Jarul: Lok-Katha (Maharashtra)

जारूल: लोक-कथा (महाराष्ट्र)

एक गाँव में एक धनी किसान रहता था। किसान बड़ा नेक, ईमानदार और मेहनती था। वह प्रतिदिन नियम से अपने खेतों पर जाता और दिनभर काम करता | उसके पास खेती की बहुत जमीन थी। इस पर उसके सेवक खेती करते थे। किसान अपने सेवकों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करता था और सुख-दुख में उनका साथ देता था। अतः उसके सेवकों के साथ ही गाँव के अन्य लोग भी उसका बहुत सम्मान करते थे। किसान बड़ा न्यायप्रिय भी था। गाँव में जब कभी पंचायत होती थी, तो गाँववाले किसान को ही सरपंच बनाते थे।

धनी किसान के एक बेटा था-जारूल। जारूल बहुत सुन्दर और हष्ट-पुष्ट शरीरवाला था। उसका रंग गोरा, सीना चौड़ा और पूरा शरीर कद्दावर था। बीस वर्ष के जारूल पर गाँव की सारी लड़कियाँ मोहित थीं और मन-ही-मन कामना करती थीं कि जारूल उन्हें पति रूप में मिल जाए। इन्हीं लड़कियों में एक थी मोहिनी।

मोहिनी रंग-रूप में तो सुन्दर थी, किन्तु वह बड़ी कर्कशा थी। वह बड़ी जिद्दी लड़की थी और मन में जो कुछ ठान लेती, उसे पूरा करके ही दम लेती थी। मोहिनी कई साल से जारूल पर डोरे डाल रही थी लेकिन जारूल इतना पत्थर दिल था कि उसने मोहिनी की ओर कभी आँखें उठाकर नहीं देखा। मोहिनी तो मोहिनी, जारूल गाँव की किसी भी लड़की पर ध्यान नहीं देता था। उसे एक सुन्दर और शीलवान लड़की की तलाश थी, जो इस गाँव में नहीं थी। जारूल को विश्वास था कि उसकी भेंट उसकी सपनों की रानी से कभी न कभी अवश्य होगी।

मोहिनी जारूल की दीवानी थी। वह किसी तरह जारूल को पा लेना चाहती थी। इसके लिए वह सब कुछ करने को तैयार थी। उसने पहले अपनी आँखों से मादक प्यार छलकाकर जारूल को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया किन्तु जारूल ने उस पर ध्यान नहीं दिया । इसके बाद उसने अपनी सहेलियों से जारूल के पास प्रेम के सन्देश भेजे और उससे एकान्त में मिलने की इच्छा प्रकट की। जारूल ने मोहिनी की सहेलियों की बातें बड़े ध्यान से सुनीं, लेकिन उससे मिलने से स्पष्ट इनकार कर दिया। मोहिनी ने जारूल को लुभाने और उसे अपने प्रेमजाल में फँसाने के इसी प्रकार के बहुत से प्रयास किए, किन्तु उसके सभी प्रयास असफल रहे। एक बार तो मोहिनी ने हद ही कर दी।

जारूल अपने पिता के खेतों से लौट रहा था। शाम हो चुकी थी और रात का अँघेरा तेजी से बढ़ रहा था। जारूल खेत की पगडंडियों पर चलता हुआ तेजी से अपने गाँव की तरफ बढ़ रहा था। उसका गाँव अभी कुछ दूर था। अचानक सुनसान रास्ते पर मोहिनी प्रकट हुई और उससे लिपट गई। उस समय उसने भरपूर श्रृंगार किया था और भड़कीले कपड़े पहने थे।

जारूल घबरा गया। उसने मोहिनी को अपने शरीर से अलग करने का बहुत प्रयास किया, किन्तु मोहिनी थी कि उसे छोड़ ही नहीं रही थी। जारूल उसका एक हाथ अलग करता तो मोहिनी दूसरा हाथ उसकी गर्दन में डाल देती और दूसरा हाथ हटाता तो वह पहले हाथ से उसे जकड़ लेती। मोहिनी की स्थिति पागलों के समान हो रही थी। वह कभी जारूल को चूमने लगती तो कभी उसके शरीर से अपना शरीर रगड़ने लगती। उसकी आँखों से वासना टपक रही थी।

