लघुकथाएँ (81-100) : महेश केशरी

Hindi Laghu-Kathayen (81-100) : Mahesh Keshri

तस्वीर (लघुकथा)

लो, भाई विकास मेरे छोटे भाई जितेंद्र की शादी का कार्ड l देवेंद्र, अपने छोटे भाई जितेंद्र की शादी का कार्ड विकास के हाथों में थमाते हुए बोला l

और, एक मुस्कान विकास की ओर उछाल दिया l और जाते-जाते ये भी ताकीद करता गया l शादी में तुम्हें जरूर आना है lकोई बहाना नहीं चलेगा l देवेंद्र की फेंकी हुई मुस्कान मानों काँच के किरचें की तरह विकास के दिल में चुभी l लगा की सैकड़ों कीलें किसी ने उसके सीने में पैवस्त कर दी हों l उसका सर भन्ना गया l उसने दीवार पर टँगी एक पुरानी तस्वीर पर नजर दौड़ाई और लगा तस्वीर वाली लड़की सीधे उससे बातें करने लगी हो l

"तुम्हें, पहले ही बता देना था निशा l अगर ऐसी ही बात थी कि तुम मुझसे नहीं प्रशांत से प्यार करती हो, तो मैं, तुमसे जबरदस्ती थोड़े ही शादी कर लेता l" विकास बड़ी लाचारगी से अपनी बात निशा से कह रहा था l उसके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ रही थी l

"कैसे, कह देती l मेरे घर में मेरे पिताजी का मुझ पर प्रेशर था l वो, किसी भी हाल में मेरी शादी करके हटाना चाह रहे थें, लेकिन अब भी क्या बिगड़ा है ? प्रशांत मुझे अब भी अपनाने के लिए तैयार है l हमारा दो साल से अफेयर चल रहा था l मेरी मम्मी को भी ये बात पता थी l और तुम भी तो जवान हो, खूबसूरत हो l तुम्हें भी कोई ना कोई लड़की मिल ही जायेगी l" निशा प्रशांत की तरफ देखती हुई बोली l

"तुम्हारे लिए, ये छोटी बात होगी निशा, लेकिन, इन बीस दिनों में लगता है जैसे एक युग बीता हो l हमारी बहुत बदनामी हो रही है l लोग तरह-तरह की बातें मेरे बारे में कर रहें हैं l तुम्हारी एक गलती की वजह से लोग मेरे नामर्द होने की बात तक कह रहे हैं l एक आदमी और सब बातें तो बर्दाश्त कर सकता है , लेकिन, कोई उसे नामर्द कहे ये कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता l विकास को लगा उसका संतुलन गड़बड़ा जायेगा और उसके पैर जबाब देने लगे तो, वो वहीं धम्म से सोफे पर बैठ गया l

लेकिन, निशा को अपने किये पर कोई अफसोस नहीं था l शादी के बीस दिनों के बाद ही वो अपने प्रेमी प्रशांत के पास भागकर चली गयी थी l और, आज उसकी पंचायत उसके घर में हो रही थी l

सामने ही विकास की माँ शोभा देवी, विकास के पिताजी सौरभ गुप्ता, विकास के चाचाजी सुरेन्द्र गुप्ता चाची लक्ष्मी देवी बैठी थीं l

बगल वाले सोफे पर निशा के पिता सच्चिदानंद गुप्ता, निशा की माँ जानकी देवी और, उसका भाई रजत बैठे थें l

"इस लड़की ने तो हमारी नाक कटवा दी हमें कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा l" निशा के पिता को ताव आ गया वो निशा को मारने के लिए उठे लेकिन, रजत ने अपने पिता के हाथ को रोक लिया l

"मारपीट करने से कुछ नहीं होगा l" सौरभ गुप्ता बोले, "लड़की बालिग है l वो अपनी मर्जी से जिसके साथ चाहे रह सकती है l सच्चिदानंद जी, जो भी आपको समझाना चाहिए था वो, आपको शादी से पहले समझाना चाहिए था l अब तीर कमान से निकल चुका है l मसौदे में मैंने ये लिख दिया है कि निशा कुमारी वल्द सच्चिदानंद गुप्ता अपने पूरे होशो हवास में ये मानती है कि वो मेरे बेटे विकास गुप्ता वल्द सौरभ गुप्ता के साथ अपनी शादी को शादी ना मानकर अपने पुराने प्रेमी प्रशांत मल्लिक वल्द नकुल मल्लिक के साथ रहना तय करती है l आज दिनांक...... के बाद विकास गुप्ता वल्द सौरभ गुप्ता के साथ उसका कोई रिश्ता नहीं है l और, विकास गुप्ता अब स्वेच्छा से किसी भी लड़की के साथ दूसरी शादी कहीं भी कर सकता है l मैं भविष्य में उसे किसी तरह से परेशान नहीं करुँगी l

सत्यापित- लड़की का नाम-निशा गुप्ता, पता -..........हस्ताक्षर- ..., लड़के का नाम-विकास गुप्ता पता-...... हस्ताक्षर-.... l

प्रेमी का नाम-प्रशांत मल्लिक, पता-......हस्ताक्षर.......l

विकास को निशा से अपने फोन पर की हुई बातें याद आने लगी-"आई लव यू डार्लिंग l मैं तुम्हारे बगैर अब एक भी पल जिंदा नहीं रह सकती l शादी से पहले का एक-एक दिन काटना कितना मुश्किल लग रहा है l मैं तुम्हें बता नहीं सकती l अब एक- एक पल, कई-कई सालों की तरह भारी लगता है l सोचती हूँ कब हमारी शादी हो और कब मैं तुम्हारे पास दौड़कर चली आऊँ l मैं, तुम्हें दिन- दोपहर सुबह शाम बस याद ही करती रहती हूँ l अपने से एक क्षण भी तुमको अलग करके जीने की कल्पना मैं नहीं कर सकती l"

लेकिन, तब विकास को कहाँ पता था कि जिस बालू के ढे़र पर वो अपना घर बना रहा है l वो एकाएक भरभराकर गिर पड़ेगा l और निशा की कही हुई एक- एक बात झूठ निकलेगी l बस वो किसी तरह अपने बाप के विवाह को पूरी करने की शर्त को लेकर, ही वो विकास से शादी कर रही है l

अचानक से उसकी नींद खुली l वो, हड़बड़ाकर उठा पसीने से उसका पूरा शरीर नहा गया था l घड़ी पर नजर डाली रात के तीन बज रहे थे l देवेंद्र को कार्ड देकर गये तो कई दिन हो गये l उसने तस्वीर पर फिर एक नज़र डाली l निशा वैसे ही उस तस्वीर में उसके साथ कुटिलता से मुस्कुरा रही थी l शादी के लाल जोड़े में l विकास उठकर तस्वीर तक आया और रुमाल से उस तस्वीर की गर्द को साफ करने लगा l जहाँ, उसका अतीत उसको मुँह चिढ़ा रहा था l वो कुछ सोचकर फायर प्लेस की तरफ बढ़ा. और तस्वीर को आग के हवाले कर दिया l धू- धू करके उसका अतीत भी जलने लगा l सुबह जब उठा तो अपने आपको तरोताज़ा महसूस कर रहा था l

अजगर (लघुकथा)

और, अचानक से कुछ लड़कों का दल चलती हुई गाड़ी के सामने आकर खड़ा हो गया l और गाड़ी को रोकने का इशारा किया... l

गाड़ी चलाते बटेसर महतो..के पैर अचानक से ब्रेक पर पड़े और, गाड़ी चीं... ईं..ईं..करती हुई अचानक से बीच सड़क पर आकर रुक गई...l रुकी ..क्या.. रोकते-रोकते डिवाइडर से टकराते-टकराते बची... !

"चल.. बे बाहर निकल.. साला l.. हरामी गाड़ी मे क्या लेकर जा रहा है.. .....? खोल... गाड़ी को..."युवकों में से एक युवक चिल्लाया.. l

बटेसर महतो.... किसी तरह गाड़ी से बाहर निकले... और, घिघियाते हुए, मरी हुई आवाज में बोले-"गाड़ी में कुछ नहीं है... बाबू.. l"

एक लड़का आगे बढ़कर गाड़ी के पिछले हिस्से को खोलते हुए बोला-"कुछ... नहीं है, ...ये जानवर क्यों ले जा रहा है..?"

दूसरा लीडर नुमा लड़का, बोला -"कौन सा जानवर है....?"

पहला लड़का-"गाय है, धीरज भईया..गाय....!"

इतना सुनते ही धीरज.. का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया l वो, बटेसर महतो का गिरेबान पकड़ते हुए बोला-"क्या.. नाम.. है. बे.... तुम्हारा..?बोल.. नहीं तो.. यहीं पर तेरी कब्र बना दूँगा l" धीरज, बटेसर महतो की गर्दन पर अतिरिक्त दबाव बनाते हुए बोला l

उनमें से एक लड़का, बोला..-"साला गाय काटने के लिए ले जा रहा ना ?" लड़का बात की तह तक जाने के लिए जैसे..व्यग्र लग रहा था..l"

"नहीं-नहीं बाबू अब, गाँव में चारागाह बचे नहीं हैं l गाय अगर, किसी के खेत में चली गई तो, खेत वाले रोज़- रोज़ गालियाँ देते हैं l खुद, अपने बाल- बच्चों को खिलाने के लिए खाना नहीं है तो.. जानवरों को क्या..खिलायेंगे..?

