काश! मैं तुम्हारे साथ रहती (कहानी) : अनवर सुहैल

Kaash ! Main Tumhare Saath Rehti (Story in Hindi) : Anwar Suhail

राजीव के मकान की चाभी उर्मि के हाथ में थी। उर्मि को ऐसा लग रहा था जैसे उसके हाथ में लोहे की एक ठंडी चाभी नहीं, बल्कि राजीव की ऊंगली पकड़ी हुई हो। पापा की ऊंगली की तरह, छोटी सी थी वह, जब पापा की ऊंगलियां ज़बर्दस्ती पकड़कर उन्हें घर से बाहर खींच ले जाती थी। पापा उसे आसपास से घुमा भी ले आते। सड़क के किनारे बसी हैरतअंगेज़ दुनिया की तरफ इशारा कर, न जाने क्या-क्या समझाया करते। नन्हीं उर्मि पापा की बात समझ नहीं पाती। बस...अपनी धुन में मगन इठलाती, खूब-खूब घूमा करती। पापा और अपनी परछाईं की हरकतों को देख खुश हुआ करती।

चिड़िया और तितली को पंख फड़फड़ाकर उड़ते देख ज़िद कर बैठती—
‘‘पापा पंखोवाली फ्राक ला दो न!’’ पापा वचन देते कि उसके लिए पंख वाली फ्राक ला देंगे।

उर्मि के हाथ में राजीव के मकान की चाभी थी। उर्मि सोच में गुम! छोटे भाई बीनू की पुकार सुनकर वह वर्तमान में लौट आई—
‘‘दीदी, दिद्दी।’’

आज बीनू की छुट्टी थी। पूरा दिन ऐसे ही तंग करेगा—
‘‘दीदी...दिद्दी..!’’

बीनू के इस आलापहीन राग को राजीव ‘‘दीदी-राग’’ कहता।

उर्मि उसमें संशोधन करती ‘‘दीदी राग’’ नहीं बल्कि "दीदी-रोग"।

वह अपने मकान के बाहर बने बाऊंड्री गेट के पास खड़ी थी। दिन के दस बज रहे थे। बीनू को बताया कि वह पड़ोस से तुरंत आ रही है।

राजीव उसका पड़ोसी। बैंक में सहकर्मी उसका सीनियर। रविवार वह अमूमन कहीं न जाता। दोस्ती-यारी से परहेज़गारी करता। लेकिन आज सुबह ही उसे घर छोड़ना पड़ गया। उसके एक मुस्लिम दोस्त परवेज़ की शादी थी—
‘‘दावत-ए-शादी, खाना आबादी।’’

रिश्ते की बहन के साथ शादी थी। सीधा-सादा उत्सव। न बैंड बाजा, न रस्मोरिवाज़ के दिखावे। ग्यारह-बारह बजे निकाह पढ़ा जाना था। दोपहर की शानदार दावत के बाद शाम चार बजे तक रुख़्सती। राजीव पूरा दिन व्यस्त था। सुबह जब उर्मि ने राजीव के मकान में बीनू को कुछ किताबें लाने भेजा था, तब बीनू ने लौटकर बताया कि भाई साहब कहीं जा रहे हैं।

उर्मि स्वयं बाहर निकली थी। देखा राजीव सूट-बूट से लैस मकान का दरवाज़ा लॉक कर रहा था। अपनी तरफ देखते देख राजीव ठिठका। उर्मि के चेहरे पर सवालिया निशान था। राजीव जाने क्या सोचकर, छाती तक खड़े बाऊंड्री वाल के पास आकर खड़ा हो गया। अपने मकान की चाभी उर्मि की तरफ बढ़ाई।

उर्मि अचम्भित...किंकर्तव्यविमूढ़ ...उससे न करते न बना। राजीव बोला ..‘‘आपको जो किताबें चाहिए, ले लीजिएगा। मुझे परवेज़ की शादी में जाना है।’’

उर्मि ने चाभी को इस तरह थामा, जैसे वह एक साधारण चाभी नहीं बल्कि उसकी सीलन-जाला वाली ज़िंदगी की बंद पड़ी कोठरियों को खोल कर देखने की, उसे धो-पोंछकर सजाने चमकाने की ख़्वाहिश हो।