जारूल ने जब देखा कि मोहिनी उसे किसी तरह छोड़ने को तैयार नहीं है तो उसने मोहिनी को अपने से अलग किया और उसे दूर करने के लिए एक जोरदार धक्का दिया। जारूल के धक्के से मोहिनी दूर जा गिरी।

मोहिनी अपने रूप का यह अपमान सहन नहीं कर सकी और उसने उसी समय बदला लेने का निश्चय कर लिया। मोहिनी ने अपने कपड़े फाड़ लिए, बाल बिखेर लिए और जोर-जोर से चिल्लाने लगी। मोहिनी जारूल पर अपनी इज्जत लूटने का आरोप लगा रही थी।

मोहिनी की चीख पुकार सुनकर राह चलते गाँव के कुछ लोग आ गए। सबने मोहिनी के अस्त-व्यस्त फटे कपड़े और उसकी स्थिति देखी तो उन्होंने उसकी बातों पर विश्वास कर लिया। मोहिनी सुन्दर तो थी ही और जारूल भी युवा था। अतः मोहिनी की चाल सफल हो गई।
जारूल किसी से कुछ नहीं बोला और चुपचाप घर आ गया।

रात भर में यह बात पूरे गाँव में फैल गई। गाँव में कुछ लोग ऐसे थे, जो मोहिनी को अच्छी तरह जानते थे। इनमें मोहिनी की सहेलियों के घरवाले भी थे, जिनसे मोहिनी जारूल तक अपने प्रेम सन्देश भिजवाती थी। ये लोग जारूल का पक्ष ले रहे थे। किन्तु मोहिनी ने अपना जाल इस तरह फैलाया था कि गाँव के अधिकतर लोग उसी का पक्ष ले रहे थे और जारूल को भला-बुरा कह रहे थे। यह बात धनी किसान तक भी पहुँच चुकी थी। वह जारूल को अच्छी तरह जानता था, लेकिन वह सीधे-सीधे अपने बेटे की कोई सहायता नहीं कर सकता था।

ऐसे मामलों में हमेशा से जो होता रहा है, वही हुआ और अगले दिन पंचायत बैठ गई। गाँववालों को धनी किसान पर पूरा विश्वास था। बेटे का मामला होते हुए भी उन्होंने धनी किसान को ही सरपंच बनाया।

अगले दिन गाँव के चौपाल पर पंचायत बैठी । इस पंचायत में गाँव के सभी लोग एकत्रित हुए। मामला मोहिनी से जुड़ा हुआ था। अतः गाँव की स्त्रियाँ भी इस पंचायत में बड़ी संख्या में आ गई थीं। पंचायत में एक तख्त पर चार पंच बैठे थे और उनके बीच धनी किसान सरपंच बनकर बैठा था। हमेशा प्रसन्‍न रहनेवाला धनी किसान आज हृदय से दुखी था। वह जानता था कि उसका बेटा जारूल निर्दोष है, लेकिन उसे पंचों की राय के अनुसार न्याय करना था।

पंचों ने सबसे पहले मोहिनी को बुलाया और उससे सारी बातें बताने को कहा। मोहिनी सबसे पीछे बैठी थी। वह अपने स्थान से उठी और पंचों के सामने आकर फफक-फफककर रोने लगी। पंचों ने उसे ढाढ़स बंधाया और न्याय करने का आश्वासन दिया तथा निडर होकर सच्चाई बयान करने को कहा।

मोहिनी कुछ देर चुपचाप खड़ी रही । इसके बाद उसने जारूल की तरफ संकेत करते हुए बताया कि वह शाम को दिशा मैदान से लौट रही थी। रात का अँधेरा धीरे-धीरे बढ़ रहा था। ऐसे में न जाने कहाँ से जारूल आ गया और सुनसान क्षेत्र में अकेला पाकर उसे पकड़ लिया और बुरी नीयत से उसके साथ छेड़खानी करने लगा। उसके मना करने पर वह क्रोधित हो गया और जोर-जबरदस्ती पर उतर आया। उसने उसके कपड़े फाड़ डाले और...। इसके बाद मोहिनी ने आगे की बात जानबूझकर अधूरी छोड़ दी और पुनः सिसकने लगी। उसने सिसकते हुए, उन लोगों के नाम भी बता दिए, जिन्होंने उसे पिछली रात अस्त-व्यस्त हालत में देखा था।