चारा इतना मँहगा हो गया है, कि अब चार-पाँच जानवरों के लिए, चारा खरीद पाना मुमकिन नहीं है l" बटेसर महतो जैसे सफाई देते हुए बोले l

"मुमकिन.. क्या बोला तुमने मुमकिन ..? .."धीरज भईया जरूर ये साला मुसलमान है l

"क्या नाम है, बे तुम्हारा...?" एक लड़के ने, बटेसर महतो को हड़काया l

"ब.. अ.. बटेसर महतो l" बड़ी मुश्किल से ग्रामोफोन की सुई जैसे रेंगी, और बटेसर महतो के गले से आवाज जैसे बाहर निकली l

"बटेसर.. महतो या... अखलाक... या इमतियाज.. या फिर, सुलेमान.... सच- सच बता... नहीं तो .. आज तुम जिंदा..घर नहीं जा सकोगे l"

"तुम.. साबित करो.. कैसे साबित करोगे कि तुम बटेसर महतो हो ?तुम्हारे पास कोई प्रूफ है ?आधार कार्ड, पैन.. वोटर.. कार्ड.. कुछ भी l"लड़का धमकाता हुआ बोला l

"नहीं...."बटेसर महतो की आवाज़ फिर, घरघराई l

इन जानवरों से पीछा छुड़ाने के लिए, बटेसर, महतो ने बहुत प्रयत्न किया था l जब, उनके पास चारा खरीदने के लिए पैसे नहीं थे तो, वो अपने दूर के एक रिश्तेदार रामखेलावन से बोले थे, भाई, रामखेलावन, ना हो तो हमारे जानवर आप अपने यहाँ ले जाकर रख लो l आपके यहाँ रहेंगे तो, कम-से - कम जिंदा तो रहेंगे, लेकिन, हमारे यहाँ तो ये भूखों मर जायेंगे l

तब रामखेलावन भाई.. कान पर लगभग हाथ रखते हुए बोले थे l ना भाई..ना., बटेसर, धीरे-धीरे हमलोग भी अपने जानवर अब अपने घरों से हटा रहे हैं l चारा इतना मँहगा हो गया कि क्या कहा जाये l नये उम्र के लड़के अब गाय-गोरू पालन नहीं चाहते l अभी मैं.. अपने गाँव की ही घटना तुमको बता रहा हूँ l हमारे यहाँ, किशोरी बाबू जब अपने गायों को हटाने लगे, तो लोगों ने गाय खरीदने से ही मना कर दिया l अब.. कौन गाय को खरीदकर अपने गाँव ले जाये l रास्ते में आजकल गौ-रक्षा दल के लोग पकड़कर बहुत मारते- पीटते हैं l किशोरी बाबू.. ने तो पैसे भी लेने से मना कर दिया था l उल्टे.. उन्होंने ही हजार रूपये दूसरे गाँव के लोगों को गाय के साथ देने की पेशकश की थी, लेकिन, गौरक्षा दल के भय के कारण दूसरे गाँव के लोगों ने तिसपर भी गाय लेने से मना कर दिया था l कोई, झूठमूठ को परेशानी क्यों कर मोल ले..? और मैंने तो, सुना है, कि वो आजकल रास्ते में पकड़े जाने पर पूरा का पूरा मवेशी ही छीनकर अपने साथ लेकर चले जाते हैं....!

बटेसर महतो का शक कहीं और गहराया l कहीं ये लोग भी तो.. मेरे मवेशियों को लूटने के इरादे से ... चलते समय उन्होंने एक और गलती कर दी थी l अपना कोई परिचय पत्र साथ में लेकर नहीं चले थे l उन्हें क्या मालूम था, कि...वे ऐसी मुसीबत में पड़ जायेंगे..?

"मवेशियों को ले जाने के लिए परमिट तो होगा, तेरे पास l"एक और, युवक गुर्राते हुए बोला l

"परमिट..! एक गाँव से दूसरे गाँव तक मवेशी ढ़ोने के लिए परमिट भी चाहिए होता है.. मुझे नहीं पता था l इतने बगल के गाँव में ले जाने के लिए परमिट भी लगेगी l" बटेसर महतो सूखे गले से थूक को घोंटते हुए बोले l

"तेरे पास परमिट भी.. नहीं है... l" अजगर ने शिकार को जोर से पकड़कर, आखिरी, दाँव खेला l

"एक-एक करके सारी गायें, गाड़ी से उतार लो l" धीरज ने आदेश दिया l

और, लड़कों ने धीरे- धीरे पूरी गाड़ी खाली कर दी l

बटेसर महतो, ने गाड़ी स्टार्ट होने की आवाज सुनी... और वे कहीं, शून्य में खोते चले गए l

मजदूरी (लघुकथा)

रोज की तरह अनिल आज भी होटल में दिनेश के साथ, चाय पीने के लिए आया हुआ था l वो, चाय पी ही रहे थें, कि एक अधेड़ उम्र की दंपत्ति होटल में बारिश से बचने के लिए उनके टेबल के बगल में आकर बैठ गई l वो, लोग काफी संपन्न व्यक्ति लग रहे थें l पत्नी ने कीमती साड़ी, गले में मँहगा सोने का हार, पायल, बिछुवे, सोने की अँगूठी, पहन रखी थी l पति भी कीमती कोट, कीमती पैंट, चमचमाते हुए जूते, पहन रखे थे l

बाहर, मूसलाधार बारिश हो रही थी, जो, लग नहीं रहा था, कि थोड़ी देर में खत्म होगी l

अनिल ने गौर किया कि जो, औरत उनके बगल वाले टेबल पर बैठी है, वो थोड़ा लँगड़ा- लँगड़ा कर चल रही है l शायद, उसके पैर में कुछ खराबी है l

थोड़ी देर में जो दंपत्ति, टेबल पर बैठी थी l उनमें से पत्नी अपने पति से चाय की चुस्की लेते हुए बोली-"एक, बात कहूँ, लगता है, मेरी सैंड़ल, टूट गई है l होटल के बाहर में एक मोची बैठा हुआ है l क्या मैं, अपनी सैंड़ल उससे सिलवा लूँ ?"

पति, बोला- "थोड़ी, देर, में बारिश, खत्म हो जायेगी, चलकर किसी मॉल, से नयी सैंड़ल ले लेना l"

पत्नी, बोली-"लेकिन, चलकर गाड़ी तक कैसे जाऊँगी ..? मैं, एक कदम भी चलकर नहीं जा सकती l"

पति, विवश होकर बोला-"ठीक, है, जाओ l"

पत्नी, लँगडाते हुए, बाहर, सैंड़ल लेकर चली गई l

थोड़ी देर में पति से आकर बोली-"लाईये दस, रूपये का एक नोट दीजिये, सैंड़ल बन गया है l"

पति ने जेब से निकाल कर दस रुपये का एक नोट पत्नी की ओर बढ़ा दिया l

थोड़ी देरी में, पत्नी वापस आ गई, फिर, वो, अपने पति से बोली-"मोची सैंड़ल सिलाई के माँग, तो दस रूपये रहा है, लेकिन मैं पाँच रुपए से ज्यादा नहीं दूँगी l लाओ, पाँच का एक सिक्का दो, दस का नोट दूँगी, तो वो दस रूपये पूरे ही रख लेगा l"

पति ने जेब से पाँच का एक सिक्का निकाल कर पत्नी की ओर, बढ़ा दिया l

पत्नी, वापस मोची को पाँच रूपये देने चली गई l

अनिल और दिनेश होटल से चाय पीकर, बाहर निकल गये थें, और अनिल, दिनेश से चलते-चलते बोला-"इस मँहगाई के जमाने में यदि, किसी गरीब-मजदूर को हम पाँच रूपये की जगह दस रूपये दे, देंगें तो क्या हो जायेगा.. ?..कैसे-कैसे काँईयां लोग हैं...इस जमाने में...! जो मजदूर की वाजिब मजदूरी भी नहीं देना चाहते l आखिर, उनका भी तो घर होता है, उनके भी बाल- बच्चे होते हैं l

सॉरी दीदी.. (लघुकथा)

मालती ने अपने भाई, सुभाष को उलाहना देते हुए कहा-"तुम को तो क्षण भर का भी समय नहीं रहता होगा, कि अपनी बहन और, अपने भाँजे की कभी खैर-ख्वाही ही पूछ लो l उस दिन जब मेरे बेटे ने प्रतियोगिता परीक्षा में टॉप किया तो, सोशल मीडिया पर बधाईयों का ताँता लग गया, लेकिन, तुम्हें शायद खुशी नहीं हुई, होगी l तुम तो ...सोशल मीडिया पर भी बहुत एक्टिव रहते हो l फिर भी..कभी तुमने फोन भी ना किया..कि अपनी बहन और भाँजे का हाल ही ले लेते l"

रसगुल्ले के प्लेट से एक रसगुल्ला उठाकर अपने मुँह में रखते हुए, सुभाष मजाकिया अँदाज में बोला -" नहीं दीदी, ऐसी कोई बात नहीं है l बस यूँ ही याद नहीं रहा, इसलिए फोन नहीं कर पाया, सॉरी..दीदी !" सुभाष बात को टालने की गरज से बोला l

मालती देवी फिर, उसी रौ में बोली- "आखिर, अपनी जाति- बिरादरी का नाम प्रभाकर ने रौशन किया है l अब तक हमारी जाति में ऐसा मुकाम बहुत कम लोगों ने हासिल किया है l मुझे गर्व है अपने बेटे पर...!"