उसे महसूस हुआ, राजीव ने चाभी नहीं, बल्कि एक नया सूरज थमाया हो। वह इस सूरज की तपिश जगमगाहट से घबराई नहीं। उसकी अंधकार में अभ्यस्त आंखें चुंधियाई नहीं। वर्जना की बर्फीली दीवारें पिघलने लगीं। कुहरा छँटा।

दिखी एक नई ज़मीन, एक नया आसमान, चहचहाते पंछी, महकते सतरंगे बाग, गुनगुनाती नदियां और ज़ख़्मी रूह को मरहम लगाती खुशनुमा हवाएं।

उर्मि यंत्रवत राजीव के मकान के अंदर दाखिल हुई। बिना पापा-मम्मी या अन्य किसी सरपरस्त के जब वह पहली बार एकदम अकेले घर से बाहर यूं ही तफ़रीहन घूमने के इरादे से निकली थी, तब इसी तरह की अनुभूतियां हुई थीं।

राजीव का मकान! एक बैचलर युवक का संसार था। बिखरा-बिखरा। अस्त-व्यस्त। दो कमरा और एक किचन। टॉयलेट-बाथ अटैच। इसी तरह के बीस मकान। सभी में नौकरी पेशा किराएदार। कमरा बैठकी और बेडरूम का संयुक्त रूप। दो फोल्डिंग कुर्सियां, एक फाईबर का टी-टेबिल, एक दीवान जिस पर राजीव का बिस्तर बिछा था। दीवान से लगी दीवार से सटी एक छोटी सी आलमारी। आलमारी में पत्रिकाएं, चंद ‘शो-पीसेज’।

दूसरे कमरे में पहुंची। इसमें एक राइटिंग टेबिल, टेबल-लैम्प, आलमारी में किताबें, एक कोने पर दीवार से टिका ‘पेंटिंग बोर्ड’ जिस पर अधूरी तस्वीर चस्पां थी। जल-रंग, चाकू, ब्रश, रंगी-पुछी चिंदियां। दाहिनी दीवार पर चे ग्वारा की एक तस्वीर। उसके बगल में एक उदास पेंटिंग। सिद्धबाबा पहाड़ी की काली चट्टानों के ऊपर बिछा उदास सुरमई आसमान। इस पेंटिंग की उदासी उर्मि के दिलो-दिमाग पर छा गई। राजीव के संसार में घूमते हुए उसे बहुत अच्छा लग रहा था। वह इस नए रंगमंच में खूब-खूब नाचना-गाना चाह रही थी। खिड़की के पट बंद थे। उसे खोला तो धूप का एक टुकड़ा फर्श पर आ गिरा, जिसके आलोक से सुरमई आसमान की उदासी भाग गई। उर्मि इस नए संसार के स्वप्न से यथार्थ में आई। उसकी चिरपरिचित वर्जनाओं से उत्पन्न हिचकिचाहटें उसे अपने गिरफ्त में लेना चाह रही थीं। वह सम्हल-सम्हल कर चलने की आदी थी। अपनी चाल स्वयं चलने में सारी रिस्क खुद पर पड़ती है। किसी दूसरे पर तोहमत लगा कर खुद को ही नुकसान उठाना पड़ता है। वह अच्छी तरह जानती समझती थी।

आलमारी से मनपसंद किताबें छांटना वह भूल चुकी थी। उसे लगा कि बालों को समेट कर उन पर दुपट्टा बांध, बस राजीव के घर की सफाई कर दे। राजीव के लिए एक सरप्राईज़! लेकिन क्यों? वह रुक गई। वह अपनी हदें जानती थी। माता-पिता के बिना छोटे भाई के साथ गुजर-बसर करती एक निराश्रित, अविवाहित युवती की सीमाएं उसे याद थीं। वह अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करना नहीं चाहती थी। उसे अचानक पापा की याद आ गई। एक मजबूत व्यक्तित्व के स्वामी। एक खुद्दार पुरुष। उर्मि के पिता मजदूर नेता थे। बीनू के जन्म के बाद मां ‘ब्रेस्ट-कैंसर’ से चल बसीं। पिता के साथ मां की भूमिका निभाने वाले उर्मि के पिता अपने व्यस्त जीवन में बच्चों के लिए समय निकाला करते। बीनू की देखभाल के लिए उनसे दूसरे विवाह करने को कहा गया। उर्मि बीनू से दस वर्ष बड़ी थी। उसके पापा और उर्मि ने मिलजुलकर बीनू की देखभाल की।

