लूट का पैसा (कोंकणी कहानी) : अभयकुमार वेलींगकार

Loot Ka Paisa (Konkani Story in Hindi) : Abhaykumar Velingkar

"देख लूँगा, देख लूँगा आज कैसे नहीं देता! बदमाश कहीं का! सब कुछ खाना चाहता है ? मुझे ठगना चाहता है ! देखूँगा कैसे ठगता है वह ! बच्चू को बरबाद न कर दिया तो मेरा नाम नहीं।"

विजू बड़बड़ाता हुआ चला जा रहा था। उसका मुंह और उसकी आँखें देखकर यह साफ जाहिर होता था कि उसने बहुत पी ली है। लोगों के लिए यह रोज की बात थी, इसलिए कोई उसके बड़बड़ाने पर ध्यान नहीं देता था। बल्कि कुछ लोग उस पर तरस खाते । कुछ आग में तेल डालने वाले थे, तो कुछ यहाँ तक कहते थे कि उसके साथ जो कुछ हुआ वह उचित ही है। बाप करता है पाप, पूत देता है हिसाब । लोगों को लूटकर, उन्हें रुलाकर बच्चों को बड़ा किया-अब खुद रोता है।

जैसी करनी वैसी भरनी ! ऐसा ही लोग उनके साथ व्यवहार करते थे । परन्तु जो नये लोग गांव में आते वे बेचारे उस पर तरस खाते; कहते-बाप के पापों का प्रायश्चित्त बच्चे करें यह कहाँ तक ठीक है ? कितना अच्छा लड़का था! उस पर यह भूत क्यों सवार हुआ, मालूम नहीं पड़ता। और जो लोग निकट से देखते थे वे कह उठते-यह लूट का पैसा है! इसी तरह जाएगा! शराब-खाने या वेश्या-घर में!

सचमुच कितना अच्छा लड़का था विजू ! सर्वगुण सम्पन्न । बी० ए० पास । बड़ी अच्छी फर्म में नौकरी थी। महीने बाद हजार-डेढ़ हजार घर में लाता और खुशी की जिन्दगी जीता। वह सारा परिवार सुख-चैन की जिन्दगी बिताता था। उनके पिताजी घर के और गाँव के मुखिया थे। सारा गाँव उनको 'बाबा' कहता था। वे 'पैसेवाले' थे; दरवाजे पर गाड़ी थी। अगर एक वाक्य में कहना हो तो कहूँगा कि लक्ष्मी उनके घर में पानी भरती थी।

बाबा के दो पुत्र थे। बड़ा गोपू और छोटा विजू । ना-ना कहते-कहते भी एक लड़की भी पैदा हुई थी-रति । रति सबकी प्यारी थी। थोड़ी-सी तिरछी नज़र परन्तु वह चश्मे की आड़ में छिप जाती थी। बाबा की घरवाली हीराबाई सबको भाती थी, बिलकुल 'हीरा' जैसी सुन्दर ।

दैवयोग से समय ने पलटा खाया। रास्ता चलते रति को एक गाड़ी ने धक्का दे गिराया और उसके दोनों पाँव बेकार हो गए। एक साल से रति घर में पड़ी रहती है। बड़ा गोपू घर-जायदाद सब हड़प करके बैठा था। बाप को घर में मिलता था सिर्फ दो जून का भोजन और सोने के लिए एक बिछौना। इससे अधिक बाबा घर के काम-काज में दखल दें, यह गोपू बरदाश्त नहीं करता था। जो हालत बाबा की थी वही हीराबाई की थी। गोपू ने एक औरत घर में लाकर रखी थी।

वह घर में सब पर अपना अधिकार जमाए थी। वैसे वह औरत हिम्मतवाली मानी जानी चाहिए क्योंकि उसने एक पति को त्याग दिया था और अब दूसरा पति किया था। पर विजू के सामने गोपू की एक नहीं चलती थी। वह घर में आता और आते ही वह सबके मां-बाप का उद्धार कर पैसे की मांग करता। वह कुसंगति में फंसकर शराब भी पीने लगा था। सारा दिन वह शराबखाने में पड़ा रहता था। यही कारण था कि उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। गोपू ने प्रण किया था कि आज विजू चाहे जितना भी ऊधम मचाए वह उसे एक भी पैसा नहीं देगा।

