हास्य-व्यंग्य (41-50) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

Hindi Hasya-Vyangya (41-50) : Jaychand Prajapati Jay

भरोसेलाल का भरोसा (हास्य-व्यंग्य)

मैं भरोसेलाल एक भरोसे का आदमी हूँ। कोई भी चिकनी चुपड़ी बातें की। उस पर सर्वत्र न्योछावर कर देने की ताकत रखता हूँ। एक बार एक कवि सम्मेलन में गये। कवि सम्मेलन में कई महिलायें भी आई थी।

एक स्त्री मुझ पर मुग्ध हो गयी। मेरा ह्रदय गदगद हो गया। उसने मीठी-मीठी बातें की। हल्की-हल्की मुस्कान बिखेरी। मेरा भरोसा जीतने लगी। मेरे जीवन में प्रथम बार स्त्री के आगमन पर मैं अतीव प्रसन्न हुआ। ऐसा प्रसन्न हुआ जैसे जौहरी को मुफ्त में हीरा मिल गया हो।

उस पर पूर्ण भरोसा कायम रखने के लिये मैंने नोटों की गड्डियां थमा दी। वह महिला प्रेमपूर्वक समर्पण भाव दिखाया। मैं भी भावना में बह गया। भावना का प्रवाह इतना तीव्र था। मैं इस किनारे से उस किनारे तक पहुँच गया। इस प्रवाह में कई डुबकियां लगा डाली।

वह महिला गौरवर्ण से युक्त थी। सुंदरता से परिपूर्ण थी। नयनों में काजल लगे थे। बालों की चमक इतनी थी कि हीरा की चमक भी नहीं प्राप्त कर सकता है। दिव्य ज्योति मस्तक पर नजर आ रहा था। उसके होठों की लालिमा और मंद-मंद, मधुर-मधुर मुस्कान लिये हुए एक सुंदर छवि सी लग रही थी। ऐसी सुंदरता पर बडे़-बडे़ ऋषि, मुनि, ज्ञानी हजारो बार अपने को न्योछावर कर सकते हैं।

मैं भी उसकी सौंदर्य से युक्त योग्यता पर समर्पित हो चुका था। उसने मेरे हाथों को नरम-नरम अंगुलियों से स्पर्श किया। ऐसी दशा मेरी हो गयी थी जैसे मैं‌ शिथिल करने वाली दवा का सेवन कर लिया हूँ।

उसके स्पर्श मात्र से मैं एक गहरी निद्रा में सो गया। उस भरोसे से युक्त महिला ने मेरी सोने की चेन,अंगुठी और सोने की घड़ी सब लेकर चम्पत हो गयी। सब घर चले गये। हम वही जमकर सोये। जब जगा तब तक सब बर्बाद कर चुका था।

रेडीमेड टिप्पणियां (हास्य-व्यंग्य)

एक बार मैंने बेढब टाइप की कविता लिखी। उसका न तो कोई लय रहा, न तो कोई भाव। अभावग्रस्त कविता रही। एकदम नीरस। किसी भी प्रकार कोई रस की उत्पत्ति नहीं हो रही थी।

कोई विद्वान अगर पढ़कर भावार्थ निकालता तो बेचारा अर्थ का अनर्थ कर देता। भावार्थ निकालते वक्त कई बार मष्तिक पर जोर देना पड़ता।

एक दिन फेसबुक पर उस बेढंगी कविता को प्रकाशित कर दिया। आजकल रेडीमेड टिप्पणी फेसबुक पर उपलब्ध है। धकाधक टिप्पणियां ही टिप्पणियां आना शुरू हो गयी। सब धकाधक रेडीमेड टिप्पणियां चस्पा कर दी।

पलक झपकते ही हजारों रेडीमेड टिप्पणियां बिना जोखिम उठाये ठोंक दी। मेरा तो उस बेढंगी बिना सुर ताल की कविता पर टिप्पणियों से झोला भर गया।

