मोज़े (कहानी): मंगला रामचंद्रन
Moze (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran
डॉक्टर सुधीर ने देखा कि वो जो भी बोल रहे हैं उस पर महिला का ध्यान है ही नहीं। वो चुप हो गये और गौर से देखने लगे। ऐसा लगा कि हेमा अपने आस-पास के वातावरण से कुछ सचेत हुई हो, उसने डॉक्टर की तरफ देख कर कहा – ‘सॉरी डॉक्टर साहब, मेरा ध्यान भटक गया था, मैं ठीक से सुन नहीं पाई कि आपने क्या कहा!’
‘कोई बात नहीं, मैं दुबारा बोल दूँगा, पर आपको हमेशा के लिए याद रखना होगा। बर्फ के पहाड़ पर चढ़ने के लिए आपको गरम मोज़े पहनना पड़ेगा। जूते भी उसी अनुसार पहनना होगा। बिना मोज़े के मात्र जूते पहनने से जूते की फिटिंग पर भी असर पड़ेगा और आपको चढ़ने में दिक्कत होगी।’
हेमा डॉक्टर की ओर देख जरूर रही थी, पर उन्हें भी लग रहा था कि हेमा किसी बात से परेशान है। इसीलिए उन्होंने अपनी बात को विराम दिया और उसकी प्रतिक्रिया पर ध्यान देने लगे। हेमा उनके चेहरे को ताकते हुए बैठी थी, कुछ सन्नाटा-सा लगा तो बोली – ‘डॉक्टर साहब, मैंने आपकी पूरी बात ध्यान से सुनी।’
‘हूं, अच्छी बात है कि आपने मेरी बात पर इस बार कान तो दिये। आपके पैर में जो ‘शू बाईट’ और ‘फ्रॉस्ट बाईट’ हो गये हैं, उन्हें ठीक होने में तीन दिन कम से कम लगेंगे, वो भी जब आप रोजाना दवाई लगवा कर ड्रेसिंग करवायेंगी। आपके ये घाव जब तक भर नहीं जायेंगे, आपको इसी बेस पर रुकना होगा।
नर्स हेमा के पैरों को साफ कर उचित चिकित्सा कर रही थी।
हेमा अभी भी मानों किसी कल्पनालोक में विचर रही थी। एकदम खोई-खोई सी लग रही थी। पति कुंदन डाक्टर के केबिन में उनको यही बता रहे थे – ‘डॉक्टर साहब जब ट्रेकिंग का कार्यक्रम बन रहा था तब से आवश्यक वस्तुओं की लिस्ट में ऊनी मोजों का जिक्र था ही। हमने दोनों के लिए रख भी लिये थे। पर प्रारंम्भ से ही हेमा कहती रही कि भले मेरे नाम से रख लें पर मैं पहनूँगी नहीं।’
‘आपने पूछा नहीं कि क्यों नहीं पहनेंगी।’
‘पूछा भी था और यहाँ आकर पहनने का दबाव भी बनाया था। पहाड़ी चढ़ने से पहले तो बहुत से लोगों ने कहा पर वो टालती रही।’ – कहते-कहते कुंदन कुछ अनमना-सा हो गया।
डॉक्टर साहब को ये बात भले ही अजीब लगी पर उन्हें दूसरे मरीजों को भी देखना था। सो ‘प्रिसक्रिप्शन’ लिखकर, कुंदन को समझा कर, वो अपने कार्य में व्यस्त हो गये।
कुंदन की मदद से हेमा अपने ठिकाने तो आ गई, पर दोनों इतने चुप्प थे मानों कुछ अनघट घट गया हो। कुंदन ने उसे पानी और दवाई दी और किसी गंभीर सोच में पड़ा हुआ कुर्सी पर बैठा रहा। हेमा अपराधिनी की तरह कनखियों से उसे देखती और कुछ कहने का प्रयत्न करते दिखती। पर फिर होंठ सिल जाते।
‘मेरे कारण आपके कार्यक्रम में भी व्यवधान पैदा हो गया। मैं बहुत शर्मिंदा हूँ।’
आाखिर हेमा के मुँह से शब्द तो निकले। कुंदन चुपचाप उसे ताकता रहा। कुंदन के चेहरे के भाव देख कर हेमा कोई अंदाज ही नहीं लगा सकती थी कि उसके मन में क्या चल रहा होगा। कुंदन का चेहरा लगभग भावहीन था या ये कह सकते हैं कि उसे अपने मनोभावों को छुपाना अच्छे से आता था।
