लघुकथाएँ (101-105) : महेश केशरी

Hindi Laghu-Kathayen (101-105) : Mahesh Keshri

अपराधबोध (लघुकथा)

ज्वाला बाबू अनमोल की बातों को बहुत ही बेचारगी से सुन रहे थे l हालाँकि, अब ये रोज की दिनचर्या हो गई थी l

वे चलते-चलते अपने मकान को और कभी -कभी अपनी रखी चीजों को भी भूल जाते थे l कभी चश्मा भूल जाते तो कभी छड़ी, लेकिन आज तो हद ही हो गई थी l वे अपना घर ही भूल गये थें l और किसी ने उनको चौक पर से उनके घर तक सकुशल पहुँचाया था l

अनमोल बिना लगाम के घोड़े की तरह बदजुबानी पर उतर आया था-"बाबूजी, आपको तो कुछ याद - वाद रहता नहीं है l कम- से -कम हमारी हालत पर तो रहम कीजिये l जब आपको अपना मकान ही याद नहीं रहता तो आप घर से बाहर निकलते ही क्यों हैं ? खामखाँ आपके चलते हमलोगों को परेशानी होती है , और बाहर के लोग हमारे ऊपर ये इलजाम लगायेंगे कि बूढ़े को मरने के लिए जानबूझकर ये लोग बाहर छोड़ आतें हैं l आपको जिस चीज़ की जरूरत हो हमसे कहिये हम आपको लाकर देंगे l"

ज्वाला बाबू बड़ी बेचारगी से अनमोल की बातों को एक टक ध्यान लगाकर सुन रहें थें l और, वो ये भी सोच रहे थें कि मेरे जैसा जिम्मेदार व्यक्ति आज उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच गया है l जहाँ दिमाग चीजों को बहुत लंबे समय तक याद नहीं रख पाता तो भला इसमें उनकी क्या गलती हो सकती है ?

हालाँकि, इस घटना को हुए लगभग सप्ताह भर हो चुका था l एक सुबह वो कहीं से टहल कर आ रहे थें कि फिर से वो अपना ही घर भूल गये l

वो अपने ही घर की तस्दीक़ कर लेना चाह रहे थें l जैसे ये उनका ही घर है या नहीं l

मैं, उनके बगल से गुजर रहा था तभी उन्होंने मुझे टोका-"सुनो, ये मेरा ही घर है ना..?"

मैंने एक बार उन्हें देखा l फिर मकान को l"नहीं ये वर्मा जी का मकान है l आपका घर थोडा़ सा और आगे है l"

"मुझे वहाँ तक पहुँचा दोगे ?"

"हाँ, क्यों नहीं l"

मैंने उन्हें सहारा देकर उनका हाथ पकड़ लिया, और उनको उनके घर तक पहुँचा आया l

ज्वाला बाबू ने अपने घर के ग्रिल को अपने खुरदरे हाथों से छुआ l फिर अपने मोटे फ्रेम वाले चश्मे से घर को देखा l फिर वे अपने भरोसे को सही पाकर बोले-"हाँ यही है l

तुमने मुझे यहाँ तक पहुँचा दिया l तुम्हारा बहुत- बहुत धन्यवाद l अब क्या करुँ ? मुझे कुछ याद नहीं रहता तो l इधर कुछ सालों से ऐसी परेशानी हो गई है l नहीं तो पहले ऐसी कोई बात नहीं थी l" वे सफाई देते हुए बोले l

"गायत्री l"उन्होंने अपनी स्वर्गवासी पत्नी को आवाज लगाई l लेकिन उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ l फिर, जैसे अपने आप से बोले-"अरे, उसको गुजरे तो करीब दो महीने से ज्यादा हो गये l उनकी आँखें अब भीगनें लगी थीं l" और वे ग्रिल को ठेलकर धीरे से अंदर चले गये l

आत्मविश्वास (लघुकथा)

