लघुकथाएँ (61-80) : महेश केशरी

Hindi Laghu-Kathayen (61-80) : Mahesh Keshri

निपटारा (लघुकथा)

वीडियोग्राफी और सर्वे का काम खत्म हो चुका था l कोर्ट परिसर खचाखच भीड़ से भरी हुई थी l सबकी साँसें रूकी हुई थीं l कि आखिर फैसला क्या आयेगा l फैसला देने के लिये जज साहब भी सोच ही रहे थें l तभी खचाखच भरी उस भीड़ में अचानक से बूढ़ा माईकल नमूदार हुआ l और जज साहब से मुखातिब होते हुए बोला-"जज साहब, हमारे अस्पताल वाले फैसले का क्या हुआ ? जो सालों पहले से यहाँ लंबित पड़ा हुआ है l मेरा वकील कह रहा था कि आजकल में मेरे गाँव के विवादित जमीन जिसपर अस्पताल बनना तय हुआ था l कुछ दबंगों ने जबरजस्ती कब्जा कर लिया है l आपको पता भी है मेरी बीबी इलाज के लिये एड़ियाँ रगड़- रगड़ कर गाँव में ही मर गई l उसी दिन मैनें कसम खाई थी कि हमारे गाँव में भी हमारे लिये अस्पताल होगा l किसी को भी गाँव से बाहर दस किलोमीटर दूर नहीं जाना होगा l गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी रास्ते में अब नहीं होगी l कोरोना में अस्पताल नहीं रहने के कारण हमारे गाँव के कई लोग मर गये l गाँव में अस्पताल होता तो शायद कितने लोगों की जान बच सकती थी l अब अपने गाँव में और मौतें मैं नहीं होने देना चाहता l"

बूढ़ा माईकल बोलते -बोलते थकने लगा था l कुछ देर सुस्ता कर फिर बोला-"जज साहेब l आज मेरा फैसला कर दीजिये l बहुत तारीखें पड़ चुकीं l" सत्तर साल का बूढ़ा माईकल जो पीठ से काफी झुका हुआ था ने जज साहब के इजलास में अपनी फरियाद सुनाई l

उसकी इस तरह की बातें सुनकर l वहाँ, मोजूद लोग माईकल को कौतूहल से देखने लगे l गोया उन्होंने भूत देख लिया हो l

तभी संतरी सेवाराम ने माईकल को डपटा-"तुमको पता नहीं है कि आज किस चीज का फैसला आने वाला है l आज इस बात का फैसला आयेगा l कि जगदतदल पुर में मंदिर बनेगा या मस्जिद l सारा देश इस फैसले को देखने के लिये बैठा हुआ है l देखते नहीं कि ये फास्ट- ट्रैक कोर्ट लगा हुआ है l चलो जाओ और जज साहब को अपना फैसला सुनाने दो l तुम्हें मालूम है अगर ये फैसला ना आया तो बलबा मच जायेगा l बलबा ! समझे कुछ l बहुत सेंसीटिव मुद्दा है l"

बूढ़ा माईकल अब भी कुछ नहीं बोला l और वहीं का वहीं खड़ा रहा l तब जज साहेब ने लताड़ा-"कैसे अहमक हो भाई तुम l एक बार में बात समझ नहीं आती क्या ? तुम्हारे अस्पताल वाले जमीन के केस के लिये कोई दूसरा दिन मुकर्रर किया है l तब तक घर जाओ और आराम करो l" जज साहब टालने की गरज से बोले l

इस बार माईकल कुछ ऊँची आवाज में बोला-"जज साहेब मँदिर-मस्जिद की जरूरत किसको है l हमें तो अस्पताल और स्कूल चाहिये l अफसोस है कि इस पर फैसले नहीं होते l और हम आँखें बँद किये रहते हैं lईश्वर तो दर असल यहीं बिराजते हैं l डॉक्टर के रूप में l शिक्षक के रूप में l क्या अस्पताल और स्कूल सेंसिटिव मुद्दे नहीं हैं l लोगों को अस्पतालों और स्कूलों के लिये बलवा करते कभी नहीं देखा l आदमी को स्कूलों और अस्पतालों के लिये लड़ना चाहिये l ना कि मँदिर और मस्जिद के लिये l क्या मैं ठीक कह रहा हूँ जज साहेब l"

बूढ़ा माईकल जज साहब से सवाल पूछ रहा था l और जज साहेब उजबकों की तरह माईकल के चेहरे को घूरे जा रहें थें l उनको समझ में नहीं आ रहा था l किस फैसले का निपटारा वो पहले करें l

छोटे लोग (लघुकथा)

सुदर्शन बाबू बहुत ही जातीय शुद्धता का दँभ भरने वाले और धार्मिक किस्म के आदमी थें l उनको उनका ही धर्म सर्वोत्कृष्ट लगता था l लेकिन आज पासा पलट गया था l नदीम उनका पड़ौसी था l और उसको वो विधर्मी ही मानते थें l और वो ठीक ही तो मानते थें l शुरू से ही उनको ये सीख मिली थी l कि ये लोग आक्राँता हैं l हिंदुस्तान को लूटने वाले l हिंदूओं से नफरत करने वाले l लेकिन आज उनका ये भ्रम जाता रहा था l कि नदीम एक विधर्मी है l उनको याद है वो रात l कयामत की रात थी वो l शहर में इतनी बारिश और तूफान था कि हाईवे और सारे रास्ते बँद थें l फोन कहीं लग नहीं रहा था l शहर में बिजली का नामों-निशाँ नहीं था l और, उनकी पत्नी की तबीयत अचानक से बिगड़ने लगी थी l तब नदीम ही था l जो मदद करने को आगे आया था l सात -आठ बजे तक मौसम बिल्कुल ही साफ था l और साढ़े आठ बजे के आसपास ही राजेश्वरी देवी की तबीयत अचानक से बिगड़ने लगी थी l तब सुदर्शन बाबू ने जाति सेना के अजेय सिपाहियों को मदद के लिये बुलाया था l लेकिन एक तो खराब मौसम और दूसरे रात का वक्त होने के कारण लोगों ने हाथ खड़े कर लिये थें l रिश्तेदारों तक ने आने से मना कर दिया था l तब नदीम ने ही पहल करते हुए कहा था-"भैया, आपके घर से भौजी की कराहने की आवाजें लगातार आ रहीं थीं l सुनकर रहा नहीं गया तो देखने चला आया l भौजी की तबीयत ठीक तो है ना l ना हो तो भौजी को लेकर अस्पताल चला जाये l"

"इस तूफानी और बरसाती रात में ! "सुदर्शन बाबू को जैसे कोई फरिश्ता आवाज लगा रहा था l सुदर्शन बाबू अपलक नदीम को लैंप की रौशनी में निहारते रह गये थें l उनका कौतूक बढ़ता ही जा रहा था l

"अरे, हाँ भाई l हमारा शरीर खेतों में खटा हुआ है l पक्का किसान रहा हूँ l घर में दसियों बीघे खेत थें l भाईयों ने जब बँटवारे की बात की तो सबकुछ उनको ही सौंपकर इधर शहर में आ गया l और ऑटो चलाने लगा l गाँव में गिरधारी चौधरी का मैं चेला था l कुछ दँगल -वँगल मारने का ऐसा शौक चर्राया की फिर, गिरधारी चौधरी का चेला होकर रह गया l गिरधारी चौधरी हमारे पड़ौसी थें l लँगोट और कौल के बड़े पक्के आदमी थें l उनका ही शार्गिद हूँ l गिरधारी चौधरी जब तक जिंदा रहे l एक ही बात कहते रहे l अपने से हमेशा कमजोर लोगों की मदद करना l कभी किसी सताये हुए को मत सताना l बजरंग बली हमेशा तुम्हारी रक्षा करेंगें l अब बताईये की आप हमारे पड़ौसी हैं कि नहीं l माना कि आज कयामत की रात है l बाबजूद इसके भौजी का कराहना हमें बहुत दु:ख पहुँचा रहा है l चलिये देरी मत कीजिये l कहीं कोई अनिष्ट ना हो जाये l"

और, उस मूसलाधार बारिश और तूफानी रात में नदीम राजेश्वरी देवी को अस्पताल पहुँचा आया था l और सुदर्शन बाबू किसी अनिष्ट की आशंका से घिरे कॉरीडार में चहलकदमी कर रहे थें l

तभी रोहित दौड़ता हुआ, सुदर्शन बाबू के पास आया और बोला -"अस्पताल में माँ के बल्ड ग्रुप का खून ही नहीं है l डॉक्टर ने कहा है कि शहर के किसी अस्पताल में माँ के ग्रुप का खून नहीं मिल रहा है l अगर खून ना मिला तो माँ बचेगी नहीं l लेकिन डॉक्टर ने एक बात और कही है l नदीम चाचा का ब्लड ग्रुप माँ के बल्ड ग्रुप से मैच करता है l राजीव भैया पूछ रहें है कि क्या माँ को नदीम चाचा का खून दिया जा सकता है या नहीं ? नदीम चाचा भी बहुत डरे हुए हैं l कह रहें थें कि कहाँ आप पंड़ित और कहाँ हम मलेच्छ l पंड़ित जी मानेंगें नहीं मैं जानता हूँ l"

"कहाँ हैं नदीम ?" सुदर्शन बाबू कॉरीडोर से अस्पताल के भीतर भागे l

देखा डॉक्टर ने नदीम का खून स्लाइन से लेना शुरू कर दिया था l धीरे-धीरे खून की बूँदें राजेश्वरी देवी में जिंदगी भर रहीं थीं l दूसरी बेड़ पर नदीम लेटे हुए थें l और अस्पताल की छत को घूरे जा रहे थें l सुदर्शन बाबू को देखा तो जैसे सफाई देते हुए बोले-"सुदर्शन बाबू, आज मैं आज बहुत शर्मिंदा हूँ l कि हमारे इस शहर में किसी ऊँची जाति का ब्लड ग्रुप का खून मुहैया नहीं था l नहीं तो ये मलेच्छ भौजी को अशुद्ध ना करता l

