हास्य-व्यंग्य (61-70) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

Hindi Hasya-Vyangya (61-70) : Jaychand Prajapati Jay

भारत रत्न मिल रहा है (हास्य-व्यंग्य)

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का हो भाई साहब ! भारत रत्न मिल रहा है,सुना हूं। चुनाव का बिगुल बजा है का ? रेवड़ी की तरह बंट रहा है। कुछ इधर भी मिल जाता तो हम अमर हो जाते। हो जाता कोई जुगाड तो बताओ यार।

कुछ लोग कह रहे हैं कि बड़का-बड़का लोग पा रहे हैं। जिनका सरकार से कुछ गहरा नाता है। कौनऊ सोर्स की जरूरत नहीं बा। सब ओके बा। जब बड़का-बड़का लोगन के मिल रहा है तो हमार बड़का बाबू हैं। का कमी है। प्रधान रहे। दस हजार लेकर कालोनी पास कर देते थे।

बड़का बाबू कहते थे, सब बीस हजार ले रहे हैं। हम दस हजार गरीबो का बचा रहे हैं। वो गरीबों का दुख दर्द समझते थे। गरीबों के मसीहा थे। इत्ता बड़ा मसीहा। मिल जाता भारत रत्न तो काम हो जाता।

हम चुपके से आवेदन कर दिए तो गांव में फुसुर-फुसुर होने लगी। कुछ लोग कहे कि रामलाल तो पांच हजार में कालोनी पास कर देते थे। ई तो अन्याय है। सोहना तो बिना लिए पास कर देता था पर सोहना की आवाज उठाने वाला कोई नहीं था।

एक दस हजार में कालोनी पास करता था और एक पांच हजार में और सोहना तो कुछ भी नहीं लेता था। सरकार ने कहा कि दोनो ने गरीबों के हित के लिए काम किया है।

दो लोगों के नामों की घोषणा भारत रत्न के लिए कर दी गई जबकि सोहना प्रबल दावेदार था। असली गरीबों का मसीहा तो सोहना था। सोहना की आत्मा ताक रही है भारत रत्न के लिए लेकिन सरकार नही ताक रही है। धत्त तेरी लोकतंत्र की…..

विरह के कवि तथा नायिकाओं का संकट (हास्य-व्यंग्य)

आजकल की नायिकाओं को विरह-वेदना की अग्नि में नहीं जलना पड़ता है इसलिए वियोग के कवि की उत्पत्ति नहीं हो पा रही है। वियोग के कवियों का संकट होने का है क्योंकि जैसे ही वियोग रस आने की सूचना मिलती है। कोई न कोई सहारा बनकर उसके अंत:स्थल में प्रवेश कर जाता है।

यही मुख्य वजह है कि विरह रस की उत्पत्ति नहीं हो पा रही है। तब जमाना होता था कि नायिकायें कई दिन तक प्रेम विरह की आग में जलकर आत्मदाह करने को तैयार रहती थी। पिय की याद में तन-मन सब सूख कर कांटा हो जाता था।

तब का कवि ऐसी नायिकाओं की दीन हीन दशा देखकर विरह वेदना का ऐसा भाव अपनी काव्य चेतना में भर देता था। पढ़ने वाला रुदन के गहरे सदमे में चला जाता था।

वहां पर सच्चे प्रेम की भूख प्यास लगी रहती थी। दूसरे की तरफ भी मुंह उठकर नहीं देखती थी। तब के प्रेम में पवित्रता का भाव होता था। साफ सुथरा प्रेम का संगम होता था। एक ही नायक की याद में नायिकायें जीवन गुजार देती थी।

विरह में लिखी रचनायें भी अमरत्व को प्राप्त कर लेती थी।

आज का जो परिवेश बना है कि विरह की तड़प क्या चीज होता है? उससे नायिका अनभिज्ञ है। प्रेम के सारे तालाब प्रेम के पानी से भरे हैं। नायिका किसी भी तालाब में डुबकी लगा सकती है।

