लघुकथाएँ (41-60) : महेश केशरी

Hindi Laghu-Kathayen (41-60) : Mahesh Keshri

छोटी-छोटी खुशियाँ (लघुकथा)

रघु बाबू आज बहुत ही व्यग्र लग रहें थें l वो रोज दुकान से लौटते तो कुत्तों के नन्हें-नन्हें बच्चों के लिये याद से बिस्कुट ले आते l नन्हें शावको के लिये अक्सर दूध भी ले आते l उनको बिस्कुट और दूध पिलाकर उन्हें बड़ा ही आत्मिक सुख मिलता l लेकिन, आज कुछ मेहमान उनके यहाँ आ गयें थें l उनके आवभगत में ही सारा दिन निकल गया l रघु बाबू को बिस्कुट लाने की सुध ही नहीं रही l

सुशीला देवी ने जब रघु बाबू से पूछा-"आज आप कुछ ज्यादा ही परेशान से लग रहें हैं l विम्मी के रिश्ते और दहेज की बात सोच रहें हैं क्या ?"

लेकिन, तब भी रघु बाबू कुछ नहीं बोले l

तब, सुशीला देवी एक बार, फिर से उनकी मन:स्थिति को भाँपकर बोलीं-"कहीं आप उन पिल्लों के बारे में तो नहीं सोच रहें हैं ?"

"हाँ, तुम्हें कैसे पता ?" रघु बाबू अन्यमनस्क से बोले l

जैसे उन्होंने इस बात पर ध्यान ही ना दिया हो l और, ये सवाल उनके लिये जैसे बिना मतलब का हो l रघु बाबू फिर भी व्यग्र ही दिखे l

तब सुशीला देवी फिर, से बोलीं-"आखिर, बताओ भी तो बात क्या है ?"

तब जैसे किसी तरह से रघु बाबू ने अपनी दुश्चिंता का निवारण चाहा l और, वे सुशीला देवी से बोले-" दर असल मैं आज पिल्लों के लिये बिस्कुट लाना ही भूल गया l तुम्हें तो मालूम है l वो मेरे हाथ से बिस्कुट कितने प्यार से खाते हैं l अब तो रात भी बहुत हो गई है l पता नहीं उन्होंने कुछ खाया भी होगा या नहीं l"

सुशीला देवी आश्चर्य चकित होते हुए बोलीं-"बस, इतनी सी बात के लिये तुम परेशान हो l ये तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है l मुझे लगा कोई बड़ी बात हो गई है l या कोई बड़ी चिंता है l"

"तुम्हारे लिये बड़ी बात नहीं होगी, सुशीला l लेकिन, मेरे लिये ये बड़ी बात है l पिछले सर्दियों में उनकी माँ मर गई थी l शायद किसी गाड़ी के नीचे आ गई थी l तब से इन बच्चों को कोई देखने वाला नहीं है l मैं खुद अनाथ हूँ l और, उनकी परेशानी समझता हूँ ! "रघु बाबू के स्वर में जैसे जमाने भर की कातरता उभर आई थी l

रघु बाबू की माँ भी बचपन में ही गुजर गई थी l वे अनाथ होने का दर्द बखूबी समझते थें l

आज अगर पारचून की कोई दुकान अभी खुली होती तो मैं दुगुने दाम देकर भी पिल्लों के लिये बिस्कुट खरीद लाता l

रघु बाबू को अगर परमात्म ने उनसे उनकी आखिरी ख्वाहिश पूछी होती l तो वे यही कहते l परमात्म अभी कोई पारचून की दुकान खुलवा दो l ताकि नन्हें पिल्लों के लिये मैं बिस्कुट खरीद सकूँ l

तभी सुशीला देवी ने टोका-"तुम जो बिस्कुट पिल्लों की खातिर लेकर आते थे ना l उसमें से एक- दो बिस्कुट रोज ही बच जाते थें l मर्तबान में रखें हैं l लाकर दूँ l"

रघु बाबू को जैसे कोई खजाना मिल गया था l उन्होंने "हाँ "में सिर हिलाया l

हमसफर (लघुकथा)

इधर, भूषण बाबू की पत्नी सुहासिनी देवी बीमार थीं l अस्पताल गये दो दिनों से ज्यादा का समय हो गया था l सावन-भादो का महीना डायरिया और डेंगू वाला होता है l परसों कुछ अचर-पचर सुहासिनी जी ने खा लिया था l उल्टी और दस्त से परेशान थीं l डॉक्टर को दिखाया गया l तो बोले फूड प्वाइजनिंग है l इस सीजन में होता रहता है l लेकिन, सुहासिनी जी की तबीयत जिस तरह से खराब हुई थी l डॉक्टर के कहे अनुसार बिना पानी चढ़ाये सुहासिनी जी ठीक नहीं हो सकतीं थीं l

कल भूषण बाबू के पैरों का दर्द ठीक था l तो परेशानी नहीं हुई थी l वो लाठी टेकते-टेकते किसी तरह अस्पताल पहुँच गये थें l सुहासिनी देवी को खाना, दवाई और चाय का फ्लासक पहुँचाने l लेकिन आज पैर कुछ ज्यादा ही दर्द कर रहा था l चलने का मन नहीं कर रहा था l तो अपने बड़े बेटे राकेश को आवाज दिया l

लेकिन राकेश उनकी बात अनसुना करते हुए बोला-"बाबूजी, ऑफिस के लिये निकल रहा हूँ l मुझे पहले ही देर हो गई है l माँ का नाश्ता आप अस्पताल पहुँचा आईये l सचमुच में मेरे पास मरने का भी वक्त नहीं है l नहीं तो पहुँचा देता l"

भूषण बाबू ने आश्चर्य चकित होकर राकेश से पूछा-"तुम्हारे पास अपनी माँ के लिये वक्त नहीं है ! जिस माँ ने तुम्हें अपने पेट में नौ महीने तक रखा l तुम्हारी आजीवण सेवा करती रही l तुम्हारे लिये तरह - तरह के कष्ट सहे l"

तीन-तीन, बेटे- बहुओं, और नाती पोतों से भरा- पूरा परिवारों था, भूषण बाबू का l लेकिन, सुहासिनी देवी और भूषण बाबू के लिये किसी के पास वक्त नहीं था l भरे-पूरे घर में भी वो अकेले से पड़ गये थें l रात को अस्पताल में रूकने की मनाही ना होती l तो वे सुहासिनी की देखभाल के लिये वहीं रूक जाते l

इधर, राकेश बिना कुछ बोले ही ऑफिस निकल गये था l

भूषण बाबू की आंतरिक पीड़ा बहुत बढ़ आई थी l आँखों के कोर भींगने लगे l उनका अंतस मथने लगा l वे भीतर ही भीतर कलपने लगे l लगा बच्चों की तरह रो पड़ेंगें l पाँव में जूते डालने l सदरी पहनी l और टिफिन उठाकर लाठी टेकते हुए बाहर निकल पड़े l

ऑटो पकड़ा और अस्पताल की तरफ सुहासिनी देवी का टिफिन लेकर चल पड़े l रात से ही उनको एक अनिष्ट चिंता खाये जा रही थी l सुहासिनी देवी का एक तो पुराना शरीर ऊपर से कोढ़ में खाज बी. पी. की पुरानी बीमारी l सुहासिनी देवी पहले ही नाना प्रकार के रोगों से परेशान थीं l कहीं कुछ अघटित तो नहीं घट गया होगा रात भर में l

अस्पताल पहुँचा तो सुहासिनी देवी को सही सलामत देखा l देखा कि, वो पडोस की बेड पर किसी महिला से हँस-हँस कर बातें कर रहीं थीं l

सुहासिनी देवी, भूषण बाबू को देखकर मुस्कराते हुए बोलीं-"अरे, तुम ही आ गये ! राकेश को क्यों नहीं भेज दिया ? तुम्हरे पैरों में तो दर्द रहता है ना l बेकार में आ गये खा-म -खां l अपनी बीमारी बढ़ाने l"

भूषण बाबू के मुँह से बस इतना ही निकला -"तुम ठीक तो हो ना सुहासिनी l तुम्हारे बेटे के पास तुम्हारे लिये वक्त ही नहीं है l क्या किया जाये ? हम दोनों ही एक-दूसरे के हमसफर हैं l बस यही मानकर चलो l"

"चलो, कोई बात नहीं l सफर में जब तुम साथ हो तो बहुत दूर तक चलेंगें l" सुहासिनी देवी की आँखें भी भींगने लगी थी l लेकिन, वो मुस्कुरा भी रहीं थीं l

दीपावली की खुशी (लघुकथा)

दीपावली नजदीक थी l लोग अपने-अपने घरों की रंगाई-पुताई में मशगूल थें l बाजार में दीयों से लेकर तरह-तरह के पटाखों की भरमार थी l लोग -बाग मिठाईयों, दीयों की खरीदारी में व्यस्त थें l दुखिया, बहुत बीमार होने के कारण खटिया से हिल भी नहीं पाती थी l काम- धँधे की कौन कहे l यहाँ तो अपने लिये दो -जून का चबेना जुगाड़ना भी मुश्किल हो रहा था l पहले जब ठीक थी l तो घरों में चूल्हा- चौका, कपड़े- बर्तन कर देती थी l लोग कुछ ना कुछ हाथ पर धर देते थें l उसी से गुजरा चल जाता था l लेकिन, इधर कुछ दिनों से उसे रह- रहकर तेज बुखार आ जाता था l डॉक्टर को दिखाये इतने पैसे भी पास में नहीं थें l

अपने मटमैले और उदास झोपड़े में खाट पर पड़ी यही सब सोच रही थी l कि सहसा उसे अपने पति घोपू की याद आई l पिछले साल के कोविड़ में उसका पति भी चल बसा था l तब से वो अकेली और अलग - थलग पड़ गई थी l

एक बेटा दीपु था l जो सालों पहले परदेश कमाने गया था l जो अब तक नहीं लौटा था l पता नहीं किस हाल में था वो l

वो अभी इन्हीं बातों को सोच रही थी l कि दरवाजे पर दस्तक हुई -"दुखिया ओ, दुखिया ..दरवाज़ा खोल ..l"

आवाज कुछ जानी- पहचानी सी लगी l तो बहुत हिम्मत करके दुखिया किसी तरह खटिया से उठकर दरवाजे तक आई l और किसी तरह उसने दरवाजा खोला l

सामने देखा तो मंगत राम खड़ा था l दुखिया, मंगत राम की तरफ देखते हुए बोली -"क्यों मंगत इतनी रात गये ? सब ठीक- ठाक तो है l"

दुखिया सशंकित होते हुए बोली l

मंगत राम जानकी बाबू और सोसायटी का चौकीदार था l दरवाजे पर आकर रौबदार आवाज में बोला- "चल, सोसायटी वालों ने तुझे याद किया है ? .."

दुखिया अचरज से बोली-"कोई जरूरी काम है क्या मंगी ?"

