हास्य-व्यंग्य (31-32) : जयचन्द प्रजापति 'जय'
Hindi Hasya-Vyangya (31-32) : Jaychand Prajapati Jay
धनाढ्य की धनाढ्यगीरी (हास्य-व्यंग्य)
धनलक्ष्मी के आगमन से उनकी छाती चौड़ी हो गयी। अकड़ कर चलने लगा, प्रेम व्यवहार खूंटी में टांग दिया, लम्बी-लम्बी फेंकना शुरू कर दिया। एक हाथ की बात दस हाथ की कहकर बताने लगा। गुरूर इतना हो गया कि आम लोगों से दुआ सलाम सब खत्म कर दिया, उसे महसूस होने लगा कि कुछ ही सालों ताजमहल खरीद लेगा।
उसके बदले रूख को देखकर लोग खुद उससे कन्नी काटने लगे, अड़ियल आदमी के मुंह कौन लगे, अपनी जुबान काहे खराब करे। अब लोग उसे जो इज्जतदार और शहंशाह समझते थे। गिरा हुआ इंसान की दृष्टि से देखने लगे। उससे मेलमिलाप बंद करके पुड़िया की तरह जेब में रख लिये।
कितना अच्छा इंसान था। लोग बिन खाना खिलाये उसको जाने नहीं देते थे। उसकी जरुरतो पर लोग बिन कहे खड़े हो जाते थे। जब मोहल्ले के लोग एक साथ बैठते तो कितना ठहाका लगता था, किसी कार्यक्रम के लिये उससे चंदा तक नहीं लिया जाता था।
कितना बदल जाता है इंसान। इस तरह से बदलने से उसे जैसे एहसास होता है कि वह अब दिव्य पुरुष है। ये छोटे- छोटे लोग तिनके के बराबर हैं। वह अपने को विशालकाय व्यक्ति समझने लगता है। जैसे उनकी मौत शहशांही मौत से कम न होगी।
किसी भी व्यक्ति को पैसा देखकर घमंडी नहीं बन जाना चाहिए, क्योंकि आप ईश्वर के तुल्य नहीं हो गये। देवी देवता फूलों की वर्षा नहीं करेगें। चिर अवधि तक आपकी आयु नहीं हो जायेगी। शारीरिक कष्ट आपको नहीं मिलेगी। यह एक भ्रम है। भ्रम की दुनिया से निकलो। एक इंसानियत की जिंदगी जियो। धनाढ्य की धनाढ्यगीरी ज्यादा दिन नहीं चलती है्
मित्रता की बदबू (हास्य-व्यंग्य)
मित्र के लिये रात भर जागा हूं।, भूखा रहकर उसको भोजन खिलाया हूं। हालात उसके खराब थे। कर्जा लेकर उसकी मदद की। उसके साथ एक थाली में, मैने रोटियां खायी। चोट उसको लगती, आंसू मेरे गिरते। कोई मेरे मित्र की बुराई कर दे तो उसकी जुबान खींच लेते थे। मेरे मदद करने पर मुझे फरिश्ता कहता था।
मित्रता में मित्र की टोपी नहीं उछालना चाहिये। ईश्वर ऐसा सच्चा मित्र आपको देता है। सहेज कर रखना चाहिये। मित्र आपका भविष्य होता है। मित्रविहीन से बाहर की दुनिया आश्रयहीन हो जाती है। मित्र ठंडे पानी की तरह तरावट देता है। यही सोंचकर हमने भी मित्रता कर ली
हमारा मित्र बहुत शालीन दिखता था। उसकी मासूमियत पर तो कलेजा निकाल कर रख देने की क्षमता आ जाती थी। हमने घर द्रार उसके भरोसे छोड़ कर गंगा स्नानकर आते थे। तीनो लोक मैं धन्य समझता था।
