लघु-कहानियाँ (11-20) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

Hindi Laghu-Kahaniyan (11-20) : Jaychand Prajapati Jay

अपनी मिट्टी से प्यार (लघुकथा)

राजा और सोहन बचपन के दोस्त थे। दोनों एक ही स्कूल में साथ पढ़ते थे। मेहनत से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। राजा को विदेश की चमक-दमक भाती थी। वह सोचता, "वहाँ जाकर अमीर बनूँगा, बड़ा नाम कमाऊँगा।" सोहन का दिल अपने वतन से बँधा था। वह कहता, "माँ-बाप का साथ छोड़कर सुख कहाँ? यहीं रहकर सेवा करूँगा।"

पढ़ाई पूरी होते ही दोनों नौकरी ढूँढने लगे। राजा को अमेरिका में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी मिल गई। वह खुशी-खुशी माँ-बाप को अलविदा कहकर चला गया। "पैसे भेजूँगा, सब ठीक हो जाएगा," उसने वादा किया।

सोहन ने अपने शहर में ही सरकारी नौकरी जॉइन की। वह रोज़ माँ-बाप की सेवा करता, उनके साथ हँसता-खेलता।समय बीता। राजा ने विदेश में महल जैसा घर बनाया, महँगी गाड़ियाँ खरीदीं, लेकिन माँ-बाप की तबीयत खराब होने पर लौट नहीं सका। वीज़ा की जटिलताएँ, काम का बोझ—बहाने बनते रहे।

आखिरकार, माँ-बाप तड़पते हुए चल बसे। सोहन ने उनका अंतिम संस्कार किया, आँसुओं से उनका सहारा बना।राजा को खबर मिली तो वह टूट गया। विदेश की चमक फीकी पड़ गई। पछतावे में डूबा वह लौटा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। सोहन ने उसे गले लगाया, "देश का प्यार ही सबसे बड़ा धन है।

दलाली चलती रहेगी (लघुकथा)

जिले में एक ईमानदार अफसर की नियुक्ति हो गयी। बिना घूस लिये काम करता। दलाली एक रूपये की नहीं। बड़ा नाम हो रहा था। इनकी गिरहबान में ईमानदारी है। कोई झकझोर नहीं सकता। ईमानदारी की रोटी खाने में भरोसा था। किसी की गाढ़ी कमाई को छीन कर बीबी बच्चों का पेट भरना उनके जीवन के शब्दकोश में नहीं था।

जिले में खुशी की लहर थी। कलावती सबसे खुश थी। बुढ़ापे का पेंशन लग जायेगा। दो रोटी मिल जायेगा। भगवान ऐसे बाबू का भला करे। उसकी रोजी रोटी में और तरक्की हो। लाठी टेकते पहुँच गयी अफसर के आफिस में। बड़ी भीड़ थी। इतनी भीड़ थी कि तीन दिन से मिलने को आ रही है। भीड़ में दो फीट आगे बढ़ने के बदले चार फीट पीछे हो जाती।

बुढ़ी कलावती को देखकर एक दलाल को दया आ गयी। इस भीड़ में शुरू कर दी दलाली। अम्मा अधिकारी तक आपका पैसा नहीं पहुंच पाया इसलिए आप नहीं पहुंच पा रही है। साहब चुपके से लेते हैं। उनके जेब में डाल देने से सब काम हो जाता है।

दलाल ने कुछ पैसे ऐंठकर कलावती का काम करा देता है। पेंशन लग गयी। भले कुछ लगा। पेंशन तो मिलने लगी। एक दिन अफसर कलावती के घर अपनी ईमानदारी का टोह लेने पहुंच गये। पेंशन के बारे में पूछा कि आपका एक पैसा नहीं लगा। पेंशन मिलने लगी।

पूरे एक हजार दिया हूँ। तब पेंशन मिलनी शुरू हुई। अफसर महोदय समझ गये किसी ने मेरे नाम का इस्तेमाल करके पैसा ऐंठकर ले लिया। ईमानदार अफसर ने कलावती का लगा समस्त खर्च वापस कर दिया और भविष्यवाणी की। इस दुनिया से दलाल नहीं खत्म हो सकते। दलाली चलती रहेगी। चाहे जितने ईमानदार अफसर ईमानदारी का चोंगा क्यों न पहन ले।

महिला का ह्रदय परिवर्तन (लघुकथा)