पंचों ने मोहिनी को बैठने के लिए कहा और एक-एक करके उन लोगों को गवाह के रूप में बुलाना आरम्भ किया, जिन्होंने मोहिनी को अस्त-व्यस्त स्थिति में देखा था।

पहले गवाह ने बताया कि पिछले दिन, जब वह अपने खेत से लौट रहा था, तो उसे शाम हो गई थी और रात का अँधेरा बढ़ रहा था। इसी समय उसने देखा कि मोहिनी जमीन पर अस्त-व्यस्त स्थिति में पड़ी थी और चीख-चीखकर जारूल पर इज्जत लूटने का आरोप लगा रही थी। जारूल वहीं पास ही खड़ा था, लेकिन कुछ बोल नहीं रहा था।

पहले गवाह के बाद दूसरे, तीसरे और फिर चौथे गवाह को बुलाया गया। सभी के बयान पहले गवाह के समान थे। सभी ने एक ही बात बताई थी कि मोहिनी अस्त-व्यस्त स्थिति में जमीन पर पड़ी थी और चीख-चीखकर जारूल पर इज्जत लूटने का आरोप लगा रही थी।

अन्त में जारूल को बुलाया गया। वह अधिक कुछ नहीं बोला। उसने बस इतना कहा कि मोहिनी उसके पीछे बहुत दिनों से पड़ी थी। उस दिन मोहिनी सभी हदें पार करते हुए उससे लिपट गई। इस पर उसने उसे धक्का देकर अपने से अलग कर दिया। इसके बाद मोहिनी ने अपने कपड़े फाड़ डाले, बाल बिखेर लिए और चिल्लाने लगी।

मोहिनी की बात की तो चार लोगों ने गवाही दे दी, लेकिन जारूल को ऐसा करते हुए किसी ने नहीं देखा था। अतः उसकी बात सच साबित करनेवाला एक भी गवाह नहीं था। जारूल ने अपनी बात भी इस ढंग से कही थी कि पंचों को उस पर विश्वास नहीं हो रहा था। दूसरी तरफ मोहिनी की बातों में पंचों को सच्चाई दिखाई दे रही थी।
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मोहिनी ने झूठा आरोप लगाकर उसे गाँव से निकलवाया था। मोहिनी समझती थी कि उसके आरोप से पंचायत उसका पक्ष लेगी और जारूल से उसका विवाह करवा देगी, लेकिन सब कुछ उलटा हो गया। जारूल उसके साथ ही पूरे गाँव को छोड़कर चला गया।

जारूल बहुत दुखी था। निरपराध होते हुए उसे गाँव से निकाला गया था। वह भूखा-प्यासा कई दिन और कई रात चलता रहा। जारूल अपने गाँव से दूर बहुत दूर चला जाना चाहता धा। उसे अपने पिता गाँव के धनी किसान से भी कोई लगाव नहीं रह गया था। उन्होंने भी उसके साथ न्याय नहीं किया था।

कई दिन यात्रा करने के बाद जारूल एक सुबह एक नदी के किनारे आ पहुँचा। जंगल के बीच बहनेवाली इस नदी के किनारे चट्टानवाले थे और आसपास बहुत से फलदार वृक्ष लगे थे।

जारूल को यह स्थान अच्छा लगा और उसने यहाँ कुछ समय ठहरने का निश्चय किया। उसने आसपास के वृक्षों के फल तोड़कर खाए और नदी का पानी पीकर एक चट्टान पर लेट गया। जारूल बहुत थका हुआ था, अतः लेटते ही उसे नींद आ गई।

जारूल कब तक सोता रहा, इसका उसे पता ही नहीं चला। लेकिन जब उसकी आँख खुली तो शाम हो चुकी थी और रात का अँधेरा तेजी से बढ़ रहा था। जारूल उठकर बैठ गया और उसने सुस्ती दूर करने के लिए दोनों हाथ ऊपर उठाकर जोरदार अँगड़ाई ली। दिनभर सोने के कारण उसकी थकान उतर गई थी और अब वह अपने को तरोताजा अनुभव कर रहा था।

