हास्य-व्यंग्य (21-30) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

Hindi Hasya-Vyangya (21-30) : Jaychand Prajapati Jay

दहेज के लिये सुर बदला (हास्य-व्यंग्य)

मोहन शर्मा दहेज के सख्त खिलाफ थे। मोहन शर्मा को तीन बेटियां हैं। एक लड़का है। बड़ा नेक इरादा। महान आत्मा वास करती है उनके शरीर में। प्रत्येक बिटिया वाला बाप उनके सामने नतमस्तक हो जाता था। उनको ईश्वर से भी बड़ा दर्जा मिल गया था।

बड़ी सराहना होती थी। जो दहेज की लेन-देन करने वाले के खिलाफ पुरजोर वकालत करते थे। आखिर तीनों बेटियों की शादी बिना दहेज के निपटा दिये। सच में ऐसे हैं बाबूजी। एक रूपया तक दहेज में नहीं दिया।

अखबारों की कई बार सुर्खियां बन गये। हम भी मुरीद हो गये। मेरी पत्नी तो दिन भर उनकी ही तारीफ करती रहती थी। उनके नेक इरादे से खुश होकर पत्नी एक बोरा चावल मोहन शर्मा को मुफ्त में दे दिया। मेरे तो कान खड़े हो गये, पर समाज की डर से बोला नहीं क्योंकि वे दहेजविरोधी थे।

समय बीतता गया। मोहन शर्मा का वक्त बदल गया। बेटे को सरकारी नौकरी मिल गयी। घर द्वार बनवा लिये। गरीबी से उठकर अमीरी में प्रवेश करते ही दहेज के खिलाफ बोलनेवाला मोहन शर्मा के तेवर और बोलने का सुर बदल गया।

अगर कोई दहेज दे ही देगा तो यह सब लड़के का नसीब है। मेहनत करके सरकारी नौकरी पाया है। लाखो घूस देना पड़ा है। उनके इस महान नेक इरादे दहेज के प्रति सुनकर मेरी आंखें फटी की फटी रह गयी।

ईमानदार वही है जिसको मौका नहीं मिला। दहेज न लेने का हल्ला बोलने वाला मोहन शर्मा अच्छा दहेज पाने के लिये कई देवी-देवताओं को मनौती मान दिये।

यूं जा रहे हैं जैसे हमें जानते नहीं (हास्य-व्यंग्य)

हरिमोहन गरीबी को नजदीक से देखा है। पीड़ा सहा है. समाज की घुड़कियां सुनी है। एक रूपये की कोई मदद नहीं की। ताने ऊपर से मारे। हालात ऐसे-ऐसे देखा है कई बार स्वयं को दुसरे के यहां गिरवी रखना पड़ा। गालियां जी भरकर लोगों ने दिया। संयम रखा बेचारे ने। उसकी जिह्वा एक शब्द गलत नहीं बोला।

कभी भरपेट भोजन नहीं किया। नये कपड़े कभी पहने नहीं। चप्पल नसीब नहीं हुआ। खराब हालातों में किसी से कुछ मांगा तो वह मिला नहीं। बेचारा हरिमोहन बेचारा बना रहा। लोगों ने उसको निमंत्रण देना बंद कर दिया और तो और लोगों से सामना होने पर मुंह फेर कर चल देते थे। यूं जा रहे हैं जैसे हमें जानते नहीं।

गरीबी में आदमी मेहनती हो जाता है। हरिमोहन ने मेहनत करके एक छोटी सी कंपनी बनाई और मेहनत करके कुछ ही बर्षो में कंपनी की पोजीशन बेहतर बना दी और समय बदल गया।

अब वह एक अमीर आदमी बन गया। जो लोग बगल से निकल जाते थे उसके यहां नौकरी मांगने गये। गरीबी का हाल बताकर लोग पैसा मांगने गये। किसी को नौकर बनाया। किसी को नौकरी दी‌‌, कोई ऐसा नहीं,होता जो उसको निमंत्रण न देता। अपने कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने लगे। समय बलवान होता है। किसी के खराब समय पर उसका अपमान नहीं करना चाहिए।

