हास्य-व्यंग्य (71-80) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

Hindi Hasya-Vyangya (71-80) : Jaychand Prajapati Jay

घूस की महिमा (हास्य-व्यंग्य)

सरकार ने एक नंबर जारी किया कि जो घूस मांगता है उसकी इस नंबर पर शिकायत दर्ज करा सकते हैं। मैनालाल नंबर पाकर गदगद हो गये। बिगड़ा काम जल्द हो जायेगा। दारोगा जी को नाको चना चबवा दूंगा। मेरा एफआईआर दर्ज करने के लिए घूस मांग रहा है।

मैनालाल बहुत खुश थे। विपक्षी को अब पता चलेगा कि मेरी पहूँच बहुत दूर तक है। घूस एक पाई नहीं दूंगा। एक रुपया मेहनत से आता है। दारोगा जी के पसीने छूट जायेंगे। नानी की याद आ जायेगी कि किस आदमी से पाला पड़ गया।

मैनालाल ने घूस लेने वाले दारोगा जी की शिकायत किया कि बिना घूस एफआईआर नहीं दर्ज कर रहे हैं। रुपये पेड़ में थोड़ी फलते हैं। साहब गरीब आदमी पर दया कीजिये। मैनालाल को बताया गया कि दारोगा जी को एक मिनट में हवालात में बंद कर दिया जायेगा। इनको मुफ्त में हवा और लात मिलेगी।

बेचारे के चेहरे पर मुस्कान थिरक गयी। सौ वाट का बल्ब चेहरे पर जल गया कि मैनालाल का काम हो जायेगा। बताया गया कि खर्चा लगेगा। बस सारा काम निपटा देंगे।

मैनालाल का माथा ठनका। दारोगा जी तो मामा ही थे। घूस निपटान केन्द्र तो उसके दादा निकले।

जगह-जगह से दबाव बनाने के लिए इस आफिस से उस आफिस तक। चक्कर पे चक्कर। भागदौड़ में कोई कमी नहीं। हर जगह से दबाव के लिए खर्चा- बर्चा की मांग की गयी। बहुत दौड़ लगाया। चप्पल घिस गयी। आंखों की रोशनी चली गयी। पोपला मुंह हो गया। दांत सारे झड गये। बालों में सफेदी आ गयी। कोई सुनवाई नहीं हुई।

घूस की महिमा के कारण बेचारे चढ़ावा नहीं चढ़ा सके। घूस पे घूस। घूस से छुटकारा दिलाने वाले को घूस। एफआईआर दर्ज नही हो सकी। एक जिंदगी बीत गयी। घूस न देने के कारण मैनालाल बेचारे का एफआईआर दर्ज नही हो सकी।

हाय रे, मेरा पांच साल (हास्य-व्यंग्य)

नेताजी बोले कि आज गरीब बस्तियों में चलों। वोट का ढेर है। चुटकी बजा दो। वोट का रेला उसकी तरफ हो जायेगा। सरकार चाहे किसकी बने उन गरीबों से इसका क्या मतलब? लालीपॉप थमाना है। इनका पैर छूना है। दो शीशी थमा दो। जिसकी खाते हैं, उसकी गाते हैं।

नेताजी के आदेश पर फुटकर टाइप के नेताओं का झुंड एक- एक वोट छूटना नहीं चाहिए। हल्ला बोलते हुए घर- घर छाप लिये। नेताओं को देखकर गरीब आदमी जान गया कि लगता है पांच साल बीत गया है। पांच साल तक मिलना कुछ नहीं। जितनी शीशी मिले गटक लो।

नेताजी ने दादी को दण्डवत प्रणाम किया। सस्ती वाली साडी़ थमा दी। बड़की चाची तो एक नोट पा गयी। चाचा की चड्डी की व्यवस्था हो गयी। बड़की भौजी घूंघट में से बुदबुदाई कि हमको कुछ दे दो। घूंघट की आड़ में तीन वोट दे दूंगी।

बड़की भौजी के दिलेरी पर नेताजी नोटों की बरसात कर दी। नेताजी बोले कि आप सब का नमक खाया हूँ। जान हाज़िर है। अगर हम जीत गये तो पूरे पांच साल तक शीशी का नि:शुल्क वितरण होगा। एक वोट भी बहकना नहीं चाहिए।