आखिर, सुभाष से भी ना रहा गया l वो भी पहलू बदलते हुए बोला- "हम किस बात का घमंड करें दीदी l इस बात का कि हमारा भाँजा, प्रभाकर ने लॉ की परीक्षा टॉप क्लास में पास कर ली है l देखियेगा, हमारा यही प्रभाकर, जब प्रैक्टिस करने लगेगा l जब कोई अपनी जाति वाला ही अपनी कोई परेशानी लेकर जायेगा, तो वो कैसे कन्नी काटता है.? वो, फाइल पर बिना चढ़ावा रखे उसे छूएगा भी नहीं l फिर, किस बात का गौरव .. हमें क्यों खुश होना चाहिए l अपनी जाति पे ? दीदी, प्रभाकर अब हमारा रहा ही कहाँ है l वो तो अब एक अलग दुनियाँ का होकर रह गया है, फिर, उसे किस लिए बधाई, और, शुभकामनाएँ दी जाये l अपने ही लोगों का खून चूसने के लिए l आम- आदमी, जब आदमी से बाबू बनता है, तो उसके, और उसके बाबू पन के बीच एक महीन रेखा खींच जाती है, सीमा के इस पार आम आदमी होता है, और उस पार बाबू l आम-आदमी से बाबू बनते हुए उसे पता ही नहीं चलता, कि कब वो अपने साथ वालों को बहुत पीछे छोड़ आया है l सॉरी, दीदी, मैं प्रभाकर को बधाई नहीं दे सकता l"

अपने, सगे भाई सुभाष के मुँह से ऐसी बात सुनकर मालती देवी को शॉक-सा लगा l छत पर घूमता हुआ हाईस्पीड पंखे की ठंढी हवा के बावजूद मालती देवी का पेशानी पसीने से तरबतर हो गया l

परिस्थिति (लघुकथा)

मिस्टर दुबे के आवभगत से पूरा तिवारी परिवार गदगद था l मिस्टर दुबे और मिस्टर तिवारी दोनों समधी बनने जा रहे थें l खाने-खिलाने का दौर-जारी था l हँसी- कहकहे जारी थे, लेकिन, मिसेज दुबे पुराने ख्यालातों की थीं l रूढिग्रस्त महिला l उनको इस रिश्ते में जाति को लेकर ही ऐतराज था, और सब बातें तो सब ठीक-ठाक थीं l उन्होंने अपने पति मिस्टर दुबे को एक बार फिर, कोहनी मारकर इशारा किया l ऐसे इशारे देखकर तिवारी जी ने मजाक में मिस्टर दुबे को झिड़की दी, अरे भाई आपकी होम मिनिस्टर कुछ कहना चाहतीं हैं, जाइये जाकर सुन भी आईये l

हालाँकि, मन में मिस्टर दुबे को अपनी श्रीमती जी की ये हरकत बहुत ही बुरी लगी, लेकिन, प्रत्यक्ष में वो हँसते हुए बोले-"तिवारी जी आप बैठिये..हम लोग..अभी तुरंत हाज़िर होते हैं l"

सोफे से उठकर, ..वे लोग बगल वाले कमरे में चले गये l

मिसेज दुबे, मिस्टर दुबे को खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए बोलीं-"ये भी क्या कोई बराबरी का रिश्ता है, हमारे जाति और गोत्र में और उनके जाति और गोत्र में बहुत ही अंतर है l वो तिवारी कंटाहा बाह्मण हैं, शोक- भोज में खाने वाले और हम... लोग कुलीन बाह्मण..!"

मिसेज दुबे इसके आगे कुछ कह पातीं, तभी उनके पति मिस्टर दुबे ने, उनको बीच में ही टोका दिया-" तुम केवल जाति देख रही हो, लेकिन ये नहीं देख रही हो कि लड़का सी. ए. है l दो लाख रुपये महीना कमाता है l तिवारी जी तो बीस लाख रुपये के दहेज में ही मान गये l किसी सजातीय के पास जाकर देखो अगर लड़का सी. ए. हुआ तो कम- से-कम पचास लाख रुपये माँगेगा l तुम हो किस फेर में l उस वक्त तुम्हारे दिमाग की सारी गर्मी उतर जायेगी, इसलिए जैसा मैं कहता हूँ l तुम वैसा ही करो l"

दुबे जी के ड़पटे जाने के बाद मिसेज दुबे धीरे-धीरे चलकर वापस फिर, से सोफे पर आकर बैठ गईं l ...तिवारी जी को परिस्थिति कुछ -कुछ समझ में आ गई थी l वो काजू की बर्फी अपने मुँह में रखते हुए बोले-"देखिए ना दुबे जी हमारी मिसेज कितनी गोरी-चिट्टी और खूबसूरत हैं l मैं इनके मुकाबले में कहीं नहीं ठहरता l हमारे समय में तिलक- दहेज का चलन उतना नहीं था l हमारी मिसेज के परिवार वाले उतने पैसे वाले लोग भी नहीं थे l मजबूरी में इनकी और हमारी शादी हो गई l इनकी माताजी को भी मैं पसंद नहीं था, इसलिए मैं कहता हूँ l शादी, लोगों के बीच नहीं, होती, बल्कि परिस्थितियों के बीच होती है l"

और, दुबे जी ने तिवारी जी को हल्की चपत लगाई, और बोले-"आप ठीक कहते हैं समधी जी l"

और..दोनों समधी कहकहे लगाकर हँस पडे़ l

कीमती पल... (लघुकथा)

"आदमी है कि लगातार पैसे के पीछे भाग रहा है l वो ठहरकर सोचने की जहमत भी नहीं उठाना चाहता की आखिर, उसे इतने पैसों की क्या जरूरत है..?..क्या करना है इन पैसों का l पैसों और झूठी शान के लिए आदमी मरा जा रहा..है l अँधी दौड़ चल पडी़ है.. अब तो l" श्रद्धा चाय की प्याली सुनील को पकडा़ते हुए बोली l

"तुम ठीक कहती हो श्रद्धा l जो चीज होती है, वो अच्छे के लिए ही होती है l अगर ये लॉकडाउन ना होता, तो मैं अपने परिवार और बाल-बच्चों के साथ इतना समय कैसे बीता..पाता.?" सुनील चाय की प्याली को टेबल पर रखते हुए ..बोला l

"मैं हर बात ठीक ही कहती हूँ l हाँ तुम्हें देर से समझ से आती है, ये और बात है l"श्रद्धा बोली l

.. तभी सुनील की कुर्सी के पास टेनिस का बॉल आकर गिरा l ये उसका.. बेटा विराट था l गेंहूँआं रंग सत्रह- अठ्ठारह साल का गबरू जवान हो गया था l दौड़कर आया, और बोला-"सॉरी पापा l"

और अपनी... टेनिस की बॉल उठाकर बाहर खेलने भाग गया l बिल्कुल, उसकी तरह ही तो है l

उसने, श्रद्धा को आवाज लगायी, -"जरा शीशा देना l"

श्रद्धा, आटा सने हाथ से ही शीशा उठा कर ले आयी l

सुनील ने शीशे में अपने चेहरे को देखा, और एक बार, फिर, विराट के चेहरे से अपने चेहरे को मिलाने लगा l

अब वो इस साल पचास का हो गया है lपचास, साल बहुत ज्यादा तो नहीं होता है l अब, अठारह साल वाली बात तो नहीं रहेगी ना l सुनील ने अपने चेहरे को एक बार फिर, शीशे में देखा l आँखों के नीचे...गढ्ढे पड़ने लगे हैं l कान से ऊपर के बाल सफेद हो गये हैं l

दाढ़ी भी पकने लगी है l खैर, अभी उतना भी बूढ़ा नहीं लग रहा है l उसके उम्र के उसके हमउम्र दोस्त बबलू, और मनोहर के सिर पर तो चाँद दिखाई देने लगा है l कुछ के तो बाल पूरे के पूरे सफेद हो गये हैं l "पापा, और चाय लेंगे.. ?" सुनील की तँद्रा टूटी l

उसने बिटिया रौशनी के ऊपर नजर दौड़ाई l बिल्कुल ताड़ की तरह लंबी हो गयी है l अपनी माँ की तरह l गोरा रंग, लंबी पतली छरहरी l बड़ी- बड़ी बोलती हुई आँखें l

"हाँ, बेटा एक कप और ले आ... "इस, घर- बाहर के चक्कर में ये तो सबसे जरुरी काम कभी याद ही ना रहा l बिटिया के ब्याह के बारे में तो कभी सोचने का वक्त ही नहीं मिल पाया l

"खाने में, क्या- क्या खायेंगे l केवल रोटी या चावल भी l" श्रद्धा ने आवाज लगायी l

"दोनों लूँगा.. थोडा़- थोड़ा l" सुनील ने खैनी थूकते हुए कहा l

"पापा.. चाय l" रौशनी चाय की प्याली मेज पर रखती हुई बोली l

सामने ओसारे में पलंग के ऊपर, उसके भाई अनिल का डेढ़ साल का बेटा.. गूड्डू अपने बडे़ भाई पिंटू को पलंग पर, से जबरदस्ती उठाने का प्रयत्न कर रहा था l इधर, गूड्डू को वो रोज़- रोज़ देखता आ रहा था l उसका अपने भाई पर जबरदस्ती का लाड़, वो पहले अपनी तोतली जुबान में उठने के लिए कहता, और जब पिंटू नहीं उठता तो जबरदस्ती उसका शर्ट का कॉलर पकड़ कर पिंटू को उठाता है, और, पलंग पर उसके साथ दौड़ लगाता और कभी- कभी उसके साथ गोल- गोल घूमता l उन दोनों को इस तरह खेलता देखकर बहुत अच्छा लग रहा था, सुनील को l

तभी, मोबाइल की घंटी बजी, और मोबाइल फोन अनिल की पत्नी सुषमा ने उठाया l फोन शायद, अनिल का ही था l कुछ देर बात करने के बाद सुषमा ने फोन का स्पीकर ऑन कर दिया l शायद, फोन की आवाज़ साफ- साफ सुनाई नहीं दे रही थी, या शायद फोन में कुछ खराबी आ गई थी l ओसारे में से आवाज़ छनकर सुनील के कानों में भी गिर रही थी l

सुषमा कह रही थी- "आखिर तुम अकेले ही बाहर काम करने वालों में से तो नहीं हो ना l सैकड़ों लोग बाहर जाकर विदेशों में काम कर रहे हैं l उनको वीजा समय पर मिल जाता है l तुमको कैसे नहीं मिल रहा है ?"

