हास्य-व्यंग्य (51-60) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

Hindi Hasya-Vyangya (51-60) : Jaychand Prajapati Jay

दो सहेलियों का मधुर मिलन (हास्य-व्यंग्य)

गीता और सीता दो सहेली थी। दोनों में मधुर संबंध था। दोनों बहुत दिनों के बाद मिली थी। दोनों ऐसे मिली थी जैसे चींटे को गुड़ की भेली मिली थी। एक दूसरे से लिपट-लिपट कर गले मिल रही थी क्योंकि दोनों कई सालों के बाद मिली थी।

दोनों बचपन में एक साथ पढ़ी लिखी थी। चोट गीता को लगती तड़प सीता को होती। एक ही थाली में खाने जैसा बर्ताव रहता था। अब दोनों की शादी हो गयी है। दोनों घर गृहस्थी में रम चुकी हैं।

गीता अपने ससुराल में बहुत खुश है। गीता कहती है। पति हमारा बहुत भोला है। सरलता से भरा है। जो मंगाओ बेचारे सब ला देते हैं। मैंने चांदी का झुमका कहा था,कि ला दो। इतना भोलापन है कि सोने का झुमका बनवा दिया।

सच कहूं वे इतने भोले हैं सोने की अंगूठी कह दी तो पीतल की अंगूठी बनवा दी। सोने जैसा ही पीला है पीतल। पीतल सस्ते में मिल गया।

इन्ही सब में हंस बोलकर जिंदगी गुजर रही है। सासु तो देशी घी की तरह है। चाहे तो रोटी में लपेटकर खा जाओ। गाय की तरह बहुत सीधी हैं। बच्चों से घर में कोलाहल बना रहता है। घर में सूनापन नहीं है।

सीता ये सब सुनकर बेचारी का मुंह लटक गया। अपना नसीब तो खोटा है। पति दो पौवा रोज लेता है। घर गृहस्थी में आग लगी रहती है। कभी नून नहीं तो कभी तेल नहीं। जिंदगी कांव-कांव सी हो गयी है। मेरे घर में रोज लड़ाई झगड़े का कोलाहल बना रहता है।

सासु तो दिनभर गाली बकती रहती है। चैन नहीं है। उब गयी हूँ‌। घर गृहस्थी का बोझ बहुत‌ बड़ा सा लगता है। सोंचती हूँ। आत्महत्या कर लूँ। पर इनको दो रोटी कौन देगा।

सोंचती हूँ। सासु कितने दिन जिंदा रहेंगी। इसलिये सब सहती हूँ। एक दिन उनकी मौत की डोली उठ ही जायेगी। घरेलू कलह से छुट्टी मिल जायेगी। सीता की कहानी सुनकर बेचारी गीता के आंसू नहीं रूक रहे है‌। सीता गीता के आंसू को पोंछने लगी।

दुनिया के नेता आलसी हो जायें (हास्य-व्यंग्य)

जब दुनिया में युध्द जैसे हालात हो जाये, एक देश दूसरे देश के खून के प्यासे हो जाये तो युध्द को निष्क्रिय करने का सबसे बढ़िया जुगाड़ टेक्नोलॉजी यह है कि सारे सक्रिय नेताओं को आलसी हो जाना चाहिए। निकम्मा हो जाना चाहिए। पत्नी के साथ विलासितापूर्ण जीवन जीना शुरू कर देना चाहिए।

अपने मोबाइल को रिचार्ज कराने से बचे। हो सके तो इनकमिंग काल की भी सुविधा न ले। तब युध्द की ललकार खत्म हो जायेगी। कोई किसी पर टीका टिप्पणी कर नहीं पायेगा। हो सके तो नींद की गोली खाकर आराम की शैय्या पर विश्राम करे।

यह एक देशी नुस्खा है। एक कलमकार का दिया गया तजुर्बा है। सच कहता हूँ। इस नुस्खे से दुनिया को बचाया जा सकता है। अपने सैनिकों को भी आराम परस्त जीवन जीने का सलाह दे देना चाहिए। नफरत की आग में देशी घी मत डालो बल्कि देशी घी को रोटियों में चुपड़ कर खा जाओ। सेहत बनेगी तथा दिमाग की खुजली भी खत्म हो जायेगी।

