लॉकडाउन की कृपा, एक और विदेश की यात्रा (यात्रा वृत्तान्त) : मंगला रामचंद्रन
Lockdown Ki Kripa, Ek Aur Videsh Yatra (Travelogue in Hindi) : Mangala Ramachandran
एमिरेटस् की उड़ान में हवाई जहाज का रंग-रूप और परिचारिकाओं की वर्दी का रंग आदि लुफ्तानज़ा से अलग होगा ये तो समझी हुई बात थी। पर समानता तो दोनों की परिचारिकाओं में नज़र आई। इन्हें ट्रेनिंग के दौरान परिचर्या का अर्थ इस तरह दिमाग में बिठा दिया जाता होगा कि नींद-बेहोशी की हालत में भी इसे भूलती नहीं होंगी। यात्रियों की सुख सुविधा का ध्यान रखने के लिए इधर से उधर आती जाती, अति महत्वपूर्ण कर्तव्य निभाती हुई, चेहरे पर वही सहज सी पसरी मुस्कान। उड़ान में पूरी रात बैठना था वो भी बिना मास्क हटाये। मेरे पास की सीट खाली थी सो हत्थे को ऊपर कर के आराम से बैठ गई। रात दस बजे की उड़ान को बारह घंटे बाद, अगली सुबह ठीक दस बजे पहुँचना चाहियें। इस हिसाब से दुबई में एकदम उजाला, चिलचिलाती धूप होनी चाहिये। मुझे बच्चों ने समझा दिया था कि टाईम ज़ोन बदल जाने से तुम शाम के करीब सात बजे पहुँचोगी। बीच के लगभग नौ घंटे कहां गायब हो गये वो कभी समझ ही नहीं पाई। किसी तरह समझ भी लूँ तो कौन सा तीर मारने वाली थी।
उड़ान तो एक रैन बसेरा था, रात का समय खत्म हो सुबह यात्री अपने ठौर पहुँच जाये। ये बात कुछ अजीब हो गई कि रात्रि की समाप्ति पर दूसरी रात प्रारंभ हो जाती है। सोच कर मज़ा भी आया। सहयात्री पाकिस्तान, भारत के विभिन्न प्रदेशों के, और विदेशी इतनी तरह के जिनका बारीकी से अध्ययन ना करें तो पता ही ना चले कि किस देश के हैं। आसानी के लिए सबकों हम एक शब्द में विदेशी कह देते हैं। पर भारत के विभिन्न प्रदेशों में ही अंतर स्पष्ट दिखता है तो सिर्फ भारतीय कहना पर्याप्त नहीं लगता। सोचने पर ये भी मज़ेदार उक्ति लगी।
साधारणतया रात में प्लेन में शांति और सन्नाटा ही होता है। लोग जगे हुए भी हों तो एक दूसरे को देख लेंगें, यदा कदा मुस्कुरा भी देंगें। बच्चे फ्लाईट में हों तो अचानक रोने की आवाज़ या पानी की बोतल खोलने-बंद करने की आवाज़ सन्नाटे को चीरती हुई सुनाई देती। इसके अलावा देर रात कुछ खाने और ठंडा-गर्म पेय पीने के लिए परिचारिका से बोलने, लाने और खाने-पीने की थोड़ी हलचल होती। फिर उसके बाद जस का तस। पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। मेरे ठीक पीछे बैठी एक विवाहित युवती और एक अधेड़ स्त्री इतना बहनापा हो गया कि वो आस-पास का भूल कर अपने-अपने परिवार की कुंडली बांचने लगी। बीच-बीच में उन दोनों की आवाज़ें काफी जोर से हो जाती और जब कोई यात्री या परिचारिका उनकी ओर देखती तब होश आता कि वो हैं कहां।
अनायास ही एक पुरानी याद ताज़ा हो गई। उन दिनों ना मॉल थे न मल्टी पैल्क्स थियेटर और ना इतना खुलापन। नव विवाहित और कुछ ऐसे दम्पति जिनके दो-एक बच्चे भी हो गये होंगें, सिनेमा हॉल मात्र फिल्म देखने नहीं आते थे।
घर में हमेशा बुजुर्ग माता-पिता और अन्य सदस्यों के द्वारा घिरे रहने के कारण आवश्यक बातें भी एक-दूसरे से साझा नहीं कर पातें। कभी कभाध मौका मिलता तो सिनेमा हॉल में धीमे स्वरों में विवाद सुलझाते या एक दूसरे को संदेश सम्प्रेषित कर के कुछ तनाव कम कर पाते। इन हालातों में एक फिल्म पर्दे पर सामने चल रही होती और अनेकों उसके सामने की सीटों पर।