मोबाइल से, अनिल की आवाज़ बाहर गिर रही थी-"सभी देशों के वीजा के नियम अलग- अलग होते हैं l इस समय हमारे मुल्क के लोगों का इंडिया आने- जाने का वीजा नहीं मिल रहा है l तुम समझदार औरत हो इस समय वीजा नहीं मिल रहा है, लेकिन कुछ समय के बाद मिलने लगेगा l उतनी देर तक तो कम से कम धैर्य रखो "

सुषमा बात करते-करते अचानक उठकर अपने कमरे में चली गई l

सुषमा की आवाज अब सुनाई नहीं पड़ रही है l

और, सुनील को अचानक लगा की समय उसके आसपास से उसको लगभग छू कर गुजर गया है l मान लो सुरंग के अंदर से जब कोई ट्रेन गुजरती है और हम प्रकृति की सुँदरता को इस बीच निहार नहीं पाते l वैसा ही कोई क्षण l टूटते हुए तारे की तरह का l जो बहुत ही कम लोग देख पाते हैं l विराट और रौशनी .. गूडडू की तरह ही खेलते-खेलते कब इतने बड़े हो गये होंगे l मैंने उनके बचपन को मिस कर दिया l मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत लम्हा.. मुझसे छूट गया l

ओह..! सुनील को लगा की उसकी कोई बहुत ही कीमती चीज कहीं खो गई है l अपने बच्चों के बचपन से खेलने का अवसर l ऐसे तो बहुत सारे लोग चूक जाते होंगे l

फिर जैसे उसने अपने मन को तस्सली दी-एक मैं ही तो ऐसा अकेले नहीं हूँ l

रावण.. (लघुकथा)

दस साल का विशाल, दशहरे का मेला देखने रामलीला मैदान अपने पिताजी के साथ गया था l राष्ट्राध्यक्ष ने रावण के ऊपर तीर चलाया और, कुछ ही देर में रावण का पूतला धू-धू करके जलने लगा l

जिसे देखकर लोग आपस में हर्ष और उल्लास मनाते हुए एक -दुसरे को अबीर और गुलाल लगाने लगे थे l आज दशहरे का पर्व संपन्न हुआ था, और लोग बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी धीरे- धीरे मनाने लगे l

विशाल अपने घर आकर अपने पिता अंकित से बोला -"पिताजी, रावण की हत्या क्यों हुई थी...?"

अंकित अपने बेटे विशाल को सदियों पहले का किस्सा बताने लगा-"उन्होंने विशाल को बताया, बेटा सालों पहले, रावण, ने सीता जी का अपहरण कर लिया था l श्रीराम जी ने, रावण को बहुत समझाया कि वो सीता को ज्यों- का- त्यों लौटा दे, लेकिन, रावण बहुत ही जिद्दी और अहँकारी व्यक्ति था l वो नहीं माना और, परिणाम स्वरूप राम ने, रावण का वध कर दिया l"

विशाल अपनी जिज्ञासा को ज्यादा देर तक नहीं रोक सका l एक बार फिर, उसी लहजे में, अपने पिता अंकित से बोला-"पिताजी मैनें किताबों में पढ़ा है कि हम मनुष्य हैं l हमारे अंदर करुणा, क्षमा, दया, संवेदनशीलता हमेशा मौजूद होनी चाहिए l यदि ये चीजें हमारे अंदर नहीं है तो हम मनुष्य नहीं हैं l हमारे धर्म में तो यही सिखाया जाता है, कि सभी जीवों पर दया करनी चाहिए l अहिंसा परमो धर्म: l गलती से भी हम एक चींटी को भी ना मारें l क्या भगवान श्री राम के अंदर ऐसी, दया, करुणा, क्षमा और संवेदनशीलता नहीं थी...?"

तभी, उसने एक सवाल और पूछ लिया-"क्या हम मनुष्य भी इतने असंवेदनशील हैं, कि हर साल एक रावण को जलाते हैं l हमारे अंदर भी दया, करूणा, खत्म हो गई है, शायद l"

विशाल के इस प्रश्न पर अंकित उजबकों की तरह खाली दीवार को ताकने लगा l एकाएक उसे कोई जबाब नहीं सूझ रहा था l

एक सपने की मौत (लघुकथा)

मेडिकल सुपरिटेंडेंट मलखान सिंह लगातार आते कोरोना के केसों से पहले ही परेशान थें l

तभी डॉक्टर वैभव, मलखान सिंह के कमरे में दाखिल हुए और बोले -"किशोरी बाबू की पत्नी मर गईं हैं l उनकी बॉड़ी उठाने के लिए कोई एंबुलेंस वाला अभी तक नहीं आया है.. .अब ?"

मलखान सिंह डॉक्टर.. वैभव की बात को बीच में ही काटते हुए बोले-"अब, बॉडी को ले जाने के लिए, एंबुलेंस नहीं मिल रही है तो, मैं कहाँ से एम्बुलेंस लाऊँ ..? जाओ जाकर किसी प्राईवेट गाड़ी वाले को या किसी ऑटो वाले को बोलो कि वो, किशोरी बाबू की पत्नी की बॉड़ी को घाट तक ले जाने की व्यवस्था करे l"

और, मलखान सिंह ने दुसरा सिगरेट सुलगा लिया l दरअसल कोरोना मरीजों के लगातार अस्पताल आने और बेड की किल्लत और ऑक्सीजन- वेंटिलेटर की कमी से जूझ रहे अस्पताल की स्थिति से वो कुछ परेशान तो थे ही l रही -सही कसर उनके दस साल के पोते के खराब होते स्वास्थ्य ने पूरी कर दी थी l

गौरव को साँस लेने में परेशानी महसूस हो रही थी, और उसे भी कहीं कोविड हुआ तो !

इसलिए भी शायद, मेडिकल सुपरिटेंडेंट मलखान सिंह कुछ ज्यादा ही खीजे हुए थें l

लेकिन, डॉक्टर वैभव मलखान सिंह से ऐसे नाजुक वक्त में ये भी नहीं कहना चाह रहे थे कि सर कोई ऑटो वाला भी कोविड पेशेंट की बॉड़ी अपनी गाड़ी में ढोकर नहीं ले जाना चाह रहा है l आटो वाले को डर है कि कहीं वो, या उसकी सवारी भी कहीं कोविड से मर गये तो..?

या अमूमन जैसा कि होता है लोगों को अगर ये पता चल गया कि फलाने आटो वाले ने कोविड की बॉड़ी को शमशान घाट पहुंचाया है तो, उसके ऑटो में कोई भी पैसेंजर बैठना नहीं चहेगा l

किशोरी बाबू, मलखान सिंह के आफिस के बाहर ही खड़े थें l पचहत्तर साल से कम के ना रहे होंगे l धोती- कुर्ता.. हाथ में छड़ी l वे मलखान सिंह और डॉक्टर वैभव की बातें सुन रहे थें l ये खबर सुनी तो वहीं कुर्सी पर धम्म से गिर गये पडे़ l

..उनके बाबूजी रामटहल साव इसी चंपारण से थें l गाँधी बाबा का पूरा सहयोग किया था उन्होंने l भारतीय स्वतंत्रता सँग्राम में l चाहे नील की खेती का विरोध हो l या असहयोग आँदोलन l या भारत छोडो़ आँदोलन l सबमें बढ़- चढ़ कर हिस्सा लिया था रामटहल साव ने l गाँधी बाबा जब भी चंपारण आते रामटहल साव के घर पर ही रुकते l अँग्रेजों के दाँत खट्टे करने वाले कई किस्से सुनाते रहे थें रामटहल साव , किशोरी बाबू को l

"किशोर बाबू .. ऐ..किशोरी बाबू.. कोई ऑटो वाला नहीं मिल रहा है इस वक्त l अपनी पत्नी की लाश आप उठवाइये l अभी मेडिकल इमर्जेंसी है l हम ज्यादा टाइम तक बॉड़ी नहीं रख सकते l आप कहें तो किसी ठेले वाले को बुलवा दूँ l" डॉक्टर वैभव जल्दी बाजी दिखाते हुए बोले l

"सत्याग्रह का ये हाल होगा.. मुझे नहीं पता था..!" किशोरी बाबू के मुँह से एक अस्फुट आवाज निकली...

"कृपाशंकर...ए.. कृपाशंकर... "वार्ड ब्वॉय को डॉक्टर वैभव ने आवाज लगाई l

"हाँ साब बोलिये.. "कृपाशंकर सुर्ती मलता हुआ आया l

"जा.. शनिचरा वैन वाला को बुला ला l किशोरी बाबू की पत्नी.. जानकी देवी की.. बॉडी ले जानी है l"

डॉक्टर वैभव कृपाशंकर को समझाते हुए बोले l

कुछ देर बाद शनिचरा वैन टुनटुनाता हुआ आकर खड़ा हो गया l

तब, डॉक्टर वैभव.. किशोरी बाबू.. कृपाशंकर. और शनिचरा ने मिलकर किसी तरह जानकी देवी की लाश को वैन पर लादा l और, शनिचरा, वैन पर पडी़ जानकी देवी की लाश को खींचता हुआ शमशान की तरफ ले कर चल पड़ा l

इधर... लाऊडस्पीकर पर एक पुराने फिल्म का गीत बज रहा था- "दिल... दिया है जाँ भी देंगे.. ऐ... वतन.. तेरे लिए.l"

और, किशोरी बाबू गमछे के कोर से अपने आँसू पोंछते हुए, वैन के पीछे- पीछे चल रहे थें l उनके, अंदर अब टूटकर बिखरने लगा है l चंपारण का नील विद्रोह, असहयोग आँदोलन, भारत छोडो़ आँदोलन.. गाँधी बाबा... और... रामटहल साव के सपनों का हमारा भारत... !!

बीच वाले लोग (लघुकथा)

कुलजीत ने फिर एक बार, सीमा पार से होती मोर्टारों की गरज सुनी, लेकिन, उसके लिए ये कोई नई बात नहीं थी l उसको कश्मीर के उस हिस्से में रहते हुए अरसा बीत गया था l अब तो उसे रात को कभी भी दो- ढ़ाई बजे या अलस्सुबह ही ऐसे मोर्टारों और बमों की आवाजें अक्सर सुनाई पडती थीं l और, आये दिन आतंकवादियों द्वारा लोगों का कत्लेआम या सुरक्षा कर्मियों या पुलिस पर हमले, ये सब दुकान से जिबह किये गये मुर्गे को खरीदकर लाने जैसी घटनाओं की तरह हो गई थी l

चँदा ने पत्थरों के ऊपर जगह बनाई और कुलजीत और, प्रीतो को खाने के लिए आमंत्रित किया l प्रीतो ने बैग से चादर निकालकर वहीं पत्थरों के एक ओर समतल मैदान पर चादर बिछा दी l

प्रीतो खाना खाते हुए, देवदार के लंबे शँकुधारी, पेड़ों को देखकर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकी l जिसके पते गोल- गोल थें l वो उन्हें बेसाख्ता निहारे जा रही थी-"कुलजीत भाई, काश्मीर को ऐसे ही लोग धरती का स्वर्ग नहीं कहते l"

तभी, उसे सीमा के उसपार कुछ लड़के किक्रेट खेलते हुए दिखे l

चँदा ने कुलजीत से कहा-"कुछ भी तो अंतर नहीं है l हमारे और वहाँ के लोगों में l जिस नदी के किनारे, बैठकर आज हम खाना खा रहे हैं l देखो ये नदी उस पार भी वैसे ही बह रही है l ये चिनार, और देवादार भी एक ही शक्ल के हैं l पानी की मिठास भी एक ही जैसी होगी l फिर, ये सरहदें क्यों बनाई गई पता नहीं चलता.. ?"