खोदा पहाड़, निकली चुहिया (हास्य-व्यंग्य)

एक- एक पाई जोड़ कर इकट्ठा किया था। महान कवयित्री बनने के लिए समस्त पूंजी प्रकाशक के चरणों में अर्पित कर दिया। आखिर छप गयी। उलट-पलट कर किताब कवयित्री ने देखा। रद्दी कागज लगा देखकर कवयित्री का गला सूख गया। संतोष करना पड़ा।

पुस्तक विमोचन का शुभ मुहुर्त निकाला गया। हिंदी के कुछ मर्मज्ञ मठाधीशों को बुलाया गया। बड़े-बड़े पत्रकारों को इमेल करके बुलाया गया। टी.वी. पत्रकार भी कुछ मिल जाने के लालच में आ गये।

फेसबुक पर पोस्ट करके पाठको से आने की अपील की गयी। उधार लेकर बेचारी विमोचन करा रही थी। हिंदी के मर्मज्ञों ने एक-एक वाक्यों से तारीफ के पुल बांध रहे थे। ऐसा तारीफ किया जा रहा था कि पुस्तक के बारे में एक शब्द नहीं बल्कि कवयित्री के सौन्दर्य पर कई रसों से सराबोर कर दिया गया।

कवयित्री खूब प्रशंसा सुनकर गदगद हो गयी। तबियत खुश हो गयी। भले कर्जा लेकर घी को खाने की बात ही क्यों न हो। अगले दिन टीवी तथा अखबारों की सुर्खिया बन गयी।

रातों रात कवयित्री सुपर स्टार हो गयी। बड़ी-बड़ी बधाई दी गयी। फेसबुक पर तारीफों के पुल बांधे गयी। कवयित्री पूर्णतया आश्वस्त थी कि सबसे ज्यादा पुस्तकें बिक जायेगी रायल्टी भी भरपूर मिलेगी। सारा कर्जा उतार दूंगी। साल छः महीना बीत गया। कोई ग्राहक नहीं मिला। मुफ्त लेने वाले कतार में खड़े हैं। आखिर सब मुफ्त में बांट दी गयी। खोदा पहाड़, निकली चुहिया।

हिन्दी की समर्पित कवयित्री (हास्य-व्यंग्य)

एक दिन मैं कोई लेख लिखा था। उस लेख में एक अंग्रेजी शब्द आ गया। शुध्द हिंदी कवयित्री का मौन टूट गया क्योंकि हिन्दी उनके रग-रग में दौड़ रही थी। कई सालों से इकट्ठा ह्रदय में विष की प्याला उगल दी। बोली मैं आपको अमित्र कर रही हूं क्योंकि आपने एक अंग्रेजी शब्द का प्रयोग किया है।

ऐसी विचारधारा को सुनकर मेरे हिन्दी लेखक होने का गुरूर टूट गया। मैं उस हिन्दी की देवी के सामने नतमस्तक हो गया। उस महान कवयित्री के प्रति समर्पित पाठक की तरह हो गया। ऐसी कवयित्री इस लोक में मिलना दुर्लभ, है। जिसको मिल गयी हैं समझियों करोड़ो देवी-देवताओं का दर्शन मिल गया है।

अमित्र करने का शब्द सुनकर गला सूख गया। फ्रीज का पानी चार गिलास पीना पड़ा। विनम्र भाव से आग्रह किया कि ऐसा मत करिये। हम अनाथ हो जायेंगें क्योंकि हिन्दी कि आप मर्मज्ञा हैं।

मैंने क्षमा मांगा कि अब अंग्रेजी शब्द कभी नहीं लिखूंगा। यदि अंग्रेजी शब्द आने की संभावना होगी तो वह लेख निरस्त कर दिया जायेगा।

