मोहन धोबी (कहानी) : अनवर सुहैल

Mohan Dhobi (Story in Hindi) : Anwar Suhail

‘मोहन भाई कर्ज़ मांग रहा है जी।’ ट्रे को स्टूल पर रखते नज़्मा बोली।

सुलेमान अनसुने बैठे रहे। अख़बार पढ़ रहे हैं। अख़बार क्या है जैसे विज्ञापनों का ज़खीरा। तीन रूपए के अख़बार में ऑडी, बीएमडब्लू कारों के विज्ञापन क्यों छापे जाते हैं भला यह बात सुलेमान की समझ से परे है। अरे, मारूति और टाटा की कारें खरीद सकने वाला खरीददार इन विज्ञापनों को क्योंकर पढ़ेगा? सुलेमान की आंखों पर चश्मा है और माथे पर त्योरियां। क्लीन- शेव्ड सुलेमान पचपन के हो गए हैं लेकिन दिखते स्मार्ट हैं। बीवी अक्सर कहती कि आप इतना डूब कर अख़बार न पढ़ा करें और टीवी के न्यूज़ चैनल देखते हुए टेंशन में न आया करें। खामखां परेशान होते हैं। ये तो इन टीवी-अखबार वालों का काम ही है कि छोटी सी बात को नमक-मिर्च लगाकर पेश करें। आए दिन सीरिया के खुदमुख्तार खलीफ़ा बग़दादी की खूंख़ार क़ातिल सेना आइसिस का बर्बर वीडियो और पाकिस्तान के आतंकी हमले। कश्मीरियों के खिलाफ़ देशद्रोही की धाराएं। इन सबसे निजात मिले तो मुसलमानों के तीन तलाक, लव-ज़िहाद, गौमांस और गौकशी जैसे नातमाम मसले। सुलेमान नौकरी का बाद का बचा समय ऐसे ही सिरदर्द समाचारों को देते हैं और मस्जिद के सदर लियाकत भाई जब मिलने आएं तो फिर उनके बहस-मुबाहसे में व्यस्त हो जाते हैं भले से मग़रिब की नमाज़ कज़ा हो जाए उन्हें चिन्ता नहीं रहती।

नज़्मा ने सामने स्टूल पर चाय रखी और दूसरी कुर्सी पर बैठ गई।

सुलेमान ने गर्मागर्म चाय की चुस्की ली और फिर बीवी से चुहल भरे अंदाज़ में कहा--‘तुम्हें बड़ी हमदर्दी रहती है अपने मोहन भाई से..।!’

‘आप भी न..।आखिर अपने ससुराल वालों से हमदर्दी भी न रखूं तो कहेंगे कि मायके में कुछ एखलास-मुहब्ब्त भी सीख कर नहीं आई। अरे हुजूर, रैयत हैं ये लोग। आप को अल्लाह ने हैसियत दी है तभी तो कोई हाथ पसारे दरवाज़े पर आता है।’ नज़मा को ये चुहल पसंद नहीं आई थी।

‘काहे कर्ज़ मांग रहा है ये मोहन भाई। पिछली बार का उधारी उसने कहां अदा किया?’

‘अजी, वो कर्ज़ के नाम पर मांगता है, शरम आती है उसे भीख मांगने में। बोलता है पटा देगा कर्ज़। अगला-पिछला सभी। झारखण्ड में उसकी भतीजी की शादी है। मोहन बड़ा भाई है इसलिए उसे कुछ पैसे चाहिए थे। आप नहीं देंगे तो मैं अपने पास से दूंगी।’-- नज्मा अड़ सी गई।

‘ठीक है, कितना मांग रहा है?’

‘एक हज़ार रूपए।’

‘रूपए का दरख़्त पर फलते हैं। ठीक है तुमने मन बना लिया है तो उसे दे दो पैसे और ये कहना कि ये उधार नहीं है बल्कि हमारी तरफ़ से भतीजी की शादी के लिए मदद है।’

मियां-बीवी की नोंक-झोंक न हो तो ज़िंदगी बेमज़ा हो जाए।

क्या करें सुलेमान का दिल ही ऐसा है। वह अपनी बीवी को नाराज़ नहीं रख सकते। बीवी की खुशी में ही अपनी खुशी मानते हैं।

