरत थीं। मैं विंग्स में अपना कॉमेडी का मेक अप किये हुए उन्हें देखता रहा था। वे भाषण दे रही थीं। मैं इतना अधिक शरमा रहा था कि आगे बढ़ कर उन्हें अपने बारे में बता ही नहीं पाया था।

लंदन में होम्स के समापन पर प्रदेशों में काम करने वाली कम्पनी के नाटक भी समाप्त हो चले थे और इस तरह से सिडनी और मैं, दोनों ही बिना काम के थे। सिडनी ने अलबत्ता, नया काम तलाशने में कोई वक्त नहीं गंवाया। नाटकों से संबंधित एक अखबार ऐरा में एक विज्ञापन देख कर वह सड़क छाप कॉमेडी करने वाली चार्ली मैनान की कम्पनी में शामिल हो गया। उन दिनों इस तरह की बहुत सारी कम्पनियां हुआ करती थीं जो हॉलों के चक्कर लगाती फिरती थीं। चार्ली बाल्डविन की बैंक क्लर्कस, जो बोगानी की लुनैटिक बेकर्स और बोइसेटे ट्रुप, ये सब के सब मूक अभिनय करते थे। हालांकि ये लोग प्रहसन कॉमेडी करते थे, उनमें साथ साथ बजाया जाने वाला संगीत होता था और ये बहुत लोकप्रिय हुआ करते थे। सबसे उत्कृष्ट कम्पनी कार्नो साहब की थी जिनके पास कॉमेडियों का खजाना था। इन सबको बर्ड्स कहा जाता था। ये होते थे, जेल बर्ड, अर्ली बर्ड्स, ममिंग बर्ड्स। इन तीन स्केचों से कार्नो साहब ने तीस से भी ज्यादा कम्पनियों का थियेटर का ताम झाम खड़ा कर लिया था। इनमें क्रिसमस पेंटोमाइम और खूब ताम झाम वाले संगीत कार्यक्रम होते। कार्नो साहब के इन्हीं नाटकों की देन थी कि वहां से फ्रेड किचन, जॉर्ज ग्रेव्स, हैरी वैल्डन, बिल रीव्ज़, चार्ली बैल और दूसरे कई महान कलाकार और कॉमेडियन सामने आये।

ये उसी वक्त की बात है जब सिडनी मेनान ट्रुप के साथ काम कर रहा था और उसे फ्रेड कार्नो ने देखा और चार पाउंड प्रति सप्ताह के वेतन पर रख लिया। चूंकि मैं सिडनी से चार बरस छोटा था, इसलिए मैं किसी भी थियेटर के काम के लिए न तो बड़ों में गिना जाता और न ही छोटों में ही, लेकिन मैंने अपने लंदन के दिनों में किये गये काम से कुछ पैसे बचा कर रखे थे, और जिस वक्त सिडनी प्रदेशों में काम करता घूम रहा था, मैं लंदन में ही रहा और पूल के खेल खेलता रहा।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 6

मैं किशोरावस्था की मुश्किल और अनाकर्षक उम्र के दौर में आ पहुंचा था और उस उम्र के संवेदनशील उतार-चढ़ावों से जूझ रहा था। मैं बुद्धूपने और अतिनाटकीयता का पुजारी था, स्वप्नजीवी भी और उदास भी। मैं ज़िंदगी से खफ़ा भी रहता था और उसे प्यार भी करता था। मेरा दिमाग अविकसित कोष की तरह था फिर भी उसमें अचानक परिपक्वता के सोते से फूट रहे थे। चेहरे बिगाड़ते दर्पणों की इस भूल भुलइयां में मैं इधर उधर डोलता और मेरी महत्त्वाकांक्षाएं रह-रह कर फूट पड़ती थीं। कला शब्द कभी भी मेरे भेजे में या मेरी शब्द सम्पदा में नहीं घुसा। थियेटर मेरे लिए रोज़ी-रोटी का साधन था, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

इस चक्कर और भ्रम के आलम में मैं अकेला ही रहता आया। इस अवधि के दौरान मेरी ज़िंदगी में रंडियों, बेशर्म औरतों और बीच-बीच में एकाध बार शराबखोरी के मौके आते और जाते रहे। लेकिन सुरा, सुंदरी और न ही गाना बजाना देर तक मेरे भीतर दिलचस्पी जगाये रख पाये। मैं सचमुच रोमांस और रोमांच चाहता था।

मैं एडवर्डकालीन कपड़ों में गदबदे बच्चे, टेडी बॉय के मनोवैज्ञानिक नज़रिये को अच्छी तरह से समझ सकता हूं। हम सब की तरह वह भी ध्यान चाहता है, अपनी ज़िंदगी में रोमांस और ड्रामा चाहता है। तब क्यों न प्रदर्शन की भावना के पल और खरमस्ती की कामना उसके मन में आये जिस तरह से पब्लिक स्कूल का लड़का अपनी आवारगर्दी और उदंडता के साथ इस कामना का प्रदर्शन करता है। क्या यह प्राकृतिक और स्वाभाविक नहीं है कि जब वह अपने वर्ग और तथाकथित बेहतर वर्गों को अपनी अकड़फूं दिखाते हुए देखता है तो उसके मन में भी यही कुछ करने की ललक जागती है।

वह जानता है कि मशीन उसके मन की बात मानती है और किसी भी वर्ग की बात मानती है। कि उसके गियर बदलने या बटन दबाने के लिए किसी खास मानसिकता की ज़रूरत नहीं पड़ती। अपनी असंवेदनशील उम्र में वह किसी नवाब, अभिजात्य या विद्वान की तरह भयावह नहीं है। उसकी उंगली किसी नेपोलियन सेना की तरह इतनी ताकतवर नहीं है कि किसी शहर को नेस्तनाबूद कर डाले। क्या टेडी बॉय अपराधी शासक वर्ग की राख में से जन्म लेता फिनिक्स नहीं है! उसका व्यवहार शायद अचेतन की इस भावना से प्रेरित है कि आदमी सिर्फ अर्ध पालतू जानवर होता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी दूसरों पर धोखेबाजी, क्रूरता और हिंसा के जरिये ही राज करता रहा है। लेकिन जैसा कि बर्नार्ड शॉ ने कहा है,"मैं आदमी को वैसे ही भटकाता हूं जिस तरह से तकलीफें हमेशा भटकाती हैं।"

और आखिर मुझे एक रंगारंग व्यक्तिचित्र, केसै'ज सर्कस में काम मिल ही गया। मुझे डिक टर्पिन, हाइवे मैन और ड़ॉ वैल्फोर्ड बोडी पर प्रहसन करना था। मुझे सफलता का पूरा इलहाम था क्योंकि ये सिर्फ निचले दर्जे की कॉमेडी के अलावा भी बहुत कुछ था। ये एक प्रोफेसरनुमा, विद्वान,व्यक्ति का चरित्र-चित्रण था और मैंने खुशी-खुशी मन ही मन तय किया कि मैं उन्हें जस का तस पेश करूंगा। मैं कम्पनी में सबकी आंखों का तारा था। हफ्ते में तीन पाउंड कमाता था। इसमें बच्चों का एक ट्रुप शामिल था जो एक सड़क दृश्य में बड़ों की नकल उतारता था। मुझे लगा, ये बहुत ही वाहियात किस्म का शो था लेकिन इसने मुझे एक कॉमेडियन के रूप में खुद को विकसित करने को मौका दिया। जब कैसी'ज सर्कस ने लंदन में प्रदर्शन किये तो हम छ: लोग मिसेज फील्डस् के साथ केनिंगटन रोड पर रहे। वे पैंसठ बरस की एक बूढ़ी विधवा महिला थीं जिनकी तीन बेटियां थीं। फ्रेडेरिका, थेल्मा, और फोबे। फ्रेडेरिका की एक रूसी केबिनेट मेकर के साथ शादी हो रखी थी जो वैसे तो शरीफ आदमी था लेकिन निहायत ही बदसूरत था। उसका चौड़ा-सा तातार चेहरा था, लाल बाल थे, लाल ही मूंछें और आंख में उसकी भेंगापन था। हम छ: के छ: जन रसोई में खाना खाया करते। हम परिवार को बहुत अच्छी तरह से जानने लग गये थे। सिडनी जब भी लंदन में काम कर रहा होता, वहीं ठहरता।

जब मैंने अंतत: कैसी'ज़ सर्कस छोड़ा तो मैं केनिंगटन रोड लौटा और फील्ड्स परिवार के पास ही रहता रहा। बूढ़ी महिला भली, धैर्यवान और मेहनतकश थीं और उनकी कमाई का ज़रिया कमरों से आने वाला किराया ही था। फ्रेडेरिका, यानी शादीशुदा लड़की का खर्चा पानी उसका पति देता था। थेल्मा और फोबे घर के काम-काज में हाथ बंटातीं। फोबे की उम्र पंद्रह बरस की थी और वह खूबसूरत थी। उसकी कद काठी लम्बोतरी और चिड़ियानुमा टेढ़ी थी और वह शारीरिक तथा भावनात्मक रूप से मुझ पर बुरी तरह से आसक्त थी। मैं दूसरी वाली के प्रति अपनी भावनाओं को रोकता क्योंकि मैं अभी सत्रह बरस का भी नहीं हुआ था और लड़कियों के मामले में मेरी नीयत डांवाडोल ही रहती थी। लेकिन वह तो साधवी प्रकृति की थी और हमारे बीच कुछ भी हुआ नहीं। अलबत्ता, वह मेरी दीवानी होती चली गयी और बाद में चल कर हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गये।

फील्ड्स परिवार बहुत ही अधिक संवेदनशील था और कई बार आपस में वे लोग एक-दूसरे से प्यार भरी झड़पों में उलझ जाते। इस तू तू मैं मैं का कारण अक्सर यही होता कि घर का काम करने की बारी किसकी है। थेल्मा, जो लगभग बीस बरस की थी, घर की मालकिन होने का दंभ भरती थी। वह आलसी थी और वह हमेशा यही दावा करती कि काम करने की बारी फ्रेडेरिका या फोबे की है। यह मामूली-सी बात तू तू मैं मैं से बढ़ कर हाथापाई तक जा पहुंचती। तब गड़े मुरदे उखाड़े जाते और पूरे परिवार की बखिया ही उधेड़ी जाती। और उस पर तुर्रा ये कि ये सबकी आंखों के सामने ही होता। मिसेज फील्डस् तब रहस्योद्घाटन करतीं कि चूंकि थेल्मा घर से भाग चुकी है और लीवरपूल में एक युवा वकील के साथ रह चुकी है अत: वह अपने आपको यही मान कर चलती है कि वही घर की सर्वेसर्वा होनी चाहिये और ये बात उसकी हैसियत से नीचे की है कि वह घर का कामकाज करे। मिसेज फील्डस् तब अपना आखिरी हथियार छोड़ती हुई कहतीं,"ठीक है, अगर तुम अपने आपको इस तरह की औरत मानती हो तो यहां से दफ़ा हो जाओ और जा के रहो अपने उसी लीवरपूल वाले वकील के पास, बस देख लेना अगर वो तुम्हें अपने घर में घुसने दे तो।" और दृश्य को अंतिम परिणति पर पहुंचाने के लिए मिसेज फील्डस् चाय की केतली उठा कर जमीन पर दे मारतीं। इस दौरान थेल्मा मेज पर महारानी की तरह बैठी रहती और ज़रा भी विचलित न होती। तब वह आराम से उठती, एक कप उठाती और, और उसे हौले से यह कहते हुए ठीक वैसे ही ज़मीन पर टपका देती,"मुझे भी ताव आ सकता है।" इसके बाद वह एक और कप उठा कर जमीन पर गिराती, एक और कप, फिर एक और कप .. .। वह तब तक कप गिरा-गिरा कर त़ेडती रहती जब तक सारा फर्श क्रॉकरी की किरचों से भर न जाता,"मैं भी सीन क्रिएट कर सकती हूं।" इस पूरे नज़ारे के दौरान मां और उसकी बहनें असहाय-सी बैठी देखती रहतीं,"जरा देखो तो, देखो तो ज़रा, क्या कर डाला है इसने?" मां घिघियाती।

"ये देख, ये देख, यहां कुछ और भी है जो तू तोड़ सकती है," और वे थेल्मा के हाथ में चीनी दानी थमा देतीं। और थेल्मा आराम से चीनी दानी पकड़ लेती और उसे भी जमीन पर गिरा देती।

ऐसे मौकों पर फोबे की बीच-बचाव कराने वाली की भूमिका होती। वह निष्पक्ष थी, ईमानदार थी और पूरा परिवार उसकी इज़्ज़त करता था। और अक्सर यही होता कि झगड़ा टंटा निपटाने के लिए वह खुद ही काम करने के लिए तैयार हो जाती। थेल्मा उसे ऐसा न करने देती।

मुझे लगभग तीन महीने होने को आये थे कि मेरे पास कोई काम नहीं था और सिडनी ही मेरा खर्चा-पानी जुटा रहा था। वही मेरे रहने-खाने के लिए मिसेज फील्डस् को हर हफ्ते के चौदह शिलिंग दे रहा था। वह अब फ्रेड कार्नो की कम्पनी के साथ मुख्य हास्य कलाकार की भूमिका निभा रहा था और अक्सर फ्रेड के साथ अपने हुनरमंद छोटे भाई की बात छेड़ देता। लेकिन कार्नो उसकी बातों पर कान ही नहीं धरते थे। उनका मानना था कि मैं बहुत छोटा हूं।

उस समय लंदन में यहूदी कामेडियनों की धूम थी। इसलिए मैंने सोचा कि मैं भी मूंछें लगा कर अपनी कम उम्र छुपा लूंगा। सिडनी ने मुझे दो पांउड दिये जिनसे मैं गाने-बजाने का साजो-सामान खरीद लाया और लतीफों की एक अमरीकी किताब मैडिसन बजट में से ढेर-सारे मज़ाकिया संवाद मार लिये। मैं हफ्तों तक प्रैक्टिस करता रहा। फील्डस् परिवार के सामने प्रदर्शन करता रहा। वे ध्यान से मेरा काम देखते और मेरा उत्साह भी बढ़ाते लेकिन इससे ज्यादा कुछ नहीं।

मैंने फोरेस्टर म्युजिक हॉल में बिना एक भी धेला दिये एक ट्रायल हफ्ते का जुगाड़ कर लिया था। ये एक छोटा-सा थियेटर था जो यहूदी चौक पर बीचों-बीच माइल एंड रोड से पीछे की तरफ बना हुआ था। मैं वहां पहले भी कैसी'ज सर्कस के साथ अभिनय कर चुका था और मैनेजमेंट ने यह सोचा कि मैं इस लायक तो होऊंगा ही सही कि मुझे एक मौका दिया जाये। मेरी भावी उम्मीदें और मेरे सपने इसी ट्रायल पर टिके हुए थे। फोरेस्टरके यहां प्रदर्शन करने के बाद मैं इंगलैंड के सभी प्रमुख सर्किटों में प्रदर्शन करता। कौन जानता है, हो सकता है मैं एक बरस के भीतर ही रंगारंग कार्यक्रमों के शो का सबसे बड़ा और अखबारों की हैड लाइनों पर छा जाने वाला कलाकार बन जाऊं। मैंने पूरे फील्डस् परिवार के साथ वादा किया था कि मैं उन्हें हफ्ते के आखिरी दिनों के टिकट दिलवा दूंगा। तब तक मैं अपनी भूमिका के साथ भी अच्छी तरह से न्याय कर पाऊंगा।

"मेरा ख्याल है कि आप अपनी सफलता के बाद हम लोगों के साथ नहीं रहना चाहेंगे?" फोबे ने पूछा था।

"बेशक, मैं यहीं रहता रहूंगा।"

सोमवार की सुबह बारह बजे बैंड रिहर्सल और संवाद अदायगी आदि की रिहर्सल थी जिसे मैंने व्यावसायिक तरीके से निपटाया। लेकिन मैंने अब तक अपने मेक अप की तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया था। रात के शो से पहले मैं घंटों तक ड्रेसिंग रूम में बैठा माथा-पच्ची करता रहा,नये-नये प्रयोग करता रहा, लेकिन मैं भले ही कितने भी लंबे रेशमी बाल क्यों न लगाऊं, मैं अपनी जवानी छुपा नहीं पा रहा था। हालांकि इस बारे में मैं भोला था लेकिन मेरी कॉमेडी बहुत अधिक यहूदी विरोधी थी और मेरे लतीफे पिटे-पिटाये थे और वाहियात थे। बल्कि मेरे यहूदी उच्चारण की तरह घटिया भी थे। और उस पर तुर्रा यह कि मैं बिल्कुल भी मज़ाकिया नहीं लग रहा था।

पहले दो एक लतीफ़ों पर ही जनता ने सिक्के और संतरे के छिलके फेंकने और जमीन पर धमाधम पैर पटकने शुरू कर दिये। पहले तो मैं समझ ही नहीं पाया कि आखिर ये हो क्या रहा है! तभी इस सब का आतंक मेरे सिर पर चढ़ गया। मैंने फटाफट रेल की गति से बोलना शुरू कर दिया। हुल्लड़बाजी और संतरों तथा सिक्कों की बरसात बढ़ती जा रही थी। जब मैं स्टेज से नीचे उतरा, तो मैं मैनेजमेंट का फैसला सुनने के लिए भी नहीं रुका, मैं सीधे ही ड्रेसिंग रूम में गया, अपना मेक-अप उतारा, थियेटर से बाहर निकला और फिर कभी वहां वापिस नहीं गया। यहां तक कि मैं वहां अपनी संगीत की किताबें उठाने भी नहीं गया।

रात को बहुत देर हो चुकी थी जब मैं वापिस केनिंगटन रोड पहुंचा। फील्डस् परिवार सोने जा चुका था और मैं इसके लिए उनका अहसानमंद ही था कि वे सो चुके थे। सुबह नाश्ते के वक्त मिसेज फील्डस् इस बारे में जानने को चिंतित थीं कि शो कैसा रहा। मैंने उदासीनता दिखायी और कहा,"वैसे तो ठीक रहा लेकिन उसमें कुछ हेर-फेर करने की ज़रूरत पड़ेगी।" उन्होंने बताया कि फोबे नाटक देखने गयी थी लेकिन उसने वापिस आ कर कुछ बताया नहीं क्योंकि वह बहुत थकी हुई थी और सीधे ही सोने चली गयी थी। जब मैंने बाद में फोबे को देखा तो उसने इसका कोई ज़िक्र नहीं किया। मैंने भी कोई ज़िक्र नहीं किया और न ही मिसेज फील्डस् ने या किसी और ने कभी भी इसका कोई ज़िक्र ही किया और न ही इस बात पर हैरानी ही व्यक्त की कि मैं उसे सप्ताह तक जारी क्यों नहीं रख रहा हूं।

भगवान का शुक्र है कि उन दिनों सिडनी दूसरे प्रदेशों की तरफ गया हुआ था और मैं उसे बताने की इस ज़हमत से बच गया कि आखिर हुआ क्या था। लेकिन ज़रूर उसने अंदाजा लगा लिया होगा या हो सकता है फील्डस् परिवार ने उसे बता दिया हो क्योंकि उसने मुझसे कभी भी इस बारे में कोई पूछताछ नहीं की। मैंने उस रात के दु:स्वप्न को अपनी स्मृति से धो-पोंछ देने की पूरी कोशिश की लेकिन उसने मेरे आत्म-विश्वास पर एक न मिटने वाला धब्बा छोड़ दिया था। उस भुतैले अनुभव ने मुझे यह पाठ पढ़ाया कि मैं खुद को सच्ची रौशनी में देखूं।

मैंने महसूस कर लिया था कि मैं रंगारंग हास्य कलाकार नहीं हूं। मेरे भीतर वह आत्मीय, नज़दीक आने की कला नहीं थी जो आपको दर्शकों के निकट ले जाती है। और मैंने अपने आपको यही तसल्ली दे ली कि मैं चरित्र प्रधान हास्य कलाकार हूं। अलबत्ता, व्यावसायिक रूप से अपने पैरों पर खड़े होने से पहले मुझे दो एक और निराशाओं का सामना करना पड़ा।

सत्रह बरस की उम्र में मैंने द' मेरी मेजर नाम के एक नाटक में किशोर युवक के रूप में मुख्य पात्र का अभिनय किया। ये एक सस्ता,हतोत्साहित करने वाला नाटक था जो सिर्फ एक हफ्ते चला। मुख्य नायिका, जो मेरी बीवी बनी थी, पचास बरस की औरत थी। हर रात जब वह मंच पर आती तो उसके मुंह से जिन की बू आ रही होती, और मुझे उसके पति की भूमिका में, उत्साह से लबरेज हो कर उसे अपनी बाहों में लेना पड़ता,उसे चूमना पड़ता। इस अनुभव ने मेरा इस बात से मन ही खट्टा कर दिया कि मैं कभी मुख्य कलाकार बनूं।

इसके बाद मैंने लेखन पर हाथ आजमाये। मैंने एक कॉमेडी स्कैच लिखा जिसका नाम था ट्वैल्व जस्ट मैन।ये एक हल्के फुल्के प्रहसन वाला मामला था कि किस तरह जूरी वचन भंग के एक मामले में बहस करती है। जूरी के सदस्यों में से एक गूंगा- बहरा था, एक शराबी था और एक अन्य नीम-हकीम था। मैंने ये आइडिया चारकोट को बेच दिया। ये रंगारंग मंच का एक हिप्नोटिस्ट था जो किसी हँसोड़ आदमी को हिप्नोटाइज़ करता और उसे आंखों पर पट्टी बांध कर शहर की गलियों में गाड़ी चलाने के लिए प्रेरित करता जबकि वह खुद पीछे बैठ कर उस पर चुम्बकीय प्रभाव छोड़ता रहता। उसने मुझे पांडुलिपि के लिए तीन पाउंड दिये लेकिन ये शर्त भी जोड़ दी कि मैं ही उसका निर्देशन भी करूंगा। हमने अभिनेताओं आदि का चयन किया और केनिंगटन रोड परहॉर्नस् पब्लिक हाउस क्लब रूम में रिहर्सल शुरू कर दी। एक खार खाये एक्टर ने कह दिया कि ये स्कैच न केवल अनपढ़ों वाला है बल्कि मूर्खतापूर्ण भी है।

तीसरे दिन जब रिहर्सल चल रही थी, मुझे चारकोट से एक नोट मिला कि उसने इस स्कैच का निर्माण न करने का फैसला कर लिया है।

अब मैं चूंकि जांबाज टाइप का नहीं था, मैंने नोट अपनी जेब के हवाले किया और रिहर्सल जारी रखी। मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि उन्हें रिहर्सल करने से रोक सकूं। इसके बजाये, मैं लंच के समय सबको अपने कमरे पर लिवा लाया और उनसे कहा कि मेरा भाई उनसे बात करना चाहता है। मैं सिडनी को बेडरूम में ले गया और उसे नोट दिखाया। नोट पढ़ने के बाद सिडनी ने कहा,"ठीक है। तुमने उन्हें इस बारे में बता दिया है ना!"

"नहीं," मैं फुसफुसाया।

"तो जा कर बता दो।"

"मैं नहीं बता सकता। बिलकुल भी नहीं। वे लोग तीन दिन तक फालतू फंड में रिहर्सल करते रहे हैं।"

"लेकिन इसमे तुम्हारा क्या दोष?" सिडनी ने कहा।

"जाओ और उन्हें बता दो," वह चिल्लाया।

मैं हिम्मत हार बैठा और रोने लगा,"क्या कहूं मैं उनसे?"

"मूरख मत बनो," वह उठा और साथ वाले कमरे में आया और उन सबको चारकोट का नोट दिखाया और समझाया कि क्या हो गया है। तब वह सबको नुक्कड़ के पब तक ले गया और सबको सैंडविच और एक-एक ड्रिंक दिलवाये।

अभिनेता एकदम मौजी आदमी होते हैं। कब क्या कर बैठें, कहा नहीं जा सकता। वह आदमी जो इतना ज्यादा भुनभुना रहा था, एकदम दार्शनिक हो गया और जब उसे सिडनी ने बताया कि मैं किस बुरी हालत में था तो वह हँसा और मेरी पीठ पर धौल जमाते हुए बोला,"इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है पुत्तर, ये सब तो उस हरामी चारकोट का किया धरा है।"

फोरेस्टर्स में अपनी असफलता के बाद मैंने जिस काम में भी हाथ डाला, उसी में मैं धराशायी हुआ और मुझे एक बार फिर असफलता का मुंह देखना पड़ा। अलबत्ता, आशावादी बने रहना जवानी का सबसे बड़ा गुण होता है, क्योंकि इसी जवानी में आदमी स्वभावत: यह मान कर चलता है कि प्रतिकूल परिस्थितियां भी अल्पकालिक ही होती हैं और बदकिस्मती का लगातार दौर भी सही होने के सीधे और संकरे रास्ते की तरह संदिग्ध होता है। दोनों ही निश्चित ही समय के साथ-साथ बदलते हैं। मेरी किस्मत ने पलटा खाया। एक दिन सिडनी ने बताया कि मिस्टर कार्नो मुझे मिलना चाहते हैं। ऐसा लगा कि वे अपने किसी कामेडियन से नाखुश थे जो फुटबाल नाटक में मिस्टर हैरी वेल्डन के साथ भूमिका कर रहा था। ये स्कैच कार्नो साहब का अत्यंत सफल नाटक था। वेल्डन अत्यंत लोकप्रिय हास्य कलाकार थे जो तीसरे दशक में अपनी मृत्यु तक उसी तरह से लोकप्रिय बने रहे।

मिस्टर कार्नो थोड़े मोटे, तांबई रंग के आदमी थे। उनकी आंखों में चमक थी और जिनमें हमेशा नापने जोखने के भाव होते। उन्होंने कभी अपना कैरियर आड़े डंडों पर काम करने वाले एक्रोबैट के रूप में शुरू किया था और इसके बाद उन्होंने अपने साथ तीन धमाकेदार कामेडियनों की चौकड़ी बनायी। ये चौकड़ी मूकाभिनय स्केचों का केन्द्र थी। वे खुद बहुत ही उत्कृष्ट हास्य अभिनेता थे और उन्होंने कई कॉमेडी भूमिकाओं की शुरुआत की थी। वे उस वक्त तक भी हास्य भूमिकाएं करते रहे जब उनकी दूसरी पांच-पांच कम्पनियां एक साथ चल रही थीं।

उनके मूल सदस्यों में से एक उनकी सेवा निवृत्ति का मज़ेदार किस्सा यूं बताया करता था: एक रात मानचेस्टर में प्रदर्शन के बाद, मंडली ने शिकायत की कि कार्नो की टाइमिंग गड़बड़ायी थी और उन्होंने सारे लतीफों के मज़े पर पानी फेर दिया। कार्नो, जिन्होंने तब तक अपने पांच प्रदर्शनों से 50,000 पाउंड जुटा लिये थे, कहा,"ठीक है मेरे दोस्तो, अगर आप लोगों को ऐसा लगता है तो यही सही। मैं छोड़ देता हूं।" और तब अपनी विग उतारते हुए उन्होंने उसे ड्रेसिंग टेबल पर पटका और हँसते हुए बोले,"इसे आप लोग मेरा इस्तीफा समझ लो।"

मिस्टर कार्नो का घर कोल्ड हारबर लेन, कैम्बरवैल में था और इससे सटा हुआ एक गोदाम था जिसमें वे अपनी बीस प्रस्तुतियों के लिए सीन सिनरी रखा करते थे। उनका अपना ऑफिस भी वहीं पर था। जब मैं वहां पहुंचा तो वे बहुत प्यार से मिले, "सिडनी मुझे बताता रहा है कि तुम कितने अच्छे हो," उन्होंने कहा,"क्या तुम्हें लगता है कि तुम द' फुटबाल मैच में हैरी वेल्डन के सामने अभिनय कर पाओगे?"

हेरी वेल्डन को खास तौर पर बहुत ऊंची पगार पर रखा गया था। उनकी पगार चौंतीस पाउंड प्रति सप्ताह थी।

"मुझे सिर्फ मौका चाहिये," मैंने आत्मविश्वास पूर्ण तरीके से कहा।

वे मुस्कुराये,"सत्रह बरस की उम्र बहुत कम होती है और तुम तो और भी छोटे लगते हो!"

मैं यूं ही कंधे उचकाये,"ये सब मेक अप से किया जा सकता है।"

कार्नो हंसे। इस कंधे उचकाने ने ही मुझे काम दिलवाया था, बाद में सिडनी ने मुझे बताया था।

"ठीक है, ठीक है, हम देख लेंगे कि तुम क्या कर सकते हो।"

ये काम मुझे तीन सप्ताह तक ट्रायल के रूप में करना था जिसके एवज में मुझे प्रति सप्ताह तीन पाउंड और दस शिलिंग मिलते और अगर मैं संतोषजनक पाया जाता तो मुझे एक बरस के लिए करार पर रख लिया जाता।

लंदन कोलेसियम में प्रदर्शन शुरू होने से पहले मेरे पास अपनी भूमिका का अध्ययन करने के लिए एक सप्ताह का समय था। कार्नो साहब ने मुझे बताया कि मैं जा कर शेफर्ड बुश एम्पायर में द' फुटबाल मैच देखूं और उस आदमी का अध्ययन करूं जिसकी भूमिका मुझे करनी है। मुझे ये मानने में कोई शर्म नहीं कि वह सुस्त और आत्म सजग था और ये कहने में भी कोई झूठी शेखी नहीं है कि मैं जानता था कि मैं उससे आगे निकल जाऊंगा। भूमिका में थोड़े और कैरिकेचर, और ज्यादा स्वांग की ज़रूरत थी। मैं अपना मन बना चुका था कि मैं उसे ठीक वैसे ही पेश करूंगा।

मुझे मात्र दो ही रिहर्सलें दी गयीं, क्योंकि इससे ज्यादा के लिए मिस्टर वेल्डन उपलब्ध नहीं थे। दरअसल वे इस बात के लिए भी खफा थे कि उन्हें अपना गोल्फ का खेल छोड़ कर सिर्फ इसी के लिए आना पड़ा।

रिहर्सलों के दौरान मैं प्रभाव न जमा सका। चूंकि मैं धीमे पढ़ता था अत: मुझे ऐसा लगा कि वेल्डन साहब मेरी क्षमता के बारे में कुछ संदेह करते थे। सिडनी भी चूंकि यही भूमिका अदा कर चुका था, अगर वह लंदन में होता तो ज़रूर मेरी मदद करता, लेकिन वह तो दूसरे हास्य नाटक में अन्य प्रदेशों में काम कर रहा था।

हालांकि द' फुटबाल मैच स्वांग वाला मामला था, फिर भी जब तक मिस्टर वेल्डन साहब सामने न आ जाते, कहीं से भी हंसी की आवाज़ नहीं फूटती थी। सब कुछ उनकी एंट्री के साथ ही जुड़ा हुआ था। और इसमें कोई शक नहीं कि वे बहुत ही शानदार किस्म के हास्य कलाकार थे और उनके आने से हँसी का जो सिलसिला शुरू होता था, वह आखिर तक थमता नहीं था।

कोलिसियम में अपने नाटक की शुरुआत की रात मेरी नसें रस्सी की तरह तनी हुई थीं। उस रात का मतलब फिर से मेरे खोये हुए आत्म विश्वास को वापिस पाना और फोरेस्टर में उस रात जो कुछ हुआ था, उसके दु:स्वप्न से खुद को मुक्त करना था। उस विशालकाय स्टेज पर मैं आगे-पीछे हो रहा था। मेरे डर के ऊपर चिंता कुंडली मारे बैठी थी और मैं अपने लिए प्रार्थना कर रहा था।

तभी संगीत बजा। पर्दा उठा। स्टेज पर एक्सरसाइज़ करते कलाकारों का एक कोरस चल रहा था। आखिरकार वे चले गये और स्टेज खाली हो गया। ये मेरे लिए संकेत था। भावनात्मक हा हा कार के बीच मैं चला। या तो मैं मौके के अनुरूप खरा उतरूंगा या फिर मुंह के बल गिरूंगा। स्टेज पर पैर रखते ही मैं राहत महसूस करने लगा। सब कुछ मेरे सामने साफ था। दर्शकों की तरफ पीठ करके मैंने मंच पर प्रवेश किया था। ये मेरा खुद का आइडिया था। पीछे की तरफ से मैं टिप टॉप लग रहा था। फ्रॉक कोट पहने हुए, टॉप हैट, हाथ में छड़ी और मोजे। हू ब हू एडवर्डकालीन विलेन। तब मैं मुड़ा। और अपनी लाल नाक दिखलायी। हंसी का फव्वारा। इससे मैं दर्शकों का कृपापात्र बन गया। मैंने उत्तेजनापूर्ण तरीके से कंधे उचकाये,अपनी उंगलियां चटकायीं और स्टेज पर इधर उधर चला। एक मुगदर पर ठोकर खायी। इसके बाद मेरी छड़ी सीधे जा कर पंचिंग बैग के साथ अटक गयी और वह उछल कर वापिस मेरे मुंह पर आ लगा। मैं अकड़ कर चला और घूमा, अपने ही सिर की तरफ बार बार छड़ी से वार करता। दर्शक हँसी के मारे दोहरे हो गये।

अब मैं पूरी तरह से सहज था और नयी नयी बातें मेरे दिमाग में घूम रही थीं। मैं स्टेज को पांच मिनट तक भी बांधे रख सकता था और एक शब्द भी बोले बिना उन्हें लगातार हँसा सकता था। अपनी विलेनमुमा चाल के बीच मेरी पैंट नीचे सरकने लगी। मेरा एक बटन टूट गया था। मैं बटन की तलाश करने लगा। मैंने यूं ही कुछ उठाने का नाटक सा किया और हिकारत से परे फेंक दिया,"ये करमजले खरगोश!!!" एक और ठहाका।

हैरी वेल्डन का चेहरा पूरे चांद की तरह विंग्स में नज़र आने लगा था। उनके मंच पर आने से पहले कभी भी ठहाके नहीं लगे थे।

ज्यों ही उन्होंने स्टेज पर अपनी एंट्री ली मैंने लपक कर ड्रामाई अंदाज में उनकी बांह थाम ली और फुसफुसाया,"जल्दी कीजिये, मेरी पैंट खिसकी जा रही है। एक पिन का सवाल है।" ये सब उसी वक्त के सोचे हुए का कमाल था और इसके लिए कोई रिहर्सल नहीं की गयी थी। मैंने हैरी साहब के लिए दर्शकों को पहले ही तैयार कर दिया था। उस शाम उन्हें जो सफलता मिली, वह आशातीत थी और हम दोनों ने मिल कर दर्शकों से कई अतिरिक्त ठहाके लगवाये। जब पर्दा नीचे आया तो मुझे पता था, मैं किला फतह कर चुका हूं। मंडली के कई सदस्यों ने हाथ मिलाये और मुझे बधाई दी। ड्रेसिंग रूम की तरफ जाते समय वैल्डन साहब ने अपने पीछे मुड़ कर देखा और शुष्क स्वर में बोले,"अच्छा रहा। बहुत बढ़िया रहा।"

उस रात मैं अपने घर तक पैदल चल कर गया ताकि अपने आपको खाली कर सकूं। मैं रुका और वेस्टमिन्स्टर ब्रिज पर झुका, और उसके नीचे से बहते गहरे, रेशमी पानी को देखता रहा। मैं खुशी के मारे रोना चाहता था। लेकिन मैं रो नहीं पाया। मैं ज़ोर लगाता रहा, मुद्राएं बनाता रहा,लेकिन मेरी आँखों में कोई आंसू नहीं आये। मैं खाली हो चुका था। वेस्टमिन्स्टर ब्रिज से मैं चल कर एलिफैंट एंड कैसल ट्यूब स्टेशन तक गया और एक कप कॉफी के लिए एक स्टाल पर रुक गया। मैं किसी से बात करना चाहता था, लेकिन सिडनी तो बाहर के प्रदेशों में था। काश, वह यहां होता तो मैं उसे आज की रात के बारे में बता पाता! आज की रात मेरे लिये क्या मायने रखती थी! खास तौर पर फोरेस्ट्रर की रात के बाद।

मैं सो नहीं पाया। एलिफैंट एंड कैसल से मैं केनिंगटन गेट तक गया और वहां एक और कप चाय पी। रास्ते में मैं अपने आप से बतियाता रहा और अकेले हँसता रहा। बिस्तर पर जाने के समय सुबह के पांच बजे थे और मैं बुरी तरह से पस्त हो चुका था।

पहली रात मिस्टर कार्नो वहां पर मौजूद नहीं थे। लेकिन वे तीसरी रात को आये। उस मौके पर मेरी एंट्री के वक्त जम कर तालियां मिलीं। वे बाद में वहां आये। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी और उन्होंने मुझसे कहा कि मैं सवेरे उनके ऑफिस में आ कर करार कर लूं।

मैंने पहली रात के बारे में सिडनी को नहीं लिखा था, लेकिन अब मैंने उसे एक संक्षिप्त तार भेजा,"मैंने एक बरस के लिए चार पाउंड प्रति सप्ताह पर करार कर लिया है, प्यार, चार्ली।"

द' फुटबाल मैच लंदन में चौदह सप्ताह तक रहा और उसके बाद दौरे पर चला गया।

वेल्डन साहब की कॉमेडी विकलांग टाइप की थी। वे धीमी गति के समाचारों की तरह लंकाशायर वाले लहजे में गड़बड़ भाषा बोलते थे। ये अदा उत्तरी इंगलैंड में बहुत बढ़िया तरीके से चल जाती थी लेकिन दक्षिण में उन्हें बहुत अधिक भाव नहीं दिया गया। ब्रिस्टॉल, कार्डिफ, प्लायमाउथ,साउथम्पटन, जैसे शहर वेल्डन के लिए मंदे गये। इन सप्ताहों में वे चिड़चिड़े होते चले गये और उनका प्रदर्शन नाम मात्र का रहा तो वे अपना गुस्सा मुझ पर उतारते रहे। शो में उन्हें मुझे थप्पड़ मारना और धकियाना था और ये सब काफी बार करना था। इसे झपकी लेना कहा जाता था। इसका मतलब यह होता था कि वे मेरे चेहरे पर मारेंगे लेकिन इसे वास्तविक प्रभाव देने के लिए विंग्स में कोई ज़ोर से हाथों से ताली बजायेगा। कई बार वे मुझे सचमुच मार बैठते, और वह भी बिना ज़रूरत के और ज़ोर से। मुझे लगता है कि वे ईर्ष्या से भर कर ही ऐसा करते थे।

बेलफेस्ट में तो स्थिति और खराब हो गयी। समीक्षकों ने उनकी ऐसी-तैसी कर दी थी लेकिन मेरी भूमिका की तारीफ की थी। इसे भला वेल्डन साहब कैसे सहन कर सकते थे। सो, एक रात उन्होंने स्टेज पर ही अपना गुस्सा निकाला और मुझे ऐसा ज़ोर का थप्पड़ मारा कि मेरी सारी कॉमेडी निकाल कर धर दी। मेरी नाक से खून आने लगा। बाद में मैंने उन्हें बताया कि अगर उन्होंने फिर कभी ऐसा किया तो मंच पर ही मुगदर से उनकी धुनायी कर दूंगा। और उस पर यह भी जोड़ दिया कि अगर उन्हें ईर्ष्या हो रही है तो उसे कम से कम मुझ पर तो न निकालें।

"ईर्ष्या और वो भी तुमसे?" वे ड्रेसिंग रूम की तरफ जाते हुए बोले,"क्यों रे, मेरी गुदा में ही इतना टैलेंट है जितना तुम्हारे पूरे शरीर में भी नहीं होगा।"

"यही वो जगह है जहां आपका टेलेंट रहता है।" मैं गुर्राया और लपक कर डेसिंग रूम का दरवाजा बंद कर दिया।

सिडनी जब शहर में वापिस आया तो हमने तय किया कि ब्रिक्स्टन रोड पर एक फ्लैट ले लें और उसे चालीस पाउंड तक की राशि खर्च करके उसे सजाएं। हम नेविंगटन बट्स में पुराने फर्नीचर की एक दुकान में गये और मालिक को बताया कि हम कितनी राशि खर्च करने का माद्दा रखते हैं और कि हमारे पास सजाये जाने के लिए चार कमरे हैं। मालिक ने हमारी समस्या में व्यक्तिगत रूप से दिलचस्पी ली और हमारे काम की चीज़ें चुनने में घंटों हमारे साथ खपाये। हमारे पहले वाले कमरे में कालीन बिछाया और बाकी तीन कमरों में लिनोलियम। इसके अलावा हम अस्तर चढ़ा हुआ सामान भी लाये। इसमें एक दीवान और दो आराम कुर्सियां थीं। बैठने के कमरे के एक कोने में हमने एक नक्काशीदार मूरिश परदा रखा जिसके पीछे से पीला बल्ब जलता था और उसके सामने वाले कोने में मुलम्मा चढ़ी ईज़ल पर सोने का पानी चढ़े फ्रेम में हमने एक पेस्टल सजाया। यह तस्वीर एक निर्वस्त्र औरत की थी जो एक पेडस्टल पर खड़ी थी और अपने कंधे के पीछे से दाढ़ी वाले चित्रकार की तरफ देख रही थी जो उसके नितम्ब के पास एक मक्खी को चित्रित करने की कोशिश कर रहा था। यह कलाकृति और परदा, मेरे हिसाब से कमरे को भरा पूरा बना रहे थे। असली प्रदर्शन योग्य चीज़ तो एक मूरिश सिगरेट शॉप और एक फ्रेंच रंडीखाने का जोड़ा थे लेकिन हमें ये अच्छे लगते थे। यहां तक कि हम एक सीधा खड़ा पियानो भी लेते आये। और हालांकि हमने अपने बजट से पन्द्रह पाउंड ज्यादा खर्च कर डाले थे, फिर भी हमें इसकी पूरी कीमत मिल गयी थी। 15 ग्लेनशॉ मैन्सन, ब्रिक्स्टन रोड पर हमारा ये घर हमारे सपनों का स्वर्ग था। प्रदेशों में प्रदर्शन करने के बाद हम यहां लौटने का कितनी बेसब्री से इंतजार किया करते थे। अब हम इतने अमीर हो चले थे कि अपने नाना की भी मदद कर सकते थे और उन्हें दस शिलिंग प्रति सप्ताह दिया करते थे। और हमारी हैसियत इतनी अच्छी हो गयी थी कि हफ्ते में दो दिन घर का काम करने वाली नौकरानी आती थी और फ्लैट में झाड़ू पोंछा कर जाती थी। लेकिन इस सफाई की ज़रूरत शायद ही कभी पड़ती हो क्योंकि हम किसी चीज़ को उसकी जगह से हिलाते भी नहीं थे। हम उसमें इस तरह से रहा करते थे मानो ये कोई पवित्र मंदिर हो। सिडनी और मैं अपनी विशालकाय आराम कुर्सियों में पसरे रहते और परम संतुष्टि का अहसास लेते। हम एक ऊंचा सा पीतल का मूढ़ा लेते आये थे जिस पर लाल रंग का चमड़ा मढ़ा हुआ था। मैं आराम कुर्सी से उठ कर मूढ़े पर चला जाता और दोनों पर मिलने वाले आराम की तुलना करता रहता।

सोलह बरस की उम्र में रोमांस के बारे में मेरे ख्यालों को प्रेरणा दी थी एक थियेटर के पोस्टर ने जिसमें खड़ी चट्टान पर खड़ी एक लड़की के बाल हवा में उड़े जा रहे थे। मैं कल्पना करता कि मैं उसके साथ गोल्फ खेल रहा हूं, एक ऐसा खेल जिसें मैं नापसंद करता हूं, और ओस भरी जमीन पर नीचे की ओर चलते हुए, दिल की धकड़न बढ़ाने वाली भावनाओं में डूबे हुए, स्वास्थ्य और प्रकृति के ख्यालों में डूबे हुए उसके साथ साथ चल रहा हूं।

यही मेरे लिए रोमांस था। लेकिन कम उम्र का प्यार तो कुछ और ही होता है। ये आम तौर पर एक जैसे ढर्रे पर चलता है। एक नज़र मिलने पर, शुरुआत में कुछ शब्दों का आदान प्रदान (आम तौर पर गदहपचीसी के शब्द), कुछ ही मिनटों के भीतर पूरी जिंदगी का नज़रिया ही बदल जाता है। पूरी कायनात हमारे साथ सहानुभूति में खड़ी हो जाती है और अचानक हमारे सामने छुपी हुई खुशियों का खज़ाना खोल देती है। और मेरे साथ भी ठीक ऐसा ही हो गुज़रा था।

मैं उन्नीस बरस का होने को आया था और कार्नो कम्पनी का सफल कामेडियन था। लेकिन कुछ था जिसकी अनुपस्थिति खटक रही थी। वसंत आ कर जा चुका था और गर्मियां अपने पूरे खालीपन के साथ मुझ पर हावी थीं। मेरी दिनचर्या बासीपन लिये हुए थी और मेरा परिवेश शुष्क। मैं अपने भविष्य में कुछ भी नहीं देख पाता था, वहां सिर्फ अनमनापन, सब कुछ उदासीनता लिये हुए और चारों तरफ आदमी ही आदमी। सिर्फ पेट भरने की खातिर काम धंधे से जुड़े रहना ही काफी नहीं लग रहा था। ज़िंदगी नौकर सरीखी हो रही थी और उसमें किसी किस्म की बांध लेने वाली बात नहीं थी। मैं तन्हा होता चला गया, अपने आप से असंतुष्ट। मैं रविवारों को अकेला भटकता घूमता रहता, पार्कों में बज रहे बैंडों को सुन का दिल बहलाता। न तो मैं अपनी खुद की कम्पनी झेल पाता था और न ही किसी और की ही। और तभी एक खास बात हो गयी - मुझे प्यार हो गया।

हम स्ट्रीथम एम्पायर में प्रदर्शन कर रहे थे। उन दिनों हम रोज़ रात को दो या तीन म्यूज़िक हॉलों में प्रदर्शन किया करते थे। एक प्राइवेट बस में एक जगह से दूसरी जगह जाते। स्ट्रीथम में हम जरा जल्दी शुरू कर देते ताकि उसके बाद कैंटरबरी म्यूज़िक हॉल और उसके भी बाद,टिवोली में प्रदर्शन कर सकें। अभी सांझ भी नहीं ढली थी कि हमने अपना काम शुरू कर दिया। गर्मी बरदाश्त से बाहर हो रही थी और स्ट्रीथम हॉलआधे से ज्यादा खाली था। और संयोग से ये बात मुझे उदास और तन्हा होने से विमुख नहीं कर सकी।

बर्ट काउंट्स यैंकी डूडले गर्ल्स नाम की गीत और नृत्य की एक मंडली का प्रदर्शन हमसे पहले होता था। मुझे उनके बारे में कोई खास खबर नहीं थी। लेकिन दूसरी शाम, जब मैं विंग्स में उदास और वीतरागी खड़ा हुआ था, उनमें से एक लड़की नृत्य के दौरान फिसल गयी और दूसरे लोग ही ही करके हँसने लगे। उस लड़की ने अचानक नज़रें उठायीं और मुझसे आंखे मिलायीं कि क्या मैं भी इस मज़ाक का मज़ा ले रहा हूं। मुझे अचानक दो बड़ी-बड़ी भूरी शरारत से चमकती आंखों ने जैसे बांध लिया। ये आंखें एक दुबले हिरनी जैसे, सांचे में ढले चेहरे पर टंगी हुई थीं और बांध लेने वाला उसका भरा पूरा चेहरा, खूबसूरत दांत, ये सब देखने का असर बिजली जैसा था। जब वह स्टेज से वापिस आयी तो उसने मुझसे कहा कि मैं उसका छोटा-सा दर्पण तो थामूं ताकि वह अपने बाल ठीक कर ले। इससे मुझे उसे देखने परखने का एक मौका मिल गया।

ये शुरुआत थी। बुधवार तक मैं इतना आगे बढ़ चुका था कि उससे पूछ बैठा कि क्या मैं उससे रविवार को मिल सकता हूं। वह हंसी,"मैं तो तुम्हें जानती तक नहीं कि बिना इस लाल नाक के तुम लगते कैसे हो।" उन दिनों मैं ममिंग बर्ड्स में शराबी के रोल वाली कॉमेडी कर रहा था और लम्बा कोट और सफेद टाई पहने रहता था।

"मेरी नाक इतनी ज्यादा तो लाल नहीं है और फिर मैं उतना गया गुजरा भी नहीं हूं जितना नज़र आता हूं।" मैंने कहा, "और इस बात को सिद्ध करने के लिए मैं कल रात अपनी एक तस्वीर लेता आऊंगा।"

मेरा ख्याल है मैंने उसके सामने एक गिड़गिड़ाते, उदास और नौसिखुए किशोर को पेश किया था जो काली स्टॉक टाइ पहने हुआ था।

"ओह, लेकिन तुम तो बहुत जवान हो," उसने कहा,"मुझे तो लगा कि तुम्हारी उम्र बहुत ज्यादा होगी।"

"तुम्हें कितनी लगती है मेरी उम्र?"