जारूल से कुछ दूरी पर खड़ी एक दानवी उसे बड़े ध्यान से देख रही थी। दानवी का शरीर एक बड़े वृक्ष जैसा था और वह बहुत कुरूप थी। उसका पति एक लम्बे समय के लिए बाहर गया हुआ था। उस दानवी को एक पुरुष की तलाश थी। ऐसे में जारूल को देखकर उसकी आँखों में चमक आ गई।

दानवी बहुत बुद्धिमान थी। वह अच्छी तरह जानती थी कि एक कुरूप और विशालकाय दानवी को कोई प्यार नहीं करेगा। यह भी सम्भव था कि उसका रूप और विशाल आकार देखकर सामनेवाला पुरुष भयभीत हो जाए और भय से उसके प्राण निकल जाएँ। दानवी ने इस विषय में बहुत सोचा। अचानक उसके दिमाग में एक योजना आ गई।

दानवी ने अपनी दानवी शक्ति से अपना रूप बदला और सोलह वर्ष की सुन्दर, रूपवान, गोरी, इकहरे शरीरवाली युवती बन गई। इस समय उसे जो भी देख लेता, उस पर मोहित हो जाता। इसके साथ ही दानवी ने अपनी शक्ति से एक तेंदुआ उत्पन्न किया और बचाओ, बचाओ चीखने लगी।

जारूल अभी उठकर बैठा ही था कि उसके कानों से किसी युवती की बचाओ, बचाओ की कातर आवाज टकराई।

जारूल खड़ा हो गया। उसने अपने चारों ओर सावधान होकर दृष्टि दौड़ाई। जारूल ने जो कुछ देखा तो देखता ही रह गया। उससे कुछ दूरी पर एक अनिंद्य सुन्दरी भयभीत खड़ी थी और एक कद्दावर तेंदुआ उस पर हमला करने जा रहा था।

जारूल ताकतवर और साहसी था। उसने पलभर में, तेंदुए से टकराने का निर्णय ले लिया और दौड़कर तेंदुए से जा भिड़ा।

तेंदुआ बड़ा चालाक और ताकतवर था। वह जारूल पर पंजे मारने और उसका गला अपने मुँह में भरने का प्रयास कर रहा था और जारूल बड़ी फुर्ती से उसके वार बचा रहा था। दोनों में बहुत देर तक लड़ाई चलती रही। दानवी दूर खड़ी जारूल की बहादुरी देख रही थी।

जारूल और तेंदुए को लड़ते-लड़ते कई घंटे हो गए, लेकिन कोई भी अपनी हार मानने के लिए तैयार नहीं था।

अचानक जारूल के हाथों में तेंदुए की पूँछ आ गई। उसने दोनों हाथों से तेंदुए की पूँछ पकड़ी और उसे चारों ओर के कई चक्कर घुमाकर एक ओर फेंक दिया।

बेचारा तेंदुआ इसके लिए तैयार नहीं था। वह नदी के किनारे की एक चट्टान पर गिरा और एक ओर भाग निकला।

तेंदुए के जाने के बाद जारूल ने दानवी की ओर देखा तो देखता ही रह गया। दानवी उसे स्वर्ग की अप्सरा के समान सुन्दर लगी। वह सवांग सुन्दरी थी और जारूल को प्यार भरी नजरों से देख रही थी।

अचानक दानवी ने आगे बढ़कर जारूल से कुछ खाने-पीने को आग्रह किया। जारूल ने मुस्कराते हुए सिर हिलाकर अपनी स्वीकृति दे दी।

दानवी ने जारूल का हाथ पकड़ा और उसे लेकर अपनी गुफा में आ गई। यह एक प्राकृतिक गुफा थी, जो भीतर से बहुत साफ और आरामदायक थी। दानवी ने जारूल को पत्थर की शिला पर बैठाया और पत्ते पर रखकर अनेक स्वादिष्ट व्यंजन ले आई । जारूल को यह सब बहुत अच्छा लगा, किन्तु उसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि इस जंगली गुफा में इतने शानदार स्वादिष्ट व्यंजन कहाँ से आए? वास्तव में ये व्यंजन दानवी ने अपनी दानव शक्ति से मँगाए थे।