आधुनिक युग में विरह की तड़प में कोई नायिका और कवि जलना ही नहीं जानता। आजकल की बढ़ती श्रृंगार रस की रचनाओं का मुख्य वजह यही है। विरह का कवि तथा विरह की नायिका आधुनिक युग में मिलना मुश्किल है।

साहित्यकारों के पेंशन के लिए आवेदन शून्य (हास्य-व्यंग्य)

जैसे ही ही सूचना मिली कि साहित्यकारों को भी पेंशन दिया जायेगा। साहित्यकारों में खुशी की लहर दौड़ गयी।

कुछ को शंका हुई। कुछ ने कानाफूसी की। कुछ ने सोचा कि मिल जाता तो जिंदगी का अंतिम पड़ाव गुजर जाता।

कुछ कवयित्रियों के भी मुंह में पानी आ गया। मिल जाता तो नई-नई साड़ियां खरीद लेती और साल भर में तीन बार मायके चली जाती। नवोदित रचनाकारों को महसूस हुआ बड़का-बड़का लेखक लपककर ले लेंगे। हम लोगों को तो गाजर, मूली की तरह उखाड़ कर फेंक दिया जायेगा।

कुछ ने कहा कि अगर सरकार पेंशन देती है तो मृत्यु शैय्या पर होने पर भी मेरी कलम चलती रहेगी। सरकार ही हमार माई-बाप है। सरकार का पैर गंगाजल से धोऊंगा। महीने में दो बार गंगा में डुबकी लगाऊंगा। दो चार पोथियाँ तो महीने में लिख ही जाऊँगा। इसी पेंशन से पुस्तकों का विमोचन करा लूंगा।

सरकार ने शर्त रखा जो अपने नाम के आगे तीन चार साल से वरिष्ठ साहित्यकार लिखता होगा। उसको अवसर मिल सकता है। सूचना मिलते ही जो कल से लिखना शुरू किया था वरिष्ठ साहित्यकार भूपेंद्र शर्मा लिखने लगा। एक कवयित्री ने भी नाम के आगे वरिष्ठ कवयित्री सुमंगला देवी लिख डाला।

अंतिम शर्त यह थी। लेखन से सन्यास लेने वाला ही आवेदन कर सकता है। आवेदन शुरू हुआ। लेखन से कोई सन्यास नही लेना चाहता था। आवेदन शून्य रहा। सरकार ने देखा कि कोई आवेदन नहीं आया। सन्यास कोई लेना नही चाहता। सरकार समझ गयी। सरकार ने निर्णय लिया कि साहित्यकारों के लिए किसी भी प्रकार का पेशन स्कीम नहीं लागू किया जायेगा।

नोबेल पुरस्कार का हकदार हूं (हास्य-व्यंग्य)

नोबेल पुरस्कार के लिये भारतीय साहित्यकारों ने हुंकार भरना शुरू कर दिया है। अपने को प्रबल दावेदार समझने वाले साहित्यकार अपने-अपने को हकदार समझ रहे हैं। हर कोई अपनी तारीफ का पुल बांध रहा है तथा दूसरे की टांग खींचने में लगा है।

एक बुजुर्ग साहित्यकार ने अदब से अपनी बात रखी। अंतिम समय है मिल जाता तो जनम सफल हो जाता। रात- रात जाग कर बड़ी-बड़ी पोथी लिखा हूं। जवानी के समय पर प्रेमरस से भरी रचनायें जिसमें नायिकाओं के विरह वेदना का सचित्र वर्णन किया हूं। अपनी रचनाओं में एक विरहिणी का सम्पूर्ण दर्द को उकेरा हूं।

एक युवा कवि पर चर्चा जोर पकड़ लिया है। जिसकी रचना दया, परोपकार, इंसानियत की पुरजोर वकालत करती है। बुजुर्ग साहित्यकार ने अपना तेवर तेज कर दिया। नहले पर दहला, दहले पर नहला फेंकना चालू कर दिये।

ये कल का पैदा अपने अंदर कौन सी विद्वत्ता हासिल कर ली है। इनकी रचनाओं में फूहड़ता है। इनकी रचनायें अनपढ़ भी समझ लेता है। ऐसी रचनाये निम्न श्रेणी की हैं। अनुभव ने नौसिखिये को शब्दों के माया जाल में फंसाना चालू कर दिया।