‘ऐसा नहीं है जी, मोहन बड़ा खुद्दार है। उसकी बीवी जुबैदा भी कितनी तहज़ीब वाली है। जब भी आती है घर के काम में हाथ बंटाती है। गेहूं साफ करके गई थी परसों। रो रही थी अपनी खोटी तकदीर पर। मोहन के अब्बा ने झूठ बोलकर जुबैदा का निकाह मोहन से करवाया था कि मध्यप्रदेश में लड़का ड्राई-क्लीनिंग करता है"--नज़मा ने आंचल से माथे पर उभर आई पसीने की बूंदों को सुखाते हुए मोहन-राग अलापना शुरू कर दिया।

मोहन कोयला खदान की कॉलोनी का धोबी है। उसकी अपनी एक छोटी सी गुमटी है। कोयला खदान के सरकारी कर्मचारी आमदनी अच्छी है इसलिए ये लोग खर्च भी खूब करते हैं। मोहन बड़ी सफाई से कपड़े धोने और प्रेस करने का काम करता है। उसे देख कर कोई कह नहीं सकता है कि वह एक मुसलमान है। तीज-त्योहार, शादी-बियाह के मौके पर उसके पास काम की अधिकता रहती है। दुकान होने के बावजूद घर पहुंच सेवा के कारण मोहन को ग्राहक तरजीह देते हैं। इस तरह इज़्ज़तदार ढंग से उसकी रोजी-रोटी चल रही है। हां, हारी-बीमारी, दुख- तकलीफ़, शादी-त्योहार जैसे अवसर पर उसका हाथ तंग हो जाया करता है। ऐसे समय में मोहन अपने कुछेक ग्राहकों से एडवान्स आदि के रूप में मदद ले लिया करता है।

मोहन की घरवाली जुबैदा से सुलेमान साहब की घरवाली का एक तरह से बहनापा सा जुड़ गया है। अफसराईन होने के ज्यादा लक्षण नहीं हैं नज़मा के अंदर। वह इसी तरह झाड़ू-पोंछा करने वाली बाई से भी भावनात्मक रिश्ता जोड़े हुए है। गरीब-गुरबा के दुख-दर्दों में शामिल होने के चक्कर में नज़मा को कई बार धोखा भी खाना पड़ा है लेकिन वह इसे इस तरह बिसरा देती है कि कौन हमारी किस्मत ले गया। अल्लाह ने हमें बख़्शा है सो हमें ऐसी छोटी-मोटी बातों से घबराकर ज़रूरतमंदों की मदद करना बंद नहीं कर देना चाहिए।

सुलेमान भी नज़मा से समहत रहते।

अक्सर कुरआन की एक आयत सुलेमान दुहराया करते--‘लकुम दीनकुम वलेया दीन..।समझीं नज़मा, तुमको तुम्हारा दीन और उनको उनका दीन। हमें जो सही लगता है करते रहें और क्या?’ सुलेमान उतने मज़हबी नहीं हैं कि दिखावे की नमाज़ें पढ़ते रहें लेकिन इस्लाम और दुनिया के दूसरे धर्मों के बारे में इधर-उधर से खूब अध्ययन किया करते हैं। उनके पास कुरआन का अरबी के साथ हिन्दी और अंग्रेजी तर्जुमा भी है।

इस लिहाज से सुलेमान का मानना है कि अल्लाह की बनाई दुनिया बहुत बड़ी है और सभी इंसान किसी एक धर्म के मानने वाले कतई नहीं हो सकते। इसी बात पर उनकी मस्जिद कमेटी के सदर लियाकत भाई से खूब बहस-मुबाहिसे हुआ करते हैं।

लियाकत भाई से एक बार उन्होंने कहा भी था--‘क्या हुजूर मुहम्मद चाहते तो अल्लाह तआला के एक छोटे से हुक्म से सारी दुनिया के इंसान इस्लाम धर्म में दाखिल नहीं हो जाते? लेकिन ऐसे में इस्लाम की खूबसूरती कहां रह पाती। यह तो अल्लाह तआला ने मुहम्मद साहब के हाथों इस्लाम सौंपा कि कुरआन के संदेश से दुनिया के लोग खुदबखुद आकर्षित होंगे और ज्यादा से ज्यादा लोग इस्लाम में दाखिल होंगे।’

ऐसे समय में नज़मा का काम है कि इन दानिशमंदों को चुपचाप चाय परोस दी जाए और यह भी उसे मालूम है कि ईशा की अज़ान सुनते ही लियाकत भाई चले जाते हैं। लियाकत भाई पंजवक्ता नमाज़ी हैं और मस्जिद में जाकर बाजमात नमाज़ अदा करते हैं।