कोई उस कालजयी कविता को पढ नहीं रहा है। एक से एक विद्वानों ने राय ठोंकी। बहुत सुन्दर, वेरी नाइस, हार्दिक बधाई, अति उत्तम, एकदम मस्त। दिल छू लेने वाली, एक सरस कविता, वाह, क्या बात है, गुड आदि-आदि टिप्पणियों की बयार बह पडी़।

हमें बहुत अफसोस हुआ। हमारा साहित्य रसातल में जा रहा है। सम्पूर्ण टिप्पणियों को झोला में भरकर खड़खड़िया साइकिल में टांगकर घर चला आया।

घर के किसी कोने में गया। खूब खिलखिलाकर हंसा। वाह रे,कविता के महान समीक्षकों। टिप्पणियों से झोला भर गया लेकिन बेढंगी कविता का मन कोई नहीं छू पाया।

घूस का जलवा (हास्य-व्यंग्य)

राम मनोहर कम सेलरी पर सरकारी आदमी थे। दुबले पतले। ईमानदारी का खाते इसलिए सेहत ठीक से नहीं बन पाई। एक रूपये किसी से नहीं लेते। सब काम ईमानदारी से करते। घूस कभी एक पैसा नहीं लिये। उपरी आमदनी नही कर पाये।

महीने की जो तनख्वाह मिलती है। उसी से पत्नी के सौन्दर्य प्रसाधन का सामान लाते। सस्ती साड़ियां खरीद कर दे देते। बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ने भेजते। अपनी बरक्कत घूस पर निर्भर नहीं मानते।

वहीं उनके साथ काम करने वाला मुरारीलाल भी सरकारी आदमी है। चालाक है। उपरी आमदनी कर लेता है। पूरी तनख्वाह बचाता है। सरकारी पैसों का गोलमाल कर लेता है। बड़े अधिकारियो को भी कुछ चढ़ावा चढ़ा आता है। अधिकारियो का वरद हस्त उसके उपर कृपा रस की बौछार करते रहते हैं।

एक आलीशान घर बनवाया है। महंगी-महंगी साड़ियां बीबी को देता है। बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। लक्जरी गाड़ी तक ले डाली। घूस से मिला पैसा खा-खाकर मोटा रईस हो गया है। चार लोग उठते-बैठते सलाम ठोंकते हैं। तनख्वाह सारी खाते में पूरी की पूरी बच जाती है।

एक ईमानदारी के बोझ के तले दबा है। कुपोषण का शिकार हो गया है। आंखें धंस सी गयी हैं। पत्नी बच्चे आधुनिक जीवन शैली से काफी पीछे हैं। एक घूस के पैसे से मोटा सेठ बना बैठा है। तनख्वाह सेम है। एक लक्जरी जीवन जी रहा है और एक तंगहाली में गुजर बसर कर रहा है।

निंदा रस बहुत मीठा होता है (हास्य-व्यंग्य)

निंदा रस सब रसों में सर्वश्रेष्ठ होता है। आनन्दायिनी होता है। बहुत मीठा होता है। निंदा की उत्पत्ति दुर्भावना से आती है। सिर दर्द अगर हो रहा है। इसका उत्तम इलाज माना जाता है। मुझे अपने लोगों की घोर निंदा करने में बडा़ मजा मिलता है।

एक-एक लोगों की निंदा करके निंदा रस का आनन्द लेता हूं। यह एक दुर्लभ टानिक है। इस तरह की औषधि मुझे मिली है। मैं जिसकी निंदा करता हूँ। उसकी खाल तक खींच लेता हूँ।

एक बार एक मित्र की निंदा कर दी। भला बुरा देशी घी का तड़का लगा कर किया। निंदा करके पूरी चमड़ी खींच ली। खिसिया-खिसिया करके लोगों को बताया कि वह चोर है। मेरे पैंट से मेरा पर्स निकाल लिया था। तब से अपने घर नहीं आने देता हूँ।