अपराधबोध से ग्रस्त होती हेमा अब चुप नहीं रह सकती थी। अपनी शर्मिंदा होती स्थिति से भी अवगत करा चुकी थी। पर कुंदन तो मानों वहाँ उपस्थित ही नहीं था। इस परिस्थिति से उबरने के लिए हेमा को लगा कि उसे ही कुछ करना पड़ेगा। वरना … , वरना के आगे हेमा कोई कयास नहीं लगा पा रही थी। ऐसी दुविधा भरी परिस्थिति में वो पहले कभी पड़ी ही नहीं हो, ऐसा भी नहीं था। जीवन यात्रा के सबसे प्रमुख मोड़ पर उसे जो उलझन और दुविधाभरी परिस्थिति का सामना करना पड़ा था, भला उसे कैसे भूल सकती है। वो तो ऐसा भयंकर, काला सच था, जिसके चपेट में आने से पहले वो करिश्माई तरीके से ही बची। पर हेमा को भी कहाँ पता था कि एस घटना या दुर्घटना की परछाई उसके पीछे हमेशा ही पड़ी रहेगी।
ऊहापोह में पड़ी हुई हेमा को अचानक खयाल आया कि फिलहाल तो उसे वर्तमान स्थिति से बाहर आना है। किसी भी तरह और किसी भी कीमत पर। कुंदन बिना किसी हरकत के तब भी उसे ही देख रहा था, जैसे कोई सुरक्षा गार्ड हो और वो ईमानदारी से अपनी ड्यूटी कर रहा हो।
‘कुंदन, आज मौन व्रत है क्या? कितनी देर हो गई, तुमने एक शब्द नहीं बोला। यदि मुझ पर गुस्सा आ रहा हो तो गुस्सा निकालने के बहाने ही मुँह खोल दो। तुम्हारी ये चुप्पी मुझे डरा रही है’ – हेमा ने ही सन्नाटे भरी चुप्पी को तोड़ने की पहल की।
‘कहना और पूछना तो बहुत कुछ है पर तुम खुद कर कुछ बताओगी ही नहीं तो पूछ कर क्या फायदा?’ – कुंदन कृत्रिम रोष से बोल पड़ा।
‘ऐसा नहीं है कि तुमसे कुछ छुपाना है या ऐसी कोई बात है जो तुम्हें पता न चले। पर जिस बात का प्रभाव मुझ तक सीमित है, उसे बताने का कोई औचित्य भी तो समझ नहीं आता। पर अब मैंने तय कर लिया है कि पूरी बात, या कहें तो पूरी कहानी प्रारम्भ से बताने जा रही हूँ।’
‘कहानी! कितनी लम्बी है भई, तुम्हारी ये कहानी। हमें इस बेस कैम्प में कम से कम तीन दिन और रुकना पड़ेगा। तो इन दिनों में ये समाप्त हो जायेगी ना!’ - कुंदन कुछ हास्य – कुछ व्यंग्य में कह रहा था और उसकी तल्ख जबान को हेमा समझ भी रही थी।
‘बनते कोशिश जल्द से जल्द खत्म कर दूँगी। मेरे कारण वैसे ही कितना नुकसान हो गया है। आज ये मन का भार उतर जाये तो शायद मेरे लिए भी ठीक होगा।’ – पल भर के अंतराल के बाद हेमा ने कुंदन से उसकी कुर्सी को पलंग के पास खिसकाने को कहा। पीठ तकिये पर टिका कर हेमा पलंग पर पैर लम्बे किये हुए बैठी थी। ‘तुमसे विवाह के पहले मेरा किसी और व्यक्ति से विवाह लगभग तय हो गया था…’
‘लगभग हो गया था का क्या क्या क्या मतलब?’ - कुंदन की आवाज़ ने ही वाक्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया।