एक भारी भरकम अधेड़ उम्र की महिला मिठाई खरीदने एक दुकान पर कार से गयी। अपनी कार बीच सड़क पर लगाकर जाने लगी। उसकी इस ढिठाई से गार्ड ने उस महिला से कहा कि आंटी कार अपनी थोड़ी आगे किनारे खड़ी कर दीजिए। इस तरह से कार खड़ी करने से आवागमन में बाधा आयेगी।

वह महिला गार्ड को डांटते हुए कहा कि तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मुझे कानून बताओगे। हमारी उमर का कोई ख्याल ही नहीं। गार्ड ने अपनी बात बढ़ाते हुए कहा कि अगर कार थोड़ी दूर करके पैदल चलेंगी तो आपका सेहत सहीं रहेगा। थोड़ा पैदल चल लिया करिये।

वह महिला फिर भड़क गयी। तूम मुझे सलाह दोगे कि हम अपनी सेहत का कैसे ख्याल रखे। गुस्से में गार्ड की तरफ लपकी। गार्ड मामले को समझ गया और वह वहां से हट गया। इस तरह से वह महिला मिठाई खरीद कर घर पहुंची और गार्ड के व्यवहार से गुस्से में थी।

उस महिला की बेटी ने मां को गुस्से में देखकर पूछ लिया। उसने बताया कि एक गार्ड ने उससे बदतमीजी किया और मुझे सलाह दे रहा था कि आप सड़क पर गाड़ी न खड़ी करें और थोड़ी दूर खड़ी करें और थोड़ा पैदल भी चल लिया करिये। सेहत के लिए ठीक रहेगा। वह बदतमीज मुझे सलाह दे रहा था। नालायक कहीं का।

अरे मम्मा, आप भी फालतू में बात कर रही हैं। वो गार्ड अंकल ठीक ही तो कह रहे थे। गाड़ी सड़क पर न लगाइये। सच में मम्मी थोड़ा इसी बहाने पैदल चलेगी तो ठीक ही रहेगा। सेहत ठीक रखने के लिए क्या से क्या नहीं करते लोग।

महिला को भी अपनी गलती का एहसास हुआ कि वास्तव में गार्ड सहीं कह रहा था। अगले दिन गाड़ी सड़क के किनारे थोड़ी दूर खड़ी किया और पैदल दुकान गयीं। एक किलो मिठाई गार्ड के लिए खरीदकर दिया और कहा बेटा तुम सहीं कह रहे थे। पैदल चलना जरूरी है स्वास्थ्य के लिए। लोग अक्सर पैदल चलना ही नहीं चाहते। बिल्कुल आलसी हो गये हैं जिससे लोग मोटापा का शिकार होते जा रहे हैं।

मां का कर्ज (लघुकथा)

रोहन के पिता की मौत के बाद सारी जिम्मेदारी मां के उपर आ गयी। गिरे हालात बन गये। कमाने वाला चला गया। घर गृहस्थी पूरी तरह से टूट गयी। किसी तरह से मां मजदूरी करके जीवन यापन किया। रोहन को पढ़ाया लिखाया। रोहन कभी-कभी जिद करता पैसे मांगने की। । मां के पास पैसा न होने के कारण नहीं देती।

ज्यादा जिद करने पर ममता टूट जाती। भावनायें बिखरने नहीं देना चाहती। बाप की कमी का एहसास न होने पाये कि बाप होता तो पैसे मिल जाते। किसी से उधार लाती और दे देती। रोहन का लड़कपना था। उसे मां के दयनीय हालातों से क्या लेना देना?

मां सदैव रोहन का ख्याल रखती। अपने बेटे के लिए बाप की कमी नहीं खलने दी। समय गुजरने लगा। रोहन की भी शादी हो गयी। घर गृहस्थी का बोझ सिर पर आ गया। अब उसकी मां बुढ़ी हो गयी। कभी बेटे से कुछ खरीदने के लिए मां पैसे मांगती तो रोहन मना कर देता। पैसे कहाँ है मां। तुम रोज जिद करती हो। कहाँ से लाऊँ?

