लघु-कहानियाँ (1-10) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

Hindi Laghu-Kahaniyan (1-10) : Jaychand Prajapati Jay

एक छोटा सा गिफ्ट (लघु कहानी)

शिक्षक दिवस पर सब बच्चे अपने अध्यापक को महंगे-महंगे गिफ्ट दे रहे थे। सब बच्चे गिफ्ट लाये थे। पांचवी में पढ़ रही नेहा भी गिफ्ट लाईं थी। अपने सरजी को देना चाह रही थी पर दे नहीं रही थी। सर जी लेगें की नहीं। नेहा सिर्फ दो टाफी लाई थी।

सकुचा रही थी। चेहरा उदास था। मम्मी ने पैसा नही दिये। एक रुपये कहीं गिरा हुआ पायी थी। वह जानती थी कि घर में पैसा नहीं है। एक हफ्ते से वह पैसा लिये थी कि सरजी को गिफ्ट सब देगें। मैं भी दूंगी। सब महंगे-महंगे गिफ्ट दे रहे थे।

वह टाफी एक बार लेकर उठी फिर बैठ गयी। सब लोग हंसेगे। यह सोच कर बैठ गयी। फटे बैग में रख ली। उसके आंखों में आसूं थे। उस दिन घर पर खाना नहीं बना था। बेहद गरीब परिवार था। उसके पापा को काम नहीं मिल रहा था। भूख लगी थी। एक बार सोंचा टाफी खाकर भूख शान्त कर ले। नहीं-नहीं यह अपने सर जी को दूंगी। नहीं खाया।

वह कभी टाफी को देखती कभी सरजी को। बहुत जतन से एक रूपये संभाल कर रखा था। सरजी ने देखा। नेहा दुखी बैठी थी। टाफियां मुट्ठी में लिये छुपा रही थी। अरे नेहा, क्या लायी हो। वह छिपाने लगी टाफियां। सरजी ने उसके हाथ से टाफियां छीन ली। अरे कितनी अच्छी टाफियां है ं। तुम बहुत अच्छी लड़की हो। आज का सबसे बड़ा गिफ्ट नेहा का है। सरजी ने उसके चेहरे पर मुश्कान देखा। नेहा ने देखा सरजी बड़े प्यार से उसकी टाफियां खा रहे थे। नेहा बेहद खुश थी। आंखों में आंसू भी थे।

सबसे सस्ते गिफ्ट में छिपा था गुरु के प्रति सच्ची आस्था। एक भरोसा। एक स्नेह। एक करूणा। एक समर्पण। बहुत कुछ छिपा था उन टाफियों में। सरजी बड़े प्यार से टाफियां चूसते रहे। नेहा सरजी को टाफियां चूसते हुए देखती रही। सरजी भावविभोर होकर टाफियों में आनन्द ले रहे थे। नेहा भी इस दृश्य को देखकर भावुक हो रही थी।

सच्ची आजादी (लघु कहानी)

रीमा एक पड़ी लिखी जागरूक महिला है। वह हर वह काम करना चाहती है जो पुरुष करता है। वह भी पुरुषों की तरह पार्टी या मौजमस्ती करना चाहती है।

राजन उसका पति अपने ओल्ड प्रेमिका के साथ घूमता रहता है । कहीं होटल में जाता है तो कहीं किसी डांस पार्टी में जाता है और मौजमस्ती करता है।

एक दिन शराब पी कर लड़खड़ाते हुए घर के अंदर आया। होश में नही था। रीमा संभालते हुए राजन से गुस्से में कहा..

’तुम आज फिर ज्यादा पी। कसम खाई थी की ज्यादा नही पियेंगे’

’बस थोड़ा सा ही पी थी। मोहनी ने पीला दी थी। थोड़ा बहुत मस्ती हुई मोहनी के साथ फिर चला आया।’ राजन ने दबी आवाज में अपनी बात कही।

इस तरह से राजन अपने प्रेमिका के साथ मौज मस्ती करता रहता है।

रीमा भी आपने दोस्तों के साथ मौजमस्ती करना चाहती है। एक दिन अपने दोस्त शोभित के साथ घूमने चली गई।

आधी रात को रीमा नशे में घर में प्रवेश की। राजन रीमा के हाव भाव से समझ गया कि बीबी ने जमकर पिया है।