युध्द में प्रयोग होने वाले घातक हथियारों को किसी कोने में रख दीजिये। सबको कबाड़ बना दीजिये। नेताओं का मन युध्द करने में ज्यादा न लगे। इसके लिए किसी प्राकृतिक दृश्यों को देखने चले जायें। कुछ जानवरों को पाल लीजिए। दूर की पहाडि़यों पर अपनी प्रियतमा के साथ रहिये।

युध्द में न मन लगे इसके लिए अपनी प्रियतमा के गालों को हलके हाथों से छूने का प्रयास करें ताकि वह एक सौम्य मुस्कान बिखेरती रहे और आप उसके प्रेम की लौ में अपने प्रेम को परिपक्व करते रहें। उसके घुंघराले बालों को अपने अंगुलियों से कंघी करें। उस प्रेयसी के प्रेम में आपका तन-मन पूर्णरूप से भीगा रहेगा। युध्द की लौ अपने आप बुझ जायेगी।

झुकने से गले में वरमाला पड़ जाता है (हास्य-व्यंग्य)

झुकना एक ईश्वरीय गुण है, जिस व्यक्ति के अंदर यह कला आ जाती है। वह किसी के गले में माला डालकर अपना मुनाफे का काम करा सकता है। यह गुण आपको शहंशाह बना सकती है। जनता के सामने झुका व्यक्ति देश का बादशाह बन जाता है।

किसी बड़े नेता के सामने झुक जाने से पार्टी का टिकट मिल ही जायेगा। सरकार के सामने झुक गये तो मंत्री का दर्जा मिल ही जायेगा, चाहे सीबीआई क्यों न पीछे पड़ी हो। जो ईश्वर के दरबार में झुक जाता है वह दुनिया के मोह माया से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।

यह एक विचित्र तरह की शक्ति होती है। जो जिसके सामने झुकता है। उसके अंदर एक रासायनिक क्रिया बड़ी तेजी से काम करने की ऊर्जा मिलने लगती है और वह उस झुके व्यक्ति का काम बड़े तल्लीनता से कर देता है।

प्रेमिका जब झुकती है तो प्रेमी उसके समस्त खरीदारी का पैसा वहन कर लेता है। विद्यार्थी ज्ञान लेने में झुक जाये तो विद्वता प्राप्त कर लेता है। माता- पिता तथा गुरु के सामने झुक कर रहने वाला संस्कार से युक्त हो जाता है। बादल झुक कर किसानों के फसलों को पानी दे जाते हैं।

पत्नी के सामने झुका रहने वाले व्यक्ति का चरित्र नहीं गिर सकतां है। वृक्ष झुक कर लोगों को फल दे देता है। झुकना लाभकारी तत्व है। विनाश को रोक देता है। मानवता बच जाती है।

जिस देश से युध्द हो रहा है वहां का शासक झुक जायें तो युध्द खत्म हो सकता है। विश्व में एक देश का राजा ऐसा है जो कभी झुकता नही है इसलिए वह बार-बार युध्द किसी न किसी देश से करता रहता है।

झुकने की कला सीखना एक कला है। झुकना किसी कमजोर प्रवृत्ति का लक्षण नहीं है। एक विशाल ह्रदय होने का भाव होता है। सच कहता हूँ जो गर्दन झुक जाता है उसके गर्दन में वर माला भी पड़ जाता है।

एक वोट अपना कम हो गया रे (हास्य-व्यंग्य)

छुटका नेता विधायक बनने का सपना पाले थे। सबसे पहले समाज सेवा करना अनिवार्य तत्व है। नेताजी गरीब से गरीब के घर नतमस्तक होने लगे। गरीबों के घर सूखी रोटी ठंडा पानी पी कर रात गुजारनी शुरू कर दी। नेताजी बहुत होनहार आदमी थे।

किसी के घर बैठने के लिए टूटी खटिया भी नहीं मिलती तो जमीन पर ही बैठ जाते थे। नेताजी के कुर्ता पायजामा में मिट्टी लग जाती तो झाड़ते नहीं थे। इस तरह की दरियादिली देखकर आम जनता नेताजी के करीब होने लगी। नेताजी जनता का समर्थन पाकर गदगद होने लगे।

सुंदरिया के लड़के की मौत के बाद खुद को सुंदरिया का बेटा घोषित कर दिया। सुंदरिया के घर की सभी जिम्मेदारी उठा ली। हर विपदा में लाठी लेकर खड़ा रहता। यहाँ तक बच्चे, बूढ़े, जवान, सभी महिलायें उसको अपना नेता मान लिये।