हमने गंभीरता से परिपूर्ण रचनाओं की उत्पत्ति की है। क्लिष्ट शब्दों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हुआ है। मेरी विद्वतापूर्ण रचनाओं की व्याख्या एक से एक विद्वान नहीं कर सके। ये साधारण पाठकों की क्या औकात है ? मेरी रचनाओं के भाव जिंदगी भर नहीं समझ सकेंगें।

अपनी रचनाओं में ऐसी विद्वत्ता की माला पहना दिये हैं कि नोबेल देने वाली संस्था के टीम के लोग भी पसीना त्यज देंगें। कोई विद्वान मुझसे मुकाबला नहीं कर सकता है। मेरे कठिन शब्दों की प्रवाह में सब बह जायेंगें‌ कोई टिकने वाला नहीं है।

इस तरह से मैं हकदार हूं। नोबेल पुरस्कार मुझसे कोई नहीं छिन सकता है। नोबेल के विद्वानों को एक भी बात समझ न आ सकी। अंत में युवा रचनाकार को नोबेल के लिये चुन लिया गया।

कवि कविता लिखकर अमर होना चाहता है (हास्य-व्यंग्य)

कवि कविता लिखकर अमर होना चाहता है। अपना भविष्य बनाना चाह रहा है। उसकी कविता से कोई सामाजिक परिवर्तन हुआ कि नहीं उससे कोई लेना-देना नहीं। वह लिखना चाहता है, जीवन का समस्त पल साहित्य में न्यौछावर कर देना चाहता है।

वह जो कवितायें लिखता है। उसकी गाढ़ी कमाई का एक हिस्सा है। बहुत ही नाजों से पाल-पोस कर लिखता है। इन कविताओं से अमर होना चाहता है। मरने से पहले वह साहित्य का एक-एक पल संवारा करता है। तेल मालिस, उबटन और आंखों में काजल लगाकर अपनी कविता को कालजयी बनाना चाहता है।

उस कवि को कोई चिंता नहीं कि व्यक्ति में कोई नई सोंच आई की नहीं। कोई दुष्ट अपनी दुष्टता छोड़ा कि नहीं। सामाजिक क्रांति हुई कि नहीं। वह जानता है कि जीवन एक दिन खत्म हो जायेगा। वह लिखकर जिंदा रहना चाहता है ताकि उसके बेटे, नाती-पोते आने वाली पीढ़ियां उसे याद करती रहे और समाज भी याद करे।

एक कवि या लेखक ऐसे नहीं मरना चाहता है। कुछ भाव विचार छोड़ जाना चाहता है। उसे अपनी हर रचना में महानता की खुशबू आती है। उसकी आत्मा प्रसन्न होती है जब कोई वाह-वाह कर उठता है। अद्भुत लेखन कह दिया तो उसके अंदर महान साहित्यकार होने का गुण कौंधने लगता है। तमाम ऐसे कलमकार अपनी रचना का यशोगान सुनना चाहते हैं।

किसी अखबार या पत्रिका में छप गया तो समझो निराला, महादेवी या टैगोर समझ लेते हैं। उसका ऐसा बखान करते हैं जैसे ससुराल से कीमती सोने की जेवरात मिल गयी हो।

हे कवियों! ऐसा लिखो ताकि सामाजिक समानता ला सको। बिगड़े लोग सुधर जाये। एक नई दुनिया बन सके। स्वार्थ से लिखा साहित्य अमर नही हो पाता है।

जिसकी भात, उसकी बात (हास्य-व्यंग्य)

एक हमारे मित्र ने बताया कि उधर मत जाना। वही पर एक महान व्यक्ति जो आधुनिक युग में साहित्य, संगीत तथा कला के पारंगत विद्वान रहते हैं। इनके पास अपना खुद का सींग तथा पूंछ है और किसी को बख्शते नहीं हैं।