कुछ शंका हुई तो पूछ लिया कि आपका नाम फेसबुक पर अंग्रेजी में है। हस्ताक्षर अंग्रेजी में करती हैं और फेसबुक पर जगह-जगह अंग्रेजी में टंकण किया गया है। फेसबुक के अंदर और झांका तो कई तस्वीर विदेशी पोशाकों में थी। भारतीय पोशाक की कोई तस्वीर नहीं दिखी।

इन सब का जबाब था। बच्चों ने प्रोफाइल बना दी। बच्चों ने अंग्रेजी में हस्ताक्षर कराना सीखा दिये। ऐक बार विदेश चली गयी थी। बच्चों ने माडर्न कपड़े खरीदकर पहना दी। बच्चे कहते हैं मम्मी अब भी तुम हिन्दी के जमाने की हो। माडर्न बनों मम्मी। कुछ फैसले बच्चों का हैं। यह सब सुनकर हम वहीं गिर पड़े। जय हो हिंदी की समर्पित सशक्त कवयित्री की।

युवती के साथ झूठी हमदर्दी (हास्य-व्यंग्य)

एक मामूली घायल युवती को देखकर युवा वर्गों की विशाल भीड़ जमा हो गयी। सारे युवाओं ने अपने अपने ढंग से युवती की मदद के लिए आगे आये। एक युवक ने युवती को ऊठाया। बोला, कई जगह चोट लग गयी है। ओह, बड़ा दर्द हो रहा है। एक ने बहते खून को पोंछा। एक ने अपने कपड़े फाड़कर चोट की जगह बांध दिया।

एक युवक ने स्कूटी ऊठाया। स्कूटी ठीक करने लगा। एक ने सारा इलाज का पैसा देने की पेशकश की। किसी ने स्कूटी मरम्मत का खर्चा वहन की बात की। किसी ने उसके कपड़े में लगी मिट्टी को झाड़ा। पूरा माहौल गम में डूब चुका था।

पूरी सहानुभूति युवक मंडलों ने दिखाया। एक-एक नुकसान की भरपाई की बात की। कई के आंखों से झर-झर आंसू बह पड़े। एक ने तो गला फाड़कर रोया जैसे स्कूटी लेकर वहीं गिरा हो। सारे युवाओं ने तरह-तरह की हमदर्दी दिखायी। मामूली चोट आई थी। एक ने दर्द की दवा दी। एक ने लगे चोट पर मलहम लगाया।

उसी युवती से टक्कर खाकर गिरा युवक खून से लथपथ था। उसकी बाइक पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी थी। कुछ लोगों ने,पास जाकर हमदर्दी दिखाई।

एक युवती ने पुलिस तथा एम्बुलेंस को खबर दे दी लेकिन युवको ने पूरी हमदर्दी युवती के साथ जो दिखाया अगर वही सहानुभूति युवक के साथ दिखाया होता तो शायद युवक का रक्त ज्यादा नहीं बहता।

प्रकांड विद्वानों का महासम्मेलन (हास्य-व्यंग्य)

एक बार देश के प्रकांड विद्वानों का सम्मेलन आयोजित किया गया। हिंदी की संपूर्ण जानकारी रखते थे। गंभीर और कठिन शब्दों की झड़ी लगा देने में महारत हासिल थी। इनको परास्त नहीं किया जा सकता था। चाहे पाठक के गले में उतरे या न उतरे लेकिन कई लाइनों का एक वाक्य बना लेना बायें हाथ का खेल था।

पंडाल लग गया। मंच भी सजा दिया गया। विद्वान गण मंच पर बैठ गये लेकिन सामने की समस्त कुर्सियां खाली पड़ी थी। विद्वानों ने घोर चिंता व्यक्त की। आयोजक ने शांत रहने के लिये विद्वानों से अनुरोध किया। आयोजक ने कहा कई खेपों में पाठक गाड़ियों से लाये जा रहे हैं।