नेताजी घर-घर, जन-जन तक पहुँच कर लोगों के लिए समस्त जीवन समर्पित कर दिया। ऐसा कर्मठ नेता, यहाँ तक गरीब बच्चों की फीस तक जमा कर देते थे। ऐसा विकास करूँगा। लोग याद करेंगे। घर-घर विकास की गंगा बहेगी। कहीं जाते सुंदरिया के घर जरूर नेताजी का काफिला रुकता।

जनता का ह्रदय मीठी-मीठी बातों से जीत लिया। चुनाव में नेताजी ने परचम लहरा दिया। सुंदरिया ने खूब नारे लगाया कि मेरा मुंहबोला बेटा जीत गया। सुंदरिया को भरोसा था जितने के बाद मेरा बेटा जरूर मिलने आयेगा।

जीत के जश्न में पगलाये नेताजी का काफिला सुंदरिया के घर के बगल से निकल गया। रुका नहीं। नेताजी का ठाठ बाट, विधायकी का रुतबा के आगे आम जनता तथा सब कुछ वादे भूल गये।

सुंदरिया राह तकती रही कि मेरा मुंहबोला बेटा जरूर आयेगा। धीरे-धीरे पांच साल गुजर गये। नेताजी अगले चुनाव की तैयारी के लिये, सुंदरिया की याद आ गयी। जैसे ही काफिला सुंदरिया के घर रुका। नेताजी देखे कि भीड़ लगी है।

पता चला वह अपने मुंहबोला बेटा से मिलना चाह रही थी। बेटा के न आने पर सुंदरिया ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। छुटका नेता से बने विधायकजी अपने चमचों से बोले.. एक अपना वोट कम हो गया रे। और काफिला आगे बढ़ गया।

साहित्य अकादमी : मेरी मौत का तमाशा देखो (हास्य-व्यंग्य)

इस बार हिंदी की संस्मरण की पुस्तक पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिल गया। साहित्य जगत में कोई हल्ला नही हुआ कि इस पुस्तक में आखिर है क्या? एक लेखक की आत्मा जुबान में आकर अटक गयी। हमने तो देहरादून की वादियों का संस्मरण लिखा था।

अरे निर्णायक मंडलों, थोड़ा नजर ही फेर लेते तो हमरे को ही मिल जाता। मैं अपनी प्रेयसी के साथ प्रकृति का एक- एक क्षण समावेश किया था। देहरादून के कोने-कोने की नजाकत का एक-एक पल समेटा था।

आखिर तिरछी नजरों से ही देख लेते। एक-एक वाक्य में घुंघरू से छम-छम करते शब्दों को पिरोया था। संगीत की स्वर लहरिया डाली थी। इंद्रधनुषी छटा थी। मनोहारी दृष्य था।

पान गुटखा हम खिला देते। किसी रेस्टोरेंट में तरह-तरह के व्यंजनों से जिह्वा की भूख शांत कर देते। जो कहते खर्चा करते। दूध का घूंट पिला देते। कहते तो अपनी प्रेयसी को एक दिन का अनुदान कर देते। हमारी प्रेयसी थोड़ी नाराज होती। एक बार साहित्य अकादमी की धारा में डुबकी लगा लेता तो जिंदगी तर जाती। बार-बार आवागमन से मुक्ति मिल जाती।

हम लिखते रहते हैं। स्त्री विमर्श में मत सहयोग करो लेखकों, नहीं तो एकदम नइया डूब जायेगी। जो पुरस्कार हमको मिलना था। महिला मंडली बाजी मार ले गयी। अब जीवन का समस्त संस्मरणों की होलिका दहन कर जाऊंगा।

अब सोंचता है उसी देहरादून की अंतिम छोर पर बसा एक पहाड़ी है। उस पर चढ़कर जहर की एक पुड़िया खाकर अपनी प्रेयसी से क्षमा मांग कर अपनी अंतिम जीवन लीला इस मधुर पहाड़ी से कूदकर समाप्त कर लूँ।

जीवन की एक ही आशा थी कि मेरे संस्मरण पर अकादमी की नजर टिकेगी। पर होनी को कौन टाल सकता है। इस संस्मरण में अपनी मौत भी जोड़ रहा हूँ। अकादमी वालों मेरी मौत का तमाशा देखो।

धत्त तेरी वादा की (हास्य-व्यंग्य)

