जीजिविषा मात्र शब्द नहीं (कहानी): मंगला रामचंद्रन
Jijivisha Matra Shabd Nahin (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran
अखबार में फिर उसी तरह की खबर देख कर केकरे सर दुखी और गंभीर हो गये। जिस सोच के तहत उन्होंने स्कूल की नौकरी ली थी उस उद्देश्य को पूरा न करने का दुख उन्हें कातर कर रहा था। गणित में पी.एच.डी. थे और विश्वविद्यालय में उन्हें आसानी से व्याख्याता का पद मिल सकता था। पर उन्हें तो स्कूल के छोटे और किशोर बच्चों के साथ मिल कर अपने लक्ष्य को पाना था। जब सुधीर दसवीं कक्षा में पढ़ता था, सुधीर केकरे, उसके सबसे करीबी, प्रिय मित्र ने परीक्षा में असफल होने पर ट्रेन के नीचे आकर आत्महत्या कर ली। महेन्द्र के इस कदम से सुधीर टूट गया था और उसे अपने आप को संतुलित करने में बहुत वक्त लगा था। सुधीर कक्षा का होनहार छात्र था और गणित में तो कक्षा का श्रेष्ठतम् विद्यार्थी था। महेन्द्र पढ़ाई में कमज़ोर ही था, खास कर गणित में। सुधीर उसकी पूरी तरह मदद करता था और परीक्षा में पास होने लायक तैयार कर देता था। पर दसवीं में वो पास होने लायक नंबर भी नहीं ला पाया।
सुधीर को असफल छात्रों का ऐसा रास्ता चुनना दुखी से भी ज्यादा गुस्सा दिलाता था। वो सोचते कि एक समूचा जीवन मात्र एक असफलता से हार मान जाये बिना ये सोचे समझे कि उसके जन्मदाताओं और करीबियों पर असर पड़ेगा! शिक्षा मात्र अलग-अलग पीरियड में अलग-अलग विषयों की पढ़ाई ही है क्या ? शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तो ये होना चाहिए कि बच्चे एक सार्थक, सही दिशा में सोचें और घर-परिवार, समाज के लिए उपयोगी ईकाई बन सकें। छोटी-छोटी असफलता तो एक तरह से भविष्य की सफलता की राह बनाती हैं। गुबार की तरह एक गहरी सांस बाहर छोड़ी और अखबार को पटक दिया। उन्हें तैयार होना है और स्कूल भी जाना है।
प्रमिला अपने पति की मनोस्थिति को बहुत अच्छे से समझती थी। जब कोई परीचित-अपरिचित या मात्र खबरों में ही पढ़-सुन कर उन्हें इतनी ठेस पहुँचती, मानों उन्हीं की गलती है कि वो इन हादसों को रोक नहीं पा रहे हैं। अनमने मन से खाना खाते हुए पति को तसल्ली देते हुए बोली - ‘दुनिया में हो रही हर आत्म-हत्या के लिए आप जिम्मेदारी नहीं ले सकते। यूं ही स्वयं पर लानत भेज कर खुद भी नैराश्य के भंवर में फंस जायेगें।‘
‘’पता नहीं मेरी हालत का अंजाम क्या होगा, पर जो बात मेरे दिल और दिमाग पर बार-बार दस्तक देती है उसे अनसुनी कैसे करूँ ? ये बताओ प्रमिला ये बच्चे सही में अपने हालातों से इतने तंग आ जाते होगें कि इनकी जीने की इच्छा ही खत्म हो जाये ? ऐसे तो जीजिविषा शब्द मात्र शब्दकोष में दफन हो जायेगा। इतना सुंदर, लालित्य पूर्ण शब्द जिसको जीवन का मूलमंत्र मान कर पल्लवित और पोषित करना चाहिए और देखो क्या माजक बना दिया।‘
वाक्य के अंत तक आते-आते उनके चेहरे पर आये निराशा के भाव प्रमिला को रोने को मजबूर कर रही थी। पर एक पढ़ लिखी विदुषी महिला की तरह उसे धैर्य और साहस का परिचय देना होगा। वरना सुधीर का सपना, सुधीर की तपस्या अपने उददेश्य तक कैसे पहुँचेगी ?
