हौसले की उड़ान (कहानी): मंगला रामचंद्रन
Hausle Ki Udaan (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran
पच्चीस वर्षीय नेहा वैसी ही थी, जैसी उसकी हमउम्र, उच्च शिक्षित, एक सम्मानजनक नौकरी के साथ होती हैं। कुदरत के करोड़ों साँचों के कारण हम इंसानों में फर्क या अंतर चिन्हित कर पाते हैं। उसी तरह हर इंसान के चेहरे-मोहरे, हाव-भाव, बोलने-चालने आदि-आदि में एक अलग खासियत होती है। किसी को हम उसके रंग- रूप, तो किसी को किसी और विशेषता के कारण याद करते हैं। नेहा सुगठित देहयष्टि की स्वामिनी तो है ही, नाक-नक्श भी लुभावने हैं। सबसे आकर्षक तो उसकी आँखें हैं जो सदा आत्मविश्वास से भरे हुए, दीपशिखा की तरह दीप्त रहते हैं। उन आँखों में बहुत कुछ कर गुजरने का जज्बा सतत् बना रहता है। उसकी यही खासियत उसे अन्य हमउम्र, समान तबके की लड़कियों से अलग करती है।
कल्पना लोक में विचरने, बहुत कुछ पा जाने का एहसास कर अल्प समय तक खुश रहने वाले तो बहुतेरे होते हैं, लेकिन नेहा व्यावहारिक जोकि वर्तमान युग की प्रमुख और प्रथम माँग होती है, उस तरह की प्रैक्टिकल है। पर ऐसा भी नहीं है कल्पना लोक में वो विचरती ही नहीं है। सपने देखना और उन्हें कल्पना लोक में पूरा करने का आनंद तो वो भी लेती है। पर फिर कल्पना में वो इतनी नहीं धँसती कि अपने सपने और उद्देश्य को भूल जाये। शायद इसीलिए छात्र जीवन से ही वो अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपने उद्देश्य को
प्राथमिकता देती थी। उसी का नतीजा है कि वो इस उम्र में एक अच्छे और ऊँचे पद पर आसीन है और सतत् कर्मशील है। घर से दूर पुणे में वो वर्किंग वूमन हॉस्टल में इस तरह रहती है, मानों वो उसी का घर है।
पिछले कुछ समय से नेहा के मम्पी-पापा उस पर विवाह के लिए ज़ोर देने लगे थे। वो लोग भी पुरातन विचार के नहीं थे और नेहा स्वयं ही किसी को पसंद कर लेती तो भी खुश हो जाते। लेकिन अपनी नौकरी और सेटिंग में इस कदर संतुष्ट और खुश थी कि कोई बदलाव, कम से कम कुछ समय तक तो नहीं चाहती थी। मगर इस बार नेहा के पापा ने जिस लड़के का जिक्र किया था वो पुणे से ही हे। पापा ने फोन पर नेहा से कहा – ‘नेहु कोई जबरदस्ती नहीं है पर तू इस लड़के से मिल तो सकती है। शहर के शहर में है और तेरी तरह किसी अच्छी कम्पनी में काम करता है। मन मिले तो ठीक, वरना राम-राम।’
पापा के अंतिम छोटे-से वाक्य ने नेहा को खुश ही कर दिया। सही तो है, उस लड़के से मिलकर अच्छा लगता है तो दोस्त बना सकती है। अगर दोनों के शौक और आदतें मैच करें तो दोस्ती अच्छे से निभ जायेगी। विवाह की ऐसी जल्दी भी नहीं है ना जरूरत। बिना एक-दूसरे को समझे-बूझे तो दोस्ती भी नहीं निभती। फिर विवाह तो संजीदा जिम्मेदारी है, सो बहुत सोच-समझ कर ही निर्णय लेगी। ये सब सोचते हुए नेहा को तसल्ली हुई कि वो सही दिशा में सोच रही है। कल्पना लोक में गोते लगाते हुए खो जाने वाली लड़की नहीं है वो।
