जड़ों की तलाश में - एक अद्भुत यायावरी यात्रा : मंगला रामचंद्रन

Jadon Ki Talash Mein-Ek Adbhut Yayavari Yatra : Mangala Ramachandran

जड़ों की तलाश में - एक अद्भुत यायावरी यात्रा : मंगला रामचंद्रन

‘दक्षिण भारत याने मद्रास’, ये मेरी अपनी सोच नहीं है पर अधिकतर हिन्दी भाषी प्रदेश के मन में यही धारणा लंबे समय तक थी। ‘हम’ भी तो बस चेन्नै जाकर आ जाया करते थे। (परिवार में विवाह आदि उत्सवों में) कभी बच्चों की शिक्षा तो कभी वृद्ध माता-पिता को अधिक समय अकेला ना छोड़ पाना, सो जल्दबाजी तो सदा ही बनी रहती थी। दो-चार बरसों से अपनी यायावरी मनोदशा का लाभ उठाने का मौका मिला तो चेन्नै में मात्र एक-दो दिन रूक कर मदुरै पहुँच गये। पिछले वर्ष मदुरै मीनाक्षी अम्मन के मंदिर व रामेश्वरम् की यात्रा कर चुके थे।

आदरणीय पूर्व राष्ट्रपति श्री कलाम के घर को देखने का चाव मन में लंबे समय से था जो उस यात्रा में पूरा हुआ।

इस बार मन में अपने पूर्वजों को जानने समझने की एक इच्छा जगी। शायद सास- ससुर और माता-पिता दोनों के ही न रहने पर यह इच्छा बलवती हो गई थी। इस यात्रा का उद्देश्य यही था, पर सोचा नहीं था कि अपनी जड़ों की तलाश में एक अविस्मरणीय यात्रा हो जायेगी। अपने पति के गांव ‘‘पत्तमडै’’ तो एक बार तीनों बच्चों को लेकर हम गये थे। पर मेरे माता-पिता (दोनों का एक ही गांव) के गांव जो पत्तमडै से मात्र 45 मिनट की दूरी पर है कभी जा नहीं पाये। शायद यही उक्ति काम कर गई कि वृद्धावस्था की ओर बढ़ते व्यक्ति को उसकी जडे़ अपनी ओर खींचती हैं। मदुरै में रहने वाले हमारे दूर के रिश्तेदार व शुभचिंतक प्रो. श्री सुब्रम्हणियम ने हमारी यात्रा का कार्यक्रम व गाड़ी बुकिंग आदि करा दी। उन्होंने फोन पर कहा कि आपके ठहरने की व्यवस्था अमर सेवा संघ के गेस्ट हाउस में करवाई है। तब तक न तो हम इस संघ के नाम से न काम से परिचित थे। जिस गांव में यह संघ है उसका नाम भी कभी सुना नहीं था।

श्री मणि ने हमको दूरभाष पर आश्वस्त किया कि यहां रूक कर हम एक-एक गांव को अच्छे से ‘कवर’ कर सकते हैं। पता चला कि अमर सेवा संघ विकलांग बच्चों की संस्था है। जिसके संस्थापक अध्यक्ष भी विकलांग है। उन्होंने मुझसे खास कर कहा कि आपके लिये एक अनुभव होगा, एकदम नया और स्फूर्तिवान। उनकी बात का मर्म पूरी तरह या स्पष्ट न समझ कर भी ठहरना तो वहीं था। मुझे दक्षिण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व राष्ट्रकवि श्री सुब्रम्हणिय ‘भारती’ पर सामग्री एकत्रित करनी थी। भारती स्मारक उनके गांव एटैयापुरम में वहीं बना है जहां भारती अपने परिवार के साथ रहते थे। यह गांव मदुरै से सड़क द्वारा मात्र एक घंटे की दूरी पर है। भारती स्मारक, पुस्तकालय, राजमहल जहां के राजा के पास भारती के पिताश्री विद्वानों के सरताज थे। इन सबके लिये श्री मणि मेरी सहायता कर रहे थे। अपने हिन्दी भाषी साहित्यकारों को भारती के संपूर्ण अवदान (देश के प्रति तथा साहित्य में) से परिचित कराना मेरा उद्देश्य था।