सुदर्शन बाबू आप कहाँ उच्च-कुलीन ब्राह्मण l और मैं कहाँ मलेच्छ l आप मुझे माफ कर देना भाई l इस गलती के लिये l" और नदीम मिंयाँ ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिये थें l

सुदर्शन बाबू का बहुत देर से जब्त किया हुआ बाँध जैसे टूट कर भरभराकर बहने लगा -"बोले, आज एक मलेच्छ ने मुझे खरीद लिया l सौ जन्म भी मैं अगर ले लूँ तब भी तुम्हारा उपकार कभी नहीं चुका सकता l तुम आदमी नहीं आदमी के रूप में फरिश्ते हो फरिश्ते l अगर मेरी देह की खाल तुम्हारे जूते बनाने के काम भी आ जाये तो मैं अपने आप को धन्य समझूँगा l"

"भैया काहे शर्मिंदा करते हो l" नदीम मिंयाँ झेंपते हुए बोले l

तूफानी रात खत्म हो चुकी थी l सुबह का सूरज आकाश में लालिमा बिखरे रहा था l धीरे-धीरे राजेश्वरी देवी सूरज की तरफ देखकर मुस्कुरा रही थीं l और सुदर्शन बाबू और नदीम मिंयाँ किसी बात पर हँस - हँसकर आपस में बातें कर रहे थें l

बोझ (लघुकथा)

"बेटा, तु मुझसे कितना प्यार करता है l अब तो पैरों से भी लाचार हूँ l इतनी सेवा से मैं धन्य हुई जाती हूँ l" सुजाता देवी के आँखों में खुशी मिश्रित आँसू की बूँदें छलछला आईं l

आँगन में जाड़े की गुनगुनी धूप अब विदा होने को हो आई थी l लेकिन आकाश कुछ खोया- खोया सा था l रह-रहकर उसे ज्योति की बात याद आ रही थी-"अब मुझसे अम्मा जी का गू- मूत साफ नहीं होता है l मैं कोई मेहतर नहीं हूँ l कि अम्मा जी का गू-मूत साफ करुँ l तुम्हें पता है कि जिस दिन मैं अम्मा जी का गू-मूत साफ करती हूँ l पूरा-पूरा दिन मैं खाना नहीं खा पाती हूँ l" बोलते-बोलते ज्योति रूआंसी हो आई थी l

"तुम या तो मेरे रहने का बँदोबस्त कहीं और करो l या तो अम्मा जी को कहीं और रखो l"

"बेटा जरा छत पर ले चलते तो मन बहल जाता l" सुजाता देवी ने इच्छा जाहिर की l

इस बार आकाश हिला और माँ को अपनी बाँहों में उठाकर सीढ़ियों पर चढ़ने लगा l धीरे-धीरे वो सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर की तरफ बढ़ने लगा l ज्योति के शब्द उसे फिर चुभे-"अबकी मायके गयी l तो लौटकर नहीं आने वाली हूँ l हाँ याद रखना l तुमने मुझे नौकरानी बना लिया है l फिर, सँभालते रहना अपने बाल-बच्चे और घर को l क्या इससे छूटकारा पाने का कोई तरीका नहीं है l तुम्हारे पास ? कोई तो तरीका होगा ना l सोचो, दिमाग दौड़ाओ l"

तीस-पैंतीस किलो की सुजाता देवी बाँस के खाँचें की तरह हल्की थीं l फिर, भी पता नहीं क्यों आकाश को वो आज बहुत भारी लग रही थीं l जैसे आत्मा पर कोई बहुत बड़ा बोझ पड़ा हो l

छत पर पहुँचने से कुछ पहले ही आकाश हाँफने लगा था l सुजाता देवी ने हाथ से आकाश के चेहरे और लालाट के पसीने को पोंछते हुए कहा- "मेरे चलते तुझे कितनी तकलीफ होती है बेटा l सीढ़ियाँ भी कमबख्त कितनी लंबी हैं l थोड़ा सुस्ता ले बेटा फिर चलना l आखिर, तू हाँफ जो रहा है l"

आकाश ने छत पर पहुँचकर डूबते सूरज और आकाश की लालिमा पर नजर फिराई l चाँद धीरे -धीरे छत पर उतरने लगा था l सितारे जैसे शरद ऋतु और इस शाम का स्वागत बड़ी तन्मयता से कर रहे थें l लेकिन आकाश को ये शाम बड़ी बोझिल और बदरंग लग रही थी l वो किनारे तक गया l गली ठंड के कारण खाली-खाली थी l कुछ बच्चे थोड़ी दूरी पर खेल रहे थें l

सुजाता देवी चाँदनी निहारते हुए बोलीं -
"आकाश, चाँदनी कितनी खूबसूरत लग रही है ना l तुम बचपन में जब चाँद देखने की जिद करते थे l तब तमको भी मैं छत पर इसी तरह घूमाने के लिये ले आती थी l कितना खुश हो जाते थे, उस वक्त तुम l" सुजाता देवी मुदित स्वर में बोली l

आकाश छत के और किनारे तक आया l गली बिल्कुल खाली थी l उसने दायें-बायें देखा l और अपने हाथ की पकड़ को ढ़ीली छोड़ दी l एक जुँबिश के साथ सुजाता देवी छत से गिरीं l और सुजाता देवी की चीख निकल गई l और सबकुछ शांत हो गया l चाँद और सितारे अब भी चमक रहे थें l और दुनिया अपनी धुरी पर घूम रही थी l

जानवर (लघुकथा)

एक बार जँगल के राजा शेर ने जानवरों को एक ऐसा टीका लगाया जिससे की मजबूत कद के जानवर कमजोर किस्म के जानवरों का शिकार करने लगे l जँगल की जनगणना में एक साँप और एक नेवला ही बचे रह गये l जिसकी गिनती जनगणना में ना हो सकी थी l और वो टीका ना ले सके l टीके की खासियत ये थी कि जो भी टीका लगाता l वो धर्मांध हो जाता l और जँगल के निरीह और कमजोर प्राणी उन्हें देशद्रोही लगने लगते l वो गश्ती दल बनाकर कमजोर और निरीह जानवरों को लिंच करने लगते l धीरे-धीरे जँगल से निरीह और छोटे जीव गायब हो रहे थें l ये बात साँप और नेवले भी को पता थी l धीरे-धीरे उस जँगल की आबादी लिंचिंग के कारण बहुत कम हो गयी l ठीक उसी समय जँगल में भयानक सूखा पड़ा l सभी जानवर झुँड़ बनाकर खाने की तलाश में निकले l जो कुछ भी उन्हें हाथ लगता l उसे वो मिल बाँटकर खाने लगते l इसमें बड़े और छोटे निरीह जानवर दोनों ही थें l एक बार जँगल से पानी का सफाया हो गया l जँगल में सिर्फ एक ही झरना था l छोटे- बड़े, ऊँच -नीच और समाजिक कुरीतियों को मानने वाले सारे जानवर धीरे-धीरे अपनी झूठी शान और अकड़ भूलकर झरने पर जमा होने लगे l घमंड़ी और बड़े जानवरों के साथ -साथ सारे छोटे और निरीह जानवर भी उसी झरने का पानी पीकर अपनी जान बचाने लगे l कुछ दिनों बाद जँगल से एक दिन अचानक से कुछ सेकेंड के लिये ऑक्सीजन गायब हो गयी l सभी जानवर हवा के लिये तड़पने लगे l बड़े और ढीठ जानवर शेखी बघारना भूल गये l फिर कुछ सेकेंड़ के बाद धरती पर फिर से ऑक्सीजन बहाल हुई l सब जानवरों ने ईश्वर का शुक्रिया अदा किया l जँगल में जब अकाल पड़ा तो एक दिन शेर ने सभी जानवरों की एक बैठक बुलवाई l और उनसे पूछा कि तुमलोगों को कैसे सपने आते हैं ? छोटे-बड़े सबने समवेत स्वर में कहा कि l हमें केवल सपने में खाना ही दिखाई देता है l चूँकि वो, धर्मांध थें l इसलिए शेर के दिखाये रास्ते पर चलते रहे l एक बार जँगल में भयानक बाढ़ आई l कुछ जानवर किसी तरह जानबचाकर भागे l और दूसरे जँगल में पहुँचें l यहाँ भी खाना और पानी दोनों मुश्किल हो रहा था l नेवला और साँप मिलकर किसी शिकार पर हाथ साफ कर रहे थें l

तभी जँगल से गुजरते हुए एक लोमड़ी ने उनसे पूछा-"तुम लोग दोनों साथ-साथ एक ही शिकार को मिल बाँटकर खा रहे हो l इतनी दोस्ती तो हमने कभी साँप और नेवले में नहीं देखी l"

साँप, लोमड़ी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए बोला-"जब राजा निरंकुश, अहंकारी और धर्मांध हो l तो अपनी जान बचाने के लिये प्रजा को एक होना ही पड़ता है l वैसे भी अब जँगल में बहुत कम जानवर ही बचे हैं l बात अब अपने अस्तित्व बचाने की है l बार-बार आपस में हम लडते रहे l तो हमारा अपना अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा l इसलिये अब ये बात हमारे समझ में आ गई है l हम तौबा करते हैं, कि आपस में कभी नहीं लडेंगें l और वैसे भी हम इंसान नहीं हैं l जो आपस में लड़ें l हम तो जानवर हैं जानवर l"

बिटिया काम ना करेगी (लघुकथा)

"घर, को ठीक से साफ करो l हाँ ऐसे ही l थोड़ा सा फर्श पर सर्फ और गिरा दो l अब रगड़-रगड़ कर पोंछा लगाओ l शाबाशा ! ऐसे ही l फिर, धीरे-धीरे पूरे किचन को पोंछो l बाँये साइड में थोड़ा गँदा रह गया है l हाँ, शाबाश बहुत बढ़िया l" रेणुका अपनी बेटी माला को, घर की सफाई कैसे की जाती है ? उसको समझा रही थी l

