मकर संक्रांति : लोक कथाएं, पौराणिक कथाएं
Makar Sankrati : Lok Kathayen, Pauranik Kathayen
मकर संक्रांति भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है। यह पूरे भारत और नेपाल में भिन्न रूपों में मनाया जाता है। पौष मास में जिस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है उस दिन इस पर्व को मनाया जाता है।
मकर संक्रांति पर धर्मराज की कहानी
एक समय जब पृथ्वीलोक पर बबरुवाहन नामक एक राजा हुआ करता था। उसके राज्य में किसी चीज की कमी नहीं थी। इसी राज्य में एक हरिदास नामक ब्राह्मण भी निवास करता था। जिसका विवाह गुणवती से हुआ था जो कि बहुत ही धर्मवती एवं पतिव्रता महिला थी। गुणवती ने अपना पूरा जीवन सभी देवी देवताओं की उपासना में लगा दिया और वह सभी प्रकार के व्रत करती थी और दान धर्म भी किया करती थी। इसके अलावा अतिथि सेवा को वह अपना धर्म मानती थी। ऐसे ही ईश्वर की उपासना करते हुए वह वृद्ध हो गयी। जब उसकी मृत्यु हुई तो धर्मराज के दूत उसे अपने साथ धर्मराजपुर ले गए।
यमलोक में एक सुन्दर सिंहासन पर यम धर्मराज विराजमान थे और उनके पास ही चित्रगुप्त भी बैठे थे। चित्रगुप्त जब धर्मराज को प्राणियों का लेखा जोखा सुना रहे थे तभी यमदूत गुणवती को लेकर पहुंचे। गुणवती यमराज को देखकर थोड़ी भयभीत हुई और मुंह निचे करके खड़ी हो गयी। फिर चित्रगुप्त ने गुणवती का ब्यौरा निकाला और उसके बारे में धर्मराज को बताया। धर्मराज ने गुणवती का पूरा ब्यौरा देखा और वे प्रसन्न हुए लेकिन फिर भी उनके मुख पर थोड़ी सी उदासी भी छायी हुई थी। यह देखकर गुणवती ने पूछा – हे प्रभु, मैंने तो अपने जीवन काल में सारे सत्कर्म ही किये फिर भी आपके मुख पर उदासी छायी है इसका कारण क्या है? प्रभु मुझसे क्या भूल हुई है?
धर्मराज ने कहा – हे देवी, तुमने सभी देवी-देवताओं के व्रत किए हैं, उपासना की है लेकिन कभी भी तुमने मेरे नाम से कुछ पूजा या पाठ या दान नहीं किया। धर्मराज की बात सुनते ही गुणवती क्षमा याचना करने लगी और कहने लगी हे प्रभु मुझे आपकी उपासना के बारे में कुछ पता नहीं है। कृपा करके मुझे ऐसा उपाय बताइये प्रभु जिससे सभी मनुष्य आपकी कृपा के पात्र बन सकें। मैं आपके मुख से आपकी भक्ति का मार्ग सुनना चाहती हूं और मेरी कामना है कि मृत्यु लोक पर वापस जाकर मैं आपकी भक्ति करूं और सभी लोगों को इस बारे में बताऊं।
धर्मराज ने बताया- जिस दिन सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश करते हैं यानि मकर संक्रांति के दिन मेरी पूजा शुरू करनी चाहिए और उस दिन से लेकर पूरे एक साल तक मेरी पूजा करते हुए ये कथा सुननी चाहिए। साथ ही मेरी पूजा करने वाले व्यक्ति को धर्म के इन दस नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए।
1. धीरज रखना यानी संतुष्ट रहना।
2. अपने मन को वश में रखना और सभी को क्षमा करना।
3. किसी प्रकार का दुष्कर्म नहीं करना।
4. मानसिक और शारीरिक शुद्धि का ध्यान रखना।
5. अपनी इन्द्रियों को वश में रखना।
6. बुरे विचारों को अपने मन में न लाना।
7. पूजा, पाठ और दान पुण्य करना।
8. व्रत करना और व्रत की कहानी सुनना।
9. सच बोलना और सभी से अच्छा व सच्चा व्यवहार करना।
10. क्रोध न करना।