तभी, लगा कहीं आसपास में ही मोर्टार का गोला गिरा और, प्रीतो और चँदा दौडकर पास के देवदार से लिपट गयीं l

प्रीतो और चँदा की धडकनें जोर -जोर से धडकनें लगी थीं l वे वापस अपने लॉज लौट गये थें l

लॉज से नदी सटकर बह रही थी l उसपर पड़ने वाली सूर्य की किरणें पानी में अभी भी चमक रही थी l प्रीतो ने काफी का प्याला चँदा और कुलजीत को पकड़ाया l और, खुद खिड़की पर बैठकर धूप का आनंद लेने लगी l

"सीमा पर बीच वाले लोगों की हालत ठीक नहीं होती है l" कुलजीत काफी को धीरे- धीरे पीते हुए बोला l

"ऐसा क्यों.. ?" प्रीतो बोली l

कुलजीत, खिड़की के और करीब सरक आया l और, धूप की ओर देखते हुए बोला-"हमारा यहाँ कुछ नहीं होता l हम केवल इस धूप के कतरे... इन... देवदार-चिनार, के पेड़ों के होकर रह जातें हैं l ये नो मेंस लेंड है l और हम बीच के लोग l जो बीच के लोग होते हैं, वो, ताउम्र अपनी पहचान नहीं बता पाते l उनकी कोई धरती नहीं होती l उनका कोई घर नहीं होता l बहुत ऊपर के लोग कहीं ना कहीं इस पार या उस पार अपना जुगाड़ बैठा लेते हैं, लेकिन नो मेंस लेंड वालों के लिए ऐसा करना आसान नहीं होता l"

बीच के लोग l हाँ प्रीतो, और और चँदा भी तो बीच के ही लोग तो थें l ना आदमी ना औरत l ट्राँसजेंडर..! कुलजीत की तरह..ना इधर के ना उधर के l यहाँ तक की माँ- बाप का भी पता नहीं l कहीं किसी.. मँदिर या कूड़े में फेंकें हुए l माँ- बाप बदनामी के डर से अपना नाम भी ना दे पाते l उनका भी कहीं कुछ नहीं था l ना कोई परिवार, ना ही रिश्तेदार l समाज में सबसे उपेक्षित और हँसी के पात्र l दूसरों की दया पर जीने वाले l समाज में उनकी जरूरत केवल बाल-बच्चों की पैदाइश के समय थी l

पता नहीं चँदा और प्रीतो की आँखें कैसे भींगने लगी थीं..?

रोते हुए चँदा और प्रीतो एक साथ बोलीं-"हाँ, कुलजीत बीच के लोग कहीं के नहीं होते l"

तीसरे तरह के लोग (लघुकथा)

जुम्मन चचा की सुपर मार्केट में दूकान थी l अक्सर मैं वहाँ जाया करता था l अपने पिताजी के साथ चप्पल-और जूते खरीदने l बचपन में जब भी जाता, वो बगल वाले ठेले से मुझे कचौरी और जलेबी खरीदकर देते l मैं वहीं उनकी दुकान पर, बैठकर कचौरी और जलेबी खाता l मेरे कचौरी खत्म करने के बाद वे ठेले वाले लड़के को आवाज देते l लड़का मुझे ग्लास में पानी लाकर दे जाता, और, मेरी जूठी प्लेट उठाकर ले जाता l पिताजी, जुम्मन चचा को जूते के पैसे देते और कचौरी के भी, लेकिन, जुम्मन चचा कचौरी जिलेबी के पैसे पिताजी से नहीं लेते l

बहुत दिनों बाद, आज सुपर मार्केट जाना हुआ l मैं जुम्मन चचा की दुकान पर गया l ठेला वाला लड़का तो था, लेकिन, वो लड़का नहीं था l

जुम्मन चचा ने मुझे पहचान लिया था l मैं उनकी ओर देखकर मुस्कुराया l वो भी मुस्कुराये l फिर, बोले- "कैसे हो .. ?"

मैनें कहा- "ठीक हूँ, आप कैसे हैं.. ?"

जुम्मन चचा-"हाँ, मैं भी ठीक ही हूँ l"

उन्होंने ठेले वाले लड़के को इशारा किया l ठेले वाला लड़का एक प्लेट में दो कचौरी और सब्जी लेते आया l

मैं कचौरी और सब्जी खाने लगा l जुम्मन चचा दूकानदारी में लगे रहे l लेकिन, मैं एक बात नोटिस कर रहा था. कि वो थोड़ी जल्दीबाजी में लग रहे थें l वो अपने स्टाफ वकील पर झुँझलाते हुए बार-बार कह रहे थें-"वकील, जूते की जोडियाँ कुछ कम खोलकर दिखलाओ l समेटने में भी वक्त लगेगा l अभी लॉकडाउन का समय है l आठ बजे ही दूकान बढ़ा देनी है l" वो वकील को जल्दी- जल्दी दूकान बढ़ाने के लिए कह रहे थें l

मैनें उनकी दूकान से दो जोड़ी चप्पल खरीदा l और पैसे चुक्ता किया l

फिर, मैंने उनसे पूछा -"चचा, दूकान बढाने का समय तो आठ बजे तक का है l लेकिन, आप इतना हड़बड़ा क्यों रहे हैं. ... ? आपके अगल- बगल वाले सारे दूकानदार तो आराम से दूकान बढ़ा रहे हैं, लेकिन, आप इतनी हडबडी में..क्यों हैं.?"

"चाय पियेंगे जुम्मन चचा.. ?"

जुम्मन चचा कुछ नहीं बोले l मैनें लड़के को इशारे से बुलाया l लड़का दो कप चाय ले आया l

वे चाय का ग्लास अपने हाथों में फँसाकर चाय पीने लगे l

वे कुछ देर चुप रहे फिर, बोले-"हमारे पास, दोनों तरह के लोग आते हैं l वे, हमसे सामान खरीदने में कोई भेद नहीं करते l लेकिन, कुछ खास समय में जैसा कि अभी है, हमें सावधान हो जाना पडता है l हम दोनों के बीच एक तीसरे तरह के लोग पैदा हो जाते हैं l जो दूकानों को लूटने, उन्हें जलाने की योजनाएँ बनाते हैं l इसलिए भी, मैं कुछ ज्यादा सावधान रहता हूँ l"

अब तुमसे कहते तो ठीक नहीं लगता l लेकिन, दूकान बढाने का समय हो गया है l उन्होंने मुझे चलने का इशारा किया l मैं अपनी जगह से हिला l चप्पल की पन्नी उठाई और, घर की तरफ चल पड़ा l

चलते समय रास्ते में मुझे एक बरगद का पेंड़ मिला l लड़के- लड़कियाँ दोनों उसपर, झूला झूल रहे थें l जु्म्मन चचा मुझे अपने गाँव के बरगद के पेंड़ की तरह लगते थें l सफेद बाल, कमर से झुके हुए lलाठी के सहारे चलते l बरगद के नीचे तक लटकती लताएँ l जु्म्मन चचा के बाल भी बरगद की लताओं की तरह नीचे लटके रहते l वहाँ, उस पेंड़ के नीचे, लकड़ी काटने वाले, लकड़हारे सुस्ताते l मीलों दूर से चलकर आया हुआ कोई यात्री सुस्ताता l वे, लकड़हारे से उसका धर्म नहीं पूछता था l ना ही यात्री से उसकी जाति l

कब, धीरे- धीरे जु्म्मन चचा उस बरगद के पेंड़ में बदल गये l मुझे पता भी नहीं चला l और, वो तीसरे तरह का आदमी आज के पेंड़ काटने वालों में l

अग्निपरीक्षा (लघुकथा)

रात अपने पूरे शबाब पर थी l स्लीवलेस गाउन में नीता किसी परी से कम नहीं लग रही थी l वो अपने पति नरेंद्र के थोडा़ और करीब सरक आई, और नीता ने नरेंद्र को अपने आगोश में लेना चाहा, लेकिन नरेंद्र ने उसे धीरे से परे कर दिया l

"मैं, इधर कुछ दिनों से तुम्हारे व्यवहार में बहुत अंतर देख रही हूँ l अब हमारे बीच पहले की तरह प्रेम नहीं बचा है l"

नीता पलंग से उठकर कुर्सी पर जा कर बैठ गई l

नरेंद्र ने अपनी बात फिर, से एक बार दुहराई-"उन्होंने तुम्हारे साथ क्या- क्या किया l तुम मुझे साफ - साफ बताओ.. ?"