तभी अनिमेष कमरे में दाखिल हुआ l अपनी बेटी को इस तरह से पोंछा लगाते देखकर भड़क गया l और हाथ से पोंछा छिनकर एक ओर फेंकते हुए बोला -"ये सब काम तुम क्यों कर रही हो ? जाओ, जाकर अपने कमरे में पढ़ाई करो l मेरी बिटिया कलेक्टर बनेगी l मैं उसको आई. एस.अफसर बनाऊँगा l पोंछा लगाना इसका काम थोड़े ही है l इसके आगे-पीछे तो दस लोग घूँमेंगें l पोंछा लगाने और झाड़ू बर्तन की नौकरी के लिये l

रेणुका ने टोका-"ये जरूरी तो नहीं कि मेरी बेटी कल को आई. ए. एस . अफसर बन ही जाये l ईश्वर करें ये आई . ए. एस . अफसर बन जाये l लेकिन अगर ना भी बनी तो कल को उसकी शादी होगी l उसके बच्चे होंगे l काम तो उसको अपने घर का करना ही होगा l आप या मैं जाकर थोड़ी ही उसके घर का काम करेंगें l सबको अपनी गृहस्थी चलाने के लिए काम तो करना ही पड़ता है l क्या मैं, आपके घर में झाड़ू - पोंछा, बर्तन-कपड़े नहीं करती ? कल को अगर ये अफसर बन भी गई तो कोई तो इसके घर में काम करेगा l क्या, जो इसके यहाँ काम करेगा l वो किसी की बेटी, बीबी, या पत्नी नहीं होगी l उनके लिए कभी आपने कुछ नहीं सोचा l दूसरों की छोड़िये आप मेरी ही बात कीजिये l क्या आपने मेरे हाथ से कभी इस तरह झाड़ू या पोंछा छीना है l आपकी बेटी बेटी l मैं भी तो आखिर किसी की बेटी हूँ l"

अनिमेष झेंपते हुए बोला-"तुम तो मेरी डार्लिंग हो l मेरी जानेमन हो l तुम अपना घर नहीं सम्भालोगी तो कौन संभालेगा ?"

"वाह इसे कहते हैं, चित भी मेरी और पट भी मेरी l बेटी को कल विदा भी करना है l उसकी आदत मत बिगाड़ो l मैं जैसा कहती हूँ l वैसा करो l" रेणुका ने पोंछा दुबारा माला के हाथों में थमाते हुए कहा l

इस बार, फिर, अनिमेष ने पोंछा उठाकर एक ओर फेंक दिया l और अपनी बेटी माला को अपनी बाँहों में भरते हुए बोला-"मेरी बेटी कहीं नहीं जायेगी l मेरी बेटी कोई काम नहीं करेगी l मैं उसे कहीं नहीं जाने दूँगा l" वो माला को बेतहाशा चूमे जा रहा था l उसका बस चलता तो सच में वो उसे कहीं जाने नहीं देता l एक पिता कि वात्सल्य आँखों से झर रहा था l पता नहीं कब रेणुका की आँखें भी झरनें लगी l तीनों आपस में लिपटकर बहुत देर तक रोते रहे l

प्लेटिया (लघुकथा)

"ऐ, बूढ़े यहाँ क्यों बैठे हो ? खुले में अगर ठँड-वँड लग गई तो बेकार में मारे जाओगे l" तुलसी ने सँदिग्ध बूढ़े की तरफ नजर फिराते हुए कहा l

बूढ़ा खामोश रहा l पहनावे और कपड़ों से वो किसी भले घर का लग रहा था l

तुलसी, और वृँदा दोनों चौकीदार थें l उनका काम था होटल परिसर में किसी संदिग्ध को देखते ही उसको वहाँ से भगाना l नहीं तो कृष्णा बाबू जो इस बड़े "चारमीनार "होटल के मालिक थें l उनकी डाँट उन दोनों को पड़ती l उनका ही आदेश था कि किसी भी सँदिग्ध आदमी पर हमेशा नजर रखनी है l समय बड़ा खराब चल रहा है l शहर में आये दिन आतंकवादी हमले होते ही रहते हैं l आतंकवादियों ने आतंक फैलाने के लिये आजकल मानव बम का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है l कभी- कभी तो बच्चों और बूढ़ों को भी अपना ढाल बना लेते हैं l

शक कुछ गहराया तो तुलसी ने पूछा-"कहाँ के रहने वाले हो बाबा ?"

इस बार बूढ़े ने अपनी जेब से एक मुड़ा-तुड़ा कागज निकाला l वो, शायद उसके आधार -कार्ड का जोरेक्स कॉपी था l तुलसी ने इबारत पर नजर डाली l बूढ़े का नाम राम अवतार था l उम्र यही कोई साठ - बासठ साल थी l मुरादा बाद का रहने वाला था l

वृ़ँदा और तुलसी की नजरें आपस में मिलीं l और, दो जोड़ी आँखों ने आपस में सहमति जताई l वृँदा ने डपटते हुए फिर से बूढ़े से पूछा-"मुरादबाद, के रहने वाले हो बाबा l तो यहाँ दिल्ली क्यों आये हो ?" इस बार बूढ़े ने खँखार कर बाहर अपना बलगम थूका l थोड़ी देर सुस्ताने के बाद बहुत धीरे से बोला-" काम की तलाश में आया हूँ l बच्चे अब मारपीट पर उतर आये हैं l जब तक हाथ- पैर चलते थें l कमाता था l घर में सब पूछते थें l अब घर में कोई नहीं पूछता l बोझ बन गया हूँ l बोझ ! सारी उम्र लोगों को कमाकर दिया l आज किसी के आगे हाथ फैलाते अच्छा नहीं लगता l"

बूढ़ा स्वाभिमानी लग रहा था l

वृँदा और तुलसी अबकी थोडे़ नर्म पड़े l रात होने के कारण ठँड़ बढ़ रही थी l

तुलसी ने आगे बढ़कर बूढ़े से पूछा-"चाय पियेंगें बाबा ?"

बूढ़ा चुप रहा l

तुलसी लपककर तीन चाय ठेले पर से उठाकर ले आया l

बूढ़ा सुड़क- सुड़ककर धीरे- धीरे चाय पीने लगा l

तभी तुलसी की नजर बूढ़े के हाथों पर पड़ी l हाथों पर पट्टी बँधी थी l

तुलसी ने बूढ़े की चोट की तरफ इशारा करते हुए पूछा-"बाबा, ये चोट आपको कैसे लगी ?"

बूढ़े ने चाय खत्म करके कुल्हड फेंक दिया l फिर बलगम थूकते हुए बोला-"बेटे ने उपहार दिया है l गलती से उसकी चाय मेरे हाथों से लगकर गिर गई थी l अभी ठँड़ का मौसम है l घाव जल्दी भर जायेगा l "बूढ़ा घाव पर हाथ फिराते हुए बोला l

"अब कहाँ जायेंगें बाबा ?" वृँदा ने एक सिगरेट सुलगाकर बूढ़े की तरफ बढाया l

बूढ़ा सिगरेट के कश खींचते हुए और, धुँए को अपने नथूनों से छोड़ते हुआ बोला-"कहीं काम करूँगा l"

बूढ़ा जैसे अपने निश्चय पर अटल था l

"यहाँ आपको काम कहाँ मिलेगा ? और फिर, इस उम्र में आपको कौन काम देगा ? आप, शायद ही कोई भारी काम कर सकें इस उम्र में l" वृँदा, ने सिगरेट की राख चुटकियों से झाड़ा l

"कोई भी काम l हाँ मैं कोई भी काम करना चाहता हूँ l किसी का मोहताज बनकर नहीं जीना चाहता l फिर, अपने शहर में बच्चों के जान-पहचान वाले भी होते हैं l इसीलिये मैं अपने बच्चों का सिर कभी नीचा नहीं होने देना चाहता l अपना शहर छोड़कर इसीलिये तो यहाँ आ गया हूँ l इस शहर में मुझे कौन जानता है l रेजा मिस्त्री का काम करूँ, या अखबार बेचूँ l या होटल में वेटर का काम करुँ l मैं कुछ भी करूँगा l लेकिन अपने शहर नहीं लौटूँगा l" बूढ़ा अपने निश्चय पर अटल दिख रहा था l जिसे डिगाना तुलसी और वृँदा के कूव्वत की बात नहीं थी l गजब का आत्मविश्वास था l उस बूढ़े की आवाज में l

तभी तुलसी के दिमाग में कृष्णा बाबू की बात गूँजी -"यार मैं तो इस होटल लाइन से परेशान हो गया हूँ l खाने के मिस्त्री ( शेफ ) रखना तो आसान है l लेकिन एक प्लेटिया ढूँढना बहुत ही मुश्किल काम है l शहर में और सब काम तो लोग करना चाहते हैं l लेकिन, कोई प्लेटिया का काम नहीं करना चहता l कभी मिस्त्री के नहीं रहने पर तुलसी भी कृष्णा बाबू के होटल में मिस्त्री का काम करता था l तुलसी होटल में शेफ भी था l ओर चौकीदार भी l वो पार्ट टाइम कभी- कभी शेफ का काम भी होटल में कर लिया करता था l कृष्णा बाबू को तुलसी ने कई बार टाल दिया था l लेकिन अब टालना मुश्किल हो रहा था l वो जब भी उससे मिलते l तो कोई प्लेटिया मिला ? इस बाबत वो तुलसी से जरूर पूछते l तुलसी अक्सर उनसे बचने की कोशिश करता रहता था l

लेकिन टालते हुए उसे कृष्णा बाबू को अच्छा नहीं लगता था l उसे मालूम था कि एक प्लेटिया की हैसियत एक दूकान में क्या होती है l ग्राहक अगर कभी शेफ को प्लेट उठाते हुए देख ले l तो उसके हाथ का खान, खाना किसी ग्राहक को गँवारा नहीं होता था l

आधी रात हो गई थी l वृँदा को अब नींद आने लगी थी l वो बूढ़े को टालने की गरज से बोला-"बाबा, यहाँ कोई काम आपके लायक नहीं है l होगा तो आपको बतायेंगें l"

लेकिन, तभी तुलसी ने अपनी आँखों से वृँदा की तरफ इशारा किया l और बूढ़े से बोला-"बाबा एक काम हमारे होटल में है, आपके लिए l क्या आप उसे करेंगें ?"