राजन गुस्से में कहा...”शराब ज्यादा पी ली है’

”हां यार, मेरा दोस्त शोभित ने ज्यादा पीला दी। मौजमस्ती ज्यादा हो गई।”...रीमा ने अपने पति से कहा।

पति का दिमाग चकरा गया। इसके पास भी दोस्त हैं ? मौज करने जाती है। शराब पीती है। गुस्से में एक चाटा खींच कर राजन ने रीमा को मारा।

राजन ने क्रोध में कहा ...”तुम मर्दों के साथ शराब पीती हो।यही करने के लिए पढ़ी लिखी हो। शर्म हया नाम की चीज नही है।’

”तुम भी तो लड़कियों के साथ जाते हो’... कह कर रीमा ने अपना हाथ उठाया राजन को मारने के लिए। राजन ने रीमा का हाथ पकड़ ली।

"मेरा हाथ छोड़ो। तुम मरद हो। तुम करो तो सच्ची आजादी है और हम वही सेम कार्य करें तो हमे संस्कार तथा पढ़े लिखे की बात किया जाता है आखिर हम सब को सच्ची आजादी कब इस तरह की मिलेगी".कहकर रीमा रोने लगी। राजन खामोश हो कर देखता रहा।

एक पुलिसवाला (लघु कहानी)

रात के दस बज रहे थे। मैं शराब के नशे में था। लड़खड़ा कर चला जा रहा था। बेहद खराब कंडीशन। कई बार गिरते हुए बचा। शरीर पूरी तरह से सुस्त होती जा रही थी।

रात में कुछ समझ में नही आ रहा था। अचानक मेरा पैर फिसला और मैं एक गहरे नाले में गिर गया था। बिल्कुल सुनसान। कोई भी नही दिख रहा था। मेरे गिरते वक्त एक पुलिसवाला बाइक से जा रहा था। वह मुझे गिरते हुए देख लिया था।

अपनी बाइक रोकी। उसने मुझे नाले में से निकाला। मैं बेहोश था। सिर्फ सांसे चल रही थी। किसी तरह मुझे निकाला और नजदीकी हॉस्पिटल में ले गया। मेरे लिए भगवान के रूप में अवतरित हुआ था। मेरा सिर भी फट चुका था। खून काफी बह गया था।

उस पुलिसमैन ने अपना ब्लड मुझे निकाल कर दिया था। पूरी गारंटी लेकर मेरा इलाज चालू कराया था। पूरी रात भर बेहोशी थी। सुबह मैं आंखे खोली।

सारी कहानी पुलिसवाले ने बताया। सच में पुलिस कठोर भले है लेकिन नरम है जरूरत के समय वे हमारी आपकी मदद करते नजर आते हैं। मुझसे इलाज का पैसा नही लिये।

एक वादा मुझसे करवाया कि आज से शराब नही पियेंगे। आज भी उनके इस महान कार्य को याद करता हूं।

एक पुलिसवाले ने मेरी जिंदगी बदल दी। शराब पीना छोड़ दिया। मेरा घरबार जीवन टूटने से एक पुलिसवाले ने बचा लिया।

एक संस्कारी बहू (लघु कहानी)

सेवाराम एक ऐसी बहू चाहते थे कि एक सरल तथा सादगी से भरी बहू हो जो संस्कार से युक्त हो। वैसे ही मिली बहू।बिना दहेज की शादी अपने लड़के से की थी। इस तरह एक संस्कारी लड़की पा कर अपने को सेवाराम धन्य समझते थे।

उस बहू के अंदर सासु ससुर के प्रति बड़ी निष्ठा थी। सासु तथा ससुर के सामने होकर कभी अपने पति से बात तक भी नही करती थी। अदब और संस्कार बहू को एकदम शालीन बहू बना रही थी। आजकल की बहुओं को भी इस तरह के संस्कार युक्त होना चाहिए।

सास ससुर से कभी भी ऊंची आवाज में बात तक नही की। समय परिस्थितियां बदली लेकिन बहू के संस्कार उतार चढ़ाव मे बिल्कुल शालीन बने रहे। दो रोटी कम भले खाया होगा लेकिन एक रत्ती आवाज तक नहीं निकाली।