धर्म के इन सभी लक्षणों का पालन करते हुए एक साल तक मेरी कथा नियम से सुनें, दान पुण्य और परोपकार के काम करें और अगली मकर संक्रांति पर इस व्रत का उद्यापन करें। इसके बाद मेरी एक मूर्ति बनाकर विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा करवाकर हवन पूजन करें और साथ ही चित्रगुप्त की भी पूजा करें। और काले तिल के लड्डू का भोग लगाएं।
इसके बाद ब्राह्मण भोज करवाएं व बांस की टोकरी में 5 सेर अनाज का दान करें। साथ ही किसी जरूरतमंद को गद्दा, तकिया, कम्बल, छप्पन, लोटा व वस्त्र आदि का दान करें, संभव हो तो गौ दान करें। धर्मराज से व्रत की पूरा कथा सुनकर गुणवती ने पुनः धर्मराज से प्रार्थना की हे प्रभो ! मुझे फिर से मृत्यु-लोक में जाने दीजिये। जिससे मैं आपका व्रत कर सकूं साथ ही इस व्रत का प्रचार भी लोगों मे कर सकूं। इस पर यमराज ने गुणवति को धरकी लोक पर फिर से जाने दिया।
धरती पर वापस आकर गुणवती ने धर्मराज द्वारा बताए गए व्रत के बारे में अपने पतिदेव को बताया। मकर संक्रांति आते ही गुणवती और उसके पति ने ये व्रत शुरू कर दिया। इसी व्रत के प्रभाव से उनपर धर्मराज की कृपा हुई और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।
सूर्य देव और शनि देव की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य देव की दो पत्नियां थीं- संज्ञा और छाया। माता छाया के पुत्र शनि देव थे। जन्म के समय शनि देव का रंग काला था, जिसे देखकर सूर्य देव ने उन्हें अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया और क्रोधवश उनका अपमान किया। पिता के इस कटु व्यवहार के कारण शनि देव और माता छाया को अलग होकर ‘कुंभ‘ नामक घर में रहना पड़ा।
सूर्य देव के दुर्व्यवहार से आहत होकर माता छाया ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया। क्रोधित होकर सूर्य देव ने प्रतिशोध में शनि देव और छाया के घर को अपनी अग्नि से जलाकर भस्म कर दिया।
जब सूर्य देव की पहली पत्नी संज्ञा के पुत्र यम को इस कलह का पता चला, तो उन्होंने पिता सूर्य देव को श्राप से मुक्ति दिलाई। यम ने पिता को समझाया और उनसे माता छाया व शनि देव के प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार करने का आग्रह किया। अपनी भूल का अहसास होने पर सूर्य देव स्वयं शनि देव से मिलने उनके घर पहुंचे। जब सूर्य देव वहां पहुंचे, तो शनि देव का सब कुछ जल चुका था। फिर भी, उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता का स्वागत काले तिल से किया। पुत्र के इस प्रेम और क्षमा भाव से सूर्य देव गदगद हो गए।
सूर्य देव ने शनि को ‘मकर’ नाम का नया घर (राशि) भेंट किया। आशीर्वाद स्वरूप शनि देव ‘मकर’ और ‘कुंभ’ दोनों राशियों के स्वामी बने। सूर्य देव ने वरदान दिया कि जब भी वे मकर राशि में प्रवेश करेंगे, तो जो भी उन्हें काले तिल अर्पित करेगा, उसका जीवन सुख-समृद्धि से भर जाएगा। यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की पूजा में काले तिल का विशेष महत्व है। यह दिन क्षमा, प्रेम और पारिवारिक पुनर्मिलन का प्रतीक माना जाता है।
भगीरथ और गंगा की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा सगर अपने परोपकार और पुण्य कर्मों से तीन लोकों में प्रसिद्ध हो गए थे। चारों ओर उनका ही गुणगान हो रहा था। इस बात से देवताओं के राजा इंद्र को चिंता होने लगी कि कहीं राजा सगर स्वर्ग के राजा न बन जाएं। इसी दौरान राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। इंद्र देव ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के पास बांध दिया।
अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा चोरी होने की सूचना पर राजा सगर ने अपने सभी 60 हजार पुत्रों को उसकी खोज में लगा दिया। वे सभी पुत्र घोड़े को खोजते हुए कपिल मुनि के आश्रम तक पहुंच गए। वहां पर उन्होंने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा देखा। इस पर उन लोगों ने कपिल मुनि पर घोड़ा चोरी करने का आरोप लगा दिया। इससे क्रोधित होकर कपिल मुनि ने राजा सगर के सभी 60 हजार पुत्रों को श्राप से जलाकर भस्म कर दिया।
यह जानकर राजा सगर भागते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे और उनको पुत्रों को क्षमा दान देने का निवेदन किया। तब कपिल मुनि ने कहा कि सभी पुत्रों के मोक्ष के लिए एक ही मार्ग है, तुम मोक्षदायिनी गंगा को पृथ्वी पर लाओ। राजा सगर के पोते राजकुमार अंशुमान ने कपिल मुनि के सुझाव पर प्रण लिया कि जब तक मां गंगा को पृथ्वी पर नहीं लाते, तब तक उनके वंश का कोई राजा चैन से नहीं बैठेगा। वे तपस्या करने लगे। राजा अंशुमान की मृत्यु के बाद राजा भागीरथ ने कठिन तप से मां गंगा को प्रसन्न किया।
मां गंगा का वेग इतना था कि वे पृथ्वी पर उतरतीं तो, सर्वनाश हो जाता। तब राजा भगीरथ ने भगवान शिव को अपने तप से प्रसन्न किया ताकि वे अपनी जटाओं से होकर मां गंगा को पृथ्वी पर उतरने दें, जिससे गंगा का वेग कम हो सके। भगवान शिव का आशीर्वाद पाकर राजा भगीरथ धन्य हुए। मां गंगा को अपनी जटाओं में रखकर भगवान शिव गंगाधर बने।
मां गंगा पृथ्वी पर उतरीं और आगे राजा भगीरथ और पीछे-पीछे मां गंगा पृथ्वी पर बहने लगी। राजा भगीरथ मां गंगा को लेकर कपिल मुनि के आश्रम तक लेकर आए, जहां पर मां गंगा ने राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया। जिस दिन मां गंगा ने राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष दिया, उस दिन मकर संक्रांति थी।
भगवान विष्णु का वामन अवतार
भगवान विष्णु ने असुर राजा बलि को धोखा देकर पाताल लोक भेज दिया था। बलि ने भगवान विष्णु से तीन पग भूमि मांगी थी। भगवान विष्णु ने तीन पग में ही तीनों लोकों को नाप लिया था। कुछ मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने मकर संक्रांति के दिन ही बलि को पाताल लोक भेजा था।
सूर्य देव का रथ
एक कथा के अनुसार, सूर्य देव का रथ सात घोड़ों द्वारा खींचा जाता है। खरमास के दौरान सूर्य देव के रथ में खर जुड़े रहते हैं जिसके कारण सूर्य देव की गति धीमी हो जाती है। मकर संक्रांति के दिन खर दूर हो जाते हैं और सातों घोड़े रथ को खींचने लगते हैं जिससे सूर्य देव की गति बढ़ जाती है। इस कथा के अनुसार मकर संक्रांति के दिन से सूर्य देव की गति बढ़ने लगती है और दिन लंबे होने लगते हैं।
यशोदा और श्रीकृष्ण की कथा
माता यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए मकर संक्रांति का व्रत रखा था। इस कथा के अनुसार, मकर संक्रांति का व्रत रखने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इन कथाओं के अलावा भी मकर संक्रांति से जुड़ी कई अन्य कथाएं हैं। इन कथाओं का उद्देश्य लोगों को धर्म और संस्कृति से जोड़ना है।