एक बार मिल मालिकों और मजदूरों के बीच ठन गई। मजदूर हड़ताल पर चले गए। दलाल मजदूर साथियों ने अवसर का लाभ उठाया। मिल मालिकों के राह में कांटे की तरह थे उर्मि के पापा। हड़ताल तोड़ने की एकमात्र तरकीब...कामरेड भूषण की हत्या। कार्यक्रम तैयार हो गया।

एक रात, महान विजय का विश्वास लिए उर्मि के पापा कामरेड भूषण घर से गए तो फिर कभी लौट कर न आ पाए। उनकी लाश किसी ट्रक से कुचली मेन रोड पर मिली। हड़ताल टूट गई। उर्मि और बीनू के जीवन की संघर्ष यात्रा प्रारम्भ हुई।

उर्मि को बैंक में नौकरी लगी। उसे इस नए शहर में आना पड़ा। यहां उसके मामा रहते थे। विधुर-निःसंतान मामा। मामी की मृत्यु के बाद ब्याह नहीं किया था मामा ने। उनकी समाज में खास इज्ज़त न थी। मामी के जीवनकाल में ही उनके एक अन्य स्त्री से अवैध सम्बंध थे। मामी की मृत्यु का यह भी एक कारण था। बड़ा सा घर। अकेले रहते। संड-मुसंड। प्रतिदिन शेव बनाते। सप्ताह में एक दिन बालों में खिजाब लगाते। उर्मि को इन सबसे क्या? उसे तो नए शहर में एक सरपस्त की ज़रूरत थी। मामा के साथ वे दोनों भाई-बहन रहने लगे। बीनू सुबह स्कूल चला जाता। मामा भी काम पर निकल जाते। दस बजे खाना पकाकर उर्मि स्वयं बैंक चली जाती। दोपहर में मामा और बीनू साथ लौटते। खाना खाकर मामा पुनः निकल जाते। शाम को उर्मि बैंक से लौटती तो फिर चूल्हा-चैकी में व्यस्त हो जाती। एक पृथक कमरा उन्हें मिल गया था। जीवन की गाड़ी ठीक-ठाक चल रही थी। मामा उसका पूरा खयाल रखते थे, स्नेह करते।

गर्मी की एक रात। उमस और पसीने से त्रस्त उर्मि ने कमरे का दरवाज़ा खुला ही रखा। टेबिल फैन की वहा से कुछ राहत मिल रही थी। मच्छर अलग सता रहे थे लेकिन नींद तो फांसी के तख़्ते पर आ जाए, थकी हारी उर्मि और बीनू कब नींद के आगोश में चले गए, पता ही न चला।

आधी रात उसने महसूस किया कि जैसे कमरे में दबे -पांव कोई घुसा हो। नींद का ज़ोर था अतः सोचा कि शायद बीनू पानी पीने या पेशाब करने के लिए उठा होगा। वह मटियाए पड़ी रही। नींद जोरों से सता रही थी।

कमरे में तेज़ मर्दाना सांस की फूत्कार से उर्मि कुछ असहज हुई। करवट बदल लिया। कुछ देर बाद ऐसा लगा कि कोई सटकर सोया हो। एक घृणित अजनबी स्पर्श! हड़बड़ाकर उठ बैठी। चिल्लाना चाहा, किन्तु भागते साए को देख चुप रह गई। उठकर लाईट जलाई। दिल बेतरह धड़क रहा था। वह साया पहचान ली थी, मामा ही थी। वह न रोई और न चीखी। जागती रही सारी रात। करती रही पौ फटने का इंतजार।

सुबह उठते ही घर से निकल पड़ी। राजीव से एक बार बातचीत के दौरान पता किया था। उसके पड़ोस का मकान खाली होने वाला था। वह राजीव के मुहल्ले पहुंची। मकान मालिक, राजीव का जिला-जवारी था। दूर का रिश्तेदार था। ऐसे रिश्ते अकसर नए शहर में आदमी तलाश लिया करता है। खैर...यह रिश्तेदारी काम आई। उर्मि को प्राथमिकता मिली। मकान उसे किराए पर मिल गया था। वह उसी दिन अपना सामान लेकर इस नए मकान में आ गई। मामा ने रोका नहीं, टोका नहीं। वह अपना अधिकार खो चुके थे। उर्मि के दिल में मर्दों के इस संसार के लिए एक घिनौना सबक़ सिखा गए थे। उसे सतर्क कर दिया था।