खैर रात बीत रही थी और सुबह का ब्रेकफास्ट जब दिया गया तब नींद पूरी हो जानी थी। पर नींद का कोई एहसास ही नहीं हुआ कि रात को सोये थे। चंद घंटों बाद तो यू ए ई पहुँचने वाले थे। यूनाइटेड अरब एमिरेटस (यू ए ई) अरब प्राय; द्वीप के दक्षिण पूर्व में है। दिसंबर 1971 में छ; अमीरात अबू धाबी, दुबई, शारजाह, अजमान, उमम् अल खूवैन और फुजैरा को मिलाकर यूनाइटेड अरब-अमीरात् बना। 1972 में सातवां अमीरात रस अल खैमाह भी शामिल हो गया। इन सबकी राजधानी है अबूधाबी, जो कि सातों में सबसे बड़ा और सबसे अमीर है।
दुबई में प्लेन उतरा और मुझे उतरने की इसलिए जल्दी नहीं थी कि मेरे लिए व्हील चेयर आ रहा था और बाकी लोगों को उतरने की जल्दी थी। प्लेन से निकली तो व्हील चेयर वाले बंदे का हँसमुख चेहरा देख कर लगा मानों वो मुझे पहचानता हो। छूटते ही उसने मलयाली भाषा में बात करना शुरू कर दिया।
जब मैंने कहा मुझे मलयाली नहीं आती, तमिल-भाषी हूँ तो तमिल का परिचय भी दे दिया। कैनेडा से लेकर आई कोविद-टेस्ट की निगेटिव रिपोर्ट, कोविद क्वारेनटाईन डिक्लेरेशन फार्म आदि सौंप कर कनवेयर बेल्ट से बैगेज उठाना था। तब तक बाहर इंतजार कर रही बेटी चंद्रिका ने फोन से संपर्क कर लिया था। इससे व्हील चेयर वाला इस कदर खुश हो गया मानों मेरी जिम्मेदारी उसके सिर पर लदे भार की तरह हो। उसको ‘ईनाम’ देने के लिए मेरे पास दुबई का दिरहम तो था नहीं। मैंने उससे पूछा कि वो डॉलर ले लेगा ना, तो दांत दिखा दिए। अनिरूद्ध ने मुझे कैनेडा के छोटे से लेकर बड़े तक हर मूल्य वर्ग की करेन्सी दे रखी थी। कहीं पानी-चाय या जरूरत पड़े तो उस हिसाब से उनका उपयोग कर सकूँ। मन ही मन ही मन अपने भारतीय रूपये और कैनेडियन डॉलर के बीच के मूल्य का हिसाब लगा रही थी। मुझे अधिक माथापच्ची नहीं करना पड़ी बाहर निकलते ही बेटी तैयार ही खड़ी थी। मैं उसे पर्स में से डॉलर निकाल कर दूँ तब तक उसने उसकी मुट्ठी दिरहम से भर दी। जी हां भर ही दी होगी, उस बंदे का पूरा चेहरा खुशी से दमक जो रहा था।
कैब में ड्राइवर और पैंसेजर सीट के बीच पारदशी आड़ थी, मास्क के बाद कोरोना की याद दिलाने एक और शै। और भी छोटी-छोटी सावधानियां जैसे हम मां-बेटी ना गले मिले ना हाथ मिलाया, गाड़ी में भी दूर-दूर बैठे। 17 सितम्बर तक भी हालात् उतने ठीक नहीं हुए थे, सो घर आकर सर्वप्रथम कार्य था स्नान करना। रात हो ही गई थी, बस खाना ही खाना था। नहा कर आई तो बेटी-दामाद और नाती ऋत्विक मुझे बालकनी में लेकर आये। विशाल भवन के तैंतीसवे मंजिल पर खड़ी चारों ओर नज़र दौड़ाई। विहंगम दृश्य था। ऊँचे- ऊँचे भवन रोशनी से ऐसे नहाये हुए थे मानों बहुत बड़ा जलसा हो। अज्ञानता में मैंने पूछ ही लिया कि यहां के लोगों का कोई पर्व या उत्सव है क्या ? मालूम हुआ कि ये रोशनी तो प्रतिदिन इसी तरह होती है। त्यौहारों पर जो रोशनी और आतिशबाजी होती है वो तो बस देखने लायक ही होती है। दूर-दूर से लोग देखने आते हैं।
दुबई का प्राचीन नाम था अल वस्ल जिसका अर्थ होता है संबंध, सम्पर्क, जोड़ना। सं.अ.अ. पारंम्परिक रूप से रूढि़वादी है। पर दुबई में खुलापन है और हमें विभिन्न संस्कृति, धर्म के लोगों की बड़ी संख्या देखने को मिलती है। इन्हें अपने-अपने तरीकों से अपने धर्म और संस्कृति का पालन करने की छूट है। साथ ही भारतीय पंडे, पुजारी आदि भी मिल जाते हैं, जो यहां के मंदिरों में भी हैं। विदेशी पर्यटकों की भीड़ हमेशा बनी रहती है।
