हास्य-व्यंग्य (81-90) : जयचन्द प्रजापति 'जय'
Hindi Hasya-Vyangya (81-90) : Jaychand Prajapati Jay
नेताजी की साइकिल से चलने की योजना (हास्य-व्यंग्य)
मेरे नेताओ और युध्द करो। मजा लो अपनी शक्ति और बुध्दि का। अब लौट आये न पुराने दिनों में। साइकिल से आफिस जाओ। साइकिल से चलने का नाटक करो। पेट्रोल बचाओ। घरेलू चीजों का इस्तेमाल करो। चटनी चावल खाओ। पहलवानी करो। देशी गुड़ खाओ। गन्ने का रस पीओ और दूध,दही खाओ। गाय,भैंस पालो।
नेताजी खुद फंस गये हैं। सरकारी आदेश है। पेट्रोल की बचत करो और आफिस साइकिल से जाओ। स्वदेशी अपनाओ। नेताजी घबड़ा गये हैं। जनता के बीच में इंसल्ट होना है। ससुरी के यही दिन देखना था। लक्जरी गाड़ी खरीदे थे। सायरन बजते जब गाड़ी टोले-मोहल्ले में जाती तो अपना रुतबा होता था।
नेताजी आज साइकिल से आफिस निकले। सिक्युरिटी भी साइकिल से निकला। कितनी बेइज्जती हो रही है। जनता हमारी असलियत जान जायेगी। जनता हमसे नहीं डरेगी। नेता की औकात जिस दिन जनता जान जायेगी। एक-एक मांस गिध्द की तरह नोंच-नोंच कर खा जायेगी।
नेताजी कैमरे वाले से कह रहे हैं। हर एंगल से फोटो खींच लो ताकि दुनिया के लोग जाने कि नेताजी बहुत गंभीर प्राणी हैं। देश के बारे में सोंच रहे हैं। ये हमारा जमीनी नेता है। हमारे लिए कितना संघर्ष कर रहा है। नेताजी के भागदौड़ में कोई कमी नहीं है। सच्चा जनप्रतिनिधि है।
नेताजी की अंतरात्मा जाग गयी। नेताजी एक चमचे से कहा कि पूरे महीने भर की फोटो हर एंगल से निकलवा लीजिए। प्रत्येक दिन की एक-एक खबर अखबार मे प्रतिदिन निकलवा दिया जायेगा। जनता को मैसेज देना है। जनता को बेवकूफ बनाना है। जनता साइकिल से चलेगी।
बाकी हम लोग पीछे के रास्ते से लक्जरी कार से चलेंगे। यार ऐसा करो कि शर्मा जी की पेट्रोल टंकी ही खरीद लो। पेट्रोल हम नेता यूज करेंगे। जनता को पेट्रोल नहीं मिलेगी तो खुद- ब-खुद साइकिल पर होगी। जब सब साइकिल से चलेंगे तो अपनी योजना कामयाब हो जायेगी।
पति कल्याण योजना (हास्य-व्यंग्य)
सोना कम खरीददारी करने का आह्वान सुन कर पतियों में खुशी की लहर दौड़ गयी है। कुछ तो झूम उठे कि ऐसे युध्द होते रहेंगे तो सोने खरीदने के दिन चले जायेंगे और जो पति दो रोटी खाते थे अब पांच रोटियां रगड़ दे रहे हैं। वे जान रहे हैं कि अब सोना खरीदना नहीं है जो पैसा बचेगा वह अपने सेहत पर खर्चा किया जायेगा।
आखिर आ ही गये सुख के दिन। यह पतियों के कल्याणकारी योजनाओं के लिए लांच की गयी बहुत बढ़िया स्कीम है। इससे खुशहाली आयेगी। बैंक बैलेंस में वृद्धि होगी। अब पत्नियां पतियों पर सोना खरीदने का दबाव नहीं नहीं बना सकती है।
दुखीराम जिस दिन से यह खबर सुन रखें हैं कि सोने की खरीददारी से बचें। दुखीराम आज बहुत प्रसन्न मुद्रा में हैं। कई मंदिरों में पूजा पाठ भी कर आये और हफ्ते में दो दिन व्रत रहने का संकल्प लिया कि हमारी सरकार को ऐसी सद्बुद्धि हमेशा के लिए बनी रहे ताकि हम लोग पत्नियों द्रारा सोने के नाम पर प्रताड़ित न हो सके। अब पत्नी की चली आ रही कई वर्षों से झुमके की मांग स्थगित हो जायेगी। यह राहत भरी खबर है।