मुझे नसीहत मिली थी लेकिन निर्भीक प्राणी की तरह करीब से गुजर रहा था तभी उसने अपनी साहित्यिक पूंछ से लपेट कर दो पटकनिया दी। मेरे तो प्राण पखेरू उड़ जाते। संयोग से यमराज जी अपने ससुराल में थे और मुंह मीठा कर रहे थे।

वे अपने दम पर साहित्य की दुनिया में दुकान चला रहे थे। उनके घर पर साहित्यकारों का अड्डा था। एक से एक विद्वान उनके घर पधार कर सिर नवाते थे और वे अपने मुख से महिमामंडित कर उनको रसमलाई, दहीबड़ा, लस्सी तथा तरह-तरह के पकवान खिलाकर विद्वानों के बीच में महान विद्वता का माला पहन लिये थे।

सारे साहित्यकार उनके आगे नतमस्तक हो जाते हैं जबकि कभी भी कोई साहित्यिक रचनायें नहीं दी। किसी कला में मर्मज्ञ भी नहीं हैं। संगीत का कोई अक्षर ज्ञान नहीं लेकिन रसमलाई, दहीबड़ा खाने वालों ने ऐसा तारीफों का शमां बांध दिया कि मैं भी उनका मुरीद हो गया।

एक बार हमको भी न्यौता भेजे। एक साहित्यिक बैठकी थी। हमको भी तरह-तरह का पकवान खिलाया गया। गले तक भर-भर कर खिलाया। मन खुश हुआ, समझो मोगैम्बो खुश हुआ जबकि साहित्य संगीत तथा कला का ककहरा तक नहीं जानता था।

लेकिन भूखा व्यक्ति को जो भात मछली देगा तो बेचारा करेगा क्या? इतने मनोयोग से उनकी विद्वता का बखान किया कि वह व्यक्ति जो साहित्य संगीत तथा कला से विहीन था। भरपेट भोज्य पदार्थ की ताकत ने उसे सींग तथा पूंछ वाला विद्वता का महारथी घोषित करना पड़ा अर्थात जिसकी भात, उसकी बात।

पत्नी के बेवफा भरे गीत (हास्य-व्यंग्य)

रामलाल चरित्रवान आदमी थे। पत्नी आवाज की जादूगर थी जो गीत गाती लोगो का ऐसा लगता था कि कलेजा बाहर आ जायेगा। अक्सर रामलाल की पत्नी बेवफा और दर्द भरे गीत गाती तो रामलाल ह्रदय कांप जाता। मन में दुविधा का खेल चालू हो जाता।

हे भगवान, जीवन भर चरित्र को संभालता रहा। कोई दाग न लगे। इसके गीत से मेरा ह्रदय बैठा जा रहा है। तन-मन सूखा जा रहा है। किस गलती का परिणाम है कि बेचारी विरह करुणा तथा बेवफाई के गीत गाकर और सुना- सुना कर मेरे कलेजे पर तीर चला रही है।

मुझे ही देखकर गाती है। बेचारी इस तरह बेवफा का गीत गा-गा कर दुबली पतली होती जा रही है। खान-पीन कमज़ोर कर दिया है। आधी रोटी खाकर पूरा दिन गुजार दे रही है। मैं तो इसके सिवा कभी कोई सौंदर्य की तरफ आकर्षित नहीं हुआ।

अपने जीवन की एक-एक पोथी मैंने खोलकर देख लिया कि मेरा पवित्र ह्रदय किसी भी कोण से गलत दिशा में भटका नही है पर यह होनहार देवी ऐसा गीत का तराना छोड़ती है। बड़ी-बड़ी गायिकाओं की आवाज भी उसकी आवाज की तुलना में कमज़ोर लगेगा।

रामलाल बेचारे रोज-रोज इस तरह के गीत से व्यथित नजर आये। आखिर मन का भ्रम खत्म करने का निर्णय लिया। पत्नी के करीब बैठ गये। पत्नी को देखा कि हाथ में अपने एक प्रेमी की तस्वीर रखकर बेवफाई का गीत गा रही है।