जी भरकर नेताजी शीशी थमाया। सबने जी भरकर पिया । नशा इतना चढ़ गया कि जिस पार्टी को वोट देना था। सारी वोट विपक्ष को ठोंक दिया। नेताजी भड़क गये। एक बोला.. साहब सब लाल-पीला दिख रहा था। एक पर ठोंक दिया।

एक समझदार शराबी ने कहा--तू मेरा पांच साल बर्बाद कर रहा था और मैने तेरा पांच साल बर्बाद कर दिया। नेताजी गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाये। हाय रे, मेरा पांच साल..

चीलर सफेदपोश बना रहता है (हास्य-व्यंग्य)

चीलर कपड़ों के अंदर पाये जाते हैं। खासकर जो सबसे अंदर पहने जाते हैं। रक्तचूसक परजीवी होता है। सफेद दिखाई देता है। देश में पाये जाने वाले नेताओं की पोशाक की तरह श्वेत वर्ण में होते हैं। चीलर लाल रक्त को चूसकर आदमी को कमजोर करता है। रक्त चूसकर मोटा तगड़ा हो जाता है लेकिन वह चीलर सफेदपोश बना रहता है।

गंदे वस्त्रों में दबंगई से रहता हैं। इनका पूरा कुनबा इस कार्य में सहयोग करता है। चीलर ग्रस्त व्यक्ति परेशान सा रहता है। एक जगह खुजलाकर खुजलाहट ठीक करता है तो दूसरी जगह की खुजलाहट शुरू हो जाती है। ये चौबीसों घंटे सक्रिय रहते हैं।

हमारे देश के अंदर भी चीलर प्रवृत्ति के लोग अंत:तह में रहते हैं। बिल्कुल सादगी परस्त। देश के अंदरूनी भाग को चीलर की तरह कमजोर करते हैं। इस तरह के प्रवृत्ति में उनके कुनबे के साथ अन्य सहयोगी घटक दल भी इस कार्य में अपनी सुविधा के अनुसार देश के अंदरूनी भागों को कमजोर करने में लगे रहते हैं।

इस तरह के चीलरों का दमन करना आसान नहीं है। इनकी जड़ें गहरी होती हैं। इनको जड़ से उखाड़ना बेहद मेहनत का काम है। इनको खत्म किया जा सकता है। बेहद सख्ती अपनाना पड़ेगा। गरम पानी में उक्त कपड़े को कुछ समय तक रखा जाये तो समूल नष्ट किया जा सकता है।

हमारी सरकार भी खौलते पानी को देश में व्याप्त जहाँ-जहाँ चीलर प्रवृत्ति है उन पर कठोरतम गुण अपनायें तो चीलर रुपी दानवों का सफाया किया जा सकता है। कपड़े की सफाई करके चीलर को खत्म कर सकते हैं। देश के भीतर खोखला करने वाली ताकतों का सफाया करके देश को आंतरिक रूप से मज़बूत किया जा सकता है।

नेताजी वोट के लिए सब खा लें (हास्य-व्यंग्य)

चुनाव आते ही नेताजी जहाँ जाते हैं, भोज्य पदार्थ भी वहां के रीति-रिवाज के अनुसार परोसा जाता है। उसी माहौल में ढल जाते हैं। नेताजी को जनता के इरादों पर ही चलना पड़ता है तब जनता समझती है कि यह अपना नेता है।

नेताजी गरीब आदमी के घर गये तो गरीब ने टूटी खटिया पर बैठा दिया तो नेताजी ना कर ही नहीं सकते हैं। वोट का मामला था। भले इडली डोसा न खाने के भक्त है। दक्षिण भारतीय का वोट लेना है तो वहां का राष्ट्रीय भोजन इडली डोसा खाना पडेगा। वोट के लिए जनता अगर गधा को अपना राष्ट्रीय पशु मानकर बैठा दिया तो नेताजी को वोट लेना है तो उस गधे पर बैठना ही पड़ेगा।