एक रात रोहन ने सपना देखा कि उसके बचपन में मां कितना कष्ट उठाकर पढ़ाया लिखाया। तुम्हारी हर जरूरत को पूरा करने के लिए उधार भी ले लेती। तुम्हारी हर आवश्यकता की पूर्ति के लिए मां रात-दिन मेहनत करके तुम्हारी हर जरूरत पूरा की। भूखे रहकर तुम्हे भूखा नहीं रखा।

आज उस मां की छोटी-छोटी आवश्यकतायें की अनदेखी कर रहा है। मां दुनिया की तुम्हारे लिए सबसे बड़ी ताकत है। मां जीवन में एक बार मिलती है। उस मां का ह्रदय मत दुखाओ। रोहन की आंखें खुली तो देखा उसकी माँ कुछ गहने रखी थी। अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किसी सुनार से बेंच रही थी।

रोहन ने अपनी माँ के चेहरे को देखा। मैं इतना भी नहीं कर सकता कि मेरी माँ खुश रहे। आज अपनी आश्यकता की पूर्ति के लिए गहने बेंच रही है। धिक्कार है मेरी जिंदगी की। झट से मां के करीब गया और कहा कि मां आज से तू मेरी बैंक है मां। मैं सारे पैसे इसी बैंक में रखूंगा। मां से कह दिया कि जिस चीज़ की आवश्यकता हो वह बिना पूछे खरीद सकती है। रोहन को समझ आ गया कि मां का कर्ज उतारना असंभव है। अब वह अपनी बुढ़ी मां का ख्याल रखने लगा।

सहायता करने से मिलती है खुशी (लघुकथा)

सूरज लोगों की अक्सर सहायता करते मिल जाता और जरूरत के अनुसार लोगों की सहायता करता। लोगों की मदद करते सुकून महसूस करता है। वह एक ह्रदयवान व्यक्ति है और आम जनमानस में लोकप्रिय भी है।

एक दिन एक दुकान पर खड़ा था। एक छात्र की साइकिल की चेन उतर गयी और चेन कवर में फंस गयी थी। रात के ग्यारह बजे रहे थे। सारी दुकाने बंद हो गयी। चेन इस तरह से अटक गयी थी कि वह छात्र बेचारा बहुत दुखी हो रहा था। उसको लगभग दस किलोमीटर जाना था।

काफी निराश था। उसे कुछ समझ में आ नहीं रहा था। सूरज ने उस छात्र को देखकर छात्र के करीब गया और जानकारी ली। वास्तव में चेन जिस ढंग से फंस गयी थी। निकलना बहुत मुश्किल था।

सूरज बड़े गौर से साइकिल देखा। दुकाने सब बंद हो गयी थी। उसने साइकिल सीट के बल खड़ी कर दिया अर्थात उल्टी खड़ी कर दिया। फंसी चेन को खींचने का प्रयास करने लगा कि चेन निकल जाये। बहुत मेहनत के बाद किसी तरह से फंसी चेन निकाला और साइकिल की चेन ठीक किया।

हाथों में बहुत कालिख लग गयी थी। जैसे ही चेन ठीक हुई। एक हल्की मुस्कान चेहरे पर थिरकी। वह छात्र अत्यंत खुशी से झूम उठा। उसने कहा कि अंकल जी आज मुझे पैदल जाने से बचा लिया। अब मुझे पैदल कमरे तक नहीं जाना पड़ेगा। वह छात्र कुछ पैसा निकाल कर सूरज को देने लगा। और कहा कि आपकी कृपा से मेरी साइकिल ठीक हो गयी।

सूरज ने पैसा लेने से मना कर दिया। उसने कहा कि मेरा यह कर्तव्य था। ईश्वर आपकी मदद करना चाहता था इसलिए आपको मेरे पास भेज दिया। छात्र ने कहा कि अंकल मेरी तरफ से यही है कि आप ऐसे फंसे हुए लोगों की मदद करते रहिए और अपना नाम रौशन करें।

शराब की लत छूटी... (लघुकथा)

होली का मौसम था। शराब जम कर चल रहा था। लोगो ने खूब पिया। रात के दस बज रहे थे। पीने का काम चल रहा था। दो शराबी शराब पीने में मस्त थे। इतने में पन्द्रह साल का एक लड़का दिखाई दिया। शराबियों ने उसको बुलाया।

"एक बॉटल पानी ला देना" एक शराबी ने कहा।

उस बालक ने मार्केट से एक बॉटल पानी लाकर दिया।

"दुकान से नमकीन ला देना थोड़ा।" दूसरे शराबी ने कहा।

संस्कारित बालक ने दुकान से नमकीन लाकर दे दिया। दोनो ने जमकर पिया। फिर उस लड़के से शराब की बोतल लाने को कहा।