उर्मि अब अपने पैरों पर थी। पुरुषों की बैसाखी से पूर्णतया मुक्त! क्या हुआ कि उसकी अनभ्यस्त चाल में लंगड़ाहट थी। लेकिन ये लंगड़ाहट तो उसकी अपनी निधि थी, अमूल्य निधि! धीरे-धीरे स्वयं चलना और फिर इस विराट संसार में उसे स्वयं ही दौड़ना भी था। वह अपने कामरेड पिता की मज़बूत संतान थी। उसे अपने पिता पर गर्व था।

राजीव के मकान में खड़ी उर्मि आत्म-साक्षात्कार के दौर से गुज़र रही थी। राजीव जैसा सहकर्मी, पड़ोसी और अब मित्र पाकर वह आत्मविभोर थी। राजीव ने अपने मकान की चाभी सौंपकर, उसे मर्दों के संसार में एक बार घूम-फिर आने का न्यौता दिया था।

राजीव की गै़र-हाजिरी में उसका मकान एक व्यक्तिगत डायरी की तरह था। जिसे बिना इजाज़त खोलना और पढ़ना अपराध था। उर्मि यह अपराध सहर्ष करना चाहती थी। उसके भीतर सोई खिलंदड़ी जिद्दी, अन्वेषी लड़की जाग उठी। वह शरारतें करना चाह रही थी। पहली शरारत तो यह थी कि किचन के गंदे बर्तनों को धो कर करीने से सजा दिया। बैठकी में आई। बिखरी चीजों को व्यवस्थित करना शुरू किया। दीवान पर राजीव का कुर्ता-पायजामा, चादर आदि फेंकी हुई थी। पहले चादर तह लगाकर रखा, फिर पायजामा कुर्ता तह लगाने के लिए उठाया तो उसे अजीब सी अनुभूति हुई। उसने कुर्ते की बाहें अपने ऊपर डाल लीं। ठीक इस तरह ज्यों राजीव ने बाहें डाली हों। उसे गुदगुदी हुई। अच्छा लगा। कुर्ते से उठती पसीने की मर्दानी गंध में वह डूब गई। मदहोशी सी तारी हुई। वह दीवान पर बैठ गई। वह थक गई थी। आराम करना चाहती थी। थकन रहित एक सम्पूर्ण विश्राम।

वह कब दीवान पर पसर गई। राजीव की चादर कब ओढ़ ली, उसे पता ही न चला। वह आज क़तरा-क़तरा पिघल रही थी। ‘मोम की गुड़िया’ में प्राण है, जीवन है...उसे आज तक पता नहीं चला था। दफ्तर में वह ‘मोम की गुड़िया’ कही जाती थी। वह स्वयं भी तो यही चाहा करती थी। समाज के प्रति बेरुखी का गुण ही उसका सुरक्षा-चक्र था। इस घेरे में वह महफूज़ थी। मित्र-दोस्त भरसक न बनाती। रिजर्व रहती। सहकर्मी उसे अकड़ू भी कहते...घमंडी भी। उसे किसी की परवाह नहीं थी।

उर्मि आंखें मींचे एक नए लोक की सैर कर रही थी। इस नए लोक में यहां लिंग के आधार पर गैर-बराबरी न थी। कड़ुवाहटों से मुक्त। दीवान पर पड़ा अपना अस्तित्व उसे हवा में घुला-मिला लग रहा था। उसकी सांसों के साथ राजीव की गंध उसके शरीर में घूम-पेवस्त हो रही थी। एक प्यारी सी पुरुष गंध... मित्र-गंध।

उसके ‘पुरुष’ शब्द की आवृत्ति को पूरी ताक़त, पूरी घृणा के साथ निकाल फेंकना चाहा। सफलता न मिली। चादर सिर तक ओढ़ ली। चादर ने कवच का काम किया।

उर्मि याद करने लगी कि वह इतनी निश्चिंत, सुरक्षित कभी थी? पापा जब जीवित थे तब ऐसी ही उन्मुक्त, बिन्दास रहा करती थी। राजीव की चादर से उसे सुरक्षा, विश्वास और निश्चिंता की बशारत मिल गई थी।

कुछ दिनों पहले पढ़ी एक कविता की पंक्तियां उसे याद हो आईं। मरीना त्स्वेतायेना की ये पंक्ति ख़ासकर ‘‘काश! मैं तुम्हारे साथ रहती...!’’