नीता ने कुर्सी पर पहलू बदलते हुए नरेंद्र को जबाब दिया-"मैं तुमसे कितनी, बार, कह चुकी हूँ, कि उन्होंने मेरा अपहरण सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे उस पुल वाले टेंडर को लेकर ही किया था l तुम अगर, पहले ही उस टेंडर को लेने से मना कर देते तो शायद, मेरा अपहरण नहीं होता l तुम्हारी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की कीमत मुझे चुकानी पडी l वे मुझे अपने साथ ले जरूर गये थें, लेकिन, बहुत ही इज्जत के साथ पेश आये l समय से खाना-पीना भी देते थे l वो चाहते तो मेरे साथ बहुत कुछ कर सकते थे l लेकिन, मुझे उन्होंने तुम्हें ज्यों- का-त्यों लौटा दिया l रही बात दुनियाँ की तो, दुनियाँ ने तो सीता जी पर भी विश्वास नहीं किया था l फिर, तो मैं एक सामान्य औरत हूँ l"

"लेकिन, मैं लोगों को कैसे समझाऊँ.. ?" नरेंद्र बोला l

"मुझे लोगों से नहीं तुमसे मतलब है l" नीता बोली l

"और, लोगों को तुम समझाना भी क्यों चाहते हो ? .. लोग तो तरक्की पाने के लिए अपनी बीबी को भी गैर मर्दों के हवाले कर देते हैं l" नीता बोली l

"लेकिन, मैं उन मर्दों में से नहीं हूँ, जो, अपनी बीबी की कमाई खाऊँ l" नरेंद्र खिड़की की तरफ घूरते हुए बोला l

नीता, नरेंद्र के और करीब खिसक आई, और, नरेंद्र के कँधे पर सिर रख दिया l

"नीता मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ l" नरेंद्र ने भूमिका बाँधी l

"क्या कहना चाहते हो बोलो.. ?" नीता नरेंद्र के कँधे पर वैसे ही झुकी रही l

नरेंद्र ने पहलू बदला और, अपने से नीता को फिर एक बार अलग करते हुए बोला- "लोग, दबी जुबान में ये भी कहते हैं, कि नरेंद्र साहब की पत्नी के साथ उन लोगों ने सात दिनों तक ऐश किया l अपने कलीग की हँसी मुझे रह- रहकर चुभती है l आखिर मैं किन-किन लोगों का मुँह बंद करुँ.? इसलिए मैनें तुमसे तलाक लेने का फैसला किया है l"

नीता का कलेजा एक बार धक से रह गया l धड़कते हुए दिल से वो नरेंद्र से बोली-"यानी तुम लोगों की बातों में आ गये l तुमने मेरे साथ जो प्रेम किया था वो सब झूठ था l तुम्हारे सारे वादे झूठे थे l ठेका किसी और कंपनी का था l मेरा अपहरण करने वाले दूसरे लोग थें l ठेके से फायदा या नुकसान तुम लोगों का होता l आखिर, इन सबमें मेरी गलती कहाँ है ? मैं तो तुम सबके बीच बेकार में ही पिस गई l ऐसा हम औरतों के साथ सदियों से होता आ रहा है l"

"और, तुम मेरा मुँह मत खुलवाओ, तुम भी कोई दूध के धुले नहीं हो l मेरी पीठ पीछे तुम मेरी सहेलियों के साथ-क्या- क्या गुल खिलाते रहे हो ? मुझे सब पता है l ऐसे तुम मुझे क्या तलाक दोगे l मैं ही कल तुम्हें तलाक के पेपर भिजवाती हूँ.. !"

यह कहर वो तेजी से सीढियाँ उतरकर नीचे चली गई l

कमरे में एक बार फिर से चुप्पी के कतरे तैरने लगे l

अभी उम्मीद बाकी है (लघुकथा)

उस, मँदिर में लोग लगातार आ -जा रहे थे l प्रसाद खरीदने वाले से लेकर, फूल-माला खरीदने वाले l लेकिन, किसी की नजर बूढ़े गणपत पर नहीं पडी l

लेकिन, उस बूढ़े आदमी को देखकर रोहित ने कयास भर लगाया l हो ना जिस बात का अंदेशा उसे है, कहीं वो सच ही ना हो जाये l ऐसा सोचकर ही उसका दिल् जोर- जोर से धडकने लगा l आये दिन अखबार में ऐसी घटनाएँ अब आम हो चली थीं l जिसे गाहे- बगाहे वो अखबार में पढ़ता रहता था l कभी किसी रेलवे स्टेशन पर तो, कभी कहीं किसी बस डिपो के यात्री पड़ाव पर या कभी कहीं किसी पार्क में l वो ऐसी घटनाओं से रु-ब- रु होता रहता था l रोहित की अनुभवी आँखों ने इसे ताड़ लिया था l

वो बूढ़े गणपत के पास थोड़ा और करीब खिसक आया l फिर उसने उनका परिचय जानने के लिहाज से पूछा- "बाबा आप यहाँ कब से बैठे हैं.. ? मैं आपको यहाँ नया देख रहा हूँ. ! आपका नाम क्या है बाबा.. ?"

बूढा गणपत करीब अस्सी साल से कम के ना रहे होंगे l रुई कि तरह सफेद बाल l आँखों पर मोटे लेंस का चश्मा l धोती और सफेद कुर्ते में वो बेंच के किनारे ऊँकडूँ हो कर बैठे थें l चश्मे को ठीक करते हुए बेहद फुस्फुसाती हुई आवाज में बोले- "कौन नीरज .. तुम आ गये क्या... ?"

रोहित भी उनके बगल में जा बैठा-"ये नीरज कौन है, बाबा.. ?"

"तुम नीरज नहीं हो, ..तो नीरज कब आयेगा..?.. क्या तुम उसके दोस्त हो.. ?" बूढ़ा गणपत बहुत धीरे- धीरे फुस्फुसाती हुई आवाज में बोल रहे थें l

"चाय पियेंगे.. ?" रोहित का दिल डूबने लगा l

बूढ़ा कुछ नहीं बोला l रोहित ने बगल वाले लड़के को आवाज दी l लड़का दो कप चाय ले आया l

उन्होंने चाय के कुल्हड को अपने दोनों हाथों में फँसा लिया l फिर, वो फुस्फुसाती हुई आवाज में बोले-" पिछले महीने अपने इलाज के लिए यहाँ अपनी बेटी और दामाद के यहाँ आया था l वो यहाँ दिल्ली में ही कहीं रहते हैं l मुझे नहीं पता l आज यहाँ मँदिर के पास नीरज और, रेणु ने बिठा दिया l यह कहकर कि वो थोड़ी देर में आकर उन्हें ले जायेंगे, लेकिन, सुबह से दोपहर हो गयी वो अब तक नहीं आये l मैं बूढ़ा आदमी आखिर, कब तक उनका इंतजार करुँ..? पता नहीं वे कब तक आयेंगे l"

रोहित ने जो अनुमान लगाया था, वो बिल्कुल सही निकला l बूढ़े गणपत को वो लोग मँदिर परिसर में छोडकर भाग गये थें l

"घर कैसे जायेंगे.. ?" रोहित ने पूछा लिया l

उन्होंने जेब से एक बहुत पुरानी डायरी निकाली और, रोहित की तरफ बढाते हुए बोले-"थोडा़ और देख लेते, हो सकता है नीरज और रेणु लौट आयें l इस डायरी में मेरा इंदौर वाला पता लिखा है l"

रोहित ने गौर, से डायरी खोलकर देखा.. उसमें इंदौर वाला उनका पता टूटी- फूटी हिंदी में लिखा हुआ था l

रोहित को मँदिर परिसर में आये दो धंटे से ज्यादा हो गया था, लेकिन, रोहित को गणपत बाबा का कोई शुभचिंतक वहाँ नहीं दिखा l

रोहित ने"अभी उम्मीद बाकी है "के ( एन. जी. ओ. )वाले अपने मित्र शुभम को फोन किया l सारी घटना उनको विस्तार से बताई l शुभम ने आश्वसत किया वो दो घंटे में आ रहा है l

बूढ़ा गणपत फिर, धीरे से बोले-"तुम्हें क्या लगता है l नीरज और रेणु आयेंगे... ?"

रोहित कुछ बोल नहीं पा रहा था l

वैन, आ गई थी l सारी औपचारिकताएं पूरी की गईं l

बूढ़ा गणपत वैन में बैठ गये थें l रोहित ने उन्हें इंदौर भेजने का एन. जी.ओ. के जरिये व्यवस्था कर दिया था l

रोहित ने बूढ़े की आँखों में झाँका l बूढ़े गणपत की आँखें ड़बड़बाई हुई थीं l वे फुस्फुसाती आवाज में धीरे से बोले -"तुम इस दुनिया में एक फरिश्ते की तरह हो l मैं तुम्हें नहीं जानता l मेरे सगे वाले लोग मुझे छोड़कर चले गये l तुमने मुझे मेरे घर भेजने की व्यवस्था कर दी l मैं तुम्हारा ये एहसान कैसे चुकाउँगा .?..समझ नहीं पा रहा हूँ l तुम मेरे पोते के जैसे ही हो l दु:ख है कि तुम्हारे जैसे लोग इस दुनियाँ में बहुत कम बचे हुए हैं l कभी इंदौर आना तो मेरे पास जरूर आना l अच्छा अब चलता हूँ l"

रोहित ने झुककर बूढ़े गणपत के पाँव छू लिये l बूढ़ा गणपत फूट फूट कर रोने लगा l

रोहित... ने बूढ़े को सहारा देकर वैन में बैठाया l वैन धीरे- धीरे आँखों से ओझल हो गई l

कुँठा (लघुकथा)

अपराजित ने एक बार फिर नोटिस किया l उसकी सबसे अच्छी दोस्त रागिनी अब उसके किसी भी पोस्ट पर ध्यान नहीं देती l ना ही कभी कोई कमेंट करती है l आखिर अपराजित से ऐसी कौन सी गलती हो गई है ? बहुत देर तक वो रागिनी के पुराने पोस्ट को खँगालता रहा l लेकिन उसे अपने किसी कमेंट को देखकर कभी ऐसा नहीं लगा कि उसने रागिनी के पोस्ट पर कभी ऐसा कोई कमेंट किया हो l जिससे रागिनी ने उसके पोस्ट पर लाइक, कमेंट करना बिल्कुल ही बँद कर दिया है l

"आज कल खाना बनाने में तुम्हारा मन बिल्कुल भी नहीं लगता है रागिनी..l कल सब्जी में मिर्ची ज्यादा थी l और, आज दाल में नमक ज्यादा है l आखिर तुम खाना ढँग से क्यों नहीं बनाती ? सारा-सारा दिन फेसबुक और व्हाटसैप पर क्यों लगी रहती हो..?" नरेश, रागिनी पर गुस्से से फुँफकारते हुए बोला l "नहीं मैनें तो खाना खाकर देखा है l सब्जी में मिर्च भी ठीक- ठाक है, और दाल में नमक भी ठीक है l" रागिनी खाना खाते हुए बोली l

"तो क्या मैं झूठ बोला रहा हूँ ?" नरेश की आवाज़ अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा ही तेज हो गयी l

"ऐसा मैंने कब कहा l हाथ-हाथ की बात है, कभी-कभी हो जाता है l" रागिनी ने पानी पीते हुए कहा l

"आजकल तुम्हारा फेसबुक-फ्रेंड, अपराजित तुम्हारी पोस्ट पर कुछ ज्यादा ही लाइक- कमेंट करता है l क्या बात है..? ..कहीं तुम्हारा उसके साथ चक्कर तो नहीं चल रहा है.. " नरेश कौर को चबाते हुए बोला l