उत्तर भारतीय लिट्टी- चोखा खिलाना पसंद करेंगे तो नेताजी मना थोड़ी करेंगे। नेताजी परिवर्तनशील होते हैं। जिस क्षेत्र की वोट की जरूरत होती है तो वहाँ की भाषा बोलेंगे। शाकाहारी है तो कोई फर्क नहीं है। वोट के लिए मांसाहारी तक बन जाते हैं। नेताजी रोटी अचार भी खा लेंगे। वोट के लिए कोई हर्ज नहीं।

जो कभी मंदिर, मस्जिद नहीं गये। वोट के लिए चले गये तो निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया जाता है। गधे को मामा कह दिये तो कौन सी इज्जत की खेती बिगड़ गयी। वोट लोग नि:शुल्क देते हैं। लोगों की भावना को बदलने की कला में पारंगत नेता को वोट मिल ही जाता है।

चुनाव के दौर में आम जनता ने नेताजी को भात मछली खिला दिया। कुछ नेता लोग सोंचे कि ई नेताजी तो जनता के ह्रदव में वास कर जायेंगे। कुछ ने तो टांग अड़ा दी जो बगुला भगत वाले थे।

अरे महोदय जी , येन केन प्रकारेण से कोई वोट का जुगाड़ बना रहा है तो किसी की नानी क्यों मरे। जिस दलित को लोग छूते नहीं थे, उनके घर में दूध भात खा लिये तो आपका दिमाग खराब क्यों हो रहा है भाई जान। वोट कोई श्रध्दावान नेता ही योग्य है जो आम जनता से निशुल्क वोट लेकर चला जाता है।

आलोचक की आलोचना (हास्य-व्यंग्य)

रामस्नेही एक कवि थे। उदारता से भरी रचनायें लिखते थे। उनकी ख्याति देश के कोने-कोने तक हुई। उनकी एक कविता एक आलोचक के हाथ लग गयी। गुणी आलोचक थे। बड़े-बडे लेखकों की आलोचना करके बड़ी उपलब्धि हासिल किये थे।

कुछ लोग उन्हें आलोचना का महामना कहा। आलोचक महोदय भी प्रसिद्धि की सीमा पार कर चूके थे। आलोचक रामस्नेही की कविता की आलोचना लिखी। आलोचना का एक-एक तत्व उड़ेल दिया। उनकी आलोचना का जितना गरल था। सब उनकी कविता पर बहा कर दी।

ईर्ष्या की कुदृष्टि इतनी कूट-कूट कर भरी थी। कविता की आत्मा तक कराह उठी। जब कविता की आत्मा कराह उठे, कवि अपनी कविता की आलोचना सुनकर कवि की रुह कांपने लगे तो समझो आलोचना अपने अंतिम रुप को प्राप्त कर ली है अर्थात आलोचना पूर्णरूपेण सफल रही।

कवि रामस्नेही अपनी कविता की आलोचना सुनकर चारों खाने चित्त हो गये। जिह्वा से शुध्द शब्द नहीं निकल पा रहे थे। उनके आंखों से झर-झर आंसू बह पड़े। इतनी खूबसूरत कविता का ऐसा पोस्टमार्टम आलोचक महोदय ने कर दी। कवि महोदय को मुर्छा आ गयी। बिना संजीवनी के कवि की मुर्झा तारीफ करने वाला आलोचक ही ठीक कर सकता है।

कवि बहुत चिंतित हुआ कि आलोचना ठीक से नहीं की गयी। आलोचक जी लगता है आलोचना के समस्त गुण का गलत मरहम लगा दिये जिससे गलत प्रतिक्रिया हुई। कवि महोदय ने आलोचक के पास पारितोषिक भेजा और कविता पर फिर आलोचना लिखने का निवेदन किया।

कविता पर फिर से आलोचना लिखी गयी। आलोचक जी पारितोषिक पाकर उनका ह्रदय गदगद हो गया। कविता का समस्त अवगुण गुण में परिवर्तित हो गया। तारीफों की ऐसी बारिश की गयी। कवि महोदय ऐसा महसूस किये जैसे संगम में डुबकी लगा लिये और इस भवसागर से पार हो गये।

हारे प्रत्याशी की मनोदशा (हास्य-व्यंग्य)

