Khadg Aur Veena (Hindi Nibandh) : Ramdhari Singh Dinkar

खड्ग और वीणा : रामधारी सिंह 'दिनकर'

बहुत दिनों की बात है ।

एक बार भूकम्प और अग्निकांड - दोनों का धरती पर साथ ही आक्रमण हुआ । महल गिर गए ; झोपड़ियाँ जलकर खाक हो गईं । कहीं नई जमीन पानी में से निकल आई ; कहीं बसे - बसाए नगर समुद्र में समा गए । पशु - पक्षियों , कीड़ों - मकोड़ों के साथ आदमी भी बहुत बर्बाद हुए । कितने ही महावृक्षों का पता नहीं रहा और कितने ही पहाड़ों की छाती फट गई ।

जिस दिन यह विनाश हुआ , उस दिन सभी लोग चुप थे , सभी लोग खामोश थे । थे चिड़ियाँ नहीं गाती थीं , पत्ते नहीं डोलते थे और दूब की फुनगी पर से शबनम भी गायब थी ।

मगर दूसरे ही दिन भोर में जब लोग जैसे - तैसे यामिनी के पार हुए , शबनम चमकने लगी , पत्ते डोलने लगे और वीणा गाने लगी ।

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बहुत दिनों की बात है ।

एक बार लड़ाई छिड़ी । देश की सरहद पर धौंसे बजाकर दुश्मन ने जवानी को चुनौती भेजी - ‘ है कोई मर्द इस देश में जो हमारा मुकाबला करे ? '

चुनौती नौजवानों को आग - सी लगी । सभी जल उठे , सभी बेताब हो उठे । माताएँ बेटों का , बहनें भ्राताओं का और गृहदेवियाँ अपने पतियों का रण - शृंगार सजाने लगीं । म्यानों से तलवारें निकल पड़ीं । मर्दो ने शपथ ली - ' अगर पीठ फेरकर लौटें तो हमें क्षत्रियों की गति नहीं मिले । '

ललनाओं ने प्रण किया - ' अगर इज्जत पर बनने को आई तो हम चिताओं में - कूद पड़ेंगी । '

शंख फूंका गया ; रणभेरी बजने लगी ; धौंसे धुधकारने लगे ; देश की मर्दानगी उमड़कर रणभूमि की ओर चली ।

चलने से पहले खड्ग ने वीणा से पूछा - ' वीणे ! क्या आज भी यही सुहाग ? देश की जान पर बन आई है और तुझे चाँदनी की रागिनी से फुरसत नहीं ? हो जा आज डंके की चोट और समा जा मेरी तेज चमकती हुई इस धार में । चलकर जरा रणभूमि का भी तो नजारा देख कि कैसे रुंड से मुंड अलग होते हैं और धुंधआती हुई तलवार कैसी लगती है । सच कहता हूँ बहन ! आँखें निहाल हो जाएँगी और सपनों का तेज बढ़ जाएगा ।

वीणा गरदन झुकाकर मौन रही । खड्ग ने सोचा , यह मुर्दा है और वह वेग से बाहर निकल गया ।

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भूकम्प , युद्ध और अग्निकांड दुनिया के लिए आम हो गए । अब इनका कोई निश्चित लग्न या काल नहीं रहा । वे जब चाहें , न जाने कहाँ से फट पड़ते हैं ।

हैरान है संसार भूकम्प से । हैरान है संसार युद्ध से । मगर वे आते ही रहते हैं ।

और जब कभी कोई त्रास आता है , खड्ग संसार के बचाव के लिए आगे बढ़ता है ; क्योंकि यही है उसका काम , इसी की वह रोटी खाता है और इसी के लिए उसे फूलों की मालाएँ भी मिलती हैं ।

वीणा बहुत बार संकेत दे चुकी है कि वह समय - कुसमय छेड़ी जाना पसन्द नहीं करती । वह जिस काम की रोटी खाती है , उसमें कोई विघ्न डाले , यह अच्छी बात नहीं है ।

लेकिन खड्ग ठहरा जरा उद्धत । वह छेड़ बैठता है वीणा को – ' पगली है ! अगर मैं न रहूँ तो देखू , तू कैसे बजती है ! दुश्मन के एक ही चपेटे में ये तार न जानें कहाँ - से - कहाँ पहुँच जाएँ । धन्यवाद कर मेरा कि देश में अमन और चैन है , जिससे लोग - बाग तुझे घेरकर बैठते हैं और रागिनियों का रस लेते हैं । '

वीणा रह जाती है मौन , उसे सूझता ही नहीं कि खड्ग के इस व्यंग्य का क्या उत्तर दे ।

वह सोचती है :

यह आकाश , यह जंगल , यह विस्तृत हरी भूमि , ये नदियाँ और ये पहाड़ , यह अनन्त सागर और ये अनन्त दिशाएँ - क्या यह सब कुछ खड्ग के अधीन है ?

सृष्टि के कण - कण में जो एक सामंजस्यपूर्ण महासंगीत व्याप्त है , क्या खड्ग का उछलना - कूदना भी उसी की नियमित कड़ी है ?

मगर बाघों और वृकों के सामने तो मैं , सचमुच ही नहीं बज सकती , तो क्या खड्ग का कहना ठीक है ?

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लड़ाई फिर आई और चली गई ।

खड्ग विजयी हुआ है । जयमालाओं से लिपटा हुआ वह जरा तनकर चलता है और गरीब वीणा से कह ही तो बैठता है :

' कहा था न चलने को ? उस दिन तो यह कहकर उड़ा दिया कि बाँसुरी बाँसुरी है और लाठी लाठी । अब देख मेरे विजय - तिलक को और रो अपने दुर्भाग्य पर ! '

वीणा विजय - तिलक को नमन करती है और मन - ही - मन सोचती जाती है : 'फूल और शबनम बदनाम नहीं। बदनाम होती हूँ मैं, क्योंकि खड्ग की मैं कमाई खाती हूँ ।

' खड्ग जिसका आरम्भ घृणा में और अन्त विनाश में होता है ।

और वीणा , जो आदि से अन्त तक निरीहता में गाती है ।

खड्ग तना हुआ है । वीणा पर वह अपना अहंकार उतारता है ।

वीणा मूक है और मन - ही - मन वह सोचती जाती है वह कविता , जिसे वह आज निशीथ में गाएगी ।

कविता उन फूलों की , जो शहीदों की समाधि पर बिखेरे जाते हैं ।

कविता उन चाँदनियों की , जो समरभूमि की लाशों पर चादर बनकर फैलती हैं , मानो खड्ग की ग्लानि पर परदा डाल रही हों ।

कविता उन दुष्ट आवेगों की , जो मनुष्य को तलवार पकड़ने के लिए विवश करते हैं ।

और कविता उन आदर्शों की , जो खड्ग के अस्तित्व को भंग करनेवाले हैं ।

('रेती के फूल' पुस्तक से)

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