वह न जाने कब तक बेसुध पड़ी रहती, तभी एकदम से उठी एक मर्दानी आवाज़ से उसका स्वप्न भग हुआ।

--‘राजीव बाबू का मकान यही है न?’’

उसे याद आया कि मकान का मुख्य द्वार तो उसने बंद किया ही नहीं था। वह हड़बड़ाकर उठ बैठी। देखा एक अधेड़ सज्जन साश्चर्य उसे निहार रहे हैं। एक दूसरा व्यक्ति भी है जो मुख्य-द्वार के बाहर खड़ा है। उसके हाथ में अटैची है। उसने सोचा हो-न-हो, ये लोग राजीव के रिश्तेदार होंगे। उसे शर्म आने लगी लेकिन शर्मा जाने से काम तो बनता नहीं। अधेड़ व्यक्ति ने पुनः पूछा। उर्मि ‘हां’ के इशारे से सिर को हिला दिया।

अधेड़ अकबकाया --‘‘वह तो अकेले ही रहता है न?’’

उर्मि तब तक उठ खड़ी हुई थी। इस प्रश्न को अनसुना कर दिया।

अधेड़--‘‘आपको पहले नहीं देखा, आप कौन हैं?’’

उर्मि चिढ़ गई। वह जानती थी कि आज वह ऐसी फंसी है कि हजारों सवाल उठ सकते हैं। वह अगर जवाब देने लग गई तो बात बेमतलब बढ़ती चली जाएगी। अतः पटाक्षेप की गर्ज से कहा--‘‘ राजीव जी अपने एक दोस्त की शादी में गए हैं। शाम चार बजे तक आ जाएंगे। आप लोग रहना चाहें तो यहीं आराम करें। मेरा मकान बगल में है।’’

अधेड़ आदमी ताव में आ गया। लगा कि उर्मि को खा जाएगा। तभी बाहर खड़े सज्जन भी अंदर आ गए।

--‘‘का हो बनवारी लाल जी, आपके भतिजवा का यही मकान है?’’

अधेड़ सज्जन, जिनका नाम बनवारी लाल था, हड़बड़ा गए।

--‘‘नहीं समधी साहब...।’’

--‘‘भई, एडरेसवा तो यही बताया था न आपने?

--‘‘हां, नहीं..’’ बनवारी लाल अकबकाए। फिर बात बदल दी। ‘‘मकान यही था लेकिन ई मेम साहब बता रही हैं कि उसने मकान बदल लिया है।’’

--‘‘तब तो भाई...मुसीबत हुई। आजई हम्मैं वापस भी लौटना है।’’

समधी साहेब ने चिंता जाहिर की।

--‘‘अइसा है समधी साहेब, आप हमारे घर चलकर आराम करें। हम एक राउंड घूम कर, राजीव को साथ लेकर आते हैं। बातचीत की शुरूआत तो कम से कम हो जाए।’’

बनवारी लाल को राह दिखलाई दी। समधी पंचम राय साहेब अटैची लिए बाहर निकल गए।

बनवारी लाल ने लगभग धमकाते हुए उर्मि से चंद बातें कीं। --‘‘मैं राजीव का चाचा हूं। इसी शहर में रहता हूं समझी। अभी तो किसी तरह बात बन गई। राजीव जैसे लौट कर आए तो उसे मेरे बारे में बता देना और कह देना कि भाई पंचम राज जी अपनी बेटी का रिश्ता लेकर आए हैं।’’

पुनः दांत पीसकर कहा उन्होंने--‘‘तुम जो भी हो...राजीव के भविष्य से मत खेलो। अनाथ है वह। हम ही उसके अभिभावक हैं। पंचम राय जी की इकलौती बेटी है। घरजमाई बनेगा राजीव और जिन्दगी भर ऐश करेगा। ई क्लर्की में का रक्खा है। समझा देना उसे। तुम उसके रास्ते में न आना।’’

चाचा बनवारी लाल चले गए। बाऊंड्री-गेट बंद होने की आवाज़ आई। उर्मि रूआंसी हो गई। अपमान और शर्म से वह धरती में समा जाना चाहती थी। राजीव से क्या बताएगी, कैसे बताएगी। उसे इतनी देर मकान में रुकना नहीं चाहिए था। किताबें लेकर तुरंत लौट जाती तो यह दुर्गति न होती। जाने क्या-क्या सोच गढ़ लिया होगा चाचा बनवारी लाल ने।