किसी चीज की जिद नहीं की। ससुर की मृत्यु के बाद सासु के दुख दर्द को बांटती रहती थी। सासु की सेवा में कोई कंजूसी नहीं की। कोई हीन भावना नहीं आई। सासु को अपनी मां से भी ज्यादा बहुत प्यार दिया करती थी।

शायद ईश्वर को मंजूर नहीं था। एक सड़क हादसे में बहू के पति की मौत हो गई। दुख के दिन आ ही गए थे। बहू के गर्भ में तीन माह के शिशु का आगमन हो चुका था। कुछ लोगो ने सलाह दिया कि गर्भपात करा ले ताकि दूसरी शादी करने में कोई समस्या न आए

कुछ ने सलाह दी कि बेटी अगर घर को छोड़ कर जायेगी तो सासु बेचारी का क्या होगा। बिन मौत मारी जायेगी। अनाथ हो जायेगी। तुम नहीं जाओगी तो तुम्हारे बच्चे को अपना बेटा ही समझ कर जी लेंगी। कुछ लोगो ने सलाह दी। बहू की अवस्था ही क्या है। दूसरे जगह घर बस जायेगा तो जीवन कट जायेगा।

सासु ने बहू को न छोड़कर जाने को कहा। आंखो में बहते आंसू को बहू देखकर बहू ने सासु को ढाढस बंधाया। सिर हिला कर न जाने को कहा। सासु के इस दुख की घड़ी में आज बहु के संस्कार एक सासु को इस हाल में छोड़कर जानें की परमिशन नही दे रहा था। धन्य है ऐसी बहू का महान त्याग।

एक स्वाभिमानी लड़की (लघु कहानी)

एक बेहद गरीब लड़की। बाल गंदे बिना कंघी के। बिखरे हुए। सड़को पर बस यूं ही टहल रही थी। बड़ी बड़ी बिल्डिंग्स को देख रही थी। दस साल की रही होगी।

बस यूं ही मैंने देखा। कुछ उदास सी लग रही थी। भूखी होगी। कुछ खाना खाना चाह रही होगी। लगता है पैसे नहीं होंगे इसलिए कुछ नहीं खरीद रही है।

मैं गर्व से उस लड़की को पचास को नोट उसकी तरफ बढ़ाया... ”ले लो कुछ खा लो”

वह पैसा थामने से इंकार कर दी। घूमकर जाने लगी। आगे बढ़ कर पैसा देना चाहा। उसने साफ इंकार करते हुए तेजी से आगे बढ़ गई। हम पचास रुपए थामे ग्लानि महसूस करते हुए जेब में पैसे रखा। जब तक नजरों से ओझल नहीं हो गई तब तक देखता रहा।

स्वाभिमान से भरी , गौरव से सिर ऊंचा किए हुए वह मेरे इस दयालुता को अस्वीकार कर दिया। वह दया की पात्र नही बनना चाह रही थी।

हां, यह मेरा घर है (लघु कहानी)

रीना की शादी एक ऐसे लड़के के साथ हुई थी जो शराबी था।शराब पीता था। बाहर जाकर अय्याशी करता था और रात में रीना को मारता था। घसीट-घसीट कर मारता था।लात घुसों से मारता था। जमीन पर पटक देता था। बालों को खींच कर मारता था। ऐसा था रीना का पति। जल्लाद सा हो जाता था। बेचारी रीना कुछ नही बोलती थी।

रीना पति को भगवान की तरह मानती थी। वह बेचारी सीधी सादी थी। पति को कभी कुछ नहीं कहती थी कि तुम तुम मेरे साथ बहुत गलत करते हो वह कुछ इसलिए नहीं कहती क्योंकि जब वह विरोध करती तो वह और मारता पीटता था। ज्यादा न मारे इसलिए मार खाते वक्त वह विरोध नही करती थी। इस तरह से मार खाते-खाते बहुत दुबली पतली हो गई थी।

रीना ने सोचा यही हाल रहेगा तो जीवन कैसे चलेगा। एक दिन फिर उसका पति शराब पी कर आया और रीना को मारा पीटा कहा कि तुम मेरे घर से निकल जाओ। आज उसने रात में निर्णय ले लिया। इस घर को छोड़ने को। एक झोले में अपना सारा सामान पैक कर लिया। एक-एक चीज भर रही थी। वह उस घर से रिश्ता खत्म करने जा रही है।