ये कहां मालूम था कि इस बीच एक ऐसे व्यक्तित्व से साक्षात्कार हो जायेगा कि दिमाग पहले इसी तपस्वी के बारे में सोचने को मजबूर हो जायेगा। अयकुड़ी गांव की ओर जाते हुए प्राकृतिक छटा ने जिस तरह मोह लिया वो कभी भुलाया नहीं जा सकता। जिधर नज़रें डालती खेतों में बिछि हरी-हरी धान, केले और सुगंधित फूलों की खेती। नारियल और ताड़ तो थे ही साथ ही एक तरफ पहाड़ों की श्रृंखला लगातार चल रही थी, मानों सफर की समाप्ति पर ही वो खत्म होगी। अमर सेवा संघ के मेन गेट पर आकर गाड़ी रूक गई, तब ख्याल आया पिछले चार घंटे से बिना रूके एटैयापुरम से सफर कर रहे थे। सोचा नहीं था अमर सेवा संघ का रूप इतना विस्तार लिये होगा। वो रविवार की शाम थी इसलिये कुछ inmates चौकीदार व कर्मचारी थे। दफ्तर, स्कूल, कम्प्यूटर व अन्य विभागों के भवन फिर रीढ़ की चोट (spinal injury) के लिये एक छोटा सा अस्पताल, जिसमें इलाज के अलावा दो वार्ड भी हैं जहां रहकर रोगी की फिजियोथेरेपी हो सके। इन सबके बाद एक छोटा सा पोर्च और बिल्डिंग। यही है मेहमानों के लिये रेस्ट हाऊस। सर्व आवश्यक सुविधायुक्त सीधा-सादा, आडंबर विहिन, कमरे। आसपास उड़द-मूंग के खेत, आम-चीकू के पेड़ फलों से लदे हुए, नारियल व तरह-तरह के फूल। इन सबसे कट कर कमरे में जाने की जरा भी इच्छा नहीं हो रही थी। सामने ही बौद्धिक पर्वत श्रृंखला मेघों से लगातार खिलवाड़ करते हुए कभी श्वेत तो कभी श्याम छटा बिखेर रहा था। हरियाली पर धूल या धुंए की कोई परछाई नहीं, सदैव सद्यस्नाता सी हरीतिमा बिखेरती हुई। तभी दिलों-दिमाग को समझ आ गया था कि इस गांव की बात कुछ और ही है।

मदुरै में हमें ये तो बता दिया गया था अमर सेवा संघ के संस्थापक श्री रामकृष्णन भी अपाहिज है। शाम को जब हम उनके घर मिलने गये तो उनकी लाचारी देख सन्न रह गये। एक पलंग पर उल्टे पड़े हुए, जी हां पड़े हुए, क्योंकि वो स्वयं तो करवट भी नहीं ले सकते। गर्दन के नीचे के सारे अंग सुन्न, पूरी तरह निढाल। गर्दन के ऊपर के अंगों खास कर मनोमस्तिष्क से उन्होंने जो जीत हासिल की वो साधारण इंसान के बस की बात तो है ही नहीं। मेरा चेहरा अवश्य ही दयनीय और कोमल हो गया होगा। पर उनके मुख पर न बेचारगी की छाया न दयनीयता। चमकती दीप्त आंखे और स्पष्ट-गहरी आवाज के मालिक जिस तरह बातें कर रहे थे वो उनके आत्मविश्वास और आत्मबल को दर्शा रहा था।

इंजीनियरिंग के चौथे वर्ष में एक हादसे में उनकी रीढ़ की चोट ने उन्हें फिर कभी उठने न दिया।