सन् 2009 में यूरोमॉनीटर ने विश्व के 150 सबसे अधिक पर्यटकों की सूची में सातवे स्थान पर था। सन् 2012 में दुबई में दस लाख से भी अधिक पर्यटक आये थे, जो कि एक रिकार्ड है। दुबई की अर्थव्यवस्था बहुत कुछ पर्यटन पर निर्भर है।
1950-60 तक संयुक्त अरब अमीरात मत्स्य उद्योग, पर्ल यानि मोती तक सीमित था। बसरा के मोती दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। 1965-66 में तेल के कुंए की खोज के साथ दुबई से तेल निर्यात होने लगा। इससे यहां के पर्यटन उद्योग को बहुत लाभ हुआ। 1966 तक यहां भारत सरकार लागू करेन्सी ‘रूपया’ ही चल रहा था। बाद में नयी करेन्सी ‘रियाल’ आया। 1969 में पहली बार जहाज में तेल की पहली खेप का निर्यात हुआ और तब से लगातार दुबई फलता-फूलता विकास करता रहा। दुबई सं.अ.अ. का सबसे बड़ा और सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य बन गया। यहां के वर्तमान शासक मोहम्मद बिन राशिद अल मखतोम, जो संयुक्त अरब अमीरात के प्रधानमंत्री भी हैं, ने दुबई के विकास में महती भूमिका निभायी है।
ये तो एक तरह से हुई दुबई की भौगोलिक, आर्थिक व्यवस्था की बातें। मैं यहां न तो पर्यटक के रूप में आई थी ना ही किसी कार्य विशेष को लेकर; अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु ही तो आई थी। इंसान की सारी सोच और योजनाएं वैसे ही फलीभूत हो जाये ऐसा कहीं कभी नहीं हुआ। कोरोना के कारण बना अनिश्चितता का माहौल तो बना ही हुआ था। पर मुझे जैसे आशावादी व्यक्ति को तो सदैव ही अनिश्चितता में भी कुछ रोशनी मिल ही जाती है। संयोगवश दामाद को कुछ वर्षों का एक प्रोजेक्ट दुबई में करना था और मुझे अपने देश के कुछ और करीब जाने का एक पड़ाव मिल गया। बेटी के साथ समय बिताने का मौका मिल जाये तो कौन भला दुखी होगा। खैर, अगले दिन सुबह नींद कुछ देर से खुली। सुबह का नाश्ता करके बाहर की बालकनी में आई तो ना जाने कितनी देर खड़ी की खड़ी रह गई। बेटी और नाती ऋत्विक भी वहीं आ गये। बेटे के यहां बाईसवीं मंजिल से कैनेडा के प्राकृतिक दृशयों को, सात महिनों से देखने की अभ्यस्त आंखों को एकदम विपरीत परिस्थिति की मानव निर्मित सुंदर भव्यता अचंभित कर रही थी। ऊँचे-विशाल भवन जिनमें कांच का अत्यधिक उपयोग हुआ है, भवन कला के एक से बढ़कर एक अद्भूत नमूने। कोई भी बिल्डिंग चटकीले रंगों की नहीं, रेत के विभिन्न रंगों के विभिन्न शेडों के, धूल-धूसरित से रंगों में। सारे बिल्डि़ंग दर्शनीय और मजबूती का प्रदर्शन करते हुए। इनके बनावट में ऊपर से नीचे की ओर एक घुमाव या झुकाव नज़र आता है। शायद इसलिए कि जब रेतीली आंधी का तूफान आता है तो वो बिल्डिंग से नीचे की ओर फिसल जाये। भवनों को एक-एक कर देखत हुए मुग्ध हुई जा रही थी और अभी जमीनी हकीकत के आनंद भरे पल मेरी नज़रों की इनायत के लिए इंतजार कर रहे थे। अरे ये क्या ? बांये में एक मेट्रो ट्रेन स्टेशन है और लो एक ट्रेन स्टेशन के अंदर गई और एक बाहर निकली। ये सिलसिला आधे-आधे घंटे से चलता रहता है। ट्रैम (tram) की लाईन भी है जो कम दूरी के लिए है। इन सबका आनंद लेते हुए हम तीनों बातें कर रहे थे और मैं उन लोगों से जानकारी और ज्ञान दोनों बटोर रही थी।