मेरा मित्र अंतःकपटी निकला, मेरे पीठ पीछे मेरा नया जूता चुरा ले गया। दस हजार उधार लिया था, उसे याद ही नही आ रहा है कि उधार लिया है। मेरी बुराइयां बड़े सुरताल के साथ लोगों को बताता था।
उसने लोगों से कहा कि बड़ा बेईमान आदमी है। चोर है। बहुत कपटी है। पूरा मक्कार आदमी है। इस व्यक्ति से दोस्ती करना अपनी जेब कटवाना है। लानत है उसकी मित्रता पर,।
भाईसाहब बुराई की ऐसा रेखाचित्र खींचा कि पैरो तले जमीन खिसक गयी। जमीन हाथ से निकलती नजर आ रही थी। मित्रता की बदबू आने लगी। मैंनै अपनी नाक दबा रखा था कि कहीं यह बदबू मेरे अंदर न आ जाये।
मेढकी ने लिखा खत (हास्य-व्यंग्य)
आखिर बारिश इतनी तेज हुई कि मेढक अपने मेढकी से बहुत दूर चला गया। अब एक तालाब में मेढकी दूसरे तालाब में मेढक के चले जाने से मेढकी को बहुत चिन्ता है। निराशा छा गयी है। इस भयंकर बारिश को गालियां मेढकी देर रही है। कितने जतन से अपना इनको बनाया था। मुझे बिना देखे एक पल भी रहना मेढकजी को बहुत भारी पड़ता होगा।
अब विरह की वेदना में दोनों तड़प रहे हैं। वेदना की अग्नि बहुत खतरनाक होती है। दोनों बेचारे की जुदाई एक दूसरे को काटने दौड़ रही है लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। कई दिन बीत गये तो मेढक को मेढकी ने एक खत लिखने का विचार किया। कुछ मन को हल्का करना चाहती थी। खत इस प्रकार लिखा..
मेढकजी....
आपका हमसे दूर जाना एक भयंकर त्रासदी है, वेदना में मैं झुलस गयी हूं। तड़प की अग्नि मन को चीर दे रही है। बहुत बड़ा सपना बनाई थी कि दो लाल गोपाल हो जायेंगे तो हमारा तुम्हारा जीवन कायदे से गुजर जायेगा पर होनी को को कौन टाल सकता है। अब मुझे नहीं लगता कि हम दोनों मिल पायेंगें। बहुत दूर चले गये हो। अब इंतजार करूंगी कि कोई भयंकर बारिश हो जाये ताकि मैं भी उसी तालाब में पहुंच जाऊं। साथ साथ जीने मरने की कसमें खाईं हूं वह पूरा हो सके। विरह की वेदना में जल लेना लेकिन किसी किसी और मेढकी से गुलछर्रे मत उड़ाना। ठीक है अपना ख्याल रखना।
आपकी प्रिय मेढकी..
मेढक को जैसे ही मेढकी का खत मिला उसके रोम रोम में सिहरन दौड़ गयी। बेचारा मेढक कर ही क्या सकता था। मेढक ने भी मेढकी को खत लिखा।
प्रिय मेढकी
तुमसे अलग होना हम दोनों के जीवन की यह भयंकर त्रासदी ही है मुझे अब एहसास हो रहा है कि हम दोनों कभी नहीं मिल पायेंगें। यह अकेलापन कट नहीं रहा है। जब से अलग हुये हैं रात दिन कटना भारी हो गया है। हम दोनों को परिस्थितियों के अनुसार जीना चाहिये। जो परिस्थिति के अनुसार ढलता है वही बुध्दिमान आज की डेट मे कहलाता है। तुम्हें कोई अच्छा सा लड़का मिले तो शादी कर लो और मैं भी कोई सुंदर कन्या देखता हूं। इसी में हम दोनों की भलाई है। सुख चैन है।
तुम्हारा बिछुड़ा मेढक...