शराब की बोतल ला दी। लड़के ने बिना विरोध किए एक आज्ञाकारी लड़के की तरह उनकी हर बात सुनता रहा।

उसमें से एक शराबी ने कहा..लो, एक घूंट तुम भी ले लो।

"अंकल जी, आपकी हर बात अच्छी लगी। मैने आपका काम कर दिया। एक घूंट लेने वाली बात मुझे अच्छी नहीं लगी। आज मैं एक घूंट लूंगा कल एक शीशी लूंगा। आप लोग भी एक घूंट लेकर आज कई शीशी शराब ले रहे हैं। मैं शराबी नहीं बनना चाहता। पढ़ लिख कर नशा मुक्ति केंद्र खोलूंगा ताकि जो शराब पीते हैं उनको शराब से मुक्ति दिलाऊंगा।" उस बालक ने जवाब दिया।

"अरे बेटा, तुमने तो मेरी आंखे खोल दी। मेरा बच्चा सुबह कापी के पैसे मांग रहा था। मैने नहीं दिया। उस पैसे का शराब पी गया। मेरा बच्चा स्कूल आज नहीं गया।अब मैं अपने बच्चे को पढ़ाऊंगा। शराब नहीं पियूंगा। मेरा बच्चा पढ़ेगा।" एक शराबी ने कहा।

दोनो शराबियों को उस बालक की बात लग गई और दोनो ने वहीं शराब की बॉटल छोड़ कर चले गए अर्थात वही नशा से मुक्त हो लिए।

संत की सादगी ने लूट लिया (लघुकथा)

एक बार सांसारिक मोहमाया से मैं विरक्त हो गया। संत महात्मा बनने का निर्णय लिया। मुझे एक सच्चे संत की आवश्यकता हुई। झोले में सभी कीमती सामानों को रखकर सच्चे संत की खोज में निकल पड़ा।

मैं घर से निकल कर चल दिया। रास्ते में एक सज्जन संत दिखाई दिये। बहुत कोमल ह्रदय वाले लगे। मस्तक पर तिलक भी लगा लिये थे। भरोसा मेरा तीन गुना बढ़ गया। ऐसे संत तो बहुत कम मिलते हैं।

उनके पास पहुंच कर दंडवत प्रणाम किया। संत जी बहुत खुश हुए। ऐसा प्राणी मिला है। आज का मेरा रोजगार हो गया। संत जी मन ही मन सोंचे। हम सोंचे ऐसा संत मिलने का मतलब ईश्वरत्व की प्राप्ति संभव है। संत महोदय से संत बनने की बात बताई। संत ने पूर्ण सहमति प्रदान कर दी।

संत के साथ मैं चल दिया। एक भरोसेमंद संत पाकर मैं अपने को धन्य समझने लगा। बहुत बड़े संत का गुण नजर आया। खा-पीकर मोटे तगड़े नजर आ रहे थे। ललाट पर चमक थी। होंठो पर मासूमियत थी। हल्की मुस्कान से लबरेज थे। करूणा के सागर नजर आये। उनकी भक्ति की बातें सुनकर मैं पूरा आश्वस्त हो गया कि मैं और मेरा झोला सुरक्षित है।

एक गुफा मे ले गये। संत महोदय ने हमको फल काट कर दिये। खूब फल खाया। तबियत मेरी मस्त हो गयी। अब मेरा भरोसा पूर्ण हो गया कि ऐसे संत के सानिध्य में रहकर एक प्रतापी संत बन जाऊंगा। प्रकृति की ठंडी-ठंडी मंद-मंद हवा पुरवाई बह रही थी। थका हारा पंछी की तरह गहरी निद्रा को प्राप्त कर लिया।

गहरी नींद का आनन्द लेने लगा। मीठे- मीठे सपने आने लगे। कई घंटों तक सोता रहा। जब मेरी निद्रा भंग हुई तो देखा कि मेरा झोला गायब है। मेरा कीमती सामान सब गायब था। इधर- उधर देखा तो संत भी गायब थे। मैं सिर पर हाथ रखकर बैठ गया और समझ गया कि आजकल के संतों को ईश्वर क्यों नहीं मिलते। संत की सादगी ने लूट लिया।