"मुझे नहीं पता l लेकिन जब जानकी बाबू और सोसायटी वालों ने बुलाया है तो, कोई ना कोई काम जरूर ही होगा l जानकी बाबू और सोसायटी वालों ने कुछ बताया नहीं है l हो ना हो शायद तेरे वास्ते कोई काम निकल आया हो l"

दुखिया बोली-"अभी तो रात का टाइम है l चल मैं कल सुबह आती हूँ l इतना कहकर उसने दरवाजा बंद कर दिया l"

सुबह जब, बुखार कुछ कम हुआ l तो दुखिया, सोसायटी पहुँची l उसे सारी रात जानकी बाबू का डर सताता रहा था l कि पता नहीं आखिर, क्या बात हुई है कि जानकी बाबू और सोसायटी वालों ने रात को ही मंगतराम को मुझे बुलाने को भेजा था l

वैसे सोसायटी वाले लोग काफी स्नेहशील और मिलनसार स्वभाव के थें l लेकिन, जानकी बाबू बहुत ही सख्त स्वभाव के थें l

लेकिन, जब वो सोसायटी पहुँची तो उसका मन खुशी के मारे चहक उठा l

सबसे पहले जानकी बाबू ही आगे आये और बोले -"तुम्हारा ये व्यवहार हमें बिल्कुल भी पसंद नहीं आया, दुखिया l तुम हमें गैर समझती हो क्या ? तुम सप्ताह भर से बीमार हो और हमें पता ही नहीं था l खैर, इसके बारे में हमें तुम्हारी बस्ती के ही एक आदमी ने बताया कि तुम बीमार हो l तुम्हें कम-से- कम एक फोन ही कर देना चाहिये था l ये सोसायटी और हम लोग सब तुम्हारे अपने हैं l तुम हमारे सुख- दु:ख में हमारा कितना ख्याल रखती हो l हमारा भी तो तुम्हारे प्रति कुछ दायित्व बनता है l कि हम भी तुम्हारे लिये कुछ करें l"

डॉ . घोष, हाथ में दीये और कंदीले लेकर खड़े मुस्कुरा रहें थें l शीला दी के हाथ में मिठाईयों का डब्बा था l गोमती दी कपड़ों को पैकेट पकड़े, मुस्कुरा रहीं थीं l

तब, फिर घोष बाबू बोले-"सच्ची, दीपावली मनाने का असली मजा तभी है l जब हम इसे अपने आस- पड़ौस के लोगों के साथ मिलकर मनायें l दीपावली का ये पावन त्योहार अपने सहकर्मियों और शुभेच्छुओं के साथ मिलकर मनाना चाहिये l दुखिया, तुम्हारे बिना हमारी दीपावाली हमेशा अधुरी मानी जायेगी l अच्छा किया जो आज तुम आ गई l आज तुम नहीं आती तो कल हम तुम्हारे घर चले आते l कल क्लिनिक पर आ जाना l ब्लड का सैंपल ले लूँगा l फिर, दवा भी लेती जाना l दवा, टेस्ट, और जाँच करवा लेना l पैसे नहीं लगेंगें l"

इस अपनत्व और प्रेम भरे व्यहवार को पाकर दुखिया आह्लादित हो कर रह गई l उसका हृदय सोसायटी के लोगों का स्नेह पाकर गदगद हो गया l

कौन कहता है ? उसका कोई परिवार नहीं है l ये इतनी बड़ी सोसायटी ही तो उसका परिवार है l दुनिया में कैसे- कैसे लोग हैं ? उसकी सारी शंका निर्मूल ही थी l आज दीपावली का दिन था l दुखिया, अपने झोपड़े की तरफ लौट गई l झोपड़ी में दीये जलाये l सोसायटी से मिली नई साडी पहनी l आस- पड़ोस के लोगों को मिठाई खिलाया l खुद भी खाई l देर रात गये मिट्टी के बर्तन में खीर पकाई l

आधी रात को दरवाजे पर फिर दस्तक हुई l दरवाज़ा खोलकर देखा तो सामने उसका बेटा दीपु खड़ा था l दुखिया, की आज दीपावली के दिन लौटरी निकल आई थी l दुखिया ने दीपु को खीर खिलाया l

दीपावली की वो रात बहुत ही खुबसूरत थी l दिल के अंदर और बाहर दोनों जगह दीपावली मनी थी ! सचमुच में आज बड़ी दीपावली थी l

पापा, आपको विश्वास नहीं था ! (लघुकथा)

दीपावली का समय था l घर की साफ-सफाई हो रही थी l आरती और पूजा घर के पर्दे और जालों को को साफ कर रहीं थीं l पुष्कर सबसे छोटा छ: साल का था l उचक- उचक कर जाले साफ कर रहा था l कितना भी प्रयास करके वो ऊँचाई तक नहीं पहुँच पा रहा था l लेकिन सफाई करने की जिद किये बैठा था l

कम्मो, योगेश की बहन पास में ही बैठी थी l सफाई करते-करते उसके हाथ सर्टिफिकेट वाली फाईल पर चले गये l जिसमें आरती और पूजा के सर्टिफिकेट थें l बाप की दुसरी चिंता थी कि बेटियाँ अब स्यानी हो रहीं हैं l उनकी शादी- विवाह की चिंता योगेश को खाये जा रही थी l इस बाबत कम्मो से वो कई बार वो चर्चा भी कर चुका था l नजर फिसली तो देखा दोनों बेटियाँ दसवीं और बारहवीं में टॉपर रहीं हैं l पुष्कर पढ़ने में शुरू से कमजोर रहा था l

"तुम्हारी दोनों बेटियाँ पढ़ने में तो अव्वल रहीं हैं, भईया l" कम्मो फाइल को दखते हुए बोली l सच, कहो तो इन्होनें तुम्हारा नाम खूब रौशन किया है l

"हाँ, ये तो है l" योगेश अभिमान से कुर्सी पर पसरते हुए बोला l

तभी चाय की प्याली लेकर रूपा कमरे में दाखिल हुई l चाय की प्याली, योगेश को पकड़ाते हुए बोली -" लेकिन इनको उस समय इन पर विश्वास कहाँ था ? दो बेटियों के बाद मैनें ना कह दिया था l लेकिन, इनकी और सासु माँ की जिद से पुष्कर पैदा हो गया l खानदान का नाम रौशन करने वाला भी तो कोई चाहिये था l आखिर वंश बेल भी बढ़नी चाहिये !"

बेटी, आरती घर के जाले निकालते हुए बोली-"... पापा को शायद हमारे ऊपर विश्वास नहीं था ..! तभी तो.. "

जाड़े की वो, खूबसूरत सा दिन अचानक से बदरंग और उदास लगने लगा था l चाय जो मीठी थी, वो फीकी लगने लगी l

योगेश, बेटियों से आँख नहीं मिला पा रहा था ! उसे लग रहा था, कि जैसे उसने कोई बहुत बड़ा अपराध किया हो l

झेंपते हुए बोला-"नहीं बेटा, मैनें कभी भी बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं पाया l"

पिता का प्रेम (लघुकथा)

आँगन में सुधा देवी अपनी बहू सलोनी पर बिफर रहीं थीं-"तुम्हें जींस पहनकर मार्केट जाने की क्या जरूरत थी l मोहल्ले में लोग तरह-तरह की बातें करतें हैं l आखिर हमारी इज्जत का तुम्हें ख्याल भी है या नहीं ? किसके कहने से तुमने जींस पहनी और फिर मार्केट भी गई l हमारी तो नाक ही कट गई l"

आखिर, कहाँ- कहाँ सेक्रीफाइज करें हम लड़कियाँ l हर बात पर दबाई जातीं हैं l ये मत पहनों l यहाँ मत जाओ l ऐसे मत चलो l वैसे मत रहो l दाँत मत दिखाओ l कहाँ आजाद हुए हैं हम !

बरसों पुरानी रवायतें हमारे ऊपर जबरजस्ती लादी जा रहीं हैं l एक बार तो मन हुआ कि सुधा देवी को कह दे कि, मेरे मन में जो आयेगा, वो पहनूँगी l और वही खाउँगी l

लेकिन, तभी याद आया कि वो, अपने मायके में नहीं बल्कि ससुराल में है l

अपने घर में थी तो अपने पसंद की चीजें पहनती थी l बाबूजी और अम्मा ने कभी टोका- टोकी नहीं की l लेकिन, ये तो ससुराल है l मान-मर्यादा सबका ख्याल रखना पड़ता है l

लेकिन, फिर, उसके अरमानों का क्या ? कितनी पसंद से उसने ये नीली जींस और टॉप खरीदी थी l

छोड़ो मायके जाऊँगी तो किसी को दे दूँगी l

अपनी, अच्छी जींस और टॉप को किसी को देने और खुद कभी ना पहन पाने के दु:ख के कारण सलोनी की आँखें छलछला आईं l

लेकिन, तभी मोहन बाबू सलोनी के ससुर बैठक में दाखिल हुए l और उन्होंने सलोनी को सुबकते देखा l

फिर जब सारा माजरा समझ आया तो हँसते हुए बोले -"धत् पगली ! अब जमाना बदल गया है l तुम

शौक से जींस-टॉप पहनों l आखिर, तुम हमारी बेटी गुडिया की तरह ही हो l गुडिया जब यहाँ थी तो वो भी जींस टॉप पहनती थी l आखिर, तुम भी तो हमारी बेटी ही हो l"

मोहन बाबू, सुधा देवी को प्यार से झिड़कते हुए बोले -"बहू, को क्यों मना कर रही हो, जींस-टॉप पहनने से ? हो सके तो अलमीरा में जो गुडिया का जींस और टॉप रखी है, वो भी इसे दे दो l नहीं तो वो रखे-रखे खराब हो जायेंगे l ओर सुनो सुधा तुम भी चाहो तो मार्केट जाकर अपने लिये जींस- टॉप खरीद लो l

आखिर, कपड़ों से आदमी की पहचान थोड़े ही होती है l और, हमें केवल बातों से ही आधुनिक नहीं बनना है l हमारे संस्कारो में और व्यहवार में भी ये बातें दिखनी चाहिये l

सुधा देवी अपना सा मुँह लेकर रह गईं l

सुधा को आज मोहन बाबू के रूप में दूसरे पिता मिल गये थें l वो ससुर नहीं उसके पिता ही थें ! अपने पिता के घर में भी उसने ऐसी आजादी पाई थी l

गालों पर के ऊभर आये आँसू को पोंछकर वो किचन में चली गई l

गाँव कहीं पीछे छूट गया (लघुकथा)

निम्मो की शादी संपन्न हो गई थी l और आज चार दिनों के बाद जब सारे मेहमान विदा हो गये थें, तो, सुमित भी नहा -धोकर ऑफिस जाने के लिये निकलने ही वाला था l तभी मोबाईल की घँटी बजी थी l फोन पर प्रेमा थी l उसकी ममेरी बहन l बहन कम दोस्त ज्यादा l बहन से ज्यादा वो सुमित की हमउम्र, दोस्त थी l बचपन से जवानी तक के कई बरस सुमित ने अपने ममहर में काट दिये थें l अनाथ था l लेकिन, बड़े मामा की कृपा उस पे हमेशा बनी रही थी l पढ़ने में होशियार भी था l इसलिये स्कूल से वजीफा भी हर साल मिलता था l

गाँव से जुड़ी कई कच्ची-पक्की स्मृतियाँ उसके मन में कौंधने लगी थीं l उसका पहला प्यार, रीमा थी l ईश्वर से जब भी वो प्रार्थना करता l उसमें रीमा को ही माँगता l रीमा को लेकर प्रेमा से सारी-सारी रात बातें करना l रीमा, क्या सोचती होगी उसके बारे में l रीमा प्यार तो करती होगी ना, उससे l वो प्रेमा को मनुहार कर -करके जैसे प्रेमा से रीमा की सारी बातें जान लेने की फिराक में रहता l

ऐसा लगता जैसे एक लड़की होने के नाते प्रेमा को रीमा के दिल की सारी बातें पता होंगी l रीमा को इंप्रेस करने के लिये उसने पायल की एक जोड़ी भी प्रेमा की पसंद से खरीदी थी l फिर, उसने अपना पहला प्रेम -पत्र भी प्रेमा के हाथों ही भिजवाया था l

गाँव के तालाब -पोखर, बाग बगीचे, खेत- खलिहान l दूर-दूर तक फैली, पहाड़ों की लंबी श्रँखला l साफ हवा l साल, देवदार, चिनार के पेंड़ l गाँव की हरीतिमा बरबस ही मन मोह लेते हैं, सुमित का l हाईस्कूल तक सुमित अपने गाँव ममहर में ही रहकर पढ़ा-लिखा l सुमित के माता- पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था l फिर बड़े मामा के यहाँ रहकर ही उसने हाईस्कूल पास किया था l फिर दिल्ली आकर बी. टेक. किया l फिर, नौकरी करने लगा l

फिर पता नहीं इस शहर में जैसे गुम होकर ही रह गया l

पता नहीं कैसे पच्चीस-तीस साल फुर्र से उड़ गये l अब तो उसके बालों के बीच सफेदी भी झाँकने लगी है l