‘आप जब सुनते जायेंगे या पूरा सुन लेंगे तो कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं रहेगी। जब मैं अच्छी-भली नौकरी कर रही थी, तभी मेरे पापा के दोस्त ने एक लड़के के बारे में बताते हुए कहा कि लड़का खूब पढ़ा-लिखा, गंभीर, और समझदार हैं। बस एक भाई भर है जो अच्छी नौकरी पर लगा हुआ है। माता-पिता भी समझदार और शिक्षित हैं सो हेमा के लिए यह रिश्ता ठीक रहेगा। हेमा अपना कॅरियर अपनी मर्जी से बना सकेगी। वे हमारे इतने करीबी और पारिवारिक मित्र थे कि मेरे माता-पिता बड़े खुश हो गये। बात आगे बढ़ी और एक- दूसरे को देखने और एक-दूसरे से मिलने के बाद विवाह तय हो गया। उन्हें सगाई की रस्म अलग से करनी नहीं थी, यही कहा कि सीधे शादी कर लेंगे। ये कोई गंभीर बात नहीं थी। दक्षिण भारतीय विवाह में सगाई हो जाने के बाद भी विवाह के पहले दिन सगाई की रस्म होती है।
मेरे माता-पिता को लगा कि हर माता-पिता की हेमा जैसी बेटियाँ हों तो विवाह की चिंता तो एकदम नहीं के बराबर हो जायेगी। बस मेरे विवाह की तारीख तय हो गई, मैं तो आकाश में उड़ रही थी कि अपने आप मेरा उद्धार हो रहा है। विवाह के पहले दिन बाराती आये और सगाई का कार्यक्रम भी बहुत अच्छे से निपट गया। दूल्हा सूट-बूट में था सो जूते-मोज़े पहने ही थे। मात्र जूते उतार कर सगाई की रस्म हो गई…’
कुंदन से अब रहा न गया – ‘तुम कहना क्या चाह रही हो, तुम्हारा आशय क्या है मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। मेरी-तुम्हारी सगाई भी तो इसी अंदाज़ में हुई थी। मेरे साथ तुम्हारा कहीं दूसरा विवाह तो नहीं है…’
हेमा ने टोक दिया – ‘अगर मेरा दूसरा विवाह होता तो अवश्य ही पहले ही सूचना दे देती। अगले दिन प्रात: विवाह की रस्मों के दौरान ही विवाह करने से इंकार कर दिया।’
हेमा इतनी चुप हो गई मानों वहाँ कोई बात ही नहीं कर रहा था।
कुंदन ऊहापोह में पड़ा हेमा के चेहरे पर नज़र गड़ाये ये तय करने की कोशिश कर रहा था कि उसे चुप रहना है या वार्तालाप प्रारम्भ करना चाहिए। घड़ी दोपहर के दो बजा रही थी और वहाँ के किचन में तीन बजे तक ही खाना मिलता था। कुंदन अपनी कुर्सी से उठकर कमरे से बाहर जाने का तय कर रहा था। तभी हेमा बोल पड़ी – ‘जानना नहीं चाहोगे कि मैंने उस बंदे से विवाह करने से इंकार क्यों किया …’
‘बताओगी तो वह भी सुन लूँगा पर मुझे तो अभी तक ये ही समझ में नहीं आ रहा है कि हमारे विवाह से पहले जब ये सब कुछ नहीं बताया तो अभी क्यों बता रही हो। फिर भी दो मिनट रुक जाओ, मैं हम दोनों का खाना कमरे में ही ले आता हूँ। तुम डाईनिंग हॉल तक चल नहीं पाओगी और देर हो जाने से खाना नहीं मिलेगा।’
कुंदन खाना लेने चला गया और हेमा को कुछ बैचेन-सा छोड़ गया। उसे लगा वो पहाड़ पर चढ़ते –चढ़ते उसकी चोटी पर पहुँच गई है। पर चोटी पर ज्यादा देर टिक नहीं पायेगी, तुरंत उसे सही सलामत उतरना पडे़गा।
जितनी देर चोटी पर रहेगी वो स्थिर कैसे रह पायेगी। चाह रही थी कि पूरे वाक्ये को सुना कर छाती का भार हल्का कर ले। पर जब खाना आ गया तो खाना ही था। भले ही हेमा के गले से खाना आसानी से उतर ही नहीं रहा था । खाने के बाद की दवाई भी लेनी थी। दवाई के असर से हेमा ने झपकी ली और कुंदन भी कुछ पढ़ते- पढ़ते सो गया था।