यह समाचार सुशीला के ऊपर गिरा वज्रपात से कम नहीं है। वियोग रस से परिपूर्ण खबर जब से सुनी है। उसका ह्रदय और मन बहुत बुझा-बुझा सा हो रहा है। वह कई सालों से सपना बना रखी है एक झुमके का और वादा के मुताबिक पति महोदय का इस बार देने का प्लान चल रहा था। इसी समय पर यह जरूरी खबर भी बुरी खबर से कम नहीं।
पतियों ने जगह-जगह जुलूस निकाले हैं और इसको एक देशव्यापी सरकारी सूचना को समझ कर पतियों को जागरूक किया जा रहा है। सरकार का यह नियम कल्याणकारी योजनाओं में से एक है जो पतियों के चेहरे पर मुस्कान लाने में कामयाब है। पतियों के लिए यह खबर एक खुशी की लहर से कम नहीं है।
कमाल है लिपिस्टिक का (हास्य-व्यंग्य)
आखिर उसकी सुंदरता का राज उसके होंठों पर लगे लिपिस्टिक का कमाल है कि उसके सौंदर्य में चार चांद लग जाते हैं। जब वह निकलती हैं तो इत्र की खुशबू फैल जाती है। सुरम्य वातावरण सा हो जाता है। कई रसिक बंधुओं के हृदय में सतरंगी रंग उभर जाता है। इस तरह से कइयों ने बर्बादी का इतिहास लिख दिया है।
उसके होंठों पर लिपिस्टिक की रंगत से कितनों का घर उजड़ गया। सोहन अपनी पत्नी को अलविदा कह दिया। मुरारी तो उसकी सुंदरता पर इतना मंत्रमुग्ध हो गया कि शराब की लत लग गयी और सड़कों पर बर्बादी की किताब लिख दी।
मनोहर तो गलियों का गीतकार बन बैठा। उसके कंठ से दर्द भरे नगमें निकलना शुरू कर दिया। एक से एक दर्द भरे गीत गाकर नाले में गिरकर जान दे दी। कुछ ने तो आत्महत्या कर ली लेकिन उसके सौंदर्य से आच्छादित होंठो को नहीं छू सके। अत्यधिक सुंदरता भी कई लोगों की विदाई कर दी।
कमजोर हृदय वाले तो उसके होंठो पर प्रेम विरह की कविताएँ लिख दी। एक से एक बढ़कर कविताएँ लिख दी। बेचारे कवि को पता ही नहीं चला कि इतनी सच्चाई भरी कविताएँ लिख दी और वह अमर हो गया।
जब वह खिड़की से झांका तो कई राह चलते युवकों का हृदय मचल उठा और एक से एक कर प्रेम की अग्नि में जलकर वीरगति को प्राप्त कर लिये लेकिन उसके सौंदर्य को प्राप्त करने की अंतिम इच्छा पूर्ण नहीं हो सकी।
यह संपूर्ण दुनिया इसी लिपिस्टिक का कायल हो चुका है। बड़ी-बड़ी कोठियां बिक गयी। बड़ी-बड़ी सल्तनतें बिक गयी। राजा फकीर हो गया। महल खंडहर में तब्दील हो गया पर इस मायावी लिपिस्टिक का मर्म कोई समझ न सका।
काकरोच बेचारा बेरोजगार (हास्य-व्यंग्य)
काकरोच बेचारा एक बेरोजगार प्राणी है। पढ़ा-लिखा है। ग्रेजुएट की डिग्री है। मास्टर की भी डिग्री है फिर भी बेचारा परजीवी है। आश्रित जीवन जी रहा है। इस तरह से दुबला- पतला सा दिखता है। कुछ तो कुपोषण के शिकार हैं। मंहगाई डायन इनको भरपूर जीवन नहीं जीने दे रही है।
रोजी-रोटी का विशेष जुगाड़ न होने के कारण कई दिन उपवास भी रह लेते हैं। ये सहनशील होते हैं इसलिए कई दिन बिना खाये जीवित रहते हैं। किसी बेरोजगार काकरोच का कहीं जुगाड़ हो गया तो रोजी-रोटी चलती रहती है।
बेरोजगारी की मार के कारण खूबसूरत गृहिणी नहीं मिल पाती है। किसी तरह से घर गृहस्थी बस जाती है। नून तेल किसी तरह से इकट्ठा हो जाता है। यही काफी है। पूर्ण विटामिन से परिपूर्ण भोज्य पदार्थ कभी नहीं मिला।
देश के कोने-कोने में इनकी संख्या पाई जाती है। प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। झुंड के झुंड पाये जाते हैं। इनकी गरीब बस्ती होती है। ठीक से साफ-सुथरा जीवन नहीं जी पाते हैं।