बूढ़ा हुलसते हुए बोला-"हाँ- हाँ बताओ तो क्या काम है ?" लगा जैसे बूढ़े को संजीवनी मिल गई हो l

"बाबा, हमारे होटल में एक प्लेटिया की जरूरत है l खाना-पीना, रहना, सब फ्री है l ऊपर से आपको अच्छी खासी तनख्वाह भी मिलेगी l बोलो क्या बोलते हो ? बनोगे प्लेटिया ?" तुलसी उत्साहित होकर बोला l अँधे को क्या चाहिए l बस दो आँखें l

बूढ़ा कुछ देर चुप रहा l फिर हँसते हुए बोला-"बेटा जिंदगी में मैनें बहुत संघर्ष किया है l सब तरह के काम किये l किसी काम को छोटा-बड़ा नहीं समझा l ये तो नई पीढ़ी है l जो किसी काम को छोटा -बड़ा समझती है l

फिर, रोज-रोज अपने बच्चों से पिटने से बेहतर है l कि प्लेटिया ही बन जाया जाये l कम- से-कम स- सम्मान जी तो सकते हैं l"

बूढ़ा उठकर चलने को हुआ l बूढ़ा जाते-जाते फिर बोला-"यहीं बगल के सराय में ही अभी ठहरा हूँ l कल सुबह से ही तय समय पर काम पर आ जाऊँगा l तुम लोग भी अब आराम करो l"

धीरे- धीरे लँगडाते हुए बूढ़ा अँधेरे में गली के अँदर गायब हो गया l

साँसें (लघुकथा)

रामप्रसाद को खुद भी आश्चर्य हो रहा था l कि इतने जल्दी उसके हाथ कैसे थकने लगे हैं ? अभी तो साठ का ही हुआ है l लेकिन दो साल पहले तक वो गाड़ी भरने में जवानों के कान भी काट देता था l सीताराम पुर में किसी को भी गाड़ी खाली करवानी हो या भरवानी हो l वो रामप्रसाद को ही पहले बुलाता था l आखिर कोलवरी में मलकट्टा के पोस्ट से रिटायर होकर जो आया था, रामप्रसाद l यही हाथ हैं जो दो ढाई दिनों में कोयले का बड़ा से बड़ा ट्रक लोड़ कर देते थें l वही हाथ इतनी जल्दी जबाब देने लगे हैं l अभी तो बहुत काम करना है l बिटीया बड़ी हो रही है l उसके लग्न के लिए भी पैसे जोड़ने हैं l मुन्ना को स्कूल की फीस भी देनी है l और घर की सारी जिम्मेदारियाँ भी उसकी ही हैं l आखिर क्या खायेंगे वो ? अगर इतनी जल्दी वो थकने लग जायेगा l"

उसने तम्बाकू निकाला और हाथ पर मलने लगा l पिछले, कोरोना में वो भी पाज़िटिव हो गया था l मरते -मरते बचा है l इधर साल भर से बीमार रहा है l हो सकता है, बीमारी और कोरोना ने मिलकर उसकी शक्ति छीन ली हो l वो बोरों पर पिल पड़ा l और आनन-फानन में बोरे उठाकर गाड़ी में भरने लगा l

लेकिन बात बन नहीं रही थी l तभी मालिक सुरेमन बाबू की आवाज उसके कानों में गूँजी-", अबे, रामप्रसाद हाथ जरा जल्दी- जल्दी चलाओ l इतना धीरे-धीरे काम करेगा तो शाम तक माल पार्टी के पास कैसे पहुँचेगा ?" सुरेमन आँखें तरेरते हुए बोला l

"हाँ, मालिक गाड़ी लोड़ कर रहा हूँ l अभी आधे घंटे में हो जायेगा l"

वो, दुबारा उठा, और बोरों को कँधों पर लादकर गाड़ी में भरने लगा l लेकिन इतने में ही उसका दम फूलने लगा l एक तो चिलचिलाती हुई धूप और गर्मी l आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा l पाँव भी लड़खड़ाने लगे l उसका दम उखडने लगा l और, अचानक से कटे पेंड़ की तरह वो गिरा l पल भर में मजदूरों ने उसे घेर लिया l नब्ज़ टटोली गई l नब्ज़ थम गई थी l"

जिम्मेदारियाँ पीछे खड़ी रामप्रसाद का बाट जोह रहीं थीं l जैसे कह रहीं हों-"उठो, रामप्रसाद, अभी, तो बहुत काम करना बाकी है l"

बस इतनी सी बात (लघुकथा)

नीलमणि देवी के पैरों में इधर कुछ दिनों से बड़ा दर्द रहने लगाा था l चौका अब वो नहीं देखतीं l लँगड़ाती हुई किसी तरह रसोई तक आयीं और बहू सुनंदा से पूछा-"बहू, बाबूजी ने नाश्ता कर लिया ?"

सुनंदा ने रोटी, तवे पर डालते हुए ही जबाब दिया-"नहीं माँ जी अभी शायद कहीं बाहर निकल गये हैं l"

"तुमने उन्हें नाश्ते के लिए नहीं पूछा l" नीलमणि देवी पैरों को सीधा करते हुए बोलीं l

"नहीं, मैनें तो उनसे कहा भी कि बाबूजी नाश्ता करके ही जाइये l लेकिन वो बिना कुछ बोले बाहर निकल गये l हाँ अलबत्ता, एक बात जरूर हुई l आशुतोष, और बच्चे भी उसी समय नाश्ता कर रहें थें l आशुतोष को उसी समय ऑफिस भी निकलना था l मैनें बाबूजी से कहा भी कि आप थोड़ा बैठिये l पहले

आशुतोष और बच्चों को नाश्ता दे देती हूँ l फिर, आपको भी देती हूँ l इस पर बाबूजी उठकर कहीं बाहर चले गये l"

"और तुम बस इतनी सी बात पर घर छोड़कर आ गये l बच्चों की तरह हरकतें करने लगे हो तुम भी रघुवंश बाबू l वैसे भी आदमी बूढ़ापे में सठिया ही जाता है l ये ट्रँक लेकर कहाँ निकल पड़े हो l" नरेश बाबू, रघुवंश बाबू के चेहरे की तरफ देखते हुए मुस्कुराये l

रघुवंश बाबू, के चेहरे के भाव जस के तस बने रहे l वो वैसे ही बोले-"तुम नहीं समझोगे नरेश l जब मैं काम करता था l घर में पैसे लाकर देता था l तो मेरी घर में पूछ थी l पहली रोटी मेरी थाली में ही आती थी l लेकिन, जब से मैं रिटायर हुआ हूँ l कोई पानी भी नहीं पूछता यार l वो मर्मांहंत गले से बोले l"

नरेश बाबू, रघुवंश बाबू के थोड़ा और करीब खिसक आये l और समझाते हुए बोले क्या बच्चों की तरह जिद करते हो यार l सत्तर पार कर चुके l क्या समय एक जैसा रहता है l अभी देखो दोपहर हो गई है l थोड़ी देर में शाम हो जायेगी l इस तरह बच्चों की तरह भी कोई सुबकता है l"

सांत्वना के लिए नरेश बाबू ने रघुवंश बाबू के पीठ पर हाथ फिरायी l लेकिन, अप्रत्याशित से रघुवंश बाबू चीखे-"हाँ, बच्चा नहीं हूँ मैं ! मुझे भी पता है l कि मैं सत्तर बसंत पार कर चुका हूँ l बूढ़ापे में कोई इस तरह बेइज्जत नहीं होता l इसलिए मैं घर छोड़कर जा रहा हूँ l कोई पूछे तो कह देना l मुझसे नहीं मिले l या मेरे पास नहीं आये l"

वो, झुके हुए कँधे से ट्रँक लेकर लँगड़ाते हुए धीरे, धीरे बाहर निकल गये l

नरेश बाबू, रघुवंश बाबू के खुद्दारी के कायल हो गये l नरेश बाबू, उस रास्ते को देर तक निहारते रहे l गर्म दोपहर की तरह उन्हें रघुवंश बाबू की खुद्दारी भी दिखी l

नीलमणि देवी उसी तरह लँगडाते हुए फिर सुनंदा के पास आई l और, पूछा-"बाबूजी, वापस आये ?"

सुनंदा ने "ना "में सिर हिलाया l

नीलमणि देवी के मुँह से अस्फुट से स्वर निकले-"कमबख्त ! तूने ये क्या किया ?"

और सुनंदा, अपनी गलती समझने की कोशिश कर रही थी l

विदाई (लघुकथा)

मुहम्मद अली बड़े ही सहृदय आदमी थे l बारात विदाई का समय था l उन्होंने चारों तरफ नजर फिराई l लड़की को दिये जाने वाले दहेज का सारा सामान वहाँ मौजूद था l पलंग, फ्रिज, रसोई के सारे बर्तन l गद्दा - रजाई l घर का सारा फर्नीचर l

फिर गुलफाम मिंयाँ के चेहरे पर ये उदासी क्यों पुती हुई है ? मुहम्मद अली, गुलफाम मिंयाँ के थोड़ा और करीब खिसक आये l और गुलफाम मिंयाँ से बोले-"मिंयाँ कुछ उदास-उदास से लगते हो ? आखिर क्या बात है ?"