"कम से कम तीस"

मैं मुस्कुराया,"मैं उन्नीस पूरे करने जा रहा हूं।"

चूंकि हम लोग रोज़ ही पूर्वाभ्यास किया करते थे इसलिए सप्ताह के दिनों में उससे मिल पाना मुश्किल होता था। अलबत्ता, उसने वायदा किया कि वह रविवार की दोपहर ठीक चार बजे केनिंगटन गेट पर मिलेगी।

रविवार का दिन एकदम बढ़िया, गर्मी भरा था और सूर्य लगातार चमक रहा था। मैंने एक गहरा सूट पहना जो सीने के पास शानदार कटाव लिये हुए था और अपने साथ एक काली आबनूसी छड़ी डुलाता चला। मैंने काली स्टॉक टाइ भी पहनी हुई थी। चार बजने में दस मिनट बाकी थे और घबराहट के मारे मेरा बुरा हाल था, मैं इंतज़ार कर रहा था और यात्रियों को ट्रामकारों से उतरता देख रहा था।

जब मैं इंतज़ार कर रहा था तो मैंने महसूस किया कि मैंने हैट्टी को बिना मेक अप के तो देखा ही नहीं था। मुझे इस बात की बिल्कुल भी याद नहीं आ रही थी कि वह देखने में कैसी लगती है। मैं जितनी ज्यादा कोशिश करता, मुझे उसका चेहरा मोहरा याद ही न आता। मुझे हल्के से डर ने जकड़ लिया। शायद उसका सौन्दर्य नकली था। एक भ्रम!! साधारण सी दिखने वाली जो भी लड़की ट्रामकार में से उतरती, मुझे हताशा के गर्त में धकेलती जाती। क्या निराशा ही मेरे हाथ लगेगी? क्या मैं अपनी ही कल्पना के द्वारा छला गया हूं या थियेटरी मेक अप के नकलीपने ने मुझसे छल किया है?

चार बजने में तीन मिनट बाकी थे कि एक लड़की ट्रामकार से उतरी और उसने मेरी तरफ बढ़ना शुरू किया। मेरा दिल डूब गया। उसका चेहरा मोहरा निराश करता था। उसके साथ पूरी दोपहरी बिताने का ख्याल और उत्साह बनाये रखने का नाटक करना, मेरी तो हालत ही खराब हो गयी। इसके बावजूद मैंने अपना हैट ऊपर किया और अपने चेहरे पर मुस्कुराहट लाया। उसने हिकारत से मेरी तरफ घूरा और आगे बढ़ गयी। भगवान का शुक्र है, ये वो नहीं थी।

तब, चार बज कर ठीक एक मिनट पर ट्रामकार में से एक नवयुवती उतरी, आगे बढ़ी और मेरे सामने आ कर रुक गयी। इस समय वह बिना किसी मेक अप के थी और पहले की तुलना में ज्यादा सुंदर नज़र आ रही थी। उसने सादा सेलर हैट, पीतल के बटनों वाला नीला वर्दी कोट पहना हुआ था, और उसके हाथ ओवरकोट की जेबों में गहरे धंसे हुए थे।

"लो मैं आ गयी" कहा उसने।

उसकी मौजूदगी इतनी आल्हादित करने वाली थी कि मैं बात ही नहीं कर पा रहा था। मेरी सांस फूलने लगी। मैं कुछ कहने या करने की सोच ही नहीं पाया।

"चलो टैक्सी कर लेते हैं।" मैं सड़क पर आगे पीछे की तरफ देखते हुए और फिर उसकी तरफ मुड़ते हुए भारी आवाज़ में बोला।

"तुम कहां जाना चाहोगी?"

"कहीं भी"

"तो चलो, वेस्ट एंड में डिनर के लिए चलते हैं।"

"मैं डिनर ले चुकी हूं" उसने ठंडेपन से कहा।

"ये बात हम टैक्सी में तय कर लेंगे" मैंने कहा।

मेरी भावनाओं के उबाल के वजह से वह ज़रूर ही सकपका गयी होगी, क्योंकि टैक्सी में जाते हुए मैं लगातार यही कहता रहा था, "मुझे पता है कि मुझे एक दिन इसके लिए अफसोस करना पड़गा, तुम इतनी ज्यादा सुंदर हो।" मैं बेकार ही में उस पर प्रभाव जमाने और उसका दिल बहलाने की कोशिश करता रहा। मैंने बैंक से तीन पाउंड निकाले थे और सोचा था कि ट्रोकाडेरो रेस्तरां ले कर जाऊंगा। वहां के संगीत और शानो शौकत के माहौल में वह मुझे बेहद रोमांटिक रूप में देख पायेगी। मैं चाहता था कि मुझसे मिल कर उसके पैर तले की ज़मीन गायब हो जाये। लेकिन वह मेरी बक बक सुन कर सूनी आंखों से और कुछ हद तक हैरान परेशान सी देखती रही। खास कर एक बात जो मैं उससे कहना चाह रहा था कि वह मेरी प्रतिशोध की देवी है। ये शब्द मैंने नया नया सीखा था।

जो बातें मेरे लिए इतने ज्यादा मायने रखती थीं, उन्हें वह कितना कम समझ पा रही थी। इसका सेक्स से कुछ लेना देना नहीं था: जो बात मायने रखती थी, वह था उसका संग साथ। मेरी ज़िदंगी जिस मोड़ पर रुकी हुई थी, वहां पर लावण्य और सौन्दर्य से मिल पाना दुर्लभ ही था।

उस शाम ट्रोकाडेरो में मैंने उसे इस बात के लिए राजी करने की बहुत कोशिश की कि वह मेरे साथ डिनर ले ले, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उसने कहा कि मेरा साथ देने के लिए वह सैंडविच ले लेगी। चूंकि हमने एक बहुत ही भव्य रेस्तरां में एक बहुत बड़ी मेज घेर रखी थी, मुझे ये ज़रूरी लगा कि कई तरह के व्यंजनों वाले खाने का ऑर्डर दिया जाये हालांकि मुझे इस सब की ज़रूरत नहीं थी। डिनर लेना बहुत गम्भीर मामला हो गया। मुझे ये भी नहीं पता था कि किस छुरी कांटे से क्या खाना होता है। मैं खाना खाते समय सहज आकर्षण के साथ शेखियां बघारता रहा, यहां तक कि फिंगर बाउल के इस्तेमाल में भी मैंने लापरवाही का अंदाज अपनाया। लेकिन मेरा ख्याल है, रेस्तरां से बाहर आते समय हम दोनों ही राहत महसूस कर रहे थे।

ट्रोकाडेरो के बाद हैट्टी ने तय किया कि वह घर जायेगी। मैंने टैक्सी का सुझाव दिया लेकिन उसने पैदल चलना ही पसंद किया। चूंकि वह चैम्बरलेन में रहती थी, मेरे लिए इससे अच्छी बात और क्या हो सकती थी। इसका मतलब यही होता कि मैं उसके साथ और ज्यादा वक्त गुज़ार सकता था।

अब चूंकि मेरी भावनाओं का ज्वार उतरने लगा था, वह मुझसे भी ज्यादा सहज लग रही थी। उस शाम हम टेम्स एम्बैंकमेंट§ पर चहलकदमी करते रहे। हैट्टी अपनी सहेलियों के बारे में बातें करती रही, हँसी खुशी की और इधर उधर की बेकार की बातें। लेकिन मुझे इस बात का ज़रा सा भी भान नहीं था कि वह क्या कह रही है। मुझे तो सिर्फ इतना पता था कि रात सौन्दर्य से भरी थी, कि मैं स्वर्ग में चल रहा था और मेरे भीतर आनंद भरी उत्तेजना के सोते फूट रहे थे।

उसे विदा कर देने के बाद मैं फिर से एम्बैंकमेंट पर लौटा। मैं अभिभूत था। मेरे भीतर एक मध्यम लौ का उजाला हो रहा था और तीव्र इच्छा शक्ति जोर मार रही थी। तीन पाउंड में से मेरी जेब में जितने भी पैसे बचे थे, मैंने टेम्स एम्बैंकमेंट पर सोने वाले भिखारियों में बांट दिये।

हमने अगली सुबह सात बजे फिर से मिलने का वायदा किया था क्योंकि शाफ्टेसबरी एवेन्यू में कहीं आठ बजे उसकी रिहर्सल शुरू होती थी। उसके घर से ले कर वेस्टमिन्स्टर ब्रिज रोड अंडरग्राउंड स्टेशन तक की दूरी लगभग डेढ़ मील की थी और हालांकि मैं देर तक काम करता था और शायद ही कभी रात दो बजे से पहले सोता था, मैं उससे मिलने के लिए सही वक्त पर हाजिर था।

कैम्बरवेल को किसी ने जादुई छड़ी से छू लिया था क्योंकि हैट्टी केली वहां पर रहती थी। सुबह के वक्त चैम्बरलेन की सड़कों पर हाथों में हाथ दिये अंडरग्राउंड स्टेशन तक जाना भ्रमित इच्छाओं के साथ घुले मिले वरदान की तरह होता था। गंदा, हताशा से भरने वाली चैम्बरलेन रोड, जिससे मैं हमेशा बचा करता था, अब प्रलोभन की तरह लगती जब मैं दूर से कोहरे में से निकल कर हैट्टी की आकृति को अपनी ओर आते देख रोमांचित होता। उस साथ साथ आने के दौरान मुझे बिल्कुल भी याद न रहता कि उसने क्या कहा है। मैं सम्मोहन के आलम में होता और ये मान कर चलता कि कोई रहस्यमयी ताकत हमें एक दूजे के निकट लायी है और भाग्य में पहले से ये लिखा था कि हम इस तरह से मिलेंगे।

उससे परिचय पाये मुझे तीन सुबहें हो गयी थीं; इन संक्षिप्त सुबहों के कारण बाकी दिन के अस्तित्व का पता ही नहीं चलता था। अगली सुबह ही पता चलता था। लेकिन चौथी सुबह उसका व्यवहार बदला हुआ था। वह मुझसे ठंडेपन से मिली। कोई उत्साह नहीं था उसमें। उसने मेरा हाथ भी नहीं थामा। मैंने इसके लिए उसे फटकारा और मज़ाक में उस पर आरोप लगाया कि वह मुझसे प्यार नहीं करती है।

"तुम कुछ ज्यादा ही उम्मीद करने लगे हो," कहा उसने "ज़रा ये भी तो देखो कि मैं सिर्फ पन्द्रह बरस की हूं और तुम मुझसे चार बरस बड़े हो।"

मैं उसके इस जुमले के भाव को समझ नहीं पाया। लेकिन मैं उस दूरी की भी अनदेखी नहीं कर पाया जो उसने अचानक ही हम दोनों के बीच रख दी थी। वह सीधे सामने की तरफ देख रही थी और गर्वोन्नत तरीके से चल रही थी। उसकी चाल स्कूली लड़की की तरह थी और उसके दोनों हाथ ओवरकोट की जेबों में गहरे धंसे हुए थे।

"दूसरे शब्दों में कहें तो तुम सचमुच मुझसे प्यार नहीं करती?"

"मुझे नहीं पता," वह बोली।

मैं हक्का बक्का रह गया। "अगर तुम नहीं जानती तो तुम प्यार नहीं करती।"

उत्तर देने के बजाये वह चुपचाप चलती रही।

"देखो तो जरा, मैं भी देवदूत ही हूं। मैंने तुमसे कहा था न कि मुझसे तुमसे मिलने का हमेशा अफसोस होता रहेगा।" मैंने हल्केपन से कहना जारी रखा।

मैंने उसका दिमाग टटोलने की कोशिश की कि आखिर उसके दिमाग में चल क्या रहा था और मेरे सभी सवालों के जवाब में वह सिर्फ यही कहती रही, "मुझे नहीं पता।"

"मुझसे शादी करोगी?" मैंने उसे चुनौती दी।

"मैं बहुत छोटी हूं।"

"अच्छा एक बात बताओ, अगर तुम्हें शादी के लिए मज़बूर किया जाये वो वो मैं होऊंगा या कोई और?"

लेकिन उसने किसी भी बात पर हां नहीं की और यही कहती रही,"मुझे नहीं पता, मैं तुम्हें पसंद करती हूं . .लेकिन . ."

"लेकिन तुम मुझसे प्यार नहीं करती।" मैंने उसे भारी मन से टोकते हुए कहा।

वह चुप रही। ये बादलों भरी सुबह थी और गलियां गंदी और हताश पैदा करने वाली लग रही थीं।

"मुसीबत ये है कि मैंने इस मामले को बहुत दूर तक जाने दिया है।" मैंने भारी आवाज़ में कहा। हम अंडरग्राउंड स्टेशन के गेट तक पहुंच गये थे, "मेरा ख्याल यही है कि हम विदा हो जायें और फिर कभी दोबारा एक दूजे से न मिलें।" मैंने कहा और सोचता रहा कि उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी।

वह उदास दिखी।

मैंने उसका हाथ थामा और हौले से सहलाया,"गुड बाय, यही बेहतर रहेगा। पहले ही तुम मुझ पर बहुत असर डाल चुकी हो।"

"गुड बाय" उसने जवाब दिया,"मुझे माफ करना।"

उसका माफी मांगना मेरे दिल पर कटार की तरह लगा। और जैसे ही वह अंडरग्राउंड में गायब हुई, मुझे असहनीय खालीपन ने घेर लिया।

मैंने क्या कर डाला था? क्या मैंने बहुत जल्दीबाजी की? मुझे उसे चुनौती नहीं देनी चाहिये थी। मैं भी निरा गावदी हूं कि उससे दोबारा मिलने के सारे रास्ते ही बंद कर दिये, हां तब की बात और है जब मैं खुद को मूरख बनने दूं। मुझे क्या करना चाहिये था? सहन तो मुझे ही करना होगा। काश, उससे दोबारा मिलने से पहले मैं अपनी इस मानसिक यंत्रणा को नींद के जरिये कम कर सकूं। किसी भी कीमत पर मुझे तब तक अपने आपको उससे अलग रखना ही होगा जब तक वह न मिलना चाहे। शायद मैं कुछ ज्यादा ही गम्भीर था, ज्यादा पागल। अगली बार जब हम मिलेंगे तो मैं और अधिक विनम्र और नि:संग रहूंगा। लेकिन क्या वो फिर से मुझसे मिलना चाहेगी? ज़रूर, उसे मिलना ही चाहिये। वह इतनी आसानी से मुझसे किनारा नहीं कर सकती।

अगली सुबह मैं अपने आप पर काबू नहीं पा सका और चैम्बरलेन रोड पर जा पहुंचा। मैं उससे तो नहीं लेकिन उसकी मां से मिला,"तुमने हैट्टी को क्या कर दिया है?" कहा उन्होंने,"वह रोती हुई घर आयी थी और बता रही थी कि तुमने उससे कभी न मिलने की बात कही है।"

मैंने कंधे उचकाये और व्यंग्य से मुस्कुराया,"उसने मेरे साथ क्या किया है?" तब मैंने हिचकिचाते हुए पूछा कि क्या मैं उससे दोबारा मिल सकता हूं।

उन्होंने जोर से अपना सिर हिलाया, "नहीं, मुझे नहीं लगता कि तुम्हें मिलना चाहिये।"

मैंने उन्हें एक ड्रिंक के लिए आमंत्रित किया और हम बात करने के इरादे से पास ही के एक पब में चले गये और बाद में मैंने उनसे एक बार फिर उनुरोध किया कि वे मुझे हैट्टी से मिलने दें तो वे मान गयीं।

जब हम घर पहुंचे तो हैट्टी ने दरवाजा खोला। वह मुझे देख कर हैरान और परेशान नज़र आयी। उसने अभी अभी सनलाइट साबुन से अपना चेहरा धोया था इसलिए एकदम ताज़ा लग रहा था। वह घर के बाहर वाले दरवाजे पर ही खड़ी रही। उसकी बड़ी बड़ी आंखें ठंडी और निर्जीव लग रही थीं। मैं समझ गया, मामला निपट चुका है।

"तो फिर" मैंने मज़ाकिया बनने की कोशिश करते हुए कहा,"मैं एक बार फिर गुडबाय कहने आया हूं।"

उसने कुछ नहीं कहा लेकिन मैं देख पाया कि वह मुझसे जान छुड़ाने के लिए बेताब थी।

मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा,"तो!! एक बार फिर गुडबाय"

"गुडबाय" उसने ठंडेपन से जवाब दिया।

मैं मुड़ा और अपने पीछे मैंने हौले से दरवाजा बंद होने की आवाज़ सुनी।

हालांकि मैं उससे सिर्फ पांच ही बार मिला था और हमारी कोई भी मुलाकात शायद ही बीस मिनट से ज्यादा की रही हो, इस संक्षिप्त हादसे ने मुझे लम्बे अरसे तक प्रभावित किये रखा।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 7

1909 में मैं पेरिस गया। फोलीज़ बेरजेरे ने कार्नो कम्पनी को एक महीने की सीमित अवधि के लिए प्रदर्शन करने के लिए अनुबंधित किया था। मैं दूसरे देश में जाने के ख्याल से ही कितना उत्तेजित था। यात्रा शुरू करने से पहले हमने एक सप्ताह के लिए वूलविच में प्रदर्शन किये। ये एक वाहियात शहर में बिताया गया वाहियात और सड़न भरा सप्ताह था और मैं परिवर्तन की राह देख रहा था। हमें रविवार की सुबह निकलना था। मुझसे गाड़ी, बिल्कुल छूटने वाली ही थी। किसी तरह भाग कर मैंने प्लेटफार्म से छूटती गाड़ी पकड़ी। मैं सामान वाला आखिरी डिब्बा ही पकड़ पाया था। उन दिनों मुझे गाड़ियां मिस करने में महारत हासिल थी।

चैनल पर तेज धूंआधार बरसात होने लगी। लेकिन कोहरे में लिपटे फ्रांस को पहली नजर से देखना कभी न भूलने वाला रोमांचक अनुभव था।...ये इंगलैंड नहीं है। मुझे अपने आपको बार-बार याद दिलाना पड़ रहा था। ये महाद्धीप है। फ्रांस। मैंने अपनी कल्पना में हमेशा इसे देखने की अपील की थी। मेरे पिता आधे फ्रेंच थे। दरअसल, चैप्लिन परिवार मूलत: फ्रांस से इंगलैंड में आया था। वे फ्रांसीसी प्रोटैस्टेंट ईसाई ह्यूग नॉट्स के वक्त इंगलैंड की धरती पर उतरे थे। पिता के चाचा अक्सर गर्व से कहा करते कि एक फ्रांसीसी जनरल ने चैप्लिन परिवार की इंगलैंड शाखा की नींव रखी थी।

ये ढलती शरद ऋतु के दिन थे। और कैलाइस से पेरिस तक की यात्रा बेमज़ा थी। इसके बावजूद, जैसे-जैसे हम पेरिस के निकट पहुंचते गये,मेरी उत्तेजना बढ़ती चली गयी। हम अंधेरे, अकेले गांवों से गुज़र कर जा रहे थे। धीरे-धीरे धूसर आसमान में हमने रौशनी के दर्शन किये।... वो ही है पेरिस का प्रतिबिंब, गाड़ी में हमारे साथ यात्रा कर रहे एक फ्रेंच आदमी ने बताया।

पेरिस में वह सब कुछ था जिसकी मैं उम्मीद कर रहा था। गारे दू नोर्द से रू ज्योफ्रे मारी तक की यात्रा ने मुझे उत्तेजना और अधैर्य से भर दिया। मैं हर नुक्कड़ पर उतर कर पैदल चलना चाहता था। इस समय शाम के सात बज रहे थे। कैफ़े से आमंत्रित करती सी सुनहरी बत्तियां चमक रही थी। और उनके बाहर सजी मेज़ें जीवन के आनंद की बातें कर रही थीं। कुछेक नयी कारों के आगमन के अलावा ये अभी भी मौने, पिसारो तथा रेनॉइर का ही पेरिस था। रविवार का दिन था और लग रहा था जैसे हर आदमी उत्सव के मूड में है। उत्सव और उल्लास वहां की फ़िजां में थे। यहां तक कि रूओ ज्योफ्रे मारी में मेरा पत्थर की दीवारों वाला कमरा जिसे मैं अपनी कारागार कहता था, मेरे उत्साह को दबा नहीं पाया क्योंकि सारा वक्त तो मैं बिस्त्रो और कैफे के बाहर लगी मेज़ों पर ही बैठा रहता था।

रविवार की रात फ्री थी। इसलिए हम फोलिज़ बेरजेरे में शो देख पाये। हमें यहीं पर अगले सोमवार से अपना नाटक शुरू करना था। मैंने सोचा कि कोई भी थियेटर इतने अधिक ग्लैमर के साथ, अपनी चमक-दमक और ठाट-बाट के साथ अपने दर्पणों और बड़े बड़े स्फटिक के फानूसों के साथ चमका नहीं था। मोटे-मोटे कालीन बिछे फोयर में तथा ड्रेस सर्किल में सारी दुनिया मौजूद थी। बड़ी-बड़ी गुलाबी रत्न जड़ित पगड़ियां बांधे भारतीय युवराज, कलगी लगे टोपों में फ्रेंच और टर्की अधिकारी जो शराब घरों में कोनियाक की चुस्कियां लेते नज़र आ रहे थे। बाहर की ओर बड़े फोयर में संगीत की लहरियां बज रही थीं और महिलाएं अपनी पोशाकों को और अपने फर कोटों को सहेजती, संभालती घूम रही थीं और अपने संगमरमरी सफेद कंधों की झलक दिखा रही थीं। वे ऐसी महिलाओं का संसार था जिन्हें फोयर में बने रहने और ड्रेस सर्कल में मौजूद रहने की लत लगी हुई थी और वे चतुराई से वहां अपनी मौजूदगी दर्ज करातीं और चहकती फिरतीं। वे उन दिनों वाकई खूबसूरत और विनम्र हुआ करतीं।

फोलिज़ बेरजेरे में व्यावसायिक दुभाषिये भी थे जो अपनी टोपी पर दुभाषिया का बिल्ला लगाये थियेटर के फोयर में घूमते रहते। मैंने उनमें से प्रमुख दुभाषिये से दोस्ती कर ली जो बहुत सारी भाषाएं धड़ल्ले से बोल सकता था।

शाम को अपने प्रदर्शन के बाद मैं अपनी स्टेज की शाम वाली पोशाक पहन लेता और मज़ा मारने वालों की भीड़ में शामिल हो जाता। उनमें से मुझे एक ऐसी हसीना मिली जिसने मेरा दिल ही छीन लिया। इस तन्वंगी हसीना की गर्दन हंसनुमा थी और उसकी रंगत सफेद थी। वो छोकरी छरहरी थी और बेहद खूबसूरत थी। उसकी सुतवां नाक और लम्बी गहरी बरौनियां थीं। उसने काली मखमली पोशाक पहनी हुई थी और हाथों में सफेद दस्ताने थे। जब वह ड्रेस सर्कल की सीढ़ियां चढ़ने लगी तो उसने अपना एक दस्ताना गिरा दिया। मैंने लपक कर उसका दस्ताना उठा लिया।

"..माफ करना "उसने कहा

"काश, आप इसे एक बार फिर गिरातीं!" मैंने बदमाशी से कहा।

"माफ करना?"

तब मैंने महसूस किया कि उसे अंग्रेजी नहीं आती और मुझे फ्रेंच बोलनी नहीं आती। इसलिए मैं भागा-भागा अपने दुभाषिए दोस्त के पास गया,"उधर एक बला की खूबसूरत लड़की खड़ी है जिसने मेरी कामुकता जागृत कर दी है। लेकिन वह खासी महंगी लग रही है।"

उसने कंधे उचकाये,"एक लुइस से ज्यादा नहीं,"

"तक तो ठीक है," मैंने कहा, हालांकि उन दिनों एक लुइस भी अच्छी खासी रकम हुआ करती थी। मैंने सोचा, और ये थी भी।

मैंने दुभाषिए से एक पोस्टकार्ड की दूसरी तरफ कई फ्रेंच अभिव्यक्तियां लिखवा कर रख ली थीं जैसे जब से मैंने आपको देखा है, मैं होश खो बैठा हूं। इत्यादि जिन्हें मैं ऐसे पवित्र मौकों पर इस्तेमाल करने का इरादा रखता था। मैंने दुभाषिए से कहा कि वह शुरुआती धंधेदारी की बातें करवा दे और उसने हमारे लिए दूत का काम किया। इधर से उधर संदेशों का आदान प्रदान करता रहा। आखिर वह वापिस आया और कहने लगा,"सब कुछ तय हो गया है। एक लुइस में। लेकिन तुम्हें उसके घर तक जाने और वापिस आने का टैक्सी का किराया देना होगा।"

मैं एक पल के लिए चकराया,"वह रहती कहां है?" मैंने पूछा।

"किराये में दस सेंट से ज्यादा नहीं लगेंगे।"

दस सेंट्स की रकम दिल दहला देने वाली थी क्योंकि मैंने इस अतिरिक्त खर्च की उम्मीद ही नहीं की थी। मैंने मजाक में पूछा,"क्या वो पैदल नहीं चल सकती?"

"सुनो, लड़की आला दर्जे की चीज़ है। सिर्फ किराये के लिए लफड़ा मत करो।" उसने बताया।

मैं आखिर तैयार हो गया।

जब सब कुछ तय कर लिया गया तो मैं ड्रेस सर्कल की सीढ़ियों पर उसे पास से गुजरा। वह मुस्कुरायी और मैंने मुड़ कर उसकी तरफ देखा।..."आज शाम!"

"अच्छी बात है महाशय"

चूंकि हमारे प्रदर्शन पूरा होने में टाइम था, मैंने उससे वायदा किया कि हम प्रदर्शन के बाद वहीं मिलते हैं। मेरे दोस्त ने कहा,"तुम टैक्सी मंगाना और मैं तब तक लड़की लेकर आऊंगा, इससे टाइम बरबाद नहीं होगा।"

"टाइम बरबाद?"

हमारी गाड़ी जब बोलेवियर दे इतालियंस के पास गुजरी तो उसके चेहरे पर रौशनी और छाया के चहबच्चे अठखेलियां कर रहे थे। मैंने अपने पोस्टकार्ड पर लिखी फ्रेंच पर उड़ती सी निगाह डाली और उससे कहा..."आप मुझे बहुत अच्छी लगी हैं!"

वह अपने सफेद चमकीले दांत झलकाती हुई हँसी,"आप बहुत अच्छी फ्रेंच बोल लेते हैं।"

मैं भावुक हो कर आगे बोलता रहा," जब से मैंने आपको देखा है, मैं होश खो बैठा हूं। "

वह फिर हँसी और उसने मेरी फ्रेंच सुधारी...और समझाया कि मैं अनौपचारिक जबान का इस्तेमाल करूं और उसे तू या तुम कहूं। उसने इसके बारे में सोचा और फिर हँसी। तब उसने अपनी घड़ी की तरफ देखा। लेकिन घड़ी बंद हो गयी थी। तब उसने इशारे से बताया कि वह समय जानना चाहती है। और बताया कि ठीक बारह बजे उसे एक बहुत ही जरूरी एपाइंटमेंट पर जाना है।

"आज शाम तो नहीं," मैंने झिझकते हुए जवाब दिया।

"हां आज शाम ही"

"लेकिन आप तो आज की पूरी शाम के लिए इंगेज हैं मोहतरमा? पूरी रात के लिए"

वह अचानक बदहवास दिखने लगी,"ओह, नहीं, नहीं, पूरी रात के लिए नहीं।"

इसके बाद वह जिद पर आ गयी,"फिलहाल के लिए बीस फ्रांक!"

"ये क्या है?" उसने जोर दे कर जवाब दिया।

"आयम सौरी," मैंने कहा,"मेरा ख्याल है हम टैक्सी यहीं रुकवा दें।"

और तब टैक्सी को उसे फालिज़ बेरजेरे में वापिस छोड़ आने का भाड़ा दे कर मैं टैक्सी से उतर गया। उस समय मुझसे ज्यादा उदास, और मोहभंग आदमी कौन रहा होगा।

हमें फालिज़ बेरजेरे में दस हफ्ते तक प्रदर्शन करने थे क्योंकि हम बहुत अधिक सफल जा रहे थे लेकिन कार्नो साहब की दूसरी बुकिंग थी। मेरा वेतन छ: पाउंड प्रति सप्ताह था और मैं इसकी पाई पाई खर्च कर रहा था। मेरे भाई सिडनी का एक कज़िन, जो उसके पिता की ओर से उसका कोई लगता था, मेरे परिचय में आया। वह अमीरजादा था और तथाकथित उच्च वर्ग से नाता रखता था। जिन दिनों वह पेरिस में था, उसने मुझे खूब समय भी दिया और घुमाया भी। उसे भी स्टेज के कीड़े ने काटा था और वह स्टेज का इस हद तक दीवाना था कि उसने अपनी मूंछें तक मुंड़वा डालीं ताकि वह हमारी ही मंडली के किसी सदस्य जैसा लग सके और उसे बैक स्टेज में आने दिया जाये।

दुर्भाग्य से उसे इंगलैंड लौट जाना पड़ा, जहां मेरा ख्याल है कि उसके मां बाप ने उसकी अच्छी खासी सिकाई की और उसे उसके महान माता पिता ने दक्षिण अफ्रीका भेज दिया।

पेरिस में जाने से पहले मैंने सुना था कि हैट्टी की मंडली भी फालिज़ बेरजेरे में ही प्रदर्शन कर रही है, इसलिए मुझे पूरा यकीन था कि उससे वहां पर मुलाकात हो जायेगी। जिस रात मैं वहां पहुंचा तो मैं बैक स्टेज में गया और उसके बारे में पूछताछ की। लेकिन वहाँ पर एक बैले लड़की से मुझे पता चला कि उनकी मंडली एक हफ्ता पहले ही मास्को के लिए रवाना हो चुकी है। जिस वक्त मैं उस लड़की से बातें कर रहा था, सीढ़ियों से एक बहुत ही रूखी आवाज सुनायी दी,"तुरंत इधर आओ, अजनबियों से बात करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?" ये लड़की की मां थी। मैंने समझाने की कोशिश की कि मैं तो सिर्फ अपनी एक मित्र के बारे में जानकारी लेना चाह रहा था लेकिन मां ने मेरी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया,"उस आदमी से बात करने की कोई ज़रूरत नहीं है। चलो एकदम अंदर आ जाओ।"

मैं उसकी इस बदतमीजी पर खासा खफा हुआ। अलबत्ता, बाद में मैं उसका अच्छा परिचित बन गया। वह भी उसी होटल में ही रहती थी जिसमें मैं रुका हुआ था। उसकी दो लड़कियां थीं जो फालीज़ बेरजेरे बैले की सदस्याएं थी। उनमें से छोटी वाली तेरह बरस की थी और मुख्य अदाकारा थी। वह सुंदर और विदुशी थी जबकि पंद्रह बरस की बड़ी वाली न तो सुंदर थी और न ही उसमें अक्कल ही थी। मां फ्रेंच थीं भरे पूरे शरीर की मालकिन थीं। उनकी उम्र चालीस बरस के आस पास थी। उन्होंने एक स्कॉटमैन से शादी रचाई थी और वह इंगलैंड में रहता था। जब हमने फालीज़ बेरजेरे में अपने प्रदर्शन शुरू किये तो वे मेरे पास आयीं और माफी मांगने लगीं कि वे इतने बेहूदे तरीके से पेश आयी थीं। ये एक बहुत ही शानदार दोस्ताना संबंध की शुरुआत थी। मुझे अक्सर उनके कमरे में चाय के लिए बुला लिया जाता। चाय वे लोग बेडरूम में ही बनाया करती थीं।

मैं अब जब पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो मैं बेहद मासूम था। एक दोपहर को जब बच्चियां बाहर गयी हुई थीं और मामा और मैं अकेले थे उनका व्यवहार बदल गया और जब वे चाय छान रही थीं तो उनका बदन कांपने लगा। मैं उस वक्त अपने सपनों और अपनी उम्मीदों की बात कर रहा था, अपने प्यार और अपनी निराशाओं की बात कर रहा था, और वे बेहद भावुक हो गयीं। जब मैं मेज पर अपनी चाय का प्याला रखने के लिए उठा तो वे मेरे पास आयीं ... तुम कितने अच्छे हो। उन्होंने कहा और अपने हाथों में मेरा चेहरा भरते हुए मेरी आंखों में गहरे देखते हुए कहा...तुम इतने प्यारे बच्चे हो कि तुम्हारा दिल नहीं तोड़ा जाना चाहिये। उनकी निगाहें झुकती होती चलीं गयीं। अजीब तरह से और मंत्रबिद्ध हो गयीं और उनकी आवाज़ कांपने लगी...तुम्हें पता है, मैं तुम्हें अपने बच्चे की तरह प्यार करती हूँ। उन्होंने कहा और अब भी अपने हाथों में मेरा चेहरा भरे हुए थीं। तब हौले से उनका चेहरा मेरे चेहरे के पास आया और उन्होंने मुझे चूम लिया।

"थैंक यू," मैंने विनम्रता पूर्वक कहा और भोलेपन से उन्हें चूम लिया। वे अपनी बेधती आंखों से मुझे बांधे रहीं और उनके होंठ कांपते रहे। और उनकी आंखों में पनीली चमक आ गयी। तभी अचानक अपने आपको संभालते हुए वे एक कप चाय और ढालने के लिए चली गयीं और पल भर में उनका बात करने का तरीका बदल गया और मधुर हंसी से और हास्य बोध से उनका चेहरा दमकने लगा," तुम बहुत ही प्यारे लड़के हो...मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूँ।"

उन्होंने अपनी लड़कियों के बारे में मुझे कई रहस्य बताये,"छोटी वाली बहुत अच्छी लड़की है।" उन्होंने बताया,"लेकिन बड़ी वाली पर निगाह रखने की जरूरत होती है। वह समस्या बनती जा रही है।"

शो के बाद वे मुझे अपने बड़े वाले बेडरूम में खाने के लिए आमंत्रित करतीं। इस बेडरूम में वे और उनकी छोटी वाली लड़की सोया करते थे। अपने कमरे में लौटने से पहले मैं उन्हें और छोटी वाली को गुड नाइट किस करता। उसके बाद मुझे एक छोटे वाले कमरे से गुज़र कर जाना पड़ता जहाँ पर बड़ी वाली सोती थी। एक रात जब मैं उस कमरे से हो कर गुज़र रहा था तो वह एकदम मेरे पास आ गयी और फुसफुसा कर बोली,"रात को अपने कमरे का दरवाजा खुला रखना। जब परिवार सो जायेगा तो मैं तुम्हारे कमरे में आऊंगी।" मेरा यकीन करें या न करें, मैंने उसे हिकारत से उसके बिस्तर पर धकेला और लपक कर कमरे से बाहर आया। फालिस बेरजेरे में उनके अंतिम प्रदर्शन के बाद मैंने सुना था कि उनकी बड़ी वाली लड़की, जो मुश्किल से पन्द्रह बरस की हुई थी, साठ बरस के एक मोटे से जर्मन डॉग ट्रेनर के साथ भाग गयी थी।

लेकिन मैं उतना भोला नहीं था जितना दिखता था। अपनी मंडली के साथियों के साथ रातों में अक्सर मैं वेश्यालयों के चक्कर काटता और वहां वे सब भद्दी हरकतें करता जो जवान लोग करते हैं। एक रात, कई पैग चढ़ा लेने के बाद, मैं एनी स्टोन नाम के एक भूतपूर्व लाइट हैवी वेट ईनामी फाइटर के साथ भिड़ गया। ये लफड़ा रेस्तरां में शुरू हुआ। और जब वेटरों ने तथा पुलिस ने हमें अलग किया तो वह बोला,"मैं तुम्हें होटल में देख लूंगा।" हम दोनों एक ही होटल में ठहरे हुए थे। उसका कमरा मेरे कमरे के ऊपर था। सुबह चार बजे मैं जब अपने होटल में लौटा तो मैंने उसका दरवाजा खटखटाया।

"आ जाओ," वह जल्दी से बोला," और अपने जूते उतार दो ताकि कोई शोर शराबा न हो।"

जल्दी ही हम छाती तक नंगे हो गये और एक दूसरे के सामने आ गये। हम काफी देर तक एक दूसरे को हिट करते रहे और एक दूसरे के वार भी बचाते रहे। इसी में मानो सदियां लग गयीं। कई बार उसने सीधे ही मेरी ठुड्डी पर वार किया, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। "मैंने सोचा, तुम पंच मारोगे," मैं ताना मारा। उसने एक छलांग लगाई लेकिन उसका वार खाली गया। और उसका सिर दीवार से जा टकराया। वह अपने आप ही पस्त हो चला था। मैंने उसे खत्म करने की सोची, लेकिन मेरे पंच कमजोर थे। उसे खतरनाक ढंग से हिट कर सकता था, लेकिन मेरे पंच के पीछे जोर नहीं था। अचानक उसने जोर से मेरे मुंह पर एक ज़ोर का घूंसा मारा, जिससे मेरे आगे के दांत हिल गये, और इससे मेरा तन बदन गुस्से के मारे जलने लगा।"...बहुत हो गया," मैंने कहा,"मैं अपने दांत नहीं गंवाना चाहता।" वह मेरे ऊपर आया और मुझसे लिपट गया। और तब शीशे में देखने लगा। मैंने उसका चेहरा कुतर कर छलनी कर दिया था। मेरे हाथ इतने सूज गये थे मानों दस्ताने पहन रखे हों। छत पर, दीवारों पर और परदों पर खून के दाग नज़र आ रहे थे। मैं नहीं जानता, खून सब जगह कैसे पहुंच गया था।

रात को खून मेरे मुंह के पास से सरकता हुआ मेरे गरदन तक आ पहुँचा था। सुबह के वक्त जो नन्हा छोकरा जो मेरे लिए चाय का प्याला ले कर आता था, ये देख कर चिल्लाया। उसने सोचा कि मैंने आत्महत्या कर ली है। और उसके बाद मैंने किसी से झगड़ा नहीं किया।

एक रात दुभाषिया मेरे पास आया और बोला कि एक प्रसिद्ध संगीतकार मुझसे मिलना चाहता है, और क्या मैं उससे बॉक्स में जाना चाहूँगा?