कभी-कभी आन्दोलन करते हैं। अनशन पर भी बैठ जाते हैं। यह देशव्यापी होता है।
भले बेरोजगार होते हैं लेकिन कुछ स्वाभिमानी होते हैं। सहनशील भी होते हैं। कोई इनका अपमान नहीं कर सकता है। सर्वोच्च सत्ता भी इनका कुछ भी नहीं उखाड़ सकती है। इनके पास एकता की शक्ति है। देश की सर्वोच्च पार्टी से भी मुकाबला कर सकते हैं। इनके अंदर भी गुटबाजी का गुण पाया जाता है।
पति ने बदला अपना सुर (हास्य-व्यंग्य)
जब से बृजमोहन की शादी हुई है। उनके अंदर संस्कार आ गये हैं। पत्नी के सामने अदब से रहने लगे हैं। चेहरे पर ऐसे गंभीर भाव रखने लगे हैं जैसे वे संस्कृत साहित्य के प्रकांड विद्वान हैं। सधे हुये वाक्यों का प्रयोग शुरू कर दिये हैं। उनकी पत्नी ने समझा कि ऐसे महान विद्वान को पाकर वह धन्य हो गयी है।
पहले झूठ का पुलिंदा होंठों पर रहता था लेकिन अब सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र हो गये हैं। जुबां पर एक शब्द असत्य नहीं। पत्नी को पूर्ण यकीन हो गया कि यह बंदा सत्य का पुजारी है। सत्ता को भी लात मार सकता है। सत्य का खून रगों में प्रवाहित हो रहा है।
आजकल वह सुमधुर आवाज में बात करता है। कर्कश आवाज अब नहीं निकलती। जैसे संगीत होंठों पर विराजमान है। मां सरस्वती का पूर्ण आशीर्वाद है। अब वह मारपीट वाले शब्द उनके शब्दकोश में नहीं हैं। बिल्कुल शांत रस में डूबा रहता है।
अब सारे वस्त्र साफ सुथरा पहनने लगे हैं। बालों को सदैव काला रखने लगे हैं ताकि पत्नी को ज्यादा उम्र होने का एहसास न हो। क्लीन शेव रखने लगे हैं। बिना इस्त्री किये वह अब कपड़ा नही पहनता है। आंखों में सुरमा उनके चेहरे की अब शान है।
आखिर यही बृजमोहन एक नंबर का आवारा था। मां-बाप को कसैले शब्दों से नवाजता रहता था। शादी के बाद से वह अपने माता-पिता को संपूर्ण तीर्थों का भगवान समझने लगा है। संस्कार और संस्कृति कभी जाना ही नहीं लेकिन अचानक आये बदलाव से लोग बड़े संकट में हैं।
पत्नी को पूर्ण एहसास है कि उसकी संपूर्ण मनोकामना पूर्ण हो गयी है। सातों जन्म तक साथ बना रहे यही बेचारी की निजी इच्छा है। ऐसा होनहार पति जिसको मिल जाये वह पत्नी अपने आप को बहुत खुश समझेगी। पति ने अपना सुर बदल लिया है। अब वह पत्नी की नजरों में श्रेष्ठ हो गया है।
सुंदरता की तारीफ (हास्य-व्यंग्य)
एक सहेली ने अपनी सहेली की सुंदरता की तारीफ की तो वह खुद अपनी सुंदरता की बगीचा ही लगा दिया। मैं तो जब पैदा हुई थी। बेहद खूबसूरत थी। किसी ने प्यारी गुड़िया कहा तो किसी ने क्यूट लड़की कह कर तारीफ की थी। कुछ पड़ोसियों ने तो नजर ही लगा दी। जब मेरी माँ आंखों में अंजन लगाती थी तो बेहद खूबसूरत सी नजर आती थी।
आखिर जब मैं बड़ी होने लगी तो सुंदरता में और चार चांद लग गये। बालों की खूबसूरती और मेरी आंखों में हिरनी जैसी चपलता, मैं एक उछल कूद करने वाली लड़की हो गयी थी। मैं खूब मशहूर हो गयी थी। मेरी सुंदरता की तारीफ तो मेरी माँ खूब जमकर करती थी। पड़ोस में आसमान की नीली परी के नाम से जानी जाती थी। लड़कों के लिए तो मोहल्ले में हलचल कर देने वाली गुड़िया थी।