उसी बालकनी से, ऊँची-ऊँची बिल्डि़ंगों के बीच से अरब सागर के दर्शन भी हो गये और उसमें चलने वाले छोटी-बड़ी नावें और जहाज भी दिख गये। समुद्र के पानी के बैकवॉटर वाले हिस्से में मरीना बीच है। यहां लोग घूमने, बीच पर सैर करने जाते हैं। बैठने के लिए सुविधाजनक बैंचे और सुविधाघर भी है। हवाई जहाज से लोगों को पैराशूट बांधकर छोड़ा जाता। रंग बिरंगे पैराशूट में ये स्काई डाइविंग बहुत सुंदर लगती है। बिल्डिंगों के बीच-बीच में समुद्र के पानी को ही घेर कर पक्के तालाब बने हैं, जो वातावरण में बढ़े तापमान को कम करता रहता है। हर बिल्डिंग के साथ एक स्विमिंग पूल होता है, जिससे भवन का तापमान सही रहता है और लोगों को तैरने का मौका भी मिल जाता है। चंद्रिका-शंकर वाली बिलिडंग में टैरेस पर स्विमिंग पूल है। इसमें पानी की सफाई और स्वच्छता का लगातार ख्याल रखा जाता है। पक्के तालाब में नाव से आकर कोई रसायन डाला जाता और साथ-साथ कार्इ-शैवाल आदि निकालकर सफाई भी करते जाते। इनमें मछलियां नहीं होती। पर बैकवॉटर में मछलियां होती और लोग फिशिंग का आनंद भी लेते। अब तक खड़े-खड़े पैरों में दर्द भी होने लगा और बैठ जाती तो कुछ देख नहीं पाती।
अगले दिन से बालकनी में खड़े होकर इन दृश्यों में से कुछ न कुछ देखने को मिलता ही था। रेगिस्तान में मानव निर्मित अदभुत् सम्पदाओं को देख-देख कर अचंभित होती रहती। नीचे देखा तो लगा कारों का काफिला जा रहा हो। मेन रोड पर लगभग सोलह लेन पर कारों की आवाजाही थी। इनके बीच में मेट्रो ट्रेन के दो ट्रेक और एक ट्रैम (tram) का। सबको एक साथ चलते हुए इतनी ऊँचाई से देखना हवाई दृश्य के समकक्ष ही था। यह भी एक रोमांचित और उत्साहित कर देने वाला अनुभव था। साथ ही दांए-बांए जाते हुए रास्तों पर भी उतने ही तरतीब और तमीज और सलीके से गुजरती गाडि़यां भी आपका ध्यान खींचे बिना नहीं रहेंगी। ज़ैब्रा क्रॉसिग पर तो सारी गाडि़यों की रफ्तार एक दम ना के बराबर हो जाती और धैर्यपूर्वक पैदल राहगीरों को निकलने देती। हर मौके पर भारत की कोई न कोई याद गुंथी हुई चली आती। कितनी बार पद्रंह मिनट के रास्ते को सवा या डेढ़ घंटे में पूरा किया होगा। वो भी हॉर्न के तेज बजते शोर और कुछ गाडि़यों का गलत तरीके से दांये-बांये से आगे निकलने की होड़ और तनाव में। यहां एक साथ इतनी गाडि़यों को एक बंधी हुई लय में बिना किसी हड़बड़ी के गुजरते देखना उसी तरह सूकून दे रहा था जैसे कोई गीत या ग़ज़ल दिल को तड़पा देता है। लोग कानून का पालन करना अपना कर्तव्य समझते हैं शायद इसीलिये उन्हें तोड़ते नहीं हैं। कानून तोड़ने पर सज़ा भी बहुत कड़ी होती है, इसका भी डर बना रहता होगा।
घुमावदार पक्की चिकनी सड़कें जो कहीं-कहीं मानव निर्मित बोगदे में से बल खाती हुई निकलती और इन पर बहती हुई सी लगती रंग-बिरंगी कारें। इस दृश्य को बालकनी से उत्सुक बच्चे की तरह देखती मैं, अनुभव उल्लास से भरा था। जगह-जगह हरियाली उगा कर उसे बनाये रखने का प्रयास तारीफ के काबिल था। पानी और हरियाली ने मिलकर तापमान को खुशनुमा बना दिया था। वैसे भी वर्ष के अंतिम दो महिने गर्मी का ज़ोर कम हो जाता है। पर्यावरण को और अच्छा करने के लिए बायसाईकिल की लेन इतनी अच्छी तरह से बनी हुई है कि आपका मन साईकिल चलाने को मचल जाये। कुछ-कुछ दूरी पर किराये की साईकिल की बैंक की तरह है। आप एक जगह से उठा लें चला के ले जाकर दूसरी जगह जमा कर सकते हैं। बिना हादसे के भय के साईकिल चलाना और पैदल चलने का पूरा लुत्फ उठाना कदाचित् दुबई में मिल सकता है।