एक तस्वीर में रीना और उसके पति की तस्वीर थी। एक बार सोचा लूं या नहीं लूं। फिर कुछ सोच कर रख ली। पूरे गहने, कपड़े कोई चीज नही छोड़ा था।

बिना बताए वह भोर में झोला उठाया और बार-बार घर के अंदर की एक-एक चीज भी निगाहों में समेटना चाह रही थी। नही-नही यह तो मेरा घर है। सामान अपने घर में रखूंगी । मैं भी जल्दी चली आऊंगी। मैं बहुत प्यार करती हूं अपने पति से। मैं चली जाऊंगी तो अकेले कैसे रहेगा। मैं जा रही हूं। कुछ दिन में चली आऊंगी। यह मेरा घर है। झोला वही रख कर बहुत दुखी मन से वह निकल गई।

सुबह जब रीना का पति उठा। रीना को उसकी निगाहें तलाशने लगी। रीना कहीं नजर नहीं आ रही थी। रीना का झोला देखा। झोला नही ले गई। खोल कर देखा। सारे गहने, सारे कपड़े कुछ नही ले गई। ये फोटो भी नही ले गई। मैं तो ऐसे ही कहा था। छोड़कर चली गई। कुछ भी नही ले गई। मैं कैसे अकेले रहूंगा। मैने बहुत दिल दुखाया है उसका। दारू पी कर उसको बहुत मारा हूं। बेचारी कितनी सीधी है। कह कर रीना का पति फफक कर रो पड़ा। दहाड़े मार कर रो पड़ा।

तुरंत रीना के पास फोन किया। रीना तुम कहां हो। चली आओ। मैने तुम्हारा दिल बहुत दुखाया है। तुम्हारे बगैर नहीं रह सकता हूं। मैं तुमसे वादा करता हूं। कभी दारू नही पियूंगा। तुम कीमती जेवरात की तरह हो। तुम्हारे रहने से इस घर में रौनक है। तुम चली जा रही हो। मेरे बारे में तनिक नही सोंचा। मैं कैसे रहूंगा। यह तुम्हारा घर है। रीना बोली.. हां यह मेरा घर है। पति बोला...जल्दी आ जाओ। मैं तुम्हारे लिए चाय बना रहा हूं।

पत्नी में हुआ बदलाव (लघु कहानी)

सूरजमणि एक मध्यवर्गीय परिवार से है। कमाता है फिर खाता है। ईमानदार है। कम भले कमाता है लेकिन किसी का गिरवी नहीं है। अपने बच्चों तथा पत्नी पर जितना हो सके खर्चा करता है जितना होना चाहिए खर्च उतनी आमदनी नही है बेचारे के पास। पत्नी तथा बच्चे उसकी आमदनी से खुश नहीं है। कमाई के हिसाब से पूरा खर्चा नही हो पाता है। पत्नी को अच्छी साड़ी चाहिये। बच्चों को अच्छा स्कूल चाहिए। अच्छा खाना होना चाहिए। फल फूल होना चाहिए। इन सबके न होने से पत्नी ठीक से सूरजमणि से बात नहीं करती है। उसका अपमान ही करती थी लेकिन सूरजमणि हर जरूरत की चीजे लाता था। पत्नी द्वारा अपमान किये जाने से बेचारा सदमे में है।

चाय नहीं है,बेचारा चायपत्ती लेने दौड़ा जाता। सब्जी नहीं है। भागा जाता सब्जी मंडी। बेटे की अचानक तबियत खराब हो गयी । दौड़ कर हास्पिटल ले भागा। दवा के लिए पैसे नहीं थे। उधार लेने चचा के घर भागा। नून तेल से लेकर जूता चप्पल"। कपड़े साबुन सोडा। पत्नी को सजाकर रखने की चाहत में क्रीम पाउडर की कमी नहीं होने देता। कल ही उसने लिपिस्टिक नहीं लगाई थी। बेचारा दौड़ कर मार्केट गया। पत्नी को लिपिस्टिक दिया। पत्नी की एक ख्वाहिश थी कि उसका पति झुमका दे लेकिन गरीबी मुफलिसी में बेचारा एक पाई नहीं बचा पाया। पत्नी के ताने से बेचारा बहुत दुखी है। ड्यूटी की छुट्टी न हो बेचारा बिना खाये ड्यूटी पहुँच गया। गरीबी से संघर्ष करता युवक पत्नी के बार बार उलाहना से न हंंस रहा है न तो रो पा रहा है। पत्नी के इस व्यवहार से तंग आ गया है। वह जानता है जिस दिन हाथ खड़े कर दूंगा। सब समझ में आ जायेगा।