जारूल के आग्रह पर दानवी ने भी खाने-पीने में उसका साथ दिया। इसके बाद दोनों में प्रेम भरी बातें आरम्भ हो गईं। बातें करते-करते कब रात हो गई, इसका उन्हें पता ही नहीं चला। रात में दोनों ने फिर थोड़ा-बहुत भोजन किया और उसी चट्टान पर लेट गए।

अगले दिन प्रातःकाल जब जारूल सोकर उठा तो उसका शरीर काफी थका हुआ था। उसे दानवी से अलौकिक सुख की प्राप्ति हुई थी। दानवी उससे पहले उठ गई थी और पास ही खड़ी उसे प्यार से देख रही थी। जारूल ने उसे संकेत से अपने पास बुलाया और लिपटा लिया। दानवी शरमाती हुई उसकी गोद में आ गई । इस समय उसे देखकर कोई यह कल्पना नहीं कर सकता था कि यह एक खूँखार, बदसूरत दानवी है।

जारूल और दानवी दोनों बहुत खुश थे। वे दिन में जंगल में इधर-उधर घूमते और रात में जीवन का अलौकिक आनन्द लेते । जारूल दानवी के प्यार में इतना डूबा हुआ था कि उसने उससे यह भी नहीं पूछा कि वह कौन है? यहाँ अकेली कैसे रहती है? स्वादिष्ट भोजन कहाँ से आते हैं?

जारूल और दानवी सूरज निकलने के बाद देर से उठते। दानवी हमेशा जारूल से पहले उठ जाती। वह थोड़ा-सा श्रृंगार करने के बाद जारूल को उठाती। कभी-कभी जारूल अपने आप ही उठ जाता था, लेकिन जारूल हमेशा दानवी के बाद ही सोकर उठता था। इसके बाद दोनों थोड़ा-बहुत खाते-पीते और खुले जंगल में आ जाते। इस जंगल में बहुत सी प्राकृतिक गुफाएँ, पर्वत, झरने और तरह-तरह के पशु-पक्षी तथा फलवाले वृक्ष थे। दोनों जंगल की सैर करते, किसी झरने अथवा नदी में नहाते, वृक्षों के फल खाते और रात का अँधेरा होने से पहले अपनी गुफा में लौट आते। इसके बाद दोनों गुफा के भीतर की चट्टान पर तरह-तरह की प्रणय लीलाएँ करते और सो जाते।

धीरे-धीरे कई महीने बीत गए। जारूल और दानवी बहुत खुश थे। जारूल ने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि गाँव छोड़ने के बाद उसकी भेंट इतनी सुन्दर युवती से होगी और उससे उसे इतना प्यार मिलेगा। जारूल का मन इस सुनसान जंगल में पूरी तरह लग गया था। अब वह यहाँ से कहीं अन्यत्र जाना नहीं चाहता था।

अचानक एक दिन अर्धरात्रि के समय दानव प्रकट हुआ और गुफा के द्वार पर खड़ा होकर दहाड़ा। जारूल और दानवी दोनों सो रहे थे।

दानव की आवाज से जारूल की नींद तो नहीं टूटी, लेकिन दानवी घबराकर उठ बैठी। उसने दानव की आवाज पहचान ली थी।

ख़तरा सिर पर था। दानव कभी भी गुफा के भीतर आ सकता था। ऐसी स्थिति में जारूल की मौत निश्चित थी। दानवी अपने दानव को अच्छी तरह जानती थी। वह किसी भी कीमत पर मानव को जिन्दा नहीं छोड़ता था और फिर अपनी दानवी के साथ जीवन का सुख लूटनेवाले को तो जीवित छोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता था।

दानवी ने पलभर में ही सब कुछ तय कर लिया। उसने अपनी दानवी शक्ति से पुनः विशाल शरीर धारण किया, सोते हुए जारूल को अचेत करके गुफा के भीतर एक सुरक्षित स्थान पर छिपाया और गुफा के द्वार पर आ गई।