तलाक़ के बीच बालिका (लघुकथा)

रहमान और रेहाना दोनों खुश थे। जैसा एक-दूसरे को चाहते थे। वैसे ही मिले थे। हंसमुख स्वभाव के थे। दोनों ने प्रेम विवाह किया था। एक-दूसरे की बात बहुत आसानी से समझ लेते थे। समझदारी कूट-कूटकर भरी थी। दोनों सामाजिक थे। पड़ोसियों से भी बहुत अच्छा व्यवहार था।

शादी हुए तीन साल हो गये। रेहाना ने एक खूबसूरत लड़की का जन्म दिया था। घर में एक प्यारी बच्ची के आने से दोनों खुश थे। पूरे मोहल्ले में मिठाइयाँ बांटी गयी थी। पूरे मोहल्ले के लोगों ने बेटी के जन्म पर बधाई एवं शुभकामनाएं दी थी। बेटी के आगमन से घर की खुशियों में चार चांद लग गये।

समय बीतता गया। घर-गृहस्थी के तामझाम में कुछ पति पत्नी में खटर-पटर होना स्वाभाविक है। हालात इस कदर बढ़ता गया कि तलाक़ की नौबत आ गयी। खटपट के बाद रेहाना अपने मायके आ गयी। संभ्रांत लोगों तथा रिश्तेदारों ने खूब समझाया लेकिन तलाक तो तलाक।

तलाक होने के दिन दोनों के परिजन तथा रिश्तेदार एक रेस्टोरेंट में उपस्थित हुए। इस तलाक में बच्ची किसके साथ रहेगी। कुछ ने निर्णय दिया कि एक अबोध बालिका को मां की सख्त जरूरत होती है। बच्ची को माँ को सौंप दिया जाये। कुछ ने सिध्दांत दिया कि बच्ची की पढ़ाई-लिखाई तथा शादी का खर्च रेहाना नहीं उठा पायेगी। अत: बच्ची को रहमान को दे दिया जाये।

फैसले में बच्ची रहमान के पास रहेगी। रेहाना अपनी गोद में बच्ची को लिये थी। रहमान जैसे आगे बढ़ा बच्ची को लेने। बच्ची माँ से चिपक कर रोने लगी। फफक-फफककर जब रोने लगी। उपस्थित दोनों पक्षों के लोगों से झर-झर आंसू गिरने लगे। रहमान बच्ची को पकड़ कर लेने की कोशिश करने लगा। बच्ची की रोने की आवाज और तेज हो गयी।

जैसे बच्ची बाप से नफरत कर रही थी। इस तलाक में ममता जीत गयी।

फैसले के अनुसार बच्ची को रेहाना बेमन से रहमान को सौंपते हुए कहा-- "मेरी बेटी का ख्याल रखना " इतना कहकर फफक-फफककर रेहाना भी रोने लगी। मजबूर माँ रोती रही। गमों के बीच दोनों एक-दूसरे से अलग हो गये। बच्ची अपने पिता की गोद में तड़फ-तड़पकर रो रही थी। मचल-मचलकर छुड़ाने का प्रयास करती रही पर एक तलाक की जिद ने अबोध बालिका को माँ की ममता से अलग कर दिया।

काकी (लघुकथा)

काकी आज भी तगडी हैं। आठ बच्चे हुये लेकिन अब भी कामकाज में तेजीपन। कोई आलस्य नहीं। कोई झिझक नहीं। काकी जिस ढंग से काम करती हैं कि आजकल की बहुयें तो हार मान जायेगी। कभी सुस्ती आई नहीं।

आठ बच्चे घर पर हुये। कभी किसी अस्पताल का चक्कर नहीं लगाई। सारे बच्चे नार्मल हो गये। सुबह खाना बनाया. दो घंटे बाद प्रसव दर्द हुआ। घर पर ही शिशु का जन्म दे दी।

पूरी हट्टी कट्टी हैं। खेती बाडी भी देखना। गाय भैंस भी पाल रखी हैं। घर द्वार साफ सुथरा रखना। पेड पौधों की भी देखभाल कर लेती हैं। काकी का मुकाबला न तो आजकल की लडकियां कर पा रही हैं न तो कोई बहू ही कर पा रही है। सबके अंदर आलस्य घुस आया है।