तैंतीस वर्षों से वे पलंग पर पड़े रह कर भी एक तरह से नहीं पड़े रहे। उनकी सोच, दूरदर्शिता और वाक्चातुर्य ने दूसरे ऐसे लोगों के लिये पलंग और चक्र कुर्सी (wheel chair) से एक ऐसी संस्था की स्थापना की जो अद्भुत है। ऐसे सेवा भाव की बानगी शायद ही कहीं मिलेगी। हादसे के बाद पुणे में जिन डॉक्टर ने श्री रामकृष्णन् का इलाज किया उन्होंने उन्हें हौसला दिया। जीवन में कुछ न कुछ कर दिखाने का जज्बा दिया। इसीलिये श्री रामकृष्णन् ने अपने स्थापित संघ का नाम उन डॉ श्री अमर सिंह चहल के नाम पर अमर सेवा संघ रखा। श्री रामकृष्णन् एक तपस्वी की तरह कार्य करते आ रहे हैं। अनेकों बच्चों और बड़ों का निःशुल्क उपचार, शिक्षा, भोजन कैलिपर्स, व्हील चेयर का प्रबंध नि:शुल्क करते आ रहे हैं। एक साधारण कृषक परिवार के होनहार बडे़ बेटे के रूप में उनका हौसला सच में अद्वितीय है। तभी तो उनकी सेवा भावना से प्रेरित होकर देश-विदेश से लगातार आर्थिक सहायता मिलती आ रही है। उनकी मां भी किसी तपस्विनी की तरह अपने बेटे की सेवा करती रही। उनकी पत्नी चित्रा का योगदान तो और भी अद्भुत व अमूल्य है। श्री रामकृष्णन् की हालत का विवरण अच्छी तरह जान कर भी उनसे विवाह किया और हर क्षण असली अर्थों में उनकी अर्धांगिनी बनी रहती है।

हमारी यात्रा में अनायास आये अयकुड़ी प्रवास व अमर सेवा संघ का शामिल होना ऐसा लगा मानों ये ईश्वरीय इच्छा हो। अयकुड़ी में दो दिन रूकने का मन बनाया था। पर हम किस्मत के धनी थे, साढे़ चार दिन रूके। इस मोहलत में जितना, जो कुछ पाया उसे न तो नापा जा सकता है न शब्दों में पूरी तरह बयां किया जा सकता है। बस, यही कहा जा सकता है कि जो अनुभव मिले उसकी धन सम्पदा की तुला से समानता नहीं की जा सकती। हमारी यात्रा का महत्व और दिमाग पर उसका असर इसलिये भी अधिक हो जाता है, क्योंकि हमारे लिए हर तरह की व्यवस्था की रूपरेखा श्री रामकृष्णन् की बनाई हुई थी। ऐसी सुव्यवस्था, ऐसी सूझ-बूझ सबके बस की बात नहीं होती।

अगली सुबह शंकरन कोविल (अर्थात मंदिर) गांव के शंकरनारायणा मंदिर गये। लगभग एक घंटे की साफ-स्वच्छ पक्की स़ड़क पर गाड़ी में सफर का मजा दुगुना हो जाता है। विशाल मंदिर, अनेकों पूजा गृहों व प्रकोष्ठों के साथ इतिहास वेत्ता तथा पुरातत्व के क्षेत्र के लोगों के लिए जिज्ञासा और प्रश्नों के सिलसिले का अंतहीन खजाना हो सकता है। यहां के प्रमुख विग्रह के चरणों का वर्ष में दो बार सूर्यकिरणें स्पर्श करती हैं। मूर्तिकला की बानगी चारों ओर बिखरी हुई, क्या देखें, कितना देखें? चल-चल कर पैर दुख गये पर देखने को शेष रह ही जाता। किसी तरह मंदिर के बाहर निकले। पलटकर उसके ऊँचे गोपुरम को गौर से देखा, गर्दन दुख गई पर मन नहीं भरा।

हर मंदिर की तरह इस मंदिर में भी चढ़ावे के लिये हुंडिया हैं। एक हंुडी अलग तरह की है। चमकीली पन्नी पर बने सांप, नेवले, बिच्छू व अन्य रेंगते, विषैले कीड़ों की छोटी-छोटी तस्वीरें इस हुंडी में डाली जाती है। अपने बच्चों को विषैले जंतुओं से बचाने का एक टोटका है यह।