"तब, तो बात, सब्जी में, मिर्ची की या दाल में नमक की तो बिल्कुल भी नहीं है, नरेश l बात कुछ और ही है l जिसे तुम सीधे- सीधे नहीं कहना चाहते, और, तुम्हें मालूम है मुझे हर बात सीधी ही सुनने की आदत है l तुम घूमा- फिरा कर बात मत करो तो ज्यादा अच्छा है l" रागिनी भी उसी लहजे में बोली l

नरेश रोटी के कौर को मुँह में चबाते हुए बोला- "कल देर रात तक तुम ऑनलाईन रही l करीब दो बजे तक l

आखिर, करती क्या हो तुम इतनी रात तक ऑनलाइन रहकर ? तुम्हारा इस तरह से, दूसरे- लोगों को लाइक-कमेंट करना, और दूसरे लोगों का तुम्हें.. सो- ब्यूटीफूल, नाइस, कहना.. मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है l लोगों का तुम्हें गुलाब देना भी मुझे पसंद नहीं है l आखिर, कितने मर्दों से तुम्हारा चक्कर चल रहा है l अब, ऐसा बिल्कुल भी नहीं चलेगा l फिर, लगभग, फैसला देने के अंदाज में नरेश बोला-आज से तुम अपना फेसबुक एकाउँट बँद करो l मैं नहीं चाहता कि मेरे घर की इज्जत का कचरा कहीं बाहर जाकर हो l समझ रही हो ना तुम मैं क्या कह रहा हूँ ?"

"लेकिन, मैं ऐसा नहीं कर सकती l" रागिनी के मुँह से भी सहसा निकल गयाl

नरेश अपने आपको जब्त नहीं कर सका l और उसने एक झापड़ रागिनी के गाल पर रसीद कर दिया l

फिर बोला- "हाँ तुम ऐसा क्यों- कर करने लगी..? तुम रँsss जो हो l स्याली .रँsss कहीं की..l साली एकदम बाजारु औरत हो गई हो तुम..l" और नरेश गुस्से से पैर पटकता हुआ बाहर निकल गया l

बिल्ली (लघुकथा)

उस आकृति को देखकर वहाँ मौजूद लोग कयास भर लगा पा रहे थें l बंटी की माँ शायद किसी काम से बाहर गयी थी l राधा देवी की दोनों बेटियाँ, जया, और खुशबू सामने ही सोफे पर बैठकर बंटी की बातों को केवल सुन भर रही थीं l वो माँ के दशकर्म में शामिल होने के लिए अपने नैहर आयी हुईं थीं l बंटी.. अपनी बुआ की बेटी सुरभि से बोला-"लगता है दादी( राधा देवी) बिल्ली बन गईं हैं l"

सुरभि ने नजदीक जाकर बालू पर उग आये आकृति को बडे़ ही ध्यान से देखते हुए बोली-"नहीं- नहीं, ये बाघिन के पंजे का निशान जैसा लग रहा है l बिल्ली के पंजे जैसा निशान तो बिल्कुल भी नहीं है l ये..बिल्ली के पंजे के निशान तो हो ही नहीं सकते l बाघिन के पंजे के निशान ही हैं l" सुरभि जैसे एकदम से फैसला देते हुए बोली l

"दादी को दूध, और दूध से बनी रबड़ी खूब पसन्द थी l हो -ना- हो दादी बिल्ली ही बनी होंगीं l" बंटी अपनी ही जिद पर जैसे अड़ा हुआ था l

सामने, ही रमा( नौकरानी) फर्श पर पोछा मार रहीं थी l बंटी और सुरभि की जिरह से तंग आकर बोली-" बबुआ, मालकिन, ( राधा देवी) को जब समय पर रुखी-सूखी रोटियाँ भी नहीं मिलती थी तो, दूध और रबड़ी की बात कौन पूछता.. है ? आखिरी, समय में बुढ़िया दवाई के लिए झखती-झखती मर गयी l चलो अच्छा ही हुआ l बिल्ली बनी होगी तो आराम से कहीं किसी घर में दूध-मलाई खायेगी l

समय.. (लघुकथा)

मनेसर बाबू चिलचिलाती हुई धूप से बचने के लिए बस स्टैंड से निकलकर सीधे नजदीक की एक जनरल स्टोर की दुकान पर चले गये l

दुकान में दोपहर का वक्त होने के कारण ग्राहक कुछ खास नहीं थे l दुकान खाली-खाली ही थी l एक आठ-दस साल के लड़के ने पूछा-"क्या दूँ साहब थम्स -अप, कोको-कोला, सेवन- अप, मिरींडा, या माजा l"

मनेसर बाबू पीठ को सीधा करते हुए वहीं बैठ गये l फिर, उन्होंने फ्रीज के ऊपर नजर घूमाई l साफ सुथरे फ्रीज के अंदर, लड़के ने जितने नाम गिनाए थे वो तमाम कोल्डड्रिंकस वहाँ मौजूद थे l

"कुछ नहीं एक सादा पानी.. की बोतल दो, लेकिन, ठँढा मत देना l"उन्होनें लडके को सख्त हिदायत देते हुए कहा l

लड़के ने पूछा- "क्यों साहब आप ठँढा नहीं पीते क्या?"

वो पानी की बोतल खोलते हुए बोले- "इधर, शुगर लेवल बढ़ा हुआ रहता है, इसलिए नहीं पीता l एक बार फिर, उन्होंने फ्रीज पर नजर डाली, और जैसे अपने आप से बोले l बचपन में मेरे पास पैसे नहीं हुआ करते थे l तब खूब कोल्डड्रिंक पीने का मन करता था l आज पैसे हैं लेकिन, पी नहीं सकता l"

कॉलम (लघुकथा)

दसवीं में पढ़ने वाले गौरव के सवाल पर पहले तो सुधांशु सर खीजे फिर वे बोले-"तुम्हें क्या फर्क पड़ता है कि इस कॉलम में हिन्दू, क्यों लिखा हुआ है..? या इस कॉलम में मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, या पारसी क्यों लिखा हुआ है ? तुम्हारा काम है फार्म भरना l चुपचाप फार्म भरकर जमा करो, और अपने इम्तिहान की तैयारी करो l" और, वे अपने रजिस्टर में कुछ दर्ज करने लगे l

"ठीक है सर-"तब आप मुझे ये बताइये. मुनव्वर जिस ब्रेड को खाता है, वो भी उसी बेकरी, से आती है जहाँ से मेरे पिताजी ब्रेड लाते हैं l ब्रेड के रंग में मैनें कोई अंतर नहीं पाया l जो, ग्वाला हमारे यहाँ दूध पहुँचाता है उसका रंग सफेद होता है l ऐसे ही मुनव्वर के यहाँ भी आने वाले दूध का रंग भी सफेद ही होता है l पेंड़, सबको बराबर, फल और हवा देते हैं l सूर्य की किरणें भी नाप- तौलकर किसी को धूप के रेशे नहीं बाँटती l जब सारे लोग एक जैसे ही हैं तो, धर्म का कॉलम क्यों बनाया गया है, सर ?"

सुधांशु सर गौरव के इतने सारे सवालों को सुनकर भौंचक्क से रह गये l एक बार उनको लगा की ये लड़का पढ़ता जरूर छोटी क्लास में है, लेकिन, है बहुत ही जहीन l गौरव के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोले-"बेटा आदमी और आदमी को बाँटने के लिए ही कुछ स्वार्थी लोगों ने ऐसे कॉलम बनाये हैं l

ताकि उनका हित सधता रहे l आदमी इसी तरह एक कॉलम के अंदर बँद होता है l साँसें जरूर प्रकृति के दिये पेंड़ों से लेता है l पीता जरुर चश्मे का पानी है, लेकिन वो अपने कॉलम में ही सिकुड़ा -सिमटा रहता है l अपने अंतर्विरोधों और कुँठाओं से लड़ता रहता है l जब वो इस कॉलम से निकलना चाहता है, तो अक्सर छोटे- बडे़, ऊँच-नीच और अमीरी गरीबी के भेद उसे घेर लेते हैं l दूसरों से अपने को श्रेष्ठ समझना, इसी में उलझकर वो ताउम्र अपने और अपने जैसे लोगों से लड़ता रहता है l अच्छा लगा ये जानकर कि नई पीढ़ी अपनी इन कुँठाओं से निकल कर ऐसे कॉलम को खत्म करना चाहती है l तुमसे और तुम्हारे जैसी सोच रखने वाले विधार्थियों से ही ये कॉलम खत्म होगा l चलता हूँ बेटा l मुझे साइंस का क्लास भी लेनी है l"

धीरे- से उठकर सुधांशु सर क्लास से बाहर चले गये l

मजबूरी (लघुकथा)

"मंगल बाबू आपको मैं पिछले दो दिनों से लँगड़ाकर चलते हुए देख रहा हूँ l पैर में कुछ हुआ है क्या.. ?" सुबंधु ने मंगल बाबू को लँगड़ाते देखकर ऐसे ही पूछ लिया l

"अरे पता नहीं पैर में अचानक से क्या हो गया है ?परसों से अचानक मेरा पैर कुछ फुल गया है, और बडा़ दर्द भी कर रहा है..पता नहीं क्या हो गया है..पैर में ?"

मंगल बाबू पैर को सहलाते हुए बोले l

"डॉक्टर को नहीं दिखाया ?" सुबंधु ने चाय की प्याली मंगल बाबू के हाथ से लेते हुए पूछा l

"अरे जाऊँगा इस दूकान से फुर्सत मिले तब ना l साल में तीन- सौ-पैंसठ दिन होते हैं, लेकिन, दूकान से किसी दिन फुर्सत नहीं मिलती है l"

विधान मेरा दोस्त था l वो चाय को पीते हुए मंगल बाबू से बोला-"मतलब, आपको अपने पैर दर्द से ज्यादा अपनी दूकान की पड़ी हुई है l ना हो तो आप मेरी मोटरसाइकिल से ही डॉक्टर शुभेंदु के यहाँ चल चलिये, और चलकर वहाँ अपने पैर को दिखला लीजिए l"

"जाऊँगा विधान बाबू एक- दो दिन में डॉक्टर को भी दिखला आऊँगा l आज शुक्रवार है l कल मेरे बेटे का आखिरी एक्जाम का पेपर है l परसों उसे कहीं बाहर जरुरी काम से जाना है l सोमवार को जरूर डॉक्टर के पास चला जाऊँगा l"

"कमाल, की बात करते हैं आप l पैर में दर्द है आपके l आप चल-फिर भी नहीं पा रहे हैं, और आप लँगड़ा-लँगड़ा कर यहाँ-वहाँ चाय बेच रहे हैं l तिस पर आप शुक्रवार, शनिवार, और रविवार तीन दिन दूकानदारी करेंगे ! आपको दूकान के अलावा अपने दर्द की कोई परवाह ही नहीं है क्या ?"