आखिर पत्नी को सबक सिखाना चाहता था। अचानक बीमार होने का बहाना बना लिया। बिल्कुल सुस्त हो गया। आंखे एकटक कर लिया। खाना पीना छोड़ दिया। अब घर के हालात बहुत खराब हो गयी। कौन इलाज के लिए अस्पताल जाये। घर में खाने के लिए कुछ नहीं है। कौन मार्केट जाये। कौन बच्चों के लिए सामान लाये। कौन दवा लाये। उसके खराब व्यवहार से पड़ोसी भी हाथ खड़े कर लिये। अब उसको अपने पति की जरूरत महसूस होने लगी। पति की वजह से आराम से जीवन गुजर बसर हो रहा था। अब उसे अगर जरूरत थी पति की। वह इस चीज को समझी की पति ही वह चीज जिसके वजह से मैं बोल लेती है। उनके बीमार हो जाने से भूखों मरने की स्थिति हो गयी।

वह पति की लगी सेवा करने। भगवान से प्रार्थना शुरू कर दिया कि मेरे पति को बचा लीजिए भगवान। नहीं तो जीते जी हम अनाथ हो जायेंगे। हमारे बच्चे बिन बाप के हो जायेंगे। पत्नी पहुँच कर पति के पास मांफी मांगा। कहा कि मैं आप का बहुत दिल दुखाती थी। हमें माफ कर दो। हमारी जो खुशी है वह आपके मेहनत से मिलती है। आज मैं समझी कि आपके बीमार हो जाने से घर में खाना नहीं बन सका। भूखों रहना पड़ा। हमारी जिह्वा अनाथ सी हो गयी। मेरे अंदर जो ताकत है। वह पति की वजह से है। पति धीरे- धीरे ठीक होने लगा। घर में खुशियाँ लौट आयी। उस दिन से उस घर में कलह समाप्त हो गया। सूरजमणि का प्रेम पत्नी के इस व्यवहार से दुगुना हो गया। उसने अपनी मेहनत बढ़ा दी। जल्दी ही पत्नी को झुमका बनवा कर दिया। पति पत्नी को उलझ कर रहने से विकास नहीं होता है। सुलझ कर रहने से संपूर्ण विकास होता है।

बड़ा ओहदा (लघु कहानी)

सूरजमल गरीबी में बड़ी मेहनत करके सरकारी आदमी बना था। आईएएस की बड़ी परीक्षा पास की थी। गांव में जश्न मना था। गांव में खुशी की लहर थी। हर घर के लोग खुश थे। ये अपना सूरज बहुत बड़ा आदमी हो गया है।

हमारी समस्या का समाधान होने में टाइम नही लगेगा क्योंकि अपना सूरजमल है। अपना सूरज। सबके घर में रोशनी की दीपक सूरज जलायेगा। रौनक रहेगा। हर दिन दिवाली होगी। हमारे बच्चे को मदद मिलेगी। उस गाँव में तरह तरह के सपने गढ़े जा रहे हैं।

बड़ा ओहदा। बड़ा रसूख। आगे पीछे अधिकारियो की भीड़। मिल गयी लालबत्ती। चकाचौंध की दुनिया। बदल गया सूरजमल। अब वो सूरजमल नहीं रहा। सूरजमल सर हो गया। एक वीआईपी सिक्योरिटी से घिरा। चीफ सेक्रेटरी की पोस्ट पर। चीफ मिनिस्टर का सबसे करीबी अधिकारी सूरजमल। रोज अखबारों की सुर्खियों में।

बेहद गरीबी में पढाई के दौरान मदद करने वाला सरजू को आशा थी कि सूरजमल उसकी मुसीबत में उसका हेल्प करेगा। सरजू पहुँच गया सूरजमल की आफिस में। यह आदमी कैसे अंदर आ गया। सर आपके गाँव का सरजू। आपकी पढाई के दौरान जो मदद किया था। वही सरजू।

आदेश जारी कर दिया गया कि गाँव के किसी व्यक्ति को यहाँ न मिलने दिया जाये। पैसे और ओहदे का जलवा।