बेचारे चुनाव हार गये। बड़ी उम्मीद थी। कर्जा लेकर चुनाव लड़े थे। पूरा दांव लगा बैठे थे। साम, दाम, दंड और भेद की पूरी रणनीति लगा दी। यहाँ तक कि चाणक्य नीति का कोना-कोना प्रयोग किये थे। एक-एक मतदाता का पैर छुये थे। सारे धार्मिक स्थलों पर माथा टेका था। ससुरी के... अपना मनहूस चेहरा भी देखने का मन नहीं करता।

पतिदेव की करारी पराजय पर पत्नी के चेहरे की सौंदर्य धूमिल नजर आ रही है। मन ही मन कह रही है कि मना कर रहे थे। चुनाव में अपना दांवपेंच कमजोर है। हार जाओगे। मेरे सारे गहने बेंच दिये। मायके से मिले गहने को भी नहीं बक्शा। लम्बा-लम्बा सपना देखने की क्या जरूरत थी? तब तो कह रहे थे। चुनाव एकतरफा है। जीत सुनिश्चित है। मंत्री पद तो दौड़ते हथिया लेंगे।

आखिर जनता का श्राप लग गया। नियत पहले से खराब थी। कह रहे थे कि जनता पैसे की झोली लेकर मेरे कदमों पर पटक देगी। उसका काम केवल मैं ही करूँगा। जनता भगवान का रूप होते हैं। उनके साथ छल करने वाले खुद छलें जायेंगे।

एक-एक से बदला लूंगा। जिसने मेरा खाया और गाना दूसरे का गाया। एक-एक को पहचानता हूँ। टांग तोड़ दूंगा कमीने का..। सब जो मेरा जय-जयकार बोलते थे। मेरे गले में माला पहना देते थे। एक थाली में खाने वाले चोखामल, सेवालाल, तुफानीलाल रात दिन मेरे साथ लगे रहे। अपने थाली में खिलाया हूँ। मेरा साथ छोड़कर मेरे विपक्षी के साथ मटर-पनीर खा रहे हैं।

हारे प्रत्याशी महोदय के घर पर मातम पसरा है। एक भयंकर चिंता में डूबे हुए हैं। चेहरा अस्त-व्यस्त है। बालों की रौनक गायब है। पत्नी भी सिर पर हाथ रखकर अफसोस में है कि जीत जाते तो मायके में मेरी और कद्र बढ़ जाती। पड़ोसियों में मेरी साख बन जाती। मेरा झुमका तक बिक गया। नौलखा हार का सपना सब टूट गया। हाय रे, निगोड़ा चुनाव...।

चुनाव जीते नेताजी के तेवर (हास्य-व्यंग्य)

नेताजी चुनाव जीत गये। समर्थकों ने माला पहनाया और नेताजी को देशी घी का लड्डू खिलाया। नेताजी गदगद हो गये। बड़ी तरावट महसूस किये। दिल को ठंडई पहुंची। ऐसा मतदाताओं पर ब्रह्मस्त्र छोड़ा कि विपक्षी के मतदाता हमारी तरफ सरक लिये।

बड़ा दांवपेंच वाला बनता था। एक भी चाल कामयाब नहीं हो पायी। चुनावी वादे का ऐसा पासा फेंका कि जनता ने तो सिर पर ताज पहना दिया। कौन सा वादा पूरा करना है। पांच साल तो मौज की जिंदगी होगी। फाइवस्टार होटलों में जश्ने बहार होगा।

अब फटा कुर्ता पायजामा तो नहीं पहनना पड़ेगा। बीबी के सपने में जान डाल देंगे। मुनीम जी का कर्जा वापस कर देंगे। ईश्वर की कृपा होगी तो दो-चार फ्लैट का मालिक हो जायेंगे। दो-तीन फोर ह्वीलर निकाल ही लेंगे। सपना था एक आलीशान महल बनाने का। राजशाही ठाठ-बाट होगी। जिंदगी में बहुत पापडु बेले हैं।

कागजी हेराफेरी का मामला है, कौन सी जांच होगी? कल्याणकारी योजनाओं को सीधा गटक लेंगे। कुछ जहाँ आला अधिकारियों को जेब में डाला। चुटकी बजाकर जनता के पैसे को काला से सफेद करने में माहिर हूँ। स्कूल के दिनों में बहुत दोस्तों का पैसा चुराकर अपना बताने का गुण रखता हूँ।