जब चिढ़ जाते सुलेमान तो यही कहते--‘लियाकत भाई, काहे हुज्जत करते हैं। अल्लाह के रसूल चाहते तो अल्लाह पाक से दुआ मांग लेते और दुनिया के तमाम इंसानों को अल्लाह तआला मुसलमान बना देता। हद है लियाकत भाई। क्या सारे मुसलमान एक हुए हैं? कोई शिया है तो कोई सुन्नी। कोई देवबंदी है तो कोई बरेलवी। इधर हिन्दुस्तान में सूफी मुसलमान नाम की एक नई जमात के रूप उभरी है जिसे राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है।’

लियाकत भाई कहते---‘आपको इसीलिए वहाबी कहता हूं तो आप नाराज़ हो जाते हैं। अल्लाह पर भरोसा रखकर इस्लाम का पैगाम कोने-कोने तक फैलाना हमारी जिम्मेदारी है। हम इससे इंकार नहीं कर सकते हैं।’

--‘और यह भी हमारी जिम्मेदारी है कि देश-समाज से कटकर कुंए के मेंढक बनकर अल्ला-अल्ला करते रहें मुसलमान। दुनिया कहां से कहां पहुंच गई और देखो हमारा मुसलमान समाज कितना पिछड़ा और दकियानूस है। अभी भी मुल्ला-मौलवियों के चंगुल से आजाद नहीं होना चाहता है।’

यह तो अच्छा हुआ कि ईशा की अज़ान की आवाज़ आई तो लियाकत भाई उठने लगे। सुलेमान उन्हें छोड़ने बाहर गेट तक आए।

मोहन की बीवी जुबैदा अक्सर नज़मा के सामने आने मायके वालों का और ससुराल वालों का रोना रोती रहती। जुबैदा बताती कि उसके घरवाले बिना तस्दीक किए मोहन के घरवालों के झांसे में आ गए और झारखण्ड में मोहन और जुबैदा का निकाह हो गया। बिदा होकर जब जुबैदा मोहन के घर आई तोे उसके पैरों तले ज़मीन निकल गई थी। एक खस्ताहाल झोपड़ी में रहता था मोहन। बाहर आंगन में बांस की अलगनी से रस्सियां टंगी हुई थीं। एक कोने में पत्थर की एक बड़ी सिल रखी हुई है जिसपर पटक-पटक कर मोहन कपड़े धोता था। झोपड़ी के पीछे टाट-बोरे से घेरकर नहाने-निस्तार की जगह है।

कालोनी की मुख्य सड़क और नाले के बीच की सरकारी जमीन पर एक लाईन से कई लोग बसे हुए हैं। मोड़ पर शिव-मंदिर। उसके बगल में मिश्राजी की एक लाईन से पांच दुकान। इन्हें किराए पर उठा दिया है मिश्रा जी ने। सुबह-शाम भोले बाबा को जल चढ़ाते हैं मिश्रा-परिवार। इसके बाद चार खम्बों पर टंगा एक छोटा सा ट्रांसफार्मर। यह इलाका उजाड़ था सो वहां सरकारी ज़मीन पर एक लाईन से कई परदेशी लोग जबरन बस गए। उन्हें कोई हटाने की सोच भी नहीं सकता क्योंकि ये न हों तो कॉलोनी वालों को अपनी ज़रूरतों के लिए दूर जाना होगा। सबसे पहले ब्रायलर मुर्गा वाले की दुकान और मकान। फिर अण्डा वाला। फिर रजाई-गद्दा वाले धुनिया। जुगनू टेलर की दुकान। फिर तीन धोबियों के घर। फिर टीवी-रेडियो-कूलर आदि रिपेयर करने वालों की दुकान। फिर एक ब्रायलर मुर्गा की दुकान। यह दूसरी वाली ब्रायलर मुर्गा की दुकान एक हिन्दू खटीक की है। उसने टीन के बोर्ड पर लिखवा भी रखा है। यहां झटका मुर्गा मिलता है: बलराज खटीक। सन बानबे के बाद देश के जो हालात बने उसके बाद चंद लोगों की फरमाईश पर यह झटका मुर्गा वाली दुकान खुली। मुर्गा भी अब हिन्दू-मुसलमान की जंग का शिकार हो गया था।

इस तरह धीरे-धीरे यह इलाका गुलजार हुआ।

जुगनू टेलर मास्साब बहुत मज़हबी है। बहुत सुरीला नात पढ़ता है। इसके अलावा उसके घर के आगे एक पक्का चबूतरा बना है। उसे सभी तकिया कहते हैं। जुगनू टेलर हर साल इसी तकिए से मुहर्रम का ताजिया रखता है। जुगनू टेलर मास्साब का ताजिया साईज़ में छोटा तो होता है लेकिन उसकी कलाकारी देखने लायक रहती है। जुगनू टेलर मास्साब जात का साईं है। मुहर्रम के मौके पर वह हर बिरादरी के लोगों से ताजिया के लिए इमदाद मांगा करता है।