स्कूल के दिनों में एक राजकुमारी सी लगने लगी थी। बालों में दो चोटियाँ बनाकर चलती थी। स्कूल के लड़के पीछे-पीछे चलते थे। मुझे अपने सुंदर मुखमंडल पर गर्व होता था कि मैं एक सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाली लड़की हूँ। स्कूल के दौरान प्रेमपत्र तो हजारों मिले थे। किसी ने पूर्णिमा का चांद कहा तो किसी ने फूलों से सजी एक खूबसूरत चंचल लड़की कहा जो खुले आसमां के नीचे रहकर विचरण करती है। किसी ने एक स्वतंत्र जीवन जीने की शौकीन बाला की संज्ञा दी।
जब मैं युवा हो गयी तो बहारों की मल्लिका हो गयी। कोई सुदूर अंचल से निहार रहा है तो कोई खिड़कियों से देखकर आह का स्वर होंठों पर लाता। सच बता रही हूँ। कई युवकों ने तो मेरे वजह से मल्लयुद्ध भी कर लिये। किसी के दांत टूटे तो किसी का थूथन तो किसी जबड़ा ही फट गया। मैं सबको चकमा दिया। कोई मुझे अपने गले का हार नहीं बना सका। कवियों ने तो ढेर सारी कविताएँ मेरी सुंदरता पर लिख दी।
जब मैं शादी के पूर्ण योग्य हो गयी। सब चाहने वाले अपनी-अपनी गृहस्थी बसा ली। कोई लड़का मिला नहीं तो यही बुद्दू मियां मिल गये। बड़े-बड़े दो दांत निकले हैं। जवानी में सूखकर कांटा जैसे दिखते हैं। न तो तन में रौनक न तो मन में कोई भाव। अब इन्हीं में अपना जीवन जी रही हूँ। मेरी सुंदरता की जो कद्र होनी चाहिए थी शायद मेरे गुरूर ने मुझे यहाँ लाकर पटक दिया। यही मेरी पटकथा है।
यमराज ने हत्यारों की भर्ती की (हास्य-व्यंग्य)
यमराज जी बढ़ती जनसंख्या के कारण लोगों का मारने का काम पूरा नहीं कर पा रहे थे। उनके यहाँ कई पद रिक्त चल रहें थे। यमराज जी चाह रहे थे कि यह भर्ती डायरेक्ट पृथ्वीवासियों की हो। आवेदन करने की तारीख घोषित कर दी गयी।
आवेदन भरने की आवश्यक शर्त रखी गयी। आवेदन करने वाला खूंखार प्रवृत्ति का होना चाहिए। किसी को मारने में कोई शील-संकोच न करने वाला हो। दुबला-पतला भी चल जायेगा। हिम्मती होना चाहिए। छुरा-चाकू चला सके। इसमें कई पद सृजित किया गया।
बच्चों को पटक-पटक कर मारने की क्षमता हो। बिल्कुल बेरहम मारते वक्त हो जाना है। महिलाओं को मारकर फांसी पर लटकाने की ताकत रखता हो। गलत ढंग से ड्राइविंग कर लोगों का एक्सीडेंट करके मारने की क्षमता हो। खुद को भी संकट मे डालने की क्षमता हो।
दयावान व्यक्तियों को आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है। सज्जन व्यक्ति कृपया आवेदन न करें अन्यथा आपका आवेदन निरस्त कर दिया जायेगा। क्रूर ढंग से मौत देने वाले को वरीयता प्रदान किया जायेगा। आवेदन में कमी होने पर भी आवेदन निरस्त नहीं किया जायेगा।
बेरोजगारी के इस दौर में लाखों आवेदन आये। यमराज जी ने इतनी बड़ी संख्या में आवेदन आने से अत्यंत संतोष की सांस ली है कि लोगों को मारने का काम आसान हो जायेगा। भर्ती का काम जल्द पूरा कर लिया गया।
भर्ती का काम पूरा होते ही पृथ्वी पर जगह-जगह हत्यारे अंजाम देने लगे। किसी का गला काटा जा रहा है। किसी के सिर पर वार करके हत्या किया जा रहा है। नाबालिग लड़कियों के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या की घटनाओं का अंजाम दिया जाने लगा है। यमराज का काम इस भर्ती से आसान हो गया है।
वे कद्दावर नेता हैं (हास्य-व्यंग्य)