दुबई में लगभग पचहत्तर दिवस रहने के बाद क्या-क्या देखा के बजाय लॉक डाऊन के कारण क्या नहीं देख पाये कि लिस्ट लंबी होगी। यहां मानव निर्मित इतने सारे आश्चर्य हैं कि आप देखते हुए थक जायें पर देखने के लिए बहुत कुछ शेष रह जाये। बड़े विशाल मॉल, दुबई म्यूजिय, दुबई फाउंटेन, दुबई सॉक्स (SOUKS) याने बाजार। एक मीना बाज़ार भी है, यहां अधिकांश पाकिस्तानी और भारतीय आते हैं। आधुनिक वास्तु-कला के नायाब नमूनों के तौर पर रिहायशी और कार्यालयीन भवनों के अलावा भी इतना कुछ काम हुआ है कि तारीफ स्वयं मुंह से निकल जाये।
पिछले 30 वर्षों में दुबई ने जो उपलब्धि प्राप्त की उसके कारण विश्व का सबसे अमीर देश बन गया। आधुनिक वास्तु-कला में सबसे प्रसिद्ध तो विश्व की सबसे ऊँची मानव निर्मित बिल्डिंग बुर्ज खलीफा है। ये मात्र बुर्ज नहीं वरन 828 मीटर ऊँचा भवन है। इस विशाल बिल्डिंग में रिहायशी निवास, कुछ कार्यालय, स्टोर्स और बड़े-बड़े नामी गिरामी होटल हैं।
यहां अनेकों थीम पार्क (Theme Park) है जिसमें सबसे प्रसिद्ध है मिरेकल गार्डन (Miracle Garden)। तरह –तरह के ढांचे बना कर उसमें विदेशों से मंगाये गये फूल खिलाते हैं। पूरा बागीचा कई एकड़ में होता है और चुने हुए विषय पर नवंबर तक फूल खिल कर तैयार मिलना चाहिये। बड़े-बड़े महल, उसी के अंदर होटल और खाने का सारा ताम-झाम। नवंबर से मार्च तक ये खिले फूल जिस तरह आकार में ही बने रहते हैं, किसी चमत्कार से कम नहीं। इन पांच महिनों में पर्यटकों के लिय ये बहुत बड़ा आकर्षण होता है।
दुबई फ्रेम वास्तुकला का नायाब लैंड मार्क है, जो ज़बील पार्क में है। सन् 2013 में बनना प्रारंभ हुआ और उसी दिन जनता के लिए दर्शनार्थ खोल दिया इसका पहले नाम था बख़ाज टॉवर। 150 मीटर (492 फीट) के दो टॉवर पर 105 मीटर का पुल बना हुआ है।
इस प्रोजेक्ट की कल्पना फेरनान्डो डोनिस ने की थी, जिसे दुबई सरकार ने एक प्रतियोगिता में चुना था। इसका उद्देश्य था प्राचीन और नये दुबई को जोड़ा जाये। एक वृहत (विशाल) फोटो फ्रेम की तरह की संरचना की जाये जो सतत् भूत, वर्तमान और भविष्य के दुबई को संजोकर रख सके। ये इमारत भी बंद ही है सो बाहर से इधर-उधर से और सिर उठा-उठा कर ऊपर देखते रहे। ऊपर चढ़ने पर अलग-अलग चैम्बर (बड़े-बड़े खाने या कमरे), सुरंग और पुल देख पाते। पुल पारदर्शी कांच का है जिसमें से नीचे साफ देख सकते हैं।
इस समय सारे ही पर्यटन स्थल बंद थे। बीच जैसी खुली जगहों पर भी कम लोग ही जा रहे थे। सोचा कि कम से कम गाड़ी का एक राउन्ड तो लगा ही लें फिर ना जाने कब आना होगा। कुछ बड़ी गाड़ी बुलवाई कि दूरी रख कर बैठा जाये, सारे नियमों का पालन करते हुए फिर मास्क चढ़ा लिया। पांच-छ: घंटों का एक चक्कर लगा ही लिया। पेलेडियम टॉवर में इनके घर से निकले सबसे पहले पहुँचे दुबई मरीना। यहां आईन दुबई, लंदन आई (London eye) की तर्ज पर एक विशाल जायंट व्हील है। इस पर बैठ कर अलग-अलग ऊँचाई से शहर के नज़ारे देख सकते हैं।