सप्ताह के अंत में अनंत और नेहा का एक मॉल में मिलना तय हुआ। जगह दोनों के सुविधानुसार तय हुई थी। वरना ‘कम्यूटेशन’ में ही आधा समय चला जाता। नेहाजिसे शालीनता से संदर्भ के अनुसार तैयार हुआ करती थी वैसे ही पहनावे में जाने के लिए तैयार हुई। मौका कोई भी हो , उसके आँखों में चमकती आत्म विश्वास की दीप्ति कभी कम नहीं होती। शायद अब तक की उसकी सफलता में इसी विशेषता का बहुत बड़ा हाथ है। समय की पाबंद नेहा जब मॉल के सामने पहुँची तभी एक युवा भी ऑटोरिक्शा में वहाँ पहुँचा। जैसा नेहा को लगा कि वो अनंत हो सकता है, वैसे अनंत को भी लगा कि वो नेहा हो सकती है। दोनों की एक विशेषता तो कॉमन है, समय के पाबंद। नाम आदि जानकर परिचय हो गया तो दोनों एक रेस्त्रां में लंच के लिए चले गये, जिससे अधिक से अधिक बातें साझा की जा सके। वेसे भी नितान्त अजनबी से पहली मुलाकात में कितनी बातें साझा हो सकती हैं। दो-तीन घंटे में प्रारम्भिक परिचय और कुछ इधर-उधर की बातें हुईं। दोनों ही वयस्क और समझदार हैं, टीनएजर तो हैं नहीं। ये नहीं कह सकते कि दोस्ती की शुरुआत हो गई थी, पर ये कह सकते हैं कि दोनों दोस्ती का भाव लिये विदा हुए।
उसी रात को नेहा की मम्मी का फोन आ गया। ‘अरे, मिली कि नहीं, कैसा है लड़का, तुझे पसंद आ गया ना, अच्छा पढ़ा-लिखा – अच्छी नौकरी - - - ’
मम्मी बिना रुके निर्बाध गति से पूछे जा रही थी। पापा ने ही उसे टोक दिया – ‘भागवान, साँस तो ले ले और नेहा को भी साँस लेने दे।’
फिर उन्होंने बात शुरू की – ‘नेहा, जब तेरी मर्जी हो बात करना। बस तू ठीक-ठाक है ना! यहाँ कब आयेगी? शतरंज की अधूरी बाजी छोड़ कर गई थी, वैसे ही बिछी हुई है।’
‘पापा, आपको भी मम्मी की हवा लग गई है क्या?बीच में कोई ‘पॉज’ या ठहराव नहीं कि मैं कुछ बोलूँ।’– हँसते-हँसते बोलती हुई नेहा को ठसका लग गया और उसने फोन बंद कर दिया।
नेहा को मालूम है कि उसे जल्द से जल्द पापा-मम्मी से दोबारा संपर्क करना होगा, वरना मम्मी पापा को सुना-सुना कर परेशान कर देगी ‘मैं कहती हूँ तो आपको मजाक लगता है, अब अकेले नये शहर में खाँसी-बुखार हो जाये तो कौन संभालेगा? उम्र भले ही कुछ भी हो, अच्छी नौकरी भी कर रही है पर आपको नहीं पता अभी वो मन से बच्ची ही है।’
तभी नेहा का कॉल आया – ‘पापा आपका सबक हो गया, मम्मी पूरा सुना चुकी कि अभी बाकी है। पहले उन्हीं से बात कर लेती हूँ।’
‘हाँ मम्मी, अब बताइये, आराम से बात करेंगे।’