जब पढाई का दौर होता है। लड़के लड़कियों में डाक्टर बनने का जुनून होता है तो समाज सेवा की भावना से लबालब रहते हैं। गरीबों की कोई फीस नहीं लेंगे। गरीबों का अस्पताल खुलेगा। उनकी कोई भी जांच नि;शुल्क होगी।

गरीबों की बस्तियों में मेरा अस्पताल खुलेगा। गरीबों को शहर जाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। हे भगवान! डाक्टर जरूर बनाना। मेरी मेहनत को सफलता में जरूर बदलना भगवान।

भगवानजी आपका दर्शन करने जरूर मैं आऊंगा। सवा किलो देशी घी का लड्डू चढ़ाऊंगा। आशीर्वाद ढंग से देना। एक-एक गरीब का इलाज फ्री रहेगा। आपकी कसम खाकर कह रहा हूँ।

आखिर मेहनत रंग लाई। डाक्टर बनने के सपने संजोने वाले की मेहनत रंग लायी और डाक्टर बन गये। अस्पताल गांव से दूर शहर में अस्पताल खुल गया। डाक्टरी चमक गयी।

डाक्टर साहब अब बड़का डाक्टर साहब हो गये। किसी का फीस नि:शुल्क नहीं रहेगी। ओपीडी का शुल्क में कोई छूट नहीं। जांच में कोई रियायत नहीं। सारा चार्ज जोड़कर लिया जायेगा।

किसी ने टोका कि डाक्टर साहब पढ़ाई के दौरान गरीबों का इलाज फ्री करने का आपका सपना रहा। कोई चार्ज नहीं लिया जायेगा। सम्पूर्ण इलाज फ्री रहेगा।

पढ़ाई क्या फ्री में हुई है ? लागत लगी है। जमीन बेंचकर अपना सपना पूरा किया हूँ। सारी वसूली कहां से होगी ? इन गरीबों का इलाज कर इन्ही से मोटी रकम वसूली होगी। अपने स्टाफ को आदेश दिया। कोई छूट नहीं करना है। पूरा का पूरा खर्चा जोड़ कर वसूली किया जाय। धत्त तेरी वादा की।

व्यंग्य त्वरित उपचार का टानिक होता है (हास्य-व्यंग्य)

जब मैं व्यंग्य लिखता हूँ। दो चार दुश्मन तैयार हो जाते हैं। दांव-पेंच लगाते रहते हैं कि इस व्यंग्यकार का गला दबा दो। न रहेगी बांस, न बजेगी बांसुरी। सबकी बुराई हंस कर देता है। व्यंग्य का तीर ऐसा छोड़ता है कि सीधे अंतड़ियों को फाड़कर रख देता है।

एक बार एक व्यंग्य लेख लिख दिया। क्षेत्र के कुछ साहित्यकारों को अच्छा नहीं लगा। घर तक पहुँच गये। हमारे घर शिकायत कर दिये। यह आवारा आदमी है। जो मन में आता है लिख देता है। हम लोग हीन भावना से ग्रस्त हो गये हैं। इसका इलाज कराओ, नहीं तो हम लोग खुद कर देंगे

व्यंग्यकारी करना कोई बायें हाथ का खेल नहीं होता है कि चुटकी बजाकर लिख दिया। इसके लिये ओखली में सिर देना पड़ता है। ईर्ष्या की आग में जलना पड़ता है। घाट-घाट का पानी पीना पड़ता है। मुंगेरीलाल के सपने की तरह शब्दों के सपने गढ़ना पड़ता है। तब कहीं एक विध्वंसक व्यंग्य लेख लिखा जाता है।

व्यंग्य का तीर जिसे चुभता है। उसकी बड़ी से बड़ी इमारतें खंडहर में तब्दील हो जाती है। सामाजिक नासूर को ठीक कर देता है‌। समाज सुधार की प्रक्रिया तेज हो जाती है। द्वंद्व की भावना तीव्रगति का रूप ले लेता है। ह्रदय की गहराइयों तक ठेस पहुंचा देता है।

व्यंग्य से मुर्दा व्यक्ति भी दौड़ने लगता है‌। दोस्ती में दाग लग जाती है। पत्नी मायके चल देती है। भावना में दुर्भावना आ जाती है। यहाँ तक व्यंग्य की क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि विकलांग मानसिकता का व्यक्ति ठीक हो जाता है। व्यंग्य एक त्वरित उपचार का टानिक की तरह होता है।