मंदिर से लौट कर अमर सेवा संघ के विभिन्न विभागों का जायजा लिया। स्कूल में किताबी शिक्षा के अलावा शारीरिक शिक्षा व स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाता। हर छात्र/छात्रा की शारीरिक कमी के अनुसार कसरत कराई जाती। उनके माता-पिता को भी बताया जाता कि इस तरह के बच्चों के साथ कैसा व्यवहार किया जाये। बेसिक शिक्षा जैसे टेलरिंग, डॉल मेकिंग तथा कम्प्यूटर कक्ष भी है। अधिकतर शिक्षक- शिक्षिका विकलांग और इसी संस्था में पढ़े हुए और प्रशिक्षण प्राप्त किये हुए हैं। चारों तरफ ऐसे लोगों का मजमा पर एक भी चेहरा दया की प्रार्थना करता नहीं लगता। सारे चेहरों पर आत्मविश्वास की चमक देखी जा सकती है। यही चमक श्री रामकृष्णन् की सोच, साहस और मेहनत की जीत है।

अब तक तेज भूख लगने लगी थी। आश्रम के रेस्ट हाऊस में मेहमानों की देखभाल का जिम्मा एक तरह से मुत्तम्मा का है। ऊँची-पूरी तन्दुरूस्त, चेहरे पर संतुष्ट और निश्छल हंसी उसकी पहचान है। विदेशी-देशी सभी मेहमानों से तामिल में ही बात करती। उसे किसी दूसरी भाषा का ज्ञान ही नहीं था। पर अपनी सेवा भावना से सभी को प्रसन्न कर लेती। मुत्तम्मा के हाथ का बना सादा सात्विक खाने का स्वाद उसके मनुहार से खिलाने के कारण कई गुना बढ़ जाता है।

शाम चार बजे प्रसिद्ध ‘कुट्रालमफाल्स’ गये जो अयकुड़ी से दस कि.मी. दूर तेनकाशी के पास है। तेनकाशी याने दक्षिण की काशी। पचास-पचहत्तर फीट नीचे झरने में छोटे- बड़े सभी नहा रहे थे। ऊपर से फेनिल दूधिया पानी पूरी ताकत के साथ नीचे गिर रहा था। हम ऊपर खड़े ये नज़ारा देख रहे थे। लगातार पानी का यूं गिरना और उसकी आवाज़ नाद और दृश्य का अद्भुत सामंजस्य पैदा कर रहा था। दक्षिण भारत के खड़े मसाले पूरे देश ही नहीं विदेशों में भी जाते हैं। वहां उनकी दूकानें सजी थी और विविध मसालों की खूशबू जीभ और पेट को कई व्यंजनों की याद दिला रही थी। इतने तरह के व इतने सुगन्धित मसाले ऊटी के बाद यहीं देखे। बाहर से आये सैलानी कुछ न कुछ मसाले अवश्य खरीद रहे थे। मसालों के बीच सफेद और मटमैंले रंग के चिकने पत्थर रखे थे। उत्सुकतावश उठाया तो दुकानदार ने कहा- ‘कुरूंजी फूल के बीज है। इसे फोड़कर अंदर के गूदे से पैर की बिवाई का इलाज होता है। पर उसे फोड़ना ही सबसे कठिन काम है।’ वहीं कोशिश की तो फिसल-फिसल कर दूर जा गिरता। उसे वहीं छोड़ आई, पर अब लगता है कुछ ले ही आती। आखिर कुरूंजी बारह वर्षों में खिलने वाला अद्भुत दैविक सुगंध वाला पुष्प है।