रामबलेसर चचा को आज फिर अपने ठेले पर छोले- कुलछे बेचते हुए देखा तो अपने आप को रोक नहीं सका l जाकर उनके सामने मैं खडा़ हो गया, और तपाक से पूछ भी लिया -"और चचा क्या हाल -चाल है ? बहुत दिनों के बाद आज आपका ठेला लगा है l"

चचा सुजाता टाकीज के बगल में पिछले पैंतीस- चालीस साल से ठेले पर छोले-कुलछे बेचते चले आ रहे थें l रोजाना नियमित समय पर आकर ठेला लगाते और नियमित समय से चले भी जाते l

इधर स्वास्थ्य कुछ साल भर से गिर गया था l चचा सत्तर साल से कम के ना रहे होगें l बिना नागा किये वो रोज समय से ठेला लगाते आ रहें थें, लेकिन स्वास्थ्य खराब रहने के कारण वो लगभग बीते साल भर से गायब हो गये थें l

चचा हँसते हुए बोले-"अरे आज साल भर से बीमार हूँ l अभी भी अँदर से ठीक नहीं लगता है, लेकिन क्या किया जाये ?"

फिर वो बोले-"तुम इधर ?"

मैंने कहा-"हाँ ऐसे ही, इधर... घूमते हुए आपकी तरफ निकल आया l"

फिर, मैंने पूछा-"अच्छा चचा अब आप ये बताईये, इस उम्र में आपको भला काम करने की क्या जरूरत है ?"

वो हँसते हुए बोले-"पैकेट खर्चवा कहाँ से आयेगा?"

मैंने फिर पूछा-"कुछ जमा -वमा नहीं करके रखा क्या चचा, बूढ़ापे के लिए ?"

अरे नहीं भाई l बाल- बच्चों को सारी उम्र पालने -पोषणे में ही सारी कमाई चली गई l जमा क्या खाक होता l मान लो लाख- पचास हजार है भी, तो बैठकर खायेंगे तो कै दिन चलेगा ?"

वे, हँसते हुए फिर बोले-"सच कहूँ तो, अब काम करने का मन नहीं करता l एक लड़का भी रखा हुआ है, ठेला वही लेकर आता- जाता है l मैं केवल दूकान पर बैठता हूँ l ठेला खींचने की अब ताकत नहीं रह गयी है l इतना बोलने भर से वो थकने लगे थें l"

"बच्चे मदद नहीं करते ?" मैंने उनसे ऐसे ही पूछ लिया था l

उनका चेहरा थका हुआ लग रहा था l लेकिन, वैसे थके हुए चेहरे के साथ वे केवल मुस्कुरा कर रह गये थें l फिर वे बोले -"जब आज तक किसी का एहसान नहीं लिया तो, अब इस उम्र में ? बाकी के शब्द वहीं हवा में तैर कर रह गये थें l"

मानों वे कह रहे हों जब सत्तर साल तक मुझे किसी के मदद की जरूरत नहीं पडी़ तो भला अब क्या किसी के मदद की जरूरत पडने वाली है ?

ठेला को ले जाने वाला लडका आ गया था l शायद स्कूल की टिफिन में उनको जाना था l उनसे पहले भी स्कूल में, मैं छोले- कुलछे खाता था l

"अच्छा, चलता हूँ l" स्कूल में टिफिन हुई होगी l वहाँ के बच्चे भी मेरा इंतजार करते होंगें l शाम को दूकान फिर लगाऊँगा l

धीरे- धीरे चचा का ठेला आँखों से ओझल हो गया l

प्रतिस्पर्धा (लघुकथा)