आज जमाना ऐसा हो गया है कि बहुयें खा पीकर पडी रहेंगी किसी काम में हाथ नहीं लगायेंगी। बिना अस्पताल का मुंह देखे किसी ने कोई बच्चे का जन्म नहीं दिया। नौ महीने तक दवाइंयां खाती हैं। तब भी बिना आपरेशन का बच्चा नही पैदा कर पाती हैं।

काकी तो सलाह देती रहती हैं कि घर का काम काज करते रहिये। आलसी मत बनिये। दिनभर मोबाइल देखने वालियों पर एतराज जताती हैं कि आजकल की लडकियों को कम उम्र में चश्में की आवश्यकता पड जाती है। सच में सत्तर साल की काकी आज भी बिना चश्मा लगाये अखबार पढ लेती हैं। आंखों की रोशनी जस की तस है।

काकी के एक भी दांत नहीं झडे लेकिन सूरज की पत्नी के तीन चार दांत टूट गये हैं। घुटनों मे दर्द बना है। पहला बच्चा आपरेशन से हुआ। हरी हरी सब्जियां खाती ही नहीं। विटामिन की कमी हमेशा बनी ही रहती है। आज भी काकी की सक्रियता देखकर आजकल की बहुयें तथा लडकियां शरमा जाती हैं। काकी का पूरे गांव में जलवा है।

रतनलाल का दर्द (लघुकथा)

रतनलाल कचेहरी में टाइपिस्ट हैं। किसी तरह से शादी रत्ना से किये थे कि रत्ना उसके साथ कंधा से कंधा मिलाकर सहयोग करेगी। बेहद गरीबी के दिन गुज़र जायेंगे लेकिन पत्नी अपने भाव में रहती है। पढ़ी लिखी ज्यादा नहीं थी लेकिन फैशन का एक-एक मर्म समझती है। रतनलाल जो कुछ कमा धमाकर लाते बेचारे सीधे सारा कमाई पत्नी के दाहिने हाथ पर रख देते थे।

स्नातक तक पढ़े लिखे थे रतनलाल। ज्यादातर पैसे रत्ना फैशन पर खर्च करने लगी। रतनलाल के न रहने पर कभी- कभी वीआईपी होटल में जाती। कभी-कभी सिनेमा देखने जाती। अपने पुराने दोस्तों के साथ घूमने फिरने चल देती। एक से बढ़कर एक लिपिस्टिक। एक से बढ़कर एक कंगन, चुड़ियाँ, एक से बढ़कर साड़ियां। बालों को सुंदर बनाने के लिए सेट कराकर रखती। बिल्कुल एक वीआईपी मेमसाहब फेल उसके फैशन के आगे।

रतनलाल शादी के बाद से हर काम पत्नी के डर के मारे करने लगे। सुबह से शाम तक कोई काम वह बेचारी नहीं करती। बेचारे रतनलाल सुबह उठकर चाय बनाते। बर्तन धुलते। खाना पकाते। जल्दी -जल्दी सारा काम निपटा कर प्रयागराज की कचेहरी जाते।

यहाँ तक कि रत्ना जिस थाली में खाना खाती। वह थाली रतनलाल को आकर धुलना पड़ता था। कई इन्ही सब चीजों को लेकर पत्नी से दबी आवाज़ में कहते थे। जिस दिन ज्यादा गरम होकर रतनलाल पत्नी से कुछ कहते तो पत्नी कई हफ्तों तक बोलती नहीं थी। इस तरह से बेचारे बार-बार कहते-कहते थक से गये थे। इस प्रकार अपना भाग्य समझकर कर उसका भी सारा काम कर देते थे।

बाहर में चर्चा है कि रतनलाल काफी भला आदमी है। कोई काम पत्नी को नहीं करने देता है। पत्नी को पूरी तरह से महारानी बना कर रखा है। फैशन में रहती है। सजी धजी रहती है। आराम की जिंदगी जी रही है। सब लोगों को ख्याल है कि रतनलाल कि जिन्दगी बहुत सुकून से है।

पति होने का सच्चा दर्द रतनलाल को है कि मेरी कमाई का सारा पैसा फैशन में उड़ा रही है और ऊपर से घर का सारा तामझाम। यह एक स्त्री विमर्श नहीं एक पुरुष विमर्श की बात है। स्त्री का दर्द आवाज करता है लेकिन पुरुष का दर्द सिर्फ चुपके चुपके सिसकियां ले रहा है।

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