Mahakavya Ki Vela (Hindi Nibandh) : Ramdhari Singh Dinkar

महाकाव्य की वेला : रामधारी सिंह 'दिनकर'

कविगुरु रवीन्द्रनाथ ने लगभग दो हजार गीत और असंख्य कविताएँ लिखीं, किन्तु महाकाव्य उन्होंने एक भी नहीं लिखा। महाकाव्य तभी लिखा जाता है जबकि युग की अनेक विचारधाराएँ वेग से बहती हुई किसी महासमुद्र में मिलना चाहती हैं। जब ऐसी अनेक धाराएँ वेगवन्त प्रवाह में होती हैं, तभी महाकाव्य की रचना का समय आता है और जो कवि उनके महामिलन के लिए सागर का निर्माण कर सकता है, वही महाकाव्य लिखने का अधिकारी होता है। महाकाव्य की रचना मनुष्य को विकल करनेवाली अनेक भाव–धाराओं के बीच सामंजस्य लाने का प्रयास है। महाकाव्य की रचना समय के परस्पर–विरोधी प्रश्नों के समाधान की चेष्टा है। जब परम्परा से आनेवाले महान प्रश्नों और भावों की अनुभूति में परिवर्तन होता है, तब मनुष्य का संस्कार भी परिवर्तित होने लगता है तथा इस परिवर्तित संस्कार को चित्रित करने के लिए ही महाकाव्य लिखे जाते हैं। विश्व के महाकाव्य मनुष्यता की प्रगति के मार्ग में मील के पत्थरों के समान होते हैंय वे व्यंजित करते हैं कि मनुष्य किस युग में कहाँ तक प्रगति कर सका है।

किन्तु यह लक्षण जिन महाकाव्यों में घटित होते हैं, उनकी संख्या अधिक नहीं है। इलियड, एनिड, ओडेसी और डिवाइन कामेडी–ये पश्चिम के कुछ प्रसिद्ध महाकाव्य हैं। इसी प्रकार, प्राचीन भारत में जिन महाकाव्यों का निर्माण हुआ, उनमें रामायण और महाभारत प्रधान हैं। जो काम पहले महाकाव्य करते थे, वही काम बाद को नाटकों और उपन्यासों के द्वारा किया जाने लगा। अतएव, हम देखते हैं कि बाद के साहित्य में बहुत–से नाटककार और औपन्यासिक ऐसे हुए, जो अगर कवि हुए होते, तो उनका स्थान रामायण और महाभारत, इलियड और ओडेसी के रचयिताओं के ही समकक्ष होता। नाटककार इब्सेन और बर्नार्ड शॉ, उपन्यास लेखक रोम्याँ–रोलाँ और गोर्की–इनमें से प्रत्येक ने अपने समय की महान समस्याओं के भीतर पैठकर उनका निदान खोजने की कोशिश की है और प्रत्येक ने अपने क्षेत्र में वही काम किया है, जो महाकाव्यों के द्वारा कवि किया करते थे। जर्मन कवि गेटे और जर्मन दार्शनिक नीत्शे की रचनाओं में भी हम महाकाव्य की ही झाँकी पाते हैं।

न जाने रवीन्द्रनाथ ने महाकाव्य क्यों नहीं लिखा! अगर उनकी प्रतिभा महाकाव्य की ओर प्रेरित हुई होती, तो अवश्य ही वे संसार को कोई ऐसी रचना दे जाते, जिसके सहारे हम अपने समय की अनन्त समस्याओं के बीच समीचीन सामंजस्य बिठा सकते थे। रवि बाबू ने चुन–चुनकर मनोहारी पुष्पों पर अपनी प्रतिभा की शबनम बरसाई! अगर उन्होंने महाकाव्य लिखा होता, तो वे शीतल जल से पूर्ण एक ऐसा जलाशय भी छोड़ जाते, जो सूखना नहीं जानता और जिसके घाट पर अनेक युगों के लोग अपनी प्यास बुझा सकते थे। अनेक युगों की आत्माओं की तृप्ति के लिए रवि बाबू यथेष्ट जल छोड़ गए हैं। किन्तु वह शबनम के रूप में फूलों की पत्तियों पर विकीर्ण है और यह शबनम कभी सूखेगी भी नहीं। किन्तु शबनम के लिए फूल–फूल पर घूमते फिरना एक बात है और प्यासे को एक सरोवर की ओर संकेत कर देना बिलकुल दूसरी बात।