सांझ ढले रेस्ट हाऊस पहुँच कर मुत्तम्मा के हाथों का दोसा-चटनी खाया और सोने चले गये। अगले दिन सुबह मेरे माता-पिता के गांव ‘कडैयम’ जाना था। एक बार छः- आठ वर्ष की उम्र में वहां जाने का याद है। दादाजी का वात्सल्य भरा चेहरा व दुबली- लंबी दादी का सतर शरीर व स्नेहिल चेहरा जिसमें सुतवां नाक आकर्षित करती थी, बस यही याद रह गया था। उन दिनों इन्दौर से बंबई फिर मद्रास वहां से तिरूनेलवेल्ली इस तरह तीन रेलों का सफर कर फिर बस और आखिर में बैलगाड़ी यानी चार दिनों का सफर। आज की तरह गद्देदार बर्थ नहीं होती थी, लकड़ी की कड़ी पट्टी, ऊपर से धूल, धुँए, कोयले के चूरे से सने हाथ-मुँह, कपड़े। शायद उम्र ही ऐसी थी या समय पता नहीं, इन असुविधाओं के अहसास से दूर मां के बनाये मूंग के लड्डू और अन्य सूखा नाश्ता लगातार खाते हुए चले गये थे।

खैर, सुबह 7 बजे एकदम तैयार होकर गाड़ी से निकल गये। साथ में पथप्रदर्शक के तौर पर अमर सेवा संघ के चैयरमैन श्री रामकृष्णन् की सुन्दर त्यागमयी माता थी। लगभग एक घंटे में गांव नित्य कल्याणी अम्मन (अम्मन अर्थात देवी) मंदिर पहुँचे। याद आता है जब हम छोटे-बड़ी मुसीबत में मां कल्याणी अम्मन को याद कर अपने चढ़ावे के तौर पर कुछ रकम अलग रख देती। वैसे तो मां शंकरन कोविल तिरूपति बालाजी के लिये भी इसी तरह हर महिने एक निश्चित रकम अलग रखती। रकम भी कितनी! मात्र सवा रूपया। जब कोई दक्षिण भारत जाता तो उसके हाथ भिजवा देती। बहरहाल, शांत, नीरव वातावरण में फूलों व अन्य वृक्षों के बीच बना मंदिर वास्तव में सुन्दर तथा इस जरा से गांव के हिसाब से भव्य कहला सकता है। देवी की प्रतिमा अति सुन्दर व सजीव भट्टर (पुजारीजी) ने जैसा उनकेा सूचित किया गया था, दूध, पुष्प व पूजन सामग्री तथा प्रसाद (चित्राअन्नम चक्क्र पोंगल घी में पकी, गुड की मीठी खिचड़ी, इमली वाले चावल, दही चावल आदि तैयार रखा था। देवी के पहले काशी विश्वनाथ की प्रतिमा का प्रथम पूजन, दूध से अभिषेक किया गया। तत्पश्चात देवी का। पूरी श्रद्धा के साथ विधिवत् पूजा तथा प्रसाद ग्रहण कर मन तृप्त हुआ। कडैयम के स्थल पुराण का प्रकाशन सन् 1966 में श्री नित्य कल्याणी अंबाल समेता श्री बिल्व वननाथ स्वामी के कुंभाभिषेक के अवसर पर हुआ था। इसके अनुसार श्री नित्य कल्याणी देवी में श्री दुर्गा, श्री लक्ष्मी तथा श्री सरस्वती तीनों का सम्मिलित स्वरूप है।

पुराणों के एक उपपुराण कपिल पुराण में योगी कपिल व मणिपात्र के बीच संवाद का वर्णन है। इसमें ‘कडैयम’ गांव की महिमा, श्री नित्यकल्याणी व बिल्ववननाथ का बखान तथा राम नदी जो तत्वसारा के नाम से थी, इनका उल्लेख है।

एक कथा के अनुसार मुनि अगस्त्य मलया (संभवतः केरल व ता.नाडु के बीच) पर्वत पर भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा कर रहे थे। ब्रह्मा अर्पण करते हुए उन्होंने अपने कमंडल से जल डाला। तीन बूंदें गिरी जिसमें से दो बूंदे नदियों के रूप में बह निकली। इनमें से एक ताम्रवरूणी तथा दूसरी तत्वसारा है।