गुलफाम मिंयाँ, इस स्नेह और ममत्व से मोम की तरह पिघले-"सोचता हूँ l कुछ छूट तो नहीं गया l सारी चीजें मैं दे तो पाया हूँ ना l लगता है कुछ कमी रह गई l"

मुहम्मद अली बड़े प्यार से बोले-"अब, क्या अपना कलेजा काढ़ कर दोगे l हर बाप को ऐसा लगता है कि उसने अपनी बच्ची को कुछ दिया ही नहीं l मैनें तुम पर कभी कोई जोर नहीं दिया l और तुमने मुझे जो भी दिया वो बहुत है l"

अपनत्व और प्रेम-से ओत- प्रोत गुलफाम मिंयाँ, मुहम्मद अली का कंधा पाकर जार-जार रोने लगे l सुबकते हुए बोले -"तुम ठीक कहते हो मुहम्मद अली हर बाप को ऐसा ही लगता है l कि उसने अपनी बेटी को कुछ दिया ही नहीं l"

मुहम्मद अली पसोपेश में पड़े, ये समझने की कोशिश कर रहे थें l कि गुलफाम साहब विदाई के दु:ख से रो रहे थें l या कोई और बात थी l

भूख (लघुकथा)

गायत्री ने जुगल को एक बार घर से बाहर निकलते वक्त फिर से याद दिलाया-"आज तुम्हारा तीसरा दिन है l आज भी खाली हाथ मत लौटना l नहीं, तो आज बच्चे मानने वाले नहीं हैं l कल पड़ोसन के यहाँ से पार्टी में बची पूड़ी लाकर खिलाया था l सम्मी की माँ का नरसों का उधार लिया दो सौ रूपया भी चुकाना है l उधर पंसारी सौदा देने से मना कर रहा है l सबके अपने तकाजे हैं l मैं आखिर कहाँ तक देखूँ ?"

आखिर जुगल से भी नहीं रहा गया l और वो, गायत्री पर बिफर पड़ा-"आखिर, तीन दिनों से बोहनी नहीं हो रही है l तो मैं क्या करूँ ? मैं शौक से थोड़ी ही खाली हाथ लौटता हूँ l कुकुरमुत्ते की तरह बेगारी बेरोजगार लड़के हो गये हैं l एक तो आर्डर नहीं है l भेड़ों से ज्यादा गड़ेंरी हो गये हैं l ना ही मैं घर में बैठा रहता हूँ l सुबह नौ बजे से रात दस बजे तक आखरी आर्डर के इंतजार में मैं सड़कों की खाक छानता रहता हूँ l

अब जब बाजार ही ज्यादा खराब रहता है l तो कोई क्या कर सकता है ?"

पर्वतपुर पहाड़ी एरिया है l यहाँ बारिश कुछ ज्यादा ही होती है l ऑनलाईन आर्डर बरसात में कम ही निकलते हैं l फिर, गाँव- ज्वार वाला एरिया होने के कारण पिज्जा- बर्गर और पेटिस खाने वाले लोग हैं ही कितने ? वो तो शहर में पढ़ने वाले आजकल के नौजवान लड़के- लड़कियों के शौक- मौज की चीज है l"

"पापा...बहुत भूख लगी है l कुछ खाने के लिए लेकर आओ ना l"

रंगोली ने जब बहुत लाड से कहा तो जुगल की तंद्रा टूटी-"हड़बड़ाकर बोला ... अभी देखता हूँ l जाकर बाहर से कुछ लाता हूँ l"

जुगल ने जेब टटोली कल रात जब वो घर आने के लिए लौट रहा था l तब उसकी जेब में एक पाँच रूपये का सिक्का था l और उसी सिक्के से उसने एक पैकेट बिस्किट खरीद लिया था l रास्ते में उसमें से एक बिस्किट निकालकर खाया था l बाकी के पाँच-छ: बिस्किट उस पन्नी में पड़े थें l जुगल ने मुस्कुराते हुए वो बिस्किट का पैकेट रंगोली की ओर बढ़ा दिया l वो कूदती -फांदती बिस्किट का पैकेट लेकर बाहर भाग गई l"

जुगल ने अपनी मोटर-साईकिल निकाली बैग को पोछा l और तभी उसकी नजर बैग पर लिखी इबारत पर पड़ी l जिसके मजमून कुछ इस तरह के थें-"आज, आप क्या खाएँगें ?" l

बड़ी अजीब बात है l वो खुद लोगों से पूछता रहता है कि "आज आप क्या खायेंगें ?" l लेकिन, आज तक कभी उसने अपनी फैमिली से नहीं पूछा कि आज आप क्या खायेंगें ?

उसने गौर से देखा बैग के ऊपर लिखी इबारत पर किसी का ध्यान तो नहीं गया l बच्चे बाहर खेल रहें थें l गायत्री कपड़े धो रही थी l

लगा उसने कोई चोरी की हो l और वो, पकड़ा जायेगा l वो जल्दी बाजी में मोटर-साईकिल लेकर सड़क पर आ गया l धूप में बैग पर लिखी इबारत बैताल की तरह जुगल के कंधे पर सवार होकर पूछ रही थी-" आज आप क्या खायेंगे..?"

युद्ध (लघुकथा)

बारह साल के अनुभव ने टी. वी. पर न्यूज देखते हुए, अपने पिता विकास से पूछा -"पापा इस दुनिया का सबसे बुद्धिमान प्राणी कौन है ?"

विकास ने नाश्ते का कौर मुँह में रखते हुए कहा -"आदमी और कौन .. ?"

"क्या आदमी, सबकुछ कर सकता है ..?" अनुभव टी. वी. का रिमोट हाथ में घुमाते हुए बोला l"

"हाँ, वो सबकुछ कर सकता है l आदमी ने साइंस और टेक्नोलॉजी की मदद से चाँद और मँगल ग्रह पर बस्तियाँ बसा लीं हैं l यहाँ तक की आदमी कहीं से भी बैठे-बैठे पलक झपकते ही अपने दुश्मनों का पल भर में सफाया कर सकता है l"

अनुभव फिर उसी लहजे में बोला- "पापा, आदमी जब सब कुछ कर सकता है l तो उसने चिड़ियों से कुछ नहीं सीखा ?"

"मतलब..?" विकास ने अनुभव को सवालिया नजरों से घूरा l

"मतलब, चिड़ियाँ रेशों और तिनकों की मदद से धीरे-धीरे अपना घोंसला बना लेती है l और, उसमें अपने लोगों के साथ आराम से रहती है l झुँड़ में दाना चुगने जाती है l झुँड़ में ही वापस आती है l मैनें उन्हें कभी आपस में लड़ते-झगड़ते नहीं देखा l क्या, आदमी ने चिड़ियों से कभी कुछ नहीं सीखा ?"

कमरे में कुछ देर चुप्पी के कतरे तैरते रहे l

फिर, विकास ने हाथ में लिया नाश्ते का कौर वापस प्लेट में रख दिया और, अनुभव के बगल में जाकर बैठ गया l फिर वो अनुभव से बोला-"बेटा, तुम कहना क्या चाहते हो ?"

तब अनुभव, विकास के और करीब खिसक आया l और विकास से बोला-"पापा, जब मनुष्य इतना बुद्धिमान है l तो वो, युद्ध क्यों करता है ? युद्ध के कारण ही लाखों लोग, युद्ध में मारे जाते हैं l

कितने बच्चे युद्ध के कारण अनाथ हो जाते हैं l कितनी स्त्रियाँ विधवा हो जातीं हैं l लोग विस्थापित हो जाते हैं l लोगों को शरणार्थियों का जीवण जीना पड़ता है l आखिर, युद्ध से किसका भला होता है ?"

विकास ने बेटे के सिर पर बड़े प्यार हाथ से फेरते हुए अफसोस के साथ कहा-"बेटा, युद्ध से किसी का भला नहीं होता l लेकिन आदमी कभी-कभी अति- महत्वकांक्षी होने के कारण और कभी- कभी अपने लालच में, अपनी कुँठा को छुपाने के लिए भी युद्ध लड़ता है l वो, युद्ध का इतिहास पढ़ता जरूर है l लेकिन, इतिहास से कुछ सीखता नहीं है l सच तो ये कि आदमी ने चिड़ियों से भी कम तरक्की की है l"

सुबह का भूला (लघुकथा)

मालती घर की छोटी बहू थी l वो अपने ससुराल के लोगों से हमेशा जलती और कुढ़ती रहती थी l सास की बात-बे-बात टोका- टोकी उसे अच्छी नहीं लगती थी l सुनंदा ने किसी बात के लिए उसे कभी नहीं टोका l लेकिन, हद तो तब हो गई जब एक दिन सुनंदा ने मालती को अपने ससुर के दूध में पानी मिलाते हुए रंगे- हाथों पकड़ लिया l

सुनंदा ने मालती को टोका-"मालती तुम इस तरह से बाबूजी के दूध में पानी क्यों मिला रही हो ? एक तो बाबूजी की पुरानी बूढ़ी देह l इस उम्र में भी अगर उनको सही से दूध नहीं मिलेगा l तो इनके शरीर में भला क्या

लगेगा ? खाना- पीना तो तुम जानती ही हो l आजकल सब उर्वरक वाला मिलता है l सारी चीजें जब जहरीलीं होतीं जा रहीं हैं l ऐसे समय में एक ग्लास दूध ही तो ऐसा है l जिससे बाबूजी का स्वास्थ्य थोड़ा ठीक रहता है l ऐसे में अगर उन्हें पतला दूध मिलेगा l तो उनके शरीर में भला क्या लगेगा l फिर बच्चे भी तो इस घर में हैं l हम तो केवल घर का ही काम करतें हैं l लेकिन बच्चों को घर के साथ- साथ बाहर का भी काम देखना होता है l उनके बक्से का बोझ कभी उठाकर देखो l बच्चों का बक्सा चार-पाँच किलो से कम का नहीं होता l फिर उनके ऊपर पढ़ाई के साथ- साथ ट्यूशन का भी दबाव होता है l दूध जैसे पोषक आहर को कम मात्रा में देने से उनका समग्र विकास नहीं हो पाता l इसलिए दूध में पानी मिलाना कहीं से भी ठीक नहीं है l"

मालती अपने पुराने रौ में उसी तरह बोली -"दीदी, बाबूजी का पाचन अब पहले की तरह ठीक नहीं रहता है l भैंस का दूध मोटा होता है l पानी डालती हूँ l तभी दूध आसानी से पचता है l बाबूजी को मोटा दूध पचता ही कहाँ है l देखतीं, नहीं बार-बार वो बाथरूम दौड़ते रहते हैं l अनमोल को भी मोटा दूध में पानी मिलाकर देना पड़ता है l देखतीं नहीं, उसे कितना जल्दी लूज मोशन हो जाता है l फिर, मुझे उसको लेकर बार-बार डॉक्टर के पास दौड़ना पड़ता है l मालती चतुराई से लूज मोशन का बहाना बनाकर किचेन से निकल गई l"

मालती रोज अपने और अपने पति के लिए सब्जी का झोर, और बढ़िया सब्जी अपने लिए निकालकर अपने कमरे में रख लेती थी l बाकी सब्जी में पानी मिलाकर रख देती l इसी तरह वो अपने लिए बनने वाली दाल अलग निकालकर रख लेती l और बाकी बची हुई दाल में पानी मिलाकर रख देती l खाना बेस्वाद लगता तो लोग आधा खाना खाते और आधा खाना छोड़ देते l"

मालती के सास-ससुर और सुनंदा तथा उसकी ननद बिन्नों और उसके दोनों देवर विशाल और ओमकार उसके इस व्यवहार से बेहद दु:खी रहते l उनका मन भीतर से टीसता रहता l लेकिन वे करते भी तो क्या ?