तीन चार ट्रैक्टर भर कर लेबर चौराहे से पाठकों को दिहाड़ी पर लाया गया। विद्वानों की छाती चौड़ी हो गयी। उन विद्वानों की विद्वत्ता फड़कने लगी। सम्मेलन का शुभारम्भ हो गया।

एक महान प्रकांड विद्वान ने घनघोर चार छः किलों के वाक्यों की वर्षा कर दी। संपूर्ण पाठक वर्ग पसीने से भीग गया। एक पाठक बुदबुदाया कि ई मोटा आदमी का कह रहा है ? एक ने समझाते हुये कहा कि अभी कुछ देर में समोसा मिलेगा। बइठे रहो।

काफी देर तक प्रवचन हुआ। समोसा चाहे मिले या ना मिले। पूरी मजदूरी चाहे। धीरे-धीरे चिल्लाहट शुरू हो गयी। विद्वानों का महासम्मेलन स्थगित कर दिया गया। लेबरों को पैसा दिलाया गया। एक वाक्य भी भाड़े के पाठकों पर असर नहीं पड़ा। आखिर इनकी विद्वत्ता होने के बावजूद पाठक भाड़े के मंगाये गये। आज के डेट में पाठक मिलना मुश्किल कितना है।

नेताओं के चुनावी लक्षण (हास्य-व्यंग्य)

चुनाव आते ही नेताओं के लक्षणों में नई-नई शाखायें निकल आती हैं। उदार टाइप के हो जाते हैं। नरम व्यवहार पनपने लगते है। समाज में अपने से छोटों को भी पैर छूने में कोई परहेज नहीं करते हैं। किसी भी प्रकार का गुस्सा मुखौटो पर नहीं लाते हैं।

उनका जनता के प्रति समर्पण देखा जा सकता है। हाल- चाल लेने में तेजी आ जाती हैं। फोड़ा-फुंसी का मलहम लगाते मिल जायेंगें। अस्पतालों में कम दाम वाले केले बांटते मिल जायेंगें। कंम्बल भी सस्ता लिये घूमते हैं, कोई ठंड से कांपते मिल गया तो दान-धरम करके पुण्य अर्जित करते दिखाई दे जाते हैं।

कोई ऐब नहीं दिखाई देखा। वे इतने मासूम से नजर आयेंगे कि आपका ह्दय मोम की तरह पिघल जायेगा। आप खुद उनके समर्पित भक्त हो जायेंगें। उनको पीड़ाहारी बाम की तरह समझने लगेंगें। दर्द निवारक दवा से भी तेज आपका दुख दर्द ठीक कर देंगें।

ऐसे नेताओं के चमचे भी कंठी माला पहन लेते हैं जो नेताओं से मिलने नहीं देते थे वो आपका उनसे साक्षात दर्शन करा देते हैं, एकदम बगुला का भगत होना। बिल्कुल सफेद, कोई दाग नहीं लगा मिलेगा।

वादे ऐसा करेंगें कि जैसे लगता है जनता की टेड़ी कमर चुटकी बजाते ठीक कर देंगें। बुजुर्गो को मरने के भी परिवारीजनों को वृध्दा पेंशन दिलाने का वादा करेंगें। कोई विकास नहीं रूकेगा। विकास के नाम पर पानी की तरह पैसा बहा दूंगा। कोई धोखा नहीं होगा।

आम जनता इन्हीं सब लक्षणों से गदगद हो जाती है। जनता इतनी खुश हो जाती है कि अपना वोट देती ही है, एक फर्जी भी डालकर सुकून महसूस करता है। इस बार दादा के मौत के बाद भी पेंशन नहीं कटेगी। ऐसा नेता, हमारा नेता होगा। जो कुछ न लेता होगा।

गांव का लेखक शहर आया (हास्य-व्यंग्य)

गांव का एक लेखक शहर में आया और अपने लेखन से शहर में प्रसिद्धि मिलनी शुरू हो गयी। शहर के जो वरिष्ठ लेखक थे उन्हें घबड़ाहट हुई। अगर गांव का छोकरा आगे निकला तो हमारी धमक और चमक फीकी हो जायेगी।