ई हमार भारतीय संस्कृति को, का होई गवा बा (हास्य-व्यंग्य)

हम इलाहाबाद के सिविल लाइन में थोड़ा भारतीय संस्कृति का दर्शन करने के इरादे से साइकिल से निकले तभी एक महिला फ्राक में सड़क पर घूम रही थी। हम जिज्ञासावश स्थानीय लोगों से पूछा- 'ई का है ' कुछ लोग कहे कि ई भारतीय संस्कृति है। हमार संस्कृति विकसित हो रही है। पूरा घुटने से आधा उपर तक दिख रहा है।

एक ने कहा कि जो दिखता है वही बिकता है। हम शरमा गये। हम गांव के ठेठ देहाती। हम का जाने कि सिविल लाइन की भारतीय संस्कृति उपर तक विकसित हो गयी बा। छी::::छी:::; ऐसा ड्रेस पहनती है। शरम के मारे मुंह फेर लिया हमने। फैशन पूरा तन खोल देता है।

आगे बढ़े तो एक लड़की दिखी जो जीन्स टी-शर्ट पहने छोटा-छोटा बाल रखे मिली तो हम लड़का समझ के उसके कंधे पर हाथ रख दिये। वो भड़क गयी। अंकल जी दिखाई नहीं देता है। बीच बाज़ार में लड़कियों को छेड़ते हैं। हम मामला समझ गये। का होई गयी है अपनी भारतीय संस्कृति को। हमारा दिमाग चकरा गया। ई का देश में होई रहा है।

फटहा -फटहा हम जीन्स पहने बड़े-बड़े घर के लोगों के लड़के लड़कियों को देखा। अपनी संस्कृति लगता है पगला गयी है। अउर दूर गये एक लड़की ने कहा मम्मी यार तुम समझती नहीं हो। यार कह रही है। एक लड़की लड़के के कंधे पर हाथ रखा है। देखकर मुरझा गये हम। हम कहाँ आ गये, दम घुट रहा है।

आगे बढ़े तो एक बूढ़ा पैंट के उपर चड्डी पहन रखा था।पैंट फटा है। बदन दिखाई न दे ,इसलिए चड्डी पहन लिया था। हमारा माथा ठनका। ई का है। लोग बोले। ई फैशन नहीं है बल्कि गरीब है। ऐसे पहन लिया है गरीबी के कारण। हम मुरझाकर वही गिर पड़े। चार लोग पहुंचे। अस्पताल पहुँचा दिये। होश आया। भारतीय संस्कृति समझ में आ गया।

गरीब व्यक्ति गरीबी में भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए ढक रहा है कि फटा पैंट के कारण दिखे नहीं इसलिए उपर से चड्डी पहन रखा है। अमीर जगह -जगह कपड़े फाड़ कर भारतीय संस्कृति दिखाना चाह रहा है।

वाह रे अमीरजादी ! अमीर उल्टा-सीधा पहने तो फैशन और गरीब उल्टा सीधा पहने तो वह फैशन नहीं बल्कि उसकी गरीबी है। लाचारी है। साइकिल लेकर नीचे सिर किये चले आये कहीं भारतीय फैशन दिख न जाये और मै शरमा जाऊँ। धत्त तेरी की------

मेरे हास्य व्यंग्य लेखन की शुरुआत (हास्य-व्यंग्य)

मैं बहुत ज्यादा समय से व्यंग्य रचनायें नहीं लिख रहा हूँ बल्कि डेढ़ दो सालों से लिखने लगा। अधिकांशतः मैं गलत चीजों के लिये व्यंग्यात्मक शब्दों का इस्तेमाल करता रहता हूँ। एक बार यूँ ही एक रचना व्यंग्यात्मक भारतीय संस्कृति पर लिख दिया। यह व्यंग्य हास्य से भी भरपूर था। पढने वालों ने वाह-वाह कर दिया। तारीफों का पुल बांध दिया। इतनी जबरदस्त तारीफ हुई तो मेरे अंदर प्रबल भावना बढ़ी कि मुझे हास्य से ओत-प्रोत व्यंग्य लेख लिखना चाहिये।

और मेरे हास्य-व्यंग्य लेखन का पुष्प खिलने लगा और इसकी खुशबू दूर तक फैलने लगी। शब्दों में चार चांद लगने लगा। लोगों की भरपूर प्रशंसा से मेरा ह्रदय गदगद होने लगा और मेरे कलम की नोंक से व्यंग्य की धार ऐसी निकली कि जो पढ़ता। उसे लगता पूरी कीमत वसूल हो गयी है।