तो भी ऐसा लगता है कि रवि बाबू ने जो अपने युग को, महाकाव्य को प्रेरित करनेवाले गुणों से रहित समझा, उसका कारण यह था कि वे 19वीं सदी में पैदा हुए थे और, यद्यपि, वे बीसवीं सदी के, प्राय:, पूर्वार्द्ध तक लिखते रहे, फिर भी उनकी मुद्रा 19वीं सदी की ही रही और जिन उपादानों का उन्होंने अपने यौवन–काल में संचय किया था, वे उपादान उनकी दृष्टि में अन्त तक मूल्यवान बने रहे!

यह भी सत्य है कि जिन प्रश्नों और समस्याओं के कारण, आज की मानवता विकल दीख रही है, वे 19वीं सदी में, बीज–रूप में ही परिलक्षित होती थीं और उनका अतिविकास वर्तमान शताब्दी में ही सम्भव हो सका है। किन्तु रवीन्द्रनाथ अपने यौवन–काल में जिस मनोदशा का निर्माण कर चुके थे, वह मनोदशा इन समस्याओं की विकरालता को स्वीकार नहीं कर सकती थी। अतएव वे अन्त तक अपने उसी मानस–जगत में धैर्य के साथ विराजमान रहे, जो उन्हें 19वीं सदी के हाथों प्राप्त हुआ था।

विशेषत:, भारत में उन्नीसवीं शताब्दी बौद्धिक तृप्ति की शताब्दी थी और कर्म के साथ उसका उचित संयोग नहीं था। यह ठीक है कि राममोहन राय और दयानन्द तथा रामकृष्ण और विवेकानन्द के व्यक्तित्व में हम एक नवजागरण की आभा पाते हैं। किन्तु यह आभा हमारे मन को जो कुछ दिखलाती है, वह प्रधानत:, धर्म और भक्ति का श्रृंग है, वह आत्मा की उपासना का मन्दिर और हृदय की आकुल भावनाओं का ताल है, जिस पर छाए हुए सेंवार को ये महात्मा दूर करने की कोशिश करते हैं। कर्म की प्रेरणा और लोगों की अपेक्षा विवेकानन्द की वाणी में कुछ अधिक थी। किन्तु देश के सामने पराधीनता की समस्या इतनी प्रचंड होकर खड़ी थी कि हम विवेकानन्द से जो स्फूर्ति प्राप्त कर सके, वह सीधे स्वातन्त्र्य–संग्राम में जा लगी और हम उन अनन्त समस्याओं को नहीं देख सके, जो पहले से ही विद्यमान थीं और जो भारतवर्ष को स्वतंत्रता–प्राप्ति के बाद भी विकल कर रही हैं।

एक दृष्टि से देखा जाए, तो स्वातन्त्र्य–संग्राम के दिनों में, भारत में सचमुच ही महाकाव्य की रचना नहीं की जा सकती थीय क्योंकि पराधीनता की समस्या के सामने और सारी समस्याएँ गौण एवं अप्रमुख हो गई थीं। लोगों के सामने केवल एक ही दीवार थी, जिस पर वे अहर्निश प्रहार करते थे। लेकिन समस्याएँ जब दिखलाई नहीं पड़ती हैं, तब भी उनका दंश तो हमें भोगना ही पड़ता है। और सच ही उनके दंशों का अनुभव हम भी करते थे, किन्तु हमारा भाव यह था कि गुलामी की दीवार ही इन दु:खों का असली मूल है और यह दीवार टूटी नहीं कि सारी मुसीबतें काफूर हो जाएँगी।

इन अनेक विपत्तियों की अनुभूति रवीन्द्रनाथ को हुई थी और उन्होंने ‘ए बार फिराओ मोरे’ नामक अपनी एक स्फुट कविता में उन विपत्तियों की ओर संकेत भी किया था :