जब हेमा आराम कर चुकी थी तो उसने तय कर लिया था कि बस अब चाय के साथ अपनी बात पूरी कर ही देगी। वरना बैचेनी उसे सही तरीके से आराम भी नहीं करने देगी।
चाय आ गई और कुंदन भी आकर कुर्सी पर बैठ गया। हेमा ने चाय की तरफ हाथ नहीं बढ़ाया, वरन् शुरू हो गई – ‘कुंदन, बस पांच मिनट में अपनी बात पूरी कर देती हूँ।’
‘अगली सुबह कुछ रस्मों के साथ जब दामाद के पैर पखारने की बारी आई, तब के हादसे का ब्यौरा दे दूँ तो सब कुछ पारदर्शी कांच की तरह नज़र आ जायेगा। दक्षिण भारतीय विवाहों में जो अल सुबह से छोटी-मोटी रस्में होती हैं, चलती रहीं। मेरे पिताजी बड़ी-सी परात के सामने पटे पर बैठ कर दूल्हे का पैर पखारने की प्रतीक्षा कर रहे थे। दूल्हे महाराज धोती के साथ भी बाकायदा मोज़े पहने हुए थे। यही नहीं, उसकी भाभी, मां और अन्य निकट की रिश्तेदार महिलायें भी भारी –भरकम जरी सिल्क की साडि़यों के नीचे मोज़े पहने हुए थीं।
‘तो क्या हुआ; ठंड में तो हर ड्रेस के साथ मोज़े पहनते ही हैं’ – कुंदन ने उसकी बात काटते हुए तपाक से कहा।
‘पार्टी या विवाहों में इतनी सुंदर ड्रेस के साथ कोई महिला मोज़े नहीं पहनती, खासकर मौसम सर्दी का ना हो तो बिल्कुल नहीं।’
‘हाँ तो दुल्हे ने जब ये कहा कि मैं अपने पितातुल्य व्यक्ति से अपने पैर पखारने की इजाजत नहीं दूँगा तो मेरा मन उसके लिए गर्व से भर गया पर मुझसे तीन वर्षीय छोटा भाई इस बात से संतुष्ट नहीं हुआ। वो बोला कि ठीक है, पर उसके लिए मोज़े पहनने की आवश्यकता नहीं है। हम तो वैसे ही आपकी भावनाओं का खयाल रख लेते।’
भाई के साथ उसके कुछ दोस्तों ने भी जोर दिया कि मोज़े तो उतार दें। उनकी तरफ से एक-दो महिलाएं बोलीं – ‘हम लोगों की आदत है कि ‘मॉइश्चराईज़र’ लगाकर दिन भर ‘सॉक्स’ पहने रहते हैं। मोज़े पहनने के प्रति उनकी जिंद के साथ ही हमारे यहाँ के बुजुर्गों को कुछ शंका हुई कि दाल में कुछ काला है। आखिर दूल्हे के मोज़े उतरवाये तो वहाँ जो कुछ हुआ, उस हंगामे के बारे में मुझे विस्तार से बताने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लड़के को ‘लेप्रोसी’ (कोढ़) था जो इलाज के बाद भले ही काबू में आ गया था पर उससे पहले ही दाहिने पैर की तीन ऊँगलियों को अपनी भेंट चढ़ा चुका था।’
हेमा यूँ ही शांत बैठी रही मानों मीलो चल कर आई हुई हो और कुछ देर बात नहीं कर सकेगी।
कुंदन ही सरक कर हेमा के पास आया और कंधे पर दबाव डालते हुए बोला – ‘इस हादसे का तो मैं सोच भी नहीं सका था। तुम पर क्या बीती होगी, इसका अंदाज तो लगा ही सकता हूँ। इतनी बड़ी बात को उन्होंने छुपाने का सोचा भी कैसे; बहुत आश्चर्य होता है।’
हेमा ने माँग कर पानी पीया, फिर कुछ अंतराल लेकर बोली – ‘यूथ हॉस्टल की तरफ से ट्रेकिंग के लिए गई थी तब मोज़े भी पहन कर गई थी। पर इस हादसे के बाद किसी के पैरों को मोज़े पहना देखती हूँ तो दहशत-सी हो जाती है। क्या करूँ?’