मेरा वह मित्र जब सुना तो वह भी निंदा करने में किसी पारंगत विद्वान से कम नहीं था। बुराई का ऐसा खाका खींचा। ऐसी निंदा की। ऐसा तीर फेंक रहा था। पूरे गली मोहल्ले में जहाँ-जहाँ मैंने अपनी हैसियत बनाई थी।

निंदा का घूंट लोगों को ऐसा पिलाया और वह खूब निंदा रस को आंखें बंद करके पिया। मंद-मद ऐसा मुस्कुरा रहा था। जैसे वह बीच बाज़ार में मेरा गला रेत कर आया है।

यहाँ तक मेरे चरित्र पर ऐसा रेखाचित्र खींचा। यह सुनकर मेरे दोनों कान खड़े हो गये। मेरे व्यक्तित्व पर ऐसा कीचड़ फेंककर प्रहार किया। मैं बेहोश होकर वहीं गिर गया।

मैंने जिसकी निंदा करके निंदा का रसपान किया था। जब होश में आया तो वह खड़ा-खड़ा मंद-मंद मुस्कान के साथ पूरे मनोयोग से निंदा रस को मुंह लगाकर पी रहा था।

समाज सेवा का फल (हास्य-व्यंग्य)

मुर्गा सोते लोगों को जगाता है। जब सब गहन निद्रा में सोने का प्रयास करते हैं। वह बेचारा अपनी नींद खराब कर समाज सेवा का कार्य करता है। पूरी ताकत लगाता है बोलने में ताकि पढने वाले छात्र भोर में उठकर ज्ञानार्जन कर सके।

किसान अपने समस्त काम घर का निपटा कर खेतों में जाकर खेती कर सके। सबेरा होने का एहसास कराता है। मुर्गा समाज सेवा बड़े चाव से करता हैं। सबको अपने समय पर लोगों को काम पर भेजता है।

मुर्गे के इस कार्य से लोगों ने जी भर सराहना की। लोगों ने दाने खिलाये। पानी पिलाया। तारीफों के पूल बांधे गये। मुर्गा अपनी सराहना पर अतीव प्रसन्न हुआ।

धीरे-धीरे समय के साथ मुर्गे की शक्ति क्षीण होने लगी। बेचारा किसी दिन नींद आ जाती। समय पर बोल नहीं पाता। लोग मुर्गे को गाली देने लगे‌। मुर्गा बेचारा बहुत असहज महसूस किया। मुर्गे ने कहा--जब हम समय पर बोलते तो लोग दाना खिलाते। अब समय मेरा साथ नहीं दे रहा है तो लोग गालियाँ बक रहे हैं।

एक दिन मुर्गे को सर्दी जुखाम हो गया। बेचारा बोलने का बहुत प्रयास किया लेकिन बोल नही पाया। लोगों को गुस्सा आ गया और मुर्गे को मार डाला और सब लोगों ने मिलकर मुर्गे की मांस को खा गये। मुर्गे को समाज सेवा का फल मिल गया। अंततः मुर्गे को जान से हाथ धोना पड़ा।

सच्चा सौंदर्य (हास्य-व्यंग्य)

केवला प्रसाद सुंदर पत्नी की कल्पना की थी। गरीबी के कारण बेचारे को थोड़ा बदसूरत पत्नी मिल गयी। एक सदा के लिये टीस बनी रही लेकिन वह एक चरित्रवान पत्नी थी।

एक जिम्मेदारी का भाव था लेकिन केवला प्रसाद के अंत:मन को नहीं छू पायी। बेचारी पति के सम्पूर्ण प्रेम पाने से वंचित रही। लेकिन श्रध्दा भाव पूरी तरह से पति के प्रति रहा। एक चरित्रवान स्त्री जिसको मिल जाये। चारो धाम जाने की आवश्यकता ही नहीं लेकिन केवला प्रसाद पत्नी को किसी धाम के बराबर नहीं समझा।