दानव लम्बे समय बाद लौटा था। अतः दानवी ने उसे देखते ही अपने सीने से लगा लिया और गुफा के भीतर ले आई। दानवी पूरी तरह सामान्य लग रही थी। अतः दानव ने उस पर किसी प्रकार का शक नहीं किया और उससे थोड़ी-बहुत छेड़खानी करने के बाद सो गया।

दानवी अपने दानव के साथ कुछ समय तक लिपटी हुई इस प्रकार पड़ी रही, मानो वह भी उसके साथ सो रही हो। किन्तु वह सोई नहीं थी। जैसे ही दानव के गहरी नींद के खर्राटे बजने लगे, दानवी उठी और जारूल के पास पहुँच गई। उसने जारूल को एक छोटे बच्चे के समान अपने कंधे पर लादा और गुफा के बाहर आ गई।

दानवी को जंगल की सभी गुफाओं की जानकारी थी। उसने अपनी गुफा से काफी दूरी की एक गुफा में ले जाकर जारूल को लिटाया और दानव के पास वापस आ गई। दानवी ने चलते समय नई गुफा के द्वार पर एक बड़ा पत्थर रख दिया था, जिससे जारूल जंगली हिंसक जीवों से बचा रहे।

दानव तीन दिन और तीन रात सोता रहा। चौथे दिन वह दोपहर के बाद उठा और दानवी को प्यार करने के बाद फिर सो गया। इस बीच दानवी अपनी गुफा में ही रही। वह जानती थी कि दानव लम्बे समय बाद लौटा है, अतः उसे कभी भी उसकी जरूरत पड़ सकती है।

दानव चौथे दिन अर्धरात्रि के बाद पुनः उठा और दानवी को प्यार करने के बाद गुफा से बाहर निकला और जंगल में खो गया। दानव को जंगली जीवों का मांस खाने की आदत थी।

धीरे-धीरे दानव का पहले जैसा क्रम बन गया। वह अर्धरात्रि के कुछ पहले गुफा से निकलता, वन्यजीवों को मारता, खाता और प्रातःकाल अपनी गुफा में आकर सो जाता और रात तक सोता रहता। कभी-कभी वह दिन में उठ जाता और दानवी को प्यार करता।

दानव अपनी दानवी को बहुत प्यार करता था, लेकिन दानव और जारूल के प्यार में बहुत अन्तर था। दानव अपने शरीर की भूख मिटाने के लिए दानवी से प्यार करता था और जारूल का प्यार दानवी के शरीर की भूख मिटाता था। अतः दानवी जारूल को हृदय से प्यार करने लगी थी। उसकी दिनचर्या अब बदल गई थी। वह अर्धरात्रि में दानव के जाने के बाद अपनी गुफा से निकलती और जारूल के पास पहुँच जाती। यहाँ आकर वह सोलह वर्ष की सुन्दरी बन जाती और रात भर जारूल से प्यार करती और प्रातःकाल होते ही जारूल को अचेत करके दानव के लौटने के पहले ही अपनी गुफा में आ जाती।
धीरे-धीरे कई दिन हो गए। सब कुछ बिना किसी बाधा के ठीक-ठाक चल रहा था।

एक दिन दानव को रात में भोजन की तलाश में अधिक भटके बिना बड़ा शिकार मिल गया। उसने भरपेट खाया और प्रातःकाल होने से पहले ही अपनी गुफा में वापस आ गया।

दानवी जारूल के पास थी। अतः दानव को गुफा में दानवी नहीं मिली । दानव गुफा के बाहर निकला और उसने अपनी दानवी को बहुत ढूँढ़ा, लेकिन वह नहीं मिली। दानव गुफा में पुनः वापस आ गया और लेट गया।

प्रातः:काल होते ही दानवी वापस आ गई। उसने गुफा में दानव को पड़े देखा तो कुछ भयभीत हुई, लेकिन शीघ्र ही उसने अपने पर नियन्त्रण किया और सामान्य दिखाई देने लगी।

