लघु-कहानियाँ (11-) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

Hindi Laghu-Kahaniyan (11-) : Jaychand Prajapati Jay

अपनी मिट्टी से प्यार (लघुकथा)

राजा और सोहन बचपन के दोस्त थे। दोनों एक ही स्कूल में साथ पढ़ते थे। मेहनत से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। राजा को विदेश की चमक-दमक भाती थी। वह सोचता, "वहाँ जाकर अमीर बनूँगा, बड़ा नाम कमाऊँगा।" सोहन का दिल अपने वतन से बँधा था। वह कहता, "माँ-बाप का साथ छोड़कर सुख कहाँ? यहीं रहकर सेवा करूँगा।"

पढ़ाई पूरी होते ही दोनों नौकरी ढूँढने लगे। राजा को अमेरिका में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी मिल गई। वह खुशी-खुशी माँ-बाप को अलविदा कहकर चला गया। "पैसे भेजूँगा, सब ठीक हो जाएगा," उसने वादा किया।

सोहन ने अपने शहर में ही सरकारी नौकरी जॉइन की। वह रोज़ माँ-बाप की सेवा करता, उनके साथ हँसता-खेलता।समय बीता। राजा ने विदेश में महल जैसा घर बनाया, महँगी गाड़ियाँ खरीदीं, लेकिन माँ-बाप की तबीयत खराब होने पर लौट नहीं सका। वीज़ा की जटिलताएँ, काम का बोझ—बहाने बनते रहे।

आखिरकार, माँ-बाप तड़पते हुए चल बसे। सोहन ने उनका अंतिम संस्कार किया, आँसुओं से उनका सहारा बना।राजा को खबर मिली तो वह टूट गया। विदेश की चमक फीकी पड़ गई। पछतावे में डूबा वह लौटा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। सोहन ने उसे गले लगाया, "देश का प्यार ही सबसे बड़ा धन है।

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