फोन दुबारा, बजा तो तो जैसे सुमित की तँद्रा टूटी l

फोन पर स्त्री स्वर उभरा-"हैलो, हाँ, सुमित भईया मेरी एक किताब शायद आपके गेस्ट रूम में ही छूट गई है l ऑफिस की लायब्रेरी से लेकर आ गई थी l गलती से आपके यहाँ छूट गई l कुरियर कर दोगे प्लीज भईया ! अरजेंट नहीं होता तो फोन नहीं करती l" प्रेमा के स्वर में मनुहार था l

तभी, सुमित को लगा की वो आने-जाने वालों, मर-मेहमानों, बर-व्यवस्था करने और लेनदेन के चक्कर में इतना उलझा रहा कि अपने बचपन की दोस्त प्रेमा से घँटा-आधा -घँटा बात भी ना कर सका l कितने दोस्त कितनी यादें l

ओह ! उसे बगल वाली सुलोचना चाची की याद आ गई l जो मामाजी के घर के बगल में रहतीं थीं l

सुमित को बाग से भर-भर दोने शहतूत, जामुन, और बेर लाकर देतीं थीं l

पगली चिरैया का क्या हुआ ? जो इधर-उधर भीख माँगकर खाती थी l उसके बारे में उसने सुन रखा था कि पगली चिरैया काली थी l और उसका पति इसलिये ही उसको छोड़कर कहीं विदेश चला गया था l सालों हो गये अब, तक लौटा या नहीं l सुना है इसी गम में चिरैया, पागल हो गई ! इधर-उधर जूठन चुनकर खाती थी l

सेमरा, मोहना, गणेशिया अभी गाँव में ही हैं l या गाँव छोड़कर बाहर में रहते है l

लँगड़ा दुखना का क्या हुआ जो बिरह के गीत गाता था l और जो गाँव के मँदिर में सोता था l

भगत और उसकी जोरू का क्या हुआ l सुना था कि भगत और उसकी जोरू गाँव के लोगों का भूत झाड़ते थें l

फोन, पर प्रेमा का स्वर फिर उभरा-"भैया, कर दोगे कुरियर ना "

"अरे पगली क्यों नहीं कर दूँगा, तुम्हारी किताब कुरियर l ये भी कोई कहने की बात है l मामाजी और, तुमलोगों के कम एहसान नहीं हैं मेरे ऊपर l लेकिन, तू इतनी जल्दी कब और क्यों चली गई ? कितनी बातें करनी थीं तुमसे l कितनी यादों का सैलाब मेरे मन में उमड रहा है l मैं बता नहीं सकता l"

उसने रीमा के बारे में पूछा l सुलोचना चाची के बारे में पूछा l पगली चिरैया के बारे में पूछा l सेमरा, मोहना, गणेशिया के बारे में पूछा l लँगड़ा दुखना के बारे में पूछा l भगत और उसके जोरू के बारे में पूछा l

लेकिन, प्रेमा का एक वाक्य ही जैसे सुमित के कलेजे को चाक कर गया -"भैया, सालों से अपने ससुराल इंदौर में हूँ l पहले दो चार सालों में जाना भी होता था l लेकिन, अब जब से माँ- बाबूजी नहीं रहे l गाँव आना जाना नहीं होता l तभी प्रेमा के घर से ही किसी बच्चे के रोने की आवाज आई l और फोन कट गया l"

सारे लोग इस भाग दौड़ में इतने व्यस्त हैं l शायद इसीलिये गाँव बहुत पीछे छूट गया है, हमसे !

सनकी (लघुकथा)

नहीं इस बार कभी जोर से दिल नहीं धड़का था l ना ही कभी कोई ऐसी खुशी महसूस हुई थी l जैसी बीस साल पहले उसको देखकर होती थी l कभी-कभी सोचता हूँ कि वो शायद एक लड़कपन के दिनों की एक गलती थी l जब उसे दिल दे बैठा था l

तारा कब की जा चुकी थी l तारा से इस तरह उसने कभी बेरूखी से बात नहीं किया था l जितना वो आज उससे बेरूखी कर गया l और, आश्चर्य ये था कि अंगद को किसी तरह का कोई मलाल भी नहीं था l बल्कि, वो तो खुश था l अपने उस व्यहवार के लिये कि तारा को सरेआम झाड़ दिया था l दसियों ग्राहकों के सामने l उस समय उसके दिमाग के तने स्नायुओं को कितनी राहत मिली थी l

जब उसने तारा से साफ-साफ कह दिया था- "कि नहीं मैम, मैं इस दुकान का मालिक जरूर हूँ l लेकिन , मैं भी नियमों से बँधा हूँ l माफ कीजिये, मैं आपकी कोई मदद इस मामले में नहीं कर सकता l आपको मैं, एक्सचेंज करने की सुविधा बिल्कुल भी नहीं दे सकता l और, हाँ मैं ऐसा आपके साथ ही नहीं कर रहा हूँ l मैं, अपने सभी ग्राहकों के साथ एक जैसा ही व्यहवार करता हूँ l नो मतलब, नो l"

उसे खुद भी पता है, कि, वो इसी शहर की फोर्टिन-बी कॉलोनी के सी- ब्लॉक में रहती है l यहाँ तक कि उसने उसका घर भी देखा है l लेकिन फिर भी वो तारा को पैसे जमा करने के बावजूद भी सामान घर ले जाकर अपनी माँ या भाभी को दिखाने की इजाजत नहीं देता l

तारा की छोटी बहन कंचन ने अनुरोध किया -"प्लीज, सर मुझे पूरा विश्वास है, कि मेरी माँ और भाभी को ये साड़ी जरूर पसंद आयेगी l प्लीज, सर, सिर्फ एक घँटे के लिये ले जाने दो ना, ये साड़ी l प्लीज मैं तुरंत लौटा दूँगी l"

"रहने, दो जिद क्यों कर रही है ? जब नहीं दे रहें हैं तो l चल कहीं दूसरी जगह देखते हैं l यही एक दुकान थोड़े है, पूरे मथुरा में l"

यही ऐंठन तारा में आज से बीस साल पहले भी थी l आज भी उसकी ऐंठन कम नहीं हुई है l निहायत बद-दिमाग और कम अक्ल की लड़की है, तारा l अंगद को कभी-कभी अफसोस होता है कि उसको प्यार भी हुआ था, तो इस कम अक्ल की बेवकूफ अक्खड़ लड़की से l वो भी तो गधा ही है l उसकी अक्ल पर ही पर्दा पड़ गया था l जो तारा से प्यार कर बैठा था l"

इन बीस सालों में क्या- क्या बदला है ? तारा कितनी खूबसूरत थी, बीस साल पहले l अब तो गोरा चेहरा काला पड़ गया है l चेहरे पर पहले वाली मुस्कुराहट नहीं रही l तारा शक्ल से तो खूबसूरत थी l लेकिन, धोखेबाज लड़की है l सामान लेने आती थी तो कैसे मुसकुराती थी l मैं तारीखों को कैलेंडर में मार्क करके रखता था l उसकी पसंद की सोनपापडी, पेठा अमावट सारी चीजें उसके आते ही पैक कर देता था l लेकिन, उसकी मुस्कुराहट धोखा दे गई थी l"

मैं कभी- कभी सोचता हूँ, कि मैं किससे प्रेम करता था ? उससे या उसके चेहरे से l अगर उसको मुझसे प्रेम नहीं था l तो वो मुझे देखकर मुस्कुराती क्यों थी ?

नहीं शायद मैं ही गलती पर था l सामान्य शिष्टाचार वश भी तो लोग मुस्कुराते हैं l

ये भी तो हो सकता है, कि उसकी तरफ से ना हो l चलो कोई बात नहीं l ना हो तो ना ही सही l लेकिन कम- से- कम संकेत तो देना ही चाहिये था l

लेकिन, लड़की है बेचारी कैसे संकेत देती ? साथ में उसकी माँ भी तो होती थी l

इधर चेहरा कैसा काला पड़ गया है, तारा का l ठीक ही हुआ l भगवान के घर देर है, अँधेर नहीं l ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती l

मेरा लेटर उसने अपने बाप को दिखाया था l मेरा भगवान गवाह है कि मैनें भगवान से कभी कम श्रद्धा नहीं रखी तारा पर l मेरा खुदा तो तारा ही थी l मैनें तो शादी तक के बारे में सोच लिया था l अपने बच्चों के नाम तक रख लिये थे l लेकिन, एक दिन उसने कहा कि नहीं धरती और आकाश कभी नहीं मिल सकते l मैनें उसे भरोसा दिलाया था, कि देखो उधर समुंद्र की तरफ जहाँ से सूरज निकल रहा है l वहाँ, क्षितिज है l जहाँ धरती और आकाश आपस में मिलते हैं l

उस वक्त तारा हँसी थी l तुम जागती आँखों से सपने मत देखो l क्षितिज कहीं नहीं होता l सब आँखों का भ्रम है l जैसे रेगिस्तान में मृग- मारिचीका के कारण होता है l पानी कहीं नहीं होता l केवल पानी के होने का भ्रम होता है l प्रेम भी कुछ- कुछ वैसा ही होता है l

फिर, अचानक मुझे याद आया कि उसने अपने बाप के सामने क्या कहा था-"जो, चीज मुझे नहीं लेना होती थी l उसे ये जबरजस्ती दे देते थें l"

"मैं तुमसे आखिरी बार पूछ रही हूँ, कि मैं इसे खरीद कर ले जा रही हूँ l अगर पसंद नहीं आयेगी तो वापस कर लोगे ना ?" तारा की आवाज में इस बार भी वही अकड़ थी l जो आज से बीस साल पहले हुआ करती थी l

पता नहीं अंगद के दिमाग के तंतु तनते चले गये l दाँत भींचते चले गये l दिमाग में खून का रफ्तार दूने वेग से बहने लगा l दिल की धड़कनें फिर बढ़ गईं l पाँव लड़खड़ाने लगे l

उस दिन दुकान में भीड़ भी बहुत ज्यादा थी l दसियों पुरूष और महिला ग्राहकों को निबटा रहा था वो l तभी तारा ने वो सवाल उससे दोहराकर पूछा था l

+++++

"उसकी आवाज अचानक, जोर से चीखी l मैं मोर्चे से एक बार पीछे हट चुका हूँ l बहुत चोट खाई थी l उस समय मैने़ं l अब इतना ताब नहीं रहा है l कि बार-बार मोर्चे पर पीछे हटूँ l"

"मैं, सामान की बात कर रही हूँ l"

"उस समय भी मैं कोई सामान नहीं था l आज भी नहीं हूँ l बहुत खेल लिया था उस समय तुमने मेरे दिल से l अब और नहीं l तुम लड़कियों की मर्दों के दिलों से खेलने की ये रवायत अब हमेशा के लिये खत्म होनी चाहिये l तुमने मुझे बरबाद कर दिया l"

"मैनें किसी के दिल से नहीं खेला है l"

"खेला है, मेरे दिल से l"

"इसका, कोई सबूत है, तुम्हारे पास l"

"पूछो, अपने दिल पर हाथ रखकर, कि तुमने कभी मुझसे प्यार नहीं किया ?"

"लो, दिल पर हाथ रखकर कसम खाती हूँ, कि कभी तुमसे प्यार नहीं किया l"

"मैं, तुमसे प्रेम करता था l मुझे सालों नींद नहीं आई l किताब पढ़ता था, तो मुझे कुछ समझ में नहीं आता था l किताबों की इबारत में तुम्हारा ही चेहरा दिखाई पड़ता था l"

"तुम्हारा, चेहरा पहले की तरह गोरा नहीं रहा l ये काला क्यों पड़ता जा रहा है ? तुम इतनी बदसूरत तो कभी नहीं थी l"

"दवाई, रिएक्शन कर गई थी l"

"झूठ, तुम्हें ईश्वर ने सजा दी है l झूठ बोलने की l और हमेशा ऐसी सजा तुमलोगों को ईश्वर देगा l अगर फिर मेरे जैसे बेकसों को घोखा दिया तो और बद्दुआएँ लगेंगी l"

"ओह ! क्या सच ? मैं अपनी गलती मानती हूँ l"

"शायद, तुम ठीक कह रहे हो l तभी मेरा चेहरा इतना खराब होता जा रहा है l ईश्वर ने तुम्हारी आहों की

सजा दी है l"

"क्या, तुमने कभी मुझे बद्दुआएँ दी थी ?"