गाँव में हल्ला मच गया। सूरजमल ने सरजू के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। गाँव के लोगों में भयंकर आक्रोश था।

सूरजमल एक दिन अपने घर पर आया। गाँव के लोगों को आशा थी। गाँव के लोगों से जरूर मिलेगा। कुछ महिलाओं ने मिलने की कोशिश की। यह अपना सूरज है। जब सब को पता चल गया कि अपने ओहदे का घमंड हो गया है सूरजमल को। लोग उसके घर से वापस चले गए। निराशा हाथ लगी। लालबत्ती के आगे गाँव में सन्नाटा पसर गया।

इस तरह महीने दिन साल गुजर गया। कई बार सूरजमल गाँव आया। न तो सूरजमल गाँव वालों से मिलने की इच्छा जाहिर की। न तो गाँव वाले मिलने गए। इस तरह अब वह दौर आ गया सूरजमल के रिटायर होने का। रिटायर होकर सूरजमल घर आ गये। सूरजमल के जमाने के कई लोग अब इस दुनिया में नहीं रहे।

सूरजमल की जिंदगी गाँव में बीत रही है। कोई व्यक्ति नहीं आता मिलने को। बिल्कुल अकेली जिन्दगी। पुराने दिन याद आने लगे। सरजू चचा कहाँ हैं। उनसे मिलना है। पढ़ाई के दौर में मेरी कई महीने की फीस सरजू चचा ने दी थी। आज सूरजमल सरजू से मिलने सरजू के घर गया।

सरजू चचा मैं सूरजमल। मैं नहीं जानता किसी सूरजमल को। वही सूरजमल जिसकी आपने फीस भरी थी। सरजू वहाँ से उठकर लाठी का सहारा लेकर चल दिया। पीछे से सूरजमल भी चल दिए। अरे चचा भूल गए। वह बूढ़ा आगे बढ़ता गया। सूरजमल अकेला पड़ गया।

सूरजमल को एहसास हो गया कि जब हम किसी से नहीं मिले तो ये लोग क्यों मिलेगें। सूरजमल के चेहरे पर निराशा के बादल छा गये। सिर पर हाथ रखकर बैठा रहा, सोंचता रहा,पर गांव का कोई व्यक्ति हाल समाचार लेने नहीं आया।

ओहदे के आगे मैंने लोगों को नहीं पहचाना आज लोग हमें नहीं पहचान रहे हैं। जिस मिट्टी में लोटपोट कर बड़े हुए हम। उस मिट्टी को हम भूल गये। वह मिट्टी हमको भूल गयी।

भाई का विशाल ह्रदय (लघु कहानी)

रक्षाबंधन नजदीक आ गया है। शीला चार बहनों में तीसरे नंबर की है। सभी बहनों की शादी अमीर घरों में हो गयी है जबकि शीला के पति की तबियत खराब होने के कारण कमाई धमाई ठीक से नहीं हो पाती है। पति अक्सर बीमार ही रहते हैं।

शीला भी अपने भाई की राखी बांधने जाना चाहती है लेकिन घर की परिस्थितियां रोक रही थी। सारी बहनों से बता दिया है कि वह भी रक्षाबंधन पर अपनी मायके आयेगी और भाई को राखी बांधेगी।

शीला अषनी हालातों पर सोंच रही है कि घर में पैसा नहीं है और बहनें घर से मजबूत हैं। मंहगी और अच्छी अच्छी मिठाइयां तथा राखी ले जायेंगी और मेरे पास उतने पैसे भी नहीं है कि मंहगी और अच्छी मिठाइयां खरीद सकूं।, सस्ती मिठाइयां लेकर जाने पर बहनों के सामने शर्मिन्दा होना पडेगा।

राखी के दिन सब पहुंच गयी लेकिन शीला अभी नहीं पहुंची। सब लोग सोंच रहे है कि शीला दीदी नहीं आयी। शीला ने मोबाइल से राखी की शुभकामनायें भाइयों को भेज दी और राखी पर न पहुंचने की असमर्थता जताई। भाइयों ने शीला बहन की परिस्थितियों को भलीभांति समझ रहे थे।