प्रमिला सुधीर से पहली बार इंटर कॉलेज परिसंवाद प्रतियोगिता में मिली थी। मंच पर वो प्रथम घोषित हुई थी पर सुधीर को विषय पर आधिकारिक रूप व्यावहारिक ज्ञान अधिक था। विषय था ‘किशोरों में डिप्रेशन और आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े’
जिन्होंने भुगते हुए लोगों को पास से देखा है या जो भुक्तभोगी का करीबी रहा हो तो स्वाभाविक था कि विषय को अधिक संवेदनशील होकर समझा होगा। वरना तो गूगल और विकिपीडिया पर एक क्लिक पर सारी जानकारी मिल जाती है। प्रमिला ने भी वहीं से आंकड़ों के साथ जानकारी जुटाई थी। अपने कथन की समाप्ति उसने इंडोनेशिया के यूनिवर्सिटी ब्राविजया की हेनीडी विंडरवाटी के कथन से की – ‘दूसरों से प्यार करना जरूरी है पर स्वयं से प्यार करना बहादुरी है। किसी और के लिए लड़ने से पहले खुद के लिए लड़ना होगा।‘
कार्यक्रम के अंत में चाय-पान के दौरान सुधीर ने प्रमिला को प्रथम स्थान पर रहने की बधाई दी। प्रमिला संकोच से बोली – ‘आपको भले ही तृतीय स्थान मिला पर असली हकदार तो आप हैं , प्रथम स्थान के ।‘
’वो कैसे ?’ – सुधीर ने प्रमिला के चेहरे पर ध्यान से देखते हुए पूछा कि कहीं मजाक तो नहीं उड़ा रही है।
‘आप जिस तरह संवेदशीलता से विषय की गहरार्इ में जाकर कारण, खतरों का विवरण और साथ में हल भी सुझा रहे थे, उसन विषय की गंभीरता को उभार दिया।‘
‘आपको ऐसा लगा यह मेरे लिए बहुत हैा मुझे तो इसी क्षेत्र में आगे भी कुछ करना हैा नहीं-नहीं , डॉक्टरेट वगैरह नहीं, बल्कि ठोस कार्य जिससे डिप्रेशन और आत्महत्या की प्रवृत्ति पर रोक लग सके।‘ --- सुधीर उत्साह से भर गया, मानों अपने विचारों को कार्यरूप में परिणत करने की आशा जाग गई हो।
‘आपने जिस आख्यान के बारे में जिक्र किया था क्या वो सही में हुआ होगा ? बहुत दिलचस्प था।
‘एक बिंदु या विषय पर अलग-अलग लेखक अपने विचार रखते हैं। उक्त लेखक का कहना था कि अगर गुरू द्रोणाचार्य सुयोधन को सदा टोकते नहीं रहते तो महाभारत का सार ही बदल जाता। अगर कुंती द्रोण को पांडवों के राज्य में आचार्य पद का लालच नहीं देती तो शायद द्रोण का व्यवहार अलग होता। सुयोधन जो कि सभी राजकुमारों में सबसे सुंदर दर्शनीय था, कोमल उदार का था। उसे नीचा दिखाने के चक्कर में उसमें कुंठा भर दी और वो सुयोधन से दुर्योधन हो गया।‘
‘ओह!‘ - प्रमिला आशा से उस पर आंख गड़ाये हुए थी कि आगे कुछ बोलने वाला है। सही में सुधीर अनजाने में प्रमिला से खुल गया -- ‘बच्चों की आपस में तुलना करना, किसी भी बच्चे को कूपमंडूक या गलत नाम देकर छोटा या कमतर महसूस कराना गलत ही तो है। हीन भावना और निराशा ऐसे ही तो मन मे घर कर जाती है।‘
दो क्षण थम कर उदास स्वरों में बोला - ‘स्कूल में हमारे शिक्षकों के असंवेदनशील व्यवहार से ही तो मैंने अपना सबसे प्यारे दोस्त महेन्द्र को खोया।‘