दोनों ने समझादारी दिखाते हुये मेढकी ने एक खूबसूरत मेढक ये शादी रचा ली और मेढक भी एक खूबसूरत मेढकी से सात फेरे ले ली। दोनों आराम से जिन्दगी जी रहें है। परिस्थितियों से समझौता करना ही महानता है।
खटमल और भ्रष्टाचार दोनों रक्तचूसक होते हैं (हास्य-व्यंग्य)
खटमल एक परजीवी होता है। स्वभाव सरल टाइप का है। मासूम नजर आता है। अधिकतर लकड़ी की बनी चीजों में पाया जाता है। पुरुष का रक्तचूसने में ये आनन्द की अनुभूति करते हैं। रक्तचूसक होते हैं। हत्यारे नहीं होते हैं। अतिरिक्त खून नहीं चूसते हैं। जरुरत भर ले लेते हैं, बाकी दूसरे दिन के लिये छोड़ देते हैं। खटमल मजे की जिंदगी जी रहा है। स्वास्थ्य भी अच्छा बना लिया है।
जिस खटिया में होते हैं। इनका पूरा कुनबा होता है। पूरा कुनबा मौका पाते ही बाहर आकर धीरे-धीरे खून का रसास्वादन लेते हैं। नींद में व्यक्ति जब होता है, तब ये बाहर आते हैं। धीरे-धीरे चूसने से व्यक्ति का विशेष नुकसान होता है लेकिन कुछ भी नुकसान नहीं हुआ है, व्यक्ति उतना गंभीरत से नहीं लेता है लेकिन यह धीरे-धीरे आपको कमजोर कर देता है।
कई बार बहुत कोशिश होती है कि इसको खत्म कर देना है। समूल नष्ट करने के लिये खटमल मारक दवा का छिड़काव होता है लेकिन इनको जड़ से खत्म करना बहुत मुश्किल है। इनकी जड़े बहुत अंदर तक होती हैं जो एकदम नीचले हिस्से में ये छिपे रहते हैं। कोई दवा वहां तक पहुंच ही नहीं पाता है।
इसी तरह हमारे देश में खटमल की तरह भ्रष्टाचार समाज रुपी खाट में जगह-जगह व्याप्त रहता है। यह भ्रप्टाचार बहुत गहरा होता है। बहुत दूर तक फैला है। आम जनमानस इस भ्रष्टाचार से दुखी हैं।
आमजन का रक्त खटमल की तरह चूसा जा रहा है। जनता बहुत मजबूर है, इस भ्रष्टाचार से दुखी है। कई बार जड़ से खत्म करने के लिये उपाय किये गये हैं लेकिन इनकी जड़े बहुत गहरी हैं और यह खत्म नहीं होता क्योंकि इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।
चमचा की चमचई (हास्य-व्यंग्य)
हम लेखकीय करते हैं। एक दिन हम जा रहे थे पैदल ही तो रास्ते मे सफेद कुर्ता पायजामा में एक चमचा मिल गया। हमसे बोला कि हम राष्ट्रीय टाइप के चमचा हैं। हम कुछ सहयोग के उद्देश्य से सुबह सुबह मिलने चल दिए आप से। हम चमचा देखा।ऊपर नीचे तक देखा। भारी भरकम शरीर।गोरा टाइप का।बाल में डाई लगा रखा था। स्माइल गजब की रही।
तो बताओ चमचा भाई क्या मदद कर सकता हूं। हमको कसाई कि तरह उपर नीचे तक देखा।बोला..तो आप कवि लेखक हैं। हमने कहा कोई दिक्कत है क्या चमचा बाबू। नही दिक्कत नही है। किस पार्टी से हैं। हम किसी पार्टी से नही हैं। हम तो सरक लेते हैं कोई मोटा रकम दिया। आप मोटे रकम वाले हैं। हां भाई कोई शक नहीं।