"धत्, भला, प्रेम करने वाला कभी अपनी प्रेमिका को बद्दुआएँ दे सकता है ! बिल्कुल नहीं !"

"सच !"

", सच ! तुम्हारी कसम !"

"तुम झूठ बोल रहे हो l"

"मैनें ईश्वर से भी ज्यादा तुमसे प्रेम किया है, तारा l प्रेम में आदमी कभी झूठ नहीं बोलता l"

++++

"मैं तुमसे कितनी बार कह चुका हूँ l मैं ये एक्सचेंज बिल्कुल भी नहीं करूँगा l तुम्हारे लिये कोई अलग से नियम नहीं बनेगा l समझीं तुम l अब अपना ये वाहियात शक्ल मुझे कभी मत दिखाना l दफा हो जाओ यहाँ से l कभी मत आना मेरी दुकान पे l जाओ नहीं तो धक्के मार कर निकाल दूँगा l पाजी कहीं की l चल भाग यहाँ से l"

तारा ओर उसकी बहन डरकर दुकान से बाहर निकल गईं l

बाहर आकर कंचन, तारा से बोली-"दीदी, आपको जानता था, वो ?"

तारा झेंपते हुए बोली-"पता नहीं कोई सनकी था l"

उस रात, तारा को सारी रात नींद नहीं आई थी l

रक्षाबंधन (लघुकथा)

आज रक्षा बंधन का त्योहार था l संजीव कहीं बाहर जाने वाला था l तभी मोबाईल की घंटी बजी थी l कोई नया नंबर था l चूँकि आज रक्षा बंधन था l इसलिये संजीव को डर था कि कहीं बहनों ने फोन ना किया हो l इसलिये उसने इग्नोर करते हुए फोन काट दिया l

इस बार संजीव की ये हरकत जगदंबा बाबू को नागवार गुजरी l अखबार एक तरफ रखते हुए संजीव से बोले-"उठा लो तुम्हारी बहनों का नहीं है l क्योंकि, तुम्हारी बहनें जानतीं हैं कि मेरा भाई पैसों या अन्य जरूरतों को लेकर मेरा फोन नहीं उठाता l इसलिये अक्सर वो मेरे नंबर पर ही फोन करतीं हैं l तुम्हारे नंबर पर नहीं l"

संजीव बढ़ती मँहगाई और घर के खर्चों से पहले ही परेशान था l अपने पिता से गुस्साते हुए बोला-" आपको, ही सात बेटियों के बाद बेटा चाहिये था l आखिर, आपने एक बेटी से ही क्यों नहीं संतोष कर लिया था ? एक बेटी तो ठीक ही थी l एक बेटे की चाहत में आप लगातार सात बेटियाँ पैदा करते चले गये l अगर, आप, एक बेटी पर ही संतोष कर लेते तो मेरी जान सांसत में तो नहीं पड़ती l"

अभी वो और भी बहुत कुछ कहने की सोच रहा था कि दरवाजे पर की कॉलबेल बजी l और संजीव अपनी बात कहते-कहते रूक गया l

दरवाज़े पर आकर दरवाजा खोला तो दरवाजे पर अपनी बड़ी बहन लक्ष्मी को देखा l निशांत ने मामा को उलाहना देते हुए कहा-"मामा, कब से आपको फोन कर रहा था l आप फोन क्यों नहीं उठा रहे थें ?"

लक्ष्मी ने तंज किया-"मामा को लगा होगा मैनें फोन किया है l जेब ढीली करनी पड़ेगी l इसलिये फोन नहीं उठा रहा होगा l क्यों ठीक कह रही हूँ ना मैं ?" लक्ष्मी ने संजीव को छेड़ा l

संजीव इस सच्चाई को सुनकर जमीन में जैसे गड़ सा गया l

औपचारिकता वश झुककर बड़ी बहन लक्ष्मी के पाँव छुए l साथ में भगना निशांत भी था l निशांत ने झुककर अपने मामा संजीव के पाँव छुए l

लक्ष्मी अपने ही क्वार्टर और उसमें रखे फर्नीचर को देखकर मुग्ध हुए जा रही थी l अतीत जैसे जोंक की तरह उसके आत्मा को जकड़ता जा रहा था l

अम्मा से जिद करके उसने क्रोशिये का काम सीखा था l जड़ी-मोती के निर्जीव तोते आज बीस साल पहले की कहानी कह रहें थें l लक्ष्मी की जब शादी हुई थी l उसके पति एक मामूली क्लर्क थें l बाद में स्थिति कुछ खराब हुई तो भाई और भाभी ने आँखें फेर लीं l

संजीव सातों बहनों में से किसी का फोन कभी नहीं उठाता था l बेकार के खर्चों और आकस्मिक जरूरतों को बेवक्त झेलना उसे गैर-मुनासिब लगता l

घर में रखा अचार का मर्तबान l तुलसी-पिंड़ा l उसकी अलमारी l सारी चीजें अपनी जगह ज्यों-की-त्यों जमा थीं l इन बीस सालों में किसी शरणार्थी की तरह वो ही बिलग हो गई थी घर से !

अंतस में कुछ भींगने लगा तो उसने रूमाल से आँखों के कोर पोंछे l

"और, सब घर में कैसे हैं, पापा .. ?" लक्ष्मी की आवाज काँप रही थी l

"सब, ठीक है, बेटा .. l बैठो ना l ...दामाद जी कैसे हैं ?" जगदंबा बाबू की आवाज भी भींगने लगी थी l

"पापा ... इन बीस वर्षों में राजीव ..जी ने बहुत संघर्ष किया l और आज उसी क्लर्क की हैसियत से उठकर कंपनी के डायरेक्टर बन गये l आज लाखों रूपये का पैकेज है l निशांत, का एक फ्राँस की कंपनी में सलैक्शन हो गया है l कोठी, और बागान हम लोग छोड़कर कहीं जा नहीं सकते l

इधर राजीव भी परमानेंट फ्राँस शिफ्ट होने की सोच रहें हैं l निशांत ( एक फ्राँसिसी लड़की ) जेनी से प्रेम करता है l वो भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, फ्राँस में l

अगले महीने हमारे घर पर ही एँगेजमेंट होगी l संजीव-सुनंदा भाभी और पापा आप सब आईयेगा l फ्राँस में राजीव ने कुछ प्रॉपर्टी खरीदी है l उनका भी वहीं बिजनेस हो रहा है l पापा, मैं आपसे एक बात कहना चाह रही थी l हमारे अब्राड़ शिफ्ट होने के बाद हमारा नोएड़ा वाला घर खाली रहेगा l हमलोग तो अब्रोड शिफ्ट हो रहें हैं l राजीव जी ने एक फैसला किया है, कि हम अपना मकान संजीव और भाभी के नाम कर दें l ताकि भईया और भाभी और उनके बच्चों को रिटायरमेंट के बाद इधर-उधर ना भटकना पड़े l संजीव, अब मेरी ये आखिरी ख्वाहिश जरूर पूरी कर देना l आज रक्षाबंधन है l आज मैं अपने भाई को गिफ्ट दूँगी l

जब हमारी परिस्थिति खराब थी l तब हम बहनों ने तुमसे बहुत कुछ लिया l लेकिन, आज ऊपर वाले की दया से हमारी सब बहनें अपने- अपने घरों में खुश हैं l इस बार मैं कुछ लेने नहीं देने आयी हूँ l इस घर ने और आपलोगों ने मुझे बहुत कुछ दिया है l संजीव मेरी बात मान लो l संजीव का भी गला रूँधने लगा था l उसने अपनी सहमति दे दी l

सुनंदा पास में ही आकर ना जाने कब से खड़ी थी l उसने लक्ष्मी के पाँव छुए l फिर पूजा की थाली लेकर आई l थाली में राखी, रोली, कपूर और मिठाई थी l लक्ष्मी ने संजीव के लालाट पर तिलक लगाया और कलाई पर राखी बाँधी l फिर, आरती की l स्निग्धता और, प्रेम एकाकार होकर लक्ष्मी की आँखों से बह रहे थें l उन आँखों में अपने भाई और अपने इस घर, की तरक्की के लिये ईश्वर से अनंत प्रार्थनायें थीं l

राखी बाँधने के बाद लक्ष्मी चलने को हुई l तो संजीव ने अपनी बहन को एक पाँच सौ रूपये का एक नोट दिया l

लेकिन, लक्ष्मी ने पाँच सौ का नोट ये कहते हुए लौटा दिया कि लक्ष्मी हमेशा देने के लिये आती है l लेने के लिये नहीं l

संजीव ने मनुहार करते हुए कहा-"दीदी, आज के दिन तो कम -से-कम रूक जाओ l"

लक्ष्मी दरवाजे तक जाती हुई बोली-"आज, केवल भाई से ही नहीं बल्कि अपनी छ: बहनों से मिलने भी निकली हूँ l और, कौन कहता है, कि रक्षाबंधन केवल भाईयों से मिलने का दिन होता है ? ये दिन तो अपनी बहनों से मिलने का दिन भी होता है l उन्हें भी तो निशांत के एँगेजमेंट में बुलाना है l वैसे भी पीहर में हमारे लिये एक शाम से ज्यादा का समय नहीं होता l या मैनें ज्यादा कह दिया l कुछ घंटे ही हमारा पीहर में बसेरा होता है l शादी के बाद हम लड़कियाँ चिंडियाँ हो जातीं हैं l अपने ही घर में कुछ घंटों की मेहमान !"

और, लक्ष्मी चिड़िया, बनकर अपने बाबुल के घोंसले से उड़ गई l

आज, संजीव अपने ही नजरों में इतना गिर गया था, कि वो, अपने आप से ही आँखें नहीं मिला पा रहा था lआँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थे l

तमगा (लघुकथा)

स्वंतत्रता दिवस का सांस्कृतिक कार्यक्रम अपने पूरे शबाब पर था l

स्टेज से कार चालक रफीक मिंया को आवाज देकर पुकारा गया l रफीक मिंयाँ भीड़ के बीच से धीरे- धीरे चलते हुए स्टेज पर पहुँचे l

राष्ट्राध्यक्ष मुदित मन से तमगे की थाली से तमगा लेकर रफीक मिंयाँ के सीने पर टाँगते हुए बोले-"मुझे बहुत फक्र है तुम पर l तुमने कार को आतंकवादियों से बचाकर दसियों लोगों की जान बचाई थी l तुम उस दिन कार में ना होते तो पता नहीं उन निर्दोष लोगों की जान कैसे बचती l इस मिट्टी का हक बखूबी अदा किया है तुमने l मुझे गर्व है तुम पर रफीक मिंयाँ l"

तभी राष्ट्राध्यक्ष की नजर रफीक मिंयाँ के आस्तीन पर गई l जहाँ से एक हाथ गायब था l राष्ट्राध्यक्ष ने कौतूहल से पूछा-"ये कब हुआ, और कैसे हुआ ?"

