Laukikta Aur Hindu-Dharma (Hindi Nibandh) : Ramdhari Singh Dinkar

लौकिकता और हिन्दू-धर्म : रामधारी सिंह 'दिनकर'

दुनिया में हिन्दू - धर्म की आलोचना इस बात को लेकर भी चलती है कि यह धर्म लोक से परलोक को अच्छा समझता है और वह जिन्दगी से जूझने की शिक्षा नहीं देता , बल्कि आदमी को संघर्ष से भागने की राह बतलाता है । हिन्दू - धर्म पर यह लाँछन शायद इसलिए लगाया जाता है कि भारतवर्ष में योगियों , साधुओं और संन्यासियों की संख्या हमेशा बड़ी रही थी और जो लोग साधु या संन्यासी हो जाते थे , वे किसी भी तरह का संचय नहीं करते थे , न वे समाज में फैले हुए अन्याय का विरोध करते थे । हिन्दुओं के बीच सबसे श्रेष्ठ मनुष्य राजे या सेठ नहीं , बल्कि वे लोग समझे जाते थे , जो अपनी मुक्ति खोजने के लिए संसार का त्याग कर देते थे । और जो आदमी संसार का त्याग कर देता है , उसकी दृष्टि में लोक की अपेक्षा परलोक अवश्य ही श्रेष्ठ होगा ।

किन्तु , संसार से भागने का यह रिवाज आर्यों के आदि धर्म में नहीं था । आर्यों के आदि धर्म यानी वैदिक धर्म में प्रधानता संन्यास की नहीं , बल्कि गृहस्थ धर्म की थी । ऋग्वेद में संसार से भागने की शिक्षा नहीं मिलती । ऋषिगण भगवान से यह नहीं माँगते कि ' हे भगवान , हमें संन्यास और वैराग्य दो । ' बल्कि वे यह माँगते हैं कि ' हे इन्द्र ! हमारे घोड़ों को पुष्ट बनाओ , हमारी सन्ततियों को ताकत दो , हमारे शत्रुओं का बल घटाओ । ' वैदिक ऋषि नरक की भी कल्पना नहीं करते थे । उनका खयाल था कि बलवान मनुष्य जैसे पृथ्वी पर पुण्य से जीकर सुख भोगता है , उसी तरह मरने के बाद भी वह ऐश्वर्यों का भोग करता है । पितरों की याद करके ऋषि ने एक मन्त्र में कहा है , " हे पितर ! आप इन्द्र के साथ सुख से विहार करें । "

और जो बात हम ऋग्वेद में देखते हैं , वही चीज हमें वाल्मीकि की रामायण और व्यास के महाभारत में भी दिखाई देती है । श्रीमद्भगवद् गीता महाभारत का ही एक अध्याय है , जिसमें भगवान कृष्ण ने युद्ध से भागने की इच्छा से पीड़ित अर्जुन को उपदेश दिया है । अर्जुन यह सोचकर कातर हो उठे थे कि अपने ही चचा , बाबा , भाई , भतीजे और भानजे को मारकर राजा बनना पुण्य नहीं , पाप का कार्य है । भगवान ने अर्जुन को इसी कातरता से मुक्त करने को गीता कही थी । गीता वैसे ज्ञान - मार्ग और भक्ति - मार्ग का भी ग्रन्थ है । लेकिन उसका असली जोर कर्मयोग पर है । और इस कर्मयोग के भीतर युद्ध का भी बहुत बड़ा स्थान है । गीता की शिक्षा यह है कि आततायी लोगों के अन्याय को सहते जाना पुण्य नहीं, पाप है। संसार संघर्ष की भूमि है । धरती पर विजय उन्हें मिलती है , जो वीर हैं , जो कर्मठ , अध्यवसायी और निर्भीक हैं । संसार का सुख ऐसा नहीं है , जिसे लात मार दी जाए और संघर्ष का मुकाबला किए बिना संसार का सुख प्राप्त नहीं किया जा सकता । भगवान ने यह बात स्पष्ट कही है कि हे अर्जुन ! अगर युद्ध में तू मारा गया , तो तुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ; यदि युद्ध तू जीत गया , तो पृथ्वी पर तू राज करेगा । अतएव , तुझे युद्ध के लिए तैयार होना चाहिए :

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा मोक्षसे महीम् ।
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय , युद्धाय कृतनिश्चयः ।

इसी प्रकार , वाल्मीकि रामायण में भगवान रामचन्द्र ने लक्ष्मण से कहा है कि हे लक्ष्मण , जो लोग खल और नीच हैं , उन्हें क्षमा नहीं करना चाहिए । जो मनुष्य क्षमा की महिमा नहीं समझता , वह दंड के योग्य है , अतएव समुद्र को मैं अब दंड दूंगा । इसकी प्रतिध्वनि हमें तुलसीकृत रामायण में भी सुनाई देती है :

