हास्य-व्यंग्य (61-) : जयचन्द प्रजापति 'जय'
Hindi Hasya-Vyangya (61-) : Jaychand Prajapati Jay
भारत रत्न मिल रहा है (हास्य-व्यंग्य)
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का हो भाई साहब ! भारत रत्न मिल रहा है,सुना हूं। चुनाव का बिगुल बजा है का ? रेवड़ी की तरह बंट रहा है। कुछ इधर भी मिल जाता तो हम अमर हो जाते। हो जाता कोई जुगाड तो बताओ यार।
कुछ लोग कह रहे हैं कि बड़का-बड़का लोग पा रहे हैं। जिनका सरकार से कुछ गहरा नाता है। कौनऊ सोर्स की जरूरत नहीं बा। सब ओके बा। जब बड़का-बड़का लोगन के मिल रहा है तो हमार बड़का बाबू हैं। का कमी है। प्रधान रहे। दस हजार लेकर कालोनी पास कर देते थे।
बड़का बाबू कहते थे, सब बीस हजार ले रहे हैं। हम दस हजार गरीबो का बचा रहे हैं। वो गरीबों का दुख दर्द समझते थे। गरीबों के मसीहा थे। इत्ता बड़ा मसीहा। मिल जाता भारत रत्न तो काम हो जाता।
हम चुपके से आवेदन कर दिए तो गांव में फुसुर-फुसुर होने लगी। कुछ लोग कहे कि रामलाल तो पांच हजार में कालोनी पास कर देते थे। ई तो अन्याय है। सोहना तो बिना लिए पास कर देता था पर सोहना की आवाज उठाने वाला कोई नहीं था।
एक दस हजार में कालोनी पास करता था और एक पांच हजार में और सोहना तो कुछ भी नहीं लेता था। सरकार ने कहा कि दोनो ने गरीबों के हित के लिए काम किया है।
दो लोगों के नामों की घोषणा भारत रत्न के लिए कर दी गई जबकि सोहना प्रबल दावेदार था। असली गरीबों का मसीहा तो सोहना था। सोहना की आत्मा ताक रही है भारत रत्न के लिए लेकिन सरकार नही ताक रही है। धत्त तेरी लोकतंत्र की…..
विरह के कवि तथा नायिकाओं का संकट (हास्य-व्यंग्य)
आजकल की नायिकाओं को विरह-वेदना की अग्नि में नहीं जलना पड़ता है इसलिए वियोग के कवि की उत्पत्ति नहीं हो पा रही है। वियोग के कवियों का संकट होने का है क्योंकि जैसे ही वियोग रस आने की सूचना मिलती है। कोई न कोई सहारा बनकर उसके अंत:स्थल में प्रवेश कर जाता है।
यही मुख्य वजह है कि विरह रस की उत्पत्ति नहीं हो पा रही है। तब जमाना होता था कि नायिकायें कई दिन तक प्रेम विरह की आग में जलकर आत्मदाह करने को तैयार रहती थी। पिय की याद में तन-मन सब सूख कर कांटा हो जाता था।
तब का कवि ऐसी नायिकाओं की दीन हीन दशा देखकर विरह वेदना का ऐसा भाव अपनी काव्य चेतना में भर देता था। पढ़ने वाला रुदन के गहरे सदमे में चला जाता था।
वहां पर सच्चे प्रेम की भूख प्यास लगी रहती थी। दूसरे की तरफ भी मुंह उठकर नहीं देखती थी। तब के प्रेम में पवित्रता का भाव होता था। साफ सुथरा प्रेम का संगम होता था। एक ही नायक की याद में नायिकायें जीवन गुजार देती थी।
विरह में लिखी रचनायें भी अमरत्व को प्राप्त कर लेती थी।
आज का जो परिवेश बना है कि विरह की तड़प क्या चीज होता है? उससे नायिका अनभिज्ञ है। प्रेम के सारे तालाब प्रेम के पानी से भरे हैं। नायिका किसी भी तालाब में डुबकी लगा सकती है।
आधुनिक युग में विरह की तड़प में कोई नायिका और कवि जलना ही नहीं जानता। आजकल की बढ़ती श्रृंगार रस की रचनाओं का मुख्य वजह यही है। विरह का कवि तथा विरह की नायिका आधुनिक युग में मिलना मुश्किल है।