अपनी वाहवाही के लिए मीडिया जिंदाबाद है ही। जनता को दिखाने के लिए दो-चार छोटा-मोटा काम करा दूंगा। पांच साल तक गोदी मीडिया की गोंद में बैठकर बैतरणी नदी पार ही कर जाऊंगा। पैसे तथ झूठ के बल पर मीडिया की सुर्खियों में रहेंगे। अखबारों की मुख्य हेडलाइन्स में रहेंगे।

एक ही काम को अलग-अलग नाम देकर फर्जी तरीके से चैनलों पर चलवाते रहेंगे। जनता का भी सुपरस्टार हीरो बनें रहेंगे। जनता परेशान रहेगी तभी अगली बार पुनः सत्ता मिलने के चांस रहेंगे। जनता अपनी परेशानी तथा वोट दोनों लेकर मेरे पास आयेंगे। राजनीति का दूसरा नाम ही है कि बेटे को बाप पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए।

प्रेमिका के खास सपने (हास्य-व्यंग्य)

आजकल की प्रेमिकायें प्रेमी को हड़काती हैं। प्रेमी के अंदर वीभत्स रस की उत्पत्ति होने लगती है। बहुत भयंकर डर का समावेश हो जाता है। बेचारा डरा हुआ होता है कि आज कितना खर्च करा देगी। कहीं दूसरे के घर में वह शशरीर वास न करने लगे। खाये मेरा, गुणगान करे मुरारीलाल का।

बार-बार मुरारीलाल का नाम लेकर डरावनी दृष्य पैदा कर देती है। आधुनिक प्रेमी निर्भय नहीं हो पा रहा है। प्रेमिका की बार-बार उलाहना से उसकी गर्दन झुक सी गयी है।कमर टेढ़ी हो गयी है। प्रेम के इस वीरान जंगल में बेचारा निहत्था हो जाता है। प्रेमिका के कटु शब्द वाह्यघाती हमला की तरह होता है।

प्रेमिका को प्रेमी एक सस्ते होटल में ले गया। प्रेमिका के सैकड़ों अरमानों पर पानी फिर गया। लाखों मिन्नते करने का बाद यही टूटा होटल। सस्ते में निपटाना चाहते है। मटको को देखो कि उसका प्रेमी कितना दिलदार है। उसके गूगल पे का पिन तक मटको जानती है। जी भर कर खाती है। महंगे-महंगे इडली,डोसा खाती है। बेचारी मटको कितनी खुश रहती है।

पूरी मार्केटिंग कर जाती है, जो मन में आया वो महंगी-महंगी चीजें खरीद लेती है। कितना भोला है मुरारीलाल। कितना खूबसूरत उसका मन है बेचारे का। सौंदर्य से परिपूर्ण उसकी आत्मा है। भगवान ऐसा नेक इंसान सबको दे। शायद मेरी किस्मत ही खराब है। मेरी पूजा-पाठ में कोई कमी नहीं रही। विधाता ही रूठा हुआ है। प्रत्येक सोमवार को व्रत रखी पर वही कंगला मिला।

यही दिन रहा तो मैं मुरारीलाल के प्रेम बंधन में बंध जाऊंगी। अपना दिन तो लौट आयेगा। मटको की तरह मैं भी मटक-मटक कर चलूंगी। मेरे भी सपनों में रौनक आ जायेगी। महंगी-महंगी साड़ियों का भंडार खरीद लूंगी। बढ़िया-बढ़िया कीमती जेवरात हो जायेंगे। अपनी दुनिया अलग होगी लेकिन इस कंगले से मुक्ति तो मिल जायेगी।

बिल्लो रानी कहो तो जान दे दूं (हास्य-व्यंग्य)

बिल्लो रानी को एक मजबूत प्रेमी की आश्यकता महसूस हुई। वह उसी को अपना प्रेम समर्पण करेगी जो जान देने की जंग में सफल होगा। बड़े-बड़े प्रेमी बिल्लो रानी को प्राप्त करने के लिए अपनी जान तक भी देने को तैयार हैं।

बिल्लो रानी ने एक स्वयंवर का आयोजन किया। बिल्लो रानी को वही प्राप्त कर सकता है जो बिल्लो रानी के लिए जान देने को तैयार है। एक से एक लोग इस स्वयवर में आने की तैयारी करने लगे।