"मुझे धोखा देता है ? तेरी...तुझे इस तरह नहीं छोड़ूँगा। वह रंडी घर में लाकर रखी है, और सारा पैसा उसे खिला रहा है ? बदमाश कहीं का! मैं निपट लूंगा तुझसे ! देखूँगा तू कैसा आदमी है ! मैं कहे देता हूँ, मैं तुझे इस तरह नहीं छोडूंगा।"
इस गर्जना से सबको सूचना मिलती थी कि विजू घर पहुंच गया है।

ऐसे अवसर पर सड़क पर से गुजरनेवाले लोग इस भावना से बाबा के घर के सामने रुक जाते थे कि अब मजा देखने को मिलेगा।
विजू घर में आ गया। बरामदा लांघकर उसने हॉल में प्रवेश किया।

"गोपू ! गोपू !! कहाँ गया? अभी तक आया नहीं बाहर? उस रंडी के पास बैठा होगा। हेऽऽ गोपू, सुन कान खोलकर सुन ले! तूने सीधी तरह अगर मुझे मेरा हिस्सा नहीं दिया, तो कहे देता हूँ तुझे मैं आसानी से नहीं छोड़ूँगा। अदालत में खींचूंगा। हाँ, कहे देता हूँ।"
गोपू ने सोचा था, आज उसके मुंह नहीं लगेगा और उसे पैसे भी नहीं देगा, इसलिए वह अपने कमरे में जा बैठा था। विजू की बातें सुनकर उससे रहा नहीं गया। वह उठकर कमरे के बाहर आया।

"अब कैसे आया? अदालत का नाम लेते ही, देखो, कैसे डर गया ! पैसे निकाल, जल्दी ! मुझे देर हो रही है।" विजू ने कहा।

उसके ये शब्द सुनकर गोपू लाल हो गया। वह समझ गया कि विज् को भी कोई गुरु मिल गया है। गोपू ने समझाने के स्वर में कहा, "देखो विजू, तुझे हिस्सा ही चाहिए न? वह भी दूंगा। पर उसके लिए लड़ना-झगड़ना क्यों ? हमें अदालत क्यों जाना चाहिए? तुझे पैसे क्यों चाहिएँ ? शराब पीने के लिए ही न? देखो, अगर मैं तुझे तेरा हिस्सा दे दूंगा, तो वे तेरे शराबी दोस्त तुझे दो दिनों में भिखारी बना देंगे । इसलिए कहता हूँ तुझे जो पैसा चाहिए बह मुझसे ले लिया कर। अगर हिस्सा चाहता है, तो पहले यह पीना छोड़ दे।"

विजू अच्छी तरह समझ गया था कि मीठी बातें करके वह उसे धोखा देना चाहता है। इसलिए उसने कहा, "गोपू, कहे देता हूँ मुझे मेरा हिस्सा नहीं दिया तो बहुत बुरा होगा। तेरी मीठी-मीठी बातों से मैं चुप नहीं रहूँगा। मुकदमा दायर करूँगा, मुकदमा ! अदालत में न जाऊँ तो बाप का बेटा नहीं कहलाऊँगा।"

अब गोपू चुप नहीं रह सका। उसका भी पारा चढ़ गया-"बड़ा आया है मुकदमा लड़नेवाला ! जा, कुछ नहीं मिलेगा तुझे ! इस घर में जो कुछ पिताजी का कमाया हुआ है वह क्या शराब और वेश्याओं में उड़ाने के लिए है ?"