धीरे-धीरे वो दोनों फोन पर लंबी-लंबी बातचीत में अपने विचारों का आदान-प्रदान करने लगे। दोनों में एक सुंदर-दोस्ताना रिश्ता कायम हो गया। उसके विचारों से प्रमिला इतनी प्रभावित हुई कि उसने मन ही मन तय कर लिया कि उसे सुधीर की इस तपस्या और हवन में पूरे मन से साथ देना होगा। दोनों के विषय और कॉलेज अलग-अलग थे, पर इस बिंदु पर समान रूप से सहमत और प्रतिबद्ध थे।
सुधीर ने पी.एच.डी कर ली थी और तय किये अनुसार स्कूल में ही शिक्षक बन गया। प्रमिला बैंक में नौकरी करने लगी। सुधीर के वृद्धा मां को अपनी इस इकलौती बावले संतान की चिन्ता बनी रहती थी। अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जूनून के आगे सुधीर सर को कुछ और सूझता ही नहीं था। प्रमिला को भी उनकी इसीलिए चिंता होती थी कि वो स्वयं की ओर से एकदम बेफिक्र थे। उनकी मां की इच्छा यही थी कि प्रमिला उनकी बहू बन कर आ जाये, पर बेटा मौका ही नहीं देता था कि वो खुल कर बात कर पायें। पहल प्रमिला की ओर से ही हुई। भले ही वो उनकी पत्नी बन कर उस घर में आई पर उसके मने में उनके प्रति एक ममतामयी भावना भी थी। वर्तमान युग में इतने ईमानदार और उद्देश्यों से बंधे होने पर अव्यावहारिक होने का ठप्पा तो लगेगा ही। प्रमिला उनको अपना पूरा-पूरा सहयोग सुरक्षात्मक तरीके से करना चाहती थी।
सुधीर सर बच्चों को रोचक तरीके से गणित सिखाते थे जिससे बच्चे उनकी कक्षा को कभी ‘मिस’ नहीं करते थे। प्रतिदिन पांच मिनट बच्चों से उनकी परेशानियों के बारे में बातें करते पढ़ाई के अलावा घर की आर्थिक स्थ्िाति या स्कूल आते जाते कोई परेशानी होती हो याने बच्चे अपनी छोटी-बड़ी सारी परेशानी बिना संकोच के उनसे साझा कर लेते थे। सुधीर सर को हमेशा लगता रहता था कि छात्रों को घर और स्कूल दोनों जगह अपनापन मिलना चाहिये। घर पर माता-पिता और घर के अन्य सदस्यों के साथ संवाद होते रहना चाहिए और स्कूल में शिक्षकों से बिना भय के संवाद होना चाहिए इससे उनके अंदर पाजि़टिविटी आती है और इन दो ‘सपोर्ट’ से वो नैराश्य की ओर नहीं जाते हैं।
एक दिन प्रमिला अनमनी सी बहुत खराब मनस्थिति में थी। सुधीर ने उसके चेहरे के भाव देखकर कारण पूछा तो दुखी स्वरों में रोष से बोली – ‘मेरे कलीग की पन्द्रह वर्षीय बेटी ने चौथी मंजिल से कूद कर आत्महत्या करने की कोशिश की। अब ये नहीं पता कि आगे सही सलामत कुछ करने योग्य रहेगी या सब पर भार बन कर रहेगी।'
सुधीर का मन खराब हो गया, दुखी स्वर में बोला – ‘जो उम्र सबसे अधिक क्रियाशील रहते हुए उपलब्धि पाने और सफलता तक पहुँचाने की होती है, उसी का सर्वनाश हो जाता है। अपने आप को दुस्साहस या गलत साहस के लिए तैयार कर लेते हैं, पर अच्छे या सही काम के लिए उसके दस प्रतिशत का प्रयास भी नहीं करते हैं। मैं तो कहूँगा ये सब कायर हैं, मेहनत और कोशिश करने से बचते हैं।'