एक प्रेमी का ह्रदय बैठा जा रहा है कि मैं जान दे दूंगा तो बिल्लो रानी हमारी कहां हो पायेगी। किसी और के अंक में चली जायेगी। सतोष की रोटी खाओ, बिल्लो रानी को भगाओ।

एक प्रेमी ने जोर-शोर से तैयारी की। ऊठक-बैठक करना शुरू कर दिया। तरह-तरह की पौष्टिक सब्जियां तथा फलफूल खाने लगा। तेल मालिश उबटन करने लगा।

बिल्लो रानी सस्ते में मिलने वाली नहीं है। बहुत रियाज करना पड़ेगा। जान की परवाह न करने वाला ही बिल्लो का घूंघट उठायेगा। बिल्लो रानी उसी की घर की दुल्हनियां बनेगी।

बिल्लो रानी ने कहा जो मेरे लिए फांसी पर चढ़ेगा उसी की सदा-सदा लिए मैं हो जाऊंगी और मेरी करोड़ों की संपत्ति का वह मालिक बन जायेगा।

एक प्रेमी तो चक्कर खा कर गिर गया। दूसरा तो स्वयंवर से बेचारा भाग निकला‌। तीसरे ने तो आत्म समर्पण कर दिया कि यह मेरे बस का नहीं है। मैं बिना बिल्लो रानी के ही रह लूंगा।

बिल्लो रानी एक परम सुंदरी है। ढेर सारे प्रेमी तो भौकाल बनाये लेकिन बिल्लो को अपना नहीं बना सके। अब बेचारी अकेले ही जीवन काट रही है।

बिल्लो रानी को अपना बना लेने के लिए ढेर सारे लोग वकालत करते हैं कि कहो तो जान दे दूं। पर आज तक कोई जान नहीं दे पाया। बिल्लो रानी भी उसी से ब्याह करेगी जो उसके लिए जान देगा। बिल्लो रानी अभी कुंवारी है। उसके लिए वही वर होगा जो उसके लिए जान देने को तैयार होगा।

विदेश का पहनावा (हास्य-व्यंग्य)

विदेश में वह पढ़ी लिखी है। विदेशी हाव-भाव घुस गया है। होनहार लड़की है। विदेश में पली बढ़ी है और वहीं का पहनावा है। उस गौरवर्ण की लड़की भारत के गांवों की तरफ चली। घुटने से आठ अंगुल उपर तक पोशाक है। उसके खुलेपन पहनावे से उसकी सुंदरता में चौदहवीं का चांद नजर आ रहा था।

पूरा माहौल दूषित होता जा रहा है। कुछ लड़कों का झुंड देख देखकर बेचारे खुद ही शर्माहट महसूस कर रहे हैं। तिरछी नजरें से देखकर आपस में फुसफुसाहट शुरू कर दी। इनका बहस चल रहा था शिक्षा पर। बेचारी के आगमन से शिक्षा पर की जा रही बहस समाप्त हो गयी।

सौंदर्यशास्त्री सब बन गये। ऐसी सुंदरता का दर्शन होता रहे तो पढ़ाई लिखाई सब इसी पर होता रहेगा। ईश्वर ने इसका दर्शन करने के लिए भेजा है। सुलभ सौंदर्य भाग्यशालियों को मिलता है।

मास्टर जी ने देखा। उनका दिमाग चकरा गया। ऐसी सुंदरी का प्रथम आगमन से गांव का माहौल खराब हो जायेगा। देश बिगड गया है। सब गड़बड़ है।

गांव की औरतों ने तंज कसा। इसे शहर की हवा लग गयी है। ऐसे चलेगी तो गांव के सब छोरे बर्बाद हो जायेंगे। इसकी अक्ल मर गयी है। दिनदहाड़े फिलिम की शूटिंग करने चल दी। यही सब देखकर हमरे लड़कवा का मन पढ़ने में नहीं लगता है।

सब पलट-पलट कर देखकर रहे हैं। भारतीय संस्कृति अब फल फूल रही है। पूर्ण विकास की ओर अग्रणी है। जमाना शार्टकट का गया है। बेचारी का कोई दोष नहीं है। सब विदेश से आयातित है।

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