आनन-फानन में फौरन वरिष्ठ लेखको ने एक सभा का आयोजन किया। इस लेखक को आगे आने से रोकने के लिये टांग अड़ाने का प्रस्ताव रखा गया कि इसको धक्का देकर धकेल दो, उसके लेखन को समाज विरोधी कह कर निंदा प्रस्ताव पास कर दिया गया।

यह जिम्मा उन साहित्यकारों के ठेकेदार को बुलाया गया। उसका सर्वप्रथम मुंह मीठा कराया गया, समोसा मिठाई सब खिला-पिलाकर एक क्वार्टर भी थमा दिया ताकि नशे में यह ठेकेदार अपनी करामात का जलवा बिखेर दे।

गांव का सीधा सादा लेखक शहरी तामझाम से दूर था। आते ही ठेकेदार ने उस पर पहला वाक्य प्रहार किया। इस लेखकी में कोई मजा नहीं है, दो पैसा जो जोड़कर रखे हो, गंवाकर घर चले जाओगे‌। पाई मात्रा बड़ा कमजोर है। लेखन करना तुम्हारे बस का नहीं है।

तुम गाजर मूली की तरह हो। बड़ा-बड़ा लेखक सब भरे पड़े हैं, उनका मुकाबला नहीं कर पाओगे। जाकर रोजी रोटी का प्रबंध करो। बच्चों की तरह लिखते हो। इतना छठवीं फेल बच्चा लिख लेगा। अभी तुम साहित्य के लल्लू पंजू आदमी हो। साहित्य का कोई बड़ा तीर नहीं चला पाओगे।

साहित्य का ठेकेदार ऐसा पहाड़ा पढाया गांव का लेखक ने सोंचा.. यह शहरी शराबी है। अनाप-सनाप बक रहा है। अरे साहब,आप के उपर... ई कुत्ता...। ई कुत्ता तो आपका पाजामा गीला कर दिया। धत्त तेरी की...। पूरा साहब ई कुत्ता आपका साहित्यिक प्रवचन सब सर्वनाश कर दिया। हम गांव के लेखक... आप जो समझाये हमरे कुछ पल्ले नाही पड़ा साहब। ठेकेदार कुत्ते को गालियां देते हुये भीड़ में गुम हो गया।

रायल्टी न मिलने पर मौत की किताब लिख दूं (हास्य-व्यंग्य)

मैं आधी रात को एक फूलों के बाग में घूमने गया था। एक खाली बेंच पर अकेले एक लेखक को उदास मुद्रा में बैठे देखा। उसका चेहरा लटका था। चेहरे पर स्पष्ट झुर्रिया नजर आ रही थी। बहुत चिंतित नजर आ रहा था। मैं उसके मासूम हालात को देखकर उसके करीब बैठ गया।

मैंने पूछा..आपके उदास चेहरे होने कारण जानना चाहता हूं कि आंधी रात में इतने उदास क्यों बैठे हैं, इस समय आपको शयनकक्ष में निद्रा में होना चाहिये। हालातों के मारे दिख रहे हैं, क्या किसी ने कोई ठेस पहुंचाई है जो इस सुनसान स्थल पर बैठे हुये है।

लेखक ने बताया.. वह कई सालों से मेहनत कर-करके सैंकड़ों पोथियां लिख डाली, जीवन की समस्त कमाई प्रकाशक के चरणों में अर्पित कर दिया।

शारीरिक सुख त्याग कर रात-रात जागकर पन्ने भरे हैं। एक भयंकर साहित्य की सेवा की है। दो रोटियां कम खाई लेकिन पाई-पाई जोड़ कर रखा सारा पैसा लगा दिया।