हेमा के अंतिम दो शब्द लाचारी भरे लग रहे थे। कुंदन ने उसे हौसला दिलाते हुए कहा – ‘ये भी एक तरह का फोबिया है जिसे तुम जितने लम्बे समय तक खींचोगी वो खिंचता चला जायेगा और धीरे-धीरे इतना बड़ा हौवा बन जायेगा कि फिर कितनी भी कोशिश कर लो, उससे निकल नहीं पाओगी।अपने आप को जितनी जल्दी इस जाल से मुक्त कर लोगी, उतना अच्छा होगा।’
‘आपको लगता है कि इससे अलग होना बहुत आसान है?’
‘जब तक कोशिश नहीं करेंगे कुछ भी आसान नहीं होगा। इस हादसे को एक दु:स्वप्न की तरह भुलाने की कोशिश तो करनी ही पड़ेगी। इसको जितना दिल से लगाये रखोगी उतनी ही बेचैनी बनी रहेगी। फिर चैन से तो क्या, जीना ही मुश्किल हो जायेगा। इसके लिए एक ही तरीका है ...’ – कुंदन ने जानबूझ कर इस जगह पर आकर बड़ा-सा ‘पॉज’ लिया।
हेमा उसके चेहरे को उत्सुकता से ताक रही थी कि आगे क्या बोलेगा।
‘अरे तो बता क्यों नहीं देते कि क्या तरीका है।’
‘जैसे ही तुम्हारे पैर की तकलीफ कम हो जाती है तो जो सबसे पहला काम करोगी वो यही कि पैरों में मोज़े पहनोगी। जब अंधेरे से डर लगता हो तो बजाय अंधेरे से डरने के धीरे-धीरे अंधेरे में जाकर उसका अनुभव लो। कुछ ही क्षण में आँखें अभ्यस्त होकर कुछ चीजों की अस्पष्ट आकृतियाँ देखने लगती हैं। जिस चीज या हालत या आदत से डर लगे उसी को रच कर अनुभव करोगी तो बड़ी जल्दी उस भय से छुटकारा मिल जायेगा।’ – कुंदन ने ‘फाइनल वर्डिक्ट’ की तरह कह दिया।
‘मैं भी तो छुटकारा ही चाहती हूँ, पर कैसे?’ – हेमा के चेहरे पर अभी भी परेशानी नाच रही थी।
‘इसका एक ही तरीका है कि पिछला जो कुछ बुरा रहा या हुआ उसे भुलाकर आज को जीना। ये नहीं करोगी तो कभी भी खुशी और चैन का जीवन नहीं जी पाओगी। ये भी याद रखो कि ये तुम्हारे ही बस का है और तुम्हें ही करना होगा।’
दो दिन बाद ही हेमा और कुंदन उस बेस कैम्प से अगले पड़ाव के लिए निकल पड़े थे। हेमा जूते के साथ मोज़े भी पहने हुए थी।