मालती के सास- ससुर क्रमश: जगदंबा प्रसाद और जानकी देवी घर में किसी तरह का कलह नहीं चाहते थें l सुनंदा, बिन्नो, विशाल और ओमकार भी बहुत सीधे-साधे थें l वो अपने माँ-बाप का सदा से सम्मान करते आ रहे थें l मुँह से कुछ भी अनुचित कहना उनको अपने माता- पिता और भाभी सुनंदा और बड़े भईया राकेश के सम्मान को ठेस लगाने जैसा था । सामने से वो कुछ बोल ही नहीं पाते l सुनंदा और राकेश भी मालती के सारी गुस्ताखियों को मन- मन समझते थें l लेकिन प्रत्यक्ष रूप से वो कुछ नहीं बोलते l

एक दिन मालती छत पर से कपड़े उतारकर आ रही थी l कि उसका पैर फिसला गया l और उसे बहुत गंभीर चोट आई l सुनंदा और सास जानकी देवी ने किसी तरह उसे उठाया l ओमकार और विशाल मालती को उठाकर अस्पताल तक ले गये l इस बीच सास जानकी देवी ससुर मालती को पलक- पाँवड़े बिछाकर सेवा-शुश्रूषा करते रहे l नियमित खाने- पीने का ध्यान रखते l दवाई भी समय से देते l बाथरूम तक लाने, ले जाने का काम बिन्नो का था l जगदंबा बाबू बाजार से फल और जूस खरीदकर मालती के लिए लेते आते l

करीब तीन-महीने की सेवा के बाद मालती ने चलना फिरना शुरु कर दिया l

इतनी सेवा-शुश्रूषा पाकर मालती अपनी ही नजरों में गिर गई थी l

एक दिन मालती अपने सास- ससुर और सुनंदा के पैरों में गिरकर रोने लगी l

मालती, रोते हुए बोली-"दीदी, और माँ- बाबूजी मैनें आप लोगों के साथ कितना गलत किया l

भगवान, मुझे कभी माफ नहीं करेंगे l लेकिन मैं आप लोगों को भगवान से भी ऊपर मानती हूँ l हो सके तो मुझ माफ कर दिजियेगा l और मालती जोर-जोर से रोने लगी l"

जगदंबा बाबू, जानकी देवी ने उसे उठाकर कुर्सी पर बैठाते हुए बोले-"बेटी, गलती तो आदमी से ही होती है l असली बात तो ये है कि हम अपनी गलती को मानते हैं या नहीं l वैसे भी सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते l"

मालती देर तक सुबकती रही l और सुनंदा मालती के बालों में देर तक हाथ फेरती रही l

सुरक्षा (लघुकथा)

नेताजी की आवाज एक बार फिर से माइक से होकर गूँजी -"हम अपनी, बेटियों को बारहवीं तक की मुफ्त शिक्षा, टेब्लेटस, साइकिल, और मुफ्त स्कूटी देंगे l पाँच सौ यूनिट तक की फ्री बिजली देंगे l युवाओं को रोजगार देंगे l गरीबों को इंदिरा आवास देंगे l वृद्धों को पेंशन देंगे l"

तभी एक लड़की की आवाज नेताजी के तरफ उछली-"नेताजी, आप हमें कुछ मत देना l बस हमें इतना भरोसा देना की कोई हम बेटियों का बलात्कार ना कर सके l" नेताजी की जुबान जैसे तालू से चिपक गई l जुबान लड़खड़ाने लगी l लगा नेताजी की घिघ्घी बंध गई हो l और माइक खामोश हो गया l

हम वहीं हैं (लघुकथा)

नेताजी के काफिले का रफ्तार और शोर जब कुछ थमा l तो चाय पीते हुए गोविंद ने टपारी पर के छोटू से पूछा-"अच्छा बेटा बताओ, इस बार कौन जीतेगा ..? हमारा पक्ष या विपक्ष.....l"

छोटू ने अपने खुरदरे हाथों से चाय का ग्लास उठाते हुए कहा-"भैया, चाहे पक्ष जीते या विपक्ष l हम आज भी वहीं हैं l जहाँ कल थे l"

गोविंद बची हई चाय बहुत मुश्किल से हलक के नीचे उतार पाया l

लबादा (लघुकथा)

"साले तुझे कितनी बार कहा कि इस बिजनेस में कुछ रखा नहीं है l लेकिन नहीं, तुझे तो कुत्ते ने काट रखा है l तू जब भी करेगा तो बिजनेस ही करेगा l आखिर तू कुछ और क्यों नहीं करता ? समथिंग न्यू l कुछ अलग करो l" दिबांग ने ग्लास का पैग नागेश की तरफ बढ़ाते हुए कहा l

"क्या नया करूँ यार ? कुछ समझ में ही नहीं आता l बचपन से पिताजी के साथ होटल चलाता आ रहा हूँ l होटल के अलावा मुझे कोई व्यवसाय सूझता ही नहीं l" नागेश ने शराब का घूँट हलक से नीचे उतारते हुए कहा l

शहर का ये रिहायशी इलाका स्टेशन के पास था l तमाम तरह के होर्डिंगों से पूरा -का- पूरा एरिया भरा पड़ा था l अचानक से होटलों के नामों पर दिबांग की नजर गई l

होटल दुर्गा, होटल पार्वती, होटल शिवशंकर l

दिबांग के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कुराहट तैर गई l वो, नागेश से मुखातिब होते हुए बोला-"तेरी परेशानी का तोड़ तो तेरे आसपास ही है l तुमने कभी नजर उठाकर देखा ही नहीं l"

"अब यहाँ देखने लायक क्या है भाई ?" नागेश उसी रौ में शराब पीते हुए बोला l

"नाम "

"नाम में क्या रखा है ?" नागेश अचकचाया !

"नाम में ही सबकुछ रखा है बेटा l अच्छा चल बता तेरे दूकान का नाम क्या है ?" दिबांग ने पूछा l

"होटल, रामअवतार l"

"अब इसका नाम कल से तुम रहमतुल्ला रख दो l" दिबांग ने शराब के आखिरी घूँट को अपने हलक में उँड़ेला l

"अबे मैं मुस्लमान नहीं हूँ l जो अपनी दूकान का नाम रहमतुल्ला रख दूँ ? मेरे बाप- दादा और पुरखों की संपत्ति और उनका नाम मैं यों ही नहीं खराब होने दूँगा l"

दिबांग, नागेश के कंधे को धीरे से दबाते हुए बोला-"देखो बेटा, अनुकूलन समझते हो l विषम परिस्थितियों में जीवों के बचे रहने के लिए क्षेत्र/ विशेष या जलवायु- विशेष स्थानों के अनुरूप अपने आप को ढाल लेना l

हम जैसे, नेताओं को अनुकूलन की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है l तेरे जैसे हिंदू नामों के यहाँ पचासों दूकान पैदा हो गये हैं l अब पहले की अपेक्षा कम्पटीशन बहुत बढ़ गया है l तुम्हारे दादा-पड़दादा के समय में यहाँ होटल कम थें l लेकिन अब पहले वाली बात नहीं है l

यहाँ शहर में सैंकड़ों यात्री रोज आते हैं l दीन-ईमान का डर सबको होता है l यहाँ पचासों होटल हिंदूओं के हैं l मुसलमानों का होटल एक भी नहीं है l देख लेना तेरे दूकान का सेल डबल हो जाता है या नहीं l और वैसे भी कौन तुम्हारी पतलून उतारकर देखता है l कि तुम हिंदू हो या मुसलमान l केवल नाम ही तो बदलना है l धर्म थोड़ी ना बदल रहे हो l अंदर से तो तुम हिंदू ही रहोगे ना !"

सुमित अपने दोनों दोस्तों की बातें बहुत देर से सुन रहा था l सुमित बीयर की घूँट भरता हुआ बोला-" बेटा, दिबांग, तुम नेता लोगों के दिमाग में ही ऐसा आइडिया आ सकता है l नहीं तो आजतक मेरे दिमाग में ऐसा आइडिया कभी नहीं आया l l मैंने कभी इस पर गौर ही नहीं किया l साले, जैसे तुमलोग अपने आप को बचाने के लिए श्रेत्रवाद, जातिवाद, और धर्म का सहारा लेते हो l बिजनेस के लिए भी ये कारगर आइडिया है l"

शराब की बोतल में बची हुई, शराब के आखिरी कतरे पर कुछ उम्मीद की किरण जैसा चमका l वहाँ उसे तिनका जैसा कुछ दिखा l लगा ये उपाय ही कारगर होगा l

नागेश जैसे अपने आप में बुदबुदाया -"हाँ, कोई पतलून उतारकर थोड़ी ही देखता है l"

चोट (लघुकथा)

बहुत देर बाद नीरव बाबू को होश आया था l शायद वो चूक गये थे l आस पास के सभी लोग भी जाने पहचाने थें l विवेक, मंटू, पुष्कर, उनके तीनों बेटे l और उनके जान पहचान और जाति सेना वाली संस्था से जुड़े उनके तमाम जाने- पहचाने चेहरे भी आसपास ही थें l रामानुज बाबू, शांतु कुमार ये जाति सेना के अजेय सिपाही थें l धुंधलाती नजरें जब कुछ सीधी हुईं l तो सामने की बेड पर मतीन मिंयाँ को देखा l स्लाइन वाले ग्लूकोज की बूंदें जैसे मतीन मिंयाँ के वजूद में जिंदगी भर रही थीं l

नीरव बाबू की भृकुटि तन गई l तमतमाते हुए बोले-"ये मनहूस यहाँ क्या कर रहा है ? इसकी शक्ल देख लो तो दिनभर खाना नसीब नहीं होता है l विधर्मी कहीं का ! नीच !"