उर्मि उस घड़ी को कोसने लगी, जब उसने राजीव के मकान की चाभी थामी थी। उसके पैर कांप रहे थे। कटे पेड़ की तरह पुनः बिस्तर पर गिर पड़ी। वह रो रही थी। राजीव के लिए उत्पन्न हुई इस अपमानजनक स्थिति के लिए वह स्वयं को ज़िम्मेदार मान रही थी।

*****

राजीव बेहद शांत मुद्रा में चाचा बनवारी लाल और पंचम राय जी के सामने बैठा था। चाची पर्दे के पीछे बैठी थी। उसका मुंह अंदर की तरफ था, पंचम राय जी की पीठ उधर थी। चाची कभी-कभी पर्दा हलका सा हटा कर बाहर का जायज़ा लिया करतीं। छोटी सी बैठकी थी, जिसमें बैठकी जैसी कोई ठसक न थी। फूहड़ सा लग रहा था सब कुछ, अटपटा! सुरुचि-सम्पन्नता से धूल भी फूल का स्थान ग्रहण कर सकता है, वरना कीमती सोफा, दीवान, रंगीन टीवी सब गोदाम की शक्ल में ठूँस-ठूँस कर भर दिये जाते हैं। यह कमरा भी इसी तरह था। चचेरा भाई ‘नमस्ते’ करता आया। लाईट ऑन किया। रोशनी में चीज़ें और साफ दिखीं। पंचम राय और चाचा ने ट्यूब लाईट को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

शाम अब क़ायदे से घिर आई थी।

पंचम राय जी पान चबाते हुए अपने विधायक भाई की वीर-गाथा का बखान पेले जा रहे थे, भले से कोई सुने या न सुने। चाचा उनकी हां में हां मिला रहे थे।

अब पंचम राज जी बात घुमाकर बनवारी चाचा के बड़े भाई साहब ‘मास्साब’ अर्थात राजीव के पिता की तरफ ले गए। --‘‘बनवारी लाल जी, बड़े भाई साहब भी गज़ब के आदमी थे। विधायक जी तमाम चिरौरी कर देखे कि मास्साब उनके बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दें, लेकिन मास्साब टस-से-मस न हुए। बोले कि बच्चों से कह दें, जो पाठ समझ में न आए स्कूल में ही पूछ लिया करें। उसूल के बड़े पक्के थे मास्साब। आज के युग में भला ऐसी ईमानदारी किसी मास्टर में दिखी?’’

चाचा--‘‘नहीं समधी साहेब, मास्साब देवता थे देवता।’’

राजीव इस बनावटी बातचीत से आजिज़ आ गया था। मास्साब की मृत्यु के बाद राजीव की मां को उस गांव घर में कितना अपमान सहना पड़ा और तकलीफ़ें उठानी पड़ी थीं। चाचा-चाची की प्रताड़ना मां सह न पाई थी। शीघ्र ही वह चल बसीं। पूरी सम्पत्ति पर चाचा ने क़ब्ज़ा कर लिया। विधायक जी ने भी चाचा का पक्ष लिया। राजीव निराश्रित हो गया था। ज़िद में आकर गांव में सब कुछ छोड़-छाड़ कर वह शहर आ गया। ट्यूशनें कीं। अध्ययन पूरा किया कि भाग्यवश बैंक में नौकरी मिल गई। चाचा से तो उसे बचपन से घृणा थी। वह तो उर्मि की पोजीशन स्पष्ट करनी थी, वरना वह उनके घर कभी न जाता। नफ़रत और बदले की आग राजीव के ज़ेहन में सुलग उठी। वह अब और वहां बैठना नहीं चाहता था। चाचा उसका मंतव्य भांप गए। उसका हाथ पकड़कर अंदर ले गए। चाची वहां से हट गई। चाचा समझाने लगे— ‘‘राजीव, बीती बातें बिसार दो। मास्साब वाली ग़लती मत कर बैठना। विधायक जी के भाई पंचम राय जी की इकलौती बेटी है। दसवां पास है लड़की, गुणवान है, सुन्दर है, मान लो साक्षात लक्ष्मी जी स्वयं चल कर आई हैं, इस रिश्ते को ठुकराना मत। लाखों की जमीन उपज है। ई क्लर्की में आखिर रखा ही क्या है? ऐश करोगे ऐश।’’