अब रामलाल को समझ आया कि उसकी बेवफाई के गीत का मुख्य वजह बेचारी को धोखा दे दिया उसका बेवफा मित्र। उस बेचारी को गलत व्यक्ति मिल गया। रामलाल को समझ आ गया कि वह नहीं बल्कि उसकी पत्नी का मित्र बेवफा है।

रामलाल बेचारी के आंसू पोंछा और समझाया कि उस पराये आदमी पर क्यों तन-मन गंवा रही हो। मुझ जैसे चरित्रवान पर पर ही गीत गाओ। अब मै ही सब कुछ हूँ। अब मन छोटा मत करो। मैं तो बेवफा नही हूँ।

धननेता बनाम जननेता (हास्य-व्यंग्य)

कई सालों से जनता के बीच रहकर सेवा करने वाले जननेता जब चलते हैं तो भीड़ का सैलाब ही सैलाब। बच्चों, बुढ़ों, जवानों की कतार खड़ी हो जाती है। बेचारे दिन को दिन न समझा, रात को रात नही। जनसेवा करके जन नेता बना।

किसी के घर सब्जी न होती, बेचारा लेकर दौड़ा आता। किसी की बेटी की शादी में जी-जान से लगकर मदद करता। राजन की पत्नी को खून की कमी थी। खून उतार कर दे दिया नहीं तो राजन के बच्चे अनाथ हो जाते। एकदम मिलनसार व्यक्तित्व।

ऐसा जननेता एक दिन में लाखों भीड़ बिना एक पाई खर्च किये खड़ा कर देता था। जमीन से जुड़ा नेता। अन्याय के खिलाफ भिड़ जाता था। एक पैसा कभी किसी का खाया नही। ऐसा होता है जननेता।

धननेता से क्या लेना-देना? कोई दूखी है या रो रहा है या भूख की तपिश में दो दिन से खाना नहीं खाया। धन नेता तो बिसलरी वाटर हर घूंट में लेता है। उसे क्या पता कुएं के पानी का स्वाद कैसा था। होटलों में खाने वाला क्या जाने चूल्हे की रोटी सरसों का साग।

जो किसी का आंसू नहीं पोंछा। वह किसी के लिए एक अश्रु क्यों बहायेगा। धननेता तो धन से वोट को बटोरने की ताकत रखता है। आम जनता को खरीदने का रौब होता है। उस आम जनता को शराब की बोतलों से अपनी जयकारा करा सकता है।

आखिर जननेता की तरफ अपार भीड़ से महसूस हुआ जननेता का पड़ला भारी है। बिक चुका था पूरा बूथ। हर वोट पर लग गयी गड्डियों की धमक। जननेताा अपने पक्ष से जाते वोट को करवट लेते देखकर हैरान रह गये। सारी वोट धननेता के चरणों में समर्पित हो गयी। कई वर्षों की मेहनत से बनाई गयी दीवार ढह गयी।

हाय रे सफेदपोश (हास्य-व्यंग्य)

नेता सज्जन होते हैं। साफ-सुथरे होते हैं। दाग धब्बा नहीं लगा होता है। सादगी पसंद है। सादगी के बगैर रह नहीं सकते हैं। सफेद वस्त्र भी धारण करते हैं। सफेदी से गहरा लगाव होता है। यही वजह होता है कि नेताजी को सफेदपोश की संज्ञा दी गयी है। यह सबके संज्ञान में भी है।

उनकी ईमानदारी पर अंगुली उठ नहीं सकती है। ईमानदार प्रवृत्ति के होते हैं। इसके साथ ही बहुत मृदुभाषी होते हैं। चुनाव आते ही गली-गली में घर-घर, द्वार- द्वार नजर आते हैं। इनकी सादगी पर आप मर मिटेंगे। तन-मन सहित सब कुछ आम जनता न्यौछावर कर देगी। इनका भोलापन तथा सादगी के वस्त्रों से सब निढाल हो जाते हैं।

कोई इनके चरित्र पर अंगुली नहीं उठा सकता है। कोई तो सपने में भी नहीं सोंच सकता है कि ये महाठग हैं। आखिर इनका चोंगा ही सफेद होता है। वही एकदम मासूम सा चेहरा, गोल-गोल आंखें, नरम-नरम हाथ। इनके बाल भी सादगी भरे होते हैं।