वे कद्दावर नेता हैं। उनकी अपनी जमीनी हकीकत है। जहाँ जाते दुनिया उनको सलाम करती। उनका अपनापन जनता में है। साफ-सुथरे मन के व्यक्ति हैं। विनम्र स्वभाव के हैं। लूटपाट में कोई भरोसा नहीं करते। कभी गरीबों को नहीं सताते हैं।
इनका अपना तेवर होने के कारण कद्दावर नेता बने हैं। बड़े पूज्यनीय हैं। विशाल ह्रदय के स्वामी हैं। जब आम जनता के बीच में होते हैं। ऐसा कद्दावर नेता जिसको मिल जाये वह पूंजीपति हो जाता है। वह अपना वरद हस्त जिस पर रख दे वह मालामाल हो जाता है।
कद्दावर नेता का हाथ सरकारी माना जाता है। सरकार में उनकी गिनती होती है। सरकार भी इनकी बात मानती है। छोटे बड़े सुझाव को सरकार गले लगा लेती है। इस तरह इनकी अपनी धाक होती है। कद्दावर नेताजी कलयुग के देवता हैं। जहाँ जाते हैं। फूल माला की वर्षा की जाती है। 'तुम भी फूलो फलो, हम भी फूले फले ' यह कहावत कद्दावर नेता तथा उनके चमचों पर सटीक निशाना है।
जब भरोसेमंद जनता अंधेरी रात में सुख की निद्रा में होती है तो ये कद्दावर नेता फाइलों में लग जाते हैं। सरकारी पैसों को हजम करने की नीति बनाते हैं। किस योजना में किसको कितना देना है ? मामला हल कर लिया जाता है। अधिकारियों को रात के अंधेरे में चढ़ावा चढ़ाया जाता है। मामला रात का रात में रफा-दफा कर दिया जाता है।
आम जनता खर्राटे में मस्त है। कद्दावर नेता हेराफेरी में मस्त हैं। सुबह होते ही जनता जागने लगती है। आम जनता को उठते देखकर कद्दावर नेता भी आंख मलकर उठते नजर आते हैं। आम जनता को समझ में आता है कि कद्दावर नेता हम लोगो के साथ सोते हैं तथा सुबह होते ही नेताजी भी उठ रहें हैं पर कद्दावर नेता की खुद्दारी तथा गद्दारी का मर्म समझना बहुत मुश्किल है।
नेताजी की सेवा करने से मिलता है टिकट (हास्य-व्यंग्य)
चुनाव नजदीक आते ही बड़े नेताजी से चुनाव लड़ने वाले संपर्क साधने लगे। अपने क्षेत्र में जनता की सेवा करने में जी जान से लग गये। कुछ ने तो भाड़े का भीड़ दिखाकर नेताजी को उल्लू बनाकर टिकट लेने की जुगत लगाने लगे।
नेताजी ने घोषणा की, जो अपने क्षेत्र में जनता की सेवा खूब किया है। जनता सबसे ज्यादा जिसका सपोर्ट करेगी। टिकट उसी को मिलेगा। सारे लोग नेताजी के दरबार में हाजिर हुए। सारे लोगों ने अपने-अपने तारीफ में पूल बांधने लगे।
एक ने अपनी तारीफ की। जनता की सेवा करने में अपना तन-मन जनता के घर गिरवी रख दिया हूँ। उन्हीं की सेवा करने में मैं इतना दुबला-पतला हो गया हूँ। जनता की सेवा करना धर्म हमारा है। टिकट हमको मिलना चाहिए नेताजी।
अगले ने अपनी करुण कहानी सुनाई। हमने जनता के बीच में रात दिन गुजारी है। यहाँ तक कि अपने घर की रोटी तक नहीं खाई। जनता की ही रोटी खाकर गुजारा कर रहा हूँ। दिन को न दिन समझा और रात को न रात समझा। सच्चा समाजसेवी हूँ मैं नेताजी।।
एक-एक करके लोगों ने अपनी प्रशंसा खूब की। सबने जनता की सेवा खूब की है। कहकर टिकट की पैरवी खूब की। नेताजी ने कहा--सब की समीक्षा की जायेगी। जो समाज सेवा में अव्वल दर्जे का किया होगा। उसी को टिकट मिलेगा।
अगले दिन अखबारों की सुर्खियाँ बन गयी कि टिकट मुरारीलाल को मिल गया। जनता तथा चुनाव में तैयारी करने वालों में चर्चा है कि मुरारीलाल तो कभी जनता के बीच में गया ही नहीं। कैसे टिकट मिल गया?