शाम को भाइयों ने मार्केट से चार साडियां लाये और गिफ्ट लाये। किसी बहन ने कहा.. भैया हम तो तीन ही आयीं हैं। शीला दीदी तो आयी नहीं है फिर ये चौथी साडी गिफ्ट किसके लिये।

भैया ने जबाब दिया कि शीला दीदी किसी कारणवश नहीं आयी तो क्या उनका हिस्सा नहीं लगेगा। यह साडी गिफ्ट शीला दीदी के लिये है। भाई का शीला बहन के प्रति स्नेह प्रेम देखकर और बहने भावुक हो गयी कि एक भाई का ह्रदय कितना विशाल है अपने बहन के प्रति.... भाई साडी गिफ्ट को लेकर शीला के घर राखी बंधवाने चला गया।

नानू मोची की हेल्प (लघु कहानी)

नानू मोची यह नहीं समझ पा रहा था कि मोहित की चप्पल बार बार क्यों टूट जा रही है। वह बार बार अपनी चप्पल बनवाने आता है। इतना गरीब मोहित नहीं है कि नई चप्पल नही ले सकता है लेकिन वही फटा पुराना चप्पल बार बार सिलवाता रहता है। हमे यह रहस्य जानना चाहिए।

मोहित एक दयालु लड़का है। लोगो की मदद करता रहता है। कोई बेहद जरूरतमंद व्यक्ति की हेल्प करने की प्लान बनाकर करता है। नानू की वह हेल्प करना चाहता है। एक दिन वह सुना। फोन पर बीबी से कहता है देर रात तक हो जाने पर बोहनी नही हुई है। लगता है आज भी सब्जी नहीं ले पाऊंगा। आज भी सूखे ही खाना पड़ेगा।

पास में मोहित वही खड़ा सुन रहा था कि आज नानू मोची सूखी रोटी खायेगा। कोई आज नही आया। हे भगवान ! कब तक ऐसे दिन देखने को मिलेगा। मोहित ने देखा बेचारा बहुत दुखी है।आज उसके बच्चे सूखी रोटियां ही खाकर रहेंगे। नही मुझे हेल्प करनी चाहिए।

वह अपनी चप्पल तोड़ कर उसके पास गया और बनाने के लिए कहा। नानू बहुत खुश हुआ की आज भगवान ने प्रार्थना सुन ली। मोहित ने सौ का नोट दिया। फुटकर नही है क्या ? नानू ने कहा। मोहित ने कहा पूरे पैसे रखो। नानू बहुत खुश हुआ।

इस तरह जब भी नानू के पास कोई ग्राहक नहीं आते तो मोहित चप्पल तोड़कर सिलवाया और नानू की हेल्प किया करता। एक दिन मोहित ने चप्पल बनवाया था लेकिन ग्राहक न आने के कारण दूसरे दिन उसने चप्पल तोड़ कर नानू के पास गया। नानू को कुछ गड़बड़ दिखा। साहब से जिद करके पूछने लगा।

कुछ नही बस टूट गया। चप्पल बना दो। नहीं साहब , पहले बताओ जिद करने लगा। देखो नानू आज कोई ग्राहक तुम्हारे यहां नहीं आया।आज तुम्हे और तुम्हारे परिवार को भूखे सोना पड़ेगा। एक दिन तुम घर पर फ़ोन से बात कर रहे थे मैंने सब सुन लिया था। नई चप्पल मैंने तोड़ डाली। मैं पैसा तुम्हे वैसे दे देता लेकिन तुम स्वाभिमानी हो पैसा नही लेते इसलिए चप्पल तोड़ दिया था ताकि तुम्हे यह रहे कि तुम अपने मेहनताना के रूप में लिए हो। जब भी मैं सुनता या देखता अपनी चप्पल तोड़ कर हेल्प तुम्हारी करता ताकि तुम तुम्हारे बच्चे भूखे न रहे।

आज भी कोई ग्राहक नहीं आया। इसलिए मैं अपनी चप्पल तोड़ डाला। नानू के आंखो से आंसू छलक पड़े। फफक फफक कर रो पड़ा। मोहित की इस सहयोग से मोहित के प्रति कृतज्ञता दर्शाया। अपने बुरे दिन के विषय में सोचते हुए चप्पल बनाने लगा। ह्रदय मन से मोहित को आशीर्वाद दे रहा था मोहित भी खुश है की आज भी नानू को सूखे नही खाना पड़ेगा।

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