उनके अंदर किसी सुंदरी के प्रति सदैव चाह बनी रही। एक प्रबल इच्छा रही धनलक्ष्मी का आगमन हो जाये तो ऐसी चरित्रवान स्त्री को किनारे कर देते।

ईश्वर की कृपा से धनवर्षा हो गयी। प्रथम पत्नी को परित्याग कर दूसरी एक सुंदर चक्षु वाली को पत्नी का दर्जा दे दिया। केवला प्रसाद पूर्ण समर्पित भाव रखते लेकिन वह चरित्र के मामले में कमजोर रही।

एक प्रेमी को धोखा देने के कारण उसने उस स्त्री के सुंदर मुखमंडल को खराब करने का निर्णय लिया। एक दिन मौका पाकर केवला प्रसाद की दूसरी पत्नी के चेहरे पर तेजाब फेंककर उसके मुखमंडल को पूर्ण रूप से विकृत कर देता है।

बेचारे केवला प्रसाद समझ गये। दुनिया की खूबसूरती चेहरे में नहीं बल्कि एक चरित्र से सुंदरता बनती है। मैं एक चरित्रवान स्त्री को बदसूरत कहा लेकिन वह सचमुच सौंदर्य से परिपूर्ण थी। एक सुंदर स्त्री अपने खराब चरित्र से अपने सौंदर्य को विकृत कर लेती है।

महिला दिवस पर पुरुषों में घबराहट (हास्य-व्यंग्य)

महिला दिवस के दिन एक बगीचे मे भीड़ इकट्ठा होने लगी। देखते ही देखते महिलाओं की विशाल भीड़ जमा हो गयी। पुरुषों में ऐसी भीड़ देखकर घबराहट होने लगी। ह्रदय की धड़कनों की तीव्रता बढ़ गयी। चेहरे पर घोर निराशा दौड़ गयी। किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी।

कुछ पुरुष खिड़की से झांक रहे हैं। कुछ फोन पर बतिया रहे हैं। कुछ ने इधर-उधर से जासूसी की लेकिन थाह नहीं चला कि इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं का झुंड क्यों है? पुरुष समाज को संकट में डाल दिया। कुछ चालाक टाइप के पुरुषों ने महिलाओं का वस्त्र पहन महिलाओं के सम्मेलन में घुस गये।

महिलाओं का महासम्मेलन शुरू हो गया। देश के कोने-कोने से महिलाओं ने शिरकत की। इस सम्मेलन को संबोधित करते हुए महिलाओं की अध्यक्षा ने अपना विचार व्यक्त किया। पुरुष न होते तो महिला महासम्मेलन की कोई आवश्यकता नहीं महसूस होती।

पुरुषों ने महिलाओं पर घोर अत्याचार किये हैं। घर के कोने- कोने तक काम कराया है। चूल्हे-चौके तक की सारी जिम्मेदारी दी है। खाने में नमक तेज हो जाये तो पुरुषों ने पूरी थाली फेंक दिए हैं। हम महिलायें पुरुषों का जूठन खाती हैं।

अब समय आ गया है कि महिलाओं को किचेन में नहीं रहना है। गृहमंत्री पद से इस्तीफा देना होगा। पुरुष अपना चूल्हा-चौका सम्हाले। सीधा प्रसारण हो रहा था।

महिलाओं के हुंकार से पुरुष डरे नजर आ रहे थे। पुरुषों ने इसे दुखद बताया। एक महाशय ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली। घोर कलयुग आने की संभावना ज्योतिषियों ने ऐलान कर दी।

इसी वजह से पुरुष महिला सशक्तिकरण के पक्ष में खुलकर नहीं रहते हैं। उन्हें डर है कि महिलाओं में पुरुष वाला भाव आया तो पुरुषों को गृहमंत्री का पद मिल सकता है।