रफीक मिंयाँ थोड़ा संभलते हुए बोले-"उस घटना में मेरा एक हाथ चला गया था l एक गोली हाथ में लगी थी l जहर पूरे शरीर में ना फैल जाये, इसलिये एक हाथ काटना पड़ा l शुक्र है पैसेंजर को कुछ नहीं हुआ l नहीं तो लोग कहते कि मुसलमान था, इसलिये आतंकवादियों से मिलकर हिंदूओं को मरवा दिया ! दु:ख इस बात का है कि हमारी कौम को बार-बार अपनी देशभक्ति का सबूत देना पड़ता है l लोग हमें शक की नजर से देखते हैं l पता नहीं ये लोग कब तक इस नफरत को सींचते रहेंगें l रही बात मिट्टी की तो सबको इसी मिट्टी में मिलना है l हाँ, एक जहर देश में जरूर फैल रहा है l इस नफरती जहर को अगर ना रोका गया तो जरूर ये मुल्क बरबाद हो जायेगा l"

इसके बाद स्टेज पर जैसे सबको साँप सूँघ गया था l और माईक बहुत देर तक खामोश रहा l

बेबसी (लघुकथा)

मँदिर से लौटते वक्त केतकी को उसकी सहेली सुलोचना रास्ते में मिल गई थी l दोनों बहुत दिनों के बाद मिली थीं l दोनों मे़ं बातें होने लगी l हालचाल पूछने के बाद केतकी ने सुलोचना से पूछा-"और, बता, तेरी दोनों बेटियाँ कैसी हैं ? स्कूल जा रहीं हैं या नहीं ?"

सुलोचना ह़ँसते हुए ही बोली-"हाँ जा रहीं हैं l एक छठी में पढ़ रही है l दूसरी आठवीं में पढ़ रही है l"

तभी केतकी की नजर सुलोचना की बाँहों पर चली गई l जहाँ नीले-स्याह धब्बे उभर आये थें l केतकी से रहा ना गया तो उसकी बाँहों की तरफ इशारा करते हुए कौतूहल वश पूछा लिया-"सुलोचना, ये तेरी बाहों पर नीले धब्बे कैसे पड़ गयें हैं ? देखो तो, गोरी, बाँहें कैसी तो काली पड़ गयी हैं l"

केतकी के अपनत्व और मिठास भरे व्यवहार को सुनकर सुलोचना की आँखें भर आईं l माँ, जिंदा थीं तो हाल-चाल लेतीं थीं l पिता को छोड़कर अब तो कोई हाल- चाल लेना वाला भी नहीं रहा !

बाहों पर के स्याह नीले धब्बे बादल बनकर केतकी की आँखों से बरसने लगे-"अरे, छोड़ो भी अब तो ये रोज- रोज की बात हो गई है l कर्मा रोज दारु पीकर आता है l और, मुझे रोज मारता -पीटता है l बच्चे छोटे-छोटे हैं, अभी, नहीं तो बच्चों को लेकर अपने मायके अपने पिता के पास चली जाती l क्या करूँ बहुत मजबूर हू़ँ l"

दु:ख की एक महीन रेखा सलवटों से भरे सुलोचना के चेहरे पर उभर आयी थीं l जहाँ सुख कभी उगा ही नहीं था !

छोटी सी एक घटना (लघुकथा)

गाड़ी स्टेशन पर रूकी, और मैं हडबड़ाते हुए स्टेशन के बाहर निकलकर अपने गंतव्य की ओर जाने के लिये मुड़ा l

तभी स्टेशन के बाहर किसी ऑटो वाले का एक्सीडेंट हो गया था l भीड़ में से कोई उसे अस्पताल तक ले जाने के लिये तैयार नहीं था l लोग पुलिस केस के डर से उस युवक को हाथ नहीं लगा रहे थें l भीड़ को चीरता हुआ जब मैं वहाँ पहुँचा तो वो युवक वहाँ पड़ा कराह रहा था l बाहर से घुटने छिले हुए दिख रहे थें l दु:ख की पीड़ा उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी l आनन -फानन में मैनें एक ऑटो वाले को रुकवाया l और उस युवक को जिसको काफी गंभीर चोट आई थी, उठाकर लोगों की मदद से शाँति- निकेतन अस्पताल की तरफ भागा l इस घटना में मुझे एक चीज बड़ी अजीब लग रही थी, पता नहीं क्यों मुझे लग रहा था कि मैं इस युवक को जानता हूँ l इस युवक को कहीं देखा है l लेकिन, कहाँ देखा है l ये याद नहीं आ रहा था l चूँकि उसकी हालत अभी काफी गंभीर थी l इसलिये उससे कुछ पूछना सरासर मुझे बेवकूफी ही लग रहा था l अस्पताल पहुँचकर सबसे पहले मैनें उसे अस्पताल में भर्ती करवाया l दो- दिनों तक उस युवक को होश नहीं आया था l दो दिनों तक लगातार मैं शाँति-निकेतन अस्पताल में ही रहा l तीसरे दिन उसको होश आया l

जब उसको होश आया तो मैनें पूछा-"कैसा लग रहा है तुम्हें ? क्या तुम अब ठीक हो ?"

युवक कुछ बोला नहीं l केवल मन- ही-मन मुस्कुरा रहा था l

"मैं पिछले दो- दिनों से तुमसे एक बात पूछना चाह रहा था l क्या हम इससे पहले भी कभी मिले हैं ?"

उसने "हाँ "में सिर हिलाया l

फिर बोला-"आप कोई दस- एक साल पहले मुझसे मिले थें l उस समय मैं दसवीं में पढ़ता था l उस समय आपको ट्रेन पकड़नी थी l मेरे बोर्ड़ के एक्जाम चल रहें थें l लेकिन, मेरे पास फॉर्म भरने तक के पैसे भी नहीं थें l ये बात मैनें ऐसे ही आपको ऑटो में बताई थी l तब ये जानकर आप ऑटो से उतरते वक्त पाँच सौ रूपये का एक नोट मुझे देते गये थें l मैं मना करता रहा l लेकिन, आप नहीं माने थें l जल्दीबाजी में आप पैसे पकड़ाकर चले गये थें l आपने उस वक्त मेरा नाम भी पूछा था l मैं वही सुनील हूँ l"

अचानक मुझे भी दस साल पहले की वो घटना याद आ गई l अरे, तुम तो बहुत बड़े हो गये हो l घर में सब कैसे हैं ? अब तो तुम्हारी मूछें भी निकल आयी हैं l

सुनील कोई प्रतिक्रिया ना देकर सीधे मेरे पैरों पर गिर पड़ा l उसकी आँखों में आँसू थें l वो कह रहा था l आप जरूर कोई फरिश्ते हैं l जब भी आते हैं l मेरी मदद करने के लिये ही आते हैं l आप ना होते तो मैं मर ही गया होता l

मैनें उसे गले लगाते हुए कहा l मैं सिर्फ एक इंसान हूँ l फरिश्ता-वरिश्ता कुछ भी नहीं हूँ l आखिर, आदमी ही आदमी के काम आता है l पैसे होने पर हर इंसान को एक-दूसरे की मदद करनी चाहिये l

तर्पण (लघुकथा)

विवेक की मौत ठंड लगने की वजह से हो गयी थी l दाह -संस्कार से घर लौटकर आते हुए भी तन्मय ने एक बार वही सवाल अपने दादा गोपी बाबू के सामने दोहराया था l जिसे बार-बार गोपी बाबू टाल जाना चाह रहा थें l

वो कैसे जबाब देते ? अभी तो वे, अपने इकलौते बेटे की मौत के सदमे से उबर भी नहीं पाये थें l अपने बेटे की लाश को कँधा देना हर बाप के लिये दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है l गोपी बाबू के कँठ भींगने लगते हैं l जब कोई विवेक की बात करता है l

करीब सप्ताह भर पहले भी घर की सफाई के वक्त उसने वही सवाल दुहराया था-"दादा, आप घर की सफाई क्यों करवा रहें हैं ? उस दिन भी आप लोगों ने पापा के मरने के बाद पूरे घर को धुलवाया था l पंडित जी से पूछा, तो उन्होंने कहा कि मरने के बाद मरे हुए आदमी के कारण घर अपवित्र हो जाता है l इसलिये हम घर की साफ- सफाई करते हैं l उसे धोते हैं l"

पूरे घर में चारों तरफ पेंट की गँध फैली हुई थी l

तन्मय के कार चलाते हुए हाथ अचानक से तब रूक गये l जब उसने गोपी बाबू को अपना सिर मुँड़वाते हुए देखा l हैरत से ताकते हुए उसने अपने दादा गोपी बाबू से पूछा-"दादा आप सिर क्यों मुँड़वा रहें हैं ?"

गोपी बाबू पीढ़े पर अधबैठे और झुके हुए ही बोले-"बेटा, ऐसे ही l"

"ऐसे ही कोई काम नहीं होता बताईये ना ?" l तन्मय जिद करते हुए बोला l

इस बार गोपी बाबू बेबस हो गये l फिर वे बोले-"बेटा जब हमारा कोई अपना गुजर जाता है l तो उसको हम अपनी सबसे प्यारी चीज अर्पित कर देते हैं l ये हमारा उस व्यक्ति के प्रति हमारी निष्ठा का सूचक होता है l हमारे यहाँ के संस्कार में इसे तर्पण कहते हैं l इस मामले में हमारे बाल हमारी सबसे प्यारी चीजों में से एक होते हैं l इसलिये हम अपने बाल मुँडवाकर अपने पूर्वजों से उऋण होते हैं l उनको सम्मान देते हैं l उनसे ये वादा भी करतें हैं, कि उसके मरने के बाद उसके बचे हुए कामों को हम पूरा करेंगें l बालों का मुँडन उस मृतक व्यक्ति के प्रति हमारा शोक भी होता है l"

तन्मय ने गोपी बाबू से फिर पूछा-"कैसा शोक दादा ? एक तरफ हम छुआ- छूत और बीमारियों के डर से अपना बाल मुँडवा लेते हैं l और, शोक का नाम देते हैं l ये हमारा आडंबर नहीं है तो क्या है ? पापा के मरने के बाद हम अपने घर को धुलवा रहे हैं l उस पर पुताई करवा रहें हैं l जैसे, पापा मरने के बाद हमारे लिये अछूत हो गयें हों l जीते जी उन्होंने इस घर के लिये और हमारे लिये कितना कुछ किया l मैनें एक बार कहा l और वो मेरे लिये लैपटॉप ले आये l मम्मी के लिये स्कूटी खरीदी l ये घर बनाया l सारी ज़िंदगी मेहनत करते रहे l और मरने के बाद हमारे के लिये अछूत हो गये l कितने मतलबी हैं, हम लोग ! जहाँ उन्हे लिटाया गया उस जगह को पानी से धोया गया l घर के ऊपर चूना, वर्निश पेंट-पुचारा हो रहा है l आपके-हमारे बालों का तर्पण हो रहा है l छि: कितनी खराब ये है ये दुनिया ! "तन्मय के चेहरे पर हिकारत के भाव उभर आये थें l

गोपी बाबू का कँठ अपने पोते की बातें सुनकर रूँधने लगा था l वो सच ही तो कह रहा था l

सावन की ऐसी विदाई (लघुकथा)

ददा के प्राण अटके हुए थें l निम्मो दीदी के आने तक शायद यमराज भी उन्हें अपने साथ ले जाने को तैयार ना थें l निम्मो दीदी या बुआजी ज्यादा पढ़ी -लिखी तो नहीं थीं l लेकिन अपने हक की बात बखूबी जानती समझतीं थीं l फूफा ने निम्मो बुआ को सालों पहले छोड़ दिया था l लेकिन ददा को पता नहीं क्यों ये लगता की सारी गलती निम्मो बुआ की है l निम्मो बुआ आखिर थोड़ा सा दब जातीं तो क्या होता ?

लेकिन अनपढ़ होने के बाद भी निम्मो बुआ को सही गलत की पहचान थी l क्योंकि उन्हें पता था कि वो गलत नहीं हैं l तो वो क्यों दबें ?