‘वही तो ! अब इस नीतू और उसके परिवार की हालत का क्या करें ? सिर्फ तसल्ली देने से तो कुछ सुधरने वाली है नहीं।'
‘सच कहूँ तो बहुत बार इन बच्चों पर गुस्सा आता है कि आगे-पीछे कुछ नहीं सोचते। ना माता-पिता का ना घर के दूसरे सदस्यों को, बस स्वयं की कोई इच्छा पूरी ना होना ऐसे कदम उठाने का बायस बन जाता है।'
‘पंद्रह वर्ष में तो बचपन भी पूरी तरह नहीं जा पाता और ये प्यार में धोखा खाकर जान देने चलीं।'
‘क्या ? ' – सुधीर सर चौंक उठे और जोर से बोल पड़े।
’और क्या, ‘आई लव यू’ तो जुमला बन कर रह गया। अंग्रेजी ना सीखने या ग्रेस से पास करने के लिए लड़ मरते हैं, पर इस वाक्य को ऐसे बोलते हैं मानों लंदन से सीधे आ रहें हों। यही नहीं अंग्रेजी के जिन शब्दों से परहेज करना चाहिये उन्हें भी खुलकर, बिना संकोच मुख श्री से बिखेरते रहते हैं।' – प्रमिला का क्रोध और खीझ कम नहीं हो रही थी।
‘इसीलिए तो चाहता हूँ कि बच्चे अपना दिल खोलकर बात कर पायें। घर पर माता-पिता और स्कूल में शिक्षक नहीं सुनेगें तो और कौन सुनेगा ! हर पीरियड में रोज पांच मिनट बच्चों को सुनने के लिए ही देता हूँ। जब लंबी बातचीत होनी हो तो बीच के अवकाश या कक्षा के बाद बच्चे स्वयं आकर मिलने लगे हैं। बच्चों में साहस और संघर्ष करने का जज्बा भी बढ़ गया है।' – उनके आवाज़ की खुशी और उत्साह प्रमिला के अंतस को भी छू रहे थे।
सुधीर की मां प्रमिला को बहू के रूप में पाकर प्रसन्न थी ही, अब पोता पाकर तो निहाल ही हो गई। उसका नाम दादी ने ही रखा, स्वामी विवेकानंद के नाम पर । उनका कहना था कि विवेकशील दम्पति के बेटे का नाम विवेक ही हो सकता है। विवेक के सातवें जन्म दिन के साथ ही जनेऊ की रस्म भी हो गई । दादी तो खुशी की पेंगें ले रही थी। दो वर्ष बाद उनकी प्राकृतिक म़ृत्यु इस तरह हुई मानों उनके जीवन के सारे उद्देश्य पूरे हो गये हों। अंतिम दर्शन करने आने वाले उनके चेहरे पर छाई अद्वितिय शांति और आभा को देखकर ही अभिभूत हो रहे थे।
जीवन एक बंधे हुए रफ्तार मे सुचारू रूप से चल रहा था। इसका पूरा श्रेय सुधीर सर प्रमिला को देते थे, जिसने कई बार प्रमोशन लेने से नकार दिया। वो अच्छे से जानती थी कि प्रमोशन मात्र उसके अहं की तुष्टि ही हो सकती है। वरना किसी और शहर में तबादला हो जाये तो न जाने कितना कुछ बिखर जायेगा।
सुधीर सर बच्चों के तो सलाहकार थे ही, अब उनके अभिभावक भी उनसे बच्चों से संबंधित सलाह लेने आने लगे। सर की दो बातों से तो छात्र और उनके माता-पिता बहुत प्रभावित हो गये। ‘असफल होना बुरी बात नहीं है क्योंकि वही सफलता की, अनुभवों की पहली सीढ़ी है। शरीर और मन दोनों का ही स्वस्थ और तंदुरुस्त रहना जरूरी है तभी संघर्ष करने की ताकत अपने आप मिल जायेगी।'