हमारी पार्टी की तरफ हो जाओ। पार्टी पर कुछ लेख कविता तारीफ में लिखना है। मालामाल कर दूंगा। चार पीढ़ियां तक मौज करेगी। हमने बात मान ली। चमचा बोला कुछ आओ समोसा चाय हो जाय। हमने कहा ..चमचा भाई। ऊ होटल ठीक रहेगा। हां चलो दबा दबा कर खालो कवि जी।मालामाल कर दूंगा। हम थोड़ा लालची टाइप के। जी हमार खुश हो गया।हमने मन ही मन सोचा। फंस गया चमचा बेचारा।
हम दोनो महंगे होटल में गए।खूब दबा दबा कर एक एक आइटम खाए ।पेट पर हाथ फेरे।सब सामान हम मंगा रहे थे। पैसा चमचा बाबू देगा। पांच हजार का बिल बन गया।चमचा बोला कवि जी बैठे रहिए। पैसा कम है। एटीएम से निकाल कर आते हैं।एक लाख तक आपको एडवांस दे देते हैं। हमने कहा जाओ भाई जल्दी करो।
हम सपने बनाने लगे। एक लाख। बड़ा फायदा है लेखकी में। मजा आ जायेगा। एक लाख एडवांस।ऊपर से जमकर खिलाया पिलाया।मजा आ गया। होटल वाला बोला... बाबूजी पैसा जल्दी से जमा कर दो। एक घण्टे हो गए। पैसा आ रहा है सब मिल जायेगा। धीरज रखो। दो घंटे बीत गए। तीन घंटे बीत गए। इसी तरह शाम हो गई। पर चमचा दिखा नही। मैं समझ गया चमचा हमसे चमचई कर गया। हाय हमारा एक लाख। हम लूट गए। बर्बाद हो गए।
सब स्टाफ आ गए होटल के। पैसा जमा करो बाबू। बेवकूफ बना रहे हो हमे। पैसा नही जमा करोगे तो एक माह तक होटल में बर्तन मांजना पड़ेगा। मेरे तो पैरो तले जमीन खिसक गई। वीआईपी होटल में आज बर्तन मांज रहा हूं। उस चमचा के कारण एक माह तक मांजना है। अच्छा हुआ चमचा का नेता नही आया नही तो पांच साल तक बर्तन मांजना पड़ता अगले चुनाव तक।
कवि सम्मेलन में कवियों की औकात (हास्य-व्यंग्य)
कवि सम्मेलन में कवियों की औकात जितनी रहती है उसी प्रकार वहां उनकी व्यवस्था रहती है। एक बार छोटे कवियों का सम्मेलन हुआ तो वहां कवियो को दरी पर बैठने के लिये व्यवस्था की गयी। मटमैली, फटी दरी थी। कपड़े गंदे होने की पूर्ण संभावना रहती है। ऐसे कवि मामला समझ कर फटे पुराने कुर्ते में चले आते हैं।
जमीन पर सारी व्यवस्था होने के कारण ये जमीनी कवि होते हैं। सच को कहने में डरते नहीं। सरकार की छाती पर मूंग दर देते हैं। सरकार को चुनौती दे देते हैं। इन दरी के कवियों से बड़े-बड़े लोग पतली गली से निकल लेते हैं। समाज की हकीकत को रूपहले पर्दे पर दिखाते हैं। इनको कोई भरा लिफाफा नहीं मिलता है।
मिडिल टाइप के कवियों को प्लास्टिक की कुर्सी मिल जाती है। ऐसे कवि कुर्ता पाजामा तथा पैंट शर्ट तथा सदरी पहन कर आते हैं। कुछ पके बालों में काम चला लेते हैं। कुछ तो हेयर डाई लगा लेते हैं जो महसूस करते हैं कि अभी उनके रगों में जवानी का खून दौड़ रहा है।
ये कवि श्रृंगार रस की कविता करते हैं। नख-शिख तक का वर्णन कर देते हैं। गांव की सांवली नायिका से लेकर शहर की गोरी छोरियों पर श्रृंगार रस उड़ेल देते हैं। पंडाल ठहाकों से गूंज उठता है। नये युवाओं में जोश भर देते हैं लेकिन सरकार का कुछ नहीं कर पाते हैं। इनको हल्का वाला लिफाफा मिल जाता है।