आमंत्रण रोचक था क्योंकि उनके साथ वहाँ पर एक बहुत ही खूबसूरत, भव्य महिला बैठी हुई थीं जो रूसी बैले की सदस्या थी। दुभाषिये ने मेरा परिचय कराया। उन महानुभाव ने कहा कि वे मेरा काम देख कर बहुत खुश हुए हैं और जानना चाहते हैं कि मेरी उम्र क्या है। इन तारीफ भरे शब्दों को सुन कर मैं सम्मानपूर्वक झुका और बीच-बीच में मैं चोर निगाहों से उनकी मित्र को भी कनखियों से देख लेता था,"आप जन्मजात एक संगीतकार और नर्तक हैं।"

यह महसूस करते हुए कि इस तारीफ के बदले शब्द कोई मायने नहीं रखते और जवाब में सिर्फ मुस्कुराया ही जा सकता है, मैंने दुभाषिये की तरफ देखा और झुका। संगीतकार महोदय उठे और मुझसे हाथ मिलाया, तब मैं भी खड़ा हो गया," हां," उन्होंने मेरा हाथ हिलाते हुए कहा,"आप एक सच्चे कलाकार हैं।"

जब वे लोग चले गये तो मैं दुभाषिये से पूछा,"उनके साथ वह महिला कौन थी?"

"वे एक रूसी बैले डांसर है मिस...।" यह एक बहुत ही लम्बा और मुश्किल नाम था।

"और इस महाशय का क्या नाम था?" मैंने पूछा।

"डेबुसी," उसने जवाब दिया,"वे एक विख्यात कम्पोजर हैं।"

"मैंने तो उनका नाम कभी नहीं सुना," मैंने टिप्पणी की।

ये बरस मैडम स्टेनहैल के कुख्यात स्कैंडल और मुकदमेबाजी का बरस था। उनपर मुकदमा चला था और उन्हें अपने पति की हत्या को दोषी नहीं पाया गया था। ये बरस सनसनीखेज "पॉम पॉम डांस" का था जिसमें जोड़े कामुकता का प्रदर्शन करते हुए अशोभनीय तरीके से गोल गोल घूम कर नृत्य करते थे। ये बरस व्यक्तिगत आय पर प्रति पाउंड पर लगाये गये छ: पेंस के अविश्वसनीय दिमाग खराब करने वाले टैक्स् का था। इसी बरस डेबुसी ने इंगलैंड में अपना फ्रेंच नाटक प्रस्तुत किया जिसे जनता ने नकार दिया और दर्शक हॉल से बाहर निकल गये।

भारी मन के साथ मैं इंगलैंड लौटा और प्रदेशों के दौरे पर निकल गया। ये पेरिस के कितना विपरीत था। उत्तरी शहरों में वे मनहूसयित भरी रविवार की शामें। सब कुछ बंद, और सब कुछ याद दिलासी वह उदासी भी जो कामातुर युवकों और पतुरियें के साथ-साथ चलती। ये अंधियारी हाई स्ट्रीट में और पिछवाड़े की गलियों में गश्त लगाते घूमते रहते। रविवारों की शामों को यही उनका टाइम पास होता था।

इंगलैंड में मुझे वापिस आये छ: माह बीत चुके थे और मैं अपने सामान्य रूटीन का आदी हो चला था। और तभी लंदन कार्यालय से एक ऐसी खबर आयी जिसने मुझे रोमांच से भर दिया। मिस्टर कार्नो ने खबर दी कि द' फुटबाल मैच के दूसरे दौर में मुझे मिस्टर हेरी वैल्डन की जगह लेनी है। अब मुझे महसूस हुआ कि अब मेरे सितारे बुलंदी पर हैं। अब पत्ते मेरे हाथ में थे। हालांकि मैं अपनी रिपेटरी में ममिंग बर्डस् और दूसरे नाटकों में सफलता के झंडे गाड़ चुका था, वे सारी चीजें द फुटबाल मैच में मुख्य भूमिका निभाने के सामने कुछ भी नहीं थीं। और सबसे बड़ी बात तो ये थी कि हमें ऑक्सफोर्ड से शुरुआत करनी थी। ये लंदन का सबसे महत्त्वपूर्ण संगीत हॉल था। हम सबसे बड़ा आकर्षण होने जा रहे थे। और ये पहली बार होने जा रहा था कि पोस्टरों में और विज्ञापनों आदि में मेरा नाम सबसे ऊपर जाता। ये बहुत ऊंची छलांग थी। अगर मैं ऑक्सफोर्ड में सफल हो जाता तो इससे मैं एक नया नाम बनता और मैं तब इस स्थिति में होता कि और अधिक पगार की मांग कर सकता था और एक दिन ऐसा भी आ सकता था कि मैं अपने खुद के स्कैच लिखता। दरअसल, इससे हर तरह की शानदार योजनाओं के द्वार खुलते थे। चूंकि कमोबेश उसी कास्ट को हीद' फुटबाल मैच के लिए रखा जा रहा था, इसलिए हमें सिर्फ एक ही हफ्ते की रिहर्सल की ज़रूरत थी। मैंने इस बारे में बहुत ज्यादा सोचा कि मैं नाटक में अपनी भूमिका कैसे निभाऊंगा। हैरी वेल्डन लंकाशायर उच्चारण में बोलते थे, मैंने तय किया कि मैं इसे कॉकने शैली में करूंगा।

लेकिन पहली ही रिहर्सल में मुझे स्वर यंत्र की गड़बड़ी का दौरा पड़ गया। मैंने अपनी आवाज़ को बचाने के लिए सब कुछ करके देख डाला,फुसफुसा कर बात की, भाप को अपने भीतर लिया, गले पर स्प्रे किया, और तब तक लगा रहा जब तक चिंता ने मुझसे मेरी कोमलता और सारी कॉमेडी छीन ली।

नाटक की पहली रात मेरे गले की नस-नस तनी हुई रस्सी की माफिक खिंची हुई थी। लेकिन मेरी आवाज़ सुनी नहीं जा सकी। कार्नो बाद में मेरे आस-पास मंडराते रहे। उनके चेहरे पर निराशा और हिकारत के मिले जुले भाव थे,"कोई भी तो तुम्हारी आवाज़ नहीं सुन सका।" वे झिड़कते हुए बोले, लेकिन मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि अगली रात मेरी आवाज़ ज़रूर बेहतर हो जायेगी। लेकिन अगली रात भी वही हाल रहा। सच तो ये है कि अगली रात वह और खराब हो चुकी थी। इसका कारण ये था कि मैंने आवाज़ के साथ इतनी जोर आजमाइश कर ली थी कि मुझे खतरा लगने लगा कि कहीं मेरी आवाज़ पूरी तरह से चली ही न जाये। उससे अगली रात भी मेरा यही हाल रहा। नतीजा यह हुआ कि पहले हफ्ते के बाद ही प्रदर्शनों का पर्दा गिर गया। ऑक्सफोर्ड में प्रदर्शन के मेरे सारे सपने चूर चूर हो चुके थे और मेरी निराशा का यह आलम था कि मैं एन्फ्लूंजा का मरीज हो कर बिस्तर पर पड़ गया।

हैट्टी से मिले मुझे एक बरस से ज्यादा हो गया था। फ्लू के प्रकोप के बाद कमज़ोरी और उदासी के आलम में मुझे एक बार फिर उसका ख्याल आया और मैं एक रात देर को कैम्बरवैल में उसके घर की तरफ घूमता-घामता पहुँच गया। लेकिन घर खाली था और दरवाजे पर `किराये के लिए खाली' का बोर्ड लटका हुआ था। मैं बिना किसी खास मकसद के गलियों में भटकता रहा। अचानक रात के अंधेरे में से एक आकृति उभरी,सड़क पार करते हुए और मेरी तरफ आते हुए।

"चार्ली, आधी रात को तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" ये हैट्टी थी। उसने सील की खाल वाला काला कोट पहना हुआ था और सील की खाल का ही गोल हैट पहना हुआ था।

"मैं तुमसे मिलने आया था,' मैंने मज़ाक में कहा।

वह मुस्कुरायी,"बहुत कमज़ोर हो गये हो तुम?"

मैंने उसे बताया कि मैं अभी ही फ्लू से उठा हूँ। वह अब सत्रह बरस की हो रही थी और खासी सुंदर नज़र आ रही थी और उसने कपड़े भी काफी सलीके से पहने हुए थे।

"लेकिन सवाल ये है कि तुम इस वक्त यहाँ क्या कर रही हो?" पूछा मैंने।

"मैं अपनी एक सहेली से मिलने आयी थी और अब अपने भाई के घर जा रही हूं। आना चाहोगे तुम मेरे साथ?" उसने जवाब दिया।

रास्ते में उसने बताया कि उसकी बहन ने एक अमरीकी करोड़पति फ्रैंक से शादी कर ली है और वे नाइस में रह रहे हैं। वह सुबह लंदन छोड़ कर उनसे मिलने के लिए जा रही है।

उस रात में उसे ठगा-सा खड़ा देखता और वह अपने भाई के साथ इठला-इठलाकर नाचती रही। वह अपने भाई के साथ मूर्खतापूर्ण और ठगिनी की तरह एक्टिंग कर रही थी। और मैं, अपने आप के बावजूद, इस भावना से अपने आपको मुक्त नहीं कर पा रहा था कि मेरी जुस्तजू उसके लिए ज़रा सी भी कम नहीं हुई थी। अगर वह किसी साधारण जगह से ताल्लुक रखती होती? किसी भी और सामान्य लड़की की तरह? इस ख्याल ने मुझे उदास कर दिया और मैं उसकी तरफ वस्तुपरक निगाहों से देखता रह गया।

उसके शरीर में भराव आ गया था और मैंने उसकी छातियों के उभारों की तरफ देखा और पाया कि उनकी गोलाइयां छोटी थीं और बहुत ज्यादा आकर्षक नहीं थी। अगर मेरी हैसियत हुई तो क्या मैं उससे शादी कर पाऊंगा? नहीं, मैं किसी से भी शादी नहीं करना चाहता था।

उस ठंडी और चमकीली रात को मैं जब उसके साथ घर की तरफ आ रहा था तो मैं ज़रूर ही बहुत अधिक उदास तरीके से तटस्थ रहा होऊंगा क्योंकि मैंने उससे इस बात की आशा व्यक्त की कि उसका जीवन बहुत सुखी और शानदार होगा।

"तुम इतने उदास और टूटे लग रहे थे कि मैं एकदम रोने रोने को थी।" उसने कहा था।

उस रात मैं एक विजेता की तरह घर लौटा क्योंकि मैंने उसे अपनी उदासी से छू लिया था और अपने व्यक्तित्व को महसूस करा दिया था।

कार्नो ने मुझे फिर से ममिंग बर्डस् में रख लिया था और विडंबना ये कि मेरी आवाज़ को पूरी तरह से ठीक होने में एक महीना लग गया था।द' फुटबाल मैच के बारे में मेरी जो निराशा थी, मैंने तय किया कि अब उसे हावी नहीं होने दूंगा। लेकिन एक ख्याल भी मुझे सताये जा रहा था कि शायद मैं वैल्डन की बराबरी करने या उनकी जगह लेने के काबिल नहीं था। और इससे सबके पीछे फोरेस्टर थियेटर में मेरी असफलता ही काम कर रही थी। अब तक चूंकि मेरा आत्म विश्वास पूरी तरह से लौटा नहीं था, जिस भी नये नाटक में मैंने मुख्य भूमिका निभायी, वह डर का एक ट्रायल था। और अब सबसे अधिक चौंकाने वाला और अत्यधिक निर्णायक दिन आ गया जब मैंने मिस्टर कार्नो को बताया कि मेरा करार खत्म होने को है और मुझे वेतन में बढ़ोतरी चाहिये।

कार्नो जिसे भी पसंद नहीं करते थे उसके प्रति क्रूर और सनकी हो सकते थे। चूंकि वे मुझे पसंद करते थे इसलिए मैंने उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष के दर्शन नहीं किये थे लेकिन वे सचमुच बहुत ही बदतमीज़ी भरे तरीके से चूर-चूर कर सकते थे। अपने किसी कामेडियन के प्रदर्शन के दौरान अगर उन्हें वह कामेडियन पसंद नहीं आता था तो वे विंग्स में खड़े हो कर इतने ज़ोर से नाक सिनकने का नाटक करते थे कि सबको सुनायी दे जाये। वे अक्सर ऐसा करने लगते थे कि कामेडियन मंच छोड़ कर ही आ जाता था और उसके साथ हाथा-पाई करने लगता था। वह आखिरी बार थी जब उन्होंने इस तरह की हरकत की थी और अब मैं उनके पास वेतन में बढ़ोतरी के लिए भिड़ने जा रहा था।

"ठीक है," उन्होंने रूखेपन के साथ मुस्कुराते हुए कहा, "तुम वेतन में वृद्धि चाहते हो और थियेटर सर्किट उसमें कटौती करना चाहता है।"उन्होंने कंधे उचकाये,"ऑक्सफोर्ड म्यूज़िक हाल के हंगामे के बाद हमारे पास सिर्फ शिकायतें ही शिकायतें हैं। उनका कहना है कि कम्पनी उस लायक नहीं है... दो कौड़ी का क्रैच क्राउड§।

कार्नो की मंडली में हमें कम से कम से छ: महीने लगते थे कि हम परफैक्ट टैम्पो विकसित कर पाते और तब तक उसे क्रैच क्राउड के नाम से पुकारा जाता था।

"लेकिन उसके लिए मुझे ही तो दोषी नहीं ठहरा सकते," मैंने जवाब दिया।

"लेकिन वे तो दोषी ठहराते हैं।" उनका जवाब था। वे चुभती निगाहों से मेरी तरफ घूर रहे थे।

"उन्हें क्या शिकायत है?" पूछा मैंने।

उन्होंने अपना गला खखारा और फर्श पर देखने लगे,"उनका कहना है कि तुम सक्षम नहीं हो।"

हालांकि उनकी यह टिप्पणी सीधे मेरे पेट में जा कर शूल की तरह चुभी, इससे मुझे गुस्सा भी आया, लेकिन मैंने शांत स्वर में जवाब दिया,"ठीक है, दूसरे लोग ऐसा नहीं सोचते। और वे मुझे उससे ज्यादा देने को तैयार हैं जितना मुझे यहाँ मिल रहा है।" ये सच नहीं था। मेरे सामने कोई प्रस्ताव नहीं था।

"उनका कहना है कि शो फालतू है और कामेडियन दो कौड़ी का है। देखो," उन्होंने फोन उठाते हुए कहा,"मैं एक स्टार को फोन करूंगा,बेरमाँडसे को, और तुम उनसे अपने आप सुन लेना।... मेरा ख्याल है पिछले हफ्ते तुम्हारा शो बहुत ही खराब रहा था।" उन्होंने फोन पर बात की।

"वाहियात..." फोन पर आवाज आयी।

कार्नो ने खींसें निपोरी,"आप इसे किस श्रेणी में डालेंगे?"

"दो कौड़ी का...शो"

"और चैप्लिन के बारे में क्या ख्याल है? हमारे प्रधान कामेडियन? क्या उसका काम भी ठीक नहीं?"

"वह तो बू मारता हैं।"

कार्नो साहब ने फोन मुझे थमा दिया,"अपने आप ही सुन लो..."

मैं फोन लिया। "...हो सकता है वह बू मारता हो लेकिन उससे आधा भी नहीं जितना आपका सड़ांध भरा थियटर बू मारता है।" मैंने जवाब दिया।

कार्नो साहब की मुझे औकात दिखाने की तरकीब काम नहीं आयी। मैंने उनसे कहा कि अगर वे भी मेरे बारे में यही राय रखते हैं तो करार का नवीकरण करने का कोई मतलब नहीं है। कई मायनों में कार्नो बहुत ही काइयां आदमी थे। लेकिन वे मनोवैज्ञानिक नहीं थे। बेशक मैं बू मारता था तो भी ये कार्नो साहब को शोभा नहीं देता था कि फोन की दूसरी तरफ से किसी और से ये कहलवायें मुझे पांच पाउंड मिल रहे थे और हालांकि मेरा आत्म विश्वास डगमाया हुआ था, फिर भी मैं छ: की मांग कर रहा था। मेरी हैरानी का ठिकाना नहीं रहा जब कार्नो साहब ने मुझे छ: पाउंड देना स्वीकार कर लिया और मैं एक बार उनकी निगाहों में राज दुलारा बन गया।

आल्फ रीव्ज़, जो कार्नो साहब की अमेरिकी कम्पनी में मैनेजर थे, इंगलैंड वापिस आये और उन्होंने ये अफवाह फैला दी कि वे अपने साथ अमेरिका ले जाने के लिए किसी प्रधान कामेडियन की तलाश में हैं।

ऑक्सफोर्ड म्यूजिक हॉल के उस बड़े हादसे के बाद से मैं अमेरिका जाने के ख्यालों से भरा हुआ था। अकेले जा कर थ्रिल और रोमांच के लिए नहीं, बल्कि वहाँ जाने का मतलब हमेशा नयी आशाएं और नयी दुनिया में एक नयी शुरुआत। सौभाग्य से, मैं जिस नये नाटक स्केटिंग में प्रमुख भूमिका निभा रहा था, बरमिंघम में सफलता के झंडे गाड़ रहा था, और जब मिस्टर रीव्ज़ वहाँ आ कर कम्पनी में शामिल हुए तो मैंने अपनी भूमिका को बेहतर बनाने में जान लड़ा दी और इसका नतीजा ये हुआ कि रीव्ज़ साहब ने कार्नो साहब को तार भेजा कि उन्हें अमेरिका के लिए अपना कामेडियन मिल गया है। लेकिन कार्नो साहब ने मेरे लिए और ही मंसूबे बांधे हुए थे। इस वाहियात खबर ने मुझे हफ्तों तक पेसोपेश में डाले रखा जब तक कि वे वॉव वॉव नाम के नाटक में दिलचस्पी नहीं लेने लग गये। ये नाटक सीक्रेट सोसाइटी में किसी सदस्य को लिये जाने के बारे में प्रहसन था। मुझे और रीव्ज़ साहब को ये नाटक वाहियात लगा, बिना सिर पैर का, बिना किसी खासियत के लगा, लेकिन कार्नो साहब पर इसका नशा सवार था और वे अड़ गये कि अमेरिका सीक्रेट सोसाइटियों से भरा पड़ा है। और उन पर इस तरह का कटाक्ष करने वाला नाटक ज़रूर सफल होगा। मेरी खुशी और राहत का ठिकाना न रहा जब कार्नो साहब ने मुझे ही इसकी प्रधान भूमिका के लिए चुना। अमेरिका के लिए वॉव वॉव।

मुझे अमेरिका जाने के लिए इसी तरह के किसी मौके की जरूरत थी। इंगलैंड में मुझे लग रहा था कि मैं अपनी संभावनाओं के शिखर पर पहुँच चुका हूँ और इसके अलावा, वहाँ पर मेरे अवसर अब बंधे बंधाये रह गये थे। आधी-अधूरी पढ़ाई के चलते अगर मैं म्यूजिक हॉल के कामेडियन के रूप में फेल हो जाता तो मेरे पास मजदूरी के काम करने के भी बहुत ही सीमित आसार होते।

अमेरिका में संभावनाओं का अंनत आकाश था।

यात्रा शुरू करने से पहले की रात मैं लंदन के वेस्ट एंड में घूमता रहा, लीसेटर स्क्वायर, कोवेन्टरी स्ट्रीट, द माल, और पिकाडिल्ली में रुका। उस समय मेरे मन में उदासी भरी भावना थी कि ये आखिरी बार होगा कि मैं लंदन घूम रहा हूँ क्योंकि मैं मन ही मन तय कर चुका था कि मुझे स्थायी रूप से अमेरिका जाकर ही बसना है। मैं आधी रात तक दो बजे तक भटकता रहा, सुनसान गलियों और मेरी खुद की उदासी की कविता में डूबता उतराता।

मैं विदा के दो शब्द कहने से बच रहा था। अपने नातेदारों से और दोस्तों से बिछुड़ते समय आदमी जो कुछ भी महसूस करता है, उनके द्वारा विदाई दिये जाने के बारे में, उसमें और धंसता ही है। मैं सुबह छ: बजे ही उठ गया था। इसलिए मैंने इस बात की ज़रूरत नहीं समझी कि सिडनी को जगाऊं। लेकिन मैंने मेज पर एक पर्ची छोड़ दी,"अमेरिका जा रहा हूँ। तुम्हें लिखता रहूँगा। प्यार। चार्ली।"

§ टेम्स एम्बैंकमेंट लंदन का प्रसिद्ध कला क्षेत्र है। शाम के वक्त लोग यहां चहलकदमी करते ऩजर आते हैं। कई स़डक छाप कलाकार वहां पर तटबंध के पास अपनी गायन और संगीत कला का प्रदर्शन करके भीख मांगते हैं।

§ कार्ना ट्रुप में हम सही तरीके से टेम्पो पर महारत हासिल कर सकें, इसमें एक साथ काम करने में हमें छ: महीने लग जाया करते थे तब तक हमें क्रैच क्राउड कहा जाता था।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 8

हमें यात्रा करते हुए बारह दिन हो चुके थे, और हमारा अगला पड़ाव क्यूबेक था। बेहद खराब मौसम और चारों तरफ लहराता हुआ महासमुद। तीन दिन तक तो हम टूटी पतवार लेकर पड़े रहे, इसके बावज़ूद मैं तो एक दूसरी ही दुनिया में जाने के विचार से उल्लसित था और अपने आपको बहुत हल्का महसूस कर रहा था। मवेशियों वाली नाव पर हम कनाडा हो कर जा रहे थे। नाव पर गाय, बैल, भेड़, बकरी भले ही न हों, पर चूहे ढेर सारे थे और रह-रह कर वे बड़ी हेकड़ी से मेरी बर्थ पर आ धमकते और जूता चलाने पर ही भागते।

सितंबर की शुरुआत थी और न्यू फाउंडलैंड हमने कोहरे में पार किया। आखिर मुख्य भूमि के दर्शन हुए। फुहार पड़ रही थी और दिन में भी सेंट लांरेस नदी के तट निर्जन नज़र आ रहे थे। नाव से क्यूबेक उस चहारदीवारी की तरह लग रहा था जहाँ हैमलेट का भूत चला करता होगा। मेरा मन स्टेट्स के बारे में कुतूहल से भर उठा।

पर जैसे-जैसे हम टोरंटो की ओर बढ़ते गए, पतझड़ के रंगों से देश और खूबसूरत होता चला गया और मेरी उम्मीदें पहले से ज्यादा रंगीन हो उठीं।

टोरंटो में हमने गाड़ी बदली और अमेरिकी आप्रवासन के दफ्तर से होकर गुज़रे। आखिरकार रविवार सुबह दस बजे हम न्यूयार्क आ पहुँचे।टाइम्स स्क्वायर में जब हम टैक्सी से उतरे तो कुछ निराशा सी हुई। सड़कों और फुटपाथों पर अखबार इधर-उधर उड़ रहे थे। ब्रॉडवे बेरौनक दिख रहा था, मानो फूहड़-सी कोई औरत अभी-अभी बिस्तर से उतरी हो। प्राय: हरेक नुक्कड़ पर ऊंची ऊँची कुर्सियां थीं जिसमें जूतों के साँचे लगे थे और लोग बिना कोट वगैरह के, केवल कमीज़ पहने हुए आराम से बैठ कर अपने जूते पॉलिश करवा रहे थे। देख कर लगा, मानो वे लोग सड़क पर ही शौच आदि से निवृत्त हुए हों। कई लोग अजनबियों सरीखे लगे जो फुटपाथों पर यूं ही खड़े थे मानो अभी-अभी रेलवे स्टेशन से बाहर निकले हों और अगली गाड़ी के आने तक का समय काट रहे हों।

जो भी हो, ये न्यू यार्क था, रोमांचक, अक्कल चकरा देने वाला और कुछ-कुछ डरावना। दूसरी तरफ पेरिस ज्यादा दोस्ताना था। मैं फ्रेंच भले ही नहीं बोल पाता था पर बिस्तास और कैफे वाले पेरिस ने हरेक नुक्कड़ पर मेरा स्वागत किया था। लेकिन न्यू यार्क बड़े कारोबार की जगह थी। गर्व से भरी निष्ठुर, ऊँची-ऊँची आकाश को छूने वाली इमारतों को आम आदमी की तकलीफ से कोई सरोकार नहीं था। सैलून बार में भी ग्राहकों के बैठने की कोई जगह नहीं थी। सिर्फ पीतल की लम्बी रेलिंग लगी हुई थी जिस पर आप पैर टिका सकें, और खाने की नामी जगहें, बेशक साफ-सुथरी थी, सफेद संगमरमर लगे हुए थे वहां लेकिन ये जगहें भी मुझे बेजान और अस्पतालनुमा लगीं।

फोर्टी-थर्ड स्ट्रीट से कुछ दूर ब्राउन स्टोन हाउसेस में मैंने पिछवाड़े का एक कमरा लिया, जहाँ अब पुरानी टाइम्स बिल्डिंग खड़ी है। घर बड़ा ही मनहूस और गंदा था और इसे देख कर मुझे लंदन और अपने छोटे से फ्लैट की याद सताने लगी। बेसमेंट में धुलाई और इस्तरी का कारोबार चलता था और हफ्ते के दिनों में भाप के साथ ऊपर उड़कर आती इस्तरी होते कपड़ों की बू मेरी परेशानियों को और बढ़ाती।

उस पहले दिन मैंने अपने आपको बहुत ही अधूरा पाया। किसी रेस्तरां में जाना और कुछ ऑर्डर करना तो अग्नि परीक्षा थी क्योंकि मेरा अंग्रेज़ी उच्चारण उनसे अलग था और मैं धीरे-धीरे बोलता था। कई लोग इतने फर्राटे से और झटका देकर बोलते थे कि मुझे इस डर से असुविधा होने लगती कि मैं बोलने चला तो हकलाने लगूंगा और उनका भी समय बरबाद होगा।

ये चमक-दमक और ये रफ्तार मेरे लिए नई थी। न्यू यॉर्क में छोटे से छोटे कारोबार वाला आदमी भी फुर्ती से काम करता है। जूता पॉलिश करने वाला लड़का पॉलिश वाले कपड़े को फुर्ती से झटकता है, बार में बियर देने वाला ही वैसी ही फुर्ती से बार की चमचमाती सतह पर बीयर आपकी ओर सरका देगा। अण्डे की जर्दी मिले माल्ट देते वक्त सोडा क्लर्क किसी कूदते फांदते कलाबाज की तरह काम करता है। एक ही बार में वह एक गिलास झटकता है और जो भी चीज़ें डालनी हैं, उन पर टूट पड़ता है। वनीला फ्लेवर, आइसक्रीम का छोटा-सा टुकड़ा, दो चम्मच माल्ट, कच्चा अण्डा, बस एक बार में फोड़ डाला, दूध मिलाया, फिर इन सबको लेकर एक बर्तन में ज़ोर से हिला कर मिलाया और लीजिए पेश है। ये सब कुछ एक मिनट से भी कम समय में।

एवेन्यू पर उस पहले दिन कई लोग वैसे नज़र आए जैसा मैं महसूस कर रहा था - अकेले और कटे-फटे। इनमें से कुछ ऐसे हाव-भाव में थे जैसे वही उस जगह के मालिक हों। कई तो बड़े ढीठ और बदमिजाज थे मानो सज्जनता और विनम्रता से पेश आएंगे तो कोई उन्हें कमज़ोर समझ लेगा। लेकिन शाम को गर्मियों के कपड़े पहनी हुई भीड़ के साथ जब मैं ब्रॉडवे होकर जा रहा था तो जो देखा उससे मेरा मन आश्वस्त हो गया। कड़ाके की सितंबर के ठंड के बीच हमने इंगलैण्ड छोड़ा था और झुलसा देने वाली अस्सी डिग्री की गर्मी में न्यू यार्क पहुँचे थे। अभी मैं चल ही रहा था कि बिजली की ढेर सारी रंग-बिरंगी बत्तियों से ब्रॉडवे जगमगाने लगा और बेशकीमती जवाहरात की तरह चमकने लगा। गर्मी की उस रात में मेरा नज़रिया बदला और अमेरिका का नया मतलब मेरे ज़ेहन में उतरता चला गया। बहुमंज़िला इमारतों, चमकती खुशनुमा रोशनियों और गुदगुदा देने वाले विज्ञापनों ने मेरे मन में आशा और रोमांच की हलचल मचा दी। यही है - मैंने अपने आपसे कहा - मैं इसी जगह से वास्ता रखता हूँ।

ब्रॉडवे पर लगता था हर कोई किसी न किसी कारोबार में है: अभिनेता, हास्य कलाकार, मजमे वाले, सरकस में काम करने वाले और मनोरंजन वाले हर जगह थे। सड़क पर, रेस्तराओं में, होटलों और डिपार्टमेंटल स्टोरों में हर आदमी धंधे की बात कर रहा था। थिएटर मालिकों के नाम जहाँ-तहाँ सुनने को मिल जाते: ली शुबर्ट, मार्टिन बैक, विलियम मॉरिस, पर्सी विलियम्स, क्ला एंड इरलैंगर, फ्रॉइमैन, सुलिवन एण्ड कान्सिडाइन, पैंटेजेज़। घरेलू नौकरानी हो, लिफ्ट वाला हो, वेटर हो, टैक्सीवाला हो, बारमैन हो, दूध वाला हो या बेकरी वाला, जिसे देखो, शो मैन की तरह बात करता। राह चलते लोगों की बातचीत के सुनायी पड़ते अंश भी वही। बूढ़ी हो चली माताएं, दिखने में किसानों की बीवियों की तरह और बातें सुनिए तो - वह अभी-अभी वेस्ट में पैंटेज़ेज के लिए काम करके लौटा है। एक दिन में तीन-तीन शो थे। सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो बड़ा हास्य कलाकार बनेगा।

एक दरबान कह रहा है,"तुमने विंटर गार्डन में जॉनसन को देखा?"

"जरूर, उसने जेक के शो की लाज रख ली।"

अखबारों का एक पूरा पन्ना हर दिन थिएटर को समर्पित होता था जिसमें रेसकोर्स वाले घोड़ों के रेसिंग चार्ट की मानिंद खबरें होतीं। हास्य कला में किसने कितना नाम कमाया, किस पर अधिक तालियां बजीं, इसके आधार पर रेस के घोड़ों की तरह पहले, दूसरे और तीसरे स्थान दिए जाते थे। अभी इस दौड़ में हम शामिल नहीं हुए थे और मुझे इस बात की चिंता रहती कि चार्ट में हम किस पोजीशन पर आएंगे। 56 हफ्तों तक हमारा कार्यम पर्सी विलियम्स सर्किट में था। इसके बाद और कोई बुकिंग नहीं थी। हमारा अमेरिका में टिकना इसी कार्यम के परिणाम पर निर्भर था। नहीं चले, तो इंगलैंड लौट जाएंगे।

हम लोगों ने एक रिहर्सल रूम लिया और द' वाउ वाउज़ की एक हफ्ते तक रिहर्सल की। हमारे दल में ड्ररी लेन का प्रसिद्ध बूढ़ा सनकी जोकरवाकर था। सत्तर पार कर चुका था। आवाज़ तो बड़ी गंभीर थी पर रिहर्सल में पता चला कि साफ-साफ तो बोल ही नहीं पाता। ऊपर से प्लॉट का एक बड़ा हिस्सा दर्शकों को समझाने का काम उसी को करना था। ऐसी कोई लाइन जैसे - मज़ाक बेहन्तहा डरावना होगा उससे बोली ही न जाए और वह कभी बोल पाया भी नहीं। पहली रात वह एब्लिब-एब्लिब ब़ड़बड़ाया। बाद में यह एब्लिब ही रह गया, पर आखिर तक सही शब्द नहीं ही निकला।

अमेरिका में कार्नो का बड़ा नाम था। इसलिए बेहतरीन कलाकारों के कार्यक्रम में सबसे ज्यादा आकर्षण का केन्द्र हम ही होते थे। भले ही मुझे उस स्केच से नफरत थी, मैंने इसका भरपूर उपयोग किया। मुझे उम्मीद थी कि शायद यही वो चीज़ हो जाये जिसे कार्नो खालिस अमेरिका के लिए कहा करते थे।

पहली रात स्टेज पर आने से पहले मैं कितना नर्वस था, किस तकलीक और पसोपेश में था, मैं इसका बयान नहीं कर सकता और न ही इसका कि स्टेज के साइड में खड़े अमेरिकी कलाकार हमें देख रहे थे तो मुझ पर क्या बीत रही थी। इंगलैंड में मेरे पहले लतीफे पर ज़ोरदार ठहाके लगते थे और इससे पता चल जाता था कि बाकी की कॉमेडी कैसी चलेगी।

कैंप का सीन था, एक तंबू में चाय का कप लिए मैं प्रवेश करता हूं।

आर्ची (मैं) : गुड मार्निंग हडसन। मुझे थोड़ा-सा पानी चाहिए। देंगे ?

हडसन : जरूर, पर किसलिए

आर्ची : मैं नहाना चाहता हूँ।

(दर्शकों की ओर से एक हल्की आधी-अधूरी हँसी और फिर बेरुखी चुप्पी)

हडसन : रात की नींद कैसी रही, आर्ची?

आर्ची : अरे, मत पूछो। सपने में देखा, एक इल्ली मुझे दौड़ा रही है।

अब भी दर्शकों में वैसी ही मुर्दनगी। इस तरह हम बड़बड़ाते रहे और स्टेज के बगल में खड़े अमेरिकियों के थोबड़े और ज्यादा लटकते गए। लेकिन हमारे उस अंक को खत्म करने से पहले ही वे जा चुके थे।

ये स्केच बचकाना और नीरस था, और मैंने कार्नो को सलाह दी थी कि इससे शुरुआत न करें। हमारे पास दूसरे ज्यादा मज़ेदार स्केचेज थे जैसे स्केटिंग, द डैंडी थीव्स, द पोस्ट ऑफिस और मिस्टर पर्किंस, एम.पी. जो अमेरिकी दर्शकों को पसंद आते। लेकिन कार्नो अपनी ज़िद पर अड़े रहे।

जो भी कहिए, परदेस में नाकामी से तकलीफ तो होती ही है। हर रात ऐसे दर्शकों के सामने हाजरी बजाना वाकई दुष्कर काम था जो एक के बाद एक गुदगुदा देने वाली इंगलिश कॉमेडी के आगे बेरुखी से सन्नाटा ओढ़े बैठे रहें। स्टेज पर हमारा आना-जाना शरणार्थियों की तरह होता था। ये बेइज़्ज़ती हम लोगों ने छह हफ्ते तक झेली। दूसरे कलाकार हम लोगों से यूं अलग-थलग रहते थे जैसे हमें प्लेग हुआ हो। इस तरह से पटकनी खाने और जलील होने के बाद जब हम जाने के लिए स्टेज के पास खड़े हुए तो लगा मानो लाइन में खड़ा करके हम गोली मारी जानी है।

हालांकि मैं अपने आपको अकेला और ठुकराया हुआ महसूस करता था, फिर भी इस बात के लिए शुक्रगुज़ार था कि मैं अकेला रह रहा हूँ। कम से कम दूसरों के साथ अपनी बेइज़्ज़ती शेयर तो नहीं करनी पड़ती थी। दिन में मैं लंबी अंतहीन वीथियों पर चहल कदमी किया करता था। कभी चिड़िया घर, तो कभी पार्क, मछलीघर और कभी संग्रहालय जाकर मन बहला लेता था। अपनी नाकामी के बाद न्यू यार्क अब एकदम अपराजेय लगता था। इमारतें इतनी ऊँची जहाँ पहुँचा न जा सके और उनका प्रतिस्पर्धी परिवेश इतना दबाने वाला कि जिसके आगे आप खड़े नहीं हो सकते। इसकी शानदार ऊँची इमारतें और फैशनबेल दुकानें बेरहमी से मुझे मेरे अधूरेपन का अहसास कराती थीं। फिफ्थ एवेन्यू के परे आलीशान मकान सफलता के स्मारक थे, घर नहीं।

मैं पैदल चल कर शहर भर की धूल फांकता रहता और शहर से होते हुए झोपड़ पट्टी वाले इलाकों की ओर चला जाता। मेडिसन स्क्वायर के पार्क से होकर, जहाँ लावारिस बूढ़े अपने पैरों की तरफ भाव शून्यता से घूरते हुए हताशा में बेंच पर बैठे रहते थे। इसके बाद मैं सेकण्ड और थर्ड एवेन्यू की ओर चला। गरीबी यहां बेरहम, तीखी और मारक थी। जहाँ-तहाँ पसरी हुई, एक गुर्राती, अट्ठहास करती और चिल्लाती हुई गरीबी; दरवाजों पर, चिमनियों पर फैलती हुई और रास्तों पर वमन करती हुई गरीबी। मेरा दिल बैठने लगा और मेरा मन जल्द से जल्द ब्रॉडवे लौटने का करने लगा।

अमेरिकी आदमी आशावादी होता है। अथक चेष्टा करने वाला और सैकड़ों सपनों में डूबा रहने वाला। वह जल्द से जल्द बाजी मार लेना चाहता है। वह जैक पॉट हिट करो! निकल चलो! बेच डालो!। कमाओ और भागो! कोई दूसरा धंधा कर लो! में विश्वास करता है। लेकिन हद से गुज़र जाने के इसी अंदाज़ ने मेरी हिम्मत बँधानी शुरू कर दी। दूसरी ओर से देखा जाये तो अपनी नाकामियों के चलते मैं काफी हल्का महसूस करने लगा। ऐसा लगने लगा मानो अब कोई रुकावट नहीं है। अमेरिका में और भी कई संभावनाएं थीं। मैं थिएटर की दुनिया से क्यूँ चिपका रहूँ? मैं कला को समर्पित तो था नहीं। कोई दूसरा धंधा कर लेता। मुझमें आत्म विश्वास लौटने लगा। जो हो गया सो हो गया, मैंने अमेरिका में टिकने की ठान ली थी।

असफलता से ध्यान हटाने के लिए मैंने सोचा, कुछ पढूँ और अपना शैक्षिक स्तर उठाऊं। मैंने पुरानी किताबों की दुकानों के चक्कर लगाने शुरू किए। कई पाठ्य पुस्तकें खरीद डालीं - केलॉग्स रेटरिक, एक अंग्रेजी व्याकरण और एक लैटिन अंग्रेजी डिक्शनरी - और उन्हें पढ़ने की ठानी। लेकिन मेरा संकल्प धरा का धरा रह गया। किताबों को देखते ही मैंने उन्हें अपने संदूक में एकदम नीचे रख दिया और भूल गया - और स्टेट्स में दूसरी बार आने पर ही उनकी ओर देखा।

न्यू यार्क में पहले हफ्ते के कार्यक्रम में एक नाटक था, गस एडवार्ड्स स्कूल डेज। बच्चों को लेकर बनाया गया। इस मण्डली में एक आकर्षक चरित्र था जो दिखने में छोटा था, पर चाल-ढाल और तौर-तरीकों से पहुँची हुई चीज़ लगता था। उसे सिगरेट के कूपनों से जूए की लत थी जिसके बदले में युनाइटेड सिगार स्टोर से निकल प्लेटेड कॉफी के बरतनों से लेकर शानदार पियानो तक मिलने का चांस रहता था। उनके लिए वह किसी के भी साथ पाँसा फेंकने को तैयार था। वाल्टर विंचेल नामक यह व्यक्ति असाधारण तेज़ी से बात कर सकता था। उम्र हो जाने पर भी उसका धुँआधार बोलना जारी रहा, पर कई बार मुँह से कुछ का कुछ निकल जाया करता था।

हालांकि हमारा शो चला नहीं। व्यक्तिगत रूप से मैं लोगों का ध्यान खींचने में सफल रहा। वेरायटी के सिम सिल्वर मैन ने मेरे बारे में कहा,"मण्डली में कम से कम एक मज़ेदार अंग्रेज़ था, और वो अमेरिका में चलेगा।"

अब तक हम लोग बोरिया-बिस्तर समेट कर छ: हफ्तों के बाद इंगलैण्ड लौटने का मन बना चुके थे। पर तीसरे सप्ताह हमने अपना नाटकफिफ्थ एवेन्यू थिएटर में खेला। यहां ज्यादातर दर्शक अंग्ऱेज नौकर और खानसामे थे। सोमवार, पहली रात को हम धमाके से चले। हर चुटकुले पर वे हँसे। हम सभी चकित थे, मैं भी, क्योंकि मैंने भी हमेशा जैसी बेरुखी की उम्मीद की थी। मुझे लगता है, कामचलाऊ प्रदर्शन से मेरे ऊपर दबाव नहीं था और मैंने कोई गलती नहीं की।

उस सप्ताह एक एजेंट ने हम लोगों से मुलाकात की और सालिवन एण्ड कॉन्सिडाइन सर्किट में बीस हफ्तों के दौरे के लिए बुक कर लिया। ये चलताऊ रंगारंग विविध शो कार्यक्रम था, और हमें दिन में तीन शो करने थे।

सालिवन कॉन्सिडाइन के उस पहले दौरे में कोई जबर्दस्त धमाका तो हम लोगों ने नहीं किया लेकिन औरों के मुकाबले बीस ही रहे। उन दिनों मिडिल वेस्ट लुभावना था। उतनी भाग-दौड़ नहीं थी और माहौल रोमांटिक था। हरेक ड्रग स्टोर और सैलून में घुसते ही चौसर की टेबल होती थी जहां हर उस चीज के लिए पाँसा फेंका जा सकता था जो वहाँ बिक रही हो। रविवार की सुबह मेन स्ट्रीट खड़खड़ाते डाइस की प्यारी और दोस्ताना आवाज़ से भरी होती थी। कई बार मैं भी दस सेंट में एक डालर की चीज़ें जीत जाता।

जीवन यापन सस्ता था। एक हफ्ते में सात डॉलर पर किसी छोटे होटल में एक कमरा और दिन में तीन बार भोजन मिल जाता था। खाना बहुत ही सस्ता था। सैलून का फ्री लंच काउंटर हमारी मंडली के लिए बहुत बड़ा संबल था। एक निकल (पाँच सेण्ट) में एक गिलास बीयर और खाने की सबसे स्वादिष्ट और खास चीज़ें मिल जाया करती थीं। सूअर की रानें होती थीं, स्लाइस्ड हैम, आलू सलाद, सार्डिन मछलियां, मैकरॉनी चीज़,लीवर वुर्स्ट, कुलचा और हॉट डॉग! हमारे कुछ सदस्य इसका फायदा उठाते और अपनी प्लेटों पर तब तक ढेर लगाते जाते जब तक बार मैन टोक न दे,"ओए, उतना लाद कर कहाँ चल दिए - क्या क्लोनडाइक की तरफ?"