ग्राहक-"तीन-सौ-बारह नंबर का टी. वी. आई. सी. आप कब तक लाकर मुझे दीजियेगा ? बार- बार कस्टमर मुझसे तगादा कर रहा है l कस्टमर कहता है कि अगर आप ये टी. वी. नहीं बना सकते तो मुझे टी. वी. ही लौटा दीजिये l आखिर मैं कब तक टालूं उसको ? हम एक टी. वी. बनायेंगे तो एक-डेढ़ हजार रूपया तो कम-से -कम मिल ही जायेगा l और आई. सी. में भी दो-तीन सौ रूपया अलग से मार्जिन मिल ही जायेगा l बोलिये हम आई. सी. लेने कब आयें l"

मनोहरपुर देहात एरिया है l यहाँ पार्टस की पहले केवल शर्मा जी की ही एक दूकान थी, लेकिन जबसे उनके भतीजे ने ऊपर मोड़ पर इलेक्ट्रॉनिक की दुकान खोल ली थी l तब से शर्मा जी की अपनी दूकान बहुत ही कम चल रही थी l चूकि, शर्मा जी का भतीजा पहले शर्मा जी की ही दूकान काम करता था, और उसे उस दूकान की सारी जानकारी थी इसलिए उसने भी ऊपर मोड़ पर इलेक्ट्रॉनिक पार्टस की ही दूकान खोल रखी थी l कारण ये था कि शादी के बाद शर्मा जी के भतीजे का खर्चा बहुत बढ गया था l इसलिए मजबूर हो कर उसको अलग अपनी दूकान खोलनी पडी़ थी l

"अरे.. भाई अब ये आई. सी. मिलना बंद हो गया है, और अब एल. सी. डी., एल. ई. डी., टी. वी. का जमाना है l अब मैं कैसे बताऊँ, तुम्हें ? इस नंबर का आई. सी. अब नहीं मिलता है l"

शर्मा जी किसी पुराने स्टेपलाइजर का नट बोल्ट टाइट करते हुए बोले l

"और कोई दुकान है क्या यहाँ आस पास में ?" ग्राहक ने शर्मा जी से पूछा l

"नहीं और कोई दुकान नहीं है यहाँ l" शर्मा जी बोले l

और कनखियों से एक नजर अपनी पत्नी रमा को देखा l उन्हें लगा उन्होनें कोई चीज़ चोरी की हो l ये झूठ बोलकर l

ग्राहक जब चला गया तो उनकी पत्नी रमादेवी ने उनसे पूछ लिया -"इस ग्राहक को आपने मनीष की दुकान पर क्यों नहीं भेज दिया l हो सकता है ये आई. सी. उसको वहां मिल जाती l"

पता नहीं शर्मा जी को क्या हुआ वो अपनी पत्नी रमा देवी से गुस्साते हुए बोले-"किसको कहाँ भेजना है, कहाँ नहीं भेजना है l मुझे अच्छी तरह पता है l मनीष, अब मेरा भतीजा नहीं है l वो मेरा कंपटेटर है... कंपटेटर...! समझीं तुम l जब ग्राहक का पैर किसी एक दूकान में जाने लगता है, तब ग्राहक लौट कर नहीं आता है l कोई अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी थोडे़ ही मारता है l" पता नहीं और क्या- क्या शर्मा जी बहुत देर तक बड़बड़ाते रहे थें l रमा देवी के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था l रमा देवी खाने का खाली टिफिन धीरे से उठाकर खिसक लीं थीं l इसका एहसास शर्मा जी को बहुत देर बाद हुआ l

राजनीति (लघुकथा)

विक्रम सिंह बार-बार इस आशंका को ये मानकर नकारने की कोशिश कर रहे थें कि जो लोग और मीडिया बार-बार उनके पिता बलविंदर सिंह के मरने की अटकलें लगा रहे हैं कहीं वो सच ना हो जाए l आखिर, उनके पिता अपने इलाके के नामी-गिरामी विधायक थें, और, पिछले तीस सालों में वो लगातार पाँच बार अपने क्षेत्र के विधानसभा से निर्विरोध निर्वाचित होते रहे थे, लेकिन, जो विधानसभा का इलेक्शन अभी-अभी तीन साल पहले हुआ था, उसके कुछ समय बाद से ही उनकी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब रहने लगी थी l और विक्रम सिंह अपने पिता की तबीयत को लेकर, काफी चिंतित थें, लेकिन, वो ये तय नहीं कर पा रहे थे कि करें तो आखिर करें क्या ?