वहां से पहुँचे, अपने वैभव को प्रदर्शित करता हुआ, ‘पाम जुमैराह’ (Palm Jumeirah)। यहां पहुँचने के लिए एक अनोखे अनुभव से गुजरने को मिला। अरब सागर के अंदर सुरंगनुमा रास्ता बना हुआ है। इसमें से गुजरते हुए सुरंग की बाहरी दीवाल पर समुद्र की लहरों के टकराने की आवाज़ सुन सकते हैं। अभी तक समुद्र के ऊपर बने पुल को देखा और पार किया है, दक्षिण के पम्बन ब्रिज पर लगा इस नये अनुभव को पाने के लिए ही दुबई आने का संयोग मिला हो। यहां सारे आलीशान लोगों के आलीशान भवनों का दीदार कर सकते हैं। हमारे बॉलीवुड के कुछ सितारों के आलीशन महल भी बने हुए हैं। हर रास्तों के दोनों और पाम वृक्षों की श्रृंखला है। पाम याने खजूर, नारियल वर्ग के पर ये पाम मात्र दिखावे के लिए सजावटी हैं, इनमें फल-फूल नहीं लगते। यहीं पर पैलेस शेख होटल (Palace Sheikh Hotel) गुलाबी रंग में बेहद खूबसूरत विशाल, बुलंद इमारत है। आई पी एल (Indian Premier League) यहां चल रहा था तब भारतीय टीम यहीं रूकी हुई थी। इसी होटल के बाहर बगीचे में पूर्ण आकार के स्वर्ण अश्वों के विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियां हैं। पाम जुमैराह का संपूर्ण क्षेत्र मानों भव्यता और कुछ दर्प दिखाने के लिए ही बना है।
आगे बढ़ते हुए कुछ नये अमूल्य अनुभवों में से एक विशेष अनुभव है ‘फ्यूचर साईंस म्यूजियम’ (Future Science Museum), नये सोच की अभिनव पहल। वर्तमान पीढ़ी खास कर 11 से 15 वर्ष के बच्चों के लिये अलग-अलग तरह के दिमागी खेल, भविष्य में विज्ञान का रूप और योजनाओं की तैयारी। यहां का प्रेरणा वाक्य ही है इंजिनियर यूअर फ्यूचर (Engineer Your Future) भविष्य को वैज्ञानिक तरीके से संवारो। इससे संबंधित फिल्में, प्रश्न–उत्तर, सलाह आदि सेशन होते हैं। बच्चे के भविष्य को सही दिशा में गति देने को प्रोत्साहित करता हुआ, एक उत्तम व्यवस्था। कोरोना ने तो भविष्य को ही अनिश्चित सा कर दिया है सो इसके द्वार भी बंद है। इसके उद्देश्य की तरह बाहर लगी एक बड़ी सी अद्भूत आकृति अवश्य ही ध्यान आकर्षित करती है। उस पर एरेबिक (Arabic) में लिखा हुआ है। उसका एक खूबसूरत सा फोटो मोबाइल पर लेकर तसल्ली कर ली।
रास्ते में ओपन आर्ट म्यूजि़यम प्रोजेक्ट (Open Art Museum Project) के तहत एक और नायाब कला का दर्शन हुआ। दि पाम जुमैराह ब्रिज (The Palm Jumeirah Bridge) फ्लाई ओवर से गुज़रे तो उसके नीचे खंभों की जगह वनस्पति का चंदोबा बना हुआ दिखा। वृक्ष के मोटे विशाल तने जो कला के रूप में इस प्रोजेक्ट के तहत बने हुए थे। ऐसा लग रहा था मानो फ्लाई ओवर के नीचे विशाल लंबा गलीचा बिछा हुआ हो।
उम्म सुक्विम पार्क से गुजरे जो जनता जनार्दन को परिवार के साथ खुशनुमा वक्त गुजारने का बढ़िया स्थान है। समुद्र तट पर होने से हवा की लगातार की आवाजाही भी होती रहती है।
हमारा अगला पड़ाव था बुर्ज अल अरब में वाईल्ड वादी (wild Wadi) । बाहर से बस प्रपात को फोटो ले पाये। वादी के अंदर खुले में और इंडोर गेम्स में भी अनेकों स्थान पर बर्फ और स्नो का प्रबंध कर आईस स्केटिंग (ice Skating) व अन्य खेलो का प्रबंध भी है।
आखिरी पड़ाव ला मेर (La Mer) बीच, जुमैराह रहा, जहां उतर कर समुद्र को करीब से देखा और कुछ समय आराम से बैठ कर समुद्री हवा का आनंद लिया। वैसे तो यहां यूनाइटेड किंगडम, भारत और पाकिस्तान से लाखों पर्यटक आया करते हैं पर इस वर्ष पर्यटन उद्योग को बहुत धक्का पहुँचा है। महामारी के कारण नियम काफी कड़े भी हो गये हैं।