हमारे दल में पंद्रह या कुछ अधिक लोग थे। ट्रेन की बर्थ के पैसे देने के बाद भी हर मेम्बर कम से कम अपना आधा मेहनताना बचा लेता था। मेरी तनख्वाह थी एक हफ्ते में पचहत्तर डॉलर और इसमें से पचास तो शान से बैंक ऑफ मैनहटन में नियमित रूप से पहुँच जाते।

दौरे के सिलसिले में हम लोग कोस्ट पहुँचे। रंगारंग कार्यक्रम की उसी टीम में हमारे साथ पश्चिम की तरफ चलने वालों में टेक्सास का एक सुंदर युवक था जो कसरती झूले पर करतब दिखाता था। वह ये तय नहीं कर पा रहा था कि और आगे भी अपने पार्टनर के साथ ही बना रहे या ईनामी दंगल लड़ा करे। रोज सुबह मैं बॉक्सिंग के दस्ताने पहन कर उसके साथ उतरता। वह बेशक मुझसे लंबा और भारी था, फिर भी मैं उसे जब जैसे चाहता, हिट कर सकता था। हम बहुत अच्छे दोस्त बन गए और बॉक्सिंग की एक पारी के बाद हम साथ लंच लेते। वो कहा करता था कि उसके आदमी टेक्सॉस के सीधे सादे किसान हैं। वह फार्म की ज़िंदगी के बारे में घण्टों बतियाता। जल्दी ही हम लोग थिएटर का धंधा छोड़ने और साझेदारी में सूअर पालने के बारे में बात करने लगे।

हम दोनों के पास कुल मिलाकर दो हजार डॉलर थे और था, ढेर सारा पैसा कमाने का एक सपना। हमने योजना बनायी। अरकसॉन्स में पचास सेन्ट प्रति एकड़ के हिसाब से दो हज़ार एकड़ जमीन शुरू में ली जाए और बाकी पैसा सूअर खरीदने में लगाया जाए। हमने जोड़-जाड़ कर देखा कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक चला तो सूअरों के चक्रवृद्धि ढंग से पैदा होने और औसतन हर साल पाँच के हिसाब से बच्चे जनने के हिसाब से पाँच वर्षों में हम एक लाख डॉलर बना सकते हैं।

रेलगाड़ी में सफ़र करते हुए हम खिड़की से बाहर देखते और सूअर बाड़ों को देखकर जोश से भर उठते। हमारे खाने, सोने और यहाँ तक कि सपने में भी सूअर ही सूअर। सूअर पालने के वैज्ञानिक तौर तरीकों पर मैंने एक किताब न खरीद ली होती तो शो बिजनेस छोड़कर सूअर पालक बन गया होता। लेकिन उस किताब ने, जिसमें सूअरों को बधिया करने के सचित्र तरीके दिए गए थे, मेरा जोश ठण्डा कर दिया और जल्दी ही मैं इस धंधे को भूल गया।

इस दौरे पर अपने साथ मैं वायलिन और सेलो लेकर चला था। सोलह बरस की उम्र से ही अपने बेडरूम में मैं हर दिन चार से छह घण्टे इन्हें बजाने का अभ्यास किया करता था। हर हफ्ते मैं थिएटर संचालक से या जिसे वो कहता उससे वायलिन के सबक लेता था। मैं बाएँ हाथ से बजाता था इसलिए वायलिन भी बाएँ हाथ के हिसाब से बँधा था, जिसमें बास-बार और साउंडिंग पोस्ट उलट दिए गए थे। मेरी बड़ी इच्छा थी कि संगीत समारोह का कलाकार बनूंगा या ये नहीं कर पाया तो रंगारंग कार्यक्रम में बजाऊँगा। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, मेरी समझ में आ गया कि इसमें कभी माहिर नहीं हो पाऊँगा, सो मैंने इसे छोड़ दिया।

1910 का शिकागो अपनी कुरूपता, भयावहता और कालिमा में एक आकर्षण लिए हुए था। एक ऐसा शहर जिसमें अभी भी शुरुआती दिनों के मिजाज थे। कार्ल सैंडलिंैग के शब्दों में धूंए और इस्पात का एक फलता-फूलता साहसी महानगर। मुझे इसके चारों ओर फैले समतल मैदान रूस के घास के मैदानों जैसे लगते हैं। कुछ नया करने का इसमें प्रचण्ड उल्लास था जो तन-मन को अनुप्राणित करता था। लेकिन इसके भीतर एक पौरुषी एकाकीपन धड़कता था। इस जिस्मानी बीमारी के काट के रूप में मौजूद था एक राष्ट्रीय मनोरंजन जिसे बर्लेस्क शो (प्रहसन/पैरोडी) कहा जाता था। इसमें बेहरतीन कॉमेडियनों का एक गुट होता था और साथ में बीस या कुछ अधिक कोरस लड़कियां होती थीं। कुछ सुंदर, कुछ घिसी-पिटी। कामेडियन मज़ेदार थे। ज्यादातर शो अश्लील होते थे, जनानखाने की कॉमेडी घटिया और बुराइयों से भरी हुई। पूरा माहौल हीमैन का था। क्षुद्र काम प्रतिद्वंद्विता से भरा हुआ जो देखने वालों को उल्टे किसी भी प्रकार की सामान्य कामेच्छा से अलग कर देता था। झूठ-मूठ की भावुकता दिखाना ही उनकी प्रतिक्रिया होती। ऐसे शो शिकागो में भरे पड़े थे। वाट्सन्स बीफ ट्रस्ट नामक ऐसे ही एक शो में अधेड़ उम्र की भारी-भरकम औरतें चुस्त कपड़ों में प्रदर्शन करती थीं। इस बात का प्रचार किया जाता था कि उन सभी का वजन टनों में है। थिएटर के बाहर शर्माये, सकुचाए पोज़ में उनकी तस्वीरें बड़ी दु:खद और निराशाजनक होती थीं।

शिकागो में हम वाबाश एवेन्यू में एक छोटे होटल में रहते थे। जीर्ण-शीर्ण और मनहूस होने के बावजूद इसमें एक रोमानी आकर्षण था क्योंकि बर्लेस्क की अधिकांश लड़कियां वहाँ रहती थीं। हर शहर में हम उस होटल के बाहर मधुमक्खियों की तरह लाइन लगा देते जहाँ शो वाली लड़कियाँ ठहरती थीं। पर जिस चक्कर में जाया करते थे उसमें कामयाब नहीं हुए। ऊँचाई पर चलने वाली ट्रेनें रात को तेज़ी से निकलतीं और रह-रह कर पुराने बाइस्कोप की तरह मेरे सोने के कमरे की दीवाल को झिलमिला जातीं। फिर भी, मुझे इस होटल से प्यार था, हालांकि कभी कुछ रोमानी घटित हुआ नहीं।

एक जवान लड़की, शांत और सुंदर, किसी कारण से हमेशा अकेली रहती थी, उसे चलते देखकर लगता, जैसे अपने प्रति बेहद सचेत है। होटल की लॉबी में आते-जाते उसके पास से होकर कई बार गुज़रा पर इतनी हिम्मत कभी जुटा नहीं पाया कि परिचय पाऊं। वैसे ये तो कहना ही पड़ेगा कि अपनी तरफ से उसने कभी पत्ता नहीं फेंका।

शिकागो से कोस्ट हम जिस ट्रेन में जा रहे थे, वो लड़की भी उसी में थी। वेस्ट जाने वाली बर्लेस्क कंपनियां आम तौर पर हमारे ही रास्ते होकर जातीं। और उनका कार्यक्रम भी एक ही शहर में पड़ता। गाड़ी में मैंने उसे अपनी कंपनी के एक सदस्य से बात करते देखा। बाद में वह मेरे पास आकर बैठा।

मैंने पूछा, "कैसी लड़की है वो?"

"बड़ी ही प्यारी। बेचारी, अफसोस होता है उसके लिए!"

"क्यों?"

वह झुककर और पास आ गया,"याद है, हवा उड़ी थी कि शो की किसी लड़की को सिफलिस है? बस, यही है।"

सीटल में उसे कंपनी छोड़ने दिया गया। वह अस्पताल में भर्ती हुई। हमने उसके लिए पैसे इकट्ठे किए जिसमें सारी घुमंतू कंपनियों ने योगदान दिया। बेचारी के बारे में सबको पता था। अलबत्ता, वो सबकी शुक्रगुजार थी और बाद में सैलवरसम की सुई, जो उस समय अभी नयी दवा थी,लेकर ठीक हुई। और फिर से अपनी कंपनी में वापस आ गयी।

उन दिनों पूरे अमेरिका में वेश्यावृत्ति बेरोक-टोक फैल रही थी। शिकागो का विशेष नाम हाउस ऑफ ऑल नेशन्स के चलते था जिसे दो अधेड़ उम्र की महिलाएं, ईवरली बहनें चलाती थीं। इसकी ख्याति इस बात में थी कि यहाँ हर देश की औरतें उपलब्ध थीं। कमरों के फर्नीचर भी हर स्टाइल के थे : तुर्की, जापानी, लूइ XVI, यहाँ तक की अरबी तंबू भी। ये दुनिया का सबसे खर्चीला रंडी बाज़ार था। बड़े-बड़े लखपति, उद्योगपति, कैबिनेट मंत्री, सीनेटर और जज, सभी इसके ग्राहक थे। आम तौर पर किसी एक परिपाटी के लोग पूरे रंडी बाज़ार को ही एक शाम के लिए अपने कब्जे में लेने का ठेका कर लेते करते थे। बताते हैं कि एक बहुत बड़े ऐय्याश ने वहाँ ऐसा डेरा जमाया कि तीन हफ्ते तक उसने दिन का उजाला भी नहीं देखा।

जितना ही हम पश्चिम की तरफ बढ़ते गए, उतना ही मुझे यह पसंद आता गया। ट्रेन के बाहर जंगली ज़मीन के विशाल फैलाव को देखकर मेरे मन में आशा का संचार होता, भले ही जगह सुनसान और मटमैली हो। खुली जगह रूह के लिए अच्छी होती है। हृदय को विशाल बनाती है। मेरे देखने का नज़रिया बड़ा होता था।

क्वीवलैंड सेंट लुइ, मिन्निपोलिस, सेंट पॉल, कानसास सिटी, डेनवर, बट, बिलिंैग्स, जैसे शहरों में आने वाले कल की हलचल थी जो मेरी नस-नस को तड़का रही थी।

दूसरी रंगारंग कार्यक्रमों वाली कंपनियों से कई सदस्य हमारे दोस्त बने। हर शहर में रेड लाइट इलाकों में हम में से छ: या उस से अधिक लोग इकठठे् हो जाते। कभी-कभी किसी वेश्यालय की मैडम को हम लोग पटाने में कामयाब हो जाते। वो उस रात के लिए "अड्डा" बंद कर देती और फिर हमारा राज होता। यदा-कदा लड़कियां अभिनेताओं पर फ़िदा हो जातीं और अगले शहर तक उनका पीछा करतीं।

बट्ट, मोन्टाना के रेड-लाइट इलाके लम्बी सड़कों और उनसे लगे अगल-बगल के छोटे रास्तों वाले हुआ करते थे जिसमें सैकड़ों झोपड़ियां थीं,और खाटें लगी होती थीं। इनमें जो लड़कियां मिलती थीं उनकी उम्र सोलह साल से शुरू होती थी - एक डॉलर में उपलब्ध। बट्ट को किसी भी रेड लाइट इलाके के मुकाबले अपने यहाँ ज्यादा सुंदर लड़कियां होने का नाज़ था और ये सच था भी। जहाँ कोई सुंदर-सी लड़की आकर्षक कपड़ों में दिखी,देखने वाला समझ जाता था कि रेड लाइट वाली है, अपनी शॉपिंग कर रही है। धंधे का टाइम न हो तो वो दाएं-बाएं नहीं झाँकती थी और इज़्ज़तदार हो जाती थीं। कई बरस बाद मैं सॉमर सेट मॉम से उनके सेडी थामसन के चरित्र को लेकर उलझ पड़ा था। जहाँ तक मुझे याद है, जीन ईगल्स ने उसे स्प्रिंग साइड बूट वगैरह पहना कर पूरा ऊट-पटांग सा रूप दे दिया था। मैंने उन्हें बताया, जनाब ऐसे कपड़े बट्ट मोन्टाना में कोई भी धंधे वाली पहन ले तो एक अधेला नहीं कमा पाएगी।

1910 में बट्ट, मोन्टाना अभी भी "निक कार्टर" वाला शहर था। लम्बे-लम्बे बूट और दस गैलन वाली टोपियां और लाल गुलूबंद लगाए खान मजदूरों का शहर। बंदूक का खेल मैंने अपनी आँखों से सड़कों पे देखा, जिसमें एक बूढ़ा शैरिफ भगोड़े कैदी के पैरों परनिशाना लगा रहा था। तकदीर से वो बाद में एक बंद गली में फंस गया, और कुछ हुआ नहीं।

हम जैसे जैसे पश्चिम की तरफ बढ़ते जाते, मेरा दिल उतना ही खुश होता जाता। शहर ज्यादा साफ़ थे। रास्ते में विनिपेग, टेकोमा, सीटल,वैंकूवर और पोर्टलैंड पड़ते थे। विनिपेग और वैंकूवर में ज्यादातर दर्शक अंग्रेज थे और अपने अमेरिकी झुकाव के बावजूद उनके सामने अभिनय करने में आनंद आया।

और अंत में केलिफोर्निया! खिली धूप, संतरे और अंगूर के बाग, और प्रशांत महासागर के तट पर हज़ारों मील तक फैले ताड़ के वृक्षों का स्वर्ग! पूर्व का प्रवेश द्वार सैन फ्रांसिस्को अच्छे व्यंजनों और सस्ते दामों का शहर, जिसने मुझे पहली बार मेंढ़क की टांग का जायका दिया। खालिस वहीं की चीज़, स्ट्रॉबेरी शॉर्ट केक और एवोकेडो नाशपाती।

हम 1910 में पहुँचे जब शहर 1906 वाले भूकंप से, या उनके शब्दों में कहें तो आग से, उबर चुका था। पहाड़ी रास्तों में अभी एक या दो दरारें थीं लेकिन नुक्सान का कोई अवशेष नहीं। हर चीज़ नयी और चमचमाती हुई थी। मेरा छोटा होटल भी।

हमारा कार्यक्रम एम्प्रेस में था। इसके मालिक थे सिड ग्राउमैन और उनके पिता, बड़े ही मिलनसार और सामाजिक लोग। पहली बार पोस्टर पर मैं अकेला था और कार्नो का नाम तक नहीं था। दर्शक - क्या खूब! "वाऊ वाऊज़" नीरस था फिर भी हर शो खचाखच भरा और ठहाकों से गूँजता हुआ होता। ग्राउमैन ने उत्साहित होकर कहा, "कार्नो साहब का काम जब भी निपट जाय, मेरे पास आना, हम लोग मिलकर शो करेंगे।" मेरे लिए यह उत्साह नयी बात थी। सैन फ्रांसिस्को में उम्मीद और मेहनत के ज़ज्बे को महसूस किया जा सकता था।

दूसरी ओर लॉस एंजेल्स, बदसूरत शहर था। गर्म और कष्टदायक। लोग मरियल और कांतिहीन लगते थे। जलवायु ज्यादा गर्म थी पर सैन फ्रांसिस्को वाली ताज़गी नहीं थी; प्रकृति ने उत्तरी कैलिफोर्निया को वो संपदाएं दी हैं जो विल्सायर बोलेवियर वाले प्रागैतिहासिक कोलतार के गड्ढों में हॉलीवुड के गायब हो जाने के बाद भी फलती-फूलती रहेंगी।

हमने अपना पहला दौरा मोरमोन्स[1] के गृह नगर साल्ट लेक सिटी में समाप्त किया। मैं मोज़ेज और इज़राएल के बच्चों के बारे में सोचने लगा। शहर काफ़ी फैला और खुला हुआ है जो सूरज की गर्मी में मरीचिका की तरह थर्राता सा दिखता है। सड़कों की चौड़ाई का अंदाज वही लगा सकता है जिसने विशाल मैदानों को पार किया हो। मोरमोन्स की ही तरह शहर अकेला और कठोर है। देखने वाले भी वैसे ही थे।

सलिवान एंड कॉन्सीडाइन सर्किट में "वाउ वाउ'ज" के प्रदर्शन के बाद हम न्यू यार्क वापस आ गए जहाँ से सीधे इंगलैंड लौटने का इरादा था,लेकिन मिस्टर विलियम मॉरिस, जो दूसरे रंगारंग ट्रस्टों से लड़ रहे थे, ने हम लोगों के पूरे दल को न्यू यार्क शहर में फोर्टीथर्ड स्ट्रीट पर स्थित अपने थिएटर में छह हफ्ते के कार्यक्रम के लिए बुक किया। हमने ए नाइट इन एन इंग्लिश म्यूज़िक हॉल से शुरुआत की। इसमें भारी सफलता मिली।

सप्ताह के दौरान एक युवक और उसके दोस्त लड़कियों से मुलाकात होने तक का समय काटने के लिए इधर उधर डोलते हुए विलियम मॉरिस के अमेरिकन म्यूजिक हॉल में घुस गए। यहाँ, उन लोगों ने हमारा शो देखा। उनमें से एक ने कहा, "मैं कभी बड़ा बना तो एक आदमी है जिसे अपने लिए लूँगा।" वो "ए नाइट इन एन इंग्लिश म्यूलिक हॉल" की बात कर रहा था। उस समय वह जी डब्लू ग्रिफिथ के लिए प्रति दिन पाँच डॉलर पर बायोग्राफ कंपनी में फिल्म के एक्स्ट्रा के रूप में कार्य कर रहा था। वह व्यक्ति था, मैक सेनेट जिसने बाद में कीस्टोन कंपनी बनायी।

न्यू यार्क में विलियम मॉरिस के लिए छ: सप्ताह का सफल कार्यक्रम करने के बाद एक बार फिर सलिवान एंड कंसिडाइन सर्किट के लिए बीस हफ्तों के दौरे के लिए हमारी बुकिंग हो गयी।

दूसरा दौरा समाप्ति के करीब आने लगा तो मैं उदास हो उठा। तीन ही सप्ताह रह गए थे: सैन फ्रांसिस्को, सैन डिएगो, सॉल्ट लेक सिटी और उसके बाद वापिस इंगलैंड।

सैन फ्रांसिस्को से रवाना होने के एक दिन पहले मार्केट स्ट्रीट पर टहलते हुए मैंने एक छोटी सी दुकान देखी जिसमें पर्दे वाली खिड़कियां थीं। लिखा था, "हाथ और पत्ते देख कर आपकी तकदीर बतायी जाती है - एक डालर।" मैं अंदर गया, जरा झेंपता हुआ। मेरा सामना भीतर के कमरे से निकलती हुई लगभग बयालिस साल की एक सुंदर औरत से हुआ। वह भोजन के बीच में ही उठ कर आ गई थी। खाना चबाते हुए उसने लापरवाही से एक छोटी टेबल की ओर इशारा किया जिसमें दीवार की ओर पीठ और दरवाजे की ओर मुख पड़ता था। मेरी ओर देखे बिना उसने कहा,"बैठ जाइये," और दूसरी तरफ खुद बैठी। उसके तौर तरीके बड़े बेढंगे थे। "पत्तों को इधर उधर करो, और तीन बार मेरी तरफ काटो और टेबल पर अपनी खुली हथेली रखो।" उसने पत्ते उलटे, सामने फैलाया और उनका अध्ययन किया। फिर मेरे हाथ देखे। "लंबी यात्रा के बारे में सोच रहे हो, यानी स्टेट्स छोड़ दोगे। पर जल्द ही वापस लौटोगे और एक नया धंधा शुरू करोगे - जो अभी कर रहे हो उससे कुछ अलग।" इसके बाद वह कुछ हिचकिचाई और भ्रम में पड़ गयी, "लगभग वैसा ही, लेकिन अंतर है। इस नए कारोबार में मुझे भारी सफलता दिखाई दे रही है। तुम्हारे सामने जबर्दस्त कैरियर पड़ा हुआ है। पर मुझे नहीं पता क्या है?" पहली बार उसने नज़रें ऊपर कीं। फिर मेरा हाथ लिया, "अरे, हाँ, तीन शादियाँ हैं: पहली दोनों नहीं चलेंगी, लेकिन अंत में तीन बच्चों के साथ सुखी विवाहित जीवन बिताते हुए आपकी ज़िंदगी कटेगी।" (यहाँ वो गलत थी!)। इसके बाद फिर से उसने मेरा हाथ देखा,"हाँ, पैसा बहुत ज्यादा कमाओगे; कमाने वाला हाथ है।" फिर उसने मेरा चेहरा देखा,"श्वास नली के न्यूमोनिया से मरोगे,बयासी साल की उम्र में। एक डॉलर, प्लीज़। और कुछ पूछना चाहोगे?"

"नहीं," मै हँसा, "मुझे लगता है, मैं अकेला अच्छा खासा जाऊँगा।"

साल्ट लेक सिटी में समाचार पत्र अपहरण और बैंक डकैतियों से भरे रहते थे। नाइट क्लबों और कैफे के ग्राहकों को कतार में दीवार की तरक मुँह किए हुए खड़ा करवा कर नकाबपोश लुटेरे लूट लेते थे। एक ही रात में डकैती की तीन घटनाएं हो गयी थीं और पूरे शहर में आतंक फैल गया था।

शो के बाद हम पीने के लिए पास के किसी सैलून में चले जाते थे, और यदा-कदा ग्राहकों से परिचय हो जाया करता था। एक शाम एक मोटा, खुश-मिजाज़, गोल चेहरे वाला आदमी दो और लोगों के साथ आया। उनमें से उम्र में सबसे बड़ा, वो मोटा आदमी आगे आया, "उस अंग्रेज़ी नाटक में तुम्हीं लोग साम्राज्ञी की भूमिका कर रहे हो?"

हम लोगों ने मुस्करा कर सिर हिलाया, "तभी तो कहूँ मैंने तुम लोगों को पहचान लिया! अरे! आओ आओ!" उसने अपने साथ आए उन लोगों को बुलाया और उनसे परिचय करा कर हमें ड्रिंक ऑकर किये।

मोटा अंग्रेज़ था - वैसे वो उच्चारण अब नाम मात्र को रह गया था - लगभग पचास का, अच्छे स्वभाव का, छोटी चमकती आँखों और लाल सुर्ख चेहरे वाला आदमी।

रात जैसे-जैसे बीतती गयी, उसके दोनों दोस्त और मेरे साथ के लोग बार की ओर चले गए। मैं "मोटू" के साथ अकेला रह गया। उसके दोस्त उसे यही कहकर पुकारते थे।

वह हमराज़ हो गया। "उस पुराने देश में तीन साल पहले मैं गया था।" उसने कहा,"लेकिन ये वैसा नहीं है - यही तो जगह है। यहाँ तीस साल पहले आया। कुछ नहीं था। बस, एक अनाड़ी मोन्टाना कॉपर में स्सालों मेहनत करते-करते चूतड़ घिस जाती थी। फिर दिमाग लगाया। मैं कहता हूं यही तो खेल है, अब अपने पास मुस्टण्डे हैं। काम करने को। उसने नोटों की मोटी गड्डी बाहर निकाली।"

"चलो एक और डरिंक लेते हैं," "बच के!" मैंने मज़ाक में कहा, "पकड़े जा सकते हो!"

उसने मुझे बड़ी शैतानी, और जानकार मुस्कुराहट से देखा फिर आँख मार कर कहा, "ये नहीं बच्चू!"

जिस ढंग से उसने आँख मारी, मैं अंदर तक सहम गया। इसका मतलब बहुत बड़ा था। वैसे ही मुस्कराते हुए और मुझ पर अपनी नज़रें उसी तरह टिकाए वह बोलता गया,"समझ रहे हो?" उसने कहा। मैंने समझदारी से सिर हिलाया।

इसके बाद गूढ़ भाव से अपना चेहरा मेरे कान के पास लाकर उसने बात शुरू की,"उन दो पट्ठों को देख रहे हो?" वह अपने मित्रों के बारे में फुसफुसाया,"वही अपना लश्कर है, दो उल्लू के पठ्ठे, दिमाग़ जरा भी नहीं, लेकिन जिगर फौलाद का।"

मैंने सावधानी से अपने होठों पर उंगली रखी कि लोग सुन लेंगे, वो आहिस्ता बोले।

"ठीक है, भाईजान, हम लोग आज रात जहाज से निकल रहे हैं।" उसने आगे कहा, "सुनो, हम तो पुराने जहाजी ठहरे, है न? तुम्हें कई बार इलिंगटन एम्पायर में देखा है जाते आते।" मुँह बनाकर उसने कहा,"मुश्किल काम है मेरे भाई।"

मैं हँस पड़ा।

और गहरा राज़दार बनने के बाद उसने मुझसे ताउम्र दोस्ती करनी चाही और मेरा न्यू यार्क का पता माँगा।

"बीते दिनों की खातिर कभी दो-एक लाइन तुम्हें लिखूंगा।"

शुक्र है फिर उसने कभी संपर्क नहीं किया।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 9

अमेरिका छोड़ते समय मुझे कोई खास अफसोस नहीं हो रहा था, क्योंकि मैंने लौटने का मन बना लिया था। कैसे और कब, मैं नहीं जानता था। इसके बावजूद, मेरा मन अभी से लंदन और अपने छोटे-से सुकून भरे घर में लौटने की राह देखने लगा था। जब से मैं अमेरिका के टूर पर था,ये फ्लैट मेरे लिए मंदिर जैसा हो गया था।

सिडनी का समाचार बहुत दिनों से नहीं मिला था। अपने आखिरी खत में उसने लिखा था कि नानाजी फ्लैट में रह रहे थे। लेकिन मेरे लंदन पहुँचने पर, सिडनी मुझे स्टेशन पर मिला और बताया कि उसने शादी कर ली है, फ्लैट छोड़ दिया है और ब्रिक्सटन रोड पर सजे सजाए घर में रह रहा है। ये सोच कर मुझे बड़ा झटका लगा कि खुशियों से भरा वह छोटा-सा स्वर्ग अब नहीं रहा जिसने मुझे जीवन जीने का एक अर्थ दिया था, और घर पर नाज करना सिखाया था --------। अब मैं बेघर था। ब्रिक्सटन रोड पर मैंने पीछे की ओर एक कमरा लिया। जगह इतनी मनहूस थी कि मैंने जितनी जल्द हो सके, अमेरिका लौटने फैसला कर लिया। किसी खाली स्लॉट मशीन में सिक्का डालने पर जैसे कुछ नहीं होता उस रात लंदन मेरी वापसी पर वैसा ही बेपरवाह लगा।

सिडनी ने चूंकि शादी कर ली थी और हर शाम काम पर रहता, मैं उससे कम ही मिल पाता था; परंतु रविवार को हम मां से मिलने गए। ये बहुत ही हताश करने वाला दिन था क्योकि मां अभी भी ठीक नहीं हुई थी। वह अभी-अभी भजन कीर्तन के शोरगुल वाले दौर से होकर गुज़री थी और उसे गद्देदार दीवारों वाले कमरे में रखा गया था। नर्स हमें पहले ही ताकीद कर चुकी थी। सिडनी ने उसे देखा, लेकिन मैं उससे मिलने की हिम्मत न कर सका, इसलिए इंतज़ार करना रहा। सिडनी वापिस आया तो परेशान लग रहा था। उसने बताया कि इलाज के तौर पर मां को बर्फ़ीले,ठंडे पानी की धार से शॉक दिया गया था और उसका चेहरा बिल्कुल नीला पड़ गया था। इस पर हम लोगों ने उसे एक प्राइवेट संस्थान में रखने का फैसला किया - खर्च अब हम उठा सकते थे - सो, हम उसे उस पागल खाने में ले आए जिस जगह इंगलैण्ड के महान कॉमेडियन स्वर्गीय डान लीओ भर्ती किये गये थे।

हर दिन मैं अपने आपको पहले से कहीं ज्यादा बेगाना और जड़ से कटा हुआ महसूस करता था। मेरी समझ से अगर मैं अपने छोटे से फ्लैट में लौटा होता, तो मेरी भावनाएं दूसरी होतीं। तब स्वाभाविक रूप से उदासी मुझ पर पूरी तरह से हावी न हो पाती। अमेरिका से आने के बाद पुराना परिचय, रीति-रिवाज और इंगलैण्ड से मेरा रिश्ता सभी मेरे भीतर उथल-पुथल मचा रहे थे। इंगलैण्ड की गर्मी का मौसम अपने सबसे अच्छे रूप में था जिसके जोड़ की रूमानी और सुहावनी चीज़ मेरी नज़र में कोई दूसरी नहीं थी।

बॉस कार्नो ने मुझे टैग्स आइलैण्ड के अपने हाउस बोट पर सप्ताहांत के लिए बुलाया। काफी लम्बा चौड़ा इंतज़ाम था। सब कुछ बेहद सुव्यवस्थित। महोगनी के पैनल वाले कमरे और मेहमानों के लिए निजी राजसी ठाठ बाठ वाले कमरे। रात में बोट के चारों ओर रंगीन बत्तियों के मनमोहक बंदनवार जगमगा उठे। गर्म और सुंदर शाम थी और डिनर के बाद अपनी कॉफी और सिगरेट लेकर ऊपर वाले डेक में जगमगाती रंगीन रोशनियों के नीचे जाकर बैठे गए। यही वो इंगलैण्ड था जो मुझे किसी भी देश से वापस खींच सकता था।

अचानक कहीं से एक बनावटी आवाज ने पागलों की तरह चीखना शुरू कर दिया; "अरे देखो, क्या प्यारी बोट है मेरी, देखो! मेरी मस्त नाव को! और क्या रोशनी! हा! हा! हा!" आवाज़ मज़ाक उड़ाने वाली हँसी में बदल रही थी। हम लोगों ने यह देखने के लिए नज़र दौड़ायी कि कहाँ से यह धारा फूट कर आ रही है। हमने खेनेवाली नाव में सफेद फ्लेनल के कपड़े पहने एक आदमी को देखा जिसके पीछे की सीट पर एक औरत लेटी हुई थी। पूरा दृश्य "पंच" पत्रिका के किसी कार्टून चित्र की तरह था। कार्नो रेलिंग पर झुके और ज़ोर से आवाज़ लगायी लेकिन उसने अपनी पागलों जैसी हँसी नहीं रोकी।

"अब एक ही चीज़ की जा सकती है," मैंने कहा: "हम भी वैसे अश्लील बन जाएं जैसा वो हमें सोचता है।" फिर तो मैंने चुन-चुन कर ऐसी गालियां सुनायी जो उसके साथ की औरत के झेंपने के लिए काफी थी। वो झटपट खिसक लिया।

ये मूर्ख चिल्ला-चिल्लाकर रुचि की आलोचना नहीं कर रहा था, ये तो अहंकार भरा पूर्वाग्रह था उस चीज के खिलाफ जिसे वह निम्न वर्गीय ठाठ बाठ समझ रहा था। बकिंघम पैलेस के सामने वह कभी अट्टहास करते हुए नहीं चिल्लाएगा कि देखो मैं कितने बड़े घर में रहता हूं, या राज्याभिषेक वाले रथ पर नहीं हँसेगा। हमेशा इस तरह होने वाले वर्गीकरण का इंगलैण्ड में मुझे तीखा अनुभव मिला। ऐसा लगता है जैसे इस तरह के अंग्रेज सामाजिक तौर पर दूसरों की कमियां बड़ी जल्दी ही मापने तौलने लगते हैं।

हमारी अमेरिकी मंडली काम में लग गयी थी और लंदन के हॉलों में हम लोगों ने चौदह सप्ताह तक प्रदर्शन किया। शो ठीक चले, दर्शक भी अच्छे थे लेकिन हमेशा मैं यह सोचता रहता कि कहीं अमेरिका वापिस जा पाऊँगा या नहीं। इंगलैंड से मुझे प्यार था, पर मेरे लिए वहाँ रहना असंभव था; अपनी पृष्ठभूमि के चलते हमेशा ये बात बेचैन किए रहती कि यहाँ रह कर मैं अपनी तुच्छता के दलदल में धंसता चला जा रहा हूं। इसलिए स्टेट्स के अगले टूर के लिए हमारे बुक हो जाने का समाचार पाकर मैं बड़ा खुश हुआ।

रविवार को सिडनी और मैं मां से मिलने गए। उसकी सेहत पहले से बेहतर लगी और सिडनी के प्रदेशों की तरफ जाने से पहले हम लोगों ने साथ खाना खाया। लंदन में अपनी आखिरी रात अपनी भावनाओं से जूझता हुआ, उदासी और कड़वाहट लिए हुए मैं वेस्ट एंड में चहलकदमी कर रहा था और अपने आप से कह रहा था, इन गलियों को आखिरी बार देख रहा हूँ।

इस बार हम ओलंपिक पर सेकंड क्लास में न्यू यॉर्क होते हुए पहुँचे। इंजन की धड़कन धीमी पड़ गयी। उसका मतलब था हम अपनी नियति के करीब पहुँच रहे हैं। इस बार स्टेट्स अपरिचित नहीं लगा। मुझे लगा मैं विदेशियों के बीच विदेशी हूँ, बाकी सबसे जुड़ा हुआ।

न्यू यॉर्क को मैं जितना पसंद करता था, उतनी ही उत्सुकता से मैं वेस्ट की प्रतीक्षा कर रहा था जहाँ फिर उन लोगों से मुलाकात होगी जिन्हें अब मैं अच्छा दोस्त समझता था : मोन्टाना के बट्ट के बार में काम करने वाला आयरिश, मिनेपोलिस का दोस्ताना मेहमाननवाज़ जमीन जायदाद वाला लखपती, सेंट पॉल की सुंदर लड़की जिसके साथ मैंने एक रोमांटिक सप्ताह बिताया था। सॉल्ट लेक सिटी का स्कॉटिश खदान मालिक, टकोमा का मित्रवत डेंटिस्ट और सेन फ्रांसिस्को का ग्रॉमैन्स परिवार।

प्रशांत के तट पर जाने से पहले हमने "स्माल्स" के इर्द गिर्द कार्यक्रम किये। शिकागो और फिलाडेल्फिया के दूरस्थ उपनगरों और फॉल रिवर और ड्यूलुथ जैसे औद्योगिक शहरों के छोटे (स्माल) थिएटरों में।

पहले की तरह मैं अकेले रह रहा था लेकिन इसके लाभ थे, क्योंकि इससे मुझे स्वाध्याय का मौका मिलता था। जिसका संकल्प मैंने महीनों के पहले किया था पर पूरा नहीं कर पाया था।

कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनमें कुछ जानने समझने की प्रचण्ड इच्छा होती है। मैं भी उन्हीं में से एक था। पर मेरा उद्देश्य इतना पवित्र नहीं था। मैं जानना चाहता था लेकिन मुझे ज्ञान से प्रेम नहीं था, मेरे लिए यह जाहिलों के प्रति दुनिया की घृणा से बचने के लिए ढाल थी। इसलिए जब मुझे समय मिलता था, मैं सेकेंड हैंड किताबों की दुकानों के चक्कर लगाता था।

फिलाडेल्फिया में यूँ ही एक बार मुझे राबर्ट इंगरसोल्स की किताब एसेज़ एंड लेक्चर्स का एक संस्करण हाथ लग गया। बड़ी उत्साहजनक खोज थी यह; उसकी नास्तिकता से मेरे इस विश्वास को बल मिला कि ओल्ड टेस्टामेंट की भयानक क्रूरता मानवता के लिए शर्मनाक बात थी। फिर मुझे इमर्सन मिले। "सेल्फ रिलाएन्स" ("आत्मनिर्भरता") पर उनका लेख पढ़ कर लगा जैसे मुझे स्व,र्गिक जन्मसिद्ध अधिकार सौंप दिया गया हो। फिर आए शापेनहावर। मैंने द वर्ल्ड एज़ विल एंड आइडिया के तीन खंड खरीदे जिसे चालीस सालों से जब तब पढ़ता रहा हूं पर कभी भी शुरू से अंत तक नहीं। वाल्ट व्हिटमैन की लीव्स ऑफ ग्रास से मुझे चिढ़ हुई और ये चिढ़ आज तक बरकरार है। उसमें प्यार भरा हृदय कुछ ज्यादा ही उमड़ता है और राष्ट्रीय रहस्यवाद की अति है। शो के बीच मिलने वाले समय में अपने ड्रेसिंग रूम में मैंने ट्वेन, पो, हार्थोन, इर्विंग और हैज़लिट को भी पढ़ने का आनंद लिया। दूसरे दौरे में शास्त्री य शिक्षा उतनी भले ही न आत्मसात कर पाया होऊं जितना मैं चाहता था, पर जिस कारोबार में मैं था उसके निचले स्तर के उबाऊपन से मेरा परिचय हो गया था।

ये सस्ते रंगारंग सर्किट्स बड़े ही मनहूस और निराशाजनक थे और अमेरिका में मेरे भविष्य की आशा सप्ताह के हर दिन तीन और कभी तीन और कभी चार शो की चक्की में पिसने लगी। इसकी तुलना में इंगलैंड का रंगारंग जगत स्वर्ग था। कम से कम वहाँ सप्ताह में छ: दिन ही काम करते थे और एक रात में दो ही शो होते थे। अमेरिका में हमें यही सोच कर संतोष कर लेना पड़ता था कि पैसा कुछ ज्यादा बच रहा है।

लगातार पाँच महीनों तक "कड़ी" मेहतन के साथ काम करने की थकान से मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी। इसलिए फिलाडेल्फिया में एक हफ्ते के आराम का जब मौका मिला तो मैंने इसे सहर्ष स्वीकार किया। मुझे बदलाव चाहिए था। दूसरा परिवेश चाहिये था। अपनी पहचान खोकर कोई और बन जाने के लिए मौका चाहिये था। रोज़-रोज़ की इस घटिया दर्जे की रंगारंग प्रस्तुति से उकता गया था और सोचा एक हफ्ते जम कर ऐश की जाय। काफी पैसे जमा हो चुके थे और खूँटे से एक बार जो छूटा, दिल खोल कर खरचने लगा। और क्यों नहीं? मैंने इतना जमा करने के लिए फूंक-फूंक कर खर्च किया था और ये सोचा था कि जब काम नहीं होगा, उस समय भी संभाल कर खरचना है, तो फिर अभी क्यूं नहीं जरा सा खर्च कर लिया जाए?

मैंने एक मँहगा ड्रेसिंग गाउन खरीदा और एक शानदार सूटकेस खरीदा जिसकी कीमत पिचहत्तर डालर पड़ी। दुकानदार तो खुशामद में बिछ गया; "सर, कहिए तो आपके घर पर पहुँचा दिया जाये?" उसके इन थोड़े से शब्दों ने मेरा सिर ऊंचा कर दिया, मुझे कुछ विशिष्ट बना दिया। अब न्यूयार्क जाऊंगा और इस घटिया रंगारंग कार्यक्रम का और इसके पूरे अस्तित्व का चोला अपने पर से उतार फेकूँगा।

मैंने होटल एस्टॉर में एक कमरा लिया। ये होटल उन दिनों बड़ा आलीशान माना जाता था। मैंने अपना नया कोट और डर्बी टोप पहना, छड़ी ली और हाँ, साथ में अपना छोटा सूटकेस भी ले लिया। लॉबी की तड़क-भड़क और वहाँ आते-जाते लोगों का विश्वास देख कर मैं कुछ डगमगाया। घबड़ाहट में ही डेस्क पर जाकर नाम दर्ज कराया।

कमरे का किराया 4.50 डालर प्रतिदिन। डरते हुए मैंरे पूछा कि किराया एडवांस में दे दू। क्लर्क ने बड़ी ही विनम्रता और दिलासा भरे अंदाज में कहा,"अरे नहीं, सर, ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है।"

लॉबी की चमक-दमक और शानो-शौकत के बीच चलते हुए मेरी भावनाओं को कुछ कुछ होने लगा और कमरे में पहुँच कर मन रोने को करने लगा। कमरे में मैं लगभग एक घंटे तक रहा। बाथरूम में लगे तरह-तरह के आइनों और नलों का मुआयना किया। इसके ठंडे और गर्म पानी के नलों को चलाकर उनका प्रचुर बहाव देखा। नलकों और फव्वारों की बढ़िया किस्में निहारता रहा। कितनी बेहिसाब होती है विलासिता और कितनी आश्वस्त करती है।

मैंने स्नान किया, बालों में कंघी की, नया बाथ रोब पहना। मेरा इरादा था अपने चार डॉलर पचास सेंट की पाई पाई को भोगना। काश, मेरे पास पढ़ने को कुछ होता - अखबार ही सही। लेकिन अखबार मंगाने के लिए फोन करने का आत्मविश्वास नहीं था। सो, कमरे के बीच में एक कुर्सी पर बैठकर अत्यंत उदास मन से हर चीज को निहारने लगा। जितना देखता, उतना ही दु:खी होता जाता।

कुछ देर बाद मैंने कपड़े पहने और नीचे उतरा। मुख्य भोजन कक्ष का रास्ता पूछा। अभी डिनर का समय नहीं हुआ था। जगह खाली-खाली थी। बस, दो एक खाने वाले पहुँचे थे। हेड वेटर मुझे खिड़की के पास वाली एक टेबल की ओर ले गया।

"सर, आप यहाँ बैठना पसंद करेंगे?"