विनय न मानत जलधि जड़ , गए तीन दिन बीति ।
बोले राम सकोप तब , भय बिनु होइ न प्रीति ।
लछुमन वेगि सरासन आनू , सोखौं वारिधि बिसिख कृसानू ।

शूरता , साहस और संघर्ष की महिमा आर्यों के प्राचीन साहित्य में सर्वत्र भरी पड़ी है और इसीलिए वैदिक आर्यों की पुरानी दुनिया पर उतनी बड़ी धाक थी । वैदिक आर्य मुनि नहीं , ऋषि होते थे । मुनि वे कहलाते थे , जो विवाह नहीं करते थे , खेती नहीं करते थे , न संग्राम में भाग लेते थे । लेकिन , ऋषि गृहस्थ होते थे , वे कृषि करते थे , वे वेद की ऋचाएँ लिखते थे और ईश्वर की उपासना करते थे , किन्तु लड़ाई लगने पर वे तलवारें उठाकर युद्ध - भूमि में भी पिल पड़ते थे । वैदिक युग भारत का स्वर्ण - युग था , जब मनुष्य लोक और परलोक में फर्क नहीं समझता था । किन्तु जब भगवान महावीर और भगवान बुद्ध का जन्म हुआ , तब उनके उपदेशों से निवृत्ति की भावना बहुत अधिक बढ़ गई और जो आर्य पहले धर्म - साधना के लिए भी गार्हस्थ का त्याग करने को तैयार नहीं थे , वे भरी जवानी में संन्यास लेने लगे , क्योंकि बुद्ध और महावीर , दोनों की शिक्षा यह थी कि मुनि और भिक्षु हुए बिना मनुष्य को मोक्ष नहीं मिल सकता ।

मेरा खयाल है , हिन्दुओं के वेद से बाद वाले दर्शन में वैराग्य और निवृत्ति की जो प्रधानता हो गई , वह ज्यादातर इन्हीं दो महात्माओं के उपदेशों का परिणाम थी ।

समय - समय पर वैराग्य - भावना पर थोड़ी - बहुत चोट कई महात्माओं ने की थी । मगर उस पर सबसे कठोर प्रहार गुरु गोविन्द सिंह ने किया । गुरु गोविन्द भगवान परशुराम के अवतार थे । उन्हें यह देखकर घोर क्लेश हुआ था कि हिन्दू - जाति परलोक की आराधना में फँसकर लोक को गँवा बैठी है । वे चाहते थे कि हिन्दू तलवार की महिमा को समझें और अपना हक और अपनी इज्जत बचाने के लिए मरने-मारने को तैयार रहें । अतएव उन्होंने हिन्दुओं के भीतर वीरता जगाने के लिए भगवान का नाम असिध्वज और महालौह रख दिया ।

असिध्वज उसे कहेंगे , जिसके झंडे पर तलवार का निशान हो । गुरु गोविन्द सिंह भगवान को इसी रूप में भजते थे । वे भगवान को महालौह यानी लौह पुरुष समझते थे :

जो हो सदा हमारे पच्छा ,
श्री असिधुज जी करिहहु रच्छा ।
महाकाल रखवार हमारे ,
महालौह , मैं किंकर थारे ।

यही नहीं , बल्कि , गुरु गोविन्द सिंह ने यह भी कहा कि भगवान जब सृष्टि की रचना करने लगे , तब और कुछ बनाने के पूर्व उन्होंने तलवार की रचना की थी ।

इसका अर्थ यह है कि संसार में पहले क्षात्र धर्म उत्पन्न हुआ । ब्राह्मण धर्म उसके पीछे आया , जब तलवार के बल से समाज में शान्ति स्थापित हो चुकी थी । महाभारत के शान्तिपर्व में भीष्म पितामह ने भी कहा है कि जब भी सभ्यता बनने लगती है , पहले क्षात्र धर्म का उत्थान होता है । यह बात सोलह आने ठीक है , क्योंकि यज्ञ करनेवाले पुरुष के पास केवल स्रुवा ही नहीं , धनुष और बाण भी होना चाहिए ।

जहाँ शस्त्रबल नहीं ,
शास्त्र पछताते या रोते हैं ।
ऋषियों को भी सिद्धि
तभी तप से मिलती है ,
जब पहरे पर स्वयं
धनुर्धर राम खड़े होते हैं ।