हाँलाकि, ददा को अपने आखिरी समय से कुछ पहले ये भान हो गया था l जब मेरे अपने दोनों बड़े भाईयों ने अपनी-अपनी बीबियों के कहने में आकर ददा को दाना -पानी देना बँद कर दिया था l

आखिरी के कुछ साल हम दोनों बहनों ने ही मिलकर ददा की सेवा -सुश्रूषा की थी l तभी ददा को अपनी गलती का एहसास हुआ था l और उनकी आँखें खुली थीं l

दरवाजे पर दस्तक हुई, निम्मो बुआ आँगन से दौड़ती हुई आयीं l और ददा के गले से लगकर रोने लगीं - "भईया पहले खबर क्यों ना भिजवायी l नहीं तो इतनी देर नहीं होती l कुछ तुम्हारी सेवा कर लेती l

आजकल तो मोबाइल का जमाना है l बस एक फोन कर दिया होता तो मैं, दौड़ी चली आती l भाई से आखिर बिगाड़ कैसा ? खून के रिश्ते भी भला कभी खत्म होते हैं क्या ?"

ददा के फँसे कँठ से जैसे आवाज फुसफुसाई l उनकी आवाज बहुत ही धीमी थी -"छुटकी बस तेरा ही इंतजार था l बेटा तेरा फैसला ही सही था l देख आज मरणासन्न हूँ l लेकिन, बेटों ने मेरी कोई बात ना पूछी l गँगाजली डालने भी मेरी दोनों बेटियाँ और मेरी निम्मो ही आई l माँ जब जिंदा थी तो मुझसे कहतें थीं l लालीराम मेरी बिटिया मेरे कलेजे का टुकड़ा है l इसको मेरे धन- संपत्ति का आधा हिस्सा दे देना l बाद में सोचा की सारी संपत्ति अपने बेटों के नाम कर दूँ l लेकिन दाढ़ीजार दोनों- के- दोनों नालायक निकलें l देख तू, और मेरी दोनों बेटियाँ आखिरी वक्त में मुझे विदा करने आई l"

उन्होंने लिहाफ के नीचे से कागज की एक दस्तावेज निकाली और निम्मो की तरफ बढ़ाते हुए बोले-" निम्मो सारी जायदाद मैनें तुम तीनों के नाम से बराबर-बराबर बाँट दी हैं l मेरी आज से दो-नहीं तीन बेटियाँ हैं l रागदरबारी सचमुच में काहिल और बेवकूफ़ आदमी था l जो तुझ जैसी पत्नी की कद्र ना कर सका l तेरा फैसला ही सही था l उस नालायक को तजकर तूने ठीक ही किया l तेरे साथ रोहन की जिंदगी भी उसने खराब कर दी l खैर, तू चिंता मत कर ये कोठी तेरी है l तेरे बाद तेरे बेटे और उसकी बहू की होगी l बाग- बगीचे और खेत खलिहान सुमन और चँदा को बराबर-बराबर हिस्सों में बाँट दिया है l ताकि बाद में तुम लोगों को कोई गलतफहमी ना रहे l बेटों को मैनें कुछ नहीं दिया है l अपना कमाकर खायेंगे l बेटियों का कहीं आसरा नहीं होता l इसलिये तुम लोगों को दिया है l बेटे नालायक निकलें l क्या करू़ँ ? धीरे - धीरे ददा की आँखें बँद होने लगीं थीं l लेकिन ददा के चेहरे एक सुकून भरी मुस्कुराहट थी l अपना फर्ज़ पूरा कर लेने की l

निम्मो को अपने फैसले पर जहाँ फक्र हो रहा था l वहीं गीली आँखों से भाई को विदा कर रही थी l आज सावन की पूर्णिमासी थी l और रक्षाबंधन का त्योहार भी l अजीब संयोग था l अंदर और बाहर जोरों की मूसलाधार बारिश हो रही थी l सावन की आज ये अनोखी विदाई हो रही थी l

चीखती आवाजें.. (लघुकथा)

रागिनी को रोज की तरह दफ्तर से लौटते हुए आज फिर से देर हो गई थी l सूरज अपनी ढलान पर था, और पश्चिम दिशा में डुबकी लगाने को आतुर दिख रहा था l सर्दियों में शाम बहुत जल्दी हो जाती है l आसमान में चाँद और तारे अपनी मौजूदगी का एहसास कराने लगे थें l ठंढ़ ने ठिठुराना शुरू भी कर दिया था l हवा का एक झोंका रागिनी के बदन में जैसे सूई चुभो गया l

"पता नहीं, आज भी ऑटो मिलेगी या नहीं l" जैसे वो अपने आप से बुदबुदायी l

तभी नरेश अंकल जो उसके पड़ोस में ही रहते थें l और बहुत ही भले आदमी थें l अपनी मोटर साईकिल रोककर बोले-"चलो रागिनी, घर चलना है ना l मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ l"

रागिनी को एक बार लगा जैसे वो कह दे l हाँ अंकल चलिये, चलते हैं l लेकिन, ये कहते-कहते वो अचानक से रूक गई l जैसे उसकी जुबान लड़खड़ा रही हो l बलात्, मुस्कुराते हुए बोली -"नहीं अंकल मेरी कैब आ रही है l आप जाइये l मैं आ जाऊँगी l"

नरेश अंकल अपना सा मुँह लेकर मोटरसाईकिल से आगे बढ़ गये l लेकिन, रागिनी को गहरा क्षोभ हुआ l अपने इस व्यवहार से l लेकिन वो मजबूर थी l ऐसा करने के लिये l

वो आये दिन लोगों की पीठ पीछे की बातें सुनती तो उसका कलेजा छलनी हो जाता l

एक दिन मिसेज शर्मा के मुँह से भी सुना था-"बड़ी चालू चीज है, रागिनी l कॉलोनी के कई मर्दों को फाँस रखा है l तभी तो नरेश जी, उसे लाते-ले जाते हैं l"

कॉलोनी के लोगों, को जब भी देखती वो बातें करते-करते अचानक से रूक जाते l और उसके जाते ही जोर का ठहाका मारकर हँसने लगते l

रागिनी को ये हँसी अक्सर चुभती है l लोग जो कहना चाहते हैं सामने क्यों नहीं कहते ? पीठ पीछे सब किसी ना किसी की निजी जिंदगी को किसी मर्द के साथ जोड़कर आनंद लेते हैं l

एक दिन किसी ने मिसेज चड्ढा के मुँह से सुना था-"नरेश भी कम स्याना नहीं है l नये-नये शिकार तलाशता रहता है l तभी तो, उसकी बीबी मायके में ज्यादा रहती है l नरेश इधर-उधर से ही तो काम चलाता है l रागिनी सोसाईटी का माहौल खराब कर रही है l पक्का छिनाल है छिनाल l सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को l बड़ी सती-सावित्री बनती है l हु़ँह ...!"

सच, औरत की सबसे बड़ी दुश्मन औरत ही है l नींद में भी ये बातें उसका पीछा करती रहतीं हैं l

"कमबख्त बेअक्ल औरतें l बात करने के लिये इन्हें ऐसे ही गँदे टॉपिक चाहिये l"

तभी एक ऑटो वहाँ से गुजरा l रागिनी ने इशारा से ऑटो रूकवाया l फिर ऑटो वाले से पूछा-" रोहिणी चलोगे ... ?"

ऑटो वाले ने हाँ में सिर हिलाया l"

वो ऑटो में सवार हो गई l लेकिन उसे जैसे कोई पीछे से आवाज दे रहा था l या कोई बार-बार कह रहा था l बहुत चालू औरत है ....रागिनी ...l पक्का छिनाल है ..छिनाल .... ! सौ .. चूहे खाके ...बिल्ली चली हज को .. l

पता नहीं रागिनी और ऐसी काम- काजी महिलायें ऐसी आवाजें ना जाने कितनी सदियों से सुनती आ रहीं हैं l आवाज है कि पीछा ही नहीं छोडती l

सौदा (लघुकथा)

"मुझे ये सब कुछ ठीक नहीं लग रहा है ?" जग्गू बाबू ने निर्विकार भाव से निर्लिप्त होकर जैसे अपने आप से कहा l

लेकिन, पता नहीं कैसे ये बात प्रमोद बाबू के कानों में चली गई थी l वो बैठक से बाहर जा रहें थें l शायद किचेन से प्लेट लेने l और तभी जग्गू बाबू की बात प्रमोद बाबू के कानों में पड़ी थी l आज प्रमोद के बड़े बेटे प्रयाग की शादी की बात चल रही थी l और लड़की वाले आज प्रयाग के फैमिली से मिलने आये थें l

ऋचा नोएड़ा में किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है l वैसे प्रमोद बाबू का बेटा प्रयाग भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, मुंबई में l चौबीस लाख का सालाना पैकेज मिलता है l शादी के बाद प्रयाग, ऋचा को लेकर मुंबई में रहेगा l एक बड़ा फ्लैट खरीदा है, उसने मुंबई में l साढ़े चार करोड़ का l

"नहीं, कुछ नहीं l ऐसे ही l" जग्गू बाबू टालने की गरज से बोले l

लेकिन, प्रमोद ने अपने पिता के मन को टटोला-"ठीक है, आप मुझे अपना नहीं समझते तो मत बताईये l"

"अरे, नहीं- नहीं ऐसी कोई बात नहीं है l तुम बैठो मेरे पास l"

और जग्गू बाबू ने प्रमोद का हाथ खींचकर वहीं सोफे पर अपने पास बिठा लिया और बोले-"तुम जानते हो मुझे, सबसे खराब बात क्या लगी की लड़की वालों ने प्रयाग को सैलरी सीट दिखाने को कहा l क्या उनको हमारी बात पर विश्वास नहीं था ? और प्रयाग को देखो उसने भी अपनी सैलरी सीट तपाक से दिखा दिया l पुराने समय में लोग लड़के का खानदान, गुण-दोष, चाल-चरित्र देखते थें l अभी के समय में लोग सैलरी सीट देखने लगे हैं l आदमी में लाख ऐब हों l सब तनख्वाह छुपा लेती है l आखिर, ये कैसा समय आ गया है ? जब हम सौदा करने लगे हैं l रिश्ते नहीं l"

"अरे पापा, आप भी किन पुराने ख्यालातों में गुम रहने वाले इंसानों में से हैं l अभी जमाना बदल गया है l लोग शान से दिखावा करते हैं l ऋचा के माँ- बाप ने भी तो ऋचा की सैलरी सीट दिखाई थी l ऋचा का सालाना पैकेज बारह लाख का है l जब लड़की वाले होकर सैलरी सीट दिखा सकते हैं l तो हम लड़के वाले होकर सैलरी सीट क्यों ना दिखायें ? आखिर हम उनसे कम हैं क्या किसी बात में l प्रमोद बाबू ने गर्व के साथ सीना तानकर कहा था l और, आजकल हर जगह ऐसा ही हो रहा है l सब लोग ऐसा ही कर रहें हैं l"

इतना कहकर वो उठने को हुए l तभी जग्गू बाबू ने प्रमोद को टोका -"अभी मेरी बात खत्म नहीं हुई है, बैठो l"

प्रमोद बाबू वहीं सोफे पर फिर बैठ गये l

जग्गू बाबू ने प्रमोद का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा-"बेटे, प्रमोद इसी लालच और दिखावे ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है l अभी प्रयाग की शादी नहीं हुई है l और वो हमसे अलग एक फ्लैट खरीदकर रहने के लिये तैयारी कर रहा है l आखिर, इसी लालच और दिखावे ने आदमी को स्वार्थी और कमजोर बना दिया है l एकल परिवार की सोच बढ़ा दी है l पता नहीं इतना पैसा लोग कमाकर क्या करेंगें ? जिसको देखो वही पैसे की पीछे भाग रहा है l एक मिनट रूककर साँस लेने की फुरसत भी नहीं है आज के आदमी के पास l दिनरात पैसा कमाते हैं l बच्चों को पढ़ाते हैं l बच्चे देश-विदेश में जाकर सेटल हो जाते हैं l फिर, वहीं के होकर रह जाते हैं l ना कभी आना ना कभी जाना l कभी गलती से दो दिनों के लिये आ भी गये l तो माँ- बाप से मिलने आने से पहले ही जाने का टिकट भी करवा लते हैं l दो-दिन के लिये आते हैं तो अपनी व्यस्तता दिन भर गिनवाते रहते हैं l आज अलाने से मीटिंग कैंसल करनी पड़ी है l आज फलाने बच्चे का स्कूल मिस हो गया l