"कहीं भी चलेगा," मैंने अपनी सबसे उम्दा अंग्रेजी आवाज़ में कहा।

अगले ही पल वेटरों की फौज ने मुझे घेर लिया और ठंडा पानी, मेन्यू, मक्खन और ब्रेड पेश करने लगे। भावुकता में मेरी भूख गायब हो चुकी थी। अलबत्ता, मैंने इशारों से काम लिया और शोरबा, रोस्ट किया हुआ चिकेन और मीठी चीज के तौर पर वनीला आइस क्रीम का ऑर्डर दिया। शराबों का एक मेन्यू वेटर ने मुझे दिया। मैंने ध्यान से देखने के बाद आधी बोतल शैम्पेन मँगायी। मैं रईस की भूमिका में इतना डूबा हुआ था कि भोजन और शराब का मज़ा क्या ही लेता। खा पी लेने के बाद मैंने वेटर को एक डॉलर का टिप दिया जो उन दिनों के हिसाब से असाधारण रूप से ज्यादा थी। लेकिन बाहर जाते वक्त जो अदब और आदाब मुझ पर बरसाये गये, इतनी टिप देनी बनती थी। अकारण ही, मैं वापस अपने कमरे में गया, दस मिनट तक बैठा, फिर हाथ धोये और बाहर निकल पड़ा।

चुपचाप मुलायम गर्मी की शाम थी। मेरे मूड की तरह। मैं मेट्रोपोलिटन ओपेरा हाउस की ओर जा रहा था। वहाँ "तैन्हॉउज़र" चल रहा था। मैंने कभी भी ग्रैण्ड ओपेरा नहीं देखा था। इसके कुछ अंश रंगारंग कार्यक्रमों में देखे थे और मुझे भयंकर चिढ़ थी इससे। पर अभी मैं इसके मूड में था। मैंने एक टिकट खरीदा और सेकेंड सर्किल में बैठा। ओपेरा जर्मन में था, जिसका एक भी शब्द अपने पल्ले नहीं पड़ा और न ही मुझे इसकी कहानी मालूम थी। लेकिन रानी के मरने के बाद उसे तीर्थ यात्रियों के सामूहिक गान के संगीत के साथ लाया गया तो मैं फूट-फूट कर रो पड़ा। इसमें मेरी जिंदगी का सारा दर्द सिमट आया लगता था। मैं अपने आपको रोक नहीं पाया। मेरे आस पास बैठे लोगों ने क्या सोचा होगा, मुझे नहीं पता, लेकिन बाहर निकला तो बदन में ताकत नहीं रह गई थी और भावनात्मक रूप से चूर-चूर हो गया था।

सबसे अंधेरे रास्तों से होकर मैं शहर की ओर चलने लगा क्योंकि ब्रॉडवे की घूरती रोशनी मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी और मूड ठीक होने तक मैं होटल वाले उस वाहियात कमरे में लौटना भी नहीं चाहता था। ठीक होने पर मेरा सीधा सो जाने का इरादा था। शारीरिक और मानसिक रूप से मैं निढाल हो चुका था।

होटल में घुसने के पहले मैं अचानक हेट्टी के भाई आर्थर केली से टकरा गया। हेट्टी जिस मंडली में थी उसका वह मैनेजर था। उसका भाई होने के नाते हम लोगों में दोस्ती थी। आर्थर को मैंने कई बरसों से नहीं देखा था।

"चार्ली! कहाँ जा रहे हो?" उसने कहा। मैने लापरवाही से एस्टर की दिशा में सिर हिलाया, "सोने जा रहा था।"

आर्थर पर इसका असर पड़ा।

उसके साथ दो दोस्त थे। उनसे मेरा परिचय कराने के बाद उसने प्रस्ताव रखा कि हम सभी मेडिसन एवेन्यू स्थित उसके घर चलें, कॉफी पी जाय और गपशप हो।

फ्लैट आरामदायक था। हम लोगों ने साथ बैठ कर हल्की फुल्की इधर-उधर की बातें कीं। आर्थर इस बात के प्रति सतर्क था कि हमारे अतीत का कोई जिक्र न आने पाए। वैसे, मेरे एस्टर में ठहरने की बात सुनकर वह और जानने को उत्सुक था। लेकिन मैंने कुछ खास बताया नहीं। सिर्फ ये कि मैं दो या तीन दिनों की छुटटी में न्यू यॉर्क आया था।

केंबरवैल में जब आर्थर रह रहा था तब से अब तक उसने लम्बा सफ़र तय कर लिया था। अब वह अमीर व्यवसायी बन गया था और अपने जीजा फ्रेंक जे गॉल्ड के लिए काम करता था। उसकी दुनियावी बातें सुन कर मैं और उदास होता गया। अपने दोस्तों में से एक की ओर इशारा करते हुए केली ने कहा, "अच्छा लड़का है वह। अच्छे परिवार का है, मेरी जानकारी में।" खानदान के बारे में उसकी रुचि देखकर मैं अपने आप पर मुस्कुराया और समझ गया कि आर्थर और मेरा मेल नहीं था।

न्यू यार्क में मैं केवल एक दिन रुका। अगली सुबह मैंने फिलाडेल्फिया लौटने का फैसला किया। उस एक दिन में मुझे जो बदलाव चाहिए था,वह मिला पर ये भावनात्मक अकेलेपन का था। मुझे अब संग-साथ चाहिए था। मुझे सोमवार सुबह वाले कार्यक्रम और मंडली के लोगों से मिलने का इंतज़ार था। पुराने कोल्हू में जुतना कितना भी उबाऊ हो, उस एक दिन के ठाट-बाट से मेरा जी भर गया था।

फिलाडेल्फ़िया लौट कर मैं थिएटर गया। रीव्ज़ साहब के नाम एक तार आया था और उन्होंने जब उसे खोला, मैं वहीं था।

"मुझे लगता है कहीं तुम्हारे लिए तो नहीं," उन्होंने कहा।

लिखा था "आपकी कंपनी में चैक़िन या वैसे ही नाम का कोई व्यक्ति है। यदि हो तो वह कैसेल एंड बावमैन, 24 लॉन्गकेयर बिल्डिंग ब्रॉडवे से संपर्क करे।"

कंपनी में उस नाम का कोई नहीं था, लेकिन रीव्ज़ का मानना था कि उस नाम का मतलब चैप्लिन हो सकता है। फिर तो मैं आनंदित हो उठा क्योंकि मुझे, जैसा कि पता चला, लॉन्गकेयर बिल्डिंग ब्रॉडवे के बीचों-बीच पड़ती थी और इसमें वकीलों के दफ्तर भरे पड़े थे; ये याद करके कि स्टेट्स में कहीं मेरी एक अमीर चाची हुआ करती थी, मेरी कल्पना को पंख लग गए; गुज़रने से पहले वो ज़रूर अच्छा-खासा पैसा छोड़ गयी होगी। सो मैंने झटपट केसल एंड बावमैन को तार दिया कि कंपनी में चैप्लिन नामक एक व्यक्ति है और वे शायद उसी के बारे में बात कर रहे हैं। मैं उत्सुकता से जवाब की प्रतीक्षा करने लगा। उसी दिन जवाब मिला। मैंने झट से तार फाड़ा और खोलकर पढ़ा।

लिखा था: "क्या आप चैप्लिन को जल्द से जल्द दफ्तर में मिलने को कह सकते हैं।"

उत्साहित होकर बड़ी आशा से मैंने न्यू यार्क के लिए एकदम सुबह की गाड़ी पकड़ी। फिलाडेल्फ़िया से ढाई घंटे का रास्ता था। क्या होगा मुझे नहीं पता था - मैंने कल्पना की कि किसी वकील के दफ्तर में बैठा हूं और मुझे कोई वसीयत पढ़कर सुनायी जा रही है।

पहुँचने पर कुछ निराशा हुई क्योंकि केसल एंड बावमैन वकील नहीं थे, चलचित्र निर्माता थे। अलबत्ता, ये मामला रोमांचक होने जा रहा था।

चार्ल्स केसल कीस्टोन कंपनी के मालिकों में से एक थे। उन्होंने कहा कि मिस्टर मैक सेनेट ने मुझे फोर्टी सेकेण्ड स्ट्रीट वाले अमेरिकी म्यूज़िक हॉल में पियक्कड़ की भूमिका में देखा था और यदि मैं वही आदमी हूँ तो वो मुझे फोर्ड स्टर्लिंग की जगह रखना चाहेंगे। मेरे मन में कई बार फिल्मों में काम करने का ख्याल आया था, और अपने मैनेजर रीव्ज़ के सामने मैंने प्रस्ताव भी रखा था कि हम लोग मिलकर साझेदारी में कार्नो के स्केचेज के सर्वाधिकार खरीद लें और उनकी फिल्में बनाएं। लेकिन रीव्ज़ को पूरा भरोसा नहीं था, और बात सही भी थी, क्योंकि हम फिल्में बनाने के बारे में कुछ जानते नहीं थे।

"क्या मैंने कीस्टोन की कोई कॉमेडी देखी है?" केसल साहब ने पूछा। देखी तो मैंने कई थी, लेकिन मैंने ये नहीं बताया कि मुझे वो कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़ के बनायी लगती थीं। अलबत्ता, माबेल नार्मेड नामक खूबसूरत लड़की, जो बीच बीच में उन फिल्मों में आती जाती रहती थी,की मौजूदगी के कारण वे अब तक टिके हुए थे। कीस्टोन ढर्रे की कॉमेडी को लेकर मैं कुछ खास उत्साहित नहीं था, लेकिन मुझे इसकी लोकप्रियता का भान था।

इस लाइन में एक साल बिताकर रंगारंग कार्यक्रमों की दुनिया में लौटने पर मैं अंतर्राष्ट्रीय सितारा बन जाऊंगा। इसके अलावा, इसमें एक नयी ज़िंदगी और अच्छा माहौल भी था। कैसल का कहना था कि करार के अनुसार मुझे प्रति सप्ताह तीन फिल्मों में काम करना होगा और वेतन होगा डेढ़ सौ डालर। कार्नो की कंपनी से जितना मिलता था, उससे यह दुगुना था। फिर भी मैंने ना नुकुर करते हुए कहा कि प्रति सप्ताह दो सौ डॉलर से कम नहीं लूँगा। कैसल साहब ने कहा अब ये सेनेट साहब पर है; वो उन्हें केलिफोर्निया में बता देंगे। फिर मुझे सूचना मिल जाएगी।

कैसल के जवाब का इंतज़ार मैंने बड़ी बेचैनी से किया। शायद मैं बहुत ज्यादा मांग बैठा था। आखिरकार खत आया कि वे लोग पहले तीन महीनों के लिए डेढ़ सौ डॉलर और बाकी के नौ महीनों के लिए एक सौ पचहत्तर डॉलर – जिंदगी में अब तक इससे बड़ा ऑफर नहीं मिला था - के हिसाब से साल भर के करार के लिए तैयार थे। सलिवन एंड कंसिडाइन टूर के समाप्त होते ही काम शुरू होना था।

ईश्वर की कृपा से लॉस एंजेल्स में हम लोग एम्प्रेस में खूब चले थे। यह एक कॉमेडी थी। नाम था "ए नाइट एट द क्लब"। मैं एक कमज़ोर बूढ़े पियक्कड़ की भूमिका में था और दिखने में कम से कम पचास बरस का लग रहा था। नाटक समाप्त होने पर सेनेट साहब खुश होकर मुझे बधाई देने आए थे। उस छोटी-सी मुलाकात में मेरा साबका घनी भौंह, भारी अनाकर्षक मुंह, और मजबूत जबड़े वाले एक भारी-भरकम इन्सान से पड़ा था और इस चेहरे मोहरे से मैं प्रभावित हुआ। पर मैं इस उधेड़बुन में था कि अपने भविष्य के रिश्ते में वह कितनी सहृदयता से पेश आएंगे। उस साक्षात्कार में लगातार मैं बेहद नर्वस था और समझ नहीं पा रहा था कि बंदा मुझसे खुश है या नहीं।

मैं कब उन्हें ज्वाइन करूँगा, उन्होंने चलताऊ ढंग से पूछा। मैने बताया सितंबर के पहले हफ्ते में शुरू करूँगा, जब कार्नो कंपनी से मेरा करार खत्म हो रहा है। कन्सास सिटी छोड़ने को लेकर मेरे मन में कुछ खटका था। कंपनी वापस इंग्लैंड जा रही थी और मैं लॉस एंजेल्स, जहाँ मैं अकेला होऊंगा और बात कुछ जम नहीं रही थी। अंतिम कार्यक्रम के पहले मैंने सबके लिए ड्रिंक मंगाया और सबसे विदा लेने के विचार से मैं कुछ ग़मगीन हो गया।

अपनी मंडली के आर्थर डेन्डो, जिसकी मुझसे किसी कारण वश पटती नहीं थी, को मज़ाक सूझा और मुझे कुछ उपहासात्मक ढंग से कसमसा कर बताया कि कंपनी की ओर मुझे तोहफ़ा मिलेगा। ये कबूल करता हूँ कि ये बात मेरे दिल को छू गयी थी। अलबत्ता, कुछ हुआ नहीं। ड्रेसिंग रूम से जब सब जा चुके थे, फ्रेड कार्नो जूनियर ने स्वीकार किया कि डैंडो ने वास्तव में एक विदाई भाषण तैयार किया था और मुझे एक भेंट देने की व्यवस्था की थी, लेकिन ये देखकर कि मैंने सबके लिए पीने का इंतजाम किया है, उसकी वो सब करने की हिम्मत नहीं हुई और वह तथाकथित"उपहार" ड्रेसिंग टेबल के आइने के पीछे छोड़ गया था। टीन की पन्नी में लिपटी हुई तंबाकू की खाली डिबिया थी जिसमें चिकनाई वाले रोगन की पुरानी खुरचन रखी हुई थी।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 10

उत्सुकता और चिंता से भरा मैं लॉस एंजेल्स पहुँचा और ग्रेट नार्दर्न में एक छोटे से होटल में कमरा ले कर टिक गया। पहली ही शाम को मैंने एक बसमैन होलिडे का टिकट लिया और एम्प्रेस में दूसरा शो देखा। यहीं पर कार्नो कम्पनी अपने प्रदर्शन कर चुकी थी। एटेडेंट ने मुझे पहचान लिया और कुछ ही पल बाद मुझे यह बताने के लिए आया कि मिस्टर सेनेट और मिस मॉबेल नोर्माड मुझसे दो कतारें पीछे बैठे हुए हैं और पूछ रहे हैं कि क्या मैं उनके साथ बैठना पसंद करूंगा? मैं रोमांचित हो गया और जल्दबाजी में, फुसफुसा कर किये गये परिचय के बाद हमने मिल कर शो देखा। शो के खत्म हो जाने के बाद, हम मेन स्ट्रीट पर कुछ कदम चल कर गये और हल्के-फुलके खाने और ड्रिंक के लिए तहखाने में बने बीयर बार में चले गये। मिस्टर सेनेट को यह देख कर धक्का लगा कि मैं इतनी कम उम्र का हूँ।

"मेरा तो ख्याल था कि तुम काफी बूढ़े आदमी होवोगे," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में परेशानी का तंज था। और इस बात ने मुझे भी परेशानी में डाल दिया क्योंकि सेनेट साहब के सभी कामेडियन बुढ़ऊ से दिखने वाले शख्स होते थे। फ्रेड मेस पचास से ऊपर की उम्र के थे जबकि फोर्ड स्टर्लिंग भी चालीस के पेटे में थे।

"मैं उतने बूढ़े जैसा मेक अप कर सकता हूँ जितना आप चाहें, मैंने जवाब दिया।" अलबत्ता, नोर्माड ज्यादा आश्वस्त करने वाली थी। मेरे बारे में उसके जो भी ख्यालात थे, उसने उन्हें जाहिर नहीं होने दिया। मिस्टर सेनेट ने कहा कि मेरा काम तत्काल ही शुरू नहीं होगा। लेकिन मैं एडेन्डेल में स्टूडियो में आ सकता हूँ और वहाँ लोगों से जान पहचान बढ़ा सकता हूँ। जब हम कैफे से चले तो हम मिस्टर सेनेट की भव्य रेसिंग कार में ठुंस गये और उन्होंने मुझे मेरे होटल पर छोड़ दिया।

अगली सुबह, मैं एडेन्डेल के लिए एक स्ट्रीटकार में सवार हुआ। ये जगह लॉस एजेंल्स के एक उप नगर में थी। ये जगह बहुत बड़ी विचित्र सी दिखती थी और मैं तय नहीं कर पाया कि ये गुज़ारे लायक लोगों की रिहायशी बस्ती थी या फिर अर्ध-औद्योगिक बस्ती। इसमें छोटे-छोटे काठ कबाड़ और कबाड़ खाने थे और वहाँ उजाड़ से दिखने वाले छोटे-छोटे खेत थे जिन पर सड़क की तरफ एकाध लकड़ी के खोखे से बने हुए थे। कई जगह पूछताछ करने के बाद मैं कीस्टोन के सामने पहुँच पाया। यहाँ पर भी ढहते हुए खंडहरों वाला मामला था। उसके चारों तरफ हरी बाड़ लगी हुई थी। लगभग डेढ़ सौ वर्ग फुट की। इसका रास्ता एक बगीचे के गलियारे से हो कर जाता था और बीच में एक पुराना बंगला पड़ता था। पूरी जगह ही एडेन्डेल की ही तरह मनहूसियत भरी लग रही थी। मैं सड़क के दूसरी तरफ खड़ा हो कर उसे देखता रहा और मन ही मन उधेड़बुन में लगा रहा कि भीतर जाऊँ या नहीं।

लंच टाइम हो रहा था और मैं औरतों, मर्दों को अपने अपने मेक अप में बंगले के बाहर आते देखता रहा। इनमें कीस्टोन के सुरक्षाकर्मी भी थे। वे सड़क पार कर सामने बने एक छोटे से जनरल स्टोर में जाते और सैंडविच और हॉट डॉग खाते हुऐ बाहर आ जाते। उनमें से कुछ लोग एक दूसरे को ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें देकर पुकार रहे थे,"...ओए हैंक, जल्दी करो, स्लिम से कहो, फटाफट आये।"

अचानक ही मैंने शर्मिंदगी महसूस की और तेजी से एक सुरक्षित दूरी पर जा कर एक कोने में खड़ा हो गया और देखने लगा कि शायद मिस्टर सेनेट या मिस नोर्माड बंगले से बाहर निकल कर आ जायें लेकिन वे नज़र नहीं आये। मैं आधे घंटे तक वहाँ खड़ा रहा और फिर मैंने फैसला कर लिया कि होटल में ही वापिस चला जाये। स्टूडियो में जाने और उन सब लोगों का सामना करने की समस्या मेरे लिए पहाड़ सी होती चली जा रही थी।

दो दिन तक मैं स्टूडियो के गेट तक आता रहा लेकिन मेरी इतनी हिम्मत नहीं थी कि भीतर तक जा सकूँ। तीसरे दिन मिस्टर सेनेट ने फोन किया और जानना चाहा कि मैंने अब तक अपनी शक्ल क्यों नहीं दिखायी है। मैंने कोई भी उलटा सीधा बहाना बना दिया। अभी ठीक इसी वक्त चले आओ। मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगा। उन्होंने कहा। इसलिए मैं वहाँ जा पहुँचा और धड़ल्ले से बंगले के भीतर घुसता चला गया और मिस्टर सेनेट के लिए पूछा।

वे मुझे देख कर बहुत खुश हुए और मुझे सीधे ही स्टूडियों में ले गये। मेरी खुशी का पारावार न रहा। नरम, सम रौशनी पूरे सेट पर फैली हुई थी। ये रौशनी सफेद कपड़ों की बहुत बड़ी चादरों से आ रही थी जो सूर्य की रौशनी की चमक को छितरा रही थीं और इससे पूरे परिवेश को एक अलौकिक आभा सी मिल रही थी। रौशनी के इस फैलाव से दिन की सी रौशनी का आभास मिल रहा था।

एक या दो अभिनेताओं से मिलवाये जाने के बाद मैं वहाँ चल रहे कारोबार में दिलचस्पी लेने लगा। एक दूसरे से सटे तीन-तीन सेट लगे हुए थे और उन पर तीन कॉमेडी कम्पनियाँ काम कर रही थीं। ये सब ऐसा लग रहा था मानो आप विश्व मेले में कुछ देख रहे हों। एक सेट पर माबेल नोर्माड एक दरवाजा पीट रही थीं और चिल्ला रही थी,"..मुझे भीतर आने दो।" तभी कैमरा रुक गया और सीन पूरा हो गया। तब मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था कि फिल्में इस तरह से टुकड़ों में बना करती हैं।

एक और सेट पर फोर्ड स्टर्लिंग काम कर रहे थे। मुझे उन्हीं की जगह लेनी थी। मिस्टर सेनेट ने उनसे मेरा परिचय कराया। फोर्ड साहब कीस्टोन कम्पनी छोड़ कर जा रहे थे क्योंकि वे युनिवर्सल के साथ मिल कर अपनी खुद की कम्पनी खड़ी करने वाले थे। वे जनता के बीच और स्टूडियो में सबके बीच बहुत अधिक लोकप्रिय थे। लोग बाग उनके सेट के आस-पास घेरा बनाये खड़े थे और उनके अभिनय पर खूब हँस रहे थे। सेनेट मुझे एक तरफ ले गये और अपने काम करने के तौर तरीके के बारे में बताया,"हमारे पास कोई सीनेरियो नहीं होता। हमें बस एक आइडिया आता है, और उसके बाद घटनाओं की स्वाभाविक श्रृंखला चलती है और चलती रहती है और आखिर में भागा-दौड़ी में खत्म होती है। यही हमारी कॉमेडी का निचोड़ होता है।"

ये तरीका अच्छा था लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मैं पीछा करने के नाटक से नफरत करता था। इससे आदमी के व्यक्तित्व ही गायब हो जाता है, नास पिट जाता है उसका। अब चूंकि मैं फिल्मों के बारे में वैसे ही कम जानता था, लेकिन इतना ज़रूर जानता था कि कोई भी चीज़ व्यक्तित्व पर हावी नहीं होती।

उस दिन मैं एक सेट से दूसरे सेट के बीच भटकता रहा और कम्पनियों को काम करते देखता रहा। ऐसा लग रहा था मानों वे सब के सब स्टर्लिंग की ही नकल कर रहे हों। मैं इससे चिंता में पड़ गया, क्योंकि उनकी स्टाइल मुझे माफिक नहीं आती थी। वे एक परेशान हाल डच मेन की भूमिका कर रहे थे, और डच उच्चारण में दृश्यों के ज़रिये होठ हिलाने का अभिनय करते थे। हालांकि ये सब मज़ाक भरा होता था लेकिन मूक फिल्मों में खो जाता था। मैं इस बात को ले कर परेशान था कि मिस्टर सेनेट मुझसे क्या उम्मीद करते हैं। उन्होंने मेरा काम देखा हुआ था और जानते ही होंगे कि मैं फोर्ड टाइप की कॉमेडी के लायक नहीं था। लेकिन मेरी स्टाइल तो ठीक उसके विपरीत थी। इसके बावजूद स्टूडियो में सोची या विचारी गयी कोई भी कहानी या स्थिति सायास या अनायास ही फोर्ड साहेब को ही ध्यान में रख कर तय की जाती थी। यहाँ तक कि रोस्को ऑरबक्कल भी स्टर्लिंग की ही नकल कर रहे थे।

स्टूडियो निश्चित ही पहले कोई खेत रहा होगा। माबेल नोर्माड का ड्रेसिंग रूम दूर एक पुराने बंगले में था और इससे सटा हुआ एक दूसरा कमरा था जहाँ अभिनेत्रियों की मंडली की दूसरी महिलाओं के तैयार होने की जगह थी। बंगले के ठीक सामने ही कलाकारों की मंडली के जूनियर स्टाफ और कीस्टोन के सुरक्षा कर्मियों के लिए मुख्य ड्रेसिंग रूम था जो शायद कभी खलिहान रहा होगा। इनमें ज्यादातर लोग सर्कस के भूतपूर्व जोकर और ईनामी कुश्तीबाज रहे थे। मुझे स्टार ड्रेसिंग रूम दिया गया। इसे पहले मैक सेनेट, फोर्ड स्टर्लिंग और रोस्को ऑरबक्क्ल इस्तेमाल करते रहे थे। यह भी एक खलिहाननुमा ढांचा था जो शायद कभी अश्व सज्जा कक्ष होगा। माबेल नोर्माड के अलावा वहाँ दूसरी कई खूबसूरत लड़कियाँ भी थीं। ये सौन्दर्य और पाशविकता का अद्भुत और अनूठा संगम था।

कई दिन तक मैं स्टूडियो दर स्टूडियो भटकता रहा और हैरान परेशान होता रहा कि आखिर काम कब शुरू होगा। कई बार मैं स्टेज पर आते जाते सेनेट साहब से टकरा जाता, लेकिन वे मेरी तरफ सूनी निगाहों से देखते, और अपने ही ख्यालों में खोये रहते। मैं इस असुविधाजनक ख्याल से ही परेशान हो रहा था कि वे ये समझते होंगे कि उन्होंने मुझे रख कर गलती ही की है और वे मुझे इस हाल से निकालने के लिए कोई कोशिश भी तो नहीं कर रहे थे।

रोज़ दर रोज़ मेरी मानसिक शांति सेनेट साहब पर ही निर्भर करती थी। अगर हम कहीं एक दूसरे से रास्ते में टकरा भी गये तो वे मुस्कुरा देते और मेरी उम्मीदें बढ़ जातीं। बाकी कम्पनी का जो रुख था वह देखो और इंतज़ार करो वाला था लेकिन कुछ लोगों की निगाह में मैं फोर्ड के गलत विकल्प के रूप में ही चुन लिया गया था।

शनिवार आया तो सेनेट साहब बहुत ही उदारमना थे। उन्होंने कहा,"फ्रंट ऑफिस में जाओ और अपना चेक ले लो।" मैंने उनसे कहा कि मैं चेक के बजाये काम पाने के बारे में ज्यादा परेशान हूं। मैं फोर्ड स्टर्लिंग की नकल करने के बारे में भी बात करना चाहता था लेकिन उन्होंने मुझे ये कह कर दर किनार कर दिया,"चिंता मत करो, हम जल्दी ही तुम्हें काम भी देंगे।"

निट्ठले बैठे हुए नौ दिन बीत चुके थे और मेरा तनाव मेरी शिराओं पर आ रहा था। अलबत्ता, फोर्ड साहब मुझे सांत्वना देते, और काम के बाद अक्सर वे मुझे शहर तक लिफ्ट भी दे देते। हम रास्ते में एलेक्ज़ैंड्रा बार में ड्रिंक के लिए रुकते, उनके कई मित्रों से मिलते। उनमें से एक थे मिस्टर एल्मर एल्सवर्थ जिन्हें मैं शुरू शुरू में तो नापसंद करता रहा और उन्हें कुछ हद तक फूहड़ समझता रहा, लेकिन वे मुझ पर मज़ाक करते हुए फब्तियाँ कसते,"मेरा ख्याल है आप फोर्ड की जगह ले रहे हैं। ठीक है, आप हंसोड़ हैं क्या?"

"विनम्रता इस बात की इजाज़त नहीं देती," मैंने चुटकी ली। इस तरह ही घिसाई बहुत तकलीफदेह थी, खासकर फोर्ड साहब की मौजूदगी में।

लेकिन पूरी सौम्यता से उन्होंने मुझे इस हालत से यह कह कर बाहर निकाल दिया,"क्या आपने इन्हें एम्प्रेस में शराबी की भूमिका में नहीं देखा है? बहुत हंसाया इन्होंने उसमें।"

"वैसे तो इन्होंने मुझे अब तक नहीं हंसाया है।" एल्सवर्थ बोले।

वे मोटे, बेढंगे आदमी थे जो ग्लैंडर रोग से पीड़ित दिखते थे, जिसमें नीचे का जबड़ा घोड़े की तरह सूज जाता है और नाक से पानी आने लगता है। उनका चेहरा उदासी से भरा और मनहूसियत के भाव लिये होता था। उनके चेहरे पर कोई बाल नहीं थे, उदास आँखें, और लटका चेहरा, और ऐसी मुस्कुराहट जिससे लगे कि वे साहित्य, वित्त और राजनीति पर कोई तोप चीज़ हैं। देश में सबसे ज्यादा जानकार बस, वही हैं और उन्हें हास्य बोध की खूब परख है। अलबत्ता, मुझे ये सब नहीं जमा और मैं तय किया कि मैं उनसे बचने की कोशिश करूंगा। लेकिन एलेक्जेंड्रा बार में एक रात, वे बोले, "अब तक ये जहाज पानी में नहीं उतरा है?"

"अब तक तो नहीं," मैं बेचैन हंसी हंसा।

"ठीक है, आप हंसोड़ ही बने रहो।"

इन महाशय से काफी कुछ सुन चुका था मैं। अब तक तो मैंने भी तय किया कि इनकी कड़वी खुराक का एक घूंट भी आज पिला ही दिया जाये।

"अच्छी बात है, आप जितने हंसोड़ दिखते हैं, उसके आधे में से भी मेरा काम चल जायेगा।"

"हुंह, ताने मारने वाला मज़ाक? ठीक है, ठीक है, मैं इसके बाद उनके लिए एक ड्रिंक खरीद दूंगा।"

और आखिर वे पल आ ही गये। सेनेट साहब माबेल के साथ लोकेशन पर बाहर गये हुए थे और फोर्ड स्टर्लिंग कम्पनी भी वहाँ नहीं थी। और इस हिसाब से स्टूडियो में कोई भी नहीं था। कीस्टोन के सबसे वरिष्ठ निर्देशक हेनरी लेहरमैन सेनेट के बाद एक नयी फिल्म शुरू करने वाले थे और चाहते थे कि मैं उसमें अखबार के एक रिपोर्टर की भूमिका करूं। लेहरमैन बहुत ही घमंडी किस्म के आदमी थे और इस बात पर उन्हें बहुत गर्व था कि उन्होंने मशीनी तरीके की कुछ बहुत ही सफल कॉमेडी फिल्में बनायी हैं। वे कहा करते थे कि उन्हें व्यक्तित्वों की ज़रूरत नहीं होती और वे अपने लिए हंसी का सारा सामान मैकेनिकल प्रभावों से और संपादन से पैदा कर सकते हैं।

हमारे पास कोई कहानी नहीं थी। सारा किस्सा प्रिंटिंग प्रेस के आस-पास बुना जाना था जिसमें यहाँ वहाँ हंसी के कुछ पल जुटाये जाने थे। मैंने एक हल्का फ्रॉक कोट पहना, एक टॉप हैट लगाया, और नींबू अटकाने वाली मूंछें रखीं। जब हमने काम शुरू किया तो मैं देख पा रहा था कि लेहरमेन साहब के पास नये नये विचारों का अकाल था। और ये बात भी थी कि चूंकि मैं कीस्टोन में नया था तो सुझाव देने के लिए छटपटा रहा था, परेशान था कि सुझाव दूँ या नहीं। और यहीं पर आकर मेरी लेहरमैन साहब से टकराहट शुरू हुई। एक दृश्य था जिसमें मुझे अखबार के सम्पादक का साक्षात्कार लेना था और अपनी तरफ से जितना भी सोचा जा सकता था, मैंने हँसी के पल डालने की कोशिश की। और यहाँ तक किया कि बाकी कलाकारों को भी सुझाव देने की ज़हमत भी उठायी। हालांकि फिल्म तीन दिन में पूरी हो गयी थी, मुझे लगा कि हम कुछ बहुत ही हँसी-मज़ाक की चीजें डालने में सफल रहे थे। लेकिन जब मैंने तैयार फिल्म देखी तो मेरा दिल डूब गया। इसका कारण यह था कि सम्पादक महोदय ने उसमें इतनी बुरी तरह से काट-छाँट कर दी थी कि उसे पहचाना ही नहीं जा सकता था। मेरे हँसी मज़ाक वाले सभी दृश्यों के ठीक बीच में कैंची चलायी गयी थी। मेरा तो दिमाग ही खराब हो गया। और सोच-सोच कर परेशान होने लगा कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया था। लेहरमैन साहब ने कई बरस बाद इस बात को स्वयं स्वीकार किया था कि उन्होंने ये सब जानबूझ कर किया था क्योंकि, उनके विचार से मैं कुछ ज्यादा ही सयाना बन रहा था।

लेहरमैन साहब के साथ जिस दिन मैंने अपना काम खत्म किया, उसके एक दिन बाद सेनेट साहब लोकेशन से वापिस आये। फोर्ड साहब एक सेट पर थे और ऑरबक्कल दूसरे सेट पर। पूरा का पूरा सेट तीनों कम्पनियों के काम के कारण व्यस्त था और वहाँ तिल धरने की जगह नहीं थी। मैं सड़क छाप कपड़ों में था और मेरे पास कोई काम धाम नहीं था। इसलिए मैं एक ऐसी जगह पर जा कर खड़ा हो गया जहाँ से सेनेट साहब की मुझ पर निगाह पड़ सके। वे माबेल के साथ खड़े थे और एक होटल लॉबी का सेट देख रहे थे और अपने सिगार का सिरा कुतर रहे थे।

"हमें यहाँ कुछ हँसी चाहिये।" उन्होंने कहा और फिर मेरी तरफ मुड़े,"कॉमेडी वाला मेक अप कर लो। कुछ भी चलेगा।"

मुझे रत्ती भर भी ख्याल नहीं था कि किस तरह का बाना धारण किया जाये। मुझे प्रेस रिपोर्टर वाला अपना गेट अप अच्छा नहीं लगा था। अलबत्ता, ड्रेसिंग रूम की तरफ जाते समय मैंने सोचा कि मैं बैगी पैंट पहन लूँ, बड़े-बड़े जूते हों, हाथ में छड़ी हो, तंग कोट हो, हैट छोटा सा हो, और जूते बड़े। मैं अभी ये तय नहीं कर पाया था कि मुझे जवान दिखना चाहिये या बूढ़ा, लेकिन मुझे याद आया कि सेनेट साहब मुझसे उम्मीद कर रहे थे कि मैं काफी बूढ़ा लगूँ, मैंने छोटी छोटी मूंछें भी लगाने का फैसला किया जिससे, मेरे ख्याल से, बिना अपने हाव-भाव छुपाये मैं अपनी उम्र को ज्यादा दिखा सकता था।

मुझे चरित्र के बारे में कोई आइडिया नहीं था। लेकिन ज्यों ही मैं तैयार हुआ, कपड़ों से और मेक अप से मुझे पता चल गया कि इस बाने से किस किस्म का व्यक्ति बन चुका है। मैं उसे जानने लग गया और जब तक मैं स्टेज तक चल कर आता, उस व्यक्तित्व का पूरी तरह से जन्म हो चुका था। जब मैं सेनेट साहब के सामने आया तो मैंने चरित्र को ही जीना शुरू कर दिया और रौब से चलने लगा। अपनी छड़ी को हिलाते हुए और उनके आगे चहल कदमी करते हुए मेरे दिमाग से हँसी भरी स्थितियों और मज़ाकों का सोता सा फूटने लगा।

मैक सेनेट की सफलता का राज़ ये था कि उनमें गज़ब का उत्साह था। वे एक बहुत ही बेहतरीन श्रोता थे और जो बात भी उन्हें मज़ाकिया लगती, उस पर खुल कर हँसते थे। वे खड़े-खड़े तब तक खिलखिलाते रहे जब तक उनका पूरा शरीर हिलने डुलने नहीं लग गया। उन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाया और मुझे चरित्र समझाया,"तुम जानते हो कि इस आदमी के व्यक्तित्व के कई पहलु हैं। वह घुमक्कड़, मस्त मौला है, भला आदमी है, कवि है, स्वप्नजीवी है, अकेला जीव है, हमेशा रोमांस और रोमांच की उम्मीदें लगाये रहता है। वह तुम्हें इस बात की यकीन दिला देगा कि वह वैज्ञानिक है, संगीतज्ञ है, ड्यूक है, पोलो खिलाड़ी है, अलबत्ता, वह सड़क पर से सिगरेटें उठा कर पीने वाले और किसी बच्चे से उसकी टॉफी छीन लेने वाले से ज्यादा कुछ नहीं। और हाँ, यदि मौका आये तो वह किसी भली औरत को उसके पिछवाड़े लात भी जमा सकता है, लेकिन बेइंतहा गुस्से में ही।

मैं दस मिनट या उससे भी ज्यादा देर तक यही करता रहा, और सेनेट साहब लगातार हँसते रहे, खिलखिलाते रहे,"ठीक है, उन्होंने कहा,"चले जाओ सेट पर और देखो कि तुम क्या कर सकते हो।"

लेहरमैन की फिल्म की ही तरह मैं इस फिल्म के बारे में भी कुछ भी नहीं जानता था सिवाय इसके कि माबेल नोर्माड अपने पति और अपने प्रेमी के बीच फंस जाती है।

किसी भी कॉमेडी में सबसे महत्त्वपूर्ण होता है नज़रिया। लेकिन हर बार नज़रिया ढूंढना आसान भी नहीं होता। अलबत्ता, होटल लॉबी में मैंने यह महसूस किया कि मैं छलिया हूँ जो कि किसी मेहमान की तरह पोज़ कर रहा है, लेकिन वास्तविकता में मैं एक ट्रैम्प था जो थोड़ा बहुत आश्रय चाहता है। मैं प्रवेश करता हूं और एक महिला के पैर से ठोकर खा जाता हूँ, मैं मुड़ता हूँ और जैसे माफी माँगते हुए अपना हैट उठाता हूँ और फिर मुड़ता हूं और इस बार एक पीकदान से टकरा जाता हूँ। और इस बार मैं पीकदान के आगे हैट उठाकर माफी मांगता हूँ। कैमरे के पीछे वे लोग हँसने लगे।

वहाँ पर काफी भीड़ जमा हो गयी थी। वहाँ न केवल उन दूसरी कम्पनियों के कलाकार अपना अपना काम छोड़ कर वहीं जुट आये थे बल्कि स्टेज पर काम करने वाले बढ़ई और वार्डरोब में काम करने वालों ने भी अच्छी खासी भीड़ जुटा ली थी। और ये सबसे बड़ा पुरस्कार था। और जब तक हमने रिहर्सल खत्म की, हमारे आस-पास बहुत बड़ी संख्या में दर्शक खड़े हुए हँस रहे थे। जल्दी ही मैंने फोर्ड साहब को दूसरे लोगों के कंधों के पीछे से उचक कर देखते हुए देखा। और जब ये सब खत्म हुआ तो मैं जानता था, मैं किला फतह कर चुका हूँ।

दिन के अंत में जब मैं अपने ड्रेसिंग रूम में गया तो फोर्ड स्टर्लिंग और ऑरबक्कल अपने-अपने मेकअप उतार रहे थे। बहुत कम बातें हुई लेकिन पूरे माहौल में एक लहर चल रही थी। फोर्ड तथा रोस्को, दोनों ने मुझे पसंद किया। लेकिन ईमानदारी से कहूँ तो वे दोनों ही किसी भीतरी संघर्ष से जुझ रहे थे।

ये एक लम्बा दृश्य था जो पूरे पिचहत्तर फुट तक चला। बाद में लेहरमैन और सेनेट साहब में बहस होती रही कि क्या इस पूरे दृश्य को ज्यों का त्यों जाने दिया जाये क्योंकि उस समय अमूमन हँसी मज़ाक के दृश्यों की लम्बाई मुश्किल से दस फुट हुआ करती थी।

"ये अच्छा मज़ाक भरा है," मैंने कहा,"क्या लम्बाई से वाकई फर्क पड़ता है?" तब उन्होंने तय किया कि इस पूरे दृश्य को जस का तस पिचहत्तर फुट की लम्बाई तक जाने दिया जाये। चूँकि मेरे कपड़े मेरे चरित्र से मेल खा रहे थे, मैंने तभी और उसी वक्त ही तय कर लिया कि भले ही कुछ भी हो जाये, मैं अपनी इसी ढब को बनाये रखूँगा।

उस रात मैं स्ट्रीटकार में अपने घर लौटा तो मेरे साथ हमारी कम्पनी में काम करने वाला एक जूनियर कलाकार था। उसने कहा,"दोस्त, आपने कुछ नयी शुरुआत कर दी है। अब तक ऐसा कभी भी नहीं हुआ था कि सेट पर इस तरह की हँसी के मौके आये हों। फोर्ड स्टर्लिंग साहब के लिए भी नहीं। आप ज़रा उनका चेहरा तो देखते, देखने लायक था।"

"अब हम यही उम्मीद करें कि लोग बाग थियेटर में भी इसी तरह से हँसते हैं?" मैंने अपनी खुशी को दबाते हुए कहा।

कुछ ही दिन बाद, एलेक्जेड्रा बार में मैंने अपने कॉमन दोस्त एल्मर एल्सवर्थ को मेरे चरित्र के बारे में फोर्ड साहब को कानाफूसी करते सुना,"जनाब ने बैगी पैंट पहनी थी, सपाट पैर, और उनकी हालत खस्ता थी, आप देखते तो बंदा अच्छा खासा हरामी, धूल-गंदगी में सना लग रहा था। इस तरह के खीझ भरे हाव भाव दिखाता है मानो इसकी बगल में चीटियाँ काट रही हों। अच्छा खासा कार्टून लगता है।"

मेरा चरित्र थोड़ा अलग था और अमेरिकी जनता के लिए अनजाना भी। यहाँ तक कि मैं भी उससे कहाँ परिचित था। लेकिन वे कपड़े पहन लेने के बाद मैं यही महसूस करता था कि मैं एक वास्तविकता हूँ, एक जीवित व्यक्ति हूँ। दरअसल, जब मैं वे कपड़े पहन लेता और ट्रैम्प का बाना धारण कर लेता तो मुझे तरह तरह के मज़ाकिया ख्याल आने लगते जिनके बारे में मैं कभी सोच भी नहीं सकता था।

मैं उस जूनियर कलाकार के बहुत करीब आ गया था और हर रात स्ट्रीटकार में घर वापिस आते समय वह मेरी कामेडी के बारे में दिन भर स्टूड़ियों में हुई प्रतिक्रियाओं के बारे में बताता और बातें करता," वो तो कमाल का ही आइडिया था, दोस्त, तुम्हारा वे फिंगर बॉल में उंगलियां डुबोना और उस बुढ़ऊ की मूंछों से पोंछ लेना।...आज तक किसी ने इस तरह की बातों के बारे में सोचा भी नहीं होगा।" और इस तरह से वह ये सारी बातें बताता रहता और मुझे हवा भरे गुब्बारे में ऊपर चढ़ाता रहता।

सेनेट साहब के निर्देशन में मैं सहज महसूस करता था क्योंकि उनके साथ सेट पर सब कुछ सहज स्फूर्त तय होता चला जाता था। चूँकि कोई भी अपने खुद के बारे में पाज़िटिव या अंतिम रूप से पक्का नहीं होता था (यहाँ तक कि निर्देशक भी नहीं,) इसलिए मैं अपने बारे में यह मान कर चलता कि मैं दूसरों से ज्यादा जानता हूँ। मैंने सुझाव देने शुरू कर दिये जिन्हें सेनेट साहब सहर्ष स्वीकार कर लेते। इस तरह से मुझमें यह विश्वास पनपने लगा कि मैं सृजन भी कर सकता हूँ और अपनी खुद की कहानियाँ भी लिख सकता हूँ। सेनेट महोदय ने निश्चय ही इस विश्वास को प्रेरित किया। लेकिन हालांकि मैं सेनेट साहब को खुश कर चुका था, जनता के दरबार में जा कर उसे खुश करना अभी बाकी था।

अगली फिल्म में मुझे फिर से लेहरमैन के हवाले कर दिया गया। वे सेनेट साहब को छोड़ कर स्टर्लिंग के पास जा रहे थे हालांकि वे सेनेट के साथ अपने करार के खत्म होने की तारीख के बाद भी दो हफ़्ते तक रुकने के लिए तैयार हो गये थे। जब मैंने उनके साथ फिर से काम करना शुरू किया तो मैं एक से एक नायाब सुझावों से भरा हुआ था। वे मेरी बात सुनते और मुस्कुरा देते लेकिन उन्हें स्वीकार न करते। वे कहा करते,"हो सकता है इस तरह की बातें थियेटर में चल जाये लेकिन फिल्मों में हमारे पास इन सब बातें के लिए फुर्सत नहीं है। हमें हमेशा गतिशील रहना चाहता हूँ। कॉमेडी पीछा करने के लिए एक बहाना है।"

मैं उनकी इस सपाटबयानी से सहमत नहीं था,"हास्य तो हास्य है।" मैं तर्क देता,"चाहे वह फिल्मों में हो या थियेटर में।" लेकिन वे अपनी ही बातों पर अड़े रहे, वही करने पर तुले रहे जो कीस्टोन में होता आया था। सारे एक्शन तेज गति से होने चाहिये। इसका यही मतलब होता कि लगातार दौड़ते रहो, घरों की छतों पर, स्ट्रीटकारों में कूदो, दौड़ो, नदियों में छलांगें मारो, और खम्भों पर से कूदो। उनकी इस कॉमेडी की थ्योरी के बावजूद मैं किसी न किसी तरह से अकेले की कॉमेडी के लिए एकाध गुंजाइश निकाल ही लेता था, लेकिन हमेशा की तरह, वे उन्हें संपादन कक्ष में कटवा ही लेते।

मैं नहीं समझता कि लेहरमैन ने मेरे बारे में सेनेट साहब को कोई बहुत अच्छी रिपोर्ट दी होगी। लेहरमैन के बाद मुझे एक अन्य निर्देशक को सौंप दिया गया। मिस्टर निकोलस साठ के पेटे में एक अधेड़ आदमी थे जो मोशन फिल्मों की शुरुआत से ही उनसे जुड़े हुए थे। मेरे सामने उनके साथ भी वही दिक्कत थी। उनके पास कुल मिला कर एक ही हँसाने का एक ही तरीका होता था। इसमें वे कॉमेडियन को गर्दन से पकड़ते थे और एक सीन से दूसरे सीन तक उसे घूँसे ही मारते जाते थे। मैं इससे बारीक बातें उन्हें बताना चाहता था, लेकिन वे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। "हमारे पास टाइम नहीं है, टाइम नहीं है।" वे चिल्लाते। वे बस किसी तरह से फोर्ड स्टर्लिंग की नकल भर चाहते। हालांकि मैंने मामूली सा ही विरोध जतलाया था लेकिन लगता है, वे जाकर सेनेट साहब के कान भर आये कि मुझ जैसे सुअर के पिल्ले के साथ काम करना उनके बस की बात नहीं।

लगभग इसी समय वह फिल्म जो सेनेट साहब ने निर्देशित की थी, माबेल्स स्ट्रेंज प्रेडिक्टामेट, उप नगरों में दिखायी गयी। भय और घबड़ाहट के मिले जुले भाव के साथ मैंने इसे दर्शकों के बीच बैठ कर देखा। जब फोर्ड स्टर्लिंग पर्दे पर आते तो उनका स्वागत हमेशा उत्साह और हँसी के साथ होता था लेकिन मेरे हिस्से में ठंडा मौन ही आया। वह सब हँसी मज़ाक के सीन जो मैंने होटल लॉबी में किये थे, मुश्किल से एकाध मुस्कुराहट ही जुटा पाये। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ी, दर्शक पहले दबी हँसी हँसे, फिर खुल कर हँसे, और फिल्म के खत्म होते न होते, एक दो ज़ोर के ठहाके लगे। उस प्रदर्शन में मैंने पाया कि दर्शक नये आगंतुक को एकदम नकार नहीं देते हैं।