अब तक विवेक बड़ी कक्षा में आ गया था। पिता की तरह गणित में वो सर्वश्रेष्ठ था। पर फिर भी सुधीर सर ने उसी पर विषय चुनने का दायित्व सौंप दिया था। उसके साथ बैठ कर आराम से चर्चा करना, उसकी राय लेना, उसके शौक और रुझान और भविष्य की योजनाओं पर तीनों सहज रुप से बात करते। इस दम्पति के इसी रुख से विवेक उनसे बहुत प्रसन्न भी था और बहुत आदर भी करता था। कई बार विवेक अपने किसी मित्र के अभिभावक को सही सलाह देने या कोई बिंदु समझाने के लिए भी कहा करता था।
बेटे से अपने काम के लिए प्रशंसा पाने से सुधीर सर का उत्साह चौगुना हो गया।
स्कूल के बच्चों में एक आशाजनक परिवर्तन आने लगा था। बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था, संघर्ष करने और आशावादी सोच का विकास भी हुआ था। पर अखबारों में ऐसी खबरें आती ही थीं। जिससे सुधीर सर उदास हो जाया करते थे और चाहते थे कि उनके उद्देश्य को एक विशाल यज्ञ में परिवर्तित करने के लिए क्या करें। उन्होंने निर्मल ह्रदय और शुद्ध मन से ही सोचा होगा तभी तो इसके लिए मौका खुद ब खुद उनकों ढूँढ़ते हुए आ गया। मानों उनकी निस्वार्थ सेवा और निष्ठा को एक विशाल फलक मिल गया हो।
स्कूल के प्रिंसीपल अपने साथ दो व्यक्तियों को साथ लेकर अचानक घर आ गये। उन्होंने क्षमा याचना के साथ कहा – ‘मुझे मिलने से पहले समय ले लेना था, पर उत्साह में और कुछ समय की कमी के कारण इन लोगों को मिलवाने तुरंत ही लेकर आ गया।'
‘नहीं-नहीं’ सर ऐसा कुछ भी नहीं है, आपके लिये कोई औपचारिकता थोड़ी है, आप कभी भी आ सकते हैं।' – सुधीर सर नम्रता से बोले।
‘सुधीर, आप ना सिर्फ हमारे स्कूल के लिए बल्कि इस शहर के लिए भी मूल्यवान संपत्ति हैं। ये दो नौजवान संदीप और आमीर हैं और इन्होंने मनोविज्ञान में पी.एच.डी. की है। आपसे मिलने स्कूल समय में आने वाले थे पर किसी कारणवश स्कूल पहुँचते देर हो गई, सो अब यहीं आ गये।'
सुधीर सर को अभी तक उनका आशय ठीक से समझ नहीं आ रहा था कि उनसे क्यों मिलना चाह रहे थे। वो संकोच और कुछ अज्ञात भय से पसीने-पसीने हो रहे थे।
तभी उनमें से एक युवक बोला – ‘सर, हम आपकी बहुत इज्जत करते हैं और आपके नेक उद़देश्य के बारे में भी जानते हैं। निस्वार्थ भाव से अपने कीमती समय में से अपने इतने लंबे समय में अनगिनत बच्चों का जीवन संवारा है। हम ही नहीं पूरा शहर चाहता है कि आपका सार्वजनिक रूप से अभिनंदन समारोह हो। बस आपका एक ‘हां’ सुन ले बस, फिर कार्यक्रम की तैयारी कर लेगें।'
‘अरे नहीं-नहीं, मैं ये सब नहीं कर सकता, मैंने तो वो किया जो मुझे अच्छा लगा और ठीक लगा। अपना उद़देश्य पूरा करना है और अभी तो उसमे इतना कुछ करना बाकी है। .......