अलमास टॉवर (Diamond Tower) अरेबिक में अलमास का अर्थ है हीरा ये एक शानदार प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट है जो जुमैराह लेक टॉवर्स में है। 78 मंजिलों की 360 मीटर (1,180 फीट) DMCC याने दुबई मल्टी कमोडिटी सेन्टर बिल्डिंग है। स्वाभाविक रूप से इतने विशाल भवन में इलेवेटर्स (Elevators) भी काफी बड़ी तादाद में हैं, कुल 351 अनेकों बड़े-बड़े व्यापारों के कार्यालय, कारपोरेट आफिसों, पांच सितारा होटलों के अलावा जो सबसे बड़ा और प्रसिध्द कार्य है, कीमती नगों, रत्नों का क्लब। दुबई पर्ल (Pearl Exchange) एक्सचेन्ज, डायमण्ड एक्सचेन्ज (Diamond Exchange) के आफिस । पूरे विश्व के हीरों का प्रमाणीकरण (Certification) यहीं होता है।
विश्व के सबसे अमीर, सम्पन्न देश की प्रगति वास्तव में चौंकाती हैं। विज्ञान और उसकी शाखाओं के वृहद ज्ञान से इंसान नये-नये कीर्तिमान रच रहा है। प्रतिदिन नई खोज और जानकारी से छलांग लगाती हुई प्रगति कर रहा है। इससे मानव जाति का वास्तव में कल्याण हो रहा है। साथ ही कुछ विनाशकारी गतिविधियां और परिवर्तन भी नज़र आते हैं। खास कर पर्यावरण और भौगोलिक परिस्थिति और वातावरण पर जो असर पड़ रहा है वो हम देख ही रहे हैं। इंसान के गर्व में नम्रता होती है तो वो समाज के लिए भी लाभदायक होता है। वरना दर्प या श्रेष्ठता का घमंड देर सबेर नुकसान पहुँचाता है। जितना यहां की प्रगति और चमक सकारात्मक रूप से चौंकाती है उतनी ही शंका मन में पैर जमा कर डराती भी है। आखिर रेगिस्तान की रेत कब तक मजबूत नींव का काम कर सकती है ?
शहर के तापमान, मिजाज, धरोहर आदि की बातें तो बहुत हो गई, अब कुछ घर-परिवार के मोर्चे से। दुबई मे हर बात के लिए खोजबीन याने एक्सप्लोर बेटी ने अपने आप किया था जो बाद में बहुत काम आया। दामाद अपने काम के सिलसिले में ऑस्ट्रेलिया गये, दो सप्ताह के लिए। संयोग या दुर्योग से कोरोना की तालाबंदी ने उन्हें तीन महिनों के लिए रोक लिया। बेटी और दामाद दोनों को चिंता और तनाव का लंबा समय काटना पड़ा। लॉकडाउन में कामगारों को अपने गांव घर परिवार की कमी का अहसास होना और लौटने की आतुरता में भगदड़ का जो मंजर था, उसका मर्म समझ आ गया।
पर चिंता खत्म नहीं हुई थी। बड़ा बेटा सिध्दार्थ उच्च शिक्षा के लिए यू के गया था और जॉब मिलने की आस में वहीं था। पूरे विश्व में जब पुराने कर्मचारियों की कम्पनियां छंटनी कर रही थी तो नयों की मांग कैसे होती ? लॉकडाऊन हो जाने से उसके वीसा को बड़ा दिया गया तो उसे लगा शायद सब ठीक हो जाये और उम्मीद बढ़ गई। पर महामारी के कारण बिगड़े हालात् को तो अब वक्त पर छोड़ दिया गया है। इधर परिवार में ये चिंता कि यू के में कोरोना के बढ़ते हुए माहौल में बेटा सुरक्षित भी रहे और खाने का प्रबंध भी ठीक से होता रहे। बड़े हुए वीसा की अवधि भी समाप्त हो रही थी। दुबई आने के लिए नये सिरे से वीसा बनाना भी प्रारंभ कर दिया वरना दुबई में आने नहीं देते। प्रगति के साथ पेचीदगी किस तरह बढ़ती जाती है इसका एक सशक्त उदाहरण।
इसी बीच दीपों का त्यौहार नज़दीक आ गया। वर्ष भर में आने वाले इस प्रमुख त्यौहार के आगमन की रूनझुन से मन में आशा और उमंगों की चहल-पहल तेज होने लगती है। सो लगा सिध्दार्थ को दुबई लौटने की कोई न कोई राह नज़र आ ही जायेगी। ऐसे समय में जब उड़ाने एक दम कम हो गई, नियमों के बंधन अधिक हो गये सारा सामान समेट कर लाना नामुमकिन था। लोग अपने कई प्रिय और काम के सामान भी छोड़ के आ रहे थे। उसे यूक्रेन की एक उड़ान मिल गई थी। जिसमें अधिक वज़न रखा जा सकता था। उसे समस्या क हल मिल गया और हम सब इसलिये खुश कि दीपावली पर पूरा परिवार साथ हो जायेगा। पर पिक्चर खत्म थोड़ी हुई थी। यूक्रेन में दूसरे फलाईट में चढ़ने ही नहीं दिया। बहाना था कोविद टेस्ट के नियम घंटे पूरे हो गये। अब फिर एक बार करा कर रिपोर्ट लेकर ही दुबई में जाने देगें। तब तक कनेक्टिंग फ्लाईट निकल चुकी थी।