इस उम्मीद के साथ एक-एक पाई का हिसाब रायल्टी के रूप में मिल जायेगी। अंतिम दौर है जीवन का अगर इसका हिसाब किताब प्रकाशक कर देता तो हम पूंजीपतियों की श्रेणी में आ जाते। हमारी भी मेहनत का जुगाड़ हो जाता।

हमारा प्रकाशक केवल अपना पेट भरना चाहता है। मेहनत हम करे मजदूरी प्रकाशक खाये, हमारे पैसे को गुलछर्रे विदेशों में उड़ा रहा है। पत्नी को मर्सडीज में लेकर घूम रहा है।

हमारा प्रकाशक बेवकूफ़ है। दुनिया को बेवकूफ बनाया जा सकता है। झूंठे हल्ला मचा देता कि इस लेखक को पचास लाख की राय्ल्टी दी जा रही है। इतने में खुद हम प्रचारित हो जाते।।

लोगों की जिज्ञासा बढ जाती और खरीद-खरीद कर किताब मेरी पढते। लेखक को मिल रही रायल्टी वाली किताब में आखिर है क्या? लाखों पुस्तकें बिक जाती।

हे मानव, मेरी समस्त उदासी का यही कारण है। रायल्टी की एक या दो खेप मिल जाती तो हमें भी संतोष रहता, अब रहा नहीं जा है, अब तो अंतिम इच्छा है कि रात को इसी बेंच पर अपनी मौत की किताब लिख दूं।

साहित्यिक मठाधीशों को राहत (हास्य-व्यंग्य)

साहित्यिक सूची में एक बड़े लेखक का नाम नहीं था। लेखक के चेहरे पर पसीना ही पसीना बह गया। बहुत निराशा हाथ लगी। उन्हें महसूस होने लगा कि जैसे अब वे लेखक नहीं रह गये। एक बार आशा जगी, हो सकता है बीच में मेरा नाम हो, सूची आराम-आराम से देखा, अंतिम नाम तक देखा लेकिन सूची में नाम नहीं था।

सूची बनाने वाले तेरे मन में क्या समाई जो तूने मेरे नाम की धज्जियाँ उड़ाई। लेखक हूं। बड़ा-बड़ा अवार्ड जीता हूं। लम्बी-लम्बी पोथी लिखा हूं। रात-रात कलम घिसा हूं। मैं भी साहित्यिक नक्षत्र हूं। इस सूची में जिनका नाम है क्या वे साहित्यिक ध्रुवतारा हैं?

ऐसे नहीं बाल पके हैं, गीता, रामायण, पुराण सब याद है। सरकार से पूछ लो, गांववालो से पूछ लीजिये। पत्र पत्रिकाओं के लिये थोक में लिखा हूं। हमका ऐरा-गैरा नत्थूलाल समझ लिये हैं। अरे गूगल से पूछ लेते। गूगल खुद बता देता। का कौनऊ लेखक से कम हैं हम।

गोरी-गोरी लेखिकाओं का नाम ठूस दिया, कल की जन्मी आज सूची में पहला नाम है। दो चार लाइन मोहब्बत की क्या सुना दिया उसका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा गया।

हद हो गयी भाई। बदला लूंगा इस सूची बनाने वाली संस्था से, कोर्ट कचेहरी सब एक कर दूंगा। हमका कंगला समझा है, कहे होता तो हम भी लाल-लाल, हरी-हरी नोटों की गड्डी थमा देता।

लेखक को रातभर नींद नहीं आयी, बेचारे काटो तो खून नहीं।कुछ नहीं अच्छा लग रहा था। बिन खाये खाट पर पड़ा रहा। अभी सूची बनानेवाला मिल जाये तो गला घोँट दूं। यह अन्याय होने नहीं दूंगा। मरते दम तक लड़ाई लड़ी जायेगी।

लेखक बेचारे को सदमा लग गया। सब अस्पताल ले गये लेकिन ईश्वर को कुछ और मंजूर था। इस लोक से चले गये।

अंत में साहित्यिक मठाधीशों ने इस लेखक की मृत्यु के बाद राहत की सांस ली

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