"बाबा आप, आराम कीजिए l डॉक्टर ने आपको ज्यादा बोलने के लिए मना किया है l" विवेक, उनका बड़ा बेटा उनको तकिये पर लिटाते हुए बोला l

"वैसे भी, आपकी जान मतीन चाचा के कारण ही बच पाई है l जब आपको गाड़ी ने चौराहे पर धक्का मारा था l तो यही मतीन चाचा आपको अपनी बेकरी वाले टेंपो पर लादकर अस्पताल लाये थे l और अस्पताल में आपकी ब्लड ग्रुप का खून भी नहीं था l तब मतीन चाचा ने ही आपको खून देकर आपकी जान बचाई थी l"

नीरव बाबू को जैसे सोते से किसी ने जगाया था l वो ताउम्र छोटे- बड़े, ऊँच-नीच, धर्म- मजहब की कुंठाओं के बीच जीते आ रहे थें l उन्हें आज एक अदना सा विधर्मी मतीन ने बचा लिया था l

हे भगवान ! ये कितना बड़ा पाप वो लगातार करते आ रहे थे l उन्हें उनकी आत्मा ने धिक्कारना शुरू कर दिया l झूठे आडंबरों-कुँठाओं में कितना लताड़ते रहे उस भले आदमी को l

पता नहीं उन्हें क्या सूझा l वो उठकर बिस्तर से नीचे उतरे और मतीन मिंया को अपनी बांहों में अंकवार लिया l कमजोरी की वजह से वो लडखडा़ये लेकिन तभी मतीन मियां ने उन्हें थाम लिया l

फिर, मतीन मियां बोले-"अमां यार बेहोश होकर गिर जाओगे l अभी तुम्हारे चलने के दिन नहीं हैं l"

नीरव बाबू अपने आपको संभालते हुए बोले -"बेहोश तो अबतक था l अब होश में आया हूँ l मतीन मिंयाँ l" और दोनों बूढ़े हो- हो कर हँसने लगे l

दर्द (लघुकथा)

उस्मान साहब कुर्सी पर बैठते हुए अचानक से फिर उसी रौ में कराहे । । जैसे इन महीनों में‌ जब से सर्दियाँ शुरु हुई थीं । वे कराहा करते थे । दर्द की एक पतली महीन रेखा उनके चेहरे पर उभर आई थी । कमबख्त घुटनों ने परेशान कर रखा है । इन दिनों । सर्दियों में उनकी तकलीफ अक्सर बढ़ जाया करती है‌ ।

वे फिर से एक बार कराहे - "ऊफ! या अल्लाह .."

और बैठक से निकलकर ओसारे में आ गए । जहाँ फलांग भर की दू‌री पर रूकैया साड़ी वा‌ले से साड़ी खरीद रही थी । उनको देखा तो ‌उनको नजरअंदाज करते हुए साड़ी वाले से बातों में उलझी रही । थोड़ा रुककर वो‌ रुकैया से बोले-"बहू, ‌‌मेरा नीकैप कब‌का खराब हो गया है । और, ठंड की वजह से जोड़ों मे कनकनाहट होती रहती है । अनवर से कहो ना एक जोड़ी नीकैप बाजार से ला दे । मैं तो अनवर‌ से कह -कहकर‌ थक गया । लेकिन‌ वो आज-कल करके टाल जाता है । "

रूकैया साड़ी को एक तरफ रखते हुए बोली-"यहाँ लोग अपने लिए कमाएँ या औरों के लिए । समझ नहीं आता । मर- मर के दिन रात काम करो । तब भी घर में बरकत नहीं होती । छोटी सी नौकरी में लोग क्या-क्या जुटायें ? एक तरफ ढकों तब दूसरी तरफ उघाड़ हो जाता ‌है । अभी पिछले साल ही तो उन्होंने आपको नीकैप खरीदकर दिया था । क्या इतनी जल्दी खराब हो गये । "

"अरे, पिछले साल कहाँ दो- तीन साल पहले अनवर ने नीकैप लाया था । एक नीकैप का रबर पूरी तरह खराब हो गया है । घुटनों से नीकैप नीचे गिर जाता है । और घुटनों में कनकनाहट बढने लगती है ।

"ग्रामो फोन की सई जैसे उस्मान साहब के गले में घरघराई ।

"दोनों पैर में दर्द है या एक ही पैर में । "रूकैया ने पाँच सौ के दो नोट साड़ी वाले की तरफ बढाते हुए पूछा ।

"कभी-कभी एक पैर में भी करता है । और‌ कभी- कभी दोनों पैरों में भी ।" उस्मान साहब खुरदरी दीवार की तरफ ताकते हुए बोले‌ ।

"आप एक ही नीकैप को बदल- बदल कर क्यों नहीं पहनते ? जब, जिस पैर में दर्द ज्यादा हो उस पैर में पहन‌ लिया कीजिए । इससे पैसा भी बचेगा और सामान‌ की यूटीलिटी भी बरकरार रहेगी ।"रूकैया कमरे में जाते हुए बोली ।

उस्मान साहब के चेहरे पर उदासी और दु:ख के कोहरे और ज्यादा घने हो गए । जो आँखों के रास्ते धीरे- धीरे बहने लगे । वे अस्फुट स्वर में जैसे बोले-"दर्द को बदलकर भी भला कोई पहनता है क्या ? मेरा बस चलता तो उसे साबुत उखाड़कर ना फेंक देता !"

बेटी का बाप (लघुकथा)

"पता है‌, लोग हमारे बारे में कैसी-कैसी बातें कर रहें हैं । कहते हैं । हमने रूबी को अच्छे संस्कार नहीं दिये । नहीं तो वो इस तरह हमारी नाक कटवाकर उस‌ निगोड़े बलवंत के साथ नहीं भागी होती । अभी रूपलाल की दुसरी बीबी सुनीतवा मिल गई थी । कह रही थी । आजकल तो हर घर की यही कहानी हो गई है बहन । चूजों के पर निकले नहीं की इश्क करने निकल जाते हैं । मुझे तो उसके हँसने पर बड़ा गुस्सा आ रहा था । इस तरह हँस -हँस कर बातें कर रही थी । जैसे रूबिया के भागने से उसे बेइंतहा खुशी हई हो । " सु‌लोचना देवी अपनी औलाद रुबी को कोस रहीं थीं ।

मकरंद बाबू भी पड़ोस की छत पर बैठे हुए अखबार पढ़ रहे थें । अखबार को तह करके एक ओर रखा । और अपनी ऐनक साफ करते हुए बोले-"ये कोई नई बात नहीं है । ऐसी घटनाएँ समाज में अक्सर होती रहती हैं । लेकिन खराब बात ये है । कि हम किसी की बेटी-बहू के भाग जाने पर खुश होते हैं। उसकी चर्चा लोगों से रस- ले लेकर करते हैं। मानों हम उनके हित चिंतक नहीं हैं । सबसे बड़े शत्रु हैं । कभी-कभी हम अनजाने में भी ऐसा करतें हैं । लेकिन कभी- कभी हम जानबूझकर ऐसा करते हैं । हमारे सबसे बड़े शत्रु हमारे ये आस- पड़ोस के लोग होते हैं । जो मौका देखकर अपनी कुंठा निकालते हैं । समाज के सबसे बड़े दुश्मन यही हैं।"

गणेशी बगल‌ में खड़ा ईंटों को छत पर सजा रहा था । वो गोपी बाबू और सुलोचना देवी से बोला-" साहेब छोटी मुँह और बड़ी बात ।‌ एक बात कहना चाहता हूँ । पहले हम रामकृपाल बाबू के यहाँ काम करते थें । उनके मुख से ही सुनाता रहा था । कि संतान से हमें यश‌ और अपयश दोनों मिलता है। जिसके भाग में जो बदा होता है । वो उसे मिलता है । ये तो भाग- भाग की बात है। "

शायद गणेशी सही कह रहा था । कि ये तो भाग्य- भाग्य की बात है । नहीं तो रूबी बिना बताये बलवंत के साथ क्यों भाग जाती ?

जमाने भर का दु:ख जैसे ‌गोपी बाबू के चेहरे पर नुमायाँ हो गया था । और वो चाय की प्याली को धीरे - धीरे पीने लगे । मानों वो अपना ही दु:ख पी रहे हों ।

परिंदे की जात (लघुकथा)

लाल्टू ने घर को आखरी बार निहारा l घर जैसे उसके सीने में किसी कील की तरह धँस गया था l उसने बहुत कोशिश की लेकिन, कील टस से मस ना हुआ l उसने सामने खुले मैदान में नजर दौड़ाई l सामने बड़े -बड़े पहाड़ खूब सूरत वादियाँ l कौन इस जन्नत को छोड़ कर जाने की बात भी सोचता है l लेकिन वो अपने बूढ़े बाप और अपने बच्चों का चेहरा याद करता है l तो ये घाटी अब उसे मुर्दों का टीला ही जान पड़ती है l इधर घाटी में जबसे मजदूरों पर हमले बढ़ें हैं l उसके पिताजी और उसके बच्चों का हमेशा फोन आता रहता है l कि कहीं कुछ... l उसके बूढ़े पिता कोई बुरी घटना घाटी के बारे में सुनतें नहीं कि उसका मोबाइल घनघना उठता है l चिंता की लकीरें लाल्टू के चेहरे पर और घनी हो जातीं हैं l

बूढ़ा असगर जाने कबसे आकर लाल्टू के बगल में खड़ा हो गया था l उसकी नजर अचानक बूढ़े असगर पर पड़ी l

लाल्टू झेंपता हुआ बोला-"अरे चचा आईये बैठिये..l"

"तुमने, तो जाने का इरादा कर ही लिया है l तो मैं क्या कहूँ..? लो यह पश्मीना साल है.. l रास्ते में ठँढ़ लगेगी तो ओढ़ लेना l" असगर चचा ने तह किये हुए साल को पन्नी से निकाला और लाल्टू के कँधे पर डाल दिया l

इस अपनत्व की गर्मी के रेशे ने एक बार फिर, से लाल्टू की आँखें नम कर दीं l

असगर चचा ने धीरे-से उसके कँधे दबाये l और हाथ से उसके कँधे को बहुत देर तक सहलाते रहें l असगर चचा को कहीं ये एहसास हुआ कि ज्यादा देर तक वो इस तरह रहें l तो उनकी भी आँखें भीगनें लगेंगी l

उन्होनें विषयांतर किया, और बोले- "चाय पियोगे.. ?"