"तू क्या सोचता है, सब तेरी रंडी के लिए है ?" विजू की आवाज अब चढ़ गई, “कहता है पिताजी ने कमाया है ! लोगों को लूटकर, धोखा देकर ही तो कमाया है न ? एक को ठगो, दूसरे पर मुकदमा चलाओ । सब लूट का पैसा है । इसी तरह खर्च होगा। नहीं तो करना क्या है उसका? सत्य नारायण की पूजा करनी है या मन्दिर बनवाने हैं? एक बात पूछूँ-मेरी रखैल की बात करता है तू? तूने क्या किया? मैंने शादीशुदा औरत को धंधा करना नहीं सिखाया, समझा?"
अब गोपू का मुंह खुल गया।

"मुकदमे लड़ने का पिताजी का स्वभाव अपना लिया है न तूने, तो उनका दूसरा स्वभाव मैंने अपना लिया है। फिर क्या बात है ? पिताजी ने भी कई औरतों को धंधे में लगाया था। शायद मालूम नहीं तुझे।"

दोनों इसी तरह लड़ रहे थे और बाबा अन्दर कमरे में बैठकर सब-कुछ सुन रहे थे। अपने ही बेटे ने उन्हें धोखेबाज़ कहा इस बात पर उन्हें अधिक दुःख हुआ। अब वे जान गए थे कि उसके लड़के उसके वश में नहीं रहे हैं और न आगे रहेंगे। एक बार जो हाथ से गया सो गया। वे समझ गए–साँप चला गया, लकीर को पीटने में क्या है!-किन्तु जीते-जी इस तरह की बातें अपने बेटों के मुंह से सुननी पड़ेंगी यह उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था। अपने बेटे उनको धोखेबाज, बदतमीज के रूप में देखते हैं यह सुनकर उन्हें असाधारण पीड़ा हुई।

उन्हें अपने किये सब बुरे काम याद आने लगे। अपने कुकर्मों का फल इसी जनम में मिलता है यह देखकर उनका हृदय अन्दर-ही-अन्दर रोने लगा। उनके सारे कुकर्म आँखों के सामने से चलचित्र की तरह गुजरने लगे। वे सोचने लगे कि किस तरह उन्होंने लोगों को ठगा था। उन्हें ऐसा आभास हुआ कि उनका अन्त निकट आ गया है और शायद इसीलिए ये बीती बातें याद आ रही हैं। बाबा ने अपने आजूबाजू में नजर डाली। "शेवतें!" उनके मुंह से अचानक ये शब्द निकले।

"हाँ बाबा, मैं ही हूँ!" शेवतें की ध्वनि उन्हें स्पष्ट सुनाई दी।
"बाबा, मेरी जमीन के कागज देते हो न?"
"आँऽऽ!" उनका मुंह खुला ही रहा।

शेवतें के कागज! -शेवतें के पति के अन्तिम संस्कार के समय उन्होंने उसको पचास रुपये दिये थे और उसके बदले में उसकी जमीन के कागज गिरवी रख लिये थे। बेचारी गरीब शेवतें ने लोगों के घर झाड़-बुहारी का काम कर-कर ब्याजसहित उनके पैसे लौटा दिये । पचास की जगह डेढ़ सौ रुपये चुकाये। परन्तु बाबा ने उसके कागज वापस नहीं दिये। शेवतें के पति की वही तो जिन्दगी-भर की कमाई थी। मरते समय तक शेवतें ने बाबा और जमीन के कागजों की रट लगाए रखी थी, और अन्त में बाबा को गालियाँ दे-देकर अपने प्राण त्याग दिये थे।

"शेवतें, मुझे माफ करो!" बाबा के मुंह से शब्द निकले। पर वहाँ शेवतें कहाँ थी? बाबा ने मन-ही-मन निश्चय किया कि अपने बेटे गोपू को सोया हुआ देखकर शेवतें के कागज हस्तगत कर लूं और शेवतें के बेटे को दे डालूं । अपने ही घर में उसे चोरी करनी पड़ेगी यह सोचकर उसे रोना आया। आँखों में आंसू उमड़ आये। आँसुओं में से दिखाई दिया चिटणीस।

अंधा चिटणीस एक समय धनी आदमी था। परन्तु कमनसीब था। बाबा को याद आया कि उन्होंने उसे किस तरह दरिद्र बनाया। कोरे कागज़ पर उसके हस्ताक्षर करवा लिये और उसकी सारी जायदाद अपने नाम करवा डाली। ऊपर से उसे उधार दिया। दिये पचास, लिखे पाँच सौ। उसका शेष मकान भी नीलाम करा लिया। चिटणीस की गालियाँ उसे अब सुनाई देने लगी थीं--"तुम मेरी तरह अंधे होकर मरोगे! तुम्हें अपने कु-कर्मों पर पश्चात्ताप करते-करते मरना होगा!" बाबा को लगा चिटणीस के शब्द सच हो जाएंगे।