एक चीज मैं बताना चाहूँगा कि अक्सर बोलचाल की भाषा में भी मेरा हास्य-व्यंग्य से भरा वाक्य निकलता रहता है। आनन्ददायिनी शब्द तो रहते हैं लेकिन उसमें व्यंग्यात्मक शब्दों की छटा रहती है। कुछ लोग तो हंसकर टाल जाते हैं। कुछ को गहरा आघात लगता है और मुंह फेर कर चल देते हैं। कुछ तो ऐसा भड़क जाते हैं। जैसे यह व्यंग्य की पंक्तियाँ उन्हीं के लिये सजाये गयें है।

मैं इलाहाबाद का हूँ इसलिए इलाहाबादी लहजे से मेरा व्यंग्य सजा रहता है। कुछ इलाहाबाद के साहित्यकारों का भी मेरे लेखन से मुंह टेढ़ा हुआ है। नाक भौं सिकुड़ी सी रहती है। चेहरा तमतमाया सा रहता है। लेकिन अब मेरा काम ही हंसी के साथ व्यंग्य लिखना। अब इसमें मेरा थोड़ी कोई दोष है। जो लपेटे में आया। लपेट लिया जाता है।

मेरी मां अक्सर गलत बातों पर व्यंग्य बोल देती है। जिसका असर शायद मेरे अंदर भी रहा है। उसी व्यंग्यात्मक लहजे में मैं भी व्यंग्यात्मक तीर छोड़ देता हूँ। जो सामने आया, उसका घायल होना लगभग तय है। इस तरह से मेरा हास्य-व्यंग्य लेखन की शुरुआत हुई। अभी मैं नौसिखिया लेखक हूँ।

हरिशंकर परसाई जी की तरह मैं लम्बे लेख नहीं लिखता हूँ। मेरे हास्य व्यंग्य लेख लघु होते हैं। अब जमाने के अनुसार लोगों के पास समय नहीं है कि बड़ा बड़ा लेख पढ़ें। कम समय में सारा काम होना लोग पसंद करते हैं। मेरा हास्य व्यंग्य लघु होता है। हास्य से भरपूर होता है तथा घातक भी होता है और मारक भी।

ट्रंप झुकता नही है... (हास्य-व्यंग्य)

ट्रंप एक न झुकने वाला फलदार वृक्ष है। जो कभी झुकता ही नहीं। चाहे जितने फल आ जाये उसकी हर डाली पर लेकिन वह झुकता नही। आंधी तूफान भी कुछ नहीं कर सकता है। ये सब ट्रंप के लिए बस हवा के झोंके है।

वह इतना ताकतवर है कि कीड़े मकोड़े उसके उपर से गुजर जाये लेकिन कोई उसकी लम्बाई का कद छोटा नहीं कर सकता है। जो इस विशालकाय वट वृक्ष से टक्कर लेने की कोशिश करता है। वह चकनाचूर हो जाता है। उसकी दाल ही नहीं गल पाती है।

विशाल चट्टान की तरह अडिग है। बम, बारुद उसकी नाक की साख है। कह लीजिए कि वह एक विशालकाय ऊंट से कम नहीं होता है। जिधर करवटें लेता है। कीड़े-मकोड़े वाले देश कराह उठते हैं। वह खूब हंसता है जब दुनिया का नुकसान देखता है। उसे अपनी परवाह होती है दूसरे की नहीं।

यहाँ तक बडे़-बडे़ कवियो की कविताएँ भी नहीं झुका सकी। कवितायें झुक गयी। उसके आगे विनम्र हो गयी। उसका तलवा चाटने लगी। उसमें एक भी अंश झुकाव नहीं उत्पन्न हो सका। कवितायें भी नतमस्तक हो गयी। लेकिन वह छाती चौड़ा किये ठहाके लगा रहा है।

तरह-तरह की उपासना की जाने लगी। हार माला पहनाया गया। फिर भी नहीं झुका। उदारता उसके मन भावों को टटोला। वह बेचारा तभी झुकता है‌। जब कोई गिड़गिड़ाता है। उसके आगे झुक जाता है। तब उसका ह्रदय गदगद हो जाता है। वह भी अकड़ के साथ झुक जाता है।

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