दानव ने दानवी की ओर देखा। दानवी उससे नजरें चुरा रही थी। इससे दानव को कुछ शक हुआ, लेकिन उसने कुछ कहा नहीं और आँखें बन्द करके लेट गया। दानवी भी उसके पास आकर लेट गई और अर्धरात्रि तक उसके पास पड़ी रही।

अर्धरात्रि होते ही हमेशा की तरह दानव उठा और गुफा के बाहर निकल गया, किन्तु वह अधिक दूर नहीं गया, बल्कि गुफा से कुछ दूर जाकर एक मोटे वृक्ष के पीछे छिपकर खड़ा हो गया।

दानवी को इसकी जानकारी नहीं थी। उसने दानव के जाने के बाद सोलह वर्ष की सुन्दर बाला का रूप धारण किया और जारूल की गुफा की ओर चल पड़ी।

दानव ने दानवी का नया रूप देखा तो उसका शक पक्का हो गया। उसने दानवी से कुछ नहीं कहा और उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

दानवी सीधी जारूल की गुफा में पहुँची और उसने जारूल को उठाया। आज उसका इरादा जारूल को सब कुछ साफ-साफ बता देने का था। आज वह जारूल को यह बताने आई थी कि वह एक दानवी है। उसका दानव बाहर से लौट आया है। दानव बहुत खतरनाक है। अतः वह जंगल छोड़कर कहीं दूर चला जाए।

जारूल ने उठते ही दानवी को अपने सीने से लगा लिया और उसे प्यार करने लगा। दानवी ने उसे अपने से अलग करने का प्रयास किया, किन्तु जारूल उसे इस तरह जकड़े हुए था कि दानवी अपने को छुड़ा न सकी।

इसी समय दानव प्रकट हुआ और उन दोनों की ओर बढ़ा। दानव का उग्र और भयानक रूप देखकर दानवी और जारूल दोनों के होश उड़ गए। दानव बहुत क्रोध में था और कुछ भी कर सकता था।

अचानक दानवी के मन में न जाने क्या आया कि उसने दानवी का विशाल रूप धारण किया और जारूल को कंधे पर लाद कर गुफा के बाहर आ गई।

जारूल ने दानवी का असली रूप देखा तो हतप्रभ-सा रह गया। उसे दानवी की प्रेम कहानी कुछ-कुछ समझ में आने लगी।

दानवी के पीछे-पीछे दानव भी गुफा के बाहर आ गया और उससे जारूल को छीनने का प्रयास करने लगा।

दानवी जानती थी कि वह जारूल को लेकर कहीं भी भाग नहीं सकती और यदि जारूल दानव के हाथ लग गया तो वह उसे मार डालेगा। अतः दानवी ने जारूल को एक ओर हवा में उछाल दिया।

जारूल दानव से कुछ दूर जमीन पर मिरा, लेकिन गिरने के पहले ही दानवी ने उसे अपनी दानवी शक्ति से एक वृक्ष बना दिया।

दानव का क्रोध अभी शान्त नहीं हुआ था। वह वृक्ष बने जारूल की ओर बढ़ा। उसका इरादा इस वृक्ष को तहस-नहस कर डालने का था।

दानवी ने दानव को वृक्ष की ओर बढ़ते देखा तो उसके पैर पकड़ लिए और गिड़गिड़ाने लगी।

दानव अपनी दानवी को बहुत प्यार करता था। अतः उसने वृक्ष बने जारूल को अभयदान दे दिया और दानवी को भी माफ कर दिया। इसके बाद दोनों ने वह जंगल छोड़ दिया और नए जंगल में जाकर रहने लगे।

कहते हैं कि दानवी जारूल के प्यार को कभी भूल नहीं पाई। वह अभी भी बरसात का मौसम आरम्भ होते ही अपने जारूल के पास आती है। अपनी दानवी का आलिंगन करते ही जारूल खुशी से झूम उठता है। जारूल के वृक्ष पर जून-जुलाई के महीने में खिलनेवाले बैंगनीपन लिए लाल रंग के फूल जारूल की खुशी के प्रतीक हैं।

(डॉ. परशुराम शुक्ल की पुस्तक 'भारत का राष्ट्रीय
पुष्प और राज्यों के राज्य पुष्प' से साभार)

 
 
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