लघु-कहानियाँ (21-) : जयचन्द प्रजापति 'जय'
Hindi Laghu-Kahaniyan (21-) : Jaychand Prajapati Jay
निष्ठुर डाक्टर (लघुकथा)
रनिया के इकलौते लड़के की तबियत बहुत खराब है। बचने की कोई उम्मीद नहीं। बचने की उम्मीद किया जाये तो घर में एक पाई नहीं है। बेहद गंभीर हालत में लड़का।
रनिया का आदमी लोगों के यहाँ-वहाँ दौड़-दौड़ कर गया। किसी ने नहीं दिया एक पैसा। मेरा बच्चा मर जायेगा। हम अनाथ हो जायेंगे। इकलौता है। मेरे हृदय का लाल। बाबू बड़ी कृपा होगी। नहीं दूंगा पैसा तो मेरा जमीन जायदाद सब हड़प लेना। भिक्षा माँग कर खा लेंगे।
टस से मस नहीं हुआ वह बाबू। करजा भर नहीं पायेगा। मर जाने दे। तेरी बीबी तो जवान है फिर पैदा कर लेगी। कर्ज से दबा आदमी उभरता नहीं है । जा बाबा घर जा। किस्मत पर सारा खेल छोड़ दे। वहाँ के मिले ताने से और कहीं नहीं गया। सीधे बेटे के पास पहुंचा। बेटे की हालत देखकर वह ले भागा हास्पिटल।
पचास हजार जमा करने पर ही बच्चे की भर्ती होगी। रनिया गिड़गिड़ाई ,डाक्टर साहब हमारे लाला को एक बार देख लीजिए, जीवनभर गुलामी करूँगी। रनिया का आदमी पैर पकड़ कर डाक्टर साहब से विनती की। जल्द ही दे दूंगा। बच्चे को एक निगाह से देख लीजिए। बच्चा बच जायेगा। इकलौता लाल। हाथ से निकल जायेगा।
पैसा आज इंसानियत को चाट रही थी। चिल्लाता रहा। डाक्टर का हृदय निष्ठुर हो गया था। करूणा का सागर सूख गया था। डाक्टर का बिल्कुल मन नहीं पिघला। डाक्टर भगवान का रुप होता है। पैसा ने ज्ञान कला का कत्ल कर दिया। थोड़ा सा देख लेते तो क्या घाटे का सौदा हो जाता। यहाँ पैसा जीत गया। मानवता का गला रेत दिया गया।
आखिर बच्चा नहीं बचा। दहाड़े मार कर माँ गिर पड़ी। डाक्टर वहाँ से सरक लिया। बाप बेसुध। आंखे फाड़ कर बच्चे को देखता रह गया। मार डाला कमीनों ने। मेरे लल्ला को हमसे छीन लिया। माँ बच्चे को बार बार "आंखे खोल बेटा' कह कर बार-बार बेसुध होती रही।
ह्रदयविदारक दृश्य। रूदन वेदना का क्षण। सब खामोश हो गया। खामोश हो गया आसमान। निर्दयी हो गया क्षण। सब तार- तार हो गया। इस पैसे की मंडी में पैसे की खातिर निष्ठुर हो गया डाक्टर। निष्ठुर डाक्टर की निष्ठुरता के कारण एक मासूम काल के गाल में समा गया। माँ - बाप को मिला जीवन भर के लिए जख्म।
इंसानियत (लघुकथा)
प्रेम का भाव लिए प्रेमी-प्रेमिका अपने मन की बाते कर रहे थे। वे दोनों चाहते थे कि उनका प्रेम अमर हो जिसमें दया, इंसानियत तथा सच्चे भाव हमेशा जिंदा रहे।
प्रेम की बातें दोनों में चल रही थी। प्रेमी अपने प्रेम की सच्चाई को बयां करते हुये कहा कि तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह बना रहेगा। मै तुम्हारे प्रति सदैव एक इंसान की तरह रहूंगा। तुम्हारी प्रत्येक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर सारा काम करूँगा।