बाबा अपने आंसू अपनी धोती के छोर से पोंछता है और उसे याद आती है देऊ घाडी की। देऊ घाडी कुनबी जाति का था। कठोर परिश्रम करके उसने साहूकार मालिक से थोड़ी-सी जमीन प्राप्त की और उसमें मकान बनवाया। मकान बनवाते समय लकड़ी लाने के लिए देऊ घाडी ने बाबा से दो सौ रुपये कर्ज के तौर पर लिये । कर्ज यह कहकर लिया कि फसल के समय सारे पैसे चुका दूंगा। लेकिन बाबा ने फसल होने के पहले ही उसका मकान नीलाम करा डाला; जमीन अपने नाम करा ली।

हाहाकार करते पिचानवे साल के देऊ घाडी की हृदयगति रुकने से मृत्यु हो गई।

नंदा शण और बाबा की भाई-भाई जैसी दोस्ती थी। एक थाली में दोनों खाते परन्तु अपने इस जानी दोस्त को भी बाबा ने चकमा देने में आगा-पीछा नहीं देखा। परन्तु उस समय बाबा को बहुत तकलीफ हुई जब शण ने बाबा को उलटा पाठ पढ़ा दिया। उसने पेट काटकर मुकदमा लड़ा। बाबा को पहली बार धक्का सहना पड़ा। अदालत ने निर्णय शण के हक में दिया। लोगों को धोखा देने के लिए बाबा ने अपनी जायदाद अपने बड़े बेटे गोपू के नाम कर दी और यही उनकी गलती हुई। गोपू ने बाबा को अलग कर दिया और इस तरह उन्हें उनकी करनी का फल चखाया।

बाबा को यद्यपि लोग 'बाबा' कहते थे तो भी वे 'टोपी' के नाम से विशेष रूप से मशहूर थे। बाबा की पोशाक भी उनके नाम के अनुरूप थी-सफेद धोती, सफेद कमीज और सफेद टोपी। बाबा जब बाहर जाते तो यही सोचकर निकलते कि आज किसकी टोपी उतार डालें। और जब लौटते तो किसी का जमीन-जुमला या किसी की गोशाला नीलाम करवाके ही लौटते।

बाबा ने जिनके लिए यह सब किया वे ही आज उन्हें धोखेबाज, चोर और न जाने क्या-क्या कहने लगे हैं, यह देखकर उन्हें बुरा क्यों नहीं लगेगा?

"हाय मेरी मां...!" बाबा चिल्ला उठे। बाहर आपस में लड़ने वाले दोनों बेटे, लँगड़ी बेटी और घरवाली हीराबाई, सब दौड़कर कमरे में आये। देखते क्या हैं बाबा सोफे पर गिर पड़े हैं।
उनके शरीर का दायाँ हिस्सा लूला पड़ गया था।

"क्या हुआ "आँ ?" हीराबाई ने पूछा।

"मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है । रोशनी जलाओ !" बाबा ने अस्पष्ट वाणी में कहा।
हीराबाई मन-ही-मन सहम गई। वह समझ गई कि बाबा को लकवा मार गया है। पर यह वह नहीं समझी कि दीखता क्यों नहीं? किन्तु बाबा समझ गए कि यह लोगों की गालियों का प्रताप है।

"कोई तो डॉक्टर को बुलाओ!" रति चिल्ला उठी। "मर जाओ..!" यह कहते हुए विज ने बाबा के गले की चेन झपट ली।

हीराबाई उसे रोकने लगी तो उसे ढकेलकर विजू बाहर की तरफ निकल गया।
गोपू ने देखा–बाबा की देह पर और कुछ बाकी नहीं रहा है।

"लकवा है। यहाँ रहने से कोई फायदा नहीं।” यह कहते हुए वह भी वहां से खिसक लिया।
अब वहाँ थे केवल हीराबाई और दुःखी पीड़ित बाबा।

(अनुवाद : मोहनदास सो० सुर्लकर)