कभी दो मिनट फोन पर ढँग से बात हो गई, तो हो गई l नहीं तो वो भी नहीं l इतनी आपा-धापी वाली जिंदगी हमें तो कभी रास नहीं आई बेटा l सही मायने में हमारा पुराना ग्रामीण ढाँचा वाला पारिवारिक जीवण ही अच्छा था l शादी में जाते थें, तो महीनों रहकर आते थें l गाँव में हँसी-कहकहे महीनों गूँजते रहते थें l संबंधो में एक तरह की मिठास थी, अपनापन था l वो सबकुछ अब नहीं बचा है l संयुक्त परिवार था l तब लोग साथ मिल-जुलकर रहते थें l खाते थे, पीते थें l आज की तरह एक- दूसरे को पछाड़कर आगे बढ़ने की होड़ तब हममें नहीं थी l आज कल शादी नहीं हो रही है, बेटा l सौदा हो रहा है सौदा l एक बात और मैं कहना चाहूँगा, तुमसे l
मेरा क्या है बेटा मैं तो कुछ दिनों का मेहमान हूँ l तुम अपना देख लो, अपनी पत्नी का देख लो l बूढ़ापा तुम्हें अकेले ही काटना है l
अच्छा, अब चलता हूँ l चार बज गये हैं l थोड़ा घूमकर आता हूँ l"

जग्गू बाबू सोफे की टेक लेकर खड़े हुए l और छड़ी खटखटाते हुए बाहर हवाखोरी के लिये निकल पड़े l

एक जैसे दु:ख (लघुकथा)

बाहर की गर्मी और तपिस देखकर ही लोगों के पसीने छूट रहे थें l पारा पैंतालिस के पार चल रहा था l पशु-पक्षी, चिड़ियाँ -चुग्गे सब ईश्वर से प्रार्थना कर रहें थें, कि जल्दी से बारिश हो और पारा कुछ नीचे गिरे l

लेकिन जयवर्धन सुबह से ही काम में जुटा हुआ था l रेत को बोरियों में भरकर दो तल्ले पर धीरे-धीरे चढ़ा रहा था l जयवर्धन, साठ साल से कम का नहीं है l इतने उम्र तक तो लोग रिटायर होकर घरों में सुख - सुविधा के मजे उड़ाते हैं l जयवर्धन को उसके बच्चों ने घर से निकाल दिया है l जवानी में जयवर्धन हट्टा- कट्ठा था l पैसे कमाता था तो जमकर खाता भी था l अब हड्डियों का केवल ढाँचा ही बचा है l वैसी खाली इमारत जो कभी भी ढह सकती है l

जुगल ठेकेदार रेत की धीमी ढुलाई से खीज गया था l मजदूरों को उसने ठेके पर लगाया था l काम को तीन दिनों में खत्म होना था l लेकिन किसी तरह वो दो दिनों में ही काम को निपटाना चाह रहा था l ताकि कुछ ज्यादा पैसे वो बचा सके l

जुगल ने जयवर्धन को डपटा-"अबे, थोड़ा जल्दी- जल्दी पैर चला l इस तरह से सीढ़ियाँ चढेगा तो हफ्ते भर में भी काम खत्म नहीं होगा l"

जयवर्धन गमछे से पसीना पोंछते हुए बोला-"हाँ बाबू अभी जल्दी करता हूँ l बस तुरंत अभी खत्म करता हूँ l"

स्टेन साहब से रहा ना गया l वो, जुगल से बोले-"अरे भाई, सुबह से वो बेचारा इतनी गर्मी में काम कर रहा है l कम-से-कम उसे कुछ खाने के लिये तो पूछ लो l आखिर वो भी तो आदमी है l हमारी-तुम्हारी जब इतनी भीषण गर्मी से जान निकल रही है l तो क्या वो इंसान नहीं है ? वो, बिना कुछ खाये -पिये खटे जा रहा है l जाओ उसे कुछ खाने को दो और कुछ देर आराम करने को कहो l"

जब जुगल ने कुछ नहीं कहा तो, स्टेन साहब ने अपनी तरफ से जयवर्धन को आवाज दी-"जयवर्धन ....अरे भाई जयवर्धन तुम कब तक काम करते रहोगे यार l उन्होंने जेब से एक सौ रूपये का नोट निकाला और सामने के होटल की तरफ इशारा करते हुए बोले l जाओ रे भले मानस उस होटल से कुछ खाकर आओ l काहे फोकट में जान देने पर तुले हो भाई जाओ l"

स्टेन साहब करोड़ों की कोठी और कई शापिंग कांपलेक्स के मालिक थें l लेकिन बेटा सात समंदर पार विदेश में अपने बच्चों के साथ रहता था l वो भी साठ के करीब ही थें l अचानक जयवर्धन का दु:ख उन्हें अपना ही दु:ख लगने लगा था l और वो भीतर-ही भीतर कहीं रीतने लगे थें l

और, ठेकेदार सारा माजरा समझने के चक्कर में था l वो उजबकों की तरह अपने मालिक स्टेन साहब को घूरे जा रहा था l

स्वार्थी लोग (लघुकथा)

सिस्टर मरियम बच्चों को पढ़ा रही थीं -"बच्चों हमारे अलग-अलग धर्मों में जितने भी लार्ड हुए हैं l उन सबमें एक समानता रही है l कि उन्होंने हमेशा त्याग की भावना को अपनाया l दूसरों के लिये अपना जीवण तक दाँव पर लगा दिया l जैसे हमारे लार्ड शिवा हैं l आपने पढ़ा भी होगा l शिव जी ने खुद विष का पान किया l ताकि हमारी धरती बची रहे l राम जी ने भाई के लिये चौदह साल का वनवास कबूल लिया l प्रभु यीशू दूसरों की भलाई के लिये सलीब पर टँगे l पैगंबर साहब ने अपने सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दी l आप लोग जानतें हैं l भगवान ऐसा क्यों करते हैं l ताकि, दुनिया में शाँति कायम रहे l लोग धरती पर आपसी भाईचारे और मेल मुहब्बत से रहें l शिव जी का हलाहल पी जाना l राम जी का बनवास चले जाना l जीसस का सलीब पर टँग जाना l पैगंबर साहब का अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देना l हमें सिखाता है l कि हम भी त्याग करें l दूसरे को अगर हमारे होने से तकलीफ हो तो हम भी वनवास चले जायें l ताकि अशाँति ना फैले l दूसरों का यदि भला हो तो हम सलीब पर भी टँग जायें l इसलिये हम इन्हें अपना आदर्श मानते हैं l इनके व्यक्तित्व के गुणों को हम अपने जीवण में उतारे l तभी हमारा उद्धार होगा l समाज का कल्याण होगा l विश्व का कल्याण होगा l"

जोसेफ अपने क्लास का सबसे होनहार बच्चा था l उसने सिस्टर मरियम से एक सवाल पूछा-"सिस्टर मरियम आप एक बात बतायें l जब इनका जीवण चरित्र इतना उत्कृष्ट है l तो फिर, देश में दँगें क्यों होते हैं ? देश भर में जो आज हालात हैं l हमारा आधा देश आज जल रहा है l ये किसके कारण हो रहा है l क्या हमारे राजनेताओं ने लार्ड शिवा, लार्ड राम, या जीसस या पैगंबर साहब से कुछ नहीं सिखा l जो आज देश में इतनी अशाँति फैली हई है l क्या उन्होंने इनको नहीं पढ़ा ? क्या उनके अंदर त्याग की भावना नहीं है ? ये क्यों नहीं सीखते हमारे लार्ड से l

सिस्टर मरियम ने जोसेफ के सिर पर प्यार से हाथ फिराते हुए कहा-"बेटा हर कोई लार्ड शिवा, राम या जीसस, या पैगंबर नहीं हो सकता l इसके लिये त्याग की भावना आदमी के अंदर होनी चाहिये l राजनेताओं के अंदर अपना स्वार्थ है l लिप्सा है l भोग की वृति है l त्याग नहीं है l लालसा है l इनसे अच्छा जीवण तो मजदूरों का है l किसानों का है l जो दो रोटी अपनी मेहनत से कमाकर खाते हैं l अपना परिवार ही नहीं अपने देश के निर्माण में भी योगदान करते हैं l लार्ड शिवा, लार्ड राम या जीसस और पैगंबर के ये बहुत ही करीब के लोग हैं l इसका कारण ये है कि इनमें भी त्याग की बहुत बड़ी इच्छा शक्ति होती है l ये परिवार से पहले देश के बारे में सोचते हैं l देश और समाज निर्माण में इनका योगदान बहुत बड़ा होता है l लेकिन हम इन्हें कभी सम्मानित नहीं करतें हैं l अपने समाज के किसी बड़े राजनेता को किसी ऑकेजन पर हम बुलाते हैं l और इसमें अपनी बड़ी शान समझते हैं l l दरअसल असली सम्मान इन मजदूरों और किसानों को मिलना चाहिये l जो कि हमारे युग निर्माता हैं l स्वार्थियों को हमें कभी सम्मानित नहीं करना चाहिये l जो हमें जात- पात, धर्म और मजहब में बाँटकर, हममें फूट डालकर अपनी राजनीतिक महत्वकाँक्षाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं l"

बलवा (लघुकथा)

रोज की तरह आज भी किशून ऑटो लेकर स्टैंड़ पर पहुँचा था l दोपहर होने को हो आई थी l लेकिन, अब तक बोहनी नहीं हुई थी l

रह- रहकर उसके दिमाग में आरती की कही बातें याद आ रही थीं l दोपहर से पहले किसी तरह आलू, प्याज, और कुछ हरी सब्जियाँ लेते आना l घर में सब्जी एक छँटाक नहीं है l गैस भी खत्म होने वाला है l एक- आध दिन चल जायेगा l उसके बाद लाना ही होगा l सोनू अब चार साल का हो गया l खाने-पीने में वैसे ही नखराहा है l

गिन -चुनकर ही चीजें खाता है l सोनू को और कुछ नहीं तो कम-से-कम पाव भर दूध तो देना ही होगा l ग्वाला, दूध के पैसे के लिये तगादा करके गया है l महीना पूरा होने वाला है l

लगता है आज भी बोहनी नहीं होगी l पिछले चार दिनों में पिछली जमा पूँजी किशून खा गया था l

आखिर, इधर कुछ दिनों से शहर के हालात कुछ ठीक नहीं हैं l किसी ने पैगंबर साहब के बारे में कुछ कह दिया है l राजधानी में बलवा मचा हुआ है l कई पुलिस वाले के सिर फूट गये हैं l एहतियातन श्रीरामपुर में भी पुलिस ने तीन-चार दिनों से निषेधाज्ञा लगा दी है l चार-पाँच आदमी एक साथ एक जगह जमा नहीं हो सकते l खैर, प्रशासन ने ठीक ही तो किया है l नहीं तो कहाँ- कहाँ और किस किस के सिर फूटेंगें कोई नहीं जानता l पुलिस वाले भी बेचारे अफसरान का हुक्म बजातें हैं l

अभी वो, अपने में खोया हुआ ये बातें सोच ही रहा था l कि सामने से, जैनुल अपनी ऑटो किशुन के बगल में लाकर खड़ा करते हुए बोला-"और, किशून भैया, आज भी सवारी मिली या नहीं l कि खाली सड़क नापते ही आज का दिन भी निकलने वाला है l"

"तुमने मेरी मुँह की बात छीन ली l यही सवाल मैं तुमसे पूछने वाला था कि तुमको भी कहीं आज सवारी मिली या नहीं ?" किशून ने हाथ पर सुर्ती मलते हुए जैनुल से पूछा l

"अरे, नहीं भईया जबसे राजधानी में बलबा मचा है l कोई घर से बाहर निकल कहाँ रहा है ? परसों एक ठो भाड़ा मिला था l उसके बाद से सूखा पड़ा है, भैया l लाओ थोड़ी खैनी मुझे भी दे दो l" जैनुल ऑटो साइड़ में लगाते हुए बोला l