‘तेरी तबीयत तो ठीक है ना? खाना-वाना ठीक से खाती है कि नहीं, वहाँ कोई नहीं है जो तेरे पीछे लगा रहे …’
‘ठीक है मम्मा, मैं अपना ख्याल बिल्कुल अच्छे से रख रही हूँ। अब रात बहुत हो रही है। सोना चाहूँगी। सुबह ऑफिस भी जाना है। ओ. के. गुड नाइट।’ – नेहा सही में थकी हुई थी, सो सो गई।
उसकी मम्मी को जो असली बात जाननी थी वह रह गई कि लड़का कैसा है, नेहा को पसंद आया कि नहीं! नेहा इतनी जल्दी कोई निश्चय करना भी नहीं चाहती थी और उसके पापा का भी यही कहना था कि एक बार मिल लेने से ही कुछ तय नहीं कर सकते हैं। इतना अवश्य था कि कुछ दिन बाद जब अनंत का फोन आया कि ‘वीक एंड’ में मिल सकते हैं क्या, तो नेहा के पास इंकार करने की कोई वजह भी नहीं थी और उस दिन उसके पास समय की कमी नहीं थी।
इस बार दोनों आराम से लंच पर मिले। नेहा को लगा कि खाने में पसंद-नापसंद से एक ठीक-ठाक शुरुआत होगी। यही हुआ भी, दोनों शाकाहारी ही नहीं, दोनों संतुलित ‘हेल्दी’ खाने पर जोर देने वाले निकले। दोनों को बायोग्राफी और ऑटोबायोग्राफी तथा मोटिवेशनल बुक्स पढ़ने का शौक है। साझा शौक के कारण बातों का सिलसिला जो चला तो भागती हुई घड़ी की सूइयों पर दोनों में से किसी का ध्यान नहीं गया। पर दोनों ही उत्साह से भरे, अपनी दोस्ती के अगले पड़ाव पर पहुँच चुके थे। शाम को गज़लों का एक कार्यक्रम पास ही के एक हॉल में था। संयोग से दोनों के पसंदीदा गायक थे। नेहा को लगा कि इतनी समझदारी भरा और मनोरंजक सप्ताहांत बहुत समय बाद मिला जो उसे तृप्त भी कर गया और अगले हफ्ते भर के लिए नई ऊर्जा भी दे गया। इस दूसरी मुलाकात के बाद तो मम्मी का कुरेद-कुरेद कर कुछ भी पूछना लाजिमी था। नेहा अपने आप को चाक-चौबंद कर, पूछे जाने वाले संभावित प्रश्नों को स्वयं से पूछ कर, उत्तर तैयार कर स्वयं ही फोन मिला दिया। जब उसने पापा से कहा – ‘पहले मम्मी से बात करा दीजिए, बाद में आप से करूँगी।’ – तो उसके पापा को भी लगा कि उसने अनंत को पसंद कर लिया है। उन्होंने पत्नी को मोबाइल थमा दिया कि नेहा बात करना चाहती है। मम्मी का दिल तो खुशी से बौरा गया – ‘अरे बोल, तेरी हाँ ही होगी, मुझे पता था। इतना अच्छा तुम्हारे टक्कर का लड़का जो है …’
मम्मी के दिल का दरिया तो हमेशा की तरह एकदम बह निकलता है।
‘मम्मी ध्यान से सुनिए। यूँ ही ख्याली पुलाव मत पकाइये, मुझे पापा से भी जरूरी बातें करनी है।’
‘ऐसा क्या हो गया? तेरी आवाज़ से तो लगता है सबकुछ ठीक नहीं है। जल्दी बता … ’
नेहा ने उन्हें और अधिक बोलने का मौका न देकर आगे की बात बोल दी।
‘अनंत और मुझमें ’ अभी दोस्ती ही गहरी नहीं हुई, हम दोनों ही सोच समझ कर ही किसी रिश्ते पर मुहर लगायेगें। मुझे आपको जो बताना था बता दिया अब पापा को मोबाइल दीजिये।’