आगे कथा है कि श्रीराम जब अयोध्या में राज्य कर रहे थे तब दक्षिण में एक राक्षस चांबुना ने उत्पात मचाया हुआ था। श्री राम ने दक्षिण आकर उसका नाश किया। पर उसकी हत्या से वे बेचैन से हो गये थे और उन्होंने कपिल मुनि से सलाह मांगी। कपिल मुनि की सलाह के अनुसार श्री राम ने तत्वसारा नदी में जाकर बिल्ववनेश्वर भगवान की पूजा-अर्चना की। तब जाकर उन्हें शांति और चैन का अनुभव हुआ। तब से तत्वसारा को रामनदी तथा जहां उन्होंने स्नान किया उसे रामतीर्थम् कहा जाने लगा।

मैं अपनी इकलौती बुआजी से कभी मिली नहीं थी जो बंबई में ही रहती थी। उनकी बड़ी बेटी जो मुझसे उम्र में बहुत ही अधिक बड़ी थी, कडैयम में ही अपने पति के साथ रहती है। वहां पहुँचने पर हम दोनों का जो सहज आत्मीय स्वागत हुआ अविस्मरणीय है। गांव का रेल के डिब्बों की तरह कतार में कमरे वाला घर। पर हर तरह की आवश्यक सुविधाओं (गैस चूल्हा, फ्रिज, पानी का पम्प तथा डायनिंग टेबल भी) सहित घर साफ-सुथरा। पिछवाड़े में कडैयम के प्रसिद्ध नींबू के पेड़, बडे़-बडे़ सुगंधित नींबू तथा चकोतरे की तरह मोटे छिलके वाला हरा फल (हरी मुसंबी की तरह) दक्षिण भारत में इसे नार्तगांय कहते हैं। उसे काट कर नमक मिला कर रख दिया जाता है। दही चावल के साथ तथा बीमारी या परहेजी खाने मे भी ये खाया जाता है। अपनी इस नई दीदी के घर 2-3 घंटे कैसे निकले पता ही न चला। पास ही में दादाजी का घर भी था जिसमें कोई और रह रहा है। अपनी जड़ों का वो घर दादाजी की तीन-चार दिन की सफेद दाढ़ी और दादी के दुबले-ऊँचे शरीर पर नौ वारी साड़ी की कल्पना और याद के साथ महसूस करना वास्तव में एक अनुभव था।

कडैयम ने कई बुद्धिजीवीयों को जन्म दिया है। श्री सुब्रह्मणियम भारती की ससुराल भी यही थी। जब भारती को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर रिमाण्ड पर कुछ समय (39 दिन) रख कर छोड़ा था, तब उनसे कहा गया कि वो अपना गांव ऐध्यापुरम छोड़ कर चले जायें। उस समय उन्होंने कडैयम में वास किया था। वो जिस घर में रहे थे वो स्कूल की संपत्ति है। वहां अब कम्प्यूटर का कोर्स खुल सकता है। वहां के सरकारी स्कूल देखे जो आज भी बहुत अच्छे से नियमित चल रहे हैं। यहां रामर नदी है, जो सदानीरा है। इसके तट पर बैठ कर भारती ने सैकड़ों गीत व कविताओं की रचना की जो आज भी दक्षिण भारत के घर-घर व स्कूलों में गाई व सुनाई जाती हैं। भारती ने जिस जगह ओज भरी राष्ट्रप्रेम की कविता सुनाई, वहां उनके नाम से पुस्तकालय व वाचनालय बनाया गया है। वो नगर निगम का पर संचालन बहुत उम्दा है। सलीके से रखी साफ-सुथरी पुस्तकें व पत्रिका। दोपहर से शाम तक पढ़ने वाले वहां बैठते हैं। मन गर्व से भर गया। गांव या शहर छोटा-बड़ा नहीं होता, वहां रहने वाले उसे जिस तरह बना दें, वैसा होता है।