"सुना है, राजधानी में तुम्हारे ससुर मकबूल साहब पर दँगाईयों ने रोड़े बाजी की है l और तुम्हारे ससुर का सिर फूट गया है l अब कैसी हालत है उनकी ? कमबख्त दँगाईयों का कुछ दीन-ईमान तो होता नहीं l दोनों तरफ ऐसे सौ-पचास फसादी लोग ऐसे भरे पड़े हैं l जो आग में घी डालने का काम करते हैं l हुँह बेड़ा गर्क हो इन फसादियों का l" किशून ने बुरा सा मुँह बनाया और सुर्ती, जैनुल की तरफ बढ़ा दिया l "अरे, कल की पैसेंजर ट्रेन से ससुर जी को ही तो देखने गया था l दँगाईयों ने सिर तो फोड़ा ही l किसी ने थाने में आग भी लगा दी l ससुर जी मरते-मरते बचे हैं l यास्मीन को वहीं ससुर जी की सेवा में लगा रखा है l वो, मेरे साथ आने को तैयार नहीं हुई l आखिर, उसको किस मुँह से अपने साथ लाता l बाप बिस्तर पर पड़ा है l और, मैं उससे कैसे कहता कि मेरे साथ वापस लौट चलो ? मेरी सास तो ये खबर सुनकर बेहोश हो गई थी l वो भी अस्पताल में हैं l आखिर, ससुर जी भी क्या करें ? साहब का हुक्म तो बजाना ही पड़ता है l आखिर इस पापी पेट का सवाल जो है l हर आदमी दँगें में भी पेट के लिये ही बाहर निकलता है l हुक्मरान बँद ए. सी. कमरों में रिआया को आपस में कैसे लड़वाया जाये इसका रोड़-मैप बनाते हैं l और बलि का बकरा बनता है, आम-आदमी l आखिर, क्या मिलता है ? लोगों को धर्म के नाम पर लड़कर आज तक मैं ये समझ नहीं पाया l आम मेहनत कश आदमी, हमारी तुम्हारी तरह बाल-बच्चों की जरूरतों के लिये सड़कों पर मारा-मारा फिरता है l सियासतदाँ अपनी-अपनी रोटी सेंकने में लगे रहते हैंl लोगों को आपस में भड़काते हैं l और लड़वाते है l नयी उम्र के, अनाड़ी किस्म के लोग उनके चक्कर में पड़ जाते हैं l और शहर जल उठता है l"

"भैया, इसी को तो राजनीति कहते हैं l" किशून ऑटो के लुकिंग ग्लास को पोंछते हुए बोला l

तभी जैनुल ने लोगों की एक भीड़ को तलवार और बँदूकों के साथ अपनी ओर आते हुए देखा l उनके हाथों में कुछ धार्मिक झँड़े भी थें l और वो नारे लगाते हुए आ रहे थें l

जैनुल ने ऑटो को जल्दी से स्टार्ट किया l और किशून की ओर चिल्लाकर बोला-"भाग भाई किशून, भाग l दँगाई आ रहें हैं l"

किशून ने भी ऑटो जैनुल की आवाज सुनकर उसी दिशा में भगा लिया l जिधर जैनुल भगा रहा था l काफी देर तक वे ऑटो को सड़क पर भगाते रहे l अब वो, दँगाईयों से दूर निकल आये थें l गली की मोड़ पर जहाँ गली खत्म होती थी l वहाँ किशून ने गाड़ी रोकी और जैनुल का शुक्रिया अदा किया -"भाई अगर तूने आज अवाज ना लगाई होती तो, आज मैं गया था काम से l"

जैनुल हँसते हुए बोला -"भाई, किशून अगर इंसान- इंसान के काम नहीं आये तो फिर लोगों का इंसानियत पर से भरोसा उठ जायेगा l और देख किशून, मेरी बात ध्यान से सुन जब तक माहौल शाँत ना हो जाये ऑटो घर से बाहर मत निकालियो l अच्छा भाई चलता हूँ l अपना ख्याल रखना l जै राम जी की l"

किशून ने भी जैनुल को उसी आवाज में हिदायत दी, और जैनुल से बोला-"जैनुल भाई मामला शाँत होने तक, तुम भी, ऑटो घर से बाहर मत निकालना l जिंदा रहे तो फिर मिंलेंगें l अच्छा भाई खुदा हाफिज l"

दोनों ऑटो आगे जाकर सड़क पर कहीं गुम हो गये l

प्रेम (लघुकथा)

"आदित्य, प्रेम किसे कहते हैं ?" रोहन ने सिगरेट के धुँए का आखिरी कश फेंफड़ों में जब्त करते हुए पूछा l

थोड़ी देर बाद अपने नथूनों से घुँआ छोड़ते हुए आदित्य बोला-"प्रेम वो है जिसमें एक दूसरे का साथ छोड़ना मुश्किल हो जाये l जब केवल देने का मन करे l जब संबंधो में स्वार्थ लेशमात्र भी ना रहे l जब अपने पर कोई वश ने चले l"

"जैसे ...? उदाहरण देकर बताओ l" रोहन ने आदित्य से पूछाl

सामने से आदित्य ने अपने कुत्ते को पुचकारा और कुत्ता आदित्य के पीछे -पीछे चल पड़ा l

बुरा वक्त (लघुकथा)

अभी पैरों के प्लासटर कटे दो दिन ही हुए थें l रवि घूप में बैठकर अखबार के पन्ने पलट रहा था l इधर सड़क दुर्घटना में दोनों पैर टूट गये थें l अभी-अभी दो दिनों पहले ही प्लास्टर कटा था l

तभी जया की आवाज रवि के कानों में गूँजी-"रवि, तुम कमलेश भैया के कामों में हाथ क्यों नहीं बँटाते ? जया कपड़ों को तह करके अलमारी में रखते हुए बोली l वीणा हमारी पड़ौसी है l योगेश आजकल ससुराल में ही रह रहा है l वीणा कह रही थी l जब से माँ- बाबूजी से योगेश लड़कर आया है l ससुराल वाले लोग उसे भाव ही नहीं देते l मैं नहीं चाहती कि यहाँ भी लोग तुम्हारे साथ ऐसा ही व्यवहार करें l अब तो तुम्हारे पैरों का प्लास्टर भी कट गया है l और तुम्हें यहाँ रहते दो महीने से ज्यादा हो गये हैं l कल को कोई योगेश की तरह ही तुम्हारे बारे में ऐसी-वैसी बात कह दे, तो मुझे तो बहुत ही बुरा लगेगा l "

रवि को ये बात काँच के किरचें की तरह चुभी l उसे आश्चर्य हो रहा था l कि उसकी पत्नी जो उसकी सबसे करीबी थी l आज उसे भी लग रहा है कि उसका पति ससुराल में बोझ बन गया है ! और बैठकर खा रहा है l वो, रवि जो दिनरात हाड़तोड़ काम करके हमेशा अपने परिवार और बाल- बच्चों के लिये जीने वाला आदमी था l ये औरत और इसके घरवाले कितने एहसान-फरामोश हैं l ये रवि को साफ-साफ दिख रहा था l

रवि की आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गईं l कछ देर रवि, जया को अपलक घूरता रह गया। l सहसा उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था l कि इस तरह से स्थितियाँ बदल जायेंगीं l अभी दो साल पहले तक जब चारों तरफ कोरोना अपनी प्रचँड़ वेग से आदिम सभ्यता को मिटाने के लिये आतुर दिख रहा था l ऐसे गाढ़े समय में उसने अपने ससुर और साले की मदद की थी l रवि ने दो-लाख रूपये कमलेश को जया के एक बार कहने पर दे दिया था l और कभी लौटाने की बात नहीं की थी l कोरोना में होटल लाइन पूरी तरह से चौपट हो गया था l कमलेश और उसका परिवार रोड़ पर आने को हो आया था l ऐसे गाढ़े वक्त में उसने उनकी मदद की थी l

"ठीक कहती हो तुम जया l आदमी कितने दिनों तक दूसरों पर बोझबना रह सकता है l मेरी परिस्थिति जब तक ठीक थी l तुम्हारे सारे खर्चे, और बच्चों के खर्चे मैं उठाता रहा l आज एक छोटे से एक्सीडेंट ने मुझे मेरी औकात दिखा दी l कि आदमी कितना स्वार्थी हो सकता है l लेकिन मैं एक बात तुमसे कहना चाहता हूँ l कि कमलेश को कह देना कि लॉकडाऊन के समय जो पैसे मैनें लोन पर लेकर तुम लोगों की दिया था l उसका मैं इन दो सालों में बहुत ब्याज भर चुका हूँ l उनको कहना की जो दो लाख रूपये उन्होनें मुझसे लिये थें l उनको बैंक को लौटाना भी होगा l एक एक्सीडेंट ने लोगों के चेहरे से शराफत के सारे नकाब उतारकर फेंक दिया है l कौन कहता है कि दुर्घटनायें बुरी चीज होती हैं l इस दुर्घटना ने मेरी आँखें खोल दीं हैं l"

"मेरे कहने का वो मतलब नहीं था l" जया ने सफाई देनी चाही l

"मैं खूब समझता हूँ l तुम्हारा मतलब l मेरा जब चिकेन खाने का मन करता था l तो तुम लोग बैंगन बनाते थें l दाल में कभी पानी ज्यादा होती थी l तो कभी नमक ज्यादा l कभी दाल में नमक ही नहीं होती थी l

रोटियाँ मोटी- मोटी जली हुई और सूखी होती थीं l चावल मार्केट से सबसे घटिया क्वालिटी का खरीदकर तुम लोग मेरे लिये लाते थे l तुम्हें क्या लगता है l मैनें इन चीजों को नोटिस नहीं किया था l मेरी नजर इन दो महीनों में तुम लोगों की सारी गतिविधियों पर बनी हुई थी l"

शाम धीरे- धीरे आँगन में उतर आई थी l रवि धीरे से कुर्सी पर से उठा l और अपने जेब से ए . टी. एम. कार्ड़ निकालकर जया की ओर बढ़ाते हुए कहा -"मेरे इस ए. टी. एम . कार्ड़ से हर महीने बीस हजार रूपये निकाल लेना l इससे तुम्हारा और तुम्हारे बच्चों का खर्चा चल जायेगा l पैसे घटेंगें तो मुझे बताना l हर महीने बढ़ाकर डाल दूँगा l"

"मैं अपने भी कपड़े पैक कर लूँ l मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूँ l" जया ने मौके की नजाकत को समझते हुए कहा l

"नहीं अब मुझे तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है l तुम्हारा स्वार्थी चेहरा मैनें देख लिया है l रहने दो l"

प्लास्टर कटे अभी दो दिन ही हुए थें l रवि के पैरों में तकलीफ अभी भी बनी हुई थी l उसने चलने की कोशिश की तो उसका संतुलन बिगड़ गया l और वो गिरने को हुआ l जया आगे बढ़कर रवि को सँभालने के लिये आई l तभी रवि बैसाखियों की मदद से धीरे-धीरे उठ खड़ा हुआ l ओर हाथ के इशारे से जया को रोकते हुए बोला -"अभी-अभी गिरकर सँभला हूँ l और अब जमाने में लोग गिरे हुए लोगों को उठाने का हुनर भूलने लगे हैं l हमारे बीच के लोगों से ये हुनर जाने लगा है l अब और गिरने की ताकत नहीं है मुझमें l तुम बहुत दूर तक मेरा साथ नहीं दे सकती l ये दुनिया ऐसी ही है l सबल लोगों का साथ देती है l लाचार लोगों को कोई नहीं पूछता l हमारे रिश्तों में भी यही बात लागू होती है l आज सारे रिश्ते मतलब के हो गये हैं l"

उसने बैसाखी सँभाली l और धीरे-धीरे लँगड़ाते हुए अँधेरे में गली के अँदर गायब हो गया l

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