कवि, तबे उठे एसो, यदि थाके प्राण,
तबे ताई लहो साथे, तबे ताई कोरो आजि दान।
बड़ो दुख, बड़ो व्यथा, सम्मुखेते कष्टेर संसार,
बड़ोई दरिद्र, शून्य, बड़ो क्षुद्र, बद्ध अन्धकार।
अन्न चाहे, प्राण चाई, आलो चाई, चाई मुक्त वायु,
चाई बल, चाई स्वास्थ्य, आनन्द–उज्ज्वल परमायु।
साहस–विस्तृत वक्षपट, एई दैन्य माझारे कवि,
एक बार निये एसो स्वर्ग होते विश्वासेर छवि।

‘कवि, यदि तुममें प्राण है, तो उठो, उसे साथ लेकर चलो और उसका आज दान करो। इस संसार में बड़े ही दु:ख हैं, बड़ी व्यथाएँ हैं, बड़ी गरीबी है। हाय, यह तो बड़ा शून्य है, बड़ा छोटा है, बड़ा अन्धकार है। अन्न चाहिए, प्राण चाहिए, रोशनी चाहिए, खुली हवा चाहिए, शक्ति चाहिए, स्वास्थ्य चाहिए, आनन्द से उज्ज्वल आयु चाहिए और साहस से विस्तृत हृदय चाहिए। हे कवि! इस दीनता में एक बार स्वर्ग से विश्वास तो ले आओ’ (मन्मथनाथ गुप्त कृत अनुवाद से)।

किन्तु, जहाँ विश्व की अगणित कुरूप पीड़ाएँ, उन्हें इस रूप में ललकार रही थीं, वहाँ उनके हृदय के निभृत कोने में एक प्रबल आध्यात्मिक विश्वास भी आसन जमाए बैठा था, जो उनके भीतर के मनुष्य को समाज की उलझनों से दूर रखकर वैयक्तिक मुक्ति की साधना के लिए तैयार कर रहा था :

विश्व यदि चले जाय काँदिते–काँदिते,
एका आमि बसे रबो मुक्ति–समाधिते।

कभी–कभी मुझे ऐसा मालूम होता है कि रवीन्द्रनाथ ने अगर बीसवीं सदी में जन्म लिया होता और जिन पीड़ाओं की ओर उन्होंने ‘ए बार फिराओ मोरे’ में संकेत किया है, उनकी अनुभूति में उन्नीसवीं सदी की ज्ञानप्रधान आध्यात्मिक मुद्रा उनकी सहायक या बाधक नहीं हुई होती, तो वे युग की समस्याओं को अचिर मानकर, उनकी ओर से मुँह नहीं फेर लेते। तब वे, शायद, इन समस्याओं के व्यूह में घुसकर वह करतब दिखाते, जो इब्सेन और शॉ, रोम्याँ–रोलाँ और गोर्की में से कोई भी नहीं दिखला सका हैय क्योंकि कविता मनुष्य के हृदय को जिस सुगमता से पकड़ सकती है, उस सुगमता से आदमी को और कोई भी साहित्य नहीं पकड़ सकता। अगर परस्पर–विरोधी भावों का आक्रमण कवि को महाकाव्य लिखने की प्रेरणा दे सकता है, तो उसका समय आज है। अगर महाकाव्य की रचना का समय, वह युग होता है, जबकि प्रश्नों की विभिन्न धाराएँ अपना समाधान पाने के लिए किसी समुद्र की खोज में वेग से दौड़ती होती हैं, तो वह समय आज ही आया हुआ है।