बेचारे सुधीर सर हड़बड़ा कर अपनी बात भी ठीक से नहीं रख पा रहे थे।
दूसरा युवक कहने लगा – ‘इसे हमारा स्वार्थ समझ लीजिये। हम दोनों ने आपके कामों से उत्साहित होकर चाइल्ड सायकोलॉजी में स्पेशलाइज़्ड किया। सोचा था आपको सलाहकार के रूप मे पदस्थ कर दोनों अलग- अलग संस्थान खोलगें। हम तो उसे क्लिनिक नाम भी नहीं देने वाले हैं। जिससे लोग बिदकते हैं।'
प्रिसिंपल सर ने भी बड़े प्रेम पूर्वक कहा – ‘सुधीर, इन्होंने अपनी योजना जो मुझे बताई उससे बड़े पैमाने पर बच्चों का लाभ होगा। परोक्ष रूप से तो अभिभावकों और परिवारों को ही तो फायदा होगा। फिर भी अपने मन की तसल्ली के लिए पूरी योजना को तफसील से एक बार जान बिना ना मत करना।'
‘जी सुनूँगा, पर प्रमिला को भी इसमें शामिल करना होगा। जो भी कुछ इस क्षेत्र में या दिशा में कर पाया सिर्फ और सिर्फ उसके किये गये त्याग और एक मजबूत पहाड़ की तरह का सहारा देने के कारण। उसकी सोच और निर्णय लेने की क्षमता अद्भूत है।' कहते-कहते उन्होंने प्रमिला को आवाज़ दी। उनकी आवाज़ देने की शैली से कोई भी समझ सकता है कि अपनी पत्नी को प्रेम ही नहीं करते सम्मान भी करते हैं।
दोनों युवकों ने विस्तार से पूरी योजना बताई। प्रमिलाजी और सुधीर सर को सबसे अच्छी बात जो लगी वो थी संस्थाओं के नाम में मनोवैज्ञानिक क्लिनिक या सायकोलॉजिकल कन्सलटेन्सी नहीं थी। अक्सर लोग ऐसे नामों से थोड़ा बचते हैं और आकर बात करने मे झिझकते हैं कि लोग उन्हें दिमागी तौर पर ठीक ना होने का तमगा न लगा दें। संदीप और आमीर ने संस्था का नाम सोचा था ‘जिजीविषा संस्था’ जो एकदम उचित और सटीक था। संस्था को रजिस्टर्ड करके इसकी शाखाओं का विस्तार करने की योजना भी थी। इसके अलावा हर बच्चे का एप्टिट्यूड टेस्ट, उसकी रूचि, अभिभावक की आर्थिक स्थ्िाति आदि सारी जानकारियां कम्प्यूटर में फाईल में दर्ज रहेंगी। इससे भविष्य में बच्चे को किसी तरह की मदद करना आसान हो सकता है। खास बात यही है कि माहौल ऐसा होगा कि बच्चा खुलकर अपनी समस्या और मन में उठते प्रश्नों को साझा करने में संकोच नहीं करेगा।
सुधीर सर ने एक मुक्त लंबी सांस ली मानों किसी समस्या से आज़ादी मिली हो। उनका चेहरा प्रसन्नचित्त था और उन्होंने प्रमिला की ओर जैसे ही देखा तो उसके चेहरे पर फैली मुस्कान और आंखे देखकर समझ गये कि वो भी आश्वस्त है। फिर भी उन्होंने उसकी राय जानना चाही।
संदीप और आमिर ने सुधीर सर, प्रमिला और प्रिंसीपल सर के चरण स्पर्श किये और नई शुरूआत के लिए आशीर्वाद लिया। फिर जैसे ही आमिर ने कहा – ‘सर आप अपनी सुविधा बताइये उसी अनुसार अभिनंदन का कार्यक्रम रखेगें।'
‘ऐसा करो, पूरे साल भर तुम्हारी परीक्षा होगी। तुम दोनों कितना अच्छा काम करते हो, अपने उद्देश्य में कहॉं तक सफल होते हो ये देखने के बाद ही बाकी बातें करेगें – सुधीर सर की निश्चय से भरी आवाज़ के बाद सबको सक्रिय होकर कार्य पर लगना ही था।
संदीप ने कुछ शरारत और कुछ गंभीरता से कहा – ‘आप तो समाज सेवा के तौर पर इस महत्ती कार्य को करते आ रहे हैं। पर हमें अपना परिवार चलाना, दुकान का किराया देना और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने के लिए यंत्र और अन्य खर्चों का भी हिसाब करना होगा। सो सबसे फीस ली जायेगी जो उसकी आर्थिक स्थिति के हिसाब से तय होगी। पर विश्वास रखिए कि सिर्फ पैसों के पीछे भाग कर या पैसों के लालच में कुछ भी गलत नहीं होगा। अंत में बच्चों को लाभ ही मिलेगा।
सर ने हंसत हुए सिर स्वीकृति में हिलाया।