गुरु गोविन्द सिंह ने जिस धर्म की व्याख्या की थी , उसे मैं वैदिक धर्म की ही व्याख्या मानता हूँ । मगर दुख की बात है कि उस समय पस्ती के बादल नहीं छंटे और जो गीता युद्धक्षेत्र में कही गई थी , उसे लोग संन्यास का ग्रन्थ मानते रहे । जो भी लड़का गीता पढ़ने लगता था , उसके माँ - बाप डरने लगते थे कि बेटा कहीं संन्यासी न हो जाए ।

किन्तु उन्नीसवीं सदी में जब हिन्दू - धर्म की टक्कर यूरोप से हुई , तब हिन्दू - धर्म एक बार तो काँप उठा , लेकिन तुरन्त उसके भीतर से स्वामी दयानन्द , स्वामी विवेकानन्द और लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जैसे महात्मा उत्पन्न हो गए । स्वामी दयानन्द ने हिन्दुओं की आँखों में उँगली डालकर उन्हें यह समझाया कि वैदिक धर्म वीरता और संघर्ष की शिक्षा देता है, कायरता और वैराग्य के लिए उसके भीतर कोई स्थान नहीं है । तिलकजी ने गीता - रहस्य लिखकर हिन्दुओं को यह बतलाया कि गीता संन्यास की शिक्षा नहीं देती , बल्कि वह यह सिखलाती है कि संघर्षों से जूझकर आदमी को उन पर विजय प्राप्त करनी चाहिए । यह तिलकजी के गीता - रहस्य का ही सुपरिणाम है कि अब कोई भी जागरूक भारतवासी गीता को संन्यास की पुस्तक नहीं मानता है । गीता वह ग्रन्थ है , जो भारत के क्रान्तिकारियों को भारी प्रेरणा देती थी और जिसके श्लोक पढ़ते हुए सैकड़ों वीर फाँसी के तख्तों पर झूल गए थे । इसीलिए हमारा विचार बन गया है कि गीता का एक आख्यान तो स्वयं भगवान कृष्ण ने किया था , किन्तु दूसरी बार उसका कथन भगवान तिलक ने किया है ।

किन्तु , पस्ती और निराशा की कालिमा को धोकर हिन्दू - धर्म को फिर से चमकाने का काम स्वामी विवेकानन्द ने किया । वे परमहंस श्री रामकृष्ण के शिष्य और महाकाली के उपासक थे । अपने सैकड़ों व्याख्यानों के द्वारा उन्होंने हिन्दुओं के मन पर से इस भाव को धो - पोंछकर दूर कर दिया कि धर्म की साधना वैयक्तिक मोक्ष के लिए की जाती है । उलटे , लोगों को उन्होंने यह समझाया कि धर्म की असली साधना का मार्ग समाज की सेवा का मार्ग है , राष्ट्र की उन्नति का मार्ग है , संघर्ष में ताल ठोंककर जूझने का मार्ग है । एक बार एक नौजवान स्वामीजी से गीता का मर्म समझने को गया था । स्वामीजी ने उससे कहा , " बेटा , गीता घर में समझने की चीज नहीं है । तुम सीधे फुटबाल के मैदान में चले जाओ । गीता आपसे - आप तुम्हारी समझ में आ जाएगी । "

एक बार एक सज्जन सत्संगति के लिए स्वामीजी के पास गए , लेकिन स्वामीजी उस दिन देश और समाज की ही बातें बोलते रहे । चलते समय उस महाशय ने कहा , “ स्वामीजी , आज तो धर्म - चर्चा हुई ही नहीं । " स्वामीजी ने गरजकर कहा , “ तुम धर्म - कथा सुनने को आए थे ? मगर जब तक भारतवर्ष का एक कुत्ता भी भूखा है , तब तक उसके लिए रोटी जुटाना ही तुम्हारा धर्म होना चाहिए । "

अमेरिका से लौटने के बाद मद्रास में स्वामीजी ने गर्जना की थी , “ तुम्हारे तैंतीस करोड़ देवता सोए हुए हैं । जगा हुआ एक ही देवता है , जो तुम्हारे सामने खड़ा है । वह देवता भारत माता है , वह देवता भारत की करोड़ - करोड़ जनता है । सोए हुए देवताओं को छोड़कर तुम इस जगे हुए देवता की सेवा में लग जाओ । यही धर्म है । यही परमात्मा की सबसे बड़ी आराधना है । "

स्वामीजी धर्मात्मा उसे समझते थे , जिसके भीतर साहस और शक्ति है , दुनिया में कुछ कर गुजरने की धुन है और जो सबको सुखी बनाने के बाद अपना सुख चाहता है ।