मैं दुविधा में था कि ये पहला प्रयास सेनेट साहब की उम्मीदों पर खरा उतरा या नहीं। मेरा तो यही मानना है कि वे निराश ही हुए थे। वे एकाध दिन के बाद मेरे पास आये और बोले,"सुनो, सब लोगों का कहना है कि तुम्हारे साथ काम करना मुश्किल है।" मैं उन्हें ये समझाना चाहता था कि मैं सतर्क था और सिर्फ फिल्म की बेहतरी के लिए ही काम कर रहा था। "वो तो ठीक है, सेनेट बोले, "तुम सिर्फ वही करो जो तुम्हें करने के लिए कहा जाये। उसी में हमारी तसल्ली हो जायेगी।" लेकिन अगले ही दिन निकोलस के साथ मेरी एक और झड़प हो गयी और मैं फट पड़ा,"आप मुझसे जो कुछ करवाना चाहते हें, वह तीन डॉलर रोज़ कमाने वाला कोई भी एक्स्ट्रा कर सकता है।" मैंने घोषणा कर दी,"मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ जिसमें कुछ अक्ल का काम हो, सिर्फ इधर उधर मारा-मारा गिरते पड़ते रहना और स्ट्रीटकार में से गिरना, ये सब मेरे बस का नहीं। मुझे हफ़्ते के एक सौ पचास डॉलर सिर्फ इसी के लिए नहीं मिलते।"

बेचारा "पॉप" निकोलस, जैसा कि हम उसे कहा करते थे, उसकी तो हालत खराब थी। "मैं पिछले दस बरस से इस धंधे में हूँ।" वे कहने लगे, "तुम इन सबके बारे में जानते ही क्या हो?" मैंने उसे प्यार से समझाने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मैंने कास्ट के बाकी कलाकारों को भी समझाने की कोशिश की लेकिन वे सब भी मेरे खिलाफ थे। "ओह, वह जानता है, वही जानता है, वह पिछले कई बरस से इसे लाइन में है," एक बूढ़े कलाकार ने मुझे समझाया।

मैंने कुल मिला कर पाँच फ़िल्में बनायीं और उन सबमें किसी तरह से जोड़-तोड़ करके अपना खुद का कुछ न कुछ कॉमेडी का मसाला डाल ही दिया। बेशक उसका संपादन कक्ष में बैठे कसाई जो भी करते रहे हों। अब चूँकि मैं संपादन कक्ष में उसकी संपादन कला से वाकिफ हो चुका था इसलिए मैं सीन के शुरू में और आखिर में ही अपना हास्य का मसाला डाल देता था ताकि उसे काटने में उन्हें अच्छी खासी तकलीफ हो। मैं सीखने के लिहाज से कोई भी मौका नहीं चूकता था। मैं डेवलपिंग कक्ष से और संपादन कक्ष के अंदर-बाहर होता रहा था और देखता था कि संपादन करने वाला किस तरह से कटे हुए टुकड़ों को आपस में जोड़ता है।

अब मैं इस चिंता में था कि अपनी खुद की फिल्में लिखूँ और उनका निर्देशन भी करूँ। इस लिहाज से मैंने सेनेट साहब से बात की। लेकिन वे तो इस बारे में कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थे। इसके बजाये उन्होंने मुझे माबेल नोर्माड के हवाले कर दिया। उन्होंने अभी अभी ही अपनी खुद की फिल्मों का निर्देशन शुरू किया था। इस बात ने मुझे चित्त कर दिया क्योंकि बेशक माबेल बला की खूबसूरत थीं, उनकी निर्देशन क्षमता पर मुझे शक था। इसलिए पहले ही दिन सिर मुंडाते ही ओले पड़े। होनी हो कर रही। हम लॉस एंजेल्स के एक उप नगर में लोकेशन पर थे। एक सीन में माबेल मुझसे चाहती थीं कि मैं सड़क पर एक हौज और पानी ले कर खड़ा होऊं ताकि विलेन की कार उस पर फिसल जाये। मैंने सुझाव दिया कि मैं हौज पाइप पर ही खड़ा हो जाता हूँ ताकि पानी बाहर नहीं आयेगा और जब मैं अनजाने में उसके नोज़ल को देखता हूँ और हौज पाइप के ऊपर से पैर हटाता हूँ तो पानी की बौछार अचानक मेरे चेहरे को भिगो देती है। लेकिन उसने ये कह कर मेरा मुँह बंद कर दिया,"हमारे पास वक्त नहीं है। हमारे पास वक्त नहीं है। वही करो जो आपसे करने को कहा गया है।"

ये बहुत बड़ी बात थी। मैं इसे सहन नहीं कर सकता था और वो भी ऐसी खूबसूरत लड़की से,"माफ करना, मिस नोर्माड, मैं वही नहीं करूंगा जो मुझे करने के लिए कहा गया है। मुझे नहीं लगता कि आप इतनी लियाकत रखती हैं कि मुझे बता सकें कि मुझे क्या करना चाहिये।"

ये दृश्य सड़क के बीचों-बीच फिल्माया जाना था और मैं इसे छोड़ कर चल दिया और एक पुलिया पर जा कर बैठ गया। प्यारी माबेल, उस वक्त बिचारी मात्र बीस बरस की थी, खूबसूरत और आकर्षक, हर दिल अजीज, हर कोई उसे चाहता था, अब वह कैमरे के पास हैरान परेशान बैठी हुई थी। आज तक उससे किसी ने सीधे बात तक नहीं की थी, मैं भी उसकी खूबसूरती, उसके सौन्दर्य और उसके आकर्षण का कायल था, और मेरे भी दिल के किसी कोने में उसके नाम के चिराग जलते थे, लेकिन ये तो मेरा काम था। तत्काल ही पूरा का पूरा स्टाफ माबेल के चारों तरफ झुंड बना कर खड़ा हो गया और सम्मेलन होने लगा। माबेल ने मुझे बाद में बताया था कि एक दो एक्स्ट्रा तो मुझे तभी के तभी रगेदना चाहते थे। लेकिन उसी ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया। तब उसने अपने एक सहायक को मेरे पास यह पूछने के लिए भेजा कि क्या मैं काम जारी रखने के लिए इच्छुक हूँ। मैं सड़क पार कर उस तरफ गया जहाँ वह बैठी हुई थी।,"मैं शर्मिंदा हूँ," मैंने माफी सी मांगते हुए कहा, "मुझे नहीं लगता कि ये मज़ाकिया है या नहीं लेकिन अगर आप मुझे एकाध मज़ाकिया दृश्यों के बारे में सुझाव देने की अनुमति दें तो...।"

उसने कोई बहस नहीं की। "ठीक है," उसने कहा,"अगर आप वह नहीं करते जो आपको बताया गया है तो हम स्टूडियो वापिस चले चलते हैं।" हालांकि स्थिति खराब थी, मैंने हार मान ली और मैंने कंधे उचकाये। हमने दिन के काम का ज्यादा नुकसान नहीं किया, क्योंकि हम सुबह नौ बजे से शूटिंग कर रहे थे। अब शाम के पाँच बजने को आये थे, और सूर्य डूबने की तैयारी कर रहा था।

स्टूडियो में मैं अपना ग्रीज़ पेंट उतार रहा था कि सेनेट साहब ड्रेसिंग रूम में दनदनाते हुए आये और एकदम फट पड़े,"ये सब मैं क्या सुन रहा हूँ? क्या लफड़ा है ये सब?"

मैंने समझाने की कोशिश की,"कहानी में एकाध हल्के फुल्के हास्य की ज़रूरत है।" मैंने बताया, "लेकिन मिस नोर्माड तो कुछ सुनने के लिए तैयार ही नहीं है।"

"आप सिर्फ वही कीजिये जो आपको करने के लिए कहा जाता है, नहीं तो यहाँ से दफा हो जाइये, करार होता है या नहीं, भाड़ में जाये करार।" वे बोले।

मैं बहुत ही शांत बना हुआ था,"मिस्टर सेनेट, मैंने जवाब दिया,"मैं यहाँ आने से पहले भी अपनी रोज़ी रोटी कमा रहा था, और अगर मुझे निकाल भी दिया जाता है, तो ठीक है, मैं बाहर हो जाता हूँ। लेकिन मैं विवेकशील हूँ और मैं भी आप ही की तरह फिल्म को बेहतर बनाने की ही उतना ही उत्सुक हूँ।"

बिना एक शब्द और बोले उन्होंने ज़ोर से दरवाजा बंद कर दिया।

उस रात स्ट्रीटकार में घर जाते समय मैंने अपने दोस्त को बताया कि क्या हुआ था।

"बहुत बुरा हुआ। आप तो बहुत ही अच्छा करने जा रहे थे।" उसने कहा।

"क्या ख्याल है, वे मुझे निकाल बाहर करेंगे?" मैंने खुश होते हुए कहा ताकि अपनी चिंता पर परदा डाल सकूं।

"मुझे इस बात पर कोई हैरानी नहीं होगी। जब उन्हें आपके ड्रेसिंग रूम से जाते हुए देखा तो वे अच्छे खासे उखड़े हुए नज़र आ रहे थे।"

"मेरे साथ ये भी चलेगा। मेरे खीसे में पन्द्रह सौ डॉलर हैं और ये मेरे इंगलैंड वापिस जाने के किराये के लिए काफी हैं। अलबत्ता, मैं कल तो आऊंगा ही और अगर उन्हें मेरी ज़रूरत नहीं है तो यही सही।

अगले दिन सुबह मुझे आठ बजे काम पर हाज़िर होना था, लेकिन मैं तय नहीं कर पा रहा था कि जाऊं या नहीं, इसलिए मैं ड्रेसिंग रूम में बिना कोई मेक-अप किये बैठा रहा। आठ बजने में पाँच मिनट पर सेनेट साहब ने दरवाजे पर अपना चेहरा दिखाया। "चार्ली, मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ। चलो, माबेल के ड्रेसिंग रूम में चलें।" उनकी टोन आश्चर्यजनक रूप से दोस्ताना थी।

"कहिये मिस्टर सेनेट," मैंने उनके पीछे जाते हुए कहा।

माबेल वहाँ पर नहीं थी। उस वक्त वह प्रोजेक्शन रूम में रशेस देख रही थी।

"सुनो, मैक बोले,"माबेल तुम्हारी बहुत बड़ी प्रशंसक है। और हम सब भी तुम्हें बहुत चाहते हैं। हम जानते हैं कि तुम बेहतरीन कलाकार हो।"

मैं इस अचानक हुए परिर्वतन को देख कर हैरान था और मैं तत्काल पिघलने भी लगा,"मेरे मन में भी माबेल के लिए बहुत अधिक सम्मान और प्रशंसा के भाव हैं," मैंने कहा, "लेकिन मुझे नहीं लगता कि उसमें इतनी क्षमता है कि निर्देशन कर सके। आखिर वह एकदम युवा ही तो है।"

"तुम जो भी सोचो, लेकिन भगवान के लिए अपने अहं को पी जाओ और इस पचड़े में से निकलने में हमारी मदद करो।" सेनेट साहब मेरे कंधे पर धौल धप्पा करते हुए बोले।

"..और मैं भी तो यही करने की कोशिश कर रहा हूँ।"

"तो ठीक है। उसके साथ संबंध ठीक रखने के लिए अपनी ओर से पूरी कोशिश करो।"

"सुनिये, अगर मुझे ही निर्देशन करने का भार सौंप देंगे तो आपको किसी भी किस्म की तकलीफ नहीं होगी।" मैंने कह ही दिया।

मैक एक पल के लिए ठिठके,"और अगर हम फिल्म रिलीज़ न कर पाये तो उसका हरजाना कौन भरेगा?"

"मैं उठाऊंगा खर्चा।" मैंने जवाब दिया,"मैं किसी भी बैंक में पन्द्रह सौ डॉलर जमा करवा देता हूँ। और अगर आप फिल्म रिलीज़ न कर पाये तो आप ये पैसे रख सकते हैं।"

मैक एक पल के लिए सोचने लग,"कोई कहानी है तुम्हारे पास?"

"बेशक, आप जितनी मर्जी कहानियां चाहें।"

"तो ठीक है।" मैक बोले,"माबेल के साथ ये फिल्म पूरी कर लो फिर हम देखते हैं।"

हम दोनों ने निहायत ही दोस्ताना लहजे में हाथ मिलाये। बाद में मैं मोबेल के पास गया और उससे क्षमा याचना की। और उसी शाम मैक हम दोनों को डिनर पर बाहर ले गये। अगले दिन माबेल जितनी मधुरता बिखेर रही थी, उससे ज्यादा प्रिय नहीं हो सकती थी। यहाँ तक कि उसने मेरे सुझाव भी माँगे और विचार भी पूछे। इस तरह, पूरी कैमरा टीम और बाकी की कास्ट को हैरान छोड़ते हुए हमने खुशी-खुशी फिल्म पूरी की। सेनेट साहब के नज़रिये में अचानक आये इस परिवर्तन से मैं हैरान था। अलबत्ता, ये तो महीनों के बाद मुझे जा कर इसके पीछे का एक कारण पता चला। ऐसे लगता है कि हफ़्ते के आखिर में सेनेट मुझे नौकरी से निकालना चाहते थे, लेकिन जिस सुबह माबेल के साथ मेरी झड़प हुई थी, मैक को न्यू यार्क कार्यालय से एक तार मिला था कि वे फटाफट चैप्लिन की और फिल्में बनायें क्योंकि वहाँ उनकी बहुत अधिक माँग हो गयी थी।

कीस्टोन द्वारा रिलीज की जाने वाली कॉमेडी फिल्मों के आम तौर पर बीस प्रिंट बनाये जाते थे। तीस की संख्या काफी सफल मानी जाती थी। पिछली फ़िल्म, जो क्रम से चौथी थी, पैंतालिस प्रिंट की संख्या तक जा पहुँची थी तथा अतिरिक्त प्रतियों की माँग बढ़ती ही जा रही थी। मैक साब के दोस्ताना व्यवहार के पीछे ये तार ही काम कर रहा था।

उन दिनों निर्देशन का अंक गणित बहुत ही सीधा सादा हुआ करता था। मुझे सिर्फ यही देखना होता था कि आने और बाहर जाने के लिए दिशा दायीं तरफ थी या बायीं तरफ। यदि कोई कलाकार बाहर जाते समय कैमरे की तरफ पीठ करके गया तो वापसी में उसका चेहरा कैमरे की तरफ होगा। अलबत्ता, ये बेसिक नियम थे।

लेकिन और अधिक अनुभव के साथ मैंने पाया कि कैमरे के रखने की जगह का न केवल मनोवैज्ञानिक प्रभाव होता है बल्कि इससे सीन भी बनता बिगड़ता है। दरअसल, यही सिनेमाई शैली का आधार था। यदि कैमरा बहुत नज़दीक या बहुत दूर रख दिया जाये तो इससे पूरा का पूरा दृश्य बन भी सकता है और पूरा प्रभाव बिगड़ भी सकता है। अब चूँकि गति की किफायत आपके लिए महत्त्वपर्ण होती है, अत: आप नहीं चाहते कि अभिनेता बिना किसी वजह के कई कदम चले, हाँ, जब तक इसके लिए कोई खास कारण न हो। इसका कारण यह है कि चलने में कुछ भी ड्रामाई नहीं है। इसलिए कैमरे को रखने का मतलब कम्पोजिशन होना चाहिये और ये अभिनेता के लिए गरिमामय होना चाहिये। कैमरे को कहां रखना है, ये बात सिनेमाई अर्थ संयोजन की होती है। इस बात के कोई तय नियम नहीं है कि क्लोज़ अप से अधिक अच्छे परिणाम मिलते हैं या लांग शॉट से बेहतर प्रभाव पैदा किया जा सकता है। क्लोज अप महसूस करने की चीज़ है। कुछेक मामलों में लाँग शॉट से बहुत अच्छे प्रभाव पैदा किये जा सकते हैं।

इसका एक उदाहरण मेरी शुरुआती कॉमेडी फिल्म स्केटिंग में देखा जा सकता है। ट्रैम्प रिंग में प्रवेश करता है और एक पैर ऊपर करके स्केट करता है। वह गिरता है, लड़खड़ाता है और आस-पास के सब लोगों को गिराता, लुढ़काता जाता है और तरह तरह की शरारतें करता रहता है। आखिर, वह सबको धराशायी करके दूर वाले कोने की तरफ जा कर दर्शकों के बीच यह देखने के लिए भोला बन के बैठ जाता है कि उसने क्या हंगामा बरपा दिया है। यहाँ पर ट्रैम्प की ये छोटी सी आकृति ही बहुत कुछ कह जाती है जो शायद क्लोज अप में उतनी मजेदार न बन पाती।

जब मैंने अपनी पहली फिल्म का निर्देशन किया तो मुझमें इतना आत्म विश्वास नहीं था जितना होना चाहिये था। दरअसल, मुझे अफरा-तफ़री का दौरा सा पड़ गया था। लेकिन जब सेनेट साहब ने पहले दिन का काम देख लिया तो में आश्वस्त हो गया। फिल्म का नाम था "कॉट इन द रेन"। हालांकि ये विश्व स्तरीय फिल्म नहीं थी लेकिन ये मज़ेदार थी और काफी सफल भी रही। जब मैंने इस पूरा कर लिया तो सेनेट साहब की प्रतिक्रिया जानने को उत्सुक था। प्रोजेक्शन रूम से उनके बाहर आने तक मैं उनकी राह देखता रहा।

"तो, बंधुवर, एक और फिल्म शुरू करने के लिए तैयार हो?" पूछा उन्होंने। उसके बाद से तो मैंने अपनी सभी कॉमेडी फिल्में खुद ही लिखीं और निर्देशित भी कीं। एक प्रोत्साहन के रूप में सेनेट साहब ने प्रत्येक फिल्म के लिए पच्चीस डॉलर का बोनस दिया।

अब उन्होंने मुझे मानो गोद ही ले लिया था। वे रोज़ रात को मुझे खाने पर बाहर ले जाते। वे मेरे साथ दूसरी कम्पनियों के लिए कहानियाँ पर चर्चा करते। और मैं उनके साथ ऐसे-ऐसे पागलपन से भरे ख्यालात के बारे में बात करता जो कई बार इतने निजी होते कि जनता उन्हें समझ ही न पाती। लेकिन सेनेट उन्हें सुनते और उन्हें स्वीकार कर लेते।

अब जब मैंने आम जनता के बीच बैठ कर अपनी फिल्में देखीं तो उनकी प्रतिक्रिया अलग ही थी। कीस्टोन कॉमेडी की घोषणा होते ही हलचल और उत्तेजना, मेरे पहले-पहले आगमन के साथ ही, मेरे कुछ करने से पहले ही खुशी भरी चीखें मेरे लिए बेहद सुकून भरी होतीं। मैं दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय होता जा रहा था। अगर मैं अपने जीवन को इसी तरह से चलाता रह पाता तो मेरे लिए यही संतोष की बात थी। अपने बोनस के साथ मैं दो सौ डॉलर हर हफ्ते के कमा रहा था।

अब चूँकि मैं अपने काम में उलझा हुआ था अब मेरे पास एलैक्ज़ेंड्रिया बार या अपने ताना मारने वाले दोस्त एल्मर एल्सवर्थ के पास जाने का वक्त ही नहीं मिलता था। अलबत्ता, मैं उसे हफ्तों बाद एक दिन सड़क पर ही मिल गया। वह कहने लगा,"अरे भई, सुनो तो, मैं कुछ अरसे से तुम्हारी फिल्में देखता आ रहा हूँ। और भगवान की कसम, तुम काफी अच्छे हो। तुम्हारे पास जो क्वालिटी है, वह यहाँ औरों से बिलकुल ही अलग है। तुमने पहली ही बार में अपने बारे में ये सब क्यों नही बता दिया था।" हाँ, हम बाद में जा कर बहुत अच्छे दोस्त बन गये थे।

ऐसा बहुत कुछ था जो मैंने कीस्टोन से सीखा और बदले में बहुत कुछ कीस्टोन कम्पनी को सिखाया भी। उन दिनों वे लोग तकनीक, स्टेज क्राफ़्ट या मूवमेंट के बारे में बहुत कम जानते थे। मैं उनके लिए ये चीजें थियेटर से ले कर आया। वे प्राकृतिक मूक अभिनय पेंटोमाइम के बारे में भी बहुत कम जानते थे। किसी सीन को ब्लॉक करने के लिए निर्देशक तीन या चार अभिनेताओं को कैमरे की तरफ मुँह करके सपाट खड़ा करवा देता और उनमें से एक बहुत खुले हावभाव के साथ अपनी ओर इशारा करते हुए मूक अभिनय करता, तब वह अपनी अंगूठी वाली उंगली की तरफ इशारा करता, और फिर लड़की की तरफ इशारा करता," मैं तुम्हारी लड़की से शादी करना चाहता हूँ।" उनके मूक अभिनय से बारीकी या प्रभाव डालने की जरा भी गुंजाइश न बचती। इसलिए मैं उनकी तुलना में बीस ठहरता। उन शुरुआती फ़िल्मों में मुझे पता था कि मेरे पक्ष में कई बातें हैं। और एक भूगर्भशास्त्रीर की तरह मैं एक नये, समृद्ध और अब तक अछूते क्षेत्र में प्रवेश कर रहा हूँ। मेरा ख्याल है, वह मेरे कैरियर का सबसे अधिक रोमांचक काल था, क्योंकि मैं कुछ आश्चर्यजनक करने की दहलीज पर था।

सफलता आपको प्यारा बना देती है और मैं स्टूडियो में सबका परिचित दोस्त बन गया। मैं एक्स्ट्रा लोगों के लिए, स्टेज पर काम करने वालों के लिए और वार्डरोब विभाग के लिए और कैमरामेन के लिए चार्ली था। हालांकि मैं चने के झाड़ पर चढ़ने वालों में से नहीं हूँ, फिर भी सच में ये बातें मुझे खुश करती ही थीं क्योंकि मैं जानता था कि इस अंतरंगता का मतलब ही यही है कि मैं सफल हो रहा हूँ।

अब मुझे अपने विचारों में आत्मविश्वास नज़र आने लगा था। और मैं सोच सकता हूँ कि सेनेट बेशक मेरी तरह काला अक्षर भैंस बराबर ही थे, उन्हें अपनी पसंद पर भरोसा था और यही भरोसा उन्होंने मुझमें भी पैदा किया। उनके काम करने के तरीके ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया। स्टूडियो में उनकी पहले दिन की टिप्पणी,"हमारे पास कोई सिनेरियो नहीं होता, हम एक आइडिया पकड़ लेते हैं। और फिर उसी की लीक पर स्वाभाविक परिणति पर चल देते हैं।" इससे मेरी कल्पना शक्ति को नये पंख लगे थे।

इस तरह से फिल्में बनाना बहुत उत्तेजनापूर्ण काम था। थियेटर में मैं रात दर रात वही बंधी बंधायी लीक पर वह सब कुछ जड़, बंधी-बंधायी दिनचर्या दोहराने को मजबूर था। एक बार स्टेज का कारोबार देख लिये जाने और तय कर लिये जाने के बाद उनमें कुछ नया डालने की कोई कभी सोचता भी नहीं था। थियेटर में काम करने की एक ही प्रेरित करने वाली वजह होती थी और वह यह थी कि अच्छा काम या बुरा काम। लेकिन फिल्मों में ज्यादा आज़ादी थी। उनमें मुझे रोमांच का अनुभव होता था। "इस आइडिया के बारे में तुम क्या सोचते हो?" सेनेट कहते या फिर "पता है शहर में मुख्य बाज़ार में बाढ़ आयी हुई है!" इस तरह की टिप्पणी से ही कीस्टोन की कामेडी की शुरुआत होती थी। ये एक बांध लेने वाली मोहक खुली हवा थी जो शानदार थी...व्यक्ति की सृजनात्मकता के लिए चुनौती।

ये सब इतना खुला-खुला और सहज रहा...कोई साहित्य नहीं, कोई लेखक नहीं, हम सब मिल कर एक विचार का ताना बाना बुनते, उसके आस-पास हँसी ठिठोली की बातें बांधते और जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाते, कहानी आकार लेने लगती।

उदाहरण के लिए, हिज प्रीहिस्टारिक पास्ट में मैंने हँसी की एक ही बात से शुरू किया और वह मेरी पहली एंट्री से थी। मैं खाल लपेट के एक प्रागैतिहासिक आदमी के रूप में एंट्री लेता हूँ और जैसे-जैसे मैं लैंडस्केप को देखता परखता हूँ, मैं अपना पाइप भरने के लिए ओढ़ी हुई भालू की खाल में से बाल नोचने लगता हूँ। ये आइडिया अपने आप में काफी था प्रागैतिहासिक काल की कथा बुनने में। इसमें प्यार था, दुश्मनी थी, मारा मारी थी और पीछा करो के दृश्य थे। यही तरीका था जिसे कीस्टोन में हम सब अपनाया करते थे।

मैं अपनी फिल्मों में कॉमेडी के अलावा और नये आयाम जोड़ने की अपनी ललक के शुरुआती प्रेरक पलों को याद कर सकता हूँ। मैं द' न्यू जेनिटर नाम की एक फ़िल्म में काम कर रहा था। इसमें एक दृश्य था जिसमें कार्यालय का मैनेजर मुझे नौकरी से निकाल देता है। उसके सामने गिड़गिड़ाते हुए कि वह मुझ पर रहम खाये और मुझे नौकरी में रहने दे, मैंने इस बात का मूक अभिनय शुरू कर दिया कि मेरे ढेर सारे छोटे छोटे बच्चे हैं। तभी मैंने पाया कि डोरोथी डेवेनपोर्ट नाम की एक वृद्ध नायिका एक तरफ रिहर्सल देख रही थी। अचानक उस पर मेरी निगाह पड़ी तो मैं ये देख कर हैरान रह गया कि वह रो रही थी। उसने बताया,"मुझे पता है कि आप यहाँ हँसाना चाहते हैं। लेकिन आपने तो मुझे रुला ही दिया।" उसने एक ऐसी बात की पुष्टि की जिसे मैं पहले से ही महसूस कर रहा था। मुझमें यह काबलियत थी कि मैं हँसाने के साथ-साथ रुला भी सकूँ।

अगर सौंदर्य का असर नहीं होता तो स्टूडियो का मर्दाना माहौल सहन करना मुश्किल हो जाता। सचमुच माबेल नोमार्ड की मौजूदगी स्टूडियो को गरिमा प्रदान करती थी। वह बेहद खूबसूरत थी, उसकी भरी-भरी आँखें, भरे भरे होंठ जो उसके मुँह के कानों से मुलायम तरीके से मुड़ जाते थे जो हास्य को और हर तरह की भावना, अदा को अभिव्यक्त करते थे। वह दिल की बहुत अच्छी थी, हल्के फुल्के मूड में और खुश रहती थी, उसके दिल में दया थी और वह उदारमना थी; हर कोई उसे चाहता था।

वार्डरूम की महिला के बच्चे के प्रति माबेल की उदारता के किस्से सुनने में आते थे, कैमरामैन के साथ उसके मज़ाक की बातें सुनायी देतीं। माबेल मुझसे भाई बहन के जैसा प्यार करती थी, और इसकी एक वजह यह थी कि उस समय वह मैक के प्यार में बुरी तरह से पागल थी। मैक के कारण ही मुझे माबेल को इतना अधिक जानने का मौका मिला। हम तीनों अक्सर एक साथ बाहर खाना खाते, उसके बाद मैक होटल की लॉबी में सो जाता। हम ये एकाध घंटा फिल्म देख कर कैफे में ही गुज़ार देते। तब वापिस आकर हम मैक को जगाते, कोई सोच सकता है कि इस तरह की निकटता किसी तरह के रोमांस में बदल जाती, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। दुर्भाग्य से हम दोनों अच्छे मित्र बने रहे।

हाँ, एक बार ऐसा ज़रूर हुआ कि मैं, माबेल, रोस्को ऑरबक्कल सैन फ्रांस्सिको में एक थियेटर में एक चैरिटी के लिए एक साथ मंच पर आये तो मैं और माबेल एक दूसरे के काफी निकट आ गये और भावनात्मक रूप से जुड़ गये। ये एक बहुत ही शानदार शाम थी और हम तीनों ने मंच पर बहुत ही बेहतरीन प्रदर्शन किया था, माबेल अपना कोट ड्रेसिंग रूम में ही छोड़ आयी थी। उसने मुझसे कहा कि मैं उसे वहाँ ले जाऊं ताकि वह कोट ला सके। ऑरबक्कल और बाकी लोग नीचे कार में इंतज़ार कर रहे थे। एक पल के लिए हम दोनों अकेले थे। वह उस समय अलौकिक सौन्दर्य की देवी लग रही थी और जब मैंने उसका कोट उसके कंधे पर डाला तो मैंने उसे चूम लिया। बदले में उसने भी मुझे चूमा। हम और भी आगे बढ़ गये होते, लेकिन लोग नीचे इंतज़ार कर रहे थे। बाद में मैंने मामले को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन कोई भी नतीजा सामने नहीं आया। "नहीं चार्ली," उसने बहुत अच्छे मूड में हँसते हुए कहा,"मैं तुम्हारी तरह की नहीं हूँ और न ही तुम मेरी ही तरह के हो।"

लगभग उसी समय के दौरान डायमंड जिम ब्राडी लॉस एंजेल्स आये। उस समय हॉलीवुड का जन्म अभी होना था। वे डॉली बहनों और उसके पतियों के साथ पहुँचे और दिल खोल कर खर्च किया। उन्होंने एलेक्जेंड्रिया होटल में जो डिनर दिया उसमें डॉली बहनें, उनके पति, कारलोटा मोन्टेरी, लोउ टेलेगेन, साराह बर्नहार्ट के प्रमुख नायक, मैक सेनेट, माबेल नोर्माड, ब्लांशे स्वीट, नैट गुडविन और कई दूसरे लोग शामिल हुए। डॉली बहनें गज़ब की खूबसूरत लग रही थीं। दोनों बहनें और उन दोनों के पति और उनके साथ डायमंड जिम ब्रैडी, इन सबके बीच दांत काटी रोटी वाला मामला था। हमेशा इन सबका एक साथ रहना उलझन में डालता था।

डायमंड जिम ब्रैडी एक अद्भुत अमेरिकी चरित्र थे। वे विनम्र जॉन बुल सरीखे दिखते थे। पहली रात तो मैं अपनी आंखों पर ही विश्वास नहीं कर सका क्योंकि उन्होंने हीरे के कफ लिंक और शर्ट फ्रंट पर स्टड पहने हुए थे और हरेक हीरा शिलिंग के आकार से भी बड़ा था। कुछ ही रातों के बाद हमने तट पर नाट गुडविन कैफे में एक साथ खाना खाया तो इस बार डायमंड जिम ब्रैडी अपने पन्ने के सेट के साथ नज़र आये। इस बार तो हरेक पन्ना छोटी माचिस की डिबिया से भी बड़ा था। पहले तो मैंने यही समझा कि उन्होंने ये सब मज़ाक के तौर पर पहने हुए हैं और भोलेपन में उनसे पूछ भी लिया कि क्या ये असली हैं। उन्होंने बताया,"ये असली ही हैं।"

"लेकिन हैं ये शानदार," मैंने हैरान होते हुए कहा। "अगर तुम सचमुच खूबसूरत पन्ने देखना चाहते हो तो ये देखो," और उन्हेंने अपना ड्रग्स वेस्टकोट ऊपर उठा दिया और मुझे अपनी बेल्ट दिखायी। ये क्वींसबेरी चैम्पियनशिप की बेल्ट जितनी बड़ी थी और पूरी की पूरी पन्नों से भरी हुई थी। मैंने आज तक इतने बड़े पन्ने नहीं देखे थे। वे मुझे बहुत गर्व से बता रहे थे कि उनके पास बेशकीमती हीरों वगैरह के पूरे दस सेट हैं और वे हर रात उन्हें बदल बदल कर पहनते हैं।

1914 चल रहा था और मैं पच्चीस बरस का होने को आया था। मुझमें जवानी पैठ रही थी और मैं अपने काम में मसरूफ था। मैं उससे काम की सफलता के लिए नहीं जुड़ा हुआ था बल्कि इसके मौज मजे के लिए ही नहीं बल्कि इससे मुझे हर तरह के फिल्मी अभिनेताओं से भी मिलने का मौका मिलता रहा था। कभी न कभी मैं उन सबका फैन रहा था। मैरी पिकफोर्ड, ब्लांशे स्वीट, मिरियम कूपर, क्लारा किमबैल यंग, गिश बहनें तथा दूसरे लोग, वे सब की सब खूबसूरत थीं और उनसे रू ब रू मिलना सुख देता था।

थॉमस इन्स अपने स्टूडियो में सींक कबाब की पार्टियां और नृत्य के कार्यक्रम रखते। ये स्टूडियो नार्दर्न सांता मोनिका के जंगलों में था और प्रशांत महासागर के सामने पड़ता था। क्या तो मदमस्त रात हुआ करती थी - जवानी और खूबसूरती; मुक्ताकाश मंच पर मादक संगीत पर झूम झूम कर थिरकना और पास ही समुद्र तट पर से टकराती लहरों की मंद मंद स्वर लहरियां बज रही होतीं।

पेगी पियर्स बेइंतहा खूबसूरत लड़की थी। उसका नरम जिस्म जैसे बारीकी से तराशा गया हो, खूबसूरत गोरी गर्दन, और सम्मोहक देहयष्टि। मेरे दिल में हलचल मचा देने वाली वह पहली औरत थी। कीस्टोन में मेरे आने के तीसरे हफ्ते तक उसके दर्शन नहीं हुए थे क्योंकि उन दिनों वह फ्लू से पीड़ित थी। लेकिन जिस पल हम मिले, उसी पल से एक दूजे के दिल मिल गये, चिंगारी भड़की और हम एक दूसरे के हो गये। मेरा दिल गा उठा। वे सुबहें कितनी रूमानी हुआ करती थीं। हर सुबह इस उम्मीद के साथ काम पर आना कि उस मोहतरमा के दीदार होंगे। रविवार के दिन मैं उसके माता पिता के अपार्टमेंट में उससे मिलने चला जाता। हर रात हमारा मिलन प्यार पर स्वीकृति की मुहर लगाता, हर रात संघर्ष में बीतती। हां, पेगी मुझसे प्यार करती थी, लेकिन ये एक खोये हुए प्यार का मामला था। वह बार बार अपने आपको रोकती। यहां तक कि मैंने निराश हो कर कोशिश ही छोड़ दी। उस वक्त मेरी यह हालत थी कि किसी से भी शादी करने में मेरी दिलचस्पी नहीं थी। मेरे लिए आज़ादी बहुत बड़ा रोमांच था। कोई भी औरत उस धुंधली छवि पर खरी नहीं उतरती थी जो मैंने अपने मन में बसा रखी थी।

हरेक स्टूडियो एक परिवार की तरह था। सप्ताह भर में फिल्म पूरी हो जाया करती थी और फीचर की लम्बाई वाली फिल्म को पूरा करने में दो या तीन सप्ताह से अधिक का समय नहीं लगता था। हम सूरज की रौशनी में काम करते थे इसीलिए हम कैलिफोर्निया में काम करते थे; यह कहा जाता था कि वहां पर हर बरस नौ महीने तक धूप चमकती रहती है।

क्लीग लाइटों का आविष्कार 1915 के आस पास हुआ था; लेकिन कीस्टोन कम्पनी ने उन्हें कभी भी इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि वे लहरदार होती थीं, सूर्य की रौशनी की तरह साफ नहीं होती थीं और लैम्पों को सेट करने में बहुत वक्त ज़ाया होता था। कीस्टोन की कॉमेडी को बनाने में मुश्किल से एक सप्ताह का समय लगता था। दरअसल, मैंने ट्वेंटी मिनटस् ऑफ लव नाम की एक फिल्म तो दोपहर में ही पूरी कर डाली थी और मज़े की बात यह कि इसमें शुरू से ले कर आखिर तक ठहाके ही ठहाके थे। डाव एंड डायनामिक नाम की एक बेहद सफल फिल्म को बनाने में नौ दिन लगे थे और इसकी लागत आयी थी अट्ठारह सौ डॉलर। अब चूंकि मैं एक हज़ार डॉलर के बजट को पार कर गया था, जो कि कीस्टोन कॉमेडी की अधिकतम सीमा हुआ करती थी, मुझे पच्चीस डॉलर के बोनस का नुक्सान उठाना पड़ा। सेनेट का कहना था कि फिल्में अपनी लागत निकाल सकें इसका एक ही तरीका है कि दो दो रील की फिल्में बनायी जायें और वे करते भी यही थे। इनसे पहले ही बरस में एक सौ तीस हजार डॉलर की कमाई हुई।

अब मैं इस बात का दावा कर सकता था कि मैं कई सफल फिल्में बना चुका हूं। इनमें ट्वेंटी मिनटस् ऑफ लव, डाव एंड डायनामिक, लाफिंग गैस तथा द स्टेज आदि शामिल थीं। इसी अरसे के दौरान मैं और माबेल नोर्माड मैरी ड्रेसलर नाम की एक फीचर फिल्म में एक साथ आये। मैरी के साथ काम करना सुखद अनुभव था। लेकिन मुझे नहीं लगता कि फिल्म कोई बहुत ऊंची चीज़ बन पायी थी। मैं एक बार फिर से फिल्मों का निर्देशन करने में जुट गया।

मैंने सेनेट साहब से सिडनी की सिफारिश की। अब चूंकि चैप्लिन नाम जा ही रहा था, हमारे ही परिवार के एक और सदस्य के नाम को शामिल करने में उन्हें खुशी ही होनी थी। सेनेट साहब ने उसे एक बरस के लिए दो सौ डॉलर प्रति सप्ताह के वेतन पर करार कर लिया। ये वेतन मेरे वेतन से पच्चीस डॉलर प्रति सप्ताह अधिक था। सिडनी और उसकी पत्नी ताज़े ताज़े इंगलैंड से आये हुए उस वक्त स्टूडियो पहुंचे जिस वक्त मैं लोकेशन के लिए निकलने वाला था। बाद में शाम के वक्त हमने एक साथ खाना खाया। मैंने पूछा कि इंगलैंड में मेरी फिल्मों का क्या हाल है।

उसने बताया कि मेरा नाम आने से पहले ही कई म्यूजिक हॉलों के कलाकारों ने उसे अमेरिकी सिनेमा के एक नये कामेडियन के बारे में उत्साह पूर्वक बताना शुरू कर दिया था जिसे उन्होंने अभी अभी देखा था।

सिडनी ने मुझे ये भी बताया कि उस वक्त जब उसने मेरी कोई भी कॉमेडी फिल्म देखी नहीं थी, वह फिल्म एक्सचेंज के दफ्तर में यह पूछने गया था कि ये फिल्में कब रिलीज होंगी और जब उसने बताया कि वह कौन है तो उन्होंने उसे तीनों फिल्में देखने के लिए आमंत्रित किया। उसने प्रोजेक्शन रूम में अकेले बैठ कर ये फिल्में देखीं और लगातार पागलों की तरह हंसता ही रहा।

"इन सब के बारे में तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया है?"

सिडनी ने जो कुछ कहा उसमें कुछ भी हैरान होने वाली बात नहीं थी, "ओह, मैं जानता था कि तुम बेहतरीन ही करोगे।" उसने विश्वासपूर्वक कहा।

मैक सेनेट लॉस एंजेल्स एथलेटिक क्लब के सदस्य होने के नाते इस बात के अधिकारी थे कि वे अपने किसी दोस्त को एक अस्थायी सदस्यता कार्ड दे सकें और इस तरह से उन्होंने मुझे एक कार्ड दे दिया। यह शहर में सभी छड़े लोगों और कारोबारियों का अड्डा हुआ करता था - एक बहुत बड़ा क्लब जिसमें पहली म़ंजिल पर एक बड़ा सा डाइनिंग रूम और एक लाउंज थे। ये शाम के वक्त महिलाओं के लिए भी खुल जाते थे और इनके अलावा एक कॉकटेल बार था।

मुझे सबसे ऊपरी मंज़िल पर एक कोने वाला कमरा मिला हुआ था जिसमें एक पियानो रखा हुआ था और थी छोटी सी लाइबेरी। ये कमरा मोज़ हैम्बर्गर के कमरे के बगल में था। वे मे डिपार्टमेंटल सेंटर के मालिक थे। ये स्टोर शहर का सबसे बड़ा स्टोर हुआ करता था। क्लब में रहने का खर्च उन दिनों बहुत ही मामूली हुआ करता करता था। मैं अपने कमरे के लिए प्रति सप्ताह बारह डॉलर अदा किया करता था और इसमें क्लब की सारी सुविधाएं मसलन, बड़ा सा जिम्नाशियम, तरण ताल, और बेहतरीन सेवाएं शामिल थीं। सारी बातें होने के बावजूद मैं पिचहत्तर डॉलर प्रति सप्ताह खर्च करते हुए आलीशान ढंग से रहा करता था। इन्हीं डॉलरों में से मैं ड्रिंक के एकाध राउंड और कभी कभार के डिनर के पैसे भी रखता।

क्लब के लोगों के बीच एक तरह का भाईचारा था जिसे पहले विश्व युद्ध की घोषणा भी भंग नहीं कर पायी थी। हर कोई यही सोच रहा था कि लड़ाई तो छ: महीने में निपट जायेगी या जैसा कि लॉर्ड किचनर ने अनुमान लगाया था कि ये चार बरस तक चलेगी, लोग बाग बेकार में सोचते थे। कई लोग तो इस बात से ही खुश थे कि युद्ध की घोषणा हो गयी है क्योंकि अब हम जर्मन लोगों को दिखा देंगे। नतीजे निकलने का कोई सवाल ही नहीं था, अंग्रेज और फ्रेंच उन्हें छ: महीने में ही धूल चटा देंगे। युद्ध अभी तक अपने चरम तक नहीं पहुंचा था और कैलिफोर्निया असली युद्ध की ज़मीन से खासा दूर था।

लगभग यही समय था जब सेनेट मेरा करार फिर ने नया करने की बात कर रहे थे और मेरी शर्तें जानना चाह रहे थे। मैं कुछ हद तक तो अपनी लोकप्रियता के बारे में जानता ही था, लेकिन मैं अपनी सफलता की क्षण भंगुरता के बारे में भी जानता था, और ये भी जानता था कि अगर मैं इसी गति से चलता रहा तो एक ही बरस में चुक जाऊंगा। इसलिए मुझे, जितना भी हो सके, बटोर लेना होगा। मत चूके चौहान वाली स्थिति थी।

"मैं एक हज़ार डॉलर प्रति सप्ताह चाहता हूं," मैंने जान बूझ कर कहा।

सेनेट बिगड़ उठे,"लेकिन इतना तो मैं भी नहीं कमाता।"

"मैं जानता हूं।" मैंने जवाब दिया, "लेकिन थियेटरों के बाहर जो लाइनें लगती हैं वे आपके नाम के लिए नहीं बल्कि मेरे नाम के लिए लगती हैं।"

"हो सकता है," सेनेट बोले,"लेकिन हमारी संस्था की मदद के बिना तुम खो जाओगे।" उन्होंने चेताया, "देखा नहीं, फोर्ड स्टर्लिंग का क्या हाल हो रहा है?"