दोनों की चल रही बातों के बीच में टोंकते हुए एक बुजुर्ग महिला ने कुछ मदद के लिए पैसे मांगा। बीच में बुजुर्ग महिला के आगमन से प्रेमी आपे से बाहर हो गया। आंखों में गुस्सा लिए बोला--"पैसा पेड़ में थोड़ी फलते हैं जो तुमको दे दूं। चलो हटो "
बुजुर्ग महिला कड़वी बातें सुनकर आगे बढ़ने लगी। प्रेमिका आगे बढ़कर बुजुर्ग महिला को कुछ पैसे देकर मदद की और प्रेमी के किये व्यवहार के लिए क्षमा भी मांगी।
प्रेमिका गुस्से में अपनी प्रेमी पर भड़क गयी। उसने कहा- तुम्हारे अंदर इंसानियत नहीं है। एक बुजुर्ग महिला के प्रति तुम्हारा व्यवहार कटु है। इंसान होने की भावना नही है और हाँ, मेरा प्रेम वहां सदैव के लिए खत्म हो जाता है जहाँ पर इंसानियत न के बराबर हो और मैं अपना प्रेम सदा के लिए तुमसे खत्म करती हूँ"।
इतना कहकर प्रेमिका वहां से चल दी। प्रेमी हतप्रभ होकर बुलाता रहा लेकिन उसके हाथों से आज उसका प्रेम काफी दूर चला गया। प्रेमी को एहसास हुआ कि इंसान के अंदर इंसानियत होना चाहिए नहीं तो उसका प्रिय वस्तु ईश्वर द्वारा छीन लिया जायेगा।
प्रायश्चित (लघुकथा)
मालिक सेवाराम की तबियत बहुत खराब है। सांस चल रही है। आईसीयू में भर्ती हैं। एक बड़ी कंपनी के मालिक जिसकी मौत से हजारों लोगों की नौकरी जा सकती है। कंपनी को कोई संभालने वाला नहीं है।
मालिक अनुशासन को मानने वाला, कड़क मिजाज के कारण सारे कर्मचारी नाखुश थे। करनी का फल है। मालिक हम लोगो से कायदे से बात नहीं करता था। सारे कर्मचारी उस मालिक के बीमार होने से खुशी मना रहे थे। सबने लडडू बांटे और पटाखे छुड़ाया।
एक बुजुर्ग कर्मचारी ने नाराजगी व्यक्त की। इस तरह से मिठाई, पटाखे सुनकर बेचारे का हृदय बैठा जाने लगा। कितना अनर्थ हो रहा है। सबको बुलाकर बुजुर्ग ने समझाया--भले हमारे साथ वे कड़क रहे। उनका व्यवहार भले कठोर रहा पर वह हमारा मालिक है। रोजी-रोटी है।
बुजुर्ग की बातें सुनकर एक भयंकर सन्नाटा छा गया। खामोश सबके सब। बुजुर्ग ने अपना अनुभव बताया। जिस मालिक की बुराई कर रहे हो। वह मालिक जिस दिन चला जायेगा। हमारी कंपनी बंद हो जायेगी। हमारे बच्चों की फीस नहीं जमा हो पायेगी। घर में रोटियां नहीं बन पायेगी। तुम्हारे पर्स में पैसे कहां से आयेंगे। एक भयंकर तबाही आ जायेगी।
हम सबको मिलकर ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारा मालिक सहीं होकर आ जाये। ठप पड़ी कंपनी पुनः चालू हो जाये। हमारी रोजी-रोटी बरकरार रहे। सबकी जैसे आंखें खुल गयी। सबको ऐसे महसूस हुआ जैसे अपने पैर पर कुल्हाड़ी से वार खुद कर रहे हैं। सबने अपने गलती को प्रायश्चित किया।