विधान, मंगल बाबू को आश्चर्य से घूरते हुए बोला l

"अरे, नहीं भाई दर्द की गोली ले ली है l आज दर्द कुछ कम भी लग रहा है l" मंगल बाबू झेंपते हुए बोले, और धीरे से वहाँ से चल दिए l

मुल्क (लघुकथा)

"माँ तुम रो क्यों रही हो ?" -सादिक ने अमीना बीबी के कँधे पर धीरे से हाथ रखकर पूछा l

"नहीं, मैं रो कहाँ रही हूँ ?"

"नहीं, तुम रो नहीं रही हो तो तुम्हारी आँखों से आँसू कैसे. निकल रहे हैं ?" सादिक, वैसे ही बोल रहा था l जैसे वो, अमीना बीबी की बात को ताड़ गया हो l

"कुछ नहीं होगा... हमलोग.. कहीं.. नहीं जा रहें हैं l सादिक ने अमीना बीबी को जैसे विश्वास दिलाते हुए कहा l"

बहुत मुश्किल से अमीना बीबी का जब्त किया हुआ बाँध जैसे भरभराकर टूट गया, और वो रुआँसे गले से बोलीं-"इस तरह से जड़ें... बार-बार नहीं खोदी जातीं l ऐसा ही एक गुलमोहर का पेंड़ हमारे यहाँ भी हुआ करता था l तुम्हारे अब्बा ने उसे लगाया था l इस गुलमोहर के पेंड़ को देखकर तुम्हारे अब्बा की याद आती है l सोचा, इस गुलमोहर के पेंड़ को ही देखकर मैं बाकी की बची-खुची जिंदगी भी जी लूँगी l मैंने यहाँ बहुत समय निकाल दिया l अब, सोचती हूँ की बाकी का समय भी इसी जमीन पर इसी गुलमोहर के नीचे काट दूँ l यहाँ की तरह ही वहाँ भी धूप के कतरे, पानी की प्यास और आदमी को लगने वाली भूख में मैंने कोई अंतर नहीं पाया l बार-बार जड़ें नहीं खोदी जाती ..सादिक मियाँ ! ..ऐसे गुलमोहर एक दिन में नहीं बनते l"और अचानक से अमीना बीबी जोर जोर से रोने लगीं l

सादिक ने अमीना बीबी को अपनी बाहों में भर लिया और चुप कराने की कोशिश करने लगा l अमीना बीबी को चुप कराते- कराते सादिक भी पता नहीं कब खुद भी रोने लगा l

फैसला (लघुकथा)

मिस्टर बक्षी ने आनंद को एक बार ऊपर से नीचे तक घूरा l फिर उन्होंने आनंद से जरा नर्म लहजे में पूछा - "मैं जान सकता हूँ कि तुम पुलिस की ये इतनी अच्छी नौकरी क्यों छोड़ रहे हो...?"

"जी हमारे भाईयों पर अत्याचार हो रहा है, और वे निहत्थे हैं, तब सवाल उठता है कि आखिर पुलिस उन निहत्थों पर लाठियाँ क्यों चला रही है ?..कल हुए लाठीचार्ज में मेरे पिताजी की उम्र के एक आदमी का सर फट गया l"

मिस्टर बक्षी ने बीच में ही आनंद को टोका-"तुम्हारे पिताजी के उम्र के थे l तुम्हारे पिताजी तो नहीं थें.. ना l आखिर हमारी भी कुछ मजबूरियाँ हैं l हमें भी अपने ऊपर वालों को जबाब देना पड़ता है l इस तरह सारे लोग नौकरी छोड़कर जाने लगे तब तो पुलिस महकमे में कोई भर्ती ही नहीं होगा l मानता हूँ तुम किसान के बेटे हो... लेकिन, इतना सेंटीमेंटल ( भावुक) होना कहीं से ठीक भी तो नहीं है l"

आनंद अपने आप को रोक नहीं सका-"आप कहना क्या चाहते हैं ? मुझे अपने पिताजी के सर के फटने का इंतजार करना चाहिए ?"

मिस्टर बक्षी-"तुम फिर से एक बार सोच लो l तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के लिए ये फैसला बहुत ही घातक सिद्ध होगा l तुम्हें तो याद ही होगा, तुम्हारे बाप ने गाँव की जमीन बेचकर तुम्हें यहाँ तक पहुँचाया है l"

"सब याद है सर, लेकिन, मैं जो फैसला ले चुका हूँ, सो ले चुका हूँ l मैं पीछे नहीं हट सकता l मेरा बचपन बहुत ही गरीबी में बीता l मेरे पिताजी किसान थे l खेतों में खूब मेहनत करते l आज मैंने जिस साठ साल के बूढ़े के सिर से खून रिसता देखा है, तो ऐसा लगा जैसे वो मेरे पिताजी का ही सिर हो l जिसे मेरे जैसे किसी एक खदगर्ज शख्स ने ही फोड़ डाला होगा l मैं अब.. अपनी ही नजरों में और आखिर कितना गिरूँ l मैं जब भी आईने के सामने खडा़ होता हूँ, अपने आप से आँखें नहीं मिला पाता ! मुझे रातों को नींद नहीं आती है l मैंने अपने परिवार के लिए तो बहुत कुछ किया है, लेकिन, अपने किसान पिता के लिए कुछ नहीं कर पाया तो जिंदगी में हमेशा मुझे मलाल रहेगा l"

"नौकरी छोड़कर क्या करोगे ?"

"किसान आँदोलन में जाऊँगा l कम से कम रात में शांति से सो तो पाऊँगा l"

टीस.. (लघुकथा)

सयाल साहब बात को बीच में ही काटते हुए बोले-"तुम पहले मेरी बात सुन लो कामता प्रसाद l जो मैं नीलेश की सफाई में कहना चाहता हूँ l आखिर मैंने नीलेश से तुमसे बात करने के बाद फोन पर ही बात किया था, और ये जानना चाहा था कि क्या ये किताब जो उसने अभी -अभी लिखकर पूरा किया है, ये उसका अपना खुद का लिखा हुआ है, या उसने किसी और की मदद भी इस किताब को लिखने में ली है l"

इस बात पर नीलेश हड़बड़ा गया l कहने लगा-"क्यों सर ? क्या हुआ ? आप ऐसा क्यों पूछ रहें हैं ? नहीं सर ये मेरा ही लिखा हुआ है l आप यकीन कीजिये l क्या, आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं है ? क्या मैं आपसे झूठ बोल रहा हूँ l"

मैंने कहा नहीं-नहीं कोई बात नहीं है l बस ऐसे ही पूछ लिया..था l

प्रत्युत्तर में कामता बाबू बोले- "मैंने तो आपको सारा स्क्रीन-शॉट भेजा रखा है l देख लीजिए. किताब के एक- एक बिंदू और वर्तनी से लेकर कोमा तक मैनें ठीक किया, और फिर, मैंने ही किताब का नाम भी रखा l यहाँ तक कि किताब के लिए प्रकाशक भी मैनें ही ढूँढा था l

लेकिन, नीलेश की किताब में मेरा कहीं भी कोई जिक्र नहीं है l जिस लड़के को मैनें उँगली पकड़कर चलना सिखाया वो लड़का ही मुझे दर किनार कर के निकला जा रहा है l कामता बाबू बड़े अफसोस के साथ ये बातें सयाल साहब से कह रहे थें l कामता बाबू को शायद नीलेश की किताब में अपना नाम कहीं ना पाकर बहुत ही दु:ख और हैरानी हुई थी l उन्होंने रात दिन एक करके नीलेश की किताब को संपादित किया था l और, यही बात उनको खटक रही थी l कि कैसा समय आ गया है l जब उनका सिखाया हुआ लड़का उनको ही दरकिनार कर रहा है l उनका नाम किताब में बतौर संपादक नहीं डाल रहा है l

सयाल साहब बोले- "अरे भाई अब, कलयुग भी नहीं है l शायद भटयुग आ गया है l आज के दौर में कोई किसी के किये हुए काम को याद नहीं रखता l इस बात को इतनी गंभीरता से लेने की कोई जरूरत नहीं है l चलो अब गुस्सा थूको, और ये लो चाय की प्याली पकडो़ और चुपचाप चाय पियो l"

लेकिन, कामता बाबू का गुस्सा कहाँ कम होने वाला था, वो गुस्साते हुए बोले -"आपको उस समय कैसा लगा था l जब आपको आपके बेटे और बहू ने आपके ही घर से निकाल दिया था l वही बेटा जिसे आपने उँगली पकड़कर चलना सिखाया था l ठीक यही मेरे साथ भी हो रहा है l"

कहने को तो कामता बाबू ये कह गये थें l लेकिन, ये बात कहकर उन्हें अपने कहे पर ही अफसोस हो रहा था l क्या हुआ अगर, अपनी किताब में निलेश ने मेरा नाम नहीं दिया तो ? आखिर, उनके मुँह से सयाल साहब के लिए ऐसी बात निकली ही कैसे ?

सयाल साहब की दुखती रग को कामता बाबू ने जैसे दबा दिया था l सयाल साहब कबके उठकर कमरे से बाहर जा चुके थें, और प्याली में पडी़ चाय ठँढी हो गई थी l

  • मुख्य पृष्ठ : महेश केशरी हिन्दी कहानियाँ और अन्य गद्य रचनाएँ
  • संपूर्ण काव्य रचनाएँ : महेश केशरी