कडैयम आते-जाते दोनों बार पहाड़ों की एक श्रृंखला साथ चलती हुई नज़र आती है। हरे-भरे धान के खेत, नारियलों से लदे पेड़ व सैनिकों की तरह तन कर खड़े केले के वृक्षों की कतारें खेत में पूरे क्षेत्रफल में, कहीं केले के लाल फूलों से तो कहीं केले के फलों से लदी हुई, आंखे देखती रहीं पर थकी नहीं। लौटते हुए तो तो हल्की बूंदाबांदी से मौसम अत्यन्त सुहावना हो गया था। अगले दिन फिर इसी रास्ते से होते हुए आगे पत्तमडै जाना था।

रेस्ट हाऊस में कैनेडा से आई दो महिलाओं जिनमें से एक श्रीलंका मूल की थी, से मुलाकात हुई। ये लोग अमर सेवा संघ के खास बच्चों (मानसिक एवं शारीरिक रूप से अपाहिज) को गीत व कवितायें किस तरह सिखाये उसकी ट्रेनिंग दे रही थीं। एक रिटायर्ड (से.नि.) मेडिकल ऑफिसर थे, उसी इलाके के रहने वाले, सेवानिवृत्ति के बाद सेवाभाव से अ.से.सं. से जुड़े हुए थे। संघ के सेक्रेटरी श्री कन्नन भी मिले। ये वैसे स्कूल टीचर हैं, अविवाहित है और स्कूल के बाद का अपना पूरा समय सेवाभाव से इस संघ को दे रहे हैं।

अगले दिन सुबह कुछ ओर पहले निकले। कडैयम को पार करते हुए पत्तमडै मेरे ससुराल के गांव में पहुँचे। यहां के बारे में सास-ससुर से सुना ही था। हर साल श्रावण मास में गांव के बालाजी मंदिर का उत्सव होता है, इस का एक हिस्सा अभी तक हमारा होता आ रहा है। पर उत्सव के समय न सास ससुर कभी जा पाये न हम पति-पत्नि। पर जो पुजारीजी सारे मंदिरों की देखरेख, पूजा आदि करते हैं, उनका पत्र आ जाता है व कुंकुम-भभूत का प्रसाद भी। सो संपर्क व एक तरह की पहचान बनी हुई है। वर्तमान पंडितजी श्री राजू आयंगार का पूरा नाम राजगोपाल है, पर शायद आधुनिकता का कुछ जोर वहां भी हो गया हो, उन्होंने पहले बालाजी या जिन्हें पेरूमाल भी कहा जाता है, की पूजा अर्चना की। उसके बाद मीनाक्षी अम्मन के मंदिर में पूजा की। यहां से लेकर रास्ते में बहुत दूर तक धान, केले, नारियल के अलावा अरबी के खेत। अरबी के पत्ते देख कर हम लोग चौंक गये। इतने बड़े-बड़े, थाल की तरह।

पत्तमडै में सबसे प्रमुख स्थान जहां जाने का हम कब से सोच रहे थे, वो था वहां का हाईस्कूल। वहां की तालीम में कुछ ऐसी खासियत है कि विद्यार्थी बड़े-बड़े शहरों में जाकर उच्च शिक्षित होकर ऊँचे पदों पर सुषोभित होकर या विदेश जाकर भी इस हायर सेकेन्डरी विद्यालय को भुलाते नहीं हैं। विद्यालय के प्रमुख को प्रिंसिपल नहीं हेडमास्टर ही कहते हैं। इसी विद्यालय में हम दोनों के पिताश्री ने शिक्षा पाई थी और फिर नौकरी की तलाश में उत्तर-पश्चिम आ गये थे। अनुशासित बच्चों को ईमानदारी से शिक्षा ग्रहण करते देखना सुकून देने वाला अनुभव था। काश देश के सभी विद्यालय इस तरह के हो जायें।

अपने स्वर्गीय पिताओं को याद करते हुए वहां से निकले तो हेडमास्टर ने बड़े जतन से कहा- ‘सर, हर वर्ष एक बार आइये न!’