इन महात्माओं के उपदेशों में स्नान करके हिन्दू - धर्म बिलकुल नवीन और ताजा हो उठा है। आज का हिन्दू अपने वैयक्तिक मोक्ष को जीवन का सबसे बड़ा ध्येय नहीं मानता । सबसे बड़ा ध्येय यह है कि हम समाज से गरीबी को दूर करें , लोगों में शिक्षा का प्रचार करें , महामारी और अकाल के समय जनता की सेवा के लिए दौड़ पड़ें और दुश्मन अगर सरहद पर आकर ललकारें , तो उसकी हेकड़ी मिटाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दें । आज का नया हिन्दू जात - पाँत की प्रथा में विश्वास नहीं करता , वह छुआछूत को नहीं मानता , न वह यही समझता है कि समुद्र जाने अथवा विधर्मियों के साथ एक मेज पर बैठकर भोजन करने से उसकी जात चली जाएगी ।

और तो और , आज के संन्यासी भी गार्हस्थ - धर्म का अनादर नहीं करते । वे एक रास्ते से तो समाज से निकल जाते हैं , मगर दूसरे रास्ते से फिर समाज में वापस आ जाते हैं । वे अपनी गृहस्थी तो नहीं बसाते , लेकिन सभी गृहस्थों की सेवा में लगे रहते हैं । संन्यास अब समाज - सेवा का सर्वोत्तम मार्ग है और आज के संन्यासी इसी पुण्य - कर्म को सबसे श्रेष्ठ समझते हैं ।

और इतने पर भी कहना यही पड़ेगा कि जो भी परिवर्तन घटित हुए हैं , वे सारे - के - सारे परिवर्तन हिन्दुत्व के पेट में मौजूद थे । हिन्दू - धर्म की विशेषता यह है कि वह जितनी ही चोटें खाता है , उतनी ही उसकी ताकत तेज हो जाती है और वह जितना ही बदलता है , उतना ही अपने मूल रूप के समीप पहुँच जाता है । इसीलिए वह आज तक जीता रहा है । इसीलिए वह आगे भी जीवित रहेगा । नया हिन्दू - धर्म बदलकर विश्वधर्म की भूमिका बन गया है । सभ्यता बड़े संकट में है । बहुतों का विचार है कि वर्तमान सभ्यता टूट रही है । लेकिन हम जानते हैं कि जब यह सभ्यता टूट जाएगी , तब नई सभ्यता का जन्म नए हिन्दू - धर्म की प्रेरणा से होगा । एक समय था , जब सारे संसार ने हिन्दुत्व से प्रेरणा लेकर अपना विकास किया था । आगे भी वह समय आनेवाला है जब सारी दुनिया को संजीवनी - शक्ति भारतवर्ष प्रदान करेगा । भारत में भौतिक साधना के साथ आज भी आध्यात्मिक साधना कदम मिलाकर चल रही है । स्वामी दयानन्द , स्वामी विवेकानन्द , महायोगी अरविन्द , महर्षि रमण और स्वयं महात्मा गांधी इस नई आध्यात्मिकता के प्रतिनिधि हुए हैं । विनोबा इसी आध्यात्मिकता के ऋषि हैं । विज्ञान और अध्यात्म के बीच की खाई सबसे पहले भारतवर्ष में भरी जाएगी और तब सारे संसार के लिए भारत एक नमूना हो जाएगा ।

नया हिन्दुस्तान केवल धर्म ही नहीं , विज्ञान का भी प्रेमी है । हमें केवल परलोक ही नहीं , यह लोक भी चाहिए । हम आत्मा और शरीर , दोनों के लिए पूरा आहार चाहते हैं । धर्म की साधना बहुत अच्छी चीज है , लेकिन साधुओं के भीतर भी यह शक्ति होनी चाहिए कि वे सरहद के भीतर घुसनेवाले शत्रु की गरदन काट सकें । दुनिया में गड़बड़ी केवल इसलिए नहीं है कि उसके राक्षस बलवान हैं । गड़बड़ी का एक बड़ा कारण यह भी है कि साधुओं का दल कमजोर है, वह लड़ने से अलग रहना चाहता है । इसीलिए भारत ने नई राह पकड़ी है । वह अपनी आध्यात्मिक संस्कृति का मेल यूरोप के विज्ञान के साथ बिठाना चाहता है । जो काम किसी अन्य देश में नहीं हुआ , उसे भारत पूरा करके दिखाना चहता है ।

एक हाथ में कमल , एक में धर्मदीप्त विज्ञान ,
लेकर उठनेवाला है धरती पर हिन्दुस्तान ।

मॉरिशस
29-7-67

('मेरी यात्राएँ' पुस्तक से)

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