नेहा की मम्मी के मन में प्रश्नों का अंबार सा लगा हुआ था पर नेहा की धीर-गंभीर आवाज़ ने मानों उसे चेता दिया कि अभी कुछ भी पूछना सही नहीं होगा।
‘हां पापा , आपको याद है ना मेर ‘पैशन’ और सपने के बारे में, आपसे मैंने शेयर किया था। .... ’
नेहा के पापा को इस बात की उम्मीद नहीं थी सो संभलने में कुछ पल लग गये।
‘अरे – अरे , मैं तो समझा था कि तू उसे भूल के आगे बढ़गई है। अभी भी तेरे मन में वो दबी हुई इच्छा होगी, ये मैं सोच भी नहीं सकता था।’
‘पापा वो मात्र इच्छा नहीं है, वो तो मेरे जीवन का ऐसा पैशन है जिसको पूरा करने के लिए मैं जॉब कर रही हूँ। इन तीन वर्षों में मैंने इतना धन जमा कर लिया है कि एक वर्षीय कोर्स में एडमिशन लेकर अच्छे से तैयार कर सकूँ। मैं अपने मन की खुशी आपसे ही शेयर कर सकती हूँ। कम से कम तीन वर्षों तक तो मैं विवाह आदि बंधन का सोच भी नहीं सकती हूँ।’
आज तो नेहा के विचारों की नदी बह चली थी। पापा कुछ असहज से हो गये। अब तक पापा ने स्वयं को संभाल लिया था -----
‘ओह-हां, मुझे याद है, पर ये नहीं सोचा था कि उसके लिए तू इतनी ‘पेशीनेट’ थी । उधर से नेहा की रूठी हुई आवाज की कल्पना कर रहे थे। नेहा अपनी ही धुन में थी ----- ‘’पापा लिसन, मैंने इन तीन वर्षों मे इतना पैसा बचा लिया है, कि आगे कई साल जॉब न करूँ तो भी मेरा सपना पूरा हो जायेगा। बाद में तो इसी में ‘अर्निंग’ भी होने लगेगी। वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी के कोर्स के लिए फार्म भी भर दिया----’
‘अरे वाह, अपने आप सब कर भी लिया! अनंत को ये सब बात बताया कि नहीं?’ – पापा की आवाज़ में उत्सुकता साफ झलक रही थी।
‘अभी कहाँ; इतनी बातें हुई ही कहाँ? सोचा है इस वीक एंड पर बताऊँगी। ’ ----- नेहा अभी भी अपनी ही धुन में थी।
‘पर बेटा, जब तूझे यही सब करना है तो उससे मिली ही क्यों ? ये तो उसको झूठा भरोसा दिलाना हो जायेगा।’
‘पापा, आप भी मम्मी की तरह सोचने लगे। अनंत को नेचर और नेचुरल ब्यूटी से तो प्यार है तो हो सकता वाईल्ड लाइफ फोटोग्राफी से भी लगाव हो। इस वीक एंड में पता चल ही जायेगा। पर पापा, मेरा इरादा तो एकदम पक्का है। यहां मैंने जॉब में नोटिस दे दिया है फिर कोर्स ज्वाइन करने से पहले आप दोनों के साथ कुछ दिन रह लूँगी । बहुत सी तैयारी करनी है। पापा, आई एम सो एक्साइटेड।’------- नेहा की आवाज में रची- बसी खुशी कोई भी चिन्ह सकता है।
‘पापा, आप टेन्शन मत लीजिए, अनंत से दोस्ती बनी रहती है तो भी हर्ज नहीं। जरूरी थोड़ी है कि लड़का- लड़की मिलें तो बस एक ही लीक पर सोचें । अनंत भी सुलझे विचारों का है सो आप परेशान मत होईये। अब तो आप मेरे उड़ते पंखों को जब-जब सहारे की जरूरत होगी अपने हौसले का सहारा देते रहिये।