जो सेलिब्रेटी टाइप के कवि होते हैं। उनके कवि सम्मेलनों में राजशाही व्यवस्था होती है। मोटा-मोटा लिफाफा पैसों से भरा मिलता है। गोल-गोल तकिया मिल जाती है। ये सरकार के परम हितैषी होते हैं। सरकार के नख-शिख तक का वर्णन करने में आनन्द रस को प्राप्त करते हैं। सरकार को परम सुंदरी से नवाजते हैं।
सरकार इनको अपना समझती है। ये ताकतवर कवि होते हैं। ये सरकार को अपना समझते हैं। ये सरकार को अपना सैंया समझते हैं। इनको किसी भी प्रकार के विवादास्पद शब्दों पर कोई डर नहीं होता है। सैंया भये कोतवाल तो काहे का डर। बड़का-बड़का अवार्ड के असली हकदार होते हैं। पदम टाइप का पुरस्कार नीचे तक नहीं आ पाता है। जब इनको मिलता है तो दरी, कुर्सी वाले कवि बेचारे हाथ मलते रह जाते हैं। इसके अलावा ये कर ही क्या सकते हैं।
पत्नी ने गिरगिट की तरह रंग बदला (हास्य-व्यंग्य)
जैसे ही पत्नी को पता चला कि मेरे मामा का आगमन होने वाला है। उसके बदन में हल्के दर्द में भी कराह आने लगा। उसकी शरीर में भयंकर ऐंठन चालू हो गयी। आंसू के दो बूंद जमीन पर टपक पड़े। धीरे-धीरे बढते दर्द से अब सिसकियाँ का रूप ग्रहण कर लिया।
रात्रि में भोजन की व्यवस्था तो करना था। दवा दे दी। दस पन्द्रह मिनट में जो दवा असर कर जाती थी। आज मामा के आगमन पर ऐसा रूदन सुनकर मेरे भी दो आंसू टपक पड़े, उसके दुख दर्द में शामिल होना मेरा नैतिक कर्तव्य था। हम उससे विमुख नहीं हो सकते थे। सात फेरो पर असर पड़ सकता था।
मैंने बड़े डाक्टर को दिखाने की बात की। पत्नी मेरी गाढी कमाई को डाक्टरों के हाथों में नहीं जाने देना चाहती थी। उसने मना कर दिया। मामाजी के लिये किचेन की बागडोर हमें संभालनी पड़ी। खाने बनते ही पत्नी की कराह कम हो गयी। एक थाली खाना हलक के नीचे उतार ली जैसे कई दिन से खाना न खाई हो।
अगले दिन भी तबियत ठीक नहीं रही। कराह कुछ तेज होने लगी। बदन में दर्द बढ रहा था। कराह थम नहीं रही थी। हल्की-हल्की सिसकिया चालू हो गयी। इतने में मेरे साले का आगमन हो गया। रात्रि पहर में भोजन की व्यवस्था करनी थी।
भाईसाहब, उसकी सारी कराह अचानक खत्म हो गयी। भाई को देखकर चेहरा खिल गया जैसे रेस्टोरेंट में निःशुल्क भोजन कर लिया हो। भाई के आते ही ऐसा दिखने लगी जैसे किसी पार्टी में जा रही हो।
ऐसा खिलखिलाहट गूंजा। मेरे तो रोंगटे खड़े हो गये। चाय बन कर आ गयी। दो घूंट हमने भी पी ली। मेरी आंखे फटी की फटी रह गयी। भाई-बहन मिलकर सारा खाना गटक गये। अपने-अपने होते हैं। ऐसा मधुर दृश्य देखकर हम ताकते रह गये। आज पत्नी को गिरगिट की तरह रंग बदलते देखा।