बुरा मत देखो (हास्य-व्यंग्य)

गांधी जी एक बार स्वर्ग से पृथ्वी पर अपने तीनो बंदरों का हाल-चाल लेने आये। बुरा मत देखो बंदर से मुलाकात हो गयी। गांधीजी को देखकर बंदर बेचारा लिपटकर गला फाड़-फाड़कर रोने लगा। गांधीजी के भी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगा।

गांधीजी को समझने में देर नही लगी कि मेरा यह बंदर बेचारा रो क्यों रहा है? इस बेचारे के ऊपर जरूर आत्मघाती हमला हुआ है। इस बंदर बेचारे को बुरा मत देखो, ऐसा मूलमंत्र दिया था। जिससे किसी भी प्रकार का दुख होने की संभावना ही नहीं है।

बेचारा बंदर बुरा न देखने के कारण आंखें धंस सी गयी हैं। हाड़-मांस सब जबाब दे रहे हैं। सारे दांत उखड़ गये हैं। गांधीजी को बंदर ने बताया कि बुरा मत देखो। आपने कहा था। उसका पालन हो रहा है। आपके जितने अनुयायी हैं। देश में जितनी बुराइयाँ हो रही है। कोई बुरा देखना ही नहीं चाह रहा है। कोई बुरा नहीं देखेगा तो बुरा का विरोध ही नहीं करेगा।

गांधीजी समझ गये कि हमने प्यारे बंदर को बुरा देखने से मना कर दिया जिसके कारण देश में हो रही बुराइयों का विरोध नहीं हुआ। इसलिए बेचारा हमारा बंदर रो रहा है।

देश में लूटपाट,भ्रष्टाचार, अत्याचार, घोर अन्याय, बेइमानी बढ़ गया है। बुरा मत देखो के कारण हो रही बुराइयों का विरोध नहीं हो रहा है।

गांधीजी को अफसोस हुआ कि मेरा यह निर्णय सहीं नहीं था। मेरा बंदर बेचारा बुरा मत देखो पर काम करता रहा जिसका परिणाम यह हुआ। बुराइयाँ बढ़ गयी।

गांधीजी ने कहा कि मैं अब किसी प्रकार से मदद नहीं कर सकता हूँ। गांधीजी बंदर से माफी मांग कर अपने वतन चले गये। देश में बुराइयों का बोलबाला है क्योंकि बुरा कोई देख ही नहीं रहा है।

कवि का समीक्षक (हास्य-व्यंग्य)

एक बार एक कवि समीक्षकों का इंतजार कर रहा था कि कोई समीक्षक खुद आये उसकी रचनाओं पर समीक्षा के दो चार शब्दों की बौछार कर दे ताकि वह भी बहती गंगा में डुबकी लगा ले लेकिन कई सालों तक इंतजार करता रहा। कोई समीक्षक आये। कोई फूटी आंख तक नहीं देखा।

विवश होकर एक दिन कवि एक समीक्षक के पास गया। उसने उस समीक्षक से अपनी रचनाओं की समीक्षा के लिये निवेदन किया। समीक्षक कवि को देखकर ऐसा मुस्कराया जैसे कसाई मजबूत बकरे को देखकर मुस्कराता है।

समीक्षक ने कवि की औकात जानने के लिए पूछा। महोदय आपकी कमाई कितनी हो जाती है। आप कुछ गरीब घराने से लगते हैं। नरम-गरम करके हो जायेगा। कवियों की भावनाओं का आदर करना मेरा नैतिक कर्तव्य है।

आदरणीय कवि महोदय, हमारा ध्येय है। कोई गरीब से गरीब कवि की भी समीक्षा हो। हल्के में ले देकर निपटा देते हैं। अगर कुछ ज्यादा भुगतान कर देते हैं तो उसी आधार पर समीक्षा को बढ़ा चढ़ा कर लिख देते हैं। झूठी तारीफों का पूल बाँध देते हैं।