लाल्टू ने हाँ में सिर हिलाया l

बूढ़े असगर ने नदीम को आवाज़ लगाई-"नदीम जरा दो कप चाय दे जाना l थोड़ी देर में नदीम दो प्यालों में गर्मा- गर्म चाय लेकर आ गया l"

चाय पीते हुए बूढ़ा असगर बोला-"ठीक, है अब तुम भी क्या कर सकते हो ? जब यहाँ लोग ड़र के साये में जीने को मजबूर हैं l वहाँ तुम्हारे वालिद और बच्चे परेशान हैं l यहाँ क्या है ? फुचके अब ना बिकेंगे l तो चाय बेचने लगूँगा l आखिर कहीं भी रहकर कमाया-खाया जा सकता है l तुम जहाँ रहो खुश रहो l अपने वालिद और अपने बच्चों को देखो l जमाना बहुत खराब आ गया l पहले लोग इंसानियत और कौम के लिए जान दे देतें थें l लेकिन, अब इन नालायकों को जेहाद और आतंकवाद के अलावे कुछ नहीं सूझता l जेहाद बुराई को खत्म करने के लिए किया जाता है l बुरा बनने के लिए नहीं l इस्लाम में कहीं नहीं लिखा है l कि बेगुनाहों, और मजलूमों को कत्ल करो l ये सब वही लड़कें हैं l जिन्हें धर्म के नाम पर उकसाया जाता है l और सीमापार बैठे हुक्मरान इनसे खेलतें हैं l"

बहुत देर से चुप बैठा नदीम भी आखिरकार चुप ना रह सका l बोला-"तमिलनाडु में एक कंपनी ने तो एक ऐसा विज्ञापन निकाला है l जिसमें लिखा है कि वो नौकरियाँ केवल हिंदुओं को देगा l मुसलमानों को नहीं ! आखिर जो हो रहा है l एकतरफा तो नहीं हो रहा है ना l"

अचानक से चचा के शब्दों में अफसोस उतर आया l वो नदीम को घूरते हुए बोले-"आज सालों पहले लाल्टू यहाँ आया था l और पता नहीं कितने मजदूर यहाँ काम की तलाश में आयें होंगे l ये देश जैसे तुम्हारा है वैसे लाल्टू का भी है l कोई भी कहीं भी देश के किसी भी हिस्से में जाकर मजदूरी कर सकता है l कमाने- खाने का हक सबको है l लाल्टू आज भी मुझे अपने वालिद की तरह ही मानता है l गोलगप्पे मैं बेलता हूँ l छानता वो है l रेंड़ी मैं लगता हूँ l रेंड़ी धकेलता वो है l मैंने कभी तुममें और लाल्टू में अंतर नहीं किया l बेचारा हर महीने जो कमाता है l अपने घर भेज देता है l साल-छह महीने में वो कभी घर जाता है l तो अपने बूढ़े बाप और बाल बच्चों से मिलने l मेरा खुदा गवाह है l कि मैंने कभी इसे दूसरी किसी नजर से देखा हो l इस ढँग की हरकतें सियासदाँ करें l उनको शोभा देता होगा l हम तो इंसान हैं ऐसी गंदी हरकतें हमें शोभा नहीं देतीं ! हम तो मिट्टी के लोग हैं l और हमारी जरूरतें रोटी पर आकर सिमट जाती है l रोटी के आगे हम सोच ही नहीं पाते l हिंदू-मुसलमान भरे- पेट वालों लोगों के लिए होता है l खाली पेट वाले रोटी के पीछे दौड़ते हुए अपनी उम्र गँवा देतें हैं l इसलिए नदीम दुनियाँ में आये हो तो हमेशा नेकी करने की सोच रखो l बदी से कुछ नहीं मिलता बेटा l बेकार की अफवाहों पर ध्यान मत दो बेटा l इस तरह की अफवाहों पर कान देने से अपना ही नुकसान है, नदीम l ऐसी अफवाहें घरों में रौशनी नहीं करतीं l ना ही शाँति के लिये कँदीलें जलातीं हैं l बल्कि पूरे घर को आग लगा देतीं हैं l मै उन नौजवानों से भी कहना चाहता हूँ l जो इस तरह के कत्लो- गारत में यकीन रखतें हैं l बेटा उनका कुछ नहीं जायेगा l लेकिन तबतक हमारा सबकुछ जल जायेगा !"

बाहर की खिली हुई धूप में कुछ कबूतर उतर आयें थें l बूढ़ा असगर गेंहूँ के कुछ दाने कोठरी से निकाल लाया l और, उनकी तरफ फेंकनें लगा l ढ़ेर सारे कबूतर वहाँ दाना चुगने लगें l

बूढ़ा असगर, उनकी ओर ऊँगली दिखाते हुए लाल्टू और नदीम से बोला-"देखो ये हमसे बहुत बेहतर हैं l अलग- अलग रँगों के होने के बावजूद ये एक साथ बैठकर दाना चुग रहें हैं l ये बहुत बुद्धि मान नहीं हैं l फिर, भी ये आपस में कभी नहीं लड़तें l लेकिन, आदमी इतना बुद्धि मान होने के बावजूद भी जातियों और मजहबों में बँटा हुआ है l इन कबूतरों से आदमी को बहुत सीखने की जरूरत है l"

लाल्टू ने नजर दौड़ाई दोपहर धीरे- धीरे सुरमई शाम में तब्दील होने लगी थी l उसने एक बार रेंड़ी को छुआ l फिर, उन बर्तनों पर सरसरी निगाह दौड़ाई l बिस्तर को निहारा l ये सब वो आखिरी बार निहारा रहा था l पिछले दस- बारह सालों से वो कश्मीर के इस हिस्से में रेंड़ी लगाता आ रहा था l सब छूटा जा रहा था ..! उसकी बस किनारे आकर लगी l लाल्टू चलने को हुआ l

बूढ़ा असगर दौड़कर बस तक आया l उसने लाल्टू को सीने से लगा लिया l लाल्टू और बूढ़ा दोनों रोने लगे l

बूढ़ा असगर बोला-"अपना ख्याल रखना ! कभी हमारी याद आये l और हालात ठीक हो जायें तो चले आना l"

"आप भी.. अपना ख्याल रखना.. बाबा..! "झेंपता हुए वो बस की सीट पर बैठ गया l उसने बैग से पश्मीना शॉल निकाला और ओढ़ लिया l सुरमई शाम धीरे-धीरे रात में बदल गई l

बेटी... (लघुकथा)

वंदना ने विनीत के बातों का जोरदार विरोध करते हुए कहा-"नहीं अबकी मैं तुम्हारी किसी बात को नहीं मानने वाली l तुम्हारे किसी भी बहकावे में, मैं अब नहीं आने वाली हूँ l मैं किसी भी हाल में इस बच्ची को नहीं गिराऊँगीं... !"वंदना अपने पेट पर हाथ फेरते हुए बोली l

"लेकिन, मैं भी अब लड़की नहीं चाहता l" विनीत का स्वर भी अपेक्षाकृत ऊँचा होता चला गया था l "इन सात सालों में मैं दो बच्चियों का बाप पहले ही बन चुका हूँ l मुझे अब बेटा चाहिए बेटा, और कुछ नहीं l तुम्हारे कहने पर ही मैंने दो बार बच्चे का लिंग जाँच नहीं करवाया, नहीं तो ! "बाकी के शब्द जैसे विनीत के गले में ही घुटकर रह गये थे l

"अरे बेटा- बेटी कोई अपने हाथ की चीज तो नहीं है, ना कि अपने मन से कोई बना ले l ये तो कुदरत की बनाई हुई चीज़ है l" वो आगे कुछ ना बोल सकी l

पता नहीं कब से विनीत का दोस्त विनोद आकर उन दोनों की बातें सुन रहा था l कमरे में एक चुप्पी काफी देर तक तैरती रही l जब चुप्पी ज्यादा भारी पड़ने लगी तो, माहौल को हल्का करने की गरज से विनीत, विनोद से मुखातिब हुआ -"अरे विनोद तुम कब आये..?"

"बस.. अभी- अभी.. l" विनोद अन्यमन्सक सा बोला l

फिर, वो वंदना और विनोद से मुखातिब होते हुए बोला-"अच्छा फिर कभी सही मौका देखकर आता हूँ l"

विनीत इससे पहले कि कुछ कहता l विनोद तेजी से कमरे से बाहर निकल गया था l

... आज जिंदगी में पहली बार विनीत को लगा कि वो बेलिबास हो गया है l सूट- बूट और टाई में भी वो अपने आप को नंगा महसूस कर रहा था l क्या- क्या सुना होगा विनोद ने ? अभी घंटे भर पहले ही वो एक सेमिनार से होकर लौटा था जिसका विषय था-"भ्रूण हत्या निषेध और बेटियों को कैसे बचाया जाए ?"

उसके भाषण से समूचा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा था l और उसका चेहरा दर्प से चमकने लगा था l

लेकिन, अभी वो एयरकंडीशन कमरे में भी पसीने से नहा गया था, और कमरे में फिर एक बार चुप्पी के कतरे तैरने लगे थें l

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