राजनीति के कच्चे खिलाड़ियों! जनता की नहीं नेताजी की सेवा मुरारीलाल ने की। मुरारीलाल ने एक थैला पैसा नेताजी के चरणों में समर्पित कर दिया। अरे मूर्खो! टिकट जनता की नहीं नेताजी की सेवा करने से मिलता है।
लूट गये साहित्य के बाजार में (हास्य-व्यंग्य)
मुझे एक साहित्यिक सम्मेलन में मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया। पहली पर ऐसा साहित्यिक स्नेह मिलने से मैं गदगद हो गया। हृदय में नई-नई भावनायें बादलों की तरह उमड़ने- घूमड़ने लगी। मन मष्तिष्क सातवें आसमान में सैर करने लगा। अब महसूस हुआ कि साहित्यकारों की श्रेष्ठ श्रेणी में पहुँच गया हूँ।
बालों की कटाई-छंटाई नाई से करवाई। बाल पकने से उम्र कम दिखे। इसके लिए हेयर डाई लगवाई। पुराना जूता फट गया था। मोची से मरम्मत कराई। क्रीम पाउडर भी मंगवा लिए थे। लगना चाहिए था कि मैं एक मुख्य अतिथि के तौर साहित्यिक सम्मेलन में साहित्यिक भाव मेरे रोम-रोम में भरा पड़ा है। कुर्ता-धोती नील से रंग लिया था।
सुना था कि मुख्य अतिथि जो बनता है उसके उपर पैसों की बौछार होती है। ज्यादा पैसे गिरने की उम्मीद से खादी का एक झोला भी खरीद लिया था ताकि पैसे की बारिश होते ही झोले में सब भर लूं। जिंदगी में जो नासूर भरा पड़ा है। वह ठीक हो जायेगा। तरक्की के रास्ते खुल जायेंगे।
कार्यक्रम की तैयारी हो गयी। हम भी शाही अंदाज में जैसे ही पहुंचे। लोगों ने फूल माला से लाद दिया। जय-जयकार अपना सुनकर महसूस हुआ कि कलयुग का देवता मैं ही हूँ।साहित्य से भरपूर हो गया हूँ।
मंच पर जैसे ही खड़ा हुआ। तालियों से पूरा पंडाल गूंज गया। प्रत्येक साहित्यकारों की तारीफ करना था। एक-एक साहित्यकारों की तारीफों के पूल बांधना शुरू कर दिये। शानदार शब्दों से ऐसा नहलाया कि सारे उपस्थित साहित्यकार मस्त हो गये। झूठे-झूठ तारीफ खूब झोंका। पूरी महफ़िल झूठे झूठ खुश हो गयी। नोटों की बरसात हो गयी। खादी का झोला भर गया। कार्यक्रम खत्म हो गया।
इतना पैसा जिंदगी में नहीं देखा था। झोला को पूरी मुस्तैदी से दबोच रखा था। आंधी रात थी। डर था। किसी की नियत खराब हुई तो झोला हाथ से निकल जायेगा। ईश्वर की कृपा है। अब समझ आया की साहित्यिक दुनिया में पैसों का जलवा है जैसे घर पहुंचे। दरवाजा बंद किया। जल्दी से झोला खोला, देखा तो मेरे अंदर का साहित्यिक रंग फीका हो गया। नोटों पर लिखा था चिल्ड्रेन बैंक। हम तो लूट गये साहित्य के बाजार में।