और तभी डॉक्टर हर्षुल ने उन्हें ये बुरी खबर सुनाई-"देखिए विक्रम जी अब आपके पिताजी ज्यादा से ज्यादा कुछ घंटों के मेहमान हैं, अपने करीबी लोगों को बुलवा लीजिए l लगता है उनके जाने का समय हो गया है, जल्दी कीजिये l"

और डा. हर्षुल विक्रम का हाथ थपथपाते हुए दूसरे वार्ड में मरीजों को देखने चले गये l

लेकिन, विक्रम सिंह के दोस्त बंटी सिंह की बातें, फिर से विक्रम सिंह के कानों में गूंजने लगी थीं l बंटी सिंह कह रहा था- "चलो, ठीक है, वैसे भी बाबूजी बूढ़े हो गये हैं l और कितना दिन जिएँगें l पैंसठ- सत्तर साल के तो हो ही गये हैं l अगर मर गये तो तुम्हारा विधानसभा के उपचुनाव में जीतना तो लगभग तय ही है l लोगों की सहानुभूति तो तुम्हारे साथ ही होगी l"

हालाँकि, इस बात पर विक्रम सिंह ने बंटी सिंह को डाँट दिया था, और गरजते हुए कहा था-"ये क्या उल्टी सीधी बातें तुम कह रहे हो l तुम होश में तो हो l मुझे ऐसी बातें बिल्कुल भी पसंद नहीं हैं l"

आज पता नहीं क्यों रह-रहकर विक्रम सिंह को बंटी सिंह की बातें याद आ रहीं थीं-"वैसे भी बाबूजी कितने साल जिएँगें l सहानुभूति, उपचुनाव, विधायक.. l"

डॉक्टर हर्षुल की बात सुनकर पास में ही खड़ी नीता ( विक्रम सिंह की पत्नी ) बोली-"बधाई हो आपको विधायक का पद!"

विक्रम सिंह मुस्कुराते हुए बोले-"धीरे- बोलो ...कोई सुन लेगा..दीवारों के भी कान होते हैं !"

अपराध... (लघुकथा)

"ये फेवीकोल का डब्बा तुमने धोकर क्यों रखा है, इसमें कुछ रखोगी क्या ?" पंकज ने ऐसे ही परिधि से पूछ लिया l

"हाँ, दीपावली आने वाली है, रँगोली बनाऊँगी l इसलिए, इस डब्बे को धोकर रखा है l इसमें आटा रखूँगी l जिससे मैं रँगोली बनाऊँगी l" परिधि ने हँसते हुए कहा l

"इस डब्बे में तो दो किलो से ज्यादा आटा घुसेगा l इतना आटा तुम बरबाद करोगी ! "पंकज ने दुबारा पूछा l

"हाँ दो किलो आटा का दाम कितना होता है ?, साठ रूपया ना, वो तुम मुझसे ले लेना l"

पंकज ने टोका- "बात साठ रूपये की नहीं है l बात खाने के बरबादी की है l इस देश में जब चौरासी करोड़ लोग भूखे सो जाते हैं l वहाँ तुम दो किलो आटे की रँगोली बनाओगी l तो तुम एक बहुत बडा़ अपराध कर रही हो l"

इस बात पर परिधि, पंकज को टोकते हुए बोली-"अपराध होगा तो अपराध ही सही, लेकिन मैं तो रँगोली बनाऊँगीं l"

"अब तुमको कौन समझा सकता है l", पंकज झुँझलाते हुए घर से बाहर निकल गया l

और, परिधि ये सोच रही थी, कि क्या ये सचमुच अपराध की श्रेणी में आता है या नहीं ?

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