ये सच था। फोर्ड स्टर्लिंग कीस्टोन कम्पनी छोड़ देने के बाद बहुत अच्छा नहीं कर पा रहे थे। लेकिन मैंने सेनेट साहब से कहा,"मुझे कॉमेडी बनाने के लिए सिर्फ एक पार्क, एक पुलिसवाले और एक खूबसूरत लड़की की ज़रूरत होती है।" और सच तो ये था कि मैंने सिर्फ इसी तामझाम के साथ कई अत्यंत सफल फिल्में बनाकर दिखा दी थीं।

इस बीच सेनेट ने अपने भागीदारों, कैसेल एंड बाउमैन को तार दे कर मेरे करार और मेरी मांग के बारे में उनकी सलाह मांगी थी। बाद में सेनेट मेरे पास एक प्रस्ताव ले कर आये,"सुनो, अभी तुम्हारे चार महीने बाकी हैं। हम तुम्हारा करार फाड़ देंगे और अभी से पांच सौ डालर हफ्ते के देंगे। अगले बरस सात सौ डॉलर और उसके बाद एक बरस में पन्द्रह सौ डॉलर देंगे। इस तरह से तुम्हें हजार डॉलर प्रति सप्ताह मिल जाया करेंगे।"

"मैक," मैंने जवाब दिया, "अगर आप इस शर्त को ठीक उलटा कर दें तो आप पहले बरस में मुझे पन्द्रह सौ डॉलर, दूसरे बरस में सात सौ डॉलर और तीसरे बरस में पांच सौ दें तो मैं ले लूंगा।"

"लेकिन ये तो पागलपन से भरा विचार है।"

इस तरह से इसके बाद करार को नया करने की कोई बात ही नहीं हुई।

अभी कीस्टोन में मेरा एक महीना बाकी था और अब तक किसी और कम्पनी ने मेरे सामने कोई प्रस्ताव नहीं रखा था। मैं नर्वस हो रहा था और मैं कल्पना कर रहा था कि सेनेट इस बात का जानते हैं और किसी तरह अपना समय पूरा करने के चक्कर में थे। आम तौर पर फिल्म खत्म होने पर वे मेरे पास आते थे और मुझे मज़ाक में जल्दी से दूसरी फिल्म शुरू करने के बारे में उकसाते थे। और अब हालांकि मैंने पिछले दो सप्ताह से कोई काम नहीं किया था, वे मुझसे दूर दूर ही रहे थे। वे विनम्र लेकिन अलग थलग बने रहे।

इस सबके बावजूद मेरे आत्म विश्वास ने कभी भी मेरा साथ नहीं छोड़ा। अगर किसी ने भी मेरे सामने प्रस्ताव न रखा तो मैं अपने आप ही धंधा शुरू कर दूंगा। क्यों नहीं। मैं आत्म विश्वास से भरा हुआ था और अपने आप में निर्भर भी था। मैं जानता था कि ठीक किस वक्त इस भावना ने जन्म लिया था। मैं स्टूडियो की दीवार का सहारा ले कर एक मांग पर्ची भर रहा था।

सिडनी ने कीस्टोन कम्पनी में आने के बाद कई सफल फिल्में बनायीं। एक फिल्म जिसने पूरी दुनिया में रिकार्ड ही तोड़ डाले वह थी - द सबमैरीन पाइलट। इसमें सिडनी ने हर तरह की कैमरा ट्रिक का सहारा लिया। चूंकि वह इतना अधिक सफल था, मैंने उससे सम्पर्क किया और उससे मेरे साथ मिल कर अपनी खुद की कम्पनी बनाने के बारे में राय मांगी।

"हमें सिर्फ एक कैमरा और एक ट्रैक लाइट चाहिये।" मैंने उसे बताया। लेकिन सिडनी दकियानूसी था। उसे लगा, ये सब कुछ ज्यादा ही जोखिम लेने वाला मामला होगा। इसके अलावा, उसने कहा, "मैं इतनी अच्छी पगार, जितनी मैंने अपनी पूरी जिंदगी में नहीं कमायी है, कैसे छोड़ दूं।" इस तरह से वह एक और बरस के लिए कीस्टोन कम्पनी के साथ ही बना रहा।

एक दिन मुझे युनिवर्सल कम्पनी के कार्ल लईम्ले की तरफ से एक टेलिफोन संदेश मिला। वे मुझे एक फुट के बारह सेंट देने और मेरी फिल्मों के लिए वित्त जुटाने के लिए तैयार थे। लेकिन वे मुझे हफ्ते के एक हजार डॉलर का वेतन नहीं देंगे। इसे देखते हुए मामला आगे नहीं बढ़ा।

जेस्स रॉबिंस नाम के एक युवा, जो ऐसेने कम्पनी का प्रतिनिधि था, ने कहा कि उसने सुना है कि मैं कोई भी करार पर हस्ताक्षर करने से पहले दस हज़ार डालर का बोनस और साढ़े बारह सौ डॉलर प्रति सप्ताह का वेतन चाहता हूं। ये मेरे लिए खबर थी। जब तक उसने ज़िक्र नहीं किया था, मैंने दस हज़ार डालर के बोनस की कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन उस सुखद पल के बाद से ये विचार मेरे दिमाग में टंक गया।

उस रात मैंने रॉबिंस को डिनर पर आमंत्रित किया और उसे ही सारी बातें करने दीं। उसने बताया कि वह सीधे ही ऐसेने कम्पनी के जी एम एंडरसन के पास से चला आ रहा है। लोग उन्हें ब्रांको बिली के नाम से भी जानते हैं। एंडरसन मिस्टर जार्ज के स्पूअर के भागीदार हैं और उनका प्रस्ताव है कि वे बारह सौ पचास डॉलर प्रति सप्ताह देने के लिए तैयार हैं लेकिन वह बोनस के बारे में कुछ नहीं कह सकता। मैंने कंधे उचकाये,"यही अड़चन कई लोगों के साथ है।" मैंने बात आगे बढ़ायी,"उनके पास बड़े बड़े प्रस्ताव तो हैं लेकिन वे नकद नारायण की बात ही नहीं करना चाहते।" बाद में उसने सैन फ्रांसिस्को में एंडरसन को फोन किया और उसे बताया कि डील हो गयी है लेकिन मैं दस हजार नकद बोनस के रूप में तत्काल चाहता हूं। वह मेज पर चहकता हुआ वापिस आया, "डील पक्की समझें। और कल आपको दस हज़ार डॉलर नकद मिल जायेंगे।"

मैं सातवें आसमान पर था। प्रस्ताव इतना शानदार था कि सच नहीं लगता था। लेकिन ये सच था क्योंकि अगले ही दिन रॉबिन्सन ने मेरे हाथ में केवल छ: सौ डॉलर का चेक थमा दिया और बताया कि मिस्टर एंडरसन अगले दिन खुद ही लॉस एंजेल्स आ रहे हैं और बाकी सब वे खुद ही निपट लेंगे। एंडरसन उत्साह से भरे हुए आये और डील के बारे में आश्वस्त किया लेकिन दस हज़ार डॉलर का कोई जिक्र नहीं,"मेरे पार्टनर मिस्टर स्पूअर शिकागो पहुंच कर इस मामले को देख लेंगे।"

हालांकि मेरे शक ने सिर उठाना शुरू कर दिया था लेकिन मैंने आशावाद के चलते अपने शक को दफनाने का ही फैसला किया। अभी भी कीस्टोन कम्पनी के साथ मेरे दो सप्ताह बाकी थे। अपनी अंतिम फिल्म हिज़ प्रिहिस्टारिक पास्ट को पूरा कर पाना मेरे लिए खासा तनाव वाला मामला था, क्योंकि इतने अधिक कारोबारी प्रस्तावों के साथ उस पर ध्यान केन्द्रित कर पाना मेरे लिए मुश्किल था, इसके बावजूद मैंने आखिर फिल्म पूरी कर ही दी।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 11

कीनोट कम्पनी को छोड़ना मेरे लिए तकलीफदेह था क्योंकि मैं वहाँ पर सेनेट और दूसरे सभी लोगों का प्रिय व्यक्ति बन चुका था। मैंने किसी से भी विदा के दो शब्द नहीं कहे; मैं कह ही नहीं सका। ये सब शुष्क, आसान तरीके से हो गया। मैंने शनिवार की रात को अपनी फिल्म का संपादन पूरा किया और अगले सोमवार मिस्टर एंडरसन के साथ सेन फ्रांसिस्को के लिए रवाना हो गया जहाँ पर हमें उनकी हरे रंग की नयी मर्सडीज़ कार के दर्शन हुए। हम सेंट फ्रांसिस होटल में सिर्फ लंच के लिए ही रुके उसके बाद में नाइल्स चले गए। वहाँ पर एंडरसन का अपना एक छोटा सा स्टूडियो था और उसमें उन्होंने एसेने कम्पनी के लिए ब्रांको बिली वेस्टर्न्स बनायी थी (एसेने स्पूअर और एंडरसन के पहले अक्षरों को मिलाकर बनाया गया नाम था)।

नाइल्स सैन फ्रांसिस्को से बाहर की ओर एक घंटे की ड्राइव की दूरी पर था और रेल की पटरियों के पास बसा हुआ था। एक छोटा सा शहर था और वहाँ की आबादी चार सौ की थी और वहाँ का काम धंधा लसुनिया घास तथा पशुपालन था। स्टूडियो लगभग चार मील बाहर की ओर एक खेत के बीचों-बीच बना हुआ था। जब मैंने इसे देखा तो मेरा दिल डूबने लगा क्योंकि इससे कम प्रेरणादायक कुछ और हो ही नहीं सकता था। इसकी काँच की छत थी, जहाँ पर गर्मियों में काम करना बेहद मुश्किल हो जाता था। एंडरसन के कहा कि वे मेरे लिए मेरी पसंद का और कॉमेडी बनाने के लिए बेहतर तरीके से सुसज्जित स्टूडियो शिकागो के आसपास ढूंढेंगे। मैं नाइल्स में सिर्फ एक ही घंटा रहा और एंडरसन अपने स्टाफ के साथ कुछ कामकाज़ निपटाते रहे। तब हम दोनों फिर से सैन फ्रांसिस्को के लिए चल पड़े। वहाँ से हमने शिकागो के लिए यात्रा शुरू की।

मुझे एंडरसन अच्छे लगे थे। उनमें एक खास तरह का आकर्षण था। रेल यात्रा में उन्होंने मेरी एक भाई की तरह देख भाल की और अलग-अलग स्टेशनों पर कैन्डी और पत्रिकाएं ले आते। वे लगभग 40 बरस के शर्मीले और चुप्पे व्यक्ति थे और जब कारोबार की चर्चा की जाती वे बड़े इत्मीनान के साथ कह देते,"इसके बारे में चिंता मत करो। सब ठीक हो जाएगा।" वे बहुत कम बात करते थे और हमेशा ख्यालों से घिरे रहते। इसके बावजूद मैंने महसूस किया कि वे भीतर ही भीतर काइयाँ थे।

यात्रा रोचक थी। ट्रेन में तीन व्यक्ति थे जिन्हें हमने पहली बार डाइनिंग कार में देखा। उनमें से दो तो संपन्न लग रहे थे, लेकिन तीसरा बेतरतीब-सा लगने वाला साधारण सा आदमी था। उन तीनों को एक साथ खाना खाते देख हमें हैरानी हुई। हमने अंदाज़ा लगाया कि दो व्यक्ति तो इंजीनियर हो सकते हैं और तीसरा सड़क छाप आदमी छोटे-मोटे काम करने के लिए मज़दूर रहा होगा। जब हम डाइनिंग कार से चले तो उनमें से एक हमारे कूपे में आया, अपना परिचय दिया। उसने बताया कि वह सेंट लुईस का शेरिफ है और उसने ब्रांको बिली को पहचान लिया है। वे फाँसी दिए जाने के लिए एक कैदी को सैन क्विंटन जेल से वापिस सेंट लोइस लिए जा रहे हैं और चूंकि वे कैदी को अकेला नहीं छोड़ सकते हैं, क्या हम उनके कूपे में आकर ज़िला एटॉर्नी से मिलना पसंद करेंगे?

शेरिफ ने विश्वास के साथ कहा,"हमने सोचा कि आपको परिस्थितियों के बारे में जानना अच्छा लगेगा। ये जो कैदी है, इसका अच्छा-खासा आपराधिक रिकार्ड है। जब अधिकारी ने इसे सेंट लोइस में गिरफ्तार किया तो इस बंदे ने कहा कि उसे अपने कमरे में जाकर अपने ट्रंक में से कुछ कपड़े-लत्ते लाने की इजाज़त दी जाए और जिस वक्त वह अपने ट्रंक में सामान तलाश रहा था, तो अचानक ही वह अपनी बंदूक के साथ घूमा और अफसर को गोली मार दी और तब भाग कर कैलिफोर्निया चला गया। वहाँ पर उसे सेंधमारी करते हुए पकड़ा गया और तीन बरस की सज़ा दी गयी और जब वह बाहर निकला तो जिला एटॉर्नी और मैं उसका इंतज़ार कर रहे थे। यह एकदम दिन की रौशनी की तरह साफ मामला है - हम उसे फाँसी देंगे।" उसने जोश के साथ कहा।

एंंडरसन और मैं उनके कूपे में गए। शेरिफ हँसोड़ मोटा-सा आदमी था, जिसके चेहरे पर सदाबहार मुस्कुराहट और आँखों में चमक बसी हुई थी। जिला एटॉर्नी कुछ ज्यादा-ही गंभीर आदमी था।

अपने मित्र से हमारा परिचय कराने के बाद शेरिफ ने कहा,"बैठ जाइए।" तब वह कैदी की तरफ मुड़ा,"और ये हैंक है।" कहा उसने, "हम इसे सेंट लोइस वापस ले जा रहे हैं, जहाँ पर वह जरा फंस गया था।"

हैंक विद्रूपता से हँसा लेकिन कुछ कहा नहीं। वह लगभग 45-46 बरस का छ: फुटा आदमी था। उसने यह कहते हुए एंडरसन से हाथ मिलाया, "ब्रांको बिली, मैंने आपको कई बार देखा है और हे भगवान! आप कैसे उन्हें बंदूकें थमाते हैं और उन्हें धराशायी कर देते हैं, मैंने आज तक नहीं देखा।" हैंक मेरे बारे में बहुत कम जानता था। उसने बताया: वह तीन बरस तक सैन क्विंटन में रहा था, "और बाहरी दुनिया में ऐसा बहुत कुछ चलता रहता है, जिसके बारे में आपको पता ही नहीं चलता।"

हालांकि हम सब बहुत सहजता से बात कर रहे थे लेकिन एक भीतरी तनाव था, जिससे उबर पाना मुश्किल लग रहा था। मैं सकते में था कि क्या कहूँ इसलिए मैं शेरिफ के जुमले पर खींसे निपोरने लगा।

"ये एक बहुत मुश्किल दुनिया है।" ब्रांको बिली ने कहा।

"हाँ, सो तो है।" शेरिफ ने कहा,"हम इसे कम मुश्किल बनाना चाहते हैं। हैंक इस बात को जानता है।"

"बेशक!" हैंक ने उपहास करते हुए कहा।

शेरिफ ने उपदेश देना शुरू कर दिया,"यही बात मैंने हैंक से कही थी जब वह सैन क्विंटन से बाहर आया था। मैंने उससे कहा कि अगर वह हमारे साथ ज्यादा सयानापन दिखाएगा तो हम भी उसके साथ वैसे ही पेश आएँगे। हम हथकड़ियों का इस्तेमाल करना या ताम झाम फैलाना नहीं चाहते; हमने उसके पैर में सिर्फ बेड़ी डाल रखी हैं।"

"बेड़ी! वो क्या होती है?" मैंने पूछा।

"आपने कभी बेड़ी नहीं देखी है?" शेरिफ ने पूछा

"अपने पैंट ऊपर करो, हैंक।"

हैंक ने अपना पाइँचा ऊपर किया और वहाँ पर लगभग पाँच इंच लंबी और तीन इंच मोटी निकल प्लेटेड बेड़ी उसके टखने के चारों ओर जकड़ी हुई थी और उसका वज़न 40 पौंड रहा होगा। इससे बातचीत बेड़ियों की नयी नयी किस्मों की तरफ मुड़ गयी। शेरिफ ने बताया कि इस खास बेड़ी में अंदर की तरफ रबर की परत चढ़ी हुई है, जिससे कैदी को आसानी हो जाती है।

"क्या ये इसके साथ ही सोता है?" मैंने पूछा।

"ये तो भई, निर्भर करता है।" शेरिफ ने हैंक की तरफ सकुचाते हुए देखते हुए कहा।

हैंक की मुस्कुराहट उदास और रहस्यमय थी।

हम उनके साथ डिनर के समय तक बैठे रहे और जैसे-जैसे दिन ढलता गया, बातचीत उस तरीके की ओर मुड़ गयी जिसमें हैंक को फिर से गिरफ्तार किया गया था। शेरिफ ने बताया था कि जेल-सूचना के आदान-प्रदान से उन्हें फोटो और उँगलियों के निशान मिले थे और उन्हें यकीन हो गया कि हैंक ही वह आदमी है जिसकी उन्हें तलाश है। इसलिए जिस दिन हैंक को रिहा किया जाना था, वे सैन क्विंटन की जेल के दरवाज़े पर पहुँच गए थे।

"हाँ!" अपनी छोटी-छोटी आँखें टिमटिमाते हुए और शेरिफ और हैंक की तरफ देखते हुए शेरिफ बोले,"हम सड़क के दूसरी तरफ इसका इंतज़ार करने लगे। बहुत जल्द ही जेल के गेट के एक तरफ वाले दरवाज़े से हैंक बाहर आया।" शेरिफ अपनी अनामिका उँगली अपनी नाक के पास ले गए और धीरे से व्यंगपूर्ण हँसी के साथ हैंक की दिशा में इशारा करते हुए बोले,"मेरा ख्याल है, यही वह व्यक्ति है, जिसकी हमें तलाश है।"

एंडरसन और मैं मंत्रमुग्ध उसे सुनते रहे,"इसलिए हमने उसके साथ सौदा किया" शेरिफ ने कहा,"अगर वह हमारे साथ चालबाज़ी करेगा तो हम उसे सीधा कर देंगे।" हम इसे नाश्ते के लिए ले गए और उसे गरमा गरम केक और अंडे खिलाए और देखिए इसे फर्स्ट क्लास में यात्रा कर रहा है। हथकड़ी और बेड़ी में मुश्किल से ले जाए जाने से तो यह बेहतर ही है।"

हैंक मुस्कुराया और भुनभुनाया,"अगर मैं चाहता तो मैं आपके साथ प्रत्यार्पण के मामले पर लड़ सकता था।"

शेरिफ ने उसे ठंडेपन से देखा,"उससे तुम्हारा कोई खास भला न हुआ होता, हैंक।" उन्होंने धीरे से कहा,"इससे बस मामूली सी देर ही होती। क्या आराम से फर्स्ट क्लास में जाना बेहतर नहीं हैं?

"मेरा ख्याल है, बेहतर ही है।" हैंक ने कंधे उचकाए।

जैसे जैसे हम हैंक की मंज़िल के नज़दीक आ रहे थे, उसने लगभग प्यार भरे स्वर में सेंट लोईस में जेल के बारे में बातें करनी शुरू कर दीं। उसने दूसरे कैदियों द्वारा अपना मुकदमा लड़े जाने की प्रत्याशा से ही खुशी हो रही थी,"मैं तो बस सोच रहा हूँ कि जब मैं कंगारू कोर्ट के सामने पहुंचूंगा तो वे गोरिल्ला मेरे साथ क्या करेंगे। जरा सोचो तो। वे मेरा तंबाखू और मेरी सिगरेटें मुझसे ले लेंगे।"

शेरिफ और एटॉर्नी का हैंक के साथ संबंध ठीक वैसा ही था जैसा उस सांड के साथ मैटाडोर का दुलार होता है, जिसे वो मारने वाला है। जब वे ट्रेन से उतरे तो ये दिसंबर का आखिरी दिन था और जब हम अलग हुए तो शेरिफ और एटॉर्नी ने हमें नववर्ष की शुभकामनाएँ दीं। हैंक ने भी उदासी से यह कहते हुए हाथ मिलाए कि सारी अच्छी चीज़ों का अंत होता ही है। यह तय कर पाना मुश्किल था कि उसे विदा कैसे दी जाए। उसका अपराध क्रूरतापूर्ण और कायरपने का था। इसके बावजूद मैंने पाया कि मैं उसे शुभकामना के दो शब्द कह रहा हूँ जिस वक्त वह अपनी भारी बेड़ी के साथ ट्रेन से लंगड़ाता हुआ उतर रहा था। बाद में हमें पता चला था कि उसे फाँसी दे दी गयी थी।

जब हम शिकागो पहुँचे तो हमारा स्वागत मिस्टर स्पूअर के बजाय स्टूडियो मैनेजर ने किया। उसने बताया कि मिस्टर स्पूअर कारोबार के सिलसिले में बाहर गए हुए हैं और नए वर्ष की छुट्टियों तक वापस नहीं आएंगे। मुझे नहीं लगा कि मिस्टर स्पूअर की गैर हाज़िरी से इस वज़ह से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है कि नए वर्ष की शुरुआत से पहले स्टूडियो में कुछ भी नहीं होने वाला। इस बीच मैंने नव वर्ष की पूर्व संध्या एंडरसन, उनकी पत्नी और परिवार के साथ बितायी। नव वर्ष के दिन एंडरसन यह आश्वासन देते हुए कैलिफोर्निया के लिए रवाना हो गए कि जैसे ही स्पूअर लौटेंगे वे सारे चीजों, जिनमें दस हजार डॉलर का बोनस शामिल है, को देख लेंगे। स्टूडियो औद्योगिक जिले में था और ज़रूर कभी गोदाम रहा होगा। सुबह के वक्त मैं वहाँ पहुँचा, न तो स्पूअर आए थे और न ही मेरे कारोबार की व्यवस्थाओं के बारे में कोई हिदायतें छोड़ गए थे। तुरंत ही लगा कि ज़रूर कुछ न कुछ गड़बड़ है और ऑफिस वाले जितना बताने को तैयार थे, उससे ज्यादा जानते थे। लेकिन उससे मैं परेशानी में नहीं पड़ा; मुझे यकीन था कि एक अच्छी फिल्म मेरी सारी समस्याओं को हल कर देगी, इसलिए मैंने प्रबंधक से पूछा कि क्या वह जानता है कि मुझे स्टूडियो स्टाफ के पूरा सहयोग मिलना है और उनकी सारी सुविधाओं को इस्तेमाल करने की पूरी छूट है।

"बेशक!" उसने ज़वाब दिया,"मिस्टर एंडरसन इस बारे में हिदायतें दे गए हैं।"

"तब तो मैं तुरंत काम करना चाहूँगा।" मैंने कहा।

"बेहतर है।" उसने जवाब दिया,"पहली मंजिल पर आपको सिनेरियो विभाग की मिस लॉयला पार्सन्स मिलेंगी, वे आपको पटकथा देंगी।"

"मैं दूसरे लोगों की पटकथाओं को इस्तेमाल नहीं करता। अपनी खुद की पटकथा लिखता हूँ।" मैंने पलटकर जवाब दिया।

मैं लड़ने भिड़ने के मूड में था क्योंकि वे सारी चीजों के बारे में और स्पूअर की अनुपस्थिति के बारे में बहुत हल्के तरीके से पेश आ रहे थे; स्टूडियो का स्टाफ अकड़ू था और बैंक क्लर्कों की तरह हाथ में सामान की मांग पर्ची लिये इधर उधर डोलता रहता था मानो वे गारंटी ट्रस्ट कम्पनी के सदस्य हों। उनका कारोबारी तरीके से पेश आना बहुत आकर्षक था लेकिन उनकी फिल्में नहीं। ऊपर वाली मंज़िल पर अलग अलग विभागों के बीच इस तरह के पार्टीशन डाले गये थे मानो बैंक के टेलरों के दड़बे हों। ये सब कुछ था लेकिन सृजनात्मक काम के लिए अनुकूल नहीं था। छ: बजते ही, इस बात की परवाह किये बिना कि दृश्य आधा हुआ है या नहीं, निर्देशक सब कुछ छोड़ छाड़ कर चल देता और बत्तियां बंद कर दी जातीं और सब लोग अपने अपने घर चले जाते।

अगली सुबह मैं कलाकारों का चयन करने वाले कास्टिंग के दफ्तर में गया। "मैं कुछ कलाकार चुनना चाहूंगा," मैंने शुष्कता से कहा,"इसलिए क्या आप अपनी कम्पनी के ऐसे लोगों के मेरे पास भेजने का कष्ट करेंगे जो फिलहाल काम में लगे हुए नहीं हैं?"

उन्होंने मेरे सामने ऐसे लोग हाज़िर कर दिये जो उनके ख्याल से मेरे काम के हो सकते थे। वहां पर भेंगी आंखों वाला एक आदमी था जिसका नाम बेन टर्पिन था जो रस्सी वगैरह का काम जानता था और उसके पास उन दिनों ऐसेने में कोई खास काम नहीं था। मैंने उसे हाथों-हाथ पसंद कर लिया, सो उसे चुन लिया। लेकिन कोई प्रमुख महिला पात्र नहीं थी। कई कई साक्षात्कार लेने के बाद एक आवेदक में कुछ संभावनाएं नज़र आयीं। वह एक खूबसूरत सी युवा लड़की थी जिसे कम्पनी ने हाल ही में करार पर रखा था। लेकिन, हे भगवान! मैं उसके चेहरे पर हाव भाव ला ही न सका। वह इतनी गयी गुज़री थी कि मैंने हार मान ली और उसे दफा कर दिया। कई बरसों के बाद ग्लोरिया स्वैनसन ने मुझे बताया था कि वही वह लड़की थी और कि ड्रामे में कुछ करने की महत्त्वाकांक्षा के चलते और स्वांग वाली चीजें पसंद न करने के कारण ही उस दिन उसने जान बूझ कर सहयोग नहीं दिया था।

फ्रांसिस एक्स बुशमैन, उस वक्त के ऐसेने के महान कलाकार ने उस जगह के प्रति मेरी नापसंदगी को ताड़ लिया, "आप स्टूडियो के बारे में जो कुछ भी सोचें," कहा उसने,"ये तो बस, विपरीत ध्रुवों वाला मामला है।" लेकिन ऐसा नहीं था। न तो मुझे स्टूडियो नापसंद था और न ही मुझे विपरीत ध्रुव शब्द ही पसंद आया। परिस्थितियां बद से बदतर होती चली गयीं। जब मैं अपनी फिल्म के रशेज़ देखना चाहता तो वे पॉजिटिव प्रिंट का खर्चा बचाने के लिए मूल नेगेटिव फिल्म ही चला देते। इस बात ने मुझे डरा दिया। और जब मैंने इस बात की मांग की कि वे एक पॉजिटिव प्रिंट बनायें तो उन्होंने इस तरह के हाव भाव दिखाये मानो मैं उन्हें दिवालिया करने आ गया हूं। वे लोग संकीर्ण और आत्म तुष्ट थे। चूंकि वे फिल्म कारोबार में सबसे पहले आये थे, और उन्हें पेटेंट अधिकारों से सुरक्षा मिली हुई थी और इस तरह से वे फिल्म निर्माण में एकाधिकार रखते थे, अच्छी फिल्म बनाना उनका अंतिम उद्देश्ये था। और हालांकि दूसरी कम्पनियां उनके पेटेंट अधिकार को चुनौती दे रही थीं और बेहतर फिल्में बना रही थीं, ऐसेने अभी भी अपने तौर तरीके बदलने को तैयार नहीं थे और हर सोमवार की सुबह ताश के पत्तों की तरह सिनेरियो का धंधा कर रहे थे।

मैंने अपनी पहली फिल्म लगभग पूरी कर ली थी। इसका नाम था हिज़ न्यू जॉब। दो हफ्ते बीत गये थे और अब तक मिस्टर स्पूअर के दर्शन नहीं हुए थे। न तो मुझे वेतन मिला था और न ही बोनस ही, इसलिए मैं तिरस्कार से भरा हुआ था।

"मिस्टर स्पूअर कहां पर हैं?" मैंने फ्रंट ऑफिस में जा कर जानना चाहा। वे परेशानी में पड़ गये और कोई संतोषजनक उत्तर न दे सके। मैंने अपनी नाराज़गी छुपाने की कोई कोशिश नहीं की और पूछा कि क्या हर बार वे अपना कारोबार इसी तरीके से करते हैं।

कई बरस बाद मैंने खुद मिस्टर स्पूअर से सुना था कि हुआ क्या था। ऐसा लगता है कि जब स्पूअर, जिन्होंने कभी मेरा नाम भी नहीं सुना था, को जब पता चला कि एंडरसन ने मुझे बारह सौ डॉलर प्रति सप्ताह और दस हज़ार डॉलर के बोनस पर एक बरस के लिए साइन कर लिया है तो उन्होंने हड़बड़ाते हुए एंडरसन को यह जानने के लिए एक तार भेजा कि कहीं वे पागल तो नहीं हो गये हैं और जब स्पूअर को पता चला कि एंडरसन ने मुझे जैस्स रॉबिन्स की सिफारिश पर सिर्फ एक जूए के तौर पर साइन किया है, उनकी चिंता दुगुनी हो गयी। उनके पास ऐसे ऐसे हँसोड़ थे जिनमें से सबसे अच्छे कलाकार सिर्फ पिचहत्तर डॉलर प्रति सप्ताह पर काम कर रहे थे और वे जो कॉमेडी बनाते थे, मुश्किल से उनका खर्चा ही निकल पाता था। इसलिए स्पूअर शिकागो से गायब ही हो गये थे।

अलबत्ता, जब वे लौटे तो अपने कई दोस्तों के साथ शिकागो के बड़े होटलों में से एक में खाना खा रहे थे तो उनकी हैरानी का ठिकाना न रहा जब दोस्तों ने उन्हें इस बात पर बधाई दी कि मैं उनकी कम्पनी में शामिल हो गया हूं। इसके अलावा चार्ली चैप्लिन के बारे में स्टूडियो कार्यालय में पहले से ज्यादा प्रचार होने लगा था। इसलिए उन्होंने सोचा कि एक आजमाइश करके देखी जाये। उन्होंने होटल के एक छोकरे को बुलवाया, उसे चौथाई डॉलर दिया और कहा कि वह पूरे होटल में घूम घूम कर चार्ली की तलाश के लिए आवाज़ लगाये। लड़का जैसे जैसे लॉबी में ये चिल्लाता घूमने लगा कि "चार्ली चैप्लिन के लिए फोन!!", लोग उसके आस पास जुटने लगे और आलम ये हो गया कि चारों तरफ उत्तेजना और हलचल मच गयी। मेरी लोकप्रियता से ये उनका पहला साबका था। दूसरी घटना फिल्म एक्सचेंज के दफ्तर में तब हुई थी जब वे वहां पर मौजूद नहीं थे; उन्होंने पाया कि मेरे फिल्म शुरू करने से पहले ही फिल्म की पैंसठ प्रतियों की अग्रिम बिक्री हो जाती थी। ऐसा आज तक नहीं हुआ था और जब तक मैं फिल्म पूरी करता, एक सौ तीस प्रिंट बिक चुके होते और अभी भी ऑर्डर आ रहे होते। उन्होंने तुरंत ही कीमत तेरह सेंट से बढ़ा कर पच्चीस सेंट प्रति फुट कर दी।

आखिरकार जब स्पूअर आये तो मैंने उनसे छूटते ही अपने वेतन और बोनस की बात की। वे तरह तरह से क्षमा मांग रहे थे और बता रहे थे कि वे अपने फ्रंट ऑफिस को मेरे सारे कारोबारी इंतज़ाम करने के लिए कह कर गये थे। उन्होंने करार नहीं देखा था लेकिन ये मान कर चल रहे थे कि उनके फ्रंट ऑफिस को इसके बारे में सब कुछ मालूम होगा।

स्पूअर ऊंचे कद के, थोड़े भारी शरीर वाले मृदु भाषी व्यक्ति थे। वे आकर्षक भी होते अगर उनके चेहरे पर मांस की पीली परत न चढ़ी होती और उनका मोटा सा ऊपरी होंठ नीचे वाले होंठ के ऊपर टिका न होता।

"मुझे अफ़सोस है कि आप इस तरह से सोचते हैं," कहा उन्होंने, "लेकिन आप को पता होना चाहिये चार्ली कि हमारी फर्म एक इज़्ज़तदार फर्म है और हम अपने करार हमेशा पूरे करते हैं।"

"ठीक है, लेकिन इस करार को आप पूरा नहीं कर रहे हैं," मैंने टोका।

"कोई बात नहीं, हम अभी सारे मामले सुलझा लेते हैं।" उन्होंने कहा।

"मुझे कोई जल्दी नहीं है।" मैंने कटाक्ष के साथ जवाब दिया।

शिकागो में मेरे संक्षिप्त प्रवास के दौरान स्पूअर ने मुझे तुष्ट करने की हर तरह से कोशिश की। लेकिन मैं कभी भी उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप खरा नहीं उतर सका। मैंने उन्हें बताया कि मैं शिकागो में काम करने में खुश नहीं हूं और कि अगर वे नतीजे चाहते हैं तो मेरे लिए कैलिफोर्निया में काम करने की व्यवस्था करा दें।

"हम ऐसा कुछ भी करेंगे जिससे आपको खुशी मिले," उन्होंने कहा,"नाइल्स जाने के बारे में क्या ख्याल है?"

मैं इस प्रस्ताव पर बहुत खुश नहीं था, लेकिन मैं स्पूअर की तुलना में एंडरसन को ज्यादा पसंद करता था, इसलिए हिज़ न्यू जॉब पूरी कर लेने के बाद मैं नाइल्स चला गया।

ब्रोंको बिली अपनी वेस्टर्न फिल्में वहीं पर बनाया करते थे। ये एक-एक रील की फिल्में हुआ करती थीं जिन्हें बनाने में उन्हें एक ही दिन लगता था। उनके पास सात ही कहानियों के प्लॉट थे जिन्हें वे घुमा-फिरा कर बार-बार दोहराते रहते थे और इन्हीं से उन्होंने कई लाख डॉलर कमाये थे। वे कभी कभार काम करते थे। कभी-कभी वे एक-एक रील की सात फिल्में एक ही हफ्ते में बना कर धर देते। और फिर छ: सप्ताह के लिए छुट्टी मनाने चले जाते।

नाइल्स में स्टूडियो के आस-पास कैलिफोर्निया शैली के कई छोटे-छोटे बंगले थे जो ब्रोंको बिली ने अपनी कम्पनी के स्टाफ के लिए बनवाये थे। एक बड़ा-सा बंगला था जो उनके खुद के लिए था। उन्होंने बताया कि अगर मैं चाहूं तो उनके बंगले में उनके साथ ही रह सकता हूं। मैं इस प्रस्ताव से खुश हुआ। ब्रोंको बिली, करोड़पति काउबॉय, जिन्होंने शिकागो में अपनी पत्नी के आलीशान अपार्टमेंट में मेरी आवभगत की थी, के साथ रहने से कम से कम नाइल्स में ज़िंदगी सहने योग्य तो रहेगी।

जिस समय हम बंगले पर पहुंचे, उस वक्त अंधेरा था। जब हमने स्विच ऑन किये तो मुझे झटका लगा। जगह एक दम खाली और मनहूसियत भरी थी। उनके कमरे में लोहे की एक चारपाई रखी थी और उसके ऊपर एक बल्ब लटक रहा था। कमरे में फर्नीचर के नाम पर एक खस्ताहाल मेज़ और एक कुर्सी भी थे। पलंग के पास लकड़ी की एक पेटी रखी थी जिस पर पीतल की एक ऐश ट्रे रखी थी जो सिगरेट के टोटों से पूरी तरह से भरी हुई थी। मुझे जो कमरा दिया गया था, वो भी कमोबेश ऐसा ही था। उसमें बस, राशन रखने की पेटी नहीं थी। कोई भी चीज़ काम करने की हालत में नहीं थी। गुसलखाने के तो और भी बुरे हाल थे। नहाने के नलके से एक मग पानी भर कर लैट्रिन में ले जाना पड़ता था तभी फ्लश किया जा सकता था और लैट्रिन को इस्तेमाल किया जा सकता था। ये घर था जी एम एंडरसन, करोड़पति काउबॉय का।

मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि एंडरसन सनकी थे। करोड़पति होने के बावजूद वे गरिमामय जीवन के प्रति ज़रा भी परवाह नहीं करते थे। उनके शौक थे, भड़कीले रंगों वाली कारें, नूरा कुश्तियों के पहलवानों को पालना, एक थियेटर रखना और संगीतमय प्रस्तुतियां करना। जब वे नाइल्स में काम न कर रहे होते, वे अपना अधिकतर समय सैन फ्रैंसिस्को में बिताते, जहां पर वे छोटे, कम कीमत वाले होटलों में ठहरते। वे अजीब ही किस्म के शख्स थे, अस्पष्ट, मौजी और बेचैन, जो आनंद भरी अकेली ज़िंदगी की चाह रखते थे। और हालांकि शिकागो में उनकी बहुत ही खूबसूरत पत्नी और बेटी थी, वे शायद ही उनसे मिलते। वे अलग और अपने तरीके से अपनी ज़िंदगी जी रही थीं।

एक बार फिर से एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो में धक्के खाना कोफ्त में डालता था। मुझे काम करने वाली एक और यूनिट का इंतज़ाम करने की ज़रूरत पड़ी। इसका मतलब, एक और संतोषजनक कैमरामैन, सहायक निर्देशक और कलाकारों की टोली चुननी पड़ी। कलाकारों की टोली चुनना थोड़ा मुश्किल काम था क्योंकि नाइल्स में इतने लोग ही नहीं थे जिनमें से चुनने की बात आती। एंडरसन की कॉउबॉय कम्पनी के अलावा नाइल्स में एक और कम्पनी थी। ये एक नामालूम सी कॉमेडी कम्पनी थी जिनका काम-काज चलता रहता और जब जी एम एंडरसन की कम्पनी काम न कर रही होती तो खर्चे निकाल लिया करती थी। कलाकारों की टोली में बारह लोग थे। और इनमें से ज्यादातर कॉउबॉय अभिनेता थे। एक बार फिर मेरे सामने मुख्य भूमिका के लिए कोई खूबसूरत-सी लड़की तलाश करने की समस्या आ खड़ी हुई। अब मैं इस बात को ले कर परेशान था कि कैसे भी करके काम शुरू किया जाये। हालांकि मेरे पास कहानी नहीं थी, मैंने आदेश दिया कि तड़क भड़क वाले एक कैफे का सेट बनाया जाये। जब मुझे हँसी-ठिठोली के लिए कुछ भी न सूझता तो कैफे के विचार से मुझे कुछ न कुछ ज़रूर सूझ जाता। जिस समय सेट बनाया जा रहा था, मैं जी एम एंडरसन के साथ सैन फ्रांसिस्को के लिए रवाना हो गया ताकि वहां पर उनकी संगीतमय कॉमेडी में समूहगान गाने वाली लड़कियों में से अपने लिए प्रमुख अभिनेत्री चुन सकूं। हालांकि वे अच्छी लड़कियां थीं फिर भी उनमें से किसी का भी चेहरा फोटोजेनिक नहीं था। एंडरसन के साथ काम करने वाले कार्ल स्ट्रॉस, खूबसूरत युवा जर्मन-अमेरिकी काउबॉय ने बताया कि वह एक ऐसी लड़की को जानता है जो कभी-कभी हिल स्ट्रीट पर टाटे के कैफे में जाती है। वह उसे व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता था लेकिन वह खूबसूरत है और हो सकता है कि होटल का मालिक उसका पता जानता हो।

मिस्टर टाटे उसे बहुत अच्छी तरह से जानते थे। वह लवलॉक, नेवादा की रहने वाली थी और उसका नाम एडना पुर्विएंस था। तुरंत ही हमने उससे सम्पर्क किया और उससे सेंट फ्रांसिस होटल में मुलाकात के लिए समय तय किया। वह खूबसूरत से कुछ ज्यादा ही थी। कमनीय थी वह। साक्षात्कार के समय वह उदास और गम्भीर जान पड़ी। मुझे बाद में पता चला कि वह अपने हाल ही के एक प्रेम प्रसंग से उबर रही थी। उसने कॉलेज तक की पढ़ाई की थी और उसने बिजिनेस कोर्स किया था। वह शांत और अलग थलग रहने वाली लड़की थी। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें, सुंदर दंत-पंक्ति और संवेदनशील मुंह था। मुझे इस बात पर शक था कि वह इतनी गम्भीर दिखती है कि वह अभिनय भी कर पायेगी या नहीं और उसमें हास्य बोध है या नहीं। इसके बावज़ूद, इन सारी बातों को दर किनार करते हुए हमने उसे रख लिया। वह मेरी कॉमेडी फिल्मों में कम से कम सौन्दर्य तो बिखेरेगी।

अगले दिन हम नाइल्स लौट आये लेकिन अब तक कैफे बन कर तैयार नहीं हुआ था। जो ढांचा उन्होंने खड़ा किया था, वह वाहियात और बकवास था। स्टूडियो में पक्के तौर पर तकनीकी ज्ञान की कमी थी। कुछेक बदलावों के लिए कहने के बाद मैं किसी आइडिया की तलाश में बैठ गया। मैंने एक शीर्षक सोचा, हिज़ नाइट आउट। खुशी की तलाश में एक शराबी। शुरुआत करने के लिए इतना काफी था। मैंने यह महसूस करते हुए नाइट क्लब में एक झरना लगवा दिया कि इसी से शायद कुछ हंसी-मज़ाक की चीजें निकल आयें। मेरे पास ठलुए की भूमिका के लिए बेन टर्पिन था। जिस दिन हमने फिल्म शुरू करनी थी, उससे एक दिन पहले एंडरसन की कम्पनी के एक सदस्य ने मुझे रात के खाने पर आमंत्रित किया। ये सीधी-सादी पार्टी थी। वहां पर एडना पुर्विएंस को मिला कर हम बीस के करीब लोग थे। खाने के बाद कुछ लोग ताश खेलने बैठ गये जबकि दूसरे लोग आस पास बैठ कर बातें करने लगे। हमारे बीच सम्मोहन शक्ति, हिप्नोटिज्म़ की बात चल पड़ी। मैंने शेखी बघारी कि मैं सम्मोहन शक्तियां जानता हूं। मैंने दावे के साथ कहा कि मैं साठ सेकेंड के भीतर कमरे में किसी को भी हिप्नोटाइज कर सकता हूं। मैं इतने आत्म विश्वास के साथ बात कर रहा था कि सबको मुझ पर यकीन हो गया। लेकिन एडना ने विश्वास नहीं किया।

वह हँसी,"क्या बकवास है? मुझे कोई हिप्नोटाइज कर ही नहीं सकता।"

"तुम," मैंने कहा,"एकदम सही व्यक्ति हो। मैं तुमसे दस डॉलर की शर्त बद कर कहता हूं कि मैं तुम्हें साठ सेकेंड के भीतर सुला दूंगा।"

"ठीक है," एडना ने कहा, "तो लग गयी शर्त"

"अब एक बात सुन लो। अगर बाद में तुम्हारी तबीयत खराब हो गयी तो इसके लिए मुझे दोष मत देना। हां, मैं जो कुछ करूंगा, बहुत ज्यादा गम्भीर नहीं होगा।"

मैंने इस बात की भरपूर कोशिश की कि वह पीछे हट जाये लेकिन वह अपनी बात पर डटी रही। एक महिला ने उसके आगे हाथ-पैर जोड़े कि वह ये सब न करने दे,"तुम तो एक दम मूरखा हो," कहा उसने।

"शर्त अभी भी अपनी जगह पर है।" एडना ने शांति से कहा।

"ठीक है," मैंने जवाब दिया,"मैं चाहता हूं कि तुम सबसे अलग, अपनी पीठ दीवार से अच्छी तरह से सटा कर खड़ी हो जाओ ताकि मुझे तुम्हारा पूरा का पूरा ध्यान मिले।"

उसने नकली हँसी हँसते हुए मेरी बात मान ली। अब तक कमरे में मौजूद सभी लोग इसमें दिलचस्पी लेने लगे थे।

"कोई घड़ी पर निगाह रखे।" मैंने कहा।

"याद रखना," एडना ने कहा, "आप मुझे साठ सेकेंड के भीतर सुला देने वाले हैं।"

"साठ सेकेंड के भीतर तुम एक दम बेहोश हो जाओगी।" मैंने जवाब दिया।

"शुरू," टाइम कीपर ने कहा

तुरंत ही मैंने दो-तीन ड्रामाई हरकतें कीं, उसकी आंखों में घूर-घूर कर देखा, तब मैं उसके चेहरे के निकट गया और उसके कानों में फुसफुसाया ताकि दूसरे लोग न सुन सकें,"झूठ मूठ का नाटक करो।" और मैंने हवा में हाथ लहराये, "तुम बेहोश हो जाओगी, बेहोश, बेहोश!!"