अधिकांश घर-दुकानें बिहार-झारखण्ड के मुसलमानों के कब्ज़े में हैं।

ईद-मीलादुन्नबी के मौके पर हर घर के बाहर छप्पर पर चांद-तारा वाला हरे रंग का झण्डा फहराने लगता है। ग्यारहवीं शरीफ़ का पूरा एक महीना मीलाद और दावतों से आबाद रहता है। जुबैदा नज़मा को बता रही थी कि जब शादी के बाद पहली बार यहां आई थी तो बस दो-तीन झोपड़ियां थीं। रात-बिरात पीछे नाले की तरफ भालू और सियार आया करते थे। अब तो नाले के उस पार की बस्ती में इंगलिश मीडियम स्कूल खुल जाने के कारण चहल-पहल बढ़ गई है वरना पहले एकदम वीरानी ही वीरानी थी। शाम ढले से डर लगने लगता। नाले के किनारे जो महुआ के पेड़ हैं उन पर जब महुआ के फूल आते तो भालुओं की आमद होने लगती थी।

नज़मा ने बताया था अपने शौहर सुलेमान को कि मोहन का असल नाम इसरार है। इसरार अंसारी। वरना सुलेमान कहां जान पाते कि मोहन नाम का व्यक्ति मुसलमान है। वैसे भी उनकी भेंट धोबी, दूधवाला आदि से कहां हो पाती है। उनकी ड्यूटी ही ऐसी है। या तो खदान में रहें या फिर कहीं सफर में। घर में तो वह नहाने-खाने और सोने ही आते हैं।

फिर इसरार का नाम मोहन कैसे हुआ?

सुलेमान को बहुत उत्सुकता हुई।

एक दिन सुलेमान बाहर बरामदे में बैठे चाय की चुस्कियों के साथ स्थानीय अख़बार पढ़ रहे थे तभी मोहन आया।

उसने सुलेमान साहब को सलाम किया।

‘कपड़े लेने आया हूं साब, मेम साब को बता दें।’--मोहन दरवाज़े के बाहर ही खड़ा रहा।

लगता है नज़मा बाथरूम में है वरना वह जवाब ज़रूर देती।

सुलेमान साहब ने प्लास्टिक की कुर्सी पर मोहन को बैठने का इशारा किया।

मोहन सिकुड़ कर बैठ गया।

सुलेमान साहब ने अख़बार को किनारे करते हुए उससे पूछा--‘तुम तो मुसलमान हो फिर तुम्हारा नाम मोहन कैसे पड़ा?’

मोहन कुर्सी पर न बैठ कर वहीं फर्श पर बैठ गया।

सुलेमान ने मोहन को गौर से देखा। पतला-दुबला शरीर। चेहरे पर हल्की सी मूंछ और सर पर भरपूर बाल। पान खाने के कारण लाल होंठ और कत्थई दांत। सुलेमान ने बताया--‘मेमसाब सब जानती हैं साहब। इधर जब हम आए तब कॉलोनी नई-नई आबाद हो रही थी। धोबी का काम शुरू किया तो काम कम ही मिलता था। साहब लोगों के घरों में जाकर कपड़ा मांग कर ले आते और धोकर प्रेस करके पहुंचा दिया करते थे। शुरू में लोगों ने मुसलमान जानकर काम देने से इंकार कर दिया था। तब हमारी दाढ़ी-मूंछ भी थी और हम टोपी भी खपकाए रहते थे। एक दिन हमने दाढ़ी-मूंछ कटवाकर एक आम आदमी बन गए और जब कोई नाम पूछता तो मोहन बता देते। इस तरह हमें काम मिलने लगा और हम इसरार अंसारी से मोहन धोबी हो गए।’

तब तक नज़मा कपड़े लेकर आ गई और सुलेमान जाने क्या सोचते हुए अखबार की खबरों में गुम हो गये।

नज़मा ने सुलेमान को कपड़े दिये और पूछा--‘कब जा रहे हो गांव?’

सुलेमान ने बताया--‘शनीचर को निकलना है मेमसाब’

नज़मा बोली--‘‘ठीक है, जुमा को आकर पैसे ले जाना। ठीक!’’

मोहन सलाम करके चला गया।

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