अनजाने एयरपोर्ट पर अनजानी भाषा बोलते लोग, रात के समय बिना शंकित हुए कैसे रहा जा सकता है। रात भर हममें से कोई नहीं सोया। दामाद ने अपने संपर्क से किसी तरह कुछ लोगों से संवाद किया कुछ पहचान के पहचानी-जानी भाषा बोलने वाले पहुँचे और एक रात दुविधा और चिंता में बिताने के बाद अगली रात उसे उड़ान में बैठने दिया गया। तब तक सबके मुर्झाये चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थी। बेमन से ही सही लक्ष्मी पूजा तो करनी ही थी। आखिर पूर लाव-लश्कर के साथ वो सही सलामत आ गया। देर सबेर ही सही पूरा परिवार साथ हो गया।
अपने शहर से दूर अनजाने माहौल में अनजाने पर भारतीय महिलाओं की एक संस्था ने दीपावली मिलन का आयोजन किया था। इसके मेम्बरस् महीनों बाद मिल रहे थे सो अत्यंत प्रसन्न और उत्सुक थे। मुझे अतिथि के रूप में बुला लिया क्योंकि हमारी बिल्डिंग की छत पर आयोजन था। दूर-दूर कुर्सियों पर बैठे हुए, मास्क लगाये बातें करते हुए, पकवान खाने के लिये मास्क हटाते फिर लगाते। एकदम अलहदा, अद्भूत अनुभव। दोनों बच्चों के घर परिवार मिलन का आनंद लेकर अब वहां से निकलने की राह तक रही थी। मात्र फलाईट की टिकट बुक करना ही नहीं था, फिर से नियत समय के अनुसार कोविद टेस्ट करवाना, निगेटिव की और सेल्फ डिक्लेरेशन का सर्टिफिकेट लेना, याने एक के बाद एक काम में बेटी को लगना था। मैं तो बस उसकी मेहनत और परेशानी देख कर बैचेन हो रही थी। इस महामारी ने यात्रा के लिये ढेरों नये नियमों का समावेश कर दिया था। हेल्प लाईन में कर्मचारी को भी नियमों की ठीक-ठाक या सटीक जानकारी नहीं थी। खैर, एयर इंडिया में टिकट बुक करवाया फिर बहत्तर घंटों का अंतर रख कर कोविद टेस्ट हुआ। गैलरी में बैठी-बैठी सोच रही थी कि अगर टेस्ट पॉजि़टिव आ गया तो ? अनेकों आर्थिक नुकसानों में यह भी जुड़ जायेगा और सोचे हुए हर कार्य की तरह इसमें भी अच्छाई ढूँढ कर संतोष करना पड़ेगा। सब कुछ ठीक ही हो गया और बेटी के कुशल प्रबंधन में व्हील-चेयर पर दोनों तरफ के एयरपोर्ट पर आसानी हो गई।
ये वंदे भारत मिशन की उड़ान थी। सीट पर पहले से ही छोटे से गत्ते के डिब्बे में छोटा सा सेन्डविच और पानी की छोटी सी बोतल, एक फोल्डर में शील्ड-मास्क, सानिटाईज़र के पैकेटस् रखे हुए थे। मास्के के साथ शील्ड भी पहनना दुखद अनुभव ही था। सारे यात्री अपनी सीट पर मूर्ति की तरह एक बंधन में बंधे हुए से लग रहे थे। कोई चारा भी तो न था । पहली बार परिचारिका की चहलकदमी और होठों पर फैली मुस्कान के बिना उड़ान का अनुभव। सारे अनुभवों को संयोग कहें या दुर्योग मालूम नहीं।
जिस तरह कैनेडा से दुबई के बीच उड़ान में नौ घंटे का हिसाब मिलाये नहीं मिला, यहां मात्र डेढ़ घंटे के अंतर का ही समझ नहीं आया। मेरी घड़ी में पांच बज रहे थे और बैंगलोर में साढ़े छ:, जो कि बारिश और ठंड के कारण रात गहरा जाने का अहसास करा रहा थे। वैस भी एयर पोटग् से घर की दूरी और बैंगलोर के ट्राफिक से सदा ही घबराहट होती थी। पर अब कुछ समय तीसरी संतान के यहां भी आराम फरमा लेती हूँ।