तब मैं अपनी जगह पर वापिस आया और वह लड़खड़ाने लगी। तुरंत ही मैंने उसे अपनी बाहों में थाम लिया। दर्शकों में से दो चिल्लाये।

"जल्दी करो," मैंने कहा, "इसे दीवान पर लिटाने में कोई मेरी मदद करे।"

जब उसे होश आया तो उसने हैरानी से चारों तरफ देखा और कहा कि वह थकान महसूस कर रही है।

हालांकि वह अपना तर्क जीत सकती थी और सभी उपस्थित लोगों के सामने अपनी बात सिद्ध कर सकती थी फिर भी उसने खुशी-खुशी अपनी जीत को हार में बदल जाने दिया। उसकी इस बात से मैं उसका मुरीद हो गया और मुझे तसल्ली हो गयी कि उसमें हास्य बोध है।

मैंने नाइल्स में चार कॉमेडी फिल्में बनायीं लेकिन चूंकि स्टूडियो सुविधाएं संतोषजनक नहीं थीं, मैं अपने आपको जमा हुआ या संतुष्ट अनुभव नहीं करता था। इसलिए मैंने एंडरसन को सुझाव दिया कि मैं लॉस एंजेल्स चला जाता हूं। वहां पर उनके पास कॉमेडी फिल्में बनाने के लिए बेहतर सुविधाएं थीं। वे सहमत हो गये लेकिन ये सहमति एक दूसरे ही कारण से थी। मैं स्टूडियो पर एकाधिकार जमाये बैठा था जो कि तीन कम्पनियों के लायक बड़ा या पर्याप्त रूप से स्टाफ युक्त नहीं था। इसलिए उन्होंने बॉयल हाइट्स पर एक छोटा-सा स्टूडियो किराये पर लेने के लिए बातचीत की। ये स्टूडियो लॉस एंजेल्स के बीचों-बीच था।

जिस वक्त हम वहां पर थे, दो युवा लड़के, जो अभी कारोबार में बस, शुरुआत कर ही रहे थे, आये और स्टूडियो की जगह किराये पर ले ली। उनके नाम थे हाल रोच और हारोल्ड लॉयड।

मेरी हर नयी फिल्म के साथ जैसे-जैसे मेरी कॉमेडी फिल्मों की कीमत बढ़ती गयी, ऐसेने ने अप्रत्याशित शर्तें लगानी शुरू कर दीं और वितरकों से मेरी दो रील की कॉमेडी के लिए हर दिन के लिए कम से कम पचास डॉलर का किराया वसूल करना शुरू कर दिया। इस तरह से वे मेरी प्रत्येक फिल्म से अग्रिम रूप से पचास हज़ार डॉलर जमा कर रहे थे।

उन दिनों मैं स्टॉल होटल पर मैं ठहरा हुआ था। ये एक ठीक-ठाक किराये वाला नया लेकिन आराम दायक होटल था। एक शाम मेरे काम से लौटने के बाद, लॉस एंजेल्स एक्जामिनर से मेरे लिए एक ज़रूरी टेलिफोन कॉल आया। उन्हें न्यू यार्क से एक तार मिला था जिसे उन्होंने पढ़ कर सुनाया: न्यू यार्क हिप्पोड्रोम में हर शाम पन्द्रह मिनट के लिए दो सप्ताह तक आ कर प्रदर्शन करने के लिए चार्ली चैप्लिन को 25000 डॉलर देंगे। इससे उनके काम में बाधा नहीं पड़ेगी।

मैंने तत्काल सैन फ्रांसिस्को में जी एम एंडरसन को फोन लगाया। देर हो चुकी थी और मैं अगली सुबह तीन बजे तक उनसे बात नहीं कर पाया। फोन पर ही मैंने उन्हें तार के बारे में बताया और पूछा कि क्या वे दो हफ्ते के लिए मुझे जाने देंगे ताकि मैं 25000 डॉलर कमा सकूं। मैंने सुझाव दिया कि मैं न्यू यार्क जाते समय ट्रेन में ही कॉमेडी बनाना शुरू कर सकता हूं और वहां रहते हुए उसे पूरा भी कर लूंगा। लेकिन एंडरसन नहीं चाहते थे कि मैं ये काम करूं।

मेरे बेडरूम की खिड़की होटल के भीतरी हॉल की तरफ खुलती थी इसलिए वहां पर कोई भी बात कर रहा होता तो उसकी आवाज़ सभी कमरों में गूंजती थी। टेलिफोन कनेक्शन अच्छी तरह से काम नहीं कर रहा था। मैं दो हफ्ते के लिए अपने हाथ से पच्चीस हज़ार डॉलर नहीं जाने दे सकता। ये बात मुझे कई बार चिल्ला कर कहनी पड़ी।

ऊपर के किसी कमरे की खिड़की खुली और एक आवाज़ पलट कर ज़ोर से चिल्लायी, "दफा करो इस हरामजादे को और सो जाओ, बदतमीज कहीं के!!"

एंडरसन ने फोन पर बताया कि अगर मैं ऐसेने को दो रील की एक और कॉमेडी बना कर दे दूं तो वे मुझे पच्चीस हज़ार डॉलर दे देंगे। उन्होंने वादा किया कि अगले ही दिन वे लॉस एंजेल्स आ रहे हैं और करार कर लेंगे। जब मैंने टेलिफोन पर बात पूरी कर ली तो बत्ती बंद करके सोने जा ही रहा था कि मुझे वह आवाज़ याद आयी, मैं बिस्तर से उठा, खिड़की खोली और ज़ोर से चिल्लाया, "भाड़ में जाओ!"

अगले दिन एंडरसन पच्चीस हज़ार डॉलर के साथ लॉस एंजेल्स आये। न्यू यार्क की मूल कम्पनी जिसने यह प्रस्ताव रखा था, दो हफ्ते बाद ही दिवालिया हो गयी। ऐसी थी मेरी किस्मत।

अब लॉस एंजेल्स वापिस लौट कर मैं पहले से ज्यादा खुश था। हालांकि बॉयल हाइट्स पर बने हुए स्टूडियो के आस-पास छोपड़-पट्टियां थीं, वहां रहने से मुझे एक फायदा से हुआ कि मैं अपने भाई सिडनी के आस-पास ही रह सका। मैं उससे अक्सर शाम को मिल लेता। वह अभी भी कीस्टोन में ही काम कर रहा था और ऐसेने के साथ मेरा करार खत्म होने से एक महीना पहले उसका करार पूरा हो जाता। मेरी सफलता का ये आलम था कि सिडनी ये सोच रहा था कि वह अब अपना पूरा वक्त मेरे कारोबारी कामों में ही लगाये। रिपोर्टों के अनुसार, मेरी लोकप्रियता आने वाली प्रत्येक कॉमेडी फिल्म के साथ बढ़ती ही जा रही थी। हालांकि लॉस एंजेल्स में सिनेमा हॉलों के बाहर लगने वाली लम्बी-लम्बी कतारों को देख कर मैं अपनी सफलता की सीमा की बारे में जानता था, मैं इस बात को महसूस नहीं कर पाया कि बाकी जगह मेरी सफलता कितनी बढ़ी है। न्यू यार्क में मेरे चरित्र, कैलेक्टर के खिलौने और मूर्तियां सभी डिपार्टमेंट स्टोरों और ड्रगस्टोरों में बिक रहे थे। जिगफेल्ड लड़कियां चार्ली चैप्लिन गीत गा रही थीं और अपने खूबसूरत चेहरों पर चार्लीनुमा मूछें लगा कर, डर्बी हैट लगा कर, बड़े जूते और बैगी पैंट पहन कर अपनी खूबसूरती का नाश मार रही थीं। वे दोज़ चार्ली चैप्लिन फीट गीत गा रही थीं।

हमारे पास हर तरह के कारोबारी प्रस्तावों का तांता लगा रहता। इनमें किताबों, कपड़ों, मोमबत्तियों, खिलौनों, सिगरेट और टूथपेस्ट जैसी चीजों के प्रस्ताव होते। इसके अलावा प्रशंसकों की डाक के लगने वाले अम्बार एक और ही परेशानी खड़ी कर रहे थे। सिडनी की ज़िद थी कि भले ही एक और सचिव रखने का खर्चा उठाना पड़े, सभी खतों का जवाब दिया जाना चाहिये।

सिडनी ने एंडरसन साहब से इस बारे में बात की कि मेरी फिल्मों को रूटीन फिल्मों से अलग से बेचा जाये। ये ठीक नहीं लगता था कि सारा का सारा पैसा वितरकों की ही जेब में जाये। हालांकि ऐसेने वाले मेरी फिल्मों की सैकड़ों प्रतियां बना कर बेच रहे थे, ये फिल्में वितरण के पुराने ढर्रे पर ही बेची जा रही थीं। सिडनी ने सुझाव दिया कि बैठने की क्षमता के अनुसार बड़े थियेटरों के लिए दाम बढ़ाये जाने चाहिये। इस योजना को लागू किया जाता तो हरेक फिल्म से आने वाली रकम एक लाख डॉलर या उससे भी ज्यादा बढ़ सकती थी। एंडरसन साहब को ये योजना असंभव लगी। उन्हें ये योजना पूरे मोशन पिक्चर्स ट्रस्ट की नीतियों के खिलाफ मोर्चा बांधने जैसी लगी। इस ट्रस्ट में सोलह हज़ार थियेटर थे। फिल्में खरीदने के उनके नियम और तरीके बदले नहीं जा सकते थे। कुछ ही वितरक ऐसी शर्तों पर फिल्में खरीद पाते।

बाद में पता चला कि ऐसेने ने बिक्री का अपना पुराना तरीका छोड़ दिया है और जैसा कि सिडनी से सुझाव दिया था, अब वे थियेटर की बैठने की क्षमता के अनुसार अपनी दरें बढ़ा रहे थे। इससे, जैसा कि सिडनी ने कहा था, मेरी प्रत्येक कॉमेडी फिल्म के लिए आने वाली रकम एक लाख डॉलर हो गयी। इस खबर से मेरे कान खड़े हो गये। मुझे हफ्ते के सिर्फ बारह सौ पचास डॉलर ही मिल रहे थे और मैं लिखने, अभिनय करने और निर्देशन करने का सारा काम कर रहा था। मैंने शिकायत करना शुरू कर दिया कि मैं बहुत ज्यादा काम कर रहा हूं और मुझे फिल्म बनाने के लिए थोड़े और समय की ज़रूरत है। मेरे पास एक बरस का करार था और मैं हर दो या तीन हफ्ते में कॉमेडी फिल्म बना कर दे रहा था। जल्द ही शिकागो में स्पूअर साहब हरकत में आये। वे लॉस एंजेल्स के लिए ट्रेन में सवार हुए और एक अतिरिक्त चुग्गे के रूप में यह करार किया कि अब मुझे हर फिल्म के लिए दस हज़ार डॉलर का बोनस मिला करेगा। इससे मेरी सेहत को कुछ खुराक मिली।

लगभग इसी समय डी डब्ल्यू ग्रिफिथ ने अपनी एपिक फिल्म द बर्थ ऑफ ए नेशन बनायी जिसने उन्हें चलचित्र सिनेमा के उत्कृष्ट निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया। इसमें कोई शक नहीं था कि वे मूक सिनेमा के बेताज बादशाह थे। हालांकि उनके काम में अतिनाटकीयता होती थी और कई बार सीमाओं से बाहर और असंगत भी, लेकिन ग्रिफिथ की फिल्मों में मौलिकता की छाप होती थी जिसकी वज़ह से हर आदमी को उनकी फिल्म देखनी होती।

डे मिले ने अपने कैरियर की शुरुआत द व्हिस्पिरिंग कोरस और कारमैन के एक संस्करण से की थी लेकिन अपने मेल एंड फिमेल के बाद उनका काम कभी भी चोली के पीछे क्या है, से आगे नहीं जा सका। इसके बावज़ूद मैं उनकी कारमैन से इतना ज्यादा प्रभावित था कि मैंने इस पर दो रील की एक प्रहसन फिल्म बनायी थी। ये ऐसेने के साथ मेरी आखिरी फिल्म थी। जब मैंने ऐसेने को छोड़ दिया था तो उन्होंने सारी कतरनों को जोड़-जाड़ कर उसे चार रील की फिल्म बना दिया था। इससे मैं बुरी तरह से आहत हो गया और दो दिन तक बिस्तर पर पड़ा रहा। हालांकि उनकी ये करतूत बेईमानी भरी थी, फिर भी मेरा ये भला कर गयी कि उसके बाद मैंने अपने सभी करारों में ये शर्त डलवानी शुरू कर दी कि मेरे पूरे किये गये काम में किसी भी किस्म की कोई काट-छांट, उसे बढ़ाना या उसमें छेड़-छाड़ करना नहीं चलेगा।

मेरे करार के खत्म होने का समय निकट आ रहा था, तभी स्पूअर साहब कोस्ट पर मेरे पास एक प्रस्ताव ले कर आये। उनका कहना था कि इस प्रस्ताव का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। अगर मैं उन्हें दो-दो रील की बारह फिल्में बना कर दूं तो वे मुझे साढ़े तीन लाख डॉलर देंगे। फिल्म निर्माण का खर्च वे उठायेंगे। मैंने उन्हें बताया कि किसी भी करार पर हस्ताक्षर करने से पहले मैं चाहूंगा कि डेढ़ लाख डॉलर का बोनस पहले रख दिया जाये। इस बात ने स्पूअर साहब के साथ किसी भी किस्म की बातचीत पर विराम लगा दिया।

भविष्य! भविष्य!! शानदार भविष्य!! कहां ले जा रहा था भविष्य!!! संभावनाएं पागल कर देने वाली थीं। किसी हिम स्खलन की तरह पैसा और सफलता हर दिन और तेज गति से बरस रहे थे। ये सब पागल कर देने वाला, डराने वाला था लेकिन था हैरान कर देने वाला।

जिस वक्त सिडनी न्यू यार्क में अलग-अलग प्रस्तावों की समीक्षा कर रहा था, मैं कारमैन फिल्म का निर्माण पूरा करने में लगा हुआ था और सांता मोनिका में समुद्र की तरफ खुलने वाले एक घर में रह रहा था। किसी-किसी शाम मैं सांता मोनिका तटबंध दूसरे सिरे पर बने नाट गुडविन के कैफे में खाना खा लिया करता था। नाट गुडविन को अमेरिक मंच का महानतम अभिनेता और हल्की फुल्की कॉमेडी करने वाला कलाकार समझा जाता था। शेक्सपियर काल के अभिनेता और आधुनिक हल्के-फुल्के कॉमेडी कलाकार, दोनों ही रूपों में उनका बहुत ही शानदार कैरियर रहा था। वे सर हेनरी इर्विंग के खास दोस्त थे और उन्होंने आठ शादियां की थीं। उनकी प्रत्येक पत्नी अपने सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध होती। उनकी पांचवीं पत्नी मैक्सिन इलियट थी जिसे वे तरंग में आ कर "रोमन सिनेटर" कह कर पुकारते थे। "लेकिन वह वाकई खूबसूरत और बेहद बुद्धिमति थी," वे बताया करते। वे बहुत सहज सुसंस्कृत व्यक्ति थे और अपने वक्त से कई बरस आगे थे। उनमें गहरा हास्य बोध था और अब उन्होंने सब-कुछ छोड़-छाड़ दिया था। हालांकि मैंने उन्हें मंच पर कभी अभिनय करते हुए नहीं देखा था, मैं उनका और उनकी प्रतिष्ठा का बहुत सम्मान करता था।

हम बहुत अच्छे दोस्त बन गये और पतझड़ के दिनों की ठिठुरती शामें एक साथ सुनसान समंदर के किनारे चहलकदमी करते हुए गुज़ारते। निचाट उदासी भरा माहौल सघन हो कर मेरी भीतरी उत्तेजना को आलोकित कर देता। जब उन्हें पता चला कि मैं अपनी फिल्म पूरी करके न्यू यार्क जा रहा हूं तो उन्होंने मुझे बहुत ही शानदार सलाह दी। "तुमने आशातीत सफलता पायी है। और अगर तुम जानते हो कि किस तरह से अपने आप से निपटना है तो तुम्हारे सामने एक बहुत ही शानदार ज़िंदगी तुम्हारी राह देख रही है। जब तुम न्यू यार्क पहुंचो तो ब्रॉडवे से परे ही रहना। जनता की निगाहों से दूर-दूर बने रहो। कई सफल अभिनेता यही करते हैं कि वह देखा जाना और तारीफ किया जाना चाहते हैं। इससे उनके भ्रम ही टूटते हैं।" उनकी आवाज़ गहरी और गूंज लिये हुए थी, "तुम्हें हर कहीं बुलाया जायेगा," उन्होंने कहना जारी रखा,"लेकिन सभी न्यौते स्वीकार मत करो। सिर्फ एक या दोस्त चुनों और बाकी के बारे में कल्पना करके ही संतुष्ट हो जाओ। कई महान अभिनेताओं ने हर तरह के सामाजिक निमंत्रण स्वीकार करने की गलती की है। जॉन ड्रियू ने भी यही गलती की थी। वे सामाजिक दायरों में बहुत लोकप्रिय थे और उनके घरों में चले जाया करते थे लेकिन लोग थे कि उनके थियेटरों में नहीं जाते थे। जॉन ड्रियू उन्हें उनके ड्राइंगरूम में ही मिल जाते थे। तुमने दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर रखा है और तुम ऐसा करना जारी रख सकते हो अगर तुम इससे बाहर खड़े रहो।" उन्होंने विचारों में खोये हुए कहा।

ये बहुत ही शानदार बातें होतीं। कभी कभी उदास कर देने वाली। हम उजाड़ समुद्र तट पर पतझड़ के दिनों में गोधूलि की वेला में चलते बातें करते रहते। नाट अपने कैरियर की अंतिम पायदान पर थे और मैं अपना कैरियर शुरू कर रहा था।

जब मैंने कारमैन का संपादन पूरा कर लिया तो मैंने फटाफट अपना थोड़ा बहुत सामान समेटा और अपने ड्रेसिंग रूम से सीधे ही स्टेशन की तरफ लपका ताकि न्यू यार्क के लिए छ: बजे की ट्रेन पकड़ सकूं। मैंने सिडनी को एक तार भेज दिया कि मैं कब चलूंगा और कब पहुंचूंगा।

ये धीमी गति वाली गाड़ी थी और न्यू यार्क पहुंचने में पांच दिन लगाती थी। मैं एक खुले कम्पार्टमेंट में अकेला बैठा हुआ था। उन दिनों मेरे कॉमेडी मेक अप के बिना मुझे पहचाना नहीं जा सकता था। हम अमारिलो, टैक्सास, होते हुए दक्षिणी रूट से जा रहे थे। गाड़ी वहां शाम को सात बजे पहुंचती थी। मैंने दाढ़ी बनाने का फैसला किया लेकिन मुझसे पहले ही वाशरूम में दूसरे मुसाफिर चले गये थे, इसलिए मैं इंतज़ार कर रहा था। नतीजा ये हुआ कि गाड़ी जब अमारिलो पहुंचने को थी, मैं अभी भी अपना अंडरवियर ही पहने था। जैसे-जैसे गाड़ी ने स्टेशन में प्रवेश किया, हमें अचानक शोर शराबे भरी उत्तेजना ने घेर लिया। वाशरूम की खिड़की से झांकते हुए मैंने देखा कि स्टेशन पर बेइंतहा भीड़ जुटी हुई है। चारों तरफ, एक खंबे से दूसरे खम्बे तक झंडियां और पताकाएं लहरा रही थीं। प्लेटफार्म पर कई लम्बी मेजें लगी हुई थीं जिन पर नाश्ता सजा हुआ था। मैंने सोचा, किसी स्थानीय राजा के स्वागत या विदाई के लिए ये सारा ताम-झाम हो रहा होगा। मैंने अपने चेहरे पर क्रीम लगानी शुरू की। लेकिन उत्तेजना थी कि बढ़ती ही जा रही थी। और फिर स्पष्ट आवाज़ें आनी लगीं,"कहां हैं वे?", तभी डिब्बे में भगदड़ मच गयी। गलियारे में लोग-बाग शोर मचाते हुए आगे से पीछे और पीछे से आगे भागे जा रहे थे।

"कहां है वे?, चार्ली चैप्लिन कहां हैं?"

"जी कहिये!," मैंने कहा।

"अमारिलो, टैक्सास के मेयर की ओर से तथा आपके सभी प्रशंसकों की ओर से हम आपको आमंत्रित करते हैं कि आप हमारे साथ एक कोल्ड ड्रिंक और नाश्ता लें।"

मुझे अचानक हड़बड़ाहट की भावना ने घेर लिया।

"मैं इस हालत में कैसे जा सकता हूं?" मैंने शेविंग क्रीम के पीछे से कहा।

"ओह, आप किसी भी बात की परवाह न करें। चार्ली, बस ड्रेसिंग गाउन डाल लें और जनता से मिल लें।"

जल्दी जल्दी में मैंने अपना चेहरा धोया और अध शेव की हालत में कमीज और टाई डाली और अपने कोट के बटन बंद करता हुआ ट्रेन से बाहर आया।

तालियों की गड़गड़ाहट से मेरा स्वागत किया गया। मेयर साहब ने कहने की कोशिश की: "मिस्टर चैप्लिन, अमारिलो के आपके प्रशंसकों की ओर से . . .", लेकिन लगातार तालियों और हो-हल्ले के बीच उनकी आवाज़ डूब गयी। उन्होंने एक बार फिर से बोलना शुरू किया, "मिस्टर चैप्लिन, अमारिलो के आपके प्रशंसकों की ओर से मैं ..." तब भीड़ ने आगे की तरफ धक्का लगाया और मेयर मेरे ऊपर आ गिरे, और हम दोनों ही ट्रेन से जा टकराये। और एक पल के लिए हालत ये हो गयी कि स्वागत भाषण गया तेल लेने, पहले खुद की जान बचायी जाये।

"पीछे हटो," भीड़ को पीछे धकेलते हुए और हमारे लिए रास्ता बनाते हुए पुलिस वाले चिल्लाये।

पूरे समारोह के लिए ही मेयर साहब के उत्साह पर पानी फिर चुका था और पुलिस तथा मेरे प्रति थोड़ी चिड़चिड़ाहट के साथ वे बोले, "ठीक है चार्ली, पहले हम ये सब खाना पीना ही निपटा लें, फिर आप अपनी ट्रेन में सवार हो जाना।"

मेजों पर धक्का-मुक्की के बाद चीजें थोड़ी शांत हुईं और आखिरकार मेयर साहब अपना भाषण देने में सफल हुए। उन्होंने मेज पर चम्मच ठकठकायी और बोले,"मिस्टर चैप्लिन, अमारिलो, टैक्सास के आपके मित्र उस खुशी के लिए आपके प्रति अपना आभार प्रकट करना चाहते हैं जो आपने उन्हें उनकी तरफ से सैंडविच और कोला कोला की ये दावत स्वीकार करके उन्हें दी है।"

अपना प्रशस्ति गान पूरा कर लेने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं कुछ कहना चाहूंगा। उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि मैं मेज पर ही चढ़ जाऊं। मेज पर चढ़ कर मैं इस आशय के कुछ शब्द बुदबुदाया कि मैं अमारिलो में आ कर बेहद खुश हूं और इस आश्चर्यजनक, रोमांचक स्वागत पा कर बहुत हैरान हूं और मैं इसे अपनी बाकी की ज़िदगी के लिए याद रखूंगा। वगैरह वगैरह। तब मैं बैठ गया और मेयर से बात करने की कोशिश करने लगा।

मैंने उनसे पूछा कि आखिर उन्हें मेरे आगमन का पता ही कैसे चला।

"टैलिग्राफ ऑपरेटर के जरिये," उन्होंने बताया, उन्होंने स्पष्ट किया कि मैंने जो तार सिडनी को भेजा था, वह अमारिलो से रिले हो कर गया था इसके बाद कैन्सास सिटी, शिकागो और न्यू यार्क गया था वह तार। और ऑपरेटरों ने ये खबर प्रेस को दे दी थी।

जब मैं ट्रेन में लौटा तो अपनी सीट पर जा कर विनम्रता की मूर्ति बन कर बैठ गया। एक पल के लिए मेरा दिमाग एकदम सुन्न हो गया था। तभी पूरा का पूरा डिब्बा ही लोगों की आवा-जाही से गुलज़ार हो उठा। लोग गलियारे से गुज़रते, मेरी तरफ घूर कर देखते और खींसे निपोरते। जो कुछ अमारिलो में हो गया था उसे न तो मैं मानसिक रूप से पचा ही पा रहा था और न ही ढंग से उसका आनंद ही ले पाया था। मैं बेहद उत्तेजित था। मैं तनाव में बैठा रहा। एक ही वक्त में अपने आप को ऊपर और हताश महसूस करते हुए।

ट्रेन के छूटने से पहले मुझे कई तार थमा दिये गये थे। एक में लिखा था,"स्वागत चार्ली, हम कन्सास सिटी में आपकी राह देख रहे हैं।" दूसरा था: "जब आप शिकागो पहुंचेंगे तो एक लिमोजिन आपकी सेवा में हाज़िर होगी ताकि आप एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन पर जा सकें।" तीसरे तार में लिखा था: "क्या आप रात भर के लिए ठहरेंगे और ब्लैकस्टोन होटल के मेहमान बनेंगे!!" जैसे जैसे हम कैन्सास सिटी के निकट पहुंचते गये, रेल की पटरियों के दोनों तरफ लोग खड़े थे और शोर मचाते हुए अपने हैट हिला रहे थे।

कैन्सास सिटी का बड़ा-सा रेलवे स्टेशन लोगों के हुजूम से अटा पड़ा था। बाहर जमा हो रही और भीड़ को काबू में पाने में पुलिस को मुश्किल का सामना करना पड़ रहा थ। ट्रेन के सहारे एक नसैनी लगा दी गयी थी ताकि मैं ट्रेन की छत पर चढ़ सकूं और सबको अपना चेहरा दिखा सकूं। मैंने अपने आपको वही शब्द दोहराते हुए सुना जो मैं अमारिलो में बोल कर आया था। मेरे लिए और तार इंतज़ार कर रहे थे: "क्या मैं स्कूलों और संस्थाओं में जाऊंगा!!" मैंने सारे तार अपने सूटकेस में ठूंस लिये ताकि न्यू यार्क में उनका जवाब दिया जा सके। कन्सास सिटी से ले कर शिकागो के रास्ते में भी लोग वैसे ही रेल जंक्शनों पर और खेतों में खड़े थे और जब उनके सामने से ट्रेन गुज़रती तो हाथ हिलाते। मैं बिना किसी पूर्वाग्रह के इस सबका आनंद लेना चाहता था लेकिन मैं यही सोचता रहा कि दुनिया जो है पागल हो गयी है। अगर कुछ स्वांग भरी कॉमेडी फिल्में इस तरह की उत्तेजना जगा सकती हैं तो क्या सारी ख्याति के बारे में कुछ ऐसा नहीं था जो नकली था। मैंने हमेशा सोचा था कि जनता मेरी तरफ ध्यान दे तो मुझे अच्छा लगेगा और अब जब जनता मुझे सिर आंखों पर बिठा रही थी तो मुझे अकेलेपन की हताश करने वाली भावना का साथ मुझे अलग-थलग करती जा रही थी।

शिकागो में जहां पर ट्रेन और स्टेशन बदलना ज़रूरी था, बाहर जाने के रास्ते पर भीड़ जुटी हुई थी और मुझे धकेल कर एक लिमोजिन में बिठा दिया गया। मुझे ब्लैकस्टोन स्टेशन ले जाया गया और न्यू यार्क के लिए अगली ट्रेन पकड़ने तक आराम करने के लिए एक सुइट दे दिया गया।

ब्लैकस्टोन होटल में न्यू यार्क के पुलिस प्रमुख की तरफ से एक तार आया जिसमें मुझसे अनुरोध किया गया था कि मैं उन पर ये अहसान करूं कि तय शुदा कार्यक्रम के अनुसार ग्रैंड सेन्ट्रल स्टेशन पर उतरने के बजाये 125वीं स्ट्रीट पर ही उतर जाऊं क्योंकि वहां आपके आने की उम्मीद में अभी से भीड़ जुटनी शुरू हो गयी है।

125वीं स्ट्रीट पर सिडनी एक लिमोजिन ले कर मुझे लेने आया था। वह तनाव और उत्तेजना में था। वह फुसफुसाया,"क्या ख्याल है इस सबके बारे में। स्टेशन पर सुबह से लोगों की भीड़ उमड़नी शुरू हो गयी है। और जब से तुम लॉस एंंजेल्स से चले हो, प्रेस रोज़ाना बुलेटिन जारी कर रही है।" उसने मुझे एक अखबार दिखाया जिसमें बड़े बड़े फांट में लिखा था, "वो यहां है!!"

दूसरी हैड लाइन थी: "चार्ली छुपते फिर रहे हैं।"

होटल जाते समय रास्ते में उसने बताया कि उसने म्युचूअल फिल्म कार्पोरेशन के साथ एक सौदा किया है जिसमें मुझे छ: लाख सत्तर हज़ार डॉलर मिलेंगे और ये मुझे दस हज़ार डॉलर प्रति सप्ताह के हिसाब से दिये जायेंगे और बीमे का टेस्ट पास कर लेने के बाद मुझे करार के लिए साइनिंग राशि के रूप में पन्द्रह लाख डॉलर दिये जायेंगे।

वकील के साथ उसकी एक लंच मीटिंग थी जिसमें उसे बाकी सारा दिन लग जाने वाला था। इसलिए वह मुझे प्लाज़ा में, जहां उसने मेरे लिए एक कमरा बुक करवा रखा था, छोड़ने के बाद चला जायेगा और मुझसे अगली सुबह मिलेगा।

जैसा कि हेमलेट कहता है: "अब मैं अकेला हूं!!" उस दोपहर मैं गलियों में भटकता रहा और दुकानों की खिड़कियों में देखता रहा, और बेवजह गलियों के नुक्कड़ों पर रुकता रहा। अब मेरा क्या होगा। यहां मैं था अपने कैरियर के शिखर पर। एकदम चुस्त दुरुस्त कपड़ों में, और मेरे पास कोई जगह नहीं थी जहां मैं जाता। लोगों से, रोचक लोगों से कोई कैसे मिलता है!!

मुझे ऐसा लगा कि हर कोई मुझे जानता है लेकिन मैं किसी को भी नहीं जानता था। मैं अंतर्मुखी हो गया। अपने आप पर दया आने लगी और मुझ पर उदासी तारी होने लगी।

मुझे याद है एक बार कीस्टोन के एक सफल कॉमेडियन ने कहा था,"और अब चूंकि हम पहुंच चुके हैं, चार्ली, ये सब क्या है।"

"कहां पहुंचे हैं?" मैंने पूछा था।

मुझे नाट गुडविन की सलाह याद आयी,"ब्रॉडवे से दूर ही रहना।" जहां तक मेरा सवाल है, ब्रॉडवे मेरे लिए रेगिस्तान है। मैंने उन पुराने दोस्तों के बारे में सोचा जिन्हें मैं सफलता के इस भव्य शिखर पर मिलना चाहूंगा। क्या मेरे पुराने दोस्त थे न्यू यार्क में या लंदन में या कहीं भी। मैं किसी खास दोस्त से मिलना चाहता था। शायद केली हैट्टी से। मैं जब से फिल्मों में आया था, मैंने उसके बारे में नहीं सुना था। उसकी प्रतिक्रिया मज़ेदार होती।

उस वक्त वह न्यू यार्क में अपनी बहन के पास रह रही थी। मिसेज फ्रैंक गॉल्ड। मैं फिफ्थ एवेन्यू तक चल कर गया। उसकी बहन का पता था - 834। मैं घर के बाहर एक पल के लिए ठिठका। हैरान हो कर सोचता रहा कि वह वहां होगी या नहीं लेकिन मैं दरवाजा खटखटाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। शायद वह खुद बाहर आ जाये और मैं अचानक ही उसे मिल जाऊं। मैं वहां पर लगभग आधा घंटे तक इंतज़ार करता रहा, गली के चक्कर काटता रहा लेकिन कोई बाहर नहीं आया और न ही कोई अंदर ही गया।

मैं कोलम्बस सर्कल पर चाइल्ड्स रेस्तरां में चला गया और आटे के केक और कॉफी का आर्डर दिया। मुझे लापरवाही भरे अंदाज में सर्व किया गया। तब मैंने वेटर को मक्खन के एक और के लिए आर्डर दे दिया। तभी उसने मुझे पहचान लिया। उसके बाद तो बस चेन रिएक्शन शुरू हो गया और भीतर तथा बाहर खूब भीड़ जुट आयी। भीड़ में से किसी तरह से अपने लिए रास्ता बनाना पड़ा और वहां से जाती एक टैक्सी ले कर गायब हो जाना पड़ा।

दो दिन तक मैं बिना किसी से परिचित से मिले न्यू यार्क में भटकता रहा। मैं खुशगवार उत्तेजना और हताशा के बीच डूब उतरा रहा था। इस बीच बीमा डॉक्टर ने मेरी जांच कर ली थी। कुछ दिन बाद सिडनी होटल में आया। वह खुशी से फूला नहीं समा रहा था,"सब कुछ तय हो गया है। तुमने बीमा टेस्ट पास कर लिया है।"

इसके बाद शुरू हुईं करार पर हस्ताक्षर करने की औपचारिकताएंं। डेढ़ लाख का चेक लेते हुए मेरे फोटो लिये गये। उस शाम मैं टाइम्स स्क्वायर में भीड़ के बीच खड़ा था जब टाइम्स बिल्डिंग पर इलैक्ट्रिक साइन पर खबर आ रही थी - "चैप्लिन ने म्युचूअल के साथ 670000 डॉलर सालाना पर करार किया।"

मैं खड़ा देखता रहा और इसे वस्तुपरक हो कर पढ़ता रहा मानो ये सब किसी और के लिए हो। मुझ पर इतना कुछ बीत चुका था कि मेरी संवेदनाएं चुक गयी थीं।

मेरी आत्मकथा : अध्याय 12

अकेलापन घिनौना होता है। इसमें उदासी का हल्का सा घेरा होता है, आकर्षित कर पाने या रुचि जगा पाने की अपर्याप्तता होती है इसमें। कई बार आदमी इसकी वज़ह से थोड़ा शर्मिंदा भी होता है। लेकिन कुछ हद तक अकेलापन हर आदमी के लिए थीम की तरह होता है। अलबत्ता, मेरा अकेलापन कुंठित करने वाला था क्योंकि मैं दोस्ती करने की सारी ज़रूरतें पूरी करता था। मैं युवा था, अमीर था और बड़ी हस्ती था। इसके बावज़ूद मैं न्यू यार्क में अकेला और परेशान हाल घूम रहा था। मुझे याद है मैं अंग्रेज़ी संगीत जगत की कॉमेडी स्टार, खूबसूरत जोसी कॉलिन्स से उस वक्त अचानक ही मिल गया था जब वह फिफ्थ एवेन्यू पर चली जा रही थी।

"ओह," उसने सहानुभूति पूर्ण तरीके से कहा,"आप अकेले क्या कर रहे हैं?"

मुझे ऐसा लगा मानो मुझे कुछ प्यारा सा अपराध करते हुए पकड़ लिया गया हो। मैं मुस्कुराया और बोला,"मैं तो बस, ज़रा दोस्तों के साथ लंच करने के लिए जा रहा था," लेकिन काश, मैंने उससे सच कह दिया होता कि मैं तन्हा हूं और उसे लंच पर ले जाना मुझे अच्छा लगता, सिर्फ मेरे संकोच ने ही मुझे ऐसा करने से रोका।

उसी दोपहर को मैं मैट्रोपॉलिटन ओपेरा हाउस के पास ही चहल कदमी कर रहा था कि मैं डेविड बेलास्को के दामाद मॉरिस गेस्ट से जा टकराया। मैं मॉरिस से लॉस एंजेल्स में मिल चुका था। उसने अपने कैरियर की शुरुआत टिकट ब्लैकी के रूप में की थी। ये धंधा उस वक्त बहुत फल फूल रहा था जब मैं पहली बार न्यू यार्क आया था। (टिकट ब्लैकी वह आदमी होता है जो थियेटर में सबसे अच्छी सीटें पहले खरीद कर रख लेता है और बाद में थियेटर के बाहर खड़ा हो कर फायदे में बेचता है।) मॉरिस ने थियेटर के धंधे में आशातीत सफलता हासिल की थी। इसका सर्वोच्च बिन्दु था उसके द्वारा बनायी गयी द मिरैकल जिसका निर्देशन मैक्स रेनहार्ड्ट ने किया था। मॉरिस स्लाविक था। चेहरा उसका पीला, और बड़ी बड़ी कंचे जैसी आंखें, बड़ा सा मुंह, और मोटे होंठ। वह ऑस्कर वाइल्ड का भद्दा संस्करण नज़र आता था। वह बहुत ही भावुक किस्म का आदमी था जो जब बोलता था तो ऐसा लगता था मानो आपको धमका रहा हो।

"आप कहां गायब हो गये थे श्रीमान," इससे पहले कि मैं जवाब दे पाता, वह आगे बोला, "आपने मुझे सम्पर्क क्यों नहीं किया?"

"मैंने उसे बताया कि मैं तो बस, ज़रा चहलकदमी कर रहा हूं।"

"क्या बात है। आपको अकेले नहीं होना चाहिये। आप जा कहां रहे हैं?"

"कहीं नहीं," मैंने दब्बूपन के साथ कहा,"बस, ज़रा साफ हवा ले रहा था।"

"आओ भी," उसने मुझे अपनी दिशा में मोड़ते हुए और अपनी बांह से मेरी बांह को घेरते हुए कहा। अब मेरे पास बचने का कोई उपाय नहीं था, "मैं आपको असली लोगों से मिलवाऊंगा। ऐसे लोग जिनमें आपको घुलना मिलना चाहिये।"

"हम कहां जा रहे हैं?" मैंने चिंतातुर हो कर पूछा।

"आप मेरे दोस्त करूसो से मिलने जा रहे हैं।" कहा उसने।

मेरी सारे प्रतिरोध बेकार गये।

"आज कारमैन का मैटिनी शो चल रहा है। उसमें करूसो और गेराल्डिन फरार हैं।"

"लेकिन मैं . ."

"भगवान के लिए, आप डरो नहीं, करूसो बहुत ही शानदार आदमी हैं। आपकी ही तरह सीधे सादे और इन्सानियत से भरे हुए। आपको देख कर वे खुशी के मारे झूम उठेंगे। वे आपकी तस्वीर लेंगे और भी बहुत कुछ करेंगे।"

मैंने उसे बताना चाहा कि मैं टहलना और थोड़ी देर ताज़ा हवा लेना चाहता हूं।

"इस मुलाकात से आपको ताज़ा हवा से भी ज्यादा आनंद मिलेगा।"

मैंने पाया कि मुझे मैट्रोपोलिटन ऑपेरा की लॉबी में से ठेल कर ले जाया जा रहा है। हम दोनों गलियारे में से दो खाली सीटों पर जा बैठे।

"यहां बैठिये," गेस्ट फुसफुसाया, "मैं इंटरवल में लौट आऊंगा।" तब वह खड़ा हुआ और गायब ही हो गया।

मैंने कारमैन का संगीत कई बार सुना था लेकिन अब जो कुछ बज रहा था, अपरिचित सा लगा। मैंने अपने कार्यक्रम पत्रक की तरफ देखा, और आज के दिन के लिए कारमैन की ही घोषणा की गयी थी। लेकिन वे कुछ दूसरी ही चीज़ बजा रहे थे। वह भी मुझे परिचित सी ही लग रही थी और कुछ कुछ रिगालेटो की तरह लग रही थी। मैं भ्रम में पड़ गया। अंक की समाप्ति से दो मिनट पहले गेस्ट चुपके से मेरे साथ वाली सीट पर लौट आया।

"क्या ये कारमैन है?" मैं फुसफुसाया।

"हां," उसने जवाब दिया, "क्या आपके पास कार्यक्रम नहीं है?"

उसने मुझसे कार्यक्रम छीना, "हां," वह फुसफुसाया,"करूसो और गेराल्डिन फरार, बुधवार, मैटिनी शो, कारमैन, ये रहा।"

परदा नीचे गिरा और वह मुझे लिये दिये सीटों के बीच में से बगल वाले दरवाजे से मंच के पीछे की तरफ ले चला।

बिना आवाज़ के बूटों में आदमी लोग सीन सिनरी को उसी तरह से शिफ्ट कर रहे थे जिस तरह से मुझे हमेशा लगती रही। वहां का माहौल किसी दुखदायी स्वप्न की तरह था। इसमें से नुकीली दाढ़ी वाला, और जासूसी कुत्ते जैसी आंखों वाला एक लम्बा, छरहरा शांत और गंभीर आदमी वहां खड़ा था। उसने मुझे एक ऊंचाई से देखा। वह मंच के बीचों बीच खड़ा था। परेशान हाल। उसके पास से एक सीनरी आ रही थी और दूसरी जा रही थी।

"मेरे अच्छे दोस्त सिग्नोर गाटी कसाज़ा कैसे हैं?" अपना हाथ बढ़ाते हुए गेस्ट ने कहा।

गाटी कसाज़ा ने हाथ मिलाया और एक उदास मुद्रा बनायी और कुछ बुड़बुड़ाये। तब गेस्ट मेरी तरफ मुड़ा,"आपका कहना सही था, ये कारमैन नहीं है, रिगोलेटो है। अंतिम पलों में गेराल्डिन फरार ने फोन करके बताया कि उसे जुकाम है इसलिए नहीं आ पायेगी। ये चार्ली चैप्लिन हैं," उसने कहा,"मैं इन्हें करूसो से मिलवाने के लिए ले जा रहा हूं। हो सकता है, इनका जी बहल जाये। आइये हमारे साथ।" लेकिन गाटी कसाज़ा ने अफ़सोस के साथ अपना सिर हिलाया।

"उनका ड्रेसिंग रूम किस तरफ है?"

काटी कसाज़ा ने स्टेज मैनेजर को बुलवाया और कहा,"ये आपको बता देगा।"

मेरी छठी इंद्रीय ने मुझे सचेत किया कि करूसो को इस वक्त डिस्टर्ब न किया जाये, और ये बात मैंने गेस्ट को बतायी।

"पागल मत बनो," उसने जवाब दिया।

हमने पैसेज में से उनके ड्रेसिंग रूम के लिए चले।

"किसी ने बत्ती बुझा दी है," स्टेज मैनेजर ने कहा,"एक पल के लिए रुकिये, मैं स्विच तलाशता हूं।

"सुनो," गेस्ट ने कहा,"कुछ लोग मेरा इंतज़ार कर रहे हैं, इसलिए मुझे निकलना होगा।"

"तुम मुझे छोड़ कर मत जाओ।" मैं जल्दी से बोला।

"आपको कुछ नहीं होगा।"

मैं जवाब ही दे पाता, इससे पहले ही वह गायब हो गया। स्टेज मैनेजर ने एक तीली जलाई। "हम पहुंच गये हैं," कहा उसने, और धीरे से दरवाजा ठकठकाया। भीतर से इतावली में ज़ोर से कुछ कहा गया।

मेरे दोस्त ने इतालवी में ही जवाब दिया। जवाब के आखिर में "चार्ली चैप्लिन" कहा गया।

एक और धमाका।

"सुनो," मैं फुसफुसाया, "फिर कभी सही।"

"नहीं, नहीं," उसने कहा, अब उसे एक मिशन पूरा करना था। दरवाजा चीं की आवाज के साथ खुला और अंधेरे में से ड्रेसर ने झांका। मेरे दोस्त ने परेशानी भरे स्वर में बताया कि मैं कौन हूं।

"ओह," ड्रेसर ने कहा, और दरवाजा फिर बंद कर दिया। दरवाजा फिर से खुला, "भीतर आइये।"

इस छोटी सी विजय से मेरे दोस्त का सीना चौड़ा हो गया। जब हम भीतर पहुंचे तो करूसो अपनी ड्रेसिंग टेबल पर एक शीशे के सामने बैठे अपनी मूंछे कुतर रहे थे। हमारी तरफ उनकी पीठ थी।

"अहा महाशय," मेरे दोस्त न