चढ़ावा के उपर निर्भर करता है। जितना ज्यादा से ज्यादा भुगतान करने में कवि सक्षम रहता है। हम भी निराला, महादेवी से भी ज्यादा दो चार हाथ बढ़ा कर लिख देते हैं। हमारे अंदर अतिश्योक्ति गुण की खान है। झूठी प्रशंसा करना है। शब्दों की कारीगरी है।

शब्दों की कारीगरी से आपकी रचना को ताजमहल से भी ज्यादा खूबसूरती निकालने में सक्षम हूँ। शब्दों के मक्कडजाल से एक से एक बड़े रचनाकारों को मुंह के बल पटकनी दे देता हूँ।

सीधा व सरल प्रवृत्ति का कवि समीक्षक महोदय को फटी आंखों से ताकता रहा। एकटक देखता रहा जैसे किसी सुंदरी को प्रथम बार देखा हो और अपलक देखता रह गया हो। कवि की गति शून्यावस्था जैसे हो गयी।

जैसे किसी सुंदरी की फटकार सुनकर प्रेमी सहमा हो और धीरे से बिना कुछ बोले उठकर चल दे उसी प्रकार समीक्षक की बातें कवि के ह्रदय पर गहरा आघात किया। धीरे से कवि अपनी कविता की पोटली उठा कर घर की तरफ मुंह लटका कर रवाना हो गया। आज तक कोई समीक्षक नहीं मिला।

खुजली से आनन्द रस मिलता है (हास्य-व्यंग्य)

खुजली एक आनन्दमय त्वचा रोग है। जिस व्यक्ति को खुजली रहती है। उसे अच्छा लगता है, जब वह उसे खुजलाता है। भावविभोर हो जाता है जैसे दुनिया की न प्राप्त होने वाली चीज है और उस चीज को वह प्राप्त कर लिया हो।

खुजली ब्रह्म का दिया हुआ एक अमृत रस का पान होता है। सबको नहीं मिलता है जिसको मिलता है वह एक सच्चा भक्त होता है। समाज में व्याप्त अंधविश्वास, ईर्ष्या, गुस्सा, नफरत की आग, बेईमानी, लूटपाट, मारपीट, दंगा-फसाद, युध्द आदि खुजली की तरह होता है।

इसे लोग समाज से खत्म नही करना चाहते हैं। यह किसी खुजली से कम नहीं होता है। इस तरह की खुजली सामाजिक आनन्द देती है। मनोहारी होता है। खसर-खसर खुजलाने का एक अलग ही आनन्द मिलता है। ऐसा लगता है जैसे ईश्वरत्व की प्राप्ति हो गयी हो।

इस प्रकार की सामाजिक खुजली को खुजलाने में बड़ी-बड़ी हस्तियां लगी है। वे चाहें तो इस प्रकार की खुजली खत्म कर सकते हैं लेकिन खत्म करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेगा। खुजली से आनन्द रस का मिलना बंद हो जायेगा।

देश के नेताओं को भी इस तरह की दुर्लभ खुजली का वरदान मिला होता है। देश के विकास के लिए रोड़े डालने की खुजली रहती है। समाज में अलगाववादी नीति को अपनाकर धार्मिक उन्माद फैलाने की खुजली रहती है।

तरह-तरह के युध्द की नीति अपनाकर देश-विदेश के नेताओं को इस समय खुजली बहुत तेजी से काम कर रही है। भयंकर दाद-खाज, खुजली अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर लिया है। इस समय दिमागी खुजली बहुत तेजी से वायरल हो रही है।

अगर इस तरह की खुजली को कोई ठोस रणनीति बनाकर खत्म नही किया गया तो देश समाज की यह खुजली किसी कोढ से कम नहीं होगी। इससे उत्पन्न देश समाज के लिए गंभीर संकट बन जायेगा।

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