पूरा भरोसा हो जाता है कि यही उत्तम प्रकृति के सफेदपोश साहब हमारा दुख हरन करेंगे। सुख बटोरकर लायेंगे और पूरी थैली में भरकर खूंटी में टांग देंगे ताकि जिसको जब भी जरूरत महसूस हो। थैली में से लेकर सुख का आनन्द ले सकते है।

अगले दिन समाचार पत्र में खबर छपी कि सफेदपोश के उपर सैकड़ों केस दर्ज हैं। मारपीट, दंगाफसाद, लूटपाट, हत्या, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार,जबरन वसूली, अवैध कारोबार, किसी का जमीन हडपने आदि का मामला सुनकर रोम-रोम कांप उठा।

ऐसी सादगी सफेदपोश को देखकर लोकतंत्र से भरोसा उठ गया। हाय रे सफेदपोश। हम सब का वोट लेकर रफूचक्कर हो जायेगा। पांच साल तक पेंडुलम की तरह इधर-उधर झूलना पड़ेगा। फिर अगली बार कोई और सफेदपोश आयेगा। वह उससे भी नरम दिखेगा। यही प्रक्रिया चलती रहेगी।

अपनी-अपनी नाक (हास्य-व्यंग्य)

चौधरी रामलखन एक नाक वाले व्यक्ति हैं। नाक को बचाकर रखते हैं। नाक एक सामाजिक ताकत देता है। नाक कटना जीवन को खत्म करने के बराबर मानते हैं। जिसकी नाक कट जाये तो रामलखन उसे मरा हुआ मान लेते हैं।

कुछ समाज में बड़ी नाक वाले होते हैं। उनका अलग रुतबा होता है। वे बड़ी नाक वाले के साथ उठना बैठना रखते हैं। एक अपना सामाजिक गौरव मानते हैं। रामलखन की भी नाक ऊंची है। जिसकी नाक थोड़ी भी कट जाती तो रामलखन उसे हेय दृष्टि से देखते और उसके प्रति कटुवचन दो-चार शब्द बोल देते।

सज्जन की बिटिया ने प्रेम विवाह कर लिया। सज्जन बहुत गरीब थे। उतनी ऊंची नाकवाले नहीं थे। पिता के हालातों को देखकर सज्जन की बिटिया पिता की अनुमति से बिन दहेज के एक युवक से प्रेम विवाह कर लिया।

इस बात को सुनकर रामलखन ने सज्जन से कहा कि तुम्हारी बिटिया नाक कटा दी। तुम्हारी नाक कट गयी सज्जन। तुम जीने के लायक नहीं रहे। सामाजिक रुतबा कम कर दी। मेरी बेटी मेरी नाक सबसे उपर रखती हैं। मेरी बेटी मेरी मर्जी के बगैर कुछ नहीं कर सकती।

रामलखन को अपनी ऊंची नाक पर विशेष गर्व रहता है। जिस कारण अपनी नाक में देशी घी लगाकर पूरे मोहल्ले में सज्जन की बुराई की। सज्जन की बेटी जैसी मेरी बेटी नहीं है। मैं नाकवाला हूँ। मेरी नाक ही मेरी इज्जत है।

अचानक फोन पर सूचना मिली की आपकी बेटी किसी युवक के साथ भागकर शादी कर ली है। चौधरी रामलखन ने धीरे से अपनी नाक को छुआ और उन्हें अंदाजा हो गया कि मेरी नाक कटकर छोटी हो गयी है।

चौधरी साहब के सामने बैठा सज्जन अपनी नाक में देशी घी लगाने लगा और बोला- चौधरी साहब आज मुझे महसूस हो रहा है कि मेरी नाक आपसे ऊंची नाक लग रही है। चौधरी साहब की नजरें झुक गयी। बोले-अब मत शर्मिंदा करो सज्जन भाई। सबकी अपनी अपनी नाक होती है।

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