हम दोनों कनखियों से एक-दूसरे को देख नज़रें चुरा रहे थे। जीवन में एक बार तो कम से कम अपने पूर्वजों की मिट्टी को तलाशते आ पाये, यही हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। कडैयम तथा पत्तमड़ै अपने उसी मूल देहाती और छोटे से गांव के स्वरूप में है। हम उसी मूल सुगंध को लिये पत्तमडै से लौट रहे थे और SCAD लिखे कुछ होर्डिंग पर नज़र डाल रहे थे। सोच ही रहे थे कि किस सम्बन्ध में होगा तभी एक विशाल भवन व उसके आसपास विशाल खुला मैदान दिखा। बाहर वही SCAD का बोर्ड और जो नामपट था उससे पता चला कि वहां इंजीनियरींग और पॉलीटेक्नीक दोनों संस्थान है। इतने से गांव में उच्च शिक्षा का इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है!

पत्तमडै में शिवानन्द मठ और मार्ग तो हम सुनते आ रहे थे, क्योंकि शिवानन्द की पुस्तकें मेरे पिताश्री और ससुरजी दोनों के पास थी। अब एक बहुत बड़ा एकदम उम्दा अस्पताल शिवानन्द के नाम से देखने को मिला। यहां हर तरह का इलाज, सर्जरी कम धन में बेहतर परिणाम के साथ होती है। पूरे देश से सेवाभावी डॉक्टर वहां लगे हुए हैं। बिहार के एक डॉक्टर से भेंट और बातचीत हुई। ठेठ दक्षिण में अच्छी हिन्दी बोलनेवाले से मुलाकात् ऊपर से चिकित्सा सेवी। मन गद्गद् हो गया। लगा यही तो असली मन्दिर है जहां चिकित्सक पुजारी के रूप में मरीजों को श्रेष्ठ प्रसाद देते हैं। ये है गांव की असली प्रगति। गनीमत है कि वहां संस्कृति को तिलांजली देकर सिनेमा, टी.वी. या ग्लैमर की दुनिया का असर अभी तक तो नहीं पड़ा।

अपने गांव से विदा लेकर भारी मन से अमर सेवा संघ अयकुड़ी लौट रहे थे। भारी हुआ मन अचानक ही प्रफुल्लित हो उठा। कारण था अनेकों तामिल रचनाओं में वर्णित ताम्रवरूणी नदी को साक्षात् देखना। विशाल पापनाशम बांध, नदी और हाइड्रो प्रोजेक्ट, अगस्त्य मुनि का मंदिर, सभी के साक्षात् दर्शन।

इन सबसे बढ़कर मुन्नडनदुरै सैंक्चूरी के एक हिस्से से गुजरना व चीतल के झुंड को देखना। वास्तव में प्रकृति के अनुपम उपहारों का खुला खजाना हमारे सामने था।

अयकुड़ी में बिताये ये चार दिन जीवन में हमेशा याद रहने वाली अनुभूति के रूप में हमारे सांसों में बस गई है। इस पर हमारी ट्रेन अहिल्या नगरी, त्रिवेन्द्रम से पकड़नी थी। सो त्रिवेन्द्रम जाना ही था। त्रिवेन्द्रम हमारे लिये नया नही था क्योंकि मेरे पति श्री रामचन्द्रन के इकलौते मामाजी वहीं रहते हैं। वैसे त्रिवेन्द्रम का नाम लेते ही मेरी आंखों के आगे चित्रा आर्ट गैलेरी और राजा रवि वर्मा के चित्रों का पिटारा खुल जाता है। इस बार भी हम वहां गये और उनकी पेन्टिंग्स देख कर मैं नये सिरे से अभिभूत हो गई। उसे देखने के पश्चात् किसी और का काम मुझे आकर्षित नहीं कर पाता।

लौटते हुए ट्रेन में अपनी भरी झोली में से एक-एक मोती को मन की आंखों के आगे सजाती, देखती, तृप्त होती इन्दौर आ पहुँची।

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