मनुष्य ने आध्यात्मिकता को निस्सार समझकर जड़ता को जोर से पकड़ा और एक बार उसके मुँह से आनन्द की किलकारी भी निकली कि पहले जिन हाथों में हवा और शून्य ही आ पाते थे, अबकि उनकी पकड़ में एक ठोस चीज आ गई है। मगर यह किलकारी देर तक नहीं ठहरी। उसने हाथ में आई हुई चीज के घनत्व को तो समझा, किन्तु उसे निर्जीव देखकर दूसरे ही क्षण उसका चेहरा उतर गया। मनुष्य ने हृदय की राह पर चलते–चलते थककर मस्तिष्क की राह पकड़ी और यह सोचने लगा कि इस रास्ते से वह जहाँ चाहे, वहाँ जा सकता है। पानी के नीचे, आकाश के अन्तराल और पहाड़ की खोह में वह बड़ी ही वीरता से चलता रहा और ज्यों–ज्यों प्रकृति उसके सामने पराजित होती गई, त्यों–त्यों उसका अहंकार बढ़ता गया, यहाँ तक कि आज वह यह भी सोचने लगा है कि इस सृष्टि को वह चाहे तो सिर्फ सात दिनों में बर्बाद कर सकता है। तो साफ बात यह है कि विज्ञान का उपयोग वह उन त्रासों को बढ़ाने के लिए करना चाहता है, जो त्रास अनन्त काल से संसार को सता रहे हैं। विज्ञान का उपयोग वह दूसरों को काटने के लिए करना चाहता है, किन्तु मन–ही–मन उसे यह भय भी लगा हुआ है कि विज्ञान की तलवार की धार एक ही नहीं, दोनों ओर है और उससे काटनेवाले का अंग भी मजे में कट सकता है। क्या बात है कि मनुष्य प्रत्येक कार्य का आरम्भ तो सदुद्देश्य से करता है, किन्तु परिणाम उसके दुखदायी हो रहे हैं? जीवन पर विजय पाने के प्रयास में, मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो रहा है, विश्व को सजाने की कोशिश में वह इसे और भी कुरूप बनाये जा रहा है तथा सत्य की समीपता की प्राप्ति के प्रयत्न में, वह उससे और भी दूर पड़ता जा रहा है? गांधी जी ने जीवनभर अहिंसा का उपदेश दियाय किन्तु मरने के पहले उन्होंने यह देख लिया कि आजीवन अगर वे लोगों को हिंसा भी सिखलाते रहते, तब भी लोग, शायद, इतनी घोर और इस नीच ढंग की हिंसा नहीं कर सकते थे। मार्क्स ने आधिभौतिकता की उपासना के द्वारा मनुष्यों को सुखी बनाने का उपदेश दिया था, किन्तु उनके मार्ग पर किए जानेवाले इतने बड़े प्रयोग के पास खड़ा होकर भी मनुष्य यह सोच रहा है कि आत्मा की सर्वथा उपेक्षा करना ठीक है, या नहीं। जीवन में कितना आकाश चाहिए और कितनी मिट्टी, कितना जल चाहिए और कितनी आग, तथा कितने फूल चाहिए और कितने पत्थर–यह समस्या केवल बौद्धिक नहीं रहकर प्रखर रूप से सत्य हो उठी है और वह अनेक रूपों में मानव–मस्तिष्क को झकझोर रही है। यह संस्कृति के बदलने का समय है। यह परम्पराओं के परिवर्तन की वेला है। पुरानी दीवार हिल रही है, पुराने प्राचीर धराशायी हो रहे हैं। क्षितिज के किनारे–किनारे एक लाल डोरी–सी दीख रही है, जिससे मालूम होता है कि आकाश का पुराना छिलका उखड़ रहा है और नीचे से एक नया–ताजा आकाश बढ़ता हुआ ऊपर जा रहा है। यह आकाश के भीतर से एक नये आकाश के निकलने की सूचना है। संसार में जो भी कोलाहल है, वह नवीन और पुरातन के संघर्ष की आवाज है। संसार में जो भी भीषिकाएँ हैं, वे मरणशील युग की मृत्यु के प्रतीक हैं और धरती जिन वेदनाओं से होकर गुजर रही है, वे नये विश्व के जन्म की वेदनाएँ हैं।

क्या महाकाव्य के लिए इससे भी और उपयुक्त समय चाहिए और क्या प्राचीन एवं मध्यकालीन नाटकों तथा महाकाव्यों में हम मानव–चरित्र के भीतर जिस द्वन्द्व एवं संघर्ष का प्रतिबिम्ब देखते हैं, वह आज के व्यक्ति एवं समाज में कुछ कम है? मनुष्य आज जिन शंकाओं और द्वन्द्वों से ग्रस्त है, उन्हें अगर वह काव्य के किसी एक ही दर्पण–खंड में देख पाए तो वह स्वयं चीत्कार कर उठेगा।

('अर्धनारीश्वर' पुस्तक से)

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