राजीव चुपचाप सुनता रहा।

--‘‘विधायक जी से रिश्ता बन जाएगा तो अपना भी भला होगा। तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मैं एक गबन के मामले में पिछले डेढ़ महीने से सस्पेंड हूं। विधायक जी चाह लेंगे तो मेरा भी उद्धार हो जाएगा।

राजीव उठ खड़ा हुआ। वह जाना चाहता था। बहुत हो चुका।

चाचा बिफर पड़े--‘‘क्या सोचते हो तुम...क्या तुम्हीं एकमात्र लड़के हो...अरे ये तो मास्साब की ईमानदारी का ईनाम था जो तुम्हें मिलने जा रहा है। ऐंठो नहीं। मुझे मालूम है सब कुछ। पराई लड़कियां तुम्हारे घर घुसी रहती हैं। कितनी मुश्किल से तुम्हारी इज्ज़त बचाई है। किसलिए कर रहा हूं यह सब मैं...तुम्हारे लिए ही न!’’

राजीव आश्वस्त हुआ। चाचा ने सज्जनता का लबादा उतारा तो सही। उनके इसी रूप को तो वह पहचानता था। कफ़नचोर, घृणित व्यक्तित्व। राजीव तेजी से बाहर उस घर से बाहर निकल गया। पंचम राय कुछ समझ न पाए। बाहर आकर राजीव ने सड़क पर ढेर सारा थूक फेंका, जैसे भीतर का सारा ज़हर बाहर फेंक रहा हो।

*****

उर्मि चाय बना रही थी। बैठक में राजीव बैठा था साधिकार। पहली बार उर्मि बहुत खुश थी। राजीव सिगरेट पी रहा था। चाय लेकर उर्मि बैठक में आई।

बीनू को अंदर कमरे में पढ़ने भेज दिया। बीनू किताब कॉपी समेटे अंदर चला गया।

चाय पीते राजीव ने पूछा--‘‘उर्मि ...तुम्हें मरीना त्स्वेताएना की कविताएं बहुत पसंद हैं न।’’ उर्मि झेंप गई। मरीना की कविता की पुस्तिका वह लौटाई जो न थी। राजीव को गौर से देखा।

राजीव--‘‘उसकी कोई कविता पढ़ो न!’’

उर्मि किताब ले आई और अपनी पसंदीदा कविता पढ़ने लगी।

‘‘काश! मैं तुम्हारे साथ रहती
एक छोटे से क़स्बे में
जहां होती गोधूली में डूबी शामें
और गूंजती शाश्वत घण्टियों की टन्...टन्।’’

कविता के शब्द तितलियों की मानिंद पूरे कमरे में विचरण करने लगे। कविता पाठ करती उर्मि का स्वर भावपूर्ण था।

‘‘जानती हो उर्मि! मरीना ने सुसाईड किया था, खुदकुशी।’’

उर्मि सिहर उठी।

‘‘लेकिन अब कोई मरीना आत्महत्या नहीं करेगी।’’ राजीव की आवाज़ ऐसी लगी जैसे कोई युग-पुरुष किसी पहाड़ी की चोटी से घोषणा कर रहा हो। राजीव की आवाज़ उसके शरीर-मन में गूंजती रही। उसे अच्छा लगा। उसने एक स्वप्न देखा... एक छोटा सा क़स्बा, गोधूली, शाम और घण्टियों की टुनटुनाहट....वह मंत्रमुग्ध थी।

कविता को आगे पढ़ा-

‘‘कमरे के बीचों-बीच होती एक अंगीठी
जिसके प्रत्येक पत्थर पर एक डिज़ाइन होता
एक गुलाब, एक दिल, एक जहाज़
और एकमात्र खिड़की से झांकती
बर्फ़...बर्फ़....बर्फ़...।’’

राजीव ने सिगरेट का गहरा कश खींच कर धुंए का एक बादल बनाना चाहा। उस धुंए की ओट में उर्मि ने झिलमिलाता सा दृश्य देखा....गुलाब के फूलों की नदी में तैरती एक बर्फीली नाव।

‘‘तुम उसी मुद्रा में लेटे हुए होते
जिसे मैं प्यार करती हूं...अलसाए
खोए-खोए और बेपरवाह।’’

राजीव ने उर्मि को देखा, उर्मि ने राजीव को। शायद